Indian History reveal the Past

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हमारे इस ब्लॉग में भारतीय इतिहास, सांस्कृतिक इतिहास, राजवंशों आंदोलन स्टार्टअप टेक्नोलॉजी कला और वास्तुकला तथा आर्थिक इतिहास से संबंधित विषयों पर जानकारी दी जाती है। हम कम से कम शब्दों में ज़्यादा से ज़्यादा जानकारी देने की कोशिश कर रहे हैं।

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शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

मुगल साम्राज्य

illustration of mughal empire

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में भारत में मुगल शासन के उदय तथा इसके पतन के कारणों को समझेंगे। इसके साथ हम प्रमुख भारतीय मुगल शासकों द्वारा किए गए महत्वपूर्ण कार्यों पर भी चर्चा करेंगे क्योंकि प्रारम्भिक शासकों के कार्यों के आधार पर ही मुगल साम्राज्य ने अपना विस्तार रुप हासिल किया था। वहीं बाद के कुछ शासकों की मूर्खता के कारण मुगल शासन का अंत हुआ। सम्पूर्ण मुग़ल साम्राज्य के दौरान भारत में हुए महत्वपूर्ण कार्यों और विकास की भी बात करेंगे।

परिचय

मुगल साम्राज्य की स्थापना 1526 में बाबर द्वार की गई थी जो कि वर्तमान उस्बेकिस्तान जिसे हम मध्य एशिया के रुप में भी जानते हैं का  राजा था।  मुगलों ने अपने समय काल के सबसे मजबूत  और महान साम्राज्य का निर्माण किया। बाबर अपने पिता की ओर से तुर्क मंगोल वंशज था। इनके पिता का नाम उमर शेख मिर्जा था। बाबर मंगोल मूल की तुर्की बलरास जनजाति से संबंधित थे। इसी क्रम में बाबर की माता कुतलुग निगार ख़ानम चंगेज़ खान की वंशज थी इस प्रकार  वे एक मंगोली भी था।

कुतलुग निगार ख़ानम

कुतलुग निगार ख़ानम चंगेज़ खान के दूसरे बेटे चगताई ख़ान के वंश  से थी। कुतलुग निगार खानम के पिता यूनूस खान मंगोलिस्तान के शासक थे जो चंगेज खान के सीधे वंशज थे। इस प्रकार से बाबर की मां चंगेज खान की 14वीं पीढ़ी से संबन्धित थीं। अंत बाबर को न तो तु्र्क सल्तनत ने अपनाया और न ही मंगोल साम्राज्य ने। इस प्रकार मध्य एशिया में अपने पैतृक संपत्ति से बेदखल होने के बाद बाबर ने भारत की ओर अपना रुख किया।

काबुल

काबुल में बाबर ने अपने साम्राज्य की स्थापना की जो कि वर्तमान अफ्गानिस्तान के अंतर्गत आता है। इस प्रकार साम्राज्य की स्थापना करने के बाद बाबर खैबर दर्दे से भारत में प्रवेश करता है। और लगातार आपने सामने आने वाले क्षेत्रों को जितते हुए दक्षिण की ओर बढ़ता जाता  है।

पानीपत का प्रथम युद्ध

1526 में पानीपत के प्रथम युद्ध के दौरान बाबर ने दिल्ली सल्तनत के शासक इब्राहिम लोदी को हराया जबकि उसके पास इब्राहिम लोदी के मुकाबले सेना की भारी कमी थी लेकिन भारी तोपों की मदद से सेना को पीछे हटाने में सफल रहा और उसकी जीत हुई। इस युद्ध के बाद मुगल सत्ता का केंद्र आगरा स्थानांतरित हो गया। जिसके प्रभाव के चलते बाबर ने अपने साम्राज्य का विस्तार मध्य इंडो-गंगा के मैदान तक किया।

खानवा का युद्ध

1527 में बाबर कि सेना ने मेवाड़ के राजा राणा सांगा को पराजित किया। इस युद्ध के दौरान मुगल सेना ने घुड़सवार सेना की पार्श्व रणनीति का परिचय दिया। खास बात यह है कि सैन्य अभियानों और लगातार युद्ध लड़ने के कारण और इनमें व्यस्त रहने के कारण बाबर भारत से प्राप्त लाभों को पूर्णतः सुनिश्चित नहीं कर पायें। या यूं कहें की प्रशासन व्यवस्था स्थिर नहीं थी।

हुमायूँ

यह बाबर का बेटा था जिसका शासन काल 1530 से 1556 तक का था। इसे मुगल साम्राज्य के ही सामंत शेर शाह सूरी द्वारा हरा कर फारस भेज दिया गया। हलांकि शेर शाह सूरी को मुगलों का सामंत कहना ठीक नहीं है लेकिन उसने मुगल सेना में सैन्य कमांडर और जागीरदार के रुप में भूमिका निभाई थी। इसने बाबर कि सेना में 1527 से 1528 तक अपनी सेवा दी थी। हुमायूँ को फारस भेजने के बाद शेर शाह सूरी ने भारत पर 1540 से 1545 तक शासन किया।

उधर हुमायूँ ने सफ़वी और मुगल दरबारों के बीच आपने राजनीति सम्बन्ध स्थापित करने में सफलता हासिल की । इसके बाद 1555 में हुमायूँ भारत वापिस आया और मुगल शासन को दोबारा स्थापित किया। वर्ष 1556 में एक दुर्घटना के दौरान उसकी मृत्यु हो गई। 

अकबर

यह हुमायूँ का बेटा था जिसकी मां का नाम हमीदा बानो बेगम था जो कि एक फारसी राजकुमारी थीं। इसने 1556 से 1605 तक भारत पर शासन किया। बचपन में अकबर का नाम जलालुद्दीन मुहम्मद था। अकबर बैरम खान की मदद से सिंहासन पर बैठा। भारत के मुगल साम्राज्य को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अकबर ने अपने साम्राज्य का विस्तार सभी दिशाओं किया। इसने गोदावरी नदी के उत्तर के लगभग सभी भारतीय उप महाद्वीप पर अपना नियंत्रण स्थापित किया। और अपने प्रति वफादार लोगों की मदद से मजबूत शासन वर्ग का निर्माण किया।

इसने एक आधुनिक प्रशासन व्यवस्था को स्थापित किया और सांस्कृतिक विकास को प्रोत्साहित किया। अकबर ने यूरोप की व्यापारिक कंपनियों के साथ व्यापार करना प्रारम्भ किया। जिसके कारण से भारत में एक मजबूत और स्थिर अर्थव्यवस्था का निर्माण हुआ। अकबर ने अपने दरबार में धर्म की स्वतंत्रता की अनुमति दी और शासक पूजा को मजबूती देने के लिए दीन-ए-इलाही नामक एक नए धर्म की स्थापना की।

अकबर इस नए धर्म के माध्यम से अपने साम्राज्य के सामाजिक राजनीतिक और सांस्कृतिक मतभेदों को सुलझाने का प्रयास करता था।

जहांगीर

इसके बचपन का नाम सलीम था ये अकबर और उसकी पत्नी भारतीय राजकुमारी मरियम उज़ ज़मानी के बेटा था। जिसने भारत पर 1605 से लेकर 1627 तक शासन किया। इसके नाम को लेकर एक कहानी प्रचलित है कि इसका बचपन का नाम भारतीय सूफी संत सलीम चिश्ती के नाम पर रखा गया था। बताया जाता है कि जहांगीर अफीम के  आदी थे जिसके कारण वे राज्य के मामलों की उपेक्षा य नजर अंदाज करते थे। इस कारण से अपने विपरीत दरबारी गुटों के प्रभाव में आ गए थे। 

इस ने अपने सम्मान को बचाने के लिए इस्लामी धार्मिक प्रतिष्ठान का समर्थन प्राप्त करने के लिए अथक प्रयास  किया जिसके चलते उसने खुद को अकबर के नियम और उनसे अलग किया। उन्हीं में से एक प्रयास मदद-ए-माश था। जिसके तहत धार्मिक रुप से विद्वान व आध्यात्मिक रुप से योग्य लोगों को कर-मुक्त व्यक्तिगत भूमि राजस्व अनुदान प्रदान किया जाता था।

जहांगीर अपने मुस्लिम धर्म के अलावा किसी अन्य भारतीय धर्म को महत्व नहीं देता था जिसके चलते इसका संघर्ष सिख गुरु अर्जन साहब के साथ हुआ। उनकी फांसी मुगल साम्राज्य और सिख समुदाय के बीच का संघर्ष और मुगल साम्राज्य के पतन की नींव थी।

शाहजहां

यह जहांगीर और मारवार यानी जोधपुर के राजा राजा उदय सिंग की बेटी जगत गोसाईं जिन्हें हम ताज बिबी बिलकीस मकानी के नाम से भी जानते है का बेटा था। इसके शासन काल का समय 1628 से 1658 तक का था। शाहजहाँ का शासन काल में मुगल दरबार की शान अपने चरण पर पहुंच गई थी। जिसका मुख्य उदाहरण ताज महल का बनवाना था। हलांकि इसके निर्माण के चलते दरबार के रखरखाव का खर्च राजस्व से अधिक होने लगा था।

शाहजहां ने अहमद सल्तनत का अंत किया और आदिल शाहियों और कुतुब शाहियों को कर देने के लिए मजबूर किया जिसके चलते मुगल साम्राज्य का विस्तार दक्कन तक हो गया था। शाहजहां ने अपने सबसे बड़े बेटे दारा शिकोह को राजगद्दी सौंपने की इच्छा रखी। जिसके चलते 1658 में उनकी मौत के बाद दारा शिकोह राजगद्दी पर बैठे। मुस्लिम रुढीवादीयों के चलते शाहजहां के छोटे बेटे औरंगज़ेब अपने बड़े भाई को हरा कर 1659 में उसे फांसी दे दी और खुद राजगद्दी पर बैठ गया।

बताते चलें कि दारा शिकोह एक उदार और अच्छा शासक था जिसने अपने पर दादा अकबर के नक्शे कदम पर चलते हुए हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों को अपना समर्थन दिया था। 

औरंगज़ेब

औरंगज़ेब ने अपना शासन काल 1658 से 1707 तक चलाया। यद्यपि शाहजहां 1659 में अपनी बीमारी से ठीक हो चुके थे मगर औरंगज़ेब ने अपने पिता को उनकी मृत्यु यानी 1666 तक कैद में रखा। औरंगज़ेब ने अपने मुगल साम्राज्य को इसके सबसे बड़े क्षेत्रीय विस्तार तक पहुंचाया। और भारत में मुगल राज के इस्लामी करण में वृ्द्धि को बढ़ावा दिया। इसने इस्लाम में धर्मांतरण यानी मुस्लिम धर्म में जबरन शामिल करने को प्रोत्साहन दिया। इसके अलावा इसने गैर मुस्लिम समुदाय पर जजिया कर को पुनः लागू किया।

बताते चलें कि भारत में सर्वप्रथम जजिया कर मोहम्मद बिन कासिम ने लगाया था 712 ई. में जिसे उसने सिंध प्रांत पर अपनी विजय हासिल करने के बाद लगाया था। इसके साथ ही औरंगज़ेब ने इस्लामी कानून का संग्रह और संरक्षण किया तथा फतवा और आलमगिरी को संकलित करवाया। एक बार फिर से इसने सिख गुरु तेग बगादुर की हत्या का आदेश दिया जिसके बाद सिख समुदाय ने अपना सैन्यीकरण करना प्रारम्भ किया।

खास बात कहें तो जहां जहांगीर अफीम के नशे में चुर रहता था वहीं औरंगज़ेब खुद अपने गुरुर के नशे में हमेशा धुत रहता था। जिन कारणों के चलते स्थानीय अन्य धर्म जाति वर्ग के राजाओं के समूह एकजुट होने लगे। 1682 में उसने दक्कन के अभियान चलाए जिसके चलते बीजापुर और गोल कोंडा की शेष मुस्लिम शक्तियों को अपने साम्राज्य में मिला लिया। हलांकि इन कार्यों में उसे काफी समय लग गया जिसका मुगल साम्राज्य पर विनाशकारी असर पड़ा।

इस अभियान के चलते मुगल खजाने पर भारी बोझ पड़ा और ओरंगज़ेब की अनुपस्थिति में शासन व्यवस्था डगमगाने लगी। दूसरी तरफ दक्कन में स्थिरता और आर्थिक उत्पादन में भी भारी गिरावट आई। कुल मिला कर ओरंगज़ेब सबसे विवादित मुगल शासक माना जाता है। इसने हिन्दू और सिया मुसलमानों का कट्टरता सो विरोध किया। 3 मार्च 1707 में ओरंज़ेब की मौत 88 वर्ष के होने के बाद हुई।

मुगल साम्राज्य का पतन

फर्रुखसियर
1712 में बहादूर शाह प्रथम की मृत्यु के बाद फर्रुखसियर राज गद्दी पर बैठा मगर उसकी बागडोर सैयद बंधुओं के  हाथ में थी।  1712 में इसकी मौत के बाद मुगल शासन स्वयं के आपसी झगड़ों में डुबने लगा। 1719 में चार सम्राट एक के बाद एक सिंहासन पर आसीन हुए।

सैयद बंधु
यह भारतीय मुस्लिम जाति से संबंधित रईसों के एक भाईचारे यानी सआदत-ए-बारा के नाम से जाने जाते थे। फर्रुखसियर की सत्ता नाममात्र की रह गयी थी। सैयद बंधु ही वास्तविक संरक्षक थे।

मुहम्मद शाह
इनका शासन काल 1719 से 1748 तक का था। इस समय साम्राज्य का विघटन शुरु हो गया था। मध्य भारत के भू भाग से मराठों के हाथों चला गया था। इसी क्रम में जब मुगलों ने दक्कन में निज़ाम-उल-मुल्क और आसफ शाह प्रथम की स्वतंत्रता को दबाने का प्रयास किया तो उन्होंने मराठों के मध्य और उत्तरी भारत पर आक्रमण करने के लिए नादिर शाह को  प्रोत्साहित किया। 

नादिर शाह का भारतीय अभियान

इसने प्रारम्भ में पश्चिम एशिया काकशस और मध्य एशिया के अधिकांश भाग पर ईरानी आधिपत्य को पुनः स्थापित किया। इसके आक्रमण दिल्ली लूट के बाद समाप्त हुए जिसने मुगल शक्ति और प्रतिष्ठा को चकना चूर कर दिया। जिसके चलते मुगल अब अपनी विशाल सेना का वित्तपोषण नहीं कर सकते थे जिसके सहयोग से वे अपना शासन चलाते थे। 

साम्राज्य के कई अभिजात वर्ग ने अब अपने मामलों पर नियंत्रण करने की कोशिश की और स्वतंत्र राज्य बनने के लिए अलग हो गए। मगर मुगल सत्ता को संप्रभुता के सर्वोच्च के प्रतीक के रुप में सम्मान देना जारी रखा। और वे सम्राट की औपचारिक स्वीकृति में भाग लिया करते रहे। इसी बीच तेजी से खंडित हो रहे मुगल साम्राज्य के भीतर कुछ क्षेत्रीय राज्यों ने स्वयं को और राज्य को वैश्विक संघर्षों में उलझा लिया। जिसके चलते उन्हें कर्नाटक और बंगाल युद्ध में हार का सामना करना पड़ा़।

मुगल सम्राट शाह आलम इसका शासन काल 1759  से 1806 तक रहा हलांकि इसने मुगल साम्राज्य के पतन के रोकने के लिए प्रयास तो किए मगर विफल रहे। दिल्ली को अफगानीयों ने लूटा। इसी बीच मराठा साम्राज्य और अफगानों के बीच युद्ध हुआ जिसे अहमद शाह दुर्रानी द्वारा किया गया था। जिसे हम पानीपत के तीसरा युद्ध के नाम से जानते है हुआ तो। तो मुगल सम्राट वेशर्मी की हदों के पार करते हुए अंग्रेजों के पास शरण लेन चले गए।

1771 में मराठों ने रोहिल्लों से दिल्ली को पुनः प्राप्त कर लिया 1784 में मराठा अधिकारिक तौर पर दिल्ली में सम्राट के संरक्षक बन  गए। इनकी स्थिति द्वितीय एंगलो-मराठा युद्ध तक बनी ही। इसके बाद से मु्गल सम्राट को ईस्ट इंडिया कंपनी ने संरक्षण प्रदान किया। अपनी कूटनीति रणनीति के चलते ब्रिटीशस ने 1793 में पूर्व मुगल प्रांत बंगाल-बिहार पर नियंत्रण कर लिया तथा 1858 तक स्थानीय शासन निज़ामत को समाप्त कर दिया।

इसके बाद भारतीय उपमहाद्वीप पर ब्रिटिश शासन की शुरुआत हुई। 1857 तक पूरा मुगल साम्राज्य जो कि भारत का बड़ा हिस्सा था ईस्ट इंडिया कंपनी के नियंत्रण  में था। जिसके चलते 21 सितंबर 1857 को मुगल सम्राट बहादुर शाह जाफर उसके पद से हटा दिया गया। परिणामस्वरूप जब ब्रिटिशस ने  दिल्ली को घेर लिया तो उन्हें 1858 में रंगून यानी बर्मा निर्वासित कर दिया गया।

भारतीय उपमहाद्वीप मुगल शासन द्वारा किए गए कार्य
मुगल साम्राज्य ने 1526 से 1857 तक दौरान खास कर शाहजहां के समय काल दौरान भारत में प्रशासनिक स्थापत्य अर्थिक और 

सांस्कृतिक क्षेत्र में योगदान दिया।

मनसबदारी और राजस्व प्रणाली
अकबर ना नागरिक व सैन्य प्रशासन को व्यवस्थित तरीके से चलाने के लिए मनसबदारी प्रणाली लागू की। राजा टोडर मल की सहायता से दहशाला नामक भू-राजस्व व्यवस्था की शुरुआत हुई जिसने कर निर्धारण व्यवस्था का पारदर्शी बनाया। अकबर के शासन के दौरान ही भारत के विशाल भू-भाग को प्रशासनिक और न्यायिक व्यवस्था के अंतर्गत लाया गया।

वास्तुकला
शाहजहां के शासन काल को वास्तुकला का स्वर्ण युग कहा जाता है जिसमें ताज महल दिल्ली का लाल किला और जामा मस्जिद जैसी इमारतें बनवाईं गई। इसी क्रम में अकबर भी पीछे नहीं थे इन्होंने फतेहपुर सीकरी में बुंलद दरवाज़ा आगरा का लाल किला और हुमायूं का मकबरा दिल्ली में बनवाया, जिसमें फारसी और भारतीय शैलियों का संगम मिलता है।

आर्थिक ओर व्यापारिक सुधार
मुगल शासन काल के दौरान चांदी के और तांबे के सिक्कों के दाम का व्यापक मानकीकरण किया गया। जिसके चलते व्यापार और लेनदेन आसान हुए। इसके अलावा व्यापारिक मार्ग ग्रैंड ट्रंक रोड़ का विस्तार और रखरखाव किया इसके साथ ही व्यापारियों की सुरक्षा के लिए सरायों का निर्माण करवाया गया। जिसके चलते भारतीय सूती वस्त्र रेशम मसाले और नील के व्यापार को बढ़ावा मिला।

सांस्कृतिक और भाषा में योगदान
मुगल शासन के चलते अरबी फारसी और स्थानीय भाषा के मिलन से उर्दू भाषा का जन्म और विकास हुआ। मुगल शासक जहांगीर के शासन काल में चित्रकला अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंची इसके साथ ही दरबारी संगीत को संरक्षण मिला। इसी समय काल में संगीतकार तानसेन सुप्रसिद्ध थे।

धार्मिक नीतियां
सुलह-ए-कुल के माध्यम से अकबर ने सर्व धर्म सम भाव का नीति अपनाई जिसके चलते अकबर के शासन काल में हिन्दू राजाओं ने भी युद्ध में उसके सेनापति एवं सहायक के रुप में योगदान दिए थे। अकबर ने जजिया कर को समाप्त किया और सभी धर्मों को समझने के लिए इबादत खाना स्थापित किया था। बताते चलें कि जज़िया कर मध्य कालीन भारत में मुस्लिम शासकों द्वारा अपनी गैर-मुस्लिम प्रजा जिनमें मुख्य रुप से हिंदू शामिल थे, से वसूला जाने वाला धार्मिक सुरक्षा के बदले वसूला जाने वाला एक कर था।