हमारे इस ब्लॉग में भारतीय इतिहास, सांस्कृतिक इतिहास, राजवंशों आंदोलन स्टार्टअप टेक्नोलॉजी कला और वास्तुकला तथा आर्थिक इतिहास से संबंधित विषयों पर जानकारी दी जाती है। हम कम से कम शब्दों में ज़्यादा से ज़्यादा जानकारी देने की कोशिश कर रहे हैं।

गुरुवार, 28 मार्च 2024

कोया विद्रोह 1803-1882

koya rebellion

प्रस्तावना

क्या आपने कभी सोचा है कि एक समय ऐसा भी था जब भारत में लोगों की आवाज़ सुनी नहीं जाती थी?एक ऐसा समय आया था जब गरीब और निराधार लोगों के आवाज़ को दबाया गया था,लेकिन उनकी आवाज़ों ने अपनी ताक़त दिखाई। यहां हम बात कर रहे हैं कोया विद्रोह की,जिसने 1803 से 1882 तक भारत में धूम मचाई थी।.प्रस्तुत लेख में हम कोया विद्रोह के मुख्य कारणों तथा 1882 के वन अधिनीयम,विद्रोह के प्रमुख नेता टोंपा सौरा,अन्नत शौयार,अल्लूरी श्री राम राजू के बारे में जानेंगे।

विद्रोह के पिछे का कारण

क्या आप जानते हैं कोया विद्रोह का अर्थ क्या है? यह एक ऐसा विद्रोह था जिसने अपनी उत्कृष्टता के लिए प्रसिद्ध था,जिसने ब्रिटिश शासन के खिलाफ अपनी आवाज़ उठाई थी।1.अंग्रेजो द्वारा परम्परागत रुप से अदिवासियो के अधिकारो को समाप्त करना।2.सरकार की दादागिरी एवं साहूकारों का उत्पिड़न और शौषण। 3.ताडी जैसे घरेलु उत्पाद पर अबकारी अधिनियम लगाना आदि।

कोया विद्रोह की शुरुआत

कोया विद्रोह भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय है जिसमें कोया जनजाति के लोगों ने अपने अधिकारों के लिए विद्रोह किया। यह विद्रोह आंध्र प्रदेश के पूर्वी गोदावरी क्षेत्र के वर्तमान बिजापुर जीला के क्षेत्र में हुआ था। 1803 में विद्रोह कि शुरुआत होती है मगर अंग्रेजो द्वारा इसे दबा दिया जाता हैं। इसके बाद लगातार विद्रोह कि चिंगारी 1840,1845,1858,1861 तथा 1862 तक जलती बुझती रहती हैं। कोया विद्रोह, भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। यह एक ऐतिहासिक घटना थी जो भारत में उथल-पुथल मचा दी और जनता के बीच गहने विचारों को उत्पन्न किया।

विद्रोह का दो भागों में विभाजन

1. 1879 से 1882 तक

अपने शुरुआती चरण में कोया और कोंड़ आदिवासी जनजाति तथा सोरा नामक पहाडी जनजाति के सरदारों ने विद्रोह कि शुरुआत कि। मगर विद्रोह ने अपना विक्राल रुप सरदार टोंपा सौरा के नेतृत्व में लिया। हालांकि प्रशिक्षित सैनिकों तथा तकनीकि हथियारों के आगे वे टिक नहीं पाये मगर सम्पूर्ण जनजाति समूह को एक जूट करने में विद्रोह ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


2.
विद्रोह का दुसरा चरण 1882-1886 तक

1882 में अनन्त शैयार के नेतृत्व में विद्रोह ने अपना असली रुप धारण किया। इन्होंने राम सेडू नामक 500 सैनिकों कि एक विद्रोही सेना कि स्थापना कि जिन्होंने अंग्रेज सेना के छक्के छुडा दिये।.अनन्त शैयार के नेतृत्व में कई गोरिल्ला युध्द लड़े गये। अपने शुरुआती चरण में ये लोग अंग्रेजो को अपने क्षेत्र से भगाने का कार्य करते थे। मगर अंग्रेजो दौबारा हमला करने पर ये पकडे जाते थे और मार दिये जाते थें। क्येंकि हर बार अंग्रेज अपनी सेना को बढ़ा कर और नये तकनिकी हथियार लेकर लौटते थे। जिसके बारे में जानकारी न होने के कारण वे अपना बचाव करने मे असफल थे। अतः श्रीराम राजू ने सेना बागडोर अपने हाथों में ली।

श्री अल्लूरी सीता राम राजू

इनका पुरा नाम अल्लूरी श्री राम राजू य सीताराम राजू था। इनके बारे में एक कथा प्रचलित है कि जब वे युवास्था में थे तो इन्हें एक लडकी से  प्रेम हो गया था मगर अपतकालिन कारणों से उस लडकी कि मौत हो गयी। जिसकी याद में इन्होंने अपने नाम के आगे सीता का नाम जोड़ दिया और इनका पुरा नाम श्री अल्लूरि सीताराम राजू पड़ गया। इन्होंने सीता कि मौत के बाद सम्पूर्ण जीवन ब्रह्मचर्य को पालन करने कि कसम उठाई। प्रारम्भिक जीवन
इनका जन्म भारत के वर्तमान आंध्र प्रदेश के बिजापुर क्षेत्र के एक तेलगु परिवार में हुआ था। इनके पिता व्यंकट राम पेशे से एक वकील थे तथा इनकी माता सूर्या नारायणमा के धर्मपरायण गृहणी थी। इनके जन्म कि तिथी को लेकर मतभ्रम है।

विद्रोह में इनका योगदान
22 और 24 अगस्त 1922 के बीच राम राजू ने अन्नवरम्कृष्णा देवी पेटाराजवोम्मांगी, चिंतापल्ले, नरसीपट्टनम के आसपास के क्षेत्रीय थानों पर राम सेडू सेना ने श्री सिता राम राजू के नेतृत्व में हमला करके उनके हथियारों को अपने कब्जे में ले लिया जिसमें 26 बंदूके 2500 राऊण्ड गोला बारुद 6303 ली एनफिल्ड राईफल और एक रिवोलवर शामिल थी। 

जिसका प्रयोग अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह में किया गया। छापा मारने के बाद राम राजू स्टेशन की एक डायरी पर हस्ताक्षर करते और लूट के माल का विवरण देकर खुद को पकड़ने के लिए अंग्रोजो को चुनौती देते थे। बताया जाता हैं कि राम राजू ने अपने सहयोगियों को कह रखा था कि कोई भी भारतीय सैनिक को नहीं मारेगा। उनके द्वारा कियें गये प्रत्येक अभियान में भारतीय सैनिकों छोड़ दिया जाता था। उन पर अंग्रेजों द्वारा एक बडे़ इनाम कि घौषणा कि गई थी। अतः 6 जून 1924 अंग्रजों द्वारा इनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई।

1882 का वन अधिनियम कानून

1882 का वन अधिनियन कानून एक अत्यंत दुःखद और निराधार कानून था। यह कानून न केवल वन्य जीवों को अत्याचारित करता था बल्कि इससे जुड़े लोगों को भी दुखी किया था। यह कानून वन्य जीवों के संरक्षण की बजाय उनके विनाश को बढ़ाता था। जंगलों की विपणन और उनके संरक्षण के बारे में कोई ध्यान नहीं था जिससे जंगलों की विनाशकारी व्यवस्था होती चली गई। यह कानून वन्य जीवों के साथ-साथ उन लोगों की आत्मा को भी क्षति पहुंचाता था जो जंगलों से जुड़े हुए थे।

इस कानून ने जंगलों को निष्काषित कर दिया जिससे लोगों का जीवन और पर्यावरण दोनों ही प्रभावित हुआ। वन्य जीवों के संरक्षण के बजाय इस कानून ने उनका विनाश किया जो अंग्रेजों द्वारा किया गया एक अत्यंत दुखद और अमानवीय विचार था।

श्री राम राजू के शब्दों में
हमें ऐसे अनुचित कानूनों के खिलाफ आवाज उठाने की आवश्यकता हैताकि हम एक सामर्थ्यवान समाज बना सकें जहां प्राकृतिक संसाधनों का सम्मान किया जाता है और हर जीव को सम्मान मिलता है।

इसके बिना हम अपने आप को एक अन्यायपूर्ण और अस्वीकृत समाज में फंसा बैठेंगे। एक ऐसा अधिकार है जो किसी भूमि के स्वामी या अधीभोगी को उस हैसियत में उस भूमि के फायदा प्रद उपभोग के लिए किसी अन्य भूमि में या उस पर या उसके संबंध में जो उसकी अपनी नहीं है कोई बात करने और करते रहने के लिए या किसी बात का किया जाना रोकने और रोकते रहने के लिए पर्याप्त है।

अधिष्ठायी और अनूसेवी सम्पत्तियां और उनके स्वामी
वह भूमि जिसके फायदा प्रद उपभोग के लिए अधिकार विद्मान है अधिष्ठायी सम्पत्ति औऱ उसका स्वामी य अधभोहगी उसका अधिष्ठायी स्वामी कहलाता हैं वह भूमि पर भाप अधिरोपित है वह अनुसेवी सम्पत्ती और उसका स्वामी या अधभोगी अनुस्वामी कहलाते हैं।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें