प्रस्तावना
प्रस्तुत लेख में हम कुतुबमीनार के इतिहास के बारे में चर्चा करेंगे यह विषय इस लिए भी महत्वपूर्ण क्योंकि आज तक हम यही जानते थे कि कुतुबमीनार का निर्माण कुतुबूद्दीन ऐबक ने कराया था मगर यह पूर्ण सच नहीं है क्योंकि इस मुस्लिम शासक ने सिर्फ इसकी मरम्मत करवाई थी। आज के इस लेख में हम कुतुबमीनार के इतिहास , विक्रमादित्य से इसके सम्बन्ध तथा इसके वास्तविक नाम के बारे में चर्चा करेंगे इसके साथ हम इसको बनाने के पीछे छुपे उद्देश्य को समझने की कोशिश करेंगे।
फिरोजशाह तुगलक
अपने प्रारम्भिक समय में कुतुबमीनार एक चार मंज़िला इमारत थी जिसकी चौथी मंज़िल पर मंदिर का निर्माण कराया गया था अतः एक कट्टर मुस्लिम होने के नाते फिरोजशाह तुगलक ने इसकी चौथी मंज़िल को तुड़वा कर पुनः इसका निर्माण करवाया इनके साथ ही इसने पांचवीं मंज़िल का भी निर्माण करवा दिया। बताते चले कि फिरोजशाह तुगलक ने दिल्ली पर 1325 से लेकर 1351 तक शासन किया। इनके शासन काल के पहले दिल्ली पर इनरे चचेरे भाई मुहम्मद बिन तुगलक का शासन था। यह दिल्ली सल्तनत के तीसरे वंश से सम्बन्धित था। बताते चले कि दिल्ली सल्तनत पर पांच वंशों ने शासन किया जिनके नाम और समय कुछ इस प्रकार है। गुलाम वंश शासन काल 1206 से 1320 ई. तक 2 खिलजी वंश शासन काल 1290 से 1320 ई. तक 3 तुगलक वंश शासन काल 1320 से 1414 तक 4 सैयद वंश शासन काल 1414 से 1451 तक 5लोदी वंश शासन काल 1451 से 1526 तक। बताते चले दिल्ली पर सबसे लंबा शासन काल तुगलक वंश का ही रहा।
चन्द्रगुप्त द्वितीय
इनका शासन काल 380 ई से 415 ई तक का माना जाता है । इनके राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र थी मगर उज्जैन भी इनका मुख्य केन्द्र था। कुतुबमीनार की बात करें तो इसे चन्द्रगुप्त द्वतीय ने अपने दरबार के नौ रत्नों में से एक एवं महान खगोल शास्त्री वराह मीहिर के लिए बनवाया था। यह एक सुर्य वेधशाला थी। मगर चौथी मंज़िल पर विष्णु मंदिर होने के कारण कुछ विद्दवान इसे विष्णु स्तंभ भी कहते थे।
प्रारम्भ में इस मिनार का प्रयोग खगोल विज्ञान के अध्ययन के लिए किया जाता था। इस बात का उल्लेख हमें हरिहार निवास द्विवेदी द्वारा रचित दो प्रसिद्ध पुस्तकों में मिलता है जिनका नाम दिल्ली के तोमर तथा ग्वालियर के तोमर है। बताते चले कि भारत में प्रचलित विक्रम संवत का निर्माण में भी इन्हीं के शासन काल में हुआ था।
तरीखे फिरोज़ शाही
इस किताब के लेखक का नाम सिराज अफिन है जो कि फिरोज़शाह तुगलक के राज दरबार का एक विद्वान था इसने अपनी किताब में लिखा की कुतुबमिनार की चौथी मंज़िल पर बिजली गिर जाने के कारण यह नष्ट हो गयी थी।
इबनेबतुता
यह एक विदेशी यात्री था जो कि मोहम्मद बीन तुगलक के शासन काल में भारत आया था। इसने अपनी किताब उलरहला में लिखा की कुतुबमीनार की चौथी मंज़िल पर सोने की घण्टीयां लगी हुई थी। जिसे ज़ाहिर है मुस्लिम शासन काल के दौरान इन्हें हटाया गया होगा।
कीर्ति स्तम्भ
यह स्तम्भ चितौड़ के दुर्ग के अन्दर राणा कुम्भा द्वारा निर्मित करवाया गया था। अगर आप वर्तमान समय में कुतुवमीनार के वास्तविक एवं प्राचीन रुप रेखा को देखना चाहते है तो यह स्तम्भ उसकी छाया प्रति है साथ में चौथी मंदिर पर विष्णु मंदिर का निर्माण हूबहू कुतुबमीनार के समान ही कराया गया था।
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