प्रस्तावना
प्रस्तुत लेख में हम रानी अब्बक्का के बारे में जानेंगे उन्हें प्रथम स्वतंत्रता सेनानी के रुप में भी जाना जाता है। वर्तमान समय में भी दक्षिणी भारत के क्षेत्रों में रानी अब्बक्का को लोकगीतों तथा कहानीयों के माध्यम से याद किया जाता है। इसके साथ ही इन क्षेत्रों में प्रसिद्ध तुलु नाडू नाटक भी उन पर ही बनाया गया है। इन्होंने सर्वप्रथम भारतीय आक्रमणकारी पुर्तगालीयों को कई बार युद्ध में हराया लेकिन अपने पति द्वारा धोखा दिये जाने के कारण बंदी बना ली गयी।
इस लेख के माध्यम से हम उनके प्रारम्भिक जीवन तथा उनके द्वारा किए गए महत्वपूर्ण कार्य एवं उनके द्वारा लड़े गए महत्वपूर्ण युद्ध के बारे में चर्चा करेंगे। इसके साथ ही हम उनके प्रशासनिक व्यवस्था तथा राजनीतिक गतिविधियों के बारे में चर्चा करेंगे।
प्रारम्भिक जीवन
वे भारतीय तुलुवा वंश से थीं इस राज वंश का प्रशासन भारत के कर्नाटक राज्य तटीय क्षेत्र तुलु नाडु पर था। विजय नगर साम्राज्य के सामंत के रुप में चौटा तुलुवा वंश का राज घराना कार्य करता था। या ऐसा समझें की वे विजय नगर साम्राज्य के एक सहयोगी राजा के रुप में कार्य करते थे।इनकी राज धानी पु्ट्टिगे थी। उनके चाचा तिरुमला राय ने उन्हें चौटस समुदाय की प्राचीन वंश परम्परा अलियासंताना का पालन करते हुए उन्हें उल्लाल नगर की राजगद्दी पर बिठाने का कार्य किया। रानी अब्बाक्का ने बचपन से ही युद्ध कला और राज कला में प्रशिक्षण प्राप्त किया था। उन्हें बचपन से ही घुड़सवारी निशानेबाजी और तलवार बाजी का शौक था।
बताते चलें कि उल्लाल चौटा के राजा थिरुमाला राय तृतीया की राजधानी थी जो कि रानी अब्बक्का के पिता थे। यहां खास बात यह है कि रानी अब्बक्का किसी भी प्रकार से हिन्दू धर्म से सम्बन्धित नहीं थीं लेकिन इसके बावजूद उनकी प्रजा में सभी प्रकार के धर्मों के लोग शामिल थे। 16 शताब्दी में उनके शासन काल के दौरान शोध से पता चला है कि बेरी समुदाय के लोगों ने उनकी नौसेना में नाविक के रुप में कार्य किया था। इसके साथ ही जब रानी अब्बक्का ने जब मलाली बांध के निर्माण कार्य को जब स्वयं के निरीक्षण में करवाया तभी भी पत्थरों की पहचान और नक्काशी के लिए बेरी समुदाय के लोगों को ही चुना गया था।
उनकी सेना में सभी धर्म और जाति के लोग शामिल थे। इसके साथ ही उन्होंने कालीकट के ज़मोरिन शासक से गठबंधन किया था। इसके अलावा बिदनूर के प्रभावशाली एवं शक्तिशाली राजा वेंकटप्पनायका का सहयोग भी उन्हें मिला। जिसके कारण उन्होंने पुर्तगाली सेना को कई बार धुल चटाई।
इनके चाचा तिरुमला राय ने इनकी शादी मैंगलोर की बंगा रियासत के राजा लक्ष्मप्पा अरसा बंग राजा द्वितीय से करायी थी। हलांकि यह विवाह ज्यादा समय तक टिक नहीं पाया जिसके कारण रानी वापिस उल्लाल चौटा वापिस आना पड़ा।दरअसल मैंगलोर के राजा ने पुर्तगालीयों के साथ गठबंधन कर लिया था और ये लोग मिलकर तुलुवा वंश कि रियासत के अंतर्गत आने वाली मंगलौर बंदरगाह पर अपना शासन स्थापित करना चाहते थे।
मंगलौर बंदरगाह
उल्लाल नगर की यह बंदरगाह एक समृद्ध बंदरगाह थी जिसके माध्यम से अरब तथा पश्चिम के कई देशों के साथ व्यापार किया जाता था इसके साथ ही भारत देश के मसालों को अन्य देशों तक पहुंचाया जाता था। एक व्यापारिक केन्द्र होने के कारण तथा व्यापार में अधिक लाभ कमाने की मंशा से पुर्तगाली डच एवं ब्रिटिशस आपस में हमेशा लड़ते रहते और राजनीतिक चालें चलते रहते थे। मगर स्थानीय शासक की मजबूती के कारण हमेशा असफल होते रहते थे। हलांकि इस क्षेत्र के लोग अलग- अलग धर्मों से थे मगर इन्होंने जाति धर्म से ऊपर उठ कर एक मजबूत संगठन बना रहा था। जिसके कारण इस क्षेत्र में प्रवेश करने पर भी अन्य प्रशासकों को अनुमति लेनी पड़ती थी।
पुर्तगालीयों के साथ यू्द्ध
रानी अब्बक्का ने पुर्तगालीयों के हमलों को चार दशकों तक विफल किया मगर अंत में हार का सामना उन्हें करना पड़ा। यहां हम कुछ महत्वपूर्ण युद्धों के बारे में ही चर्चा करेंगे जो की महत्वपूर्ण है।
1525 का युद्ध
इस समय काल में रानी हाल ही में गद्दी पर बैठीं थी पुर्तगालीयों को लगा एक रानी को हराना बहोत ही आसान होगा। इसलिए उन्होंने गोवा क्षेत्र पर विजय प्राप्त करने के बाद उल्लाल चौटा पर आक्रमण किया और उन्हें बुरी हार का सामना करना पड़ा।
1555 का युद्ध
इस युद्ध का नेतृत्व पुर्तगालीयों की तरफ से एडमिरल डोम अव्वारो दा सिल्वेरा ने किया। इस युद्ध की शुरुआत पुर्तगालीयों द्वारा कर देने के लिए मजबूर करने के कारण हुई जिसके विपरीत रानी से सिधा कर देने से इनकार कर दिया। इस बार भी पुर्तगालीयों को हार का सामना करना पड़ा।
1557 का युद्ध
इस पुर्तगालियों ने मंगलौर को लुटा और उसे बरबाद कर दिया लेकिन इस बार भी अंत में जीत रानी अब्बक्का की ही हुई। हलांकि लूटपाट एवं इमारतों के नष्ट होने के कारण रानी अब्बक्का को भी भारी नुकसान का सामना करना पड़ा।
1568 का यु्द्ध
इस बार के युद्ध का नेतृत्व पुर्तगाली वायसराय एंटोनियो नोरोन्हा के द्वारा भेजे गये सेनापति जोआओ पेइक्सोटो द्वारा किया गया। ये अपने साथ एक बड़ी सेना के साथ आया था। अब कि बार पुर्तगाली उल्लाल नगर पर कब्जा करने में सफल रहे। रानी अब्बक्का बच निकली और एक मस्जिद में शरण ली। उसी रात में रात के दूसरे पहर में रानी ने 200 सैनिकों के साथ पुर्तगालियों पर हमला कर दिया और उन्हें बंदी बनी लिया गया। सेनापति जोआओ पेइक्सोटो को मार दिया गया। इस प्रकार एक बार फिर से पुर्तगाली सेना की हार हुई और उन्हें मंगलौर के किले को खाली करना पड़ा।
1570 का युद्ध
इस युद्ध के दौरान पुर्तगालीयों को रानी अब्बक्का के पति का समर्थन मिल गया था। इधर रानी को अहमदनगर के सुल्तान और कालीकट के ज़मेरिन का सहयोग मिला। ज़ंमोरिन के सेनापति कुट्टी मार्कर ने रानी अब्बक्का की ओर से लड़ाई लड़ी और मंगलौर पर अपनी आधिपत्य स्थापित किए पुर्तगालीयों को मार गिराया लेकिन वापिस आते वक्त धोखे से उसकी हत्या कर दी गई। इन हारों के चलते तथा अपने पति के धोखे के कारण युद्ध हार गईं। उन्हें गिरफ्तार करके कारागार में डाल दिया गया। जेल में भी उन्होंने कई बार विद्रोह किया। मगर अंत में वे वीरगति को प्राप्त हुईं।
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