9b45ec62875741f6af1713a0dcce3009 Indian History: reveal the Past: प्रीह विहार मंदिर

बुधवार, 31 दिसंबर 2025

प्रीह विहार मंदिर

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 प्रस्तावना 

प्रस्तुत लेख में हम बात करने जा रहे थाइलैंड के फोनम रंग मंदिर के बारे में जो कि भगवान शिव के समर्पित है। मंदिर की खास बात यह की मंदिर स्थापित किया गये शिवलिंग का सम्बन्ध सिधा आयुर्वेद विज्ञान से है। यह इस लिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जिस प्रकार मंदिरों का इतिहास बहुत प्राचीन है ठीक उसी प्रकार आयुर्वेद विज्ञान का इतिहास भी बहुत प्राचीन है। और यह दोनों ही तथ्य हमारे भारतीय समाज एवं हिंदु धर्म से सम्बन्धित है।.
 
यह उपचार की वह शाखा है जिसे भारतीय समाज में विकसित किया गया। इस विज्ञान में उपचार के दौरान प्राकृतिक फल, फूल, पत्तियों एवं जड़ों का इस्तेमाल किया जाता है। आयुर्वेद विज्ञान कि सबसे बड़ी कमी यह है कि इसके द्वारा उपचार में समय बहुत अधिक लगता है ,लेकिन आपको बताते चले कि यही इस विज्ञान का महत्वपूर्ण पहलू भी है । क्योंकि जब हम किसी आयुर्वेदिक दवा का सेवन करते है तो इस दौरान शरीर में रासायनिक अभिक्रिया धिरे-धिरे काम करती है जिससे इस दवा के लाभ और शारीरिक हानि के बारे में पहले से ही पता चल जाता है। जिसके चलते शरीर के किसी भी अंग को पुरी तरह खराब होने से पहले ठीक किया जा सकता है।. वहीं एलोपैथिक दवाओं एवं रासायनिक दवाओं को खाने से आये दिन लाखों लोगों की मौत ( किडनी फेलियर , हार्ट अटैक य शरीर में किसी नयी बीमारियों के बनने के कारण होती रहती है।.

उदाहरण के लिए

हाल ही समय में मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के राज्यों में Phensedyl cough syrup से 18-19 नवजात बच्चों कि जान चली गयी। घटना के होने के बाद सरकार हरकत में आयी और इस सिरप के बैन किया गया। आपको बताते चले कि यह दवा जानी मानी कंपनी ABBOT द्वारा बनायी जाती थी यानी के यह एक  पेटेंट दवा थी। इस दवा जांच में कई सरकारी अधिकारियों के नाम भी सामने आये जो कि इस दवा के व्यापार में अहम भूमिका निभाते थे। अब आप समझ गये होंगे कि किस प्रकार आयुर्वेद विज्ञान हमारे लिए अहम है।

मंदिर का इतिहास

यह मंदिर थाईलैंड के बुरी राम प्रांत के एक विलुप्त ज्वालामुखी के किनारे पर बनाया गया है। यह मंदिर कंबोडिया और थाईलैंड की सीमा पर डांगरेक पर्वत श्रृंखला की चोटी पर बना है । पुरातत्व  खोज कर्ताओं द्वारा यह अनुमानित किया गया है कि मंदिर का निर्माण 10वीं से 13वीं शताब्दी के बीच किया गया है। मंदिर सामान्य भू-स्थल भाग से 402 मीटर की उंचाई पर है जो कि भगवान शिव को समर्पित है। वर्ष 2008 में इसे युनेस्को की विश्व धरोहर कि सूची में शामिल किया गया।.

मुख्य विशेषताए

मंदिर की बनावट ही इसके निर्माण का आकर्षक बिन्दु है। मंदिर का प्राचीन शिवलिंग अब विलुप्त हो चुका है । उस स्थान पर पत्थर के नवीनतम शिवलिंग को स्थापित किया गया। शिवलिंग पर अर्पित जल का निकासी द्वार आयुर्वेद विज्ञान के प्राचीन रहस्यों को उजागर करता है क्योंकि यह जल ही औषधि का कार्य करता था। आगे के लेख में हम इसके बारे में गहनता से विचार करेंगे।

वास्तुकला

 मंदिर का निर्माण बलुआ पत्थर लेटराईट और ईंटों के संयोजन से किया गया है। मुख्य मीनार का निर्माण गुलाबी बलुआ पत्थर से किया गया है। जिसके कारण मंदिर को स्टोन कैसल के नाम से भी जाना जाता है।
ऐतिहासिक महत्व
यह थाईलैंड में सबसे महत्वपूर्ण और प्रभावशाली खमेर मंदिरों से से एक है। खमेर शिलालेख के अनुसार फनोम रुंग नाम खमेर भाषा के वानंग रुंग से लिया गया है जिसका अर्थ है विशाल पर्वत।.

सरंक्षण 

थाईलैंड के ललित कला विभाग ने 1970 के दशक में व्यापक जीर्गोद्धार कार्य किया  और 1988 में इस मंदिर को अधिकारिक तौर पर फानोम रुंग हिस्टोरिकल पार्क के रुप में खोला गया।.

नवपशना

इस मंदिर का शिवलिंग 9 प्रकार के ज़हर को मिलाकर बनाया गया था जिसे नवपशना कहते है। नवपशना शब्द का अर्थ नव-9 और पशना - ज़हर होता है। अब यह सवाल उठता है कि इस शिवलिंग को 9 प्रकार के ज़हर के मिलान से क्यों बनाया गया । इस पीछे वैज्ञानिकों ने तर्क दिया की इन तत्वों के अलग-अलग सेवन करने से यह ज़हर के समान प्रतिक्रिया करते है, मगर इन्हें एक साथ मिलाकर अद्भुत उपचार गुण प्राप्त किए जा सकते है। जब शिवलिंग पर जल अर्पित किया जाता है तो वह जल अथवा दूध  इन तत्वों के समर्पक में आकर अपने साथ इन तत्वों के कुछ कण बहा ले जाता है। परिणामस्वरूप यह जल आयुर्वेदिक औषधि का रुप धारण कर लेता है जिसे बीमार लोगों में वितरित किया जाता था। इसी प्रकार की एक मूर्ति भारत के पलानी मंदिर में भी पायी जाती है जो कि इस मंदिर के समान ही सुप्रसिद्ध मूर्ति है जो कि 9 विष के संयोजन से बनायी गयी है।.

प्राचीन भूमिगत तकनीक का खुलासा

शिवलिंग से गिरे जल को बीमार लोगों में अर्पित करने से पहले इस तरल का शुद्धिकरण किया जाता था ताकि इसमें से विषैले पदार्थों बड़े टुकड़ों को अलग किया जा सकें और जल विषैला बनने कि अपेक्षा आयुर्वेद औषधि में परिवर्तित हो सके।. अतः इस प्रक्रिया चलते भूमिगत तकनीक का खुलासा होता है।.

निसबंधन प्रणाली

दोस्तों प्राचीन काल में  शिवलिंग एक गड्ढ़ा बना कर उसमें स्थापित किया जाता था जिसे यौनी कहते थे ताकि शिवलिंग पर अर्पित जल, शिवलिंग के निचले भाग से निकले। इस प्रकार शिवलिंग पर अर्पित जल अपने साथ शिवलिंग के कुछ कणों को बहा ले जाता था। मंदिर के शिवलिंग के  पास दो गड्ढे बनाये गये थे। जिनमें जल एकत्रित होकर आगे बढ़ता था प्रत्येक गड्ढे में जल निकासी के दो छेद बनाये गये थे।.

पहले छेद कि विशेषता

यह गड्ढे की ऊपरी तरफ होता था और हमेशा खुला रहता  था । अब प्रक्रिया समझें शिवलिंग से जब जल तीव्र गति से गड्ढे में आता है तो वह तीव्र गति से गड्ढे की सतह के पास चला जाता है जहां वे शिवलिंग के भारी कणों को छोड़कर आगे दूसरे गड्ढे की तरफ बढ़ता है जहां जल में शिवलिंग के बारीक कण जल के साथ जाते है। अब दूसरे गड्ढे में जल का शुद्धिकरण पिछले गड्ढे के समान होता है और आगे बढ़ता है। अब जल को फिर से शुद्ध करने के लिए नाली में अवरोध बनाये गये थे ताकि जल कुछ मात्रा में एकत्रित होकर तब आगे बढ़े। यहां जल के एकत्रित स्थान पर नाली में विपरीत दिशा में छोटे-छोटे छेद बनाये गये थे । ताकि शिवलिंग के जो बचे हुए बड़े कण पानी के साथ बह कर आगे आ गये है वे इन छिद्रों से बाहर निकल सके ।. इस प्रकार जल को कई बार शुद्धिकरण की प्रक्रिया से गुजरने के बाद हमें औषधि युक्त जल कि प्राप्ति होती है।.

दूसरे छेद का प्रयोग 

क्योंकि गड्ढ़े में की सतह में शिवलिंग के विषैले तत्वों कि भरमार थी जिसके कारण उन्हें हाथों से साफ करना हानिकारक था । अतः इन्हें बाहर निकालने के लिए इस दूसरे गड्ढ़े का इस्तेमाल किया जाता था। यानी हम कह सकते हैं कि दूसरे गड्ढे का इस्तेमाल साफ-सफाई के लिए किया जाता था।. पुरातत्व अभिलेखों से पता चला है कि इस प्रकार के जल का इस्तेमाल अरो कायशाला में किया जाता था। उस समय काल के  अस्पतालों को अरोकायशाला कहा जाता था।

सोर्स वीकिपीडिया textbook Praveen Mohan facebook page

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