प्रस्तावना
प्रस्तुत लेख में चोल साम्राज्य द्वारा बनाये गए बृहदेश्वर मंदिर बारे में बात करने जा रहे है। इस मंदिर के बारे में जानना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि यह यूनेस्को की विश्व धरोहर की सूची में शामिल किया गया है। मंदिर के निर्माण चोल साम्राज्य की स्थापत्य कला शैली का प्रयोग किया गया है। यह मंदिर हिन्दू देवता भगवान शिव को समर्पित है जिसके चारों तरफ खाई का निर्माण किया गया था।
परिचय
तमिलनाडू का बृहदेश्वर मंदिर चेन्नई से लगभग 350 किलोमीटर दूर दक्षिण-पश्चिम में स्थित तंजावुर शहर में है। जहां जाने के लिए आप यातायात के विभिन्न साधनों का इस्तेमाल कर सकते है। यहां रेलवे मार्ग से जा सकते है इसके साथ ही हवाई मार्ग के लिए आपकों तिरुचिरापल्ली अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के माध्य से भी जा सकते है जो कि तंजावुर शहर से सिर्फ 55 किलोमीटर दूर है। इसके साथ राष्ट्रीय राजमार्ग 67 45 और 226 के माध्यम से भी आप यहां आसानी से पहुंच सकते है।
इतिहास
इस मंदिर को 1003 से 1010 ईसा पूर्व के समय काल में चोल साम्राज्य के शासक एवं सम्राट राजराज प्रथम ने बनवाया था। 5वीं से 9वीं शताब्दी के समय काल में इस क्षेत्र विशेष में चालुक्य साम्राज्य शासन था तब से ही यहां मंदिर निर्माण की नवीनतम कला शैलियों का विकास होने लगा था।
जिनमें ऐहोल बादामी तथा पट्टाडकल कला शैलियां बहुत प्रचलित थीं जिनके उदाहरण चालुक्य साम्राज्य के पतन के बाद पल्लव साम्राज्य के शासन काल में भी देखने को मिलता है। इसके बाद चोल साम्राज्य के उदय में इन शैलियों का और अधिक विकास हुआ। प्रारम्भ में चोल साम्राज्य ने भी भूमि विस्तार तथा अपनी सीमाओं को सुरक्षित करने पर अधिक जोर दिया और वास्तुकला पर कम।
दसवीं शताब्दी में जा कर चोल साम्राज्य में भी बहुआयामी वास्तुकला शैलियों का विकास होना प्रारम्भ हुआ। जिसका मुख्य उदाहरण यह मंदिर है। इसके साथ ही मंदिर के स्तंभ निर्माण में विभिन्न प्रकार की विशेषताओं का विकास भी हुआ। जिसमें से शीर्ष पर उभरे हुए गोलाकार स्तंभ प्रमुख है।
जार्ज मिशेल के आनूसार- यह एक नई चोल शैली के विकास की शुरुआत थी जो कि बृहदेश्वर मंदिर के निर्माण में मुख्य रुप से प्रयोग की गई थी। मुख्य रुप से मंदिर का निर्माण 11वीं शताब्दी से आरम्भ हुआ। जिसके बाद अगले 1000 वर्षों तक मंदिर में कई निर्माण कार्य किए गए जिनमें मंदिर का जीर्णोद्धार और मंदिर का मरम्मत कार्य भी शामिल है।
दरअसल मदुरै पर शासन करने वाले मुस्लिम शासकों और तंजावुर पर शासन करने वाले हिंदू राजाओं के आपसी संघर्ष और आक्रमण के कारण मंदिर को कई बार क्षति पहुंचाई गई। अतः हिंदू राजाओं द्वारा नियंत्रण पुनः प्राप्त करने के बाद मंदिर का पुनः निर्माण करवाया जाता।
कुछ मामलों में पुराने कलाकृति व भित्ति चित्र को दुबारा से बनवाया गया क्योंकि पुराने वाले चित्र धुंधले पड़ गये थे। इसी प्रकार कुछ अन्य मामलों में नए मंदिर बनवाने का प्रयोजन भी किया गया। उदाहरण के लिए कार्तिकेय जिन्हें मुरुगन कहा जाता है तथा पार्वती देवी जीन्हे अम्मन कहा जाता और नंदी के महत्वपूर्ण मंदिरों का निर्माण 16वी से 17वीं शताब्दी में हुआ।
इसी प्रकार दक्षिणा मूर्ति का निर्माण मराठों द्वारा किया गया। जिनका उन्होंने अच्छे से रखरखाव भी किया।
मंदिर परिसर
इस मंदिर को निर्माण में गणित की ज्यामिति नियमों का प्रयोग किया गया है। इस मंदिर का निर्माण मानव निर्मित ऊंचे टीलों पर किया गया है। मंदिर परिसर एक आयत है जो दो वर्गााकारों के आकृति में बना है। यह पूर्व से पश्चिम तक 240.79 मीटर तक तथा उत्तर से दक्षिण तक 121.92 मीटर तक फैला हुआ है। मंदिर को मुख्यतः पांच भागों में विभाजित किया गया है।
पहला विशाल गर्भगृह जिसे श्री विमान कहा जाता है दुसरा सामने का नंदी मंडप इसके बाद इनके बीच मुख्य सामुदायिक हाल जिसे मुखमंडपम भी कहा जाता है। इसके बाद महामंडपन और गर्भ गृह को महामंडपम से जोड़ने वाला मंडप है जिसे अंतराल भी कहा जाता है।
मंदिर परिसर में एक विशाल प्रांगण है जो कि बड़े स्तंभों पर टिका है जिसकी परिक्रमा करने के लिए लगभग 450 मीटर की परिधि है। इस स्तंभों वाले बरामदे के बाहर दो चारदीवारी हैं। जिसमें बाहरी दीवार रक्षात्मक है जिसे फ्रांसीसी औपनिवेशिक सेनाओं द्वारा बनवाई गई थी।
इसमें तोपों के संचालन के लिए छेद है जिनका प्रयोग मंदिर की सुरक्षा के लिए किया जाता था। उन्होंने बाहरी दीवार को ऊंचा बनाया जिससे मंदिर परिसर का क्षेत्र अलग-अलग हो गया। इसके पूर्वी छोर पर मूल मुख्य गोपुरम जिसे हम मुख्य द्वार के नाम से भी जाना जाता वह है जो कि मेहराबदार है।
मंदिर का गर्भ
मुख्य मंदिर के विमान यानी गर्भ ग्रह के ऊपर का हिस्सा गोलाकार गुंबद नूमा बनाया गया। 11वीं शताब्दी के बाद मूल मंदिर में अतिरिक्त संरचनाएं जोड़ी गई जैसे कि उत्तर-पूर्व कोने का मंडप और परिधि पर अतिरिक्त प्रवेश द्वार ताकि लोग कई स्थानों से प्रवेश और निकास कर सके।
मंदिर की संरचनाएं मुख्य रुप से पांड्य नायक विजयनगर और मराठा काल के दौरान तथा औपनिवेशिक युग शुरु होने से पहले जोड़ी गईं और खास बात यह है कि इन निर्माताओं ने मंदिर की मूल योजनाओं और समरूपता के नियमों का सम्मान किया।
मूल मंदिर के प्रांगण के भीतर मुख्य गर्भगृह और नंदी मंडपम के साथ दो प्रमुख मंदिर भी है जैसे एक कार्तिकेय के लिए दूसरा मां पार्वती को समर्पित है। इनके अलावा परिसर में अतिरिक्त छोटे मंदिर भी हैं। बृहददेश्वर मंदिर ने स्थापत्य कला और सजावटी तत्वों को अपनाकर दक्षिण भारत की हिंदू मंदिर परंपराओं को जारी रखा।
लेकिन इसका पैमाना 11वीं शताब्दी से पहले निर्मित मंदिरों से कहीं अधिक था। चोल युग के वास्तुकारों और कारीगरों ने विशेष रुप से भारी पत्थर के साथ निर्माण करने और 63.4 मीटर ऊंचे विशाल विमान को पूरा करने के लिए विशेषज्ञता में प्रतिभा शाली विकास किया था।
राजराजा प्रथम और उनके गुरु का चित्र
नंदी मंदिर के नायक काल की छत पर बनी चित्र राजा के भित्ती चित्र बनाये गए है। इसके अलावा मंदिर के गर्भगृह की दीवारों पर परिक्रमा मार्ग के साथ-साथ चोल राजा के चित्रों को एक निचली परत पर कुरेदा गया है। फर्श से छत तक फैले इन भित्ति चित्रों की खोज 1931 में अन्नामलाई विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एस के गोविंदासामी जी ने की थी।
चित्रकारों ने प्राकृतिक रंगों का प्रयोग किया और उन्हें गीले चुना पत्थर की परत में तब मिलाया जब वह जम रही थी। चोल भित्तिचित्र मुख्य रुप से शैव धर्म के संबंधित थे। इनका जीर्णोद्धार 2000 के दशक में किया गया था।
चोल भित्ति चित्रों का कुल क्षेत्रफल लगभग 670 वर्ग मीटर है जिसमें से लगभग 112 वर्ग मीटर के चित्रों को 2010 तक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विकास की खोज के माध्यम से उजागर किया गया। ये भित्तिचित्र हिंदू पौराणिक कथाओं का वर्णन करते हैं।
पुरातत्व वैज्ञानिक बाला सुब्रमण्यम के अनुसार अधिकांश भित्तिचित्र शिव से संबंधित हैं। लेकिन 11वीं शताब्दी के चोल भित्तिचित्रों में विष्णु दुर्गा और अन्य साथ ही चोल राजघराने दरबारी और आम जीवन के दृश्य भी दिखाए गए हैं।
नंदी मंडप की छत पर बने भित्तिचित्र
मंदिर में बाद में किए गए निर्माण परिवर्धन और संशोधनों ने मंदिर के अंदर प्राकृतिक प्रकाश की मात्रा को कम कर दिया है। इस प्रकार भित्तिचित्रों की सीमित रुप से ही तस्वीरें ली गई और उनकी व्याख्या की गई। श्री रामन के अनुसार बेहतर फोटो ग्राफिक उपकरणों के साथ पूर्ण इमेजिंग से पता चलता है कि ये ऐतिहासिक व्याख्याएं गलत थीं।
उदाहरण के लिए एक भित्तिचित्र जिसे पहले दक्षिणामूर्ति शिव के रुप में व्याख्यायित किया गया था। वास्तव में वह एक शाही गुरु का बरगद के पेड़ के नीचे ध्यान करते हुए एक धर्मनिरपेक्ष दृश्य है। पेड़ पर मोर पक्षी बंदर गिलहरी और उल्लू साथ ही एक कोबरा को दिखाया गया है।
इसके साथ ही जानवरों और पक्षियों को कोबरा से चिंतित होते हुए दिखाया गया है। पैनल के अन्य भाग भी इसी तरह एक संत को सुनते हुए दरबार को दिखाते हैं। अन्य में विभिन्न वेशभूषा में महिलाएं विभिन्न नृत्य मुद्राओं में दिखाई गईं हैं। गर्भ और गलियारे की दीवारों पर बनी कुछ चित्रकारी एक समय में उन पर जमी कालिख के कारण क्षतिग्रत हो गई थी।
सदियों से गर्भगृह में दीपों से निकलने वाले धूनएँ और कपूर के जलने से निकलने वाली कालिख के निरंतर संपर्क में रहने के कारण परिक्रमा मार्ग की दीवारों पर बने चोल चित्रकारी के कुछ हिस्से बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए थे। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने विश्व में पहली बार अपनी अनूठी प्लास्टर हटाने की प्रक्रिया का उपयोग करके 1000 वर्ष पुराने चोल भित्तिचित्रों पर आरोपित 16नायक चित्रों का जीर्णोद्धार किया है।
इन 400 वर्ष पुराने चित्रों को फाइबर ग्लास बोर्ड पर लगाया गया है और एक अलग मंडप में प्रदर्शित किया गया है।
शिलालेख
इस मंदिर में 11वीं शताब्दी के तमिल और संस्कृत शिलालेख मौजूद है। मंदिर की दीवारों पर तमिल और ग्रंथा लिपियों में अनेक शिलालेख हैं। इनमें से कई शिलालेख राजा के बारे में पारंपरिक संस्कृत और तमिल भाषा में ऐतिहासिक परिचय से शुरु होते है।
मंदिर परिसर में राजाराज चोल प्रथम के चौंसठ शिलालेख तथा 2 राजेंद्र चोल प्रथम के उनतीस शिलालेख विक्रमा चोल कुलुत्तुंगा प्रथम और राजामहेंद्र जिन्हें राजेंद्र द्वितीय के नाम से भी जाना जाता है के एक-एक शिलालेख तथा एक संभावित पांड्य राजा के तीन शिलालेख और नायक शासकों अच्युतप्पा नायक और मल्लापा नायक के दो शिलालेख है।
परिसर की उत्तरी दीवार पर 1011 ईस्वी का एक शिलालेख मंदिर द्वारा आयोजित और समर्थित लोगों का विस्तृत विवरण देता है। शिलालेख में उनके वेतन भूमिकाओं और उनके नाम का विवरण दिया गया है।
इसमें 600 से अधिक नाम शामिल है जिनमें मुख्य रुप से पुजारी दीपक जलाने वाले धोबी दर्जी जौहरी कुम्हार बढ़ई पवित्र छत्रवाहक नृत्य गुरु नर्तकियां गायक पुरुष और महिला संगीतकार प्रदर्शन कलाकारों के अधीक्षक लेखाकार आदी शामिल है।
इसके साथ ही उनके वेतन भूमि के टुकड़ों के रुप में था इसलिए मंदिर में उनका रोजगार संभवतः अंशकालिक था। मंदिर में देव दासियां कार्यरत थीं जो नृत्यांगनाएं और भक्ति गीत गातीं थी। मंदिर के अनेक शिलालेखों में अक्सर ऐसे दान का उल्लेख मिलता है जिनमें लिखा है पूजा अर्चना संन्यासियों की सभा के लिए भोजन और सेवा करना था।
जार्ज मिशेल के अनुसार तंजावुर मंदिर अपने इतिहास में एक प्रमुख धर्मार्थ संस्था थी। यहां प्रतिदिन तीर्थ यात्रियों भक्त और राहगीरों को निशुल्क भोजन प्रदान किया जाता था। हिंदू त्योहारों के दिनों में ये भोजन भव्य होते थे और विशेष रुप से ब्राह्मणों को आमंत्रित करके भोजन कराया जाता था।
भारत सरकार द्वारा किए गए कार्य
भारत सरकार द्वारा 26 सितंबर 2010 में बिग टेंपल से शताब्दी समारोह के पांचवे दिन को देश के सांस्कृतिक स्थापत्य और शिलालेख इस मंदिर के इतिहास को बिग टेंपल को योगदान को रुप में मान्यता देते हुए।
इंडिया पोस्ट द्वारा 216 फीट ऊंची विशाल राजा गोपुरम की प्रतिमा के चित्र को दर्शाने वाले 5 रुपये के डाक टिकट को जारी किया गया था। जिसका आदेश संचार और सूचना प्रौद्योगिकी के कैबिनेट मंत्री ए राजा ने दिया था। भारतीय रिज़र्व बैंक ने मंदिर की आकृति को उभार कर 5 रुपये का सिक्का जारी करके इस घटना को यादगार बनाया।
वर्तमान समय में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने मंदिर के जीर्णोद्धार और दीर्घकालिक संरक्षण का जिम्मा लिया है। इसके साथ ही मंदिर ग्रेट लिविंग चोल टेम्पल्स की श्रेणी में शामिल किया गया है।
वर्ष 1954 में भारतीय रिज़र्व बैंक ने 1000 को पुराने नोटों के पिछले हिस्से पर बृहदेश्वर मंदिर का चित्र छापा था। जिसे बाद में 1978 में बंद कर दिया गया था।
निष्कर्ष
तंजावुर का बृहदेश्वर मंदिर केवल चोल साम्राज्य की वैभवशाली शक्ति और राजा राजराज चोल प्रथम की अगाध भक्ति का प्रतीक नहीं है बल्कि यह भारतीय वास्तुकला इंजीनियरिंग और कला का एक अनुपम उदाहरण भी है। 1000 वर्षों से भी अधिक समय बीत जाने के बाद भी यह महान जीवित मंदिर अपनी भव्यता के साथ सीना ताने खड़ा है।
इसके अभूतपूर्व योगदान और ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए भारत सरकार ने भी इसे उचित सम्मन दिया है चाहे वह इसके 1000 वर्ष पूरे होने पर जारी किया गया 1000 रुपये का विशेष नोट हो य 5 रुपये का डाक टिकट हो। इसके साथ ही भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा इसका निरंतर संरक्षण किया जा रहा है।
इसके साथ ही भारत सरकार ने इस मंदिर को यूनेस्कों की विश्व धरोहर की सूची में शामिल करने में अहम भूमिका निभाई थी। अतः यह हमारा नैतिक कर्तव्य है कि हम इस महान ऐतिहासिक विरासत को संजोकर रखें और अपनी आने वाली पीढ़ियों को इसके गौरवशाली इतिहास से परिचित कराते रहें।
