9b45ec62875741f6af1713a0dcce3009 Indian History: reveal the Past: कन्नौज का युद्ध 1540

सोमवार, 10 जून 2024

कन्नौज का युद्ध 1540

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प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम कन्नौज के युद्ध तथा इसके मुख्य पात्र हुमायूँ एवं शेरशाह सूरी के बारे में चर्चा करेंगे।.युद्ध के दौरान भारत में हुए परिवर्तन के बारे में चर्चा करेंगे।

युद्ध का मुख्य कारण

कन्नौज के युद्ध का मुख्य कारण शेरशाह द्वारा जिती गयी अपनी रियासतों को वापिस लेना था।.हुमायूँ तथा शेरशाह के मध्य हुए चौंसा के युद्ध में शेरशाह द्वारा उत्तरी भारत,पाकिस्तान तथा अफगानिस्तान के क्षेत्र को उससे छिन लिया गया था। दूसरी तरफ शेरशाह द्वारा चौंसा का युद्ध सम्पुर्ण मुग़ल सेना तथा प्रशासन को पुरी तरह से समाप्त करना था। अतः कन्नौज के युद्ध मे अपने भाईयों के समर्थन से शेरशाह पर हुमायूँ ने आक्रमण किया ताकि अपने खोये हुए राज्य को वापिस ले सके।

युद्ध कि प्रारम्भीक घटना

यह युद्ध 17 मई 1540 ई0 के उत्तर प्रदेश के कन्नौज जिले में लड़ा गया। इस युद्ध को बिल ग्राम के युद्ध के नाम से भी जाना जाता है। चौसा के युद्ध में अपनी पराजय के बाद हिमायूँ को गंगा नदी में कूदकर भागना पड़ा।. कुछ समय बाद हुमायूँ अपने भाईयों के समर्थन से सेना एकत्रित करके दुबारा आगरा आया। कन्नौज के युद्ध में हुमायूँ के भाई हिंदाल मिर्जा ने अपनी सेना देकर समर्थन किया वहिं दूसरे भाई कामरान मिर्ज़ा अपना समर्थन देने से इन्कार कर दिया। दरासल कामरान मिर्ज़ा स्वयं कन्नौज पर शासन करना चाहते थे। इसके साथ ही कामरान मिर्जा पंजाब और अफ्गनिस्तान की सुरक्षा को लेकर भी परेशान था। दूसरा भाई हिंदाल सिंध पर नियंत्रण करना चाहता था। परन्तु शेरशाह कि सेना का समाना वे नहीं कर पाया अन्त में अपनी सेना के साथ लाहौर चला गया। इन सभी घटनाओं के बावजूद हुमायूँ ने सेना एकत्रीत करने में सफल रहा। सर्वप्रथम चोंसा के युद्ध में हार के बाद हुमायूं ने आगरा आकर अपने भाई हिं दाल मिर्जा के अव्यवस्थित प्रशासन को सुव्यवस्थित किया। भाईयों के सहयोग से 40000 सैनिकों कि सेना का गठन किया।

युद्ध में हार का मुख्य कारण

सेना एकत्रित करने का बाद हुमायूँ गंगा पार करके कन्नौज पहुंचा, दूसरी तरफ शेरशाह मात्र 15000 सैनिकों के साथ हुमांयू का मुकाबला करने के लिए तैयार खड़ा था अपना सेना के साथ।.शेरशाह को अपने सैनिकों पर विश्वास था कि 40000 सैनिकों के लिए मेरे इतने ही सैनिक काफी है।.युद्ध के दौरान शेरशाह कि सेना ने देखा कि कुछ रईस अफगानों द्वारा पहचाने जाने के ड़र से अपना प्रतीक चिन्ह छुपा रहे है। दरअसल चौसा के यूद्ध के बाद शेर शाह ने खुद को सुल्तान घोषित कर दिया था जो कि हुमायूँ कि मुगल सेना कि दहशत का मु्ख्य कारण था।.उपरोक्त कारण के साथ हि युद्ध के मैदान में हुमायूं ने मुगल सेना का अपमान किया जिससे शेरशाह कि मुगल सेना को तो कोई फर्क नही पड़ा मगर हुमायूँ की मुगल सेना मैदान छोड़कर भागने लगी जो उसकी हार का मु्ख्य कारण बना। अतः एक बार फिर हुनायूँ को युद्ध का मैदान छोड़कर भागना पडा। परिणामस्वरुप शेर शाह द्वारा उसे भगोड़ा घोषित किया गया। इतिहासकार मिर्ज़ा मुहम्मद हैदर दुगलत ने अपनी किताब तारीखी-ए-रशीदी में लिखा हुमायूँ की हार का मुख्य कारण उसके आमीरों द्वारा गलत निर्णय लेने कि क्षमता तथा दूरदर्शी सोच की कमी बताया।

युद्ध कि बाद कि घटना

चौंसा के युद्ध को हारने के बाद हि हुमायू बिना राज्य का राजा था। उसने 15 साल अज्ञातवास मि बिताये ताकि बदला लेने कि आग ठण्ड़ी न पड़े। अतः कन्नौज में दोबारा हार के बाद उसने आगरा कि तरफ भागा मगर शेर शाह को सैनिकों का पिछा करने के कारण वे आगरा रुक न सका और लाहौर अपने भाई पास शरण लेने के लिये गया अभी वह लाहौर पहुंचा भी नहीं था कि हुमायूं को खबर मिली कि शेर शाह ने आगरा और दिल्ली पर भी अपना अधिकार कर लिया और सूरी साम्राज्य की स्थापना कर दी। जिसके बाद सिंध कि तरफ चला गया।

मिर्जा मुहम्मद हैदर तुगलक

वे एक इतिहासकार होने के सात हि वे तुर्की मंगौल सेना के जर्नल थे और कश्मीर के गवर्नर भी। इस मुगल राजकुमार का जन्म 1499-1500 ई0 के बीच ताशकंद मुगलिस्तान में हुआ।.ये बाबर के चचेरे भाई थे इनका पुरा नाम मिर्जा मुहम्मद हैदर दुगलत इब्र मुहम्मद हुसैन मिर्जा कुर्कन था। इनकी माँ का नाम माँ खून निगार खानिम था जो दौलत बेगम की जन्मी यूनुस खान कि तीसरी बेटी थी और बाबर की माँ कुतलुक निगार खानिम की छोटी बहन थीं। मिर्जा मुहम्मद हैदर ने 1540-1551 तक कश्मीर में शासन किया। एक युद्ध के दौरान इनकी मौत हुईं।.

शेर शाह सूरी

शेर शाह सूरी,जिनका असली नाम फ़रीद खान था। एक महान भारतीय शासक और सूर वंश के संस्थापक थे। उनका जन्म 1486 में हुआ था और वह भारत में अफ़गान मूल के एक प्रमुख शासक बने। शेर शाह सूरी ने 1540 से 1545 तक शासन किया और अपने छोटे लेकिन प्रभावशाली शासन काल में अनेक सुधार किए, जिनका प्रभाव भारतीय प्रशासन पर दीर्घकालिक रहा।

शेर शाह सूरी के प्रमुख योगदान

  1. प्रशासनिक सुधार- शेर शाह सूरी ने एक संगठित प्रशासनिक ढांचा स्थापित किया। उन्होंने भूमि राजस्व प्रणाली को पुनर्गठित किया और पट्टा और कबूलियत की प्रणाली शुरू की, जिससे किसानों को अधिक स्थिरता मिली।
  2. सड़क और संचार- उन्होंने ग्राैंड ट्रंक रोड (GT Road) का निर्माण किया, जो बंगाल से लेकर पेशावर तक फैली हुई थी। यह सड़क आज भी महत्वपूर्ण मार्गों में से एक है।
  3. मुद्रा प्रणाली- शेर शाह सूरी ने एक स्थिर मुद्रा प्रणाली शुरू की, जिसमें चांदी के रुपये और तांबे के सिक्के शामिल थे। इस प्रणाली को बाद में मुगल शासकों ने भी अपनाया।
  4. सैन्य संगठन- उन्होंने अपनी सेना को संगठित और अनुशासित किया, जिससे उन्हें अपने दुश्मनों पर विजय प्राप्त करने में मदद मिली।
  5. शासन में सुधार-शेर शाह सूरी ने अपने राज्य में कानून और व्यवस्था को बनाए रखने के लिए कठोर कदम उठाए और न्यायिक प्रणाली को मजबूत किया।

शेर शाह सूरी की प्रमुख उपलब्धियाँ

  • चूनार और रोहतास के किले-उन्होंने कई महत्वपूर्ण किलों का निर्माण किया और पुराने किलों का पुनर्निर्माण किया, जिनमें चुनार और रोह तास के किले शामिल हैं।
  • शेर शाह सूरी का निधन 1545 में कालिंजर के किले की घेराबंदी के दौरान हुआ। उनके शासन काल ने भारतीय इतिहास पर एक गहरा प्रभाव छोड़ा और उनकी नीतियों को मुगलों ने भी अपनाया। शेर शाह सूरी को उनके प्रशासनिक कौशल और दूरदर्शिता के लिए आज भी याद किया जाता है।

हुमायूँ

हुमायूँ,जिनका पूरा नाम नासिर-उद-दीन मुहम्मद हुमायूँ था, मुगल सम्राट बाबर के बेटे और मुगल साम्राज्य के दूसरे शासक थे। उनका जन्म 6 मार्च 1508 को काबूल, अफ्गानिस्तान में हुआ था। हुमायूं ने 1530 से 1540 और फिर 1555 से 1556 तक शासन किया।

हुमायूँ का जीवन और शासनकाल

प्रारंभिक जीवन-हुमायूँ का जन्म मुगल साम्राज्य के संस्थापक बाबर के परिवार में हुआ था। उनके पिता ने उन्हें भारत के कुछ हिस्सों का गवर्नर नियुक्त किया था। जिससे उन्होंने प्रशासनिक अनुभव प्राप्त किया।

प्रथम शासन काल (1530-1540)

  • बाबर की मृत्यु के बाद1530 में बाबर की मृत्यु के बाद हुमायूँ ने मुगल साम्राज्य की गद्दी संभाली। उनका शासन काल शुरुआती समस्याओं से भरा था। क्योंकि उनके भाईयों और अफगान शासकों ने उनके खिलाफ विद्रोह किया था।
  • शेर शाह सूरी से हार 1540 में हुमायूँ को शेर शाह सूरी के हाथों कन्नौज की लड़ाई में हार का सामना करना पड़ा और उन्हें भारत से भागकर फारस (वर्तमान ईरान) में शरण लेनी पड़ी।

निर्वासन (1540-1555)

  • फारस में निर्वासन-निर्वासन के दौरान हुमायू ने शाह तहमास्प प्रथम से सहायता प्राप्त की। फारस में उन्होंने कुछ समय बिताया और वहां से उन्हें सैन्य समर्थन मिला।
  • साम्राज्य की पुनः स्थापना-1555 में हुमायू ने फारसी सहायता से दिल्ली और आगरा पर पुनः कब्जा कर लिया और मुगल साम्राज्य को पुनः स्थापित किया।

द्वितीय शासन काल और मृत्यु (1555-1556)

  • अल्पकालिक पुनः शासन-हुमायू का दूसरा शासन काल बहुत ही छोटा रहा। उन्होंने प्रशासनिक सुधारों को लागू करने का प्रयास किया लेकिन अपने पूर्ववर्ती की तुलना में वह कम प्रभावी रहे।
  • मृत्यु-27 जनवरी 1556 को हुमायू की मृत्यु सीढ़ियों से गिरने के कारण हुई। उनकी मृत्यु के बाद उनके बेटे अकबर ने गद्दी संभाली और मुगल साम्राज्य को अपनी नई ऊँचाइयों पर पहुँचाया।

हुमायूँ की प्रमुख उपलब्धियाँ और योगदान

  • दिल्ली में हुमायूँ का मकबरा-उनकी पत्नी हमीदा बानो बेगम ने दिल्ली में हुमायूँ का मकबरा बनवाया, जो आज भारतीय स्थापत्या कला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है और यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है।
  • मुगल साम्राज्य की पुन-स्थापना हुमायूँ की सबसे बड़ी उपलब्धि उनके दूसरे शासन काल में मुगल साम्राज्य की पुनः स्थापना थी, जिससे उनके बेटे अकबर को एक मजबूत आधार मिला।हुमायूँ का जीवन संघर्ष और पुनःस्थापना का प्रतीक था। उनके शासन काल ने मुगल साम्राज्य को स्थायित्व और संरचना प्रदान की, जिससे उनके उत्तराधिकारी अकबर ने एक महान साम्राज्य का निर्माण किया।

हुमायूँ का मकबरा

हुमायूँ का मकबरा दिल्ली में स्थित एक प्रमुख ऐतिहासिक स्थल है, जिसे मुग़ल स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है। इस मकबरे का निर्माण हुमायूँ की पत्नी, हमिदा बानो बेगम ने 1569-1570 के बीच करवाया था, और इसे भारतीय उप महाद्वीप में मुग़ल वास्तुकला के पहले महत्त्वपूर्ण स्मारक के रूप में देखा जाता है।

 विशेषताएँ और महत्व

स्थापत्य कला
  • डिज़ाइन और शैली-हुमायूँ का मकबरा मुग़ल और फारसी स्थापत्य शैलियों का मिश्रण है। इसे मिर्ज़ा घियास द्वारा डिज़ाइन किया गया था, जो एक फारसी वास्तुकार थे। मकबरे की संरचना में लाल बलुआ पत्थर और संगमरमर का व्यापक उपयोग किया गया है।
  • उद्यान और चार बाग़ शैली-मकबरे के चारों ओर चार बाग़ शैली के उद्यान बनाए गए हैं, जो फारसी बाग वानी शैली का एक प्रतीक है। इस उद्यान को चार समान भागों में विभाजित किया गया है, जो इस्लामिक पारंपरिक उद्यान योजना का हिस्सा हैं।
  • मुख्य मकबरा-हुमायूँ का मकबरा एक विशाल मंच पर स्थित है और इसमें एक गुंबद है जो इसकी प्रमुखता को और बढ़ाता है। मुख्य गुंबद के चारों ओर छोटे-छोटे गुंबद भी हैं, जो इसकी सुंदरता को और अधिक बढ़ाते हैं।
ऐतिहासिक महत्व
  • मुग़ल स्थापत्य कला की शुरुआत-हुमायूँ का मकबरा भारतीय उप महाद्वीप में मुग़ल स्थापत्य कला की शुरुआत का प्रतीक है। यह ताजमहल के निर्माण के लिए प्रेरणा स्रोत भी माना जाता है।
  • विश्व धरोहर स्थल-1993 में,हुमायूँ के मकबरे को यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता दी गई। यह स्थल भारतीय इतिहास और संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
  • दरवाजे और प्रवेश द्वार-मकबरे का मुख्य प्रवेश द्वार बहुत भव्य है और इसे इस्लामिक शैली में सजाया गया है। इसके दरवाजे और मेहराबें बहुत ही सुंदर और आकर्षक हैं।
  • जल प्रबंधन-मकबरे के चारों ओर जल प्रबंधन की भी व्यवस्था की गई है, जिसमें फव्वारे और नहरें शामिल हैं। यह तत्कालीन समय के जल प्रबंधन की उन्नत प्रणाली को दर्शाता है।

महत्व और प्रभाव

हुमायूँ का मकबरा न केवल स्थापत्य कला का उत्कृष्ट नमूना ही नही,बल्कि यह भारतीय उपमहाद्वीप की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह स्मारक मुग़ल शासकों की महानता और उनके स्थापत्य कौशल का प्रमाण है।

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