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2026-03-07

भारत के गद्दार

the traitors india

प्रस्तावना 

प्रस्तुत  लेख में हम देश के उन गद्दारों के बारे में चर्चा करेंगे जो अगर न होते तो देश आज कुछ और ही होता । हम बात करने जा रहे है पंडित राम बहादुर सूर्य नारायण शर्मा  ,वीर भद्र तिवारी , जय जी राव सिंधिया , गंगू पंडित के बारे में जो देश के असली गद्दार थे। ये ऐसे लोग थे जो अपने स्वार्थ के लिए किसी भी हद तक गीर सकते है । इस लेख का मकसद ये बिल्कुल भी नहीं है कि आप किसी जाति धर्म विशेष के लोगों से नफरत करने लगें , हमारा मकसद बस इतना है कि आप जिस भी प्रकार के माहौल में रहते है अपने अगल-बगल के लोगों से सावधान रहे समय-समय पर लोगों को परखते रहें । क्योंकि संभवतया अगर यह इतिहास में हो सकता है तो भविष्य में भी हो सकता है। हलांकि ब्राह्मण समाज पर अतीत से लेकर अब तक उंगली उठती रही है मगर हर एक ब्राह्मण गलत नहीं होता वो भी चहते है कि देश तरक्की करें।

राम बहादूर सूर्य नारायण शर्मा

यह घटना 1930 की है सूर्य नारायण शर्मा ही वे शख्स थे जिन्होंने भगत सिंह को फांसी दिलाने के कार्य अंग्रेजों कि तरफ से किया था। इन्हें भी सब देश के गद्दार के रुप में जानते है। इस समय के दौरान भगत सिंह पुलिस कि हिरासत में थे उन्हें 1929 में केन्द्रीय विधानसभा परिषद पर बम कांड के चलते गिरफ्तार किया गया था।.मुकदमा 1929 से 1930 तक चला जिसके बाद सुख देव राज गुरु और भगत सिंह के साथ बटुकेश्वर दत्त के  फांसी की सज़ा सुनाई गयी थी। लाहौर षड्यंत्र तथा बटु केश्वर दत्त के बारे में हम आगे किसी अन्य लेख में बात करेंगे। आपको इन वकील साहब के नाम में जो राय बहादुर शब्द दिख रहा है वे एक ब्रिटिश कालीन उपाधि है जो अंग्रेजों ने इन्हें तब सम्मान में दी जब इन्होंने भगत सिंह को फांसी दिलाने में अहम भूमिका निभाई।. बताते चले कि सूर्य नारायण शर्मा आर एस एस के संस्थापक डा. केशव बलराम हेडगेवार के मित्र होने के साथ-साथ RSS के मुख्य सदस्य भी थे।.

वीर भद्र तिवारी 

राम भद्र तिवारी को ही कही-कही वीर भद्र तिवारी के नाम से जाना जाता है। इस व्यक्ति ने मात्रा 5000 के रुपये में लालच में आकर चन्द्र शेखर आज़ाद कि मुखबिरी की थी। यह घटना 1931 की है वीर भद्र तिवारी भी चन्द्र शेखर आज़ाद के संगठन हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक आर्मी (HSRA) की सेन्ट्रल कमेटी का हिस्सा था। हलांकि उसका सहयोगी यश पाल भी उसके साथ शामिल था जो कि खुद भी HSRA का सदस्य था लेकिन उसका पद वीर भद्र तिवारी कितना बड़ा नहीं था। अतः मुख्य दोषी वीर भद्र तिवारी ही था। वीर भद्र तिवारी उत्तर प्रदेश के जालौन जिले कि उरई तहसील मौहल्ला गोपालगंज का मूल निवासी था। 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में राम भद्र तिवारी ने ही सबसे चन्द्र शेखर आज़ाद को देखा था और तत्काल प्रभाव से इसकी जानकारी उसने पुलिस अधिकारी शम्भूनाथ को दी  और शम्भू नाथ ने इसकी सूचना अपने उच्च अधिकारी मैसर्स को दी।
सोर्स  दोस्तों इस घटना का पता हमें धर्मेंद्र गौड़ की किताब धर्मेंद्र गौंड़ की किताब ( आज़ाद की पिस्तौल और उसके गद्दार साथी ) से मिलता है। धर्मेन्द्र गौड़ कोई मामूली इंसान नही थे 1930 के समय वो ब्रिटिश पुलीस विभाग के सहायक केन्द्रीय गुप्तचर अधिकारी के तौर पर गुप्तचर विभाग में कार्यरत थे। अपने उच्च अधिकारी को रिपोर्ट देने के लिए वे अपने सामने होने वाली घटनाओं के एक डायरी में लिखते थे जिसे बाद में इस किताब का रुप दिया गया।.

जय जी राव सिंधिया

 इनका जन्म 19 जनवरी 1835 में हुआ था ये सिंधिया राजवंश के एक मराठा राजा थे । 1843 से 1886 के समय काल में यह ब्रिटिश राज के अधीन ग्वालियर के महाराजा का पद भार संभाला था। सिंधिया राज वंश ने 1818 में ही अंग्रेज़ हुकूमत से संधि कर ली थी । दोस्तों कहा यह भी जाता है कि 14 वर्ष कि आयु में राजगद्दी संभालने के कारण तथा कूटनीतिक दबाव और सुरक्षा कारणों के चलते इन्होंने अंग्रेज़ों का सहयोग किया और अंतिम समय में रानी लक्ष्मी बाई की मदद करने से इनकार कर दिया शायद यह अंग्रेज़ों कि चाल ही थी कि जब रानी ने ग्वालियर की और सैन्य सहायता के लिए रुख किया तो सिंधिया अपने सैनिकों और खजाने को छोड़कर आगरा भाग गये जिससे अंग्रेज़ों कि मदद करने की उनकी मंशा सामने आती है।.

गंगू पंडित

गंगू पंडित एक सारस्वत ब्राह्मण था जो कि कश्मीर से गुरु तेग बहादुर के दरबार में आया था और आनन्द पुर  साहिब में गुरु गोबिंद साहब के रसोई घर को संभालता था। ये एक कश्मीरी पंडित था। मुगलों के डर से यह दुबारा कश्मीर लौट गया था तब इसकी उम्र 25 वर्ष थी तीस की उम्र में यह फिर वापिस आया एक मुखबिर बन के और गोबिंद साहब की सेवा करनी प्रारम्भ की। 1704 के समय काल में गुरु गोबिंद सिंह जी और उनके साथी सिख साथी कुछ कारण वश आनंद पुर से बाहर थे तब आनंद पुर पर मुगलों का हमला हुआ। गंगू माता गुजरी और उनके दोनों बेटों को सुरक्षा का दावा करके धोखे से अपने गांव खोरही ले गया यहां उसकी पत्नी जो कि कश्मीर से आयी थी वे भी थी के तीनों अतिथियों को छोड़कर खुद मुगल गवर्नर वज़ीर खान के पास चला गया । इस प्रकार माता गुजरी और उनके बेटों को पकड़ लिया गया और मार दिया गया। गंगू को उसकी गद्दारी के बदले सर हिंद का राजपाल घोषित किया गया। 1710 में बंदा बहादुर ने गंगू की और उसकी पत्नी की हत्या कर दी इसके साथ गंगू की सैनिक टुकड़ी और पूरा गांव को आग लगा दी।
सोर्स विकीपिडीया, क्योरा, धर्मेंद्र गौड की डायरी 

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