प्रस्तावना
प्रस्तुत लेख में हम शैलेंद्र राजवंश के इतिहास पर प्रकाश डालेंगे। बताते चलें कि इस राजवंश को कुछ विद्वान भारतीय राजवंश नहीं मानते वहीं कुछ विद्वान हिंदू धर्म से सम्बन्धित होने के कारण भारतीय ही मानते है। शैलेंद्र राजवंश के लोग कट्टर बौध धर्म के अनुयायी थे। इस लेख में हम इस वंश के भारतीय सम्बन्ध तथा इनके साम्राज्य जो कि इंडोनेशिया मलेशिया एवं जावा जैसे देशों फैला हुआ था के बारे चर्चा करेंगे। इतिहास के पन्ने को पलटा जाए तो हमें पता चलता है कि यह राजवंश अपने समय काल में बहुत प्रभावशाली एवं शक्ति शाली हिंदू बौद्ध राजवंश था।
नाम की उत्पत्ति
शैलेंद्र शब्द का अर्थ है पर्वतों का राज हिन्दी में विच्छेदन करें तो हमें पता चलता है कि शैल यानी पर्वत इंद्र देवताओं का राजा इंद्र। आमतौर पर देखा जाए तो इस शब्द का प्रयोग भगवान शिव प्रयोग किया जाता है। इस वंश की उत्पत्ति की बात करें तो इतिहासकारों में इस बात पर मतभेद है कुछ इतिहासकार इन्हें दक्षिण भारत के राजवंश एवं शैल वंश से सम्बन्धित मानते है वही कुछ इतिहासकार इन्हें इंडोनेशिया के मूल निवासी मानते है जिन्होंने भारतीय संस्कृति एवं धर्म को अपनाया था। इनका समय काल 8वीं शताब्दी से 11वीं शताब्दी के बीच का माना जाता है।
धर्म और भाषा
शैलेंद्र वंश के लोग बौद्ध धर्म के कट्टर अनुयायी थे इन्होंने दक्षिण पूर्व एशिया में बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार में अहम भूमिका निभाई। हलांकि इन्होंने कभी हिन्दू धर्म का विरोध नहीं किया। इनके राज्य में शिव के भी उपासक तथा अन्य हिंदू देवताओं के उपासक थे जिसके चलते इन्होंने सप्रंग मन्दिर का निर्माण करवाया था। इन्होंने अपने ग्रंथ संस्कृत भाषा भारतीय पल्लव ग्रंथ लिपि को भी अपनाया। इस वंश के लोग कला प्रेमी भी थे।
बोरोबुदुर स्तूप
इंडोनेशिया के जावा में स्थित यह स्तूप शैलेंद्र राजाओं के संरक्षण में लगभग 780 से 825 ईस्वी के बीच बनाया गया था। जो कि बारीक नक्काशी के साथ-साथ मूर्तिकला एवं वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है। इस स्तूप को यूनेस्को की विश्व धरोहर की सूची में संरक्षित किया गया है। यह दुनिया का सबसे बड़ा बौद्ध स्तूप है जिसमें नौ प्लेट फार्म तथा बुद्ध की 504 मूर्तियां स्थापित की गईं हैं। इस मंदिर कि दीवारों पर बौद्ध दर्शन को तथा उनके जीवन के महत्वपूर्ण पल को दर्शाया गया है।
चांडी सेवूा candi sewu
यह इंडोवेशिया का दूसरा सबसे बड़ा बौद्ध मंदिर है जो प्रमबानान मंदिर के पास स्थित है।
चांडी कलसन candi kalasan
यह भी जावा का सबसे पुराना मंदिर है जिसे शैलेंद्र राजा ने अपने गुरु और देवी तारा के सम्मान में बनवाया था।
भारत के साथ सम्बन्ध
चोल एवं पाल राजवंश के राजाओं के साथ इस राजवंश के सांस्कृतिक व्यापारिक एवं कूटनीतिक सम्बन्ध थे। बताते चलें कि पाल राजाओं के साथ मिलकर शैलेंद्र वंश के राजा बाल पुत्र देव ने मिलकर मगध यानी बिहार के नालंदा विश्वविद्यालय में बौद्ध भिक्षुओं के रहने के लिए एक मठ मनवाया था। इस योजना को पूर्ण करने के लिए उन्होंने पाल राजा देव पाल से पांच गांवों को दान करने का अनुरोध किया था। इसका उल्लेख नालंदा ताम्र पत्र अभिलेख में मिलता है।
शुरुआती समय में शैलेंद्र राजाओं के भारतीय राजा राजा रज चोल तथा राजेंद्र चोल के साथ अच्छे संबंध थे। मगर राजनीतिक कारणों इनमें विरोध हो गया। विरोध से पहले शैलेंद्र राजा श्री मारविजयोत्तुंगवर्मन ने तमिलनाडु के नागपट्टिनम में चूड़ामणि विहार नामक बौद्ध मठ का निर्माण करवाया था। लेकिन इन राजाओं का समय काल बीतने का बाद चोल राजा राजेंद्र चोल ने शैलेंद्र साम्राज्य के राजा श्रीविजय पर व्यापारिक वर्चस्व चलते नौसैनिक हमला किया था।
नौवीं शताब्दी के समय काल में शैलेंद्र राजवंश का प्रशासन इंडोनेशिया में विस्तृत कम होने लगा जिसके बाद शैलेंद्र राजवंश ने सुमात्रा द्वीप वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किए। जिसके चलते सुमात्रा द्वीव के श्री विजय साम्राज्य के भी शासक बन गए और दोनों साम्राज्य की शक्ति एक हो गई। उपरोक्त कारणों के चलते मलक्का जलडमरुमध्य यानी strait of Malacca के व्यापारिक मार्ग को अपने नियंत्रण में कर लिया।
वंश के समाप्त होने का कारण
11वीं आते-आते चोल साम्राज्य के लगातार नौसैनिक हमलों तथा जावा के मताराम साम्राज्य के साथ आंतरिक संघर्षों के कारण शैलेंद्र वंश और श्री विजय वंश समाप्त हो गया।
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