प्रस्तावना
भारत की प्राचीन धार्मिक परंपराओं में बौद्ध धर्म का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रहा है। बौद्ध धर्म की स्थापना गौतम बुद्ध ने 6वीं शताब्दी ईसा पूर्व में की थी। यह धर्म अहिंसा, करुणा,समानता और मध्यम मार्ग का संदेश देता है। मौर्य सम्राट अशोक के समय बौद्ध धर्म अपने चरम पर था और भारत से बाहर भी तेजी से फैल रहा था।
लेकिन समय के साथ भारत में बौद्ध धर्म का प्रभाव कम होता गया और अंततः यह लगभग लुप्त हो गया। आज यह प्रश्न महत्वपूर्ण है कि इतना महान और लोकप्रिय धर्म भारत में क्यों कमजोर पड़ गया। इस लेख में हम बौद्ध धर्म के पतन के कारण विस्तार से समझेंगे।
लेख को प्रारम्भ करने से पहले हम अपने पाठकों को बताना चाहते है कि हम किसी भी धर्म का विरोध नही करते मगर हम इतना जरुर मान कर चलते है कि किसी धर्म में कोई खामी न हो यह विचार करने का विषय है क्योंकि प्रत्येक धर्म को किसी न किसी मनुष्य द्वारा ही बनाया गया है और मनुष्य गलतीयों को किये बिना कोई कार्य पूर्ण नही करता।
उदाहरण के लिए हम हिन्दू धर्म के देवता श्री राम जी को लेते है जिन्हे भगवान विष्णु का अवतार भी कहा जाता है। धर्म की मान्यता अनूसार कहा जाता है कि भगवान सब जानते है और हम सभी उस ईश्वर की संतान है और एक पिता अपनी संतान के साथ किसी भी तरह का भेद भाव नही कर सकता। लेकिन देखा जाये तो ये गलत है क्योंकि श्री राम ने यह भेदभाव किया है। उन्हें एक राजा के रुप में भी देखा जाये तब भी यह बात न्यायपुर्ण राजा के लिए उचित सिद्ध नही होती।
एक धोबी के कहने पर सीता जी को जंगल में भेजना किसी भी तरह से उचित न्याय नही हो सकता है। यह पुरे नारी समाज के लिए कंलक के समान था जीसकी भुक्त भोगी आज के समाज की स्त्रीयां भी हो रही हैं। हमारे विचार से किसी प्रति व्यक्ति द्वारा किये गये गलत क्रत्य के आधार पर पुरे समज को सजा देना किसी भी तरह से उचित न्याय नही है।
1.बौद्ध धर्म की आंतरिक कमजोरियाँ Internal Weaknesses
बौद्ध धर्म के पतन का सबसे बड़ा कारण इसकी अपनी आंतरिक समस्याएँ थीं।
1.संप्रदायों में विभाजन
समय के साथ बौद्ध धर्म दो प्रमुख शाखाओं में बंट गया। 1.हीनयान 2.महायान
इनके बीच विचारों का मतभेद बढ़ता गया। बाद में वज्रयान जैसे और संप्रदाय भी बने। इस विभाजन से धर्म की एकता कमजोर हो गई और आम जनता भ्रमित होने लगी।
2.अनुशासन में गिरावट
प्रारंभ में बौद्ध भिक्षु अत्यंत अनुशासित जीवन जीते थे, लेकिन बाद में मठों में विलासिता और भ्रष्टाचार बढ़ने लगा।इससे लोगों का विश्वास कम होने लगा।
ब्राह्मण धर्म का पुनरुत्थान
बौद्ध धर्म के पतन में ब्राह्मण धर्म हिंदू धर्म के पुनरुत्थान की भी बड़ी भूमिका रही।
1.भक्ति आंदोलन का प्रभाव- भक्ति आंदोलन के कारण लोगों को सरल पूजापद्धति और व्यक्तिगत ईश्वर की भक्ति का मार्ग मिला। इससे बौद्ध धर्म की तुलना में हिंदू धर्म अधिक आकर्षक लगने लगा।
2.बौद्ध विचारों का समावेश- हिंदू धर्म ने बौद्ध धर्म की कई शिक्षाओं को अपना लिया। यहाँ तक कि गौतम बुद्ध को विष्णु का अवतार माना जाने लगा। इससे बौद्ध धर्म की अलग पहचान कमजोर हो गई।
3.राजकीय संरक्षण का अभाव- बौद्ध धर्म के विकास में राजाओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा था।
1.अशोक के बाद बौद्ध धर्म को वैसा मजबूत संरक्षण नहीं मिला। अन्य राजाओं ने हिंदू धर्म को अधिक बढ़ावा दिया।
2.गुप्त काल में हिंदू धर्म का पुनरुत्थान हुआ और बौद्ध धर्म को कम समर्थन मिला। इससे इसका प्रभाव घटने लगा।
संस्कृत भाषा का प्रयोग
प्रारंभ में बौद्ध धर्म की शिक्षाएँ पाली भाषा में थीं,जो आम जनता के लिए सरल थी। लेकिन बाद में महायान संप्रदाय ने संस्कृत भाषा का उपयोग शुरू किया,जो कठिन थी और आम लोगों की समझ से बाहर थी। इससे बौद्ध धर्म जनसाधारण से दूर होता गया।
मठों की आर्थिक स्थिति
बौद्ध मठों की आर्थिक स्थिति भी पतन का एक बड़ा कारण बनी। मठों में धन और संपत्ति का संचय होने लगा, भिक्षु विलासिता में लिप्त हो गए। जनता से दूरी बढ़ने लगी इससे बौद्ध धर्म की सादगी और नैतिकता प्रभावित हुई।
विदेशी आक्रमण
विदेशी आक्रमणों ने बौद्ध धर्म को गहरा नुकसान पहुँचाया।
1.हूण आक्रमण-हूणों ने कई बौद्ध मठों और विश्वविद्यालयों को नष्ट कर दिया।
2.तुर्क और मुस्लिम आक्रमण-मध्यकाल में तुर्क आक्रमणकारियों ने बौद्ध संस्थानों को भारी क्षति पहुँचाई। विशेष रूप से नालंदा विश्वविद्यालय को नष्ट कर दिया गया, जो बौद्ध शिक्षा का प्रमुख केंद्र था। इससे बौद्ध धर्म की जड़ें कमजोर हो गईं।
बौद्ध धर्म का अत्यधिक दार्शनिक होना
समय के साथ बौद्ध धर्म अत्यधिक दार्शनिक और जटिल हो गया। आम जनता के लिए इसकी शिक्षाएँ कठिन हो गईं
साधारण लोग सरल धार्मिक मार्ग की ओर आकर्षित हुए इससे बौद्ध धर्म का जनाधार कम हो गया।
प्रतिस्पर्धा और अन्य धर्मों का प्रभाव
भारत में कई धर्मों और विचारधाराओं का विकास हुआ। हिंदू धर्म का पुनरुत्थान,जैन धर्म का प्रभाव बाद में इस्लाम का आगमन इन सभी ने बौद्ध धर्म को प्रतिस्पर्धा दी, जिससे इसका प्रभाव धीरे-धीरे कम होता गया।
सामाजिक कारण
1.जनता से दूरी-बौद्ध भिक्षु मठों में सीमित हो गए और आम जनता से उनका संपर्क कम हो गया।
2.जीवन शैली में बदलाव- समाज में बदलती जीवनशैली और आवश्यकताओं के कारण लोग नए धार्मिक मार्गों की ओर आकर्षित हुए।
नेतृत्व की कमी
समय के साथ बौद्ध धर्म में प्रभावशाली नेताओं की कमी हो गई। प्रारंभ में बुद्ध जैसे महान नेता थे बाद में वैसा नेतृत्व नहीं मिल पाया। इससे बौद्ध धर्म का प्रभाव कमजोर पड़ गया।
निष्कर्ष
बौद्ध धर्म का पतन एक जटिल प्रक्रिया थी, जिसमें कई आंतरिक और बाहरी कारण शामिल थे। संप्रदायों में विभाजन, अनुशासन में गिरावट, ब्राह्मण धर्म का पुनरुत्थान, राजकीय संरक्षण की कमी, विदेशी आक्रमण और सामाजिक बदलाव इन सभी ने मिलकर बौद्ध धर्म को कमजोर कर दिया।
हालांकि भारत में इसका पतन हुआ, लेकिन बौद्ध धर्म आज भी चीन, जापान, श्रीलंका और थाईलैंड जैसे देशों में अत्यंत प्रभावशाली है।अंततः, बौद्ध धर्म का इतिहास हमें यह सिखाता है कि किसी भी धर्म या विचारधारा की स्थिरता उसके मूल सिद्धांतों, अनुशासन और समय के साथ बदलाव की क्षमता पर निर्भर करती है।

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