Indian History reveal the Past

हमारे इस ब्लॉग में भारतीय इतिहास, सांस्कृतिक इतिहास, राजवंशों आंदोलन स्टार्टअप टेक्नोलॉजी कला और वास्तुकला तथा आर्थिक इतिहास से संबंधित विषयों पर जानकारी दी जाती है। हम कम से कम शब्दों में ज़्यादा से ज़्यादा जानकारी देने की कोशिश कर रहे हैं।

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सोमवार, 31 अगस्त 2026

सिल्क रोड

silk route

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम सिल्क रोड के इतिहास इसके साथ ही नामकरण के पीछे के कारण तथा एक व्यापारिक मार्ग के रुप में इसके आर्थिक महत्व को समझेंगे। साथ  ही हम इस रोड के य मार्ग के विच्छेदित होने के पीछे के प्रमुख कारणों को समझेंगे। इसके साथ ही हम इस रोड के चीन द्वारा पुनरुत्थान के कारण पर प्रकाश डालेंगे।

परिचय

सिल्क रोड वास्तविकता में यूरोप के अटलांटिक समुद्र तट से एशिया के प्रशांत तट को जोड़ने वाले व्यापारिक मार्गों का एक विशाल जाल था। यह मार्ग बेबी लोन कु्स तुंतुनिया समर कंद सहित अन्य महत्वपूर्ण शहरों से होकर गुजरता था। इस रोड ने यूरेशिया के अलावा अन्य छोरों के साथ चीनी वस्तुओं लोगों के विचारों  धर्मों और यहां तक की यूरोप और एशिया तक की सभ्यताओं के बीच आर्थिक एवं सांस्कृतिक महत्व के स्थानांतरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इस रोड ने चीनी राजवंश जो की मध्य एशिया और पश्चिम एशिया के खानाबदोश साम्राज्यों की श्रेणी में आते थे के साथ संचार और व्यापार को सरल बनाया। इन खानाबदोश जनजाति साम्राज्य में  खज़र साम्राज्य का नाम मुख्य रुप से लिया जाता है। इसके अलावा हान साम्राज्य एवं तिब्बत का टुबो साम्राज्य का नाम भी आता है।

नामकरण

सिल्क रोड का नामकरण रेशमी वस्त्रों उत्पादन और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में लाभ कमाने के कारण पड़ा है। इस सिल्क यानी रेशमी कपड़ों का अत्यधिक मात्रा में उत्पादन चीन के हान राजवंश द्वारा किया जाता था। 202 से 220 ईसा पूर्व के समय काल में ये राजवंश चीन से शासन करता था। इसके साथ ही इसका  सम्बन्ध पार्थियन साम्राज्य चीनी शादी दूत झांग कियान के नाम से भी जोड़ा जाता है। 


झांग कियान ने अपने अभियानों एवं प्रयासों के चलते चीन की महान दीवार के निर्माण और विस्तार का कार्य किया था। पार्थियन साम्राज्य ने ही सिल्क रोड के भू मध्य सागर से जोड़ने में एवं विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इतिहास

दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व के समय काल में हान साम्राज्य के राजा जिनका नाम वू था ने अपने राजदूत झांग कियान को झिंजियांग यानी पश्चिमी क्षेत्रों का दौरा करने के लिए भेजा। यहीं से सिल्क रोड के निर्माण की प्रारम्भिक रुप रेखा तैयार हुई। झांग कियान झिंजियांग के साथ-साथ ही तियानशान कुनलुन पामीर जैसे पहाड़ी क्षेत्रों से घिरे बेसीन के तटीय इलाकों से यात्रा करते हुए तकला मकान के रेगिस्तान को पार करके आगे तक गया।

उसने देखा की तारिम बेसिन से होकर व्यापारी पश्चिम की और लेवंत वर्तमान सिरिया जार्डन लेबनान और अनातेलिया ओर जाते है जहां व्यापार  की वस्तुओं को भूध्य सागर की बंदरगाहों के जहाज़ों तक ले जाया जाता था ताकि वे यूरोप तक जा सकें। इस प्रकार सिल्क रोड का निर्माण भूमि पर लगभग 4000 मील से अधिक लंबा हो गया। जो की पूर्वी और पश्चिमी दुनिया के बीच आर्थिक सांस्कृतिक राजनीतिक और धार्मिक लेन देन को सरल बनाने में अहम पहलू बन गया था।

खास बात यह भी है कि इस मार्ग की खोज उस समय काल में की गई थी जब महाद्वीप पर व्यापक राजनीतिक उथल- पुथल देखी जा रही थी जिसका मुख्य उदाहरण मंगोल विजय और काला मृत्यु  जिसे हम प्लेग महामारी के नाम से भी जानते की प्रमुख घटना को मान सकते है। यहाँ खास बात यह भी है कि प्लेग महामारी इसी रोड के कारण एक देश से दूसरे देशों तक फैली थी।

अत्यधिक विस्तार होने के कारण यात्रियों को रास्ते में डाकुओं और खानाबदोश हमलावरों का डर हमेशा लगा रहता था जिस कारण से बहुत कम ही लोगों सिल्क रोड की पूरी यात्रा करते थे। वे व्यापार करने के लिए बीचोलियों का सहारा लेते थे।

पतन का मुख्य कारण

सर्वप्रथम पतन का कारण डाकुओं और डकैतों का रास्ते में मिलना था। इसके अलावा 1453 के समय काल से ही ओटोमन साम्राज्य ने अपने विरोधी साम्राज्यों के साथ जमीनी मार्गों पर अधिक नियंत्रण के लिए प्रतिस्पर्धा शुरु कर दी। जिन कारणों से प्रभावित होकर यूरोपीय राज्यों को मजबूर होकर अन्य व्यापारिक मार्गों की खोज करनी पड़ी। 21वीं सदी में अन्य व्यापारिक मार्गों की खोज के साथ ही नए सिल्क रोड का नाम सामने आया। इन मार्गों की सूची में चीनी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव एवं यूरेशियन लैंड ब्रिज का नाम प्रमुख रुप से लिया जाता है।

जलवायु परिवर्तन
वर्ष 2023 के जून महीने में साइंस बुलेटेन नामक पत्रिका में प्रकाशित लेख में चीनी वैज्ञानिकों ने दावा किया है की स्लिक रोड के पतन में कारण जलवायु परिवर्तन था। अध्ययन में बताया गया है कि मध्य एशिया के शुष्क क्षेत्रों में अनुकूल जलवायु यानी गर्म और नम वातावरण ने ट्रांस यूरेशियम मार्गों से यात्रा को आसान बनाया जिसे प्राचीन मानव समुदायों को आवाजाही में सरलता होने लगी।

सिल्क रोड चर्चा में क्यों है

वर्ष 2013 में चीन ने सिल्क रोड को दुबारा से प्रारम्भ करने के लिए वन बेल्ट वन रोड तथा बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव रणनीति की शुरुआत की। इसका मुख्य उद्देश्य वैश्विक व्यापार को बढ़ावा देकर बहुआयामी रणनीति का विकास करना है। वर्ष 2014 में सिल्क रोड के चांगान-तियानशान गलियारे को यूनेस्को की विश्व धरोहर की सूची में शामिल किया गया। 

इसी श्रृंखला में वर्ष 2023 में जराफ़शान काराकुम गलियारे के विश्व धरोहर की सूची में शामिल किया गया है। इसके अलावा सिल्क रोड इकोनामिक बेल्ट जिसे हम BRI के नाम से भी जानते है का उद्देश्य युरेशिया के साथ सहयोग व्यापार संबंध और बुनियादी ढाँचे को मजबूत  बनाने के उद्देश्य से प्रारम्भ किया गया है। वहीं भारत अफ्रीका यूरोप एवं दक्षिण पूर्व एशिया तथा हिंद महासागर के अगल-बगल के इलाकों से व्यापार करने के लिए मेरीटाइम सिल्क रोड परियोजना को प्रारम्भ किया गया है चीन के द्वारा।

रविवार, 30 अगस्त 2026

उक्कु य मूषा इस्पात

wootz steel

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में भारत की सबसे प्राचीन धातु जिसके द्वारा बनायी गई तलवार सबसे मजबूत मानी जाती थी और जिसे हम wootz steel के नाम से जानते है के इतिहास के बारे में चर्चा करेंगे। बताते चलें की इस धातु को भारत में मूषा इस्पात के नाम से भी जानते है। इस लेख में इस धातु के इतिहास तथा इसे बनाने के तरीके एवं इसकी निर्माण कला के पतन के बारे में चर्चा करेंगे। इसके साथ ही इस धातु से बनी तलवारों के विदेशी व्यापार पर भी चर्चा करेंगे। इस धातु की खास बात यह थी कि यह अपनी मजबूती के साथ इसकी सतह पर बनी लहर धार आकृतियों के चलते भी बहुत प्रचलित हुईं थी।

परिचय

भारत ने प्राचीन काल में ही मानव इतिहास की सबसे उन्नत इस्पात तकनीक को विकसित कर लिया था जिसे हम उक्कु इस्पात के नाम से जानते है जिसे हम Wootz steel के नाम से भी जानते है। प्रारम्भिक समय में इसका निर्माण कार्य भारत के तमिलनाडु कर्नाटक तथा आंध्र प्रदेश के क्षेत्रों में प्रारम्भ हुआ। धीरे-धीरे पूरे विश्व में अपनी मजबूती का डंका बजाया। ज्यादातर इस स्टील से बनी तलवार का  व्यापार अरब देशों के साथ किया जाता था।

वूट्ज स्टील की निर्माण की कहानी हमें यह बताती है कि भारतीय प्राचीन धातु वैज्ञानिकों के असाधारण शिल्प कौशल और अपनी विद्वता का प्रदर्शन करते हुए ऐसे इस्पात का निर्माण किया जिसने सदियों तक वैश्विक धातु निर्माण की परंपराओं को प्रभावित किया। वूट्स स्टील की विरासत हमें याद दिलाती है कि महान इंजीनियरिंग की शुरुआत सामग्री यों की जानकारी में महारत हासिल करने होती है न की उसके निर्माण में।

इस स्टील की शुरूआत ईसा पूर्व के समय काल में भारतीय राज्य तेलंगाना के गोलाकोंडा क्षेत्र से हुई इसके बाद के अन्य क्षेत्र जैसे कर्नाटक तमिलनाडु और श्रीलंका में हुई। इस स्टील को लोहे के एक ठोस टुकड़े के रुप में निर्यात किया जाता था जिसे मूषा इस्पात कहते थे। श्रीलंका में स्टील बनाने की प्रारंभिक विधि के रुप में मानसूनी हवाओं से चलने वाली एक अनोखी भट्टी के माध्यम से बनाया जाता था।

इसके साक्ष्य हमें अनुराधापुरा तिस्सामहारमा औस समनालावेवा जैसे स्थलों के सर्वे के दौरान मिला। इसके साथ ही इतिहासकारों को कोडुमल से प्राचीन लोहे और इस्पात की कलाकृतियां भी प्राप्त की गईं है। 2018 में मन्नार जिले में स्थित योधावेवा स्थल की खुदाई में एक गोलाकार भट्टी का निचला आधा भाग मिला है। शोधकर्ताओं के अनुसार यह ढ़क्कन क्रूसिबल इस्पात का बना है। 

इसी खोज के दौरान श्रीलंका के दक्षिण-पूर्व के क्षेत्रों में शास्त्रीय कला संबंधित कुछ सबसे पुराने लोहे और इस्पात की कलाकृतियाँ पाईं गईं है। अरब सागर के रास्ते भारत और श्रीलंका के समुद्री व्यापार के चलते अरब देशों को वूट्स स्टील के बारे में पता चला। इस का पता हमें  इस्लामीक ग्रंथों में मुहन्नद और हेन्देय शब्द मिलने से चलता है जो कि भारतीय स्टील से बनी तलवारों की ओर इशारा करते है। अरबी कविताओं में भी इसका उल्लेख मिलता है जिसके तहत वूट्ज स्टील से बनी तलवार अत्यधिक मूल्यवान थी।

आगे चलकर इस प्रकार की स्टील का व्यापार विस्तार अन्य देशों तक हुआ जिसके चलते दमिश्क स्टील का निर्माण हुआ। इसके अलावा 12वी शताब्दी के अरब यात्री एड्रिसी ने भी भारतीय स्टील को दुनिया की सर्वश्रेष्ठ धातु बताया। अरब लेख तेलिंग में स्टील की प्रसिद्धि के लिए तेलंगाना क्षेत्र के संदर्भ में लिखा गया है। जिसमें बताया गया कि तेलंगाना का गोलाकांडा क्षेत्र स्पष्ट रुप से पश्चिम एशिया में उक्कू स्टील के निर्माण का प्रमुख केंद्र है।

वूट्स शब्द का अर्थ

17वीं शताब्दी में यूरोपीय यात्रियों ने दक्षिण भारत के गोलाकोंडा मालाबार और मैसूर क्षेत्र की यात्रा की और इस्पात निर्माण के क्षेत्र का दौरा किया। जिसके तहत उन्हें इस स्टील के नाम के पीछे का अर्थ समझ आया। वूट्ज शब्द तमिल शब्द उरुक्कू से लिया गया है जिसका अर्थ है पिघलाना। इसी प्रकार द्रविड़ भाषा में इसी प्रकार के मिलते जुलते शब्द का प्रयोग किया गया। वहीं तेलुगु में इस स्टील को उक्कू तथा मलयालम में इसे उरुक्कू नाम से जाना जाता था। इसी प्रकार इस स्टील को मैसूर में उक्कू टूंडू के नाम से जाना जाता था।

17वी से 19वीं शताब्दी के समय काल में यूरोपीय वैज्ञानिकों में इस स्टील के बारे में जानने की जिज्ञासा हुई। उस समय काल के दौरान यूरोपीय वैज्ञानिकों को कार्बन मिश्रित धातुओं की जानकारी बहुत कम थी। मगर उनके द्वारा वूट्ज स्टील के शोध ने आधुनिक अंग्रेजी फ्रांसीसी और रुसी धातु विज्ञान के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
 

प्रजनन अनुसंधान

19वीं शताब्दी के समय काल में ही वूट्ज स्टील पर गहन अध्ययन के लिए रॅायल स्कूल आफ साइंस द्वारा इसे पुनः बनाने के लिए प्रयास किया जिसके चलते 1795 में  डॅा. पियर्सन ने वूट्ज स्टील की रासायनिक रुप पर जांच की जो कि इस स्टिल पर रिसर्च करने वाले पहले व्यक्ति थे।

पावेल पेट्रोविच अनोसोव

ये रुस के धातु वैज्ञानिक थे वे वूट्ज स्टील अपने सभी प्राचीन गुणों के साथ पुनः बनाने में सफल रहे। उनके द्वारा निर्मित स्टील पारंपरिक वूटज के लगभग समान ही था। उन्होंने इस प्रकार के स्टील के उत्पादन के चार अलग-अलग तरीकों के बारे में लिखा जो कि एक पारंपरिक पैटर्न प्रदर्शित करते थे। उनका यह कार्य बुलैट स्टील्स नाम से भी जाना जाता है। जिसे माइंनिग जनरल पत्रिका में इसी शीर्षक के नाम से प्रकाशित किया गया था।

रीबोल्ट एट अल के अनुसार

इन्होंने अपने विश्लेषण में सीमेंटटाइट के नैनोवायरों को घेरने वाले कार्बन नैनोट्यूब की उपस्थिति के बारे में बताया। इसके साथ ही उन्हें धातु पर वैनेडियम मोलिब्डेनम और क्रोमियम के कुछ अंश मिले जिसके चलते उन्हें पता चला की धातु की अशुद्धियों को निकालने के लिए और वूट्ज स्टील को मजबूती प्रदान करने के लिए इसे गर्म ठंडा और जमाने जैसे चरणों से गुजारा गया है। जिसके कारण ही यह स्टील लचीला होने के कारण भी अपनी मजबूत पकड़ को नहीं छोड़ता।

वूट्ज स्टील बनाने का तरीका

इस इस्पात का निर्माण एक खास प्रक्रिया द्वारा किया जाता है जिसके दौरान लोहे के कार्बन युक्त पदार्थ के साथ सील बंद भट्टियों में पिघलाया जाता है। जिसके चलते अंत में हमें शुद्ध स्टील प्राप्त होता है जिस पर अद्वितीय सूक्ष्म संरचनाएं होती है।

कच्चे लोहे का चयन
सबसे पहले कच्चे लोहे का चयन सावधानीपूर्वक शुद्धता के आधार पर किया जाता था। धातु की संरचना में एक स्वरुप सुनिश्चित करने के लिए अशुद्धियों को कम से कम किया जाता था।

क्रूसिबल स्टील का उत्पादन
कठोर मिट्टी के बने छोटे-छोटे बर्तन जो की लोहे और कार्बन युक्त पदार्थों जैसे चारकोल आदि से बने होते थे। खास बात यह है कि इस कार्बन निर्माण के लिए बांस की पत्तियों को जला कर तथा अन्य पौधों को जलाकर प्राप्त किया जाता था।

नियंत्रित कार्बन अवशोषण

अब गर्म करने की प्रक्रिया के दौरान कार्बन लोहे में समाहित हो जाता था और एक उच्च कोटि के कार्बन इस्पात में बदल जाता था। इस चरण में धातु की भंगुरता को रोकने के लिए एक निश्चित तापमान की आवश्यकता होती थी जिसके अधिक या कम होने पर स्टील अपनी मजबूती खो देता था।

धीमी शीतलता
धातु के भट्टी में पिघलाने के बाद भट्टियों को धीरे-धीरे ठंडा किया जाता था। जिसके कारण एक नियंत्रित शीतलता के कारण धातु पर आंतरिक संरचनाएं बनी, जिन्होंने आगे चलकर ढलाई को दौरान दमिशक आकृति का धातुरुप धारण कर लिया। अंत में हमें एक ठोस स्टील का पिंड मिलता है।

वूट्ज स्टील के गुण
यह स्टील न केवल अपनी दिखावट के लिए बल्कि अपने यांत्रिक प्रदर्शन के लिए भी जाना जाता है। इस स्टील के माध्यम से बने बेल्ड प्राचीन काल में अन्य स्टील की तुलना में अधिक मजबूत हुआ करते थे। वैज्ञानिकों ने इसकी सूक्ष्म संरचना का अध्ययन करके पता लगाया की इस स्टील की मजबूती का मुख्य राज ये सूक्ष्म संरचनाएं ही है जो इसकी मजबूती के साथ इसके लचीलेपन में भी योगदान देती हैं।

दमिश्क स्टील की उत्पत्ति और वूट्ज स्टील से संबंध

कई लोग पौराणिक तलवारों का सम्बन्ध दमिश्क स्टील से जोड़ते है जो वूट्ज स्टील की तरह ही अन्य आकृति बहते पानी की आकृतियों के लिए प्रसिद्ध है। हलांकि खोज कर्ताओं का यह मानना है कि दमिश्क तलवारों के बनाने में भी इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल भारत में उत्पादित वूट्ड स्टील के क्षेत्र से ही आता था।

भारतीय इस्पात की सिल्लियों को व्यापार मार्गों के माध्यम से मध्य पूर्व में निर्यात किया जाता था। इसके बाद वहां के कुशल कारीगरों द्वारा इन्हें ढालकर ब्लेड़ बनाते थे। विशेष ढलाई तकनीकों के माध्यम से इन सिल्लियों पर विशिष्ट दमिश्क पैटर्न निर्मित होता था।

शनिवार, 29 अगस्त 2026

कैलाश मँदिर

kailasa temple

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में एलोरा गुफाओं में से सबसे प्रसिद्ध गुफा एवं मंदिर के बारे में चर्चा की गई है जिसे हम कैलाश मंदिर के रुप में जानते है। बताते चले कि यह मंदिर यूनेस्को की विश्व धरोहर की सूची में आता है जिसे वर्ष 1983 एलोरा की सम्पूर्ण गुफा सूची जो कि लगभग 100 अभी तक खोजी जा चूंकि हैं के साथ सम्मिलित किया गया। एलोरा की गुफाओं की बात करें तो इन 100 गुफाओं में से सिर्फ 34 गुफाओं को ही लोगों के पर्यटन स्थल के रुप में खोला गया है। 

कैलाश मंदिर इन 34 गुफाओं की सूची में 16वें स्थान पर आता है। इस लेख के माध्यम से हम इस मंदिर की वास्तु शिल्प कला तथा इस मंदिर के निर्माण के पीछे की कहानी एवं इतिहास के बारे में जानेंगे। इसके साथ ही हम यह जानने की कोशिश करेंगे की यह मंदिर इस प्रकार से राष्ट्रकूट  पल्लव वंश चालुक्य शासकों से सम्बन्धित है तथा इसके प्रमाणीकरण पर भी बात करेंगे।

परिचय

यह मंदिर भारतीय राज्य महाराष्ट्र के छत्रपती संभाजी नगर जिले में एलोरा में स्थित मंदिरों की सूची में सबसे बड़ा मंदिर है। यह मंदिर एक पूरे पहाड़ को काट कर बनाया गया है। इस मंदिर का निर्माण राष्ट्रकूट वंश के राजा नरेश प्रथम के द्वारा प्रारम्भ करवाया गया जिनका समय काल 757 से 783 ई. का था। यह मंदिर पूरे विश्व में अपने एक अनूठे ढंग का वास्तु और शिल्प कला का अद्भुत नमूना है। यह खास इस लिए भी है क्योंकि 1200 वर्ष से भी प्राचीन सह्वाद्री पहाड़ियों के कठोर चट्टान जिसे हम बेसाल्ट पत्थर के रुप में भी जानते है काटना इतना आसान नहीं था।

यह भारतीय इतिहास के सबसे प्राचीन मंदिरों की सूची में इस लिए भी प्रसिद्ध है क्योंकि इसका निर्माण कार्य नीचे से प्रारम्भ न करके ऊपर यानी इसके शिखर निर्माण कार्य से प्रारम्भ किया गया था। याद रखने योग्य बात यह भी है कि जिस क्षेत्र विशेष पर यह मंदिर निर्मित किया गया है उसे पहले ओरंगाबाद के बाद के नाम से जाना जाता था जिसे वर्ष 2023 के फरवरी महीने में राज्य और केन्द्र सरकार की मंजूरी पर मराठा साम्राज्य के दूसरे शासक छात्रपति सम्भा जी महाराज के सम्मान में परिवर्तित किया गया।

मंदिर निर्माण का कारण

प्राचीन काल में मंदिर निर्माण का कार्य व्यापारिक मार्गों के निकट किया जाता था ताकि व्यापारी और सौदागर यहां रुक कर विश्राम कर सकें इसके साथ ही यहां रहने वले भिक्षुओं साधुओं और तपस्वियों के साथ लंबी यात्रा करने सहायता और सुविधा भी मिलती थी। बदले में इन धनी व्यापारियों और सौदागरों की तरफ से मंदिर परिसर के संरक्षण के लिए आर्थिक मदद की जाती थी। प्राचीन व्यापारिक मार्ग पर स्थित होने के कारण यह दक्कन क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया था। इसके साथ ही क्षेत्रीय शासकों द्वारा भी इस मंदिर को संरक्षण प्राप्त था।

लोक कथा के अनुसार

दसवीं शताब्दी की एक कथा अनुसार जिसे हम कल्प तरु के नाम से भी जानते है में एक वृतांत के अनुसार राष्ट्रकूट शासक एलु की एक रानी का उल्लेख है जो कि इस प्रकार है। लगभग 8वीं शताब्दी के समय काल में राष्ट्रकूट राजा बीमार पड़ गए। जिसके चलते रानी ने भगवान भोले नाथ की आराधना की और राजा के अच्छे स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना की तथा उन्होंने वादा कि राजा स्वास्थ्य हो गए यानी उनकी मनोकामना पूर्ण हुई तो वे भगवान शिव के भव्य मंदिर का निर्माण करवायेंगी। फलस्वरूप  उनकी इच्छा पूर्ण हुई जिस कारण से रानी ने प्रण लिया कि जब तक वे भगवान शिव के मंदिर का शिखर नहीं देख लेतीं तब वे भोजन नहीं ग्रहण करेंगे।

राजा ने अपने देश के सर्वश्रेष्ठ वास्तुकारों मंदिर निर्माण के लिए आमंत्रित किया। वास्तुकारों ने भव्य मंदिर की संरचना प्रस्तुत की राजा उनसे प्रभावित भी हुए। मगर समस्या यह थी की पूरे मंदिर के निर्माण कार्य में लगभग 1 महीने का समय लग जाता जिसके चलते रानी को पूरे एक महीन के लिए भूखा रहना पड़ता।

अतः पेठन के वास्तुकार कोकासा मंदिर निर्माण की एक अनोखी योजना प्रस्तुत की जिसमें उन्होंने मंदिर को ऊपर स नीचे की तरफ निर्माण करने की बात की। इस योजना के तहत वास्तुकार मंदिर  की शुरुआत उसके शिखर के निर्माण कार्य से कर सकते थे  और मंदिर के शीर्ष को देखकर रानी अपना व्रत तोड़ सकती थी।

शिलालेख के अनुसार

दशा अवतार गुफा में मिले  शिला लेख के अनुसार इसी प्रकार के एक अन्य मंदिर  का निर्माण राष्ट्रकुट वंश के संस्थापक दंतिदुर्ग द्वारा अपने शासन काल यानी 735 से 757 ई. के मध्य के समय काल में करवाया था। इस मंदिर की नक्काशी भी कैलाश मंदिर की नक्काशी के समान शैली द्वारा निर्मित की गयी थी। हलांकि मंदिर परिसर के कुछ हिस्सों के बाद शासकों द्वारा पूर्ण करवाया गया। खास बात यह है कि यह गुफा भी एलोरा की गुफाओं की श्रेणी में 15 स्थान पर आती है और शैव मंदिर निर्माण स्थली के समीप है।

मंदिर की सरंचना

कैलाश मंदिर उन 34 हिंदू जैन और बौद्ध गुफाओं और मठों में सबसे बड़ा है जिन्हें हम सामूहिक रुप से एलोरा की गुफाएं कहते है। जिनमें 17 हिन्दू मंदिर 12 बौद्ध गुफाएं एवं 5 जैन मंदिर को शामिल किया गया है। इस मंदिर का निर्माण कार्य इस लिए भी खास है क्योंकि उस समय काल के दौरान वर्तमान तकनीकी औजार जैसे जैक हैमर उपलब्ध नहीं था जिसके कारण पूर्ण मंदिर का निर्माण हथौड़े व छेनी का इस्तेमाल करने वाले श्रमिकों की सेना के द्वारा तराशा गया।

प्रारम्भ में बेसाल्ट चट्टान के अंदर तीन विशाल खाई खोदी गई और लगभग 20 लाख टन चट्टान को काटकर हटाया गया। अतः इस चरण के बाद ही वास्तविक कार्य प्रारम्भ हुआ। जैसे-जैसे कारीगर नीचे उतरते गए मंदिर परिसर की विभिन्न संरचनाओं को तरशते गए। इनमें मुख्य रुप से गर्भगृह के ऊपर का शिखर स्वतंत्र स्तंभ अलग-अलग मंदिर और विशाल मूर्तियां शामिल थीं। इसके बाद ही मंदिर की बाहरी और आंतरिक सतह पर विस्मयकारी मूर्तिकला को बारीकी से उकेरा गया।

मंदिर का मुख्य मंडप 16 स्तंभों के सहारे पर टिका हुआ है इसके अलावा शिव के वाहन नंदी बैल के लिए अलग मंडप बनाया गया है। चारों तरफ 45 फुट ऊंचे ध्वज स्तंभ का निर्माण किया गया है। इन स्तंभों पर कभी त्रिशूल रखे जाते थे। मंदिर परिसर के अन्दर पांच अलग-अलग मंदिर स्थापित किए गए हैं जिनमें से तीन यमुना सरस्वती और गंगा को समर्पित है। 

नंदी मंदिर के मंडप के अगल-बगल विशालकाय हाथी की मूर्तियों के साथ स्तंभों का निर्माण किया गया है। अगर पूरे मंदिर की लंबाई की बात करें तो यह मंदिर 276 फुट लंबा है और वहीं चौड़ाई की बात करें तो यह 148 फिट चौड़ा है। मंदिर  के आंगन में तीन तरफ कोठरियों को एक सारणी में बनाया गया है। 12 मंजिला इमारत के रुप में निर्मित होने के कारण यह मंदिर सम्पूर्ण एलोरा गुफाओं में विशेष स्थान रखता है। यह एक मात्र गुफा है जो 12 मंजिलों में निर्मित है। मंदिर में मौजूद प्रमुख मुर्तियों की बात करें तो इनमें नटराज यानी भगवान शिव की मूर्ति गजलक्ष्मी अर्धनारीश्वर विष्णु के दशावतार रावणानुग्रह की मु्र्तियां प्रमुख है।

आधुनिक युग की खोज

इस मंदिर पर 1819 में जान स्मिथ नामक ब्रिटिश अधिकारी दुबारा खोजा गया। जान स्मिथ एक दिन शिकार के दौरान औरंगाबाद से 100 किलो मीटर दूर सह्राद्रि की पहाड़ियों की तरफ मौजूद जंगल में चले गए। शिकार के दौरान वे बघौरा नदी के पास पहुंच गए। वहीं उन्हें नदी की ऊपर की पहाड़ियों पर एक मंदिर का मुहाना दिखा। उन्हें लगा की गुफा के अन्दर उन्हें शिकार के लिए जरूर कोई बाघ मिल सकता है जिसके कारण वे अन्दर चले गए। प्रकाश जला के जब उन्होंने अन्दर का द्रश्य देखा तो चकित रह गए। इस प्रकार इन गुफाओं की दुबारा से खोज हो सकी। वे पहला यूरोपीयन शख्स था जो पहली बार इन गुफाओं तक पहुंचा।

लेख से सम्बन्धित अगर आपके पास कोई अन्य जानकारी है तो जरूर हमें बताएं

शुक्रवार, 28 अगस्त 2026

नाना साहब

nana saheb

प्रस्तावना

‎प्रस्तुत लेख में हम महान भारतीय क्रांतिकारी नाना साहेब के बारे मे चर्चा करेंगे। जिन्हें हम भारतीय प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के शिल्पकार के नाम से भी जानते हैं। इसके साथ ही हम उनके द्वारा किये गए महत्वपूर्ण कार्यों के बारे में चर्चा करेंगे। तथा उनके जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओ जैसे की पेंशन का निलंबन, कानपुर विद्रोह इसके साथ ही 1857 की क्रांति के दौरान कल्पी दिल्ली और लखनऊ यात्रा की घटना का ज़िक्र किया गया है। इसके अलावा मेरठ क्रांति की पूर्ण घटना का ज़िक्र किया गया है। इसके साथ ही doctrine of lapse कानून के बारे मे ज़िक्र किया गया है।

जीवन परिचय

19 मई 1824 को इनका जन्म वेनगांव के माधवराव नारायण भट्ट के घर हुआ। उनकी माता का नाम मैनावती था। उनके पिता पेशवा के बाजीराव द्वितीय के चचेरे भाई थे।

बाजीराव पेशवा ने नाना राव को अपना दत्तक पुत्र स्वीकार किया और उनकी शिक्षा दीक्षा का जिम्मा अपने हाथों में लिया। नाना राव के बचपन का नाम धन्डोपंत था।  बचपन से बाजीराव द्वितीय की छत्र छाया मे ही उन्हें तलवार और बंदूक चलना तथा घुड़सवारी को सिखाया गया। नाना साहेब की तीन पत्नियां थी। जिनके नाम कुछ इस प्रकार थे कृष्णबायी सर्जाबायी काशीबाई था।

‎नाना साहब 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता के प्रमुख नेताओं मे से एक थे, इन्होंने अपना विद्रोह कानपुर में ब्रिटिश शासन के खिलाफ किया था।

‎पेंशन का निलंबन

‎लार्ड डलहोजी की हड़प नीति अंग्रेजों की इसी नीति को Doctrine of Lapse के नाम से भी जाना जाता हैं। इस नियम के तहत अंग्रेजों ने नाना राव को बाजीराव द्वितीया का वैध उत्तराधिकारी मनाने से मना कर दिया था। इस प्रकार उनकी वार्षिक पेंशन बंद कर दी गयी। पेशवा बाजीराव के मरने के बाद नाना साहब ने पेशवा की सभी उपाधियों को धारण कर लिया।
‎इसके साथ ही उन्होंने अपने वकील के सहयोग से ब्रिटिश सरकार को आवेदन किया और पेश वाई पेनशन को चालू करवाने की न्यायोचित मांग कानपुर के कलेक्टर के पास रखी मगर उनकी मांग को खारिज कर दिया गया और उन्हे सूचना दी गयी की ब्रिटिश सरकार उनकी पेश वाई उपाधि को स्वीकार नही करती।

‎लंदन मिशन

‎नाना साहब ने अपनी पेंशन बहाल करने के कई प्रयास किये मगर असफल रहे। इसके बाद क्षेत्रीय वकीलों का सहारा लिया मगर वे भी असफल रहे। अंत मे नाना साहब ने प्रसिध्द राजनेता एवं वकील अजीमुल्ला खान को इंग्लैंड भेजा लेकिन सारे प्रयास असफल रहे। अंत मे नाना साहब को अंग्रेजों की कूटनीति के बारे मे पता चला। दरासल अंग्रेज पेशवा बाजीराव की संपूर्ण सम्पति को जब्द करके अपनी टरेट्री में शामिल करना चाहते थे।
‎इन्ही कारणों से नाना साहब की पेंशन को बंद किया गया था। अजीमूल्ला खां ने बोहत प्रयास किये मगर असफल रहे। लौटते वक्त अजीमूल्ला खां ने रूस इटली फ्रांस की यात्रा की और वापिस आकर अंग्रेजों की वस्तविक साज़िश और यूरोप मे चल रहे स्वधिनता आंदोलन से रूबरू कराया।

‎1857 की क्रांति

‎इस क्रांति के दौरान नाना साहब ने लखनऊ दिल्ली की यात्रा की और कानपुर वापस आकर अपने परम मित्र कुवर सिंह से मुलाकात की जो की बिहार के रहने वाले थे इनसे मिलने के बाद इन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति करने की बात पर विचार विमर्श किया।

‎इसी दौरान मेरठ में अंग्रेजों के प्रति विद्रोह भड़क उठा जिसमें नाना राव ने गुप्त रूप से मदद की। जिसके परिणाम स्वरूप क्रांति कारियों ने ब्रिटिश खजाने से लगभग 9 लाख की नकदी और असलाह बारूद बरामद हुए। कानपुर के एक गढ़ में अंग्रेजों को कैद कर लिया गया और गढ़ पर भारतीय ध्वज फरया गया।

‎दिल्ली प्रस्थान

‎लूट की घटना के बाद सभी क्रांति कारी कानपुर मे दिल्ली जाने के लिए इकट्ठा हुए यांहा नाना साहब ने सभी का सहयोग किया मगर दिल्ली जाने मे बोहत खतरा था अतः सेना और हटियारों की कमी के कारण दिल्ली प्रस्थान के लिए नाना साहब को ना जाने की सलाह दी गयी।

‎जिसके परिणाम स्वरुप नाना साहब ने कानपुर से ही युद्ध का नेतृत्व किया और कानपुर के कल्याणपुर से युद्ध की घोषणा की। उन्होंने अपने सैनिकों को कई टुकड़ों मे बाँटा जिन्होंने अंग्रेजों को कड़ी टक्कर दी। परिणाम स्वरुप अंग्रेज पीछे हटने को मजबूर हुए। सेना के नेता ने अंग्रेज अफसर जनरल टु व्हीलर को पत्र लिखा और उन्हे इलाहाबाद वापिस बुलाने की गुजारिश की। टु व्हीलर ने उन्हे सुरक्षित इलाहाबाद लाने का वायदा किया।

‎सती चौरा घाट पर जब अपने साथी सैनिकों के लिए नाव की व्यवस्था की तब क्रांतिकारियों ने उन पर गोलियां चला दी जिसमें अनेकों अंग्रेज सैनिक मारे गए। ब्रिटिश सरकार इसका दोषी नाना साहब को ही मानती हैं।

‎बदले मे जनरल ने बड़ी सेना कानपुर मे भेजी क्रांति कारियों की पत्नियों को गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें मार डाला गया। इस घटना के बाद एक बार फिर से कानपुर मे ब्रिटिश शासन स्थापित हो गया।

‎लखनऊ प्रस्थान

‎इस घटना के बाद नाना साहब कानपुर से भागने मे सफल रहे। अंग्रेजों की बढ़ती सेना को देख कर नाना साहब गंगा नदी पर कर लखनऊ चले गए। अपने साथ भाईयों के सहयोग से एक बार फिर नाना साहब कानपुर वापस लौट आये। एक बार फिर से विद्रोह करने का प्रयास किया मगर अंग्रेजों ने कानपुर और लखनऊ मार्ग पर अपना अधिपत्य स्थापित कर लिया जिसे कारण नाना साहब को रुहेलखंड की और भगाना पड़ा।

‎रुहेलखंड मे विद्रोह

‎रुहेलखंड पहुंचकर उन्हें खान बहादुर खान का समर्थन मिला जिसके कारण एक बार फिर उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह प्रारंभ किया। अब अंग्रेजों को समझ आगया की जब तक नाना साहब पकड़े नही जाते तब तक विद्रोह को दबाना मुश्किल हैं। परिणाम स्वरूप अपने मुखबिरों को करांतिकारियो के संगठन मे शामिल किया ताकि उनकी हर गतिविधि पर नजर रख कर उन्हें पकड़ा जा सके।

‎मगर इन प्रयासों के बावजूद भी नाना साहब भागने मे सफल रहे और बरेली चले गए। बरेली विद्रोह मे क्रांति कारियों की हार हुई लेकिन नाना साहब महाराणा प्रताप की तरह बहादुरी से लड़े। अंत मे अपने सहयोगियों के कहने पर उन्हे नेपाल जाना पड़ा क्योंकि उनका मानना था अगर वे यानी उनका नेता पकड़ा गया तो विद्रोह समाप्त हो जायेगा।

जिस कारण नाना साहब नेपाल चले गए और यंही से उन्हे प्रधानमंत्री के संरक्षण मे रहना पड़ा। 

‎अंत मे 24 सितम्बर 1859 मे इनका देहांत हो गया। नाना साहब के बलिदान को इतनी आसानी से भूलना देश वासियों के लिए किसी देश द्रोह से का नही हैं।

सोमवार, 24 अगस्त 2026

राजेंद्र चोल

rajendra chola

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम राजेंद्र चोल द्वारा लड़े युद्धों तथा उनकी कुशल रणनीति के साथ उनके प्रारम्भिक जीवन के बारे में चर्चा करेंगे। इसके साथ ही हम उनके साम्राज्य के विस्तार पर भी चर्चा करेंगे। एक भारतीय राजा होने के नाते उनके द्वारा किए गए महत्वपूर्ण कार्यों पर भी इस लेख में विस्तार से बताया गया है।

जीवन परिचय

पहले हम राजेंद्र चोल प्रथम की बात करते है इनका शासन काल 1014 से 10144 के समय तक का था। इनके पिता का नाम राजराज था और माता का नाम जो की कोडंबलुर की राजकुमारी थिरिपुवना अथवा महादेवी नाम से भी प्रसिद्ध थीं। राजेंद्र प्रथम का राज्याभिषेक 1012 ई. में हुआ। हलांकि राजराज अभी मरे नहीं थे  लेकिन इससे पहले ही उन्होंने अपनी गद्दी का वारिस राजेंद्र को बना दिया। 

बाप बेटे ने मिलकर प्रशासन को चलाया। राजराज के अनुभव और राजेंद्र चोल के प्राक्रम से चोल साम्राज्य ने कई क्षेत्रों पर विजय हासिल की।राजगद्दी पर बैठते ही राजेंद्र प्रथम को मद्रास वर्तमान तमिलनाडु मैसुर वर्तमान कर्नाटक सिंहल एवं आंध्र प्रदेश पर शासन करने का अवसर मिला। इसके बाद राजेंद्र प्रथम ने अपने 33 वर्ष के कार्य काल में श्री लंका मालदीव तथा इंडोनेशिया पर भी अपना शासन स्थापित किया। राजेंद्र चोल ने अपने कार्य काल के सातवे वर्ष यानी 1018 ई. को अपने सबसे काबिल बेटे राजाधिराज को युवराज के पद पर नियुक्त किया।

अपने शासन के प्रारंभिक कार्यों में उन्होंने  इडितुरैनाडु यह कृष्णा तथा दक्षिण के तुंगभद्रा नदी के बीच के क्षेत्र था पर अपना आधिपत्य स्थापित किया। इसके बनवासे फिर कोल्लिप्पक्कै जोकी हैदराबाद के उत्तर पूर्व का एक क्षेत्र था एवं मण्णैक्डक्कम् पर विजय हासिल की। 

खास बात यह है कि इन क्षेत्रों पर चालुक्य नरेश सत्याश्रय का अधिकार था। 1017 ई. में राजेंद्र प्रथम ने ईलमंडलम जिसे हम वर्तमान समय में श्री लंका के नाम से जानते हैं पर विजय हासिल की।  इस समय श्री लंका पर महेन्द्र पंचम का अधिकार था। 1017 ई. के ठीक 12 साल पहले राजराज ने श्री लंका पर आक्रमण किया था मगर वे श्री लंका के कुछ क्षेत्रों पर ही अपना अधिपत्य स्थापित कर सके। लेकिन उनके बेटे ने पूरे श्री लंका पर अपना अधिपत्य स्थापित करके अपने पिता के सपने को पुरा किया।

1018 में केरल पर आक्रमण किया और वहां की सास्कृंतिक सम्पत्ति को लुटा। इसके बाद पांड्य राज पर हमला हुआ इस विजय के बाद राजेंद्र ने अपने बेटे सुंदरचोल राजाधिराज प्रथम को पांड्य प्रदेश का वायसराय बनाया जिसे हम महामंडलेश्वर के रुप में भी जानते है। इस प्रकार सुंदर चोल ने पांड्य प्रदेश पर 1018 से 1044 ई तक के समय काल तक शासन किया।

 वेंगी पर आक्रमण

1019 ई.को वेंगी पर आक्रमण किया यह युद्ध राजेंद्र चोल ने अपनी बहन के बेटे को राजगद्दी दिलाने के लिए लड़ा था। दरअसल इस क्षेत्र पर चालुक्यों का अधिपत्य था। विमलादित्य जो उस समय चालुक्य नरेश की गद्दी पर बैठा था अपनी चोल महारीनी कुंदवै देवी से उत्पन्न पुत्र राजराज नरेंद्र को राजगद्दी पर बिठाना चाहता था। वहीं चालुक्य शासक जयसिंह वेंगी के सिंहासन पर नरेंद्र के सौतेले भाई विष्णु वर्धन  को गद्दी पर बिठाना चाहता था। परिणामस्वरूप जयसिंह ने कलिंग के तथा ओड़्ड के शासकों के साथ मिलकर नरेंद्र को राजगद्दी पर बिठाने का विरोध किया। 

राजनीति षड्यंत्र से दुःखी होकर नरेंद्र ने अपने मामा राजेंद्र चोल से मदद मांगी इस प्रकार वेंगी पर राजेंद्र चोल द्वारा भारी आक्रमण किया गया। जिसमें विजयादित्य और जयसिंह की सेना को हरा कर 1022 ई में राजराज नरेंद्र को वेंगी की राजगद्दी पर बिठाया। इसी वर्ष यानी 1019 ई में  ही राजेंद्र चोल कलिंग को जीतते हुए आगे निकल गए। राजेंद्र प्रथम ने अपने शासन काल में अनेकों युद्ध लडे।

राजेंद्र चोल की युद्ध नीति

राजेंद्र चोल प्रथम Rajendra Chola  की युद्ध नीति मुख्य रूप से अत्यधिक सशक्त नौसेना Navy, दूरदर्शी कूटनीति और तीव्र गति से अचानक आक्रमण करने की कला पर आधारित थी। उन्होंने दक्षिण भारत की सीमाओं से आगे निकलकर दक्षिण-पूर्व एशिया और गंगा घाटी तक अपने सैन्य कौशल का लोहा मनवाया।राजेंद्र चोल के पास एक अजेय बेड़ा था। उन्होंने बंगाल की खाड़ी को पार कर सुमात्रा, जावा और मलय प्रायद्वीप पर विजय प्राप्त की।

अचानक और तीव्र आक्रमण

राजेंद्र चोल सबसे अचूक रणनीति यह थी कि अपने शत्रु राज्य को सोचने का य युद्ध रणनीति बनाने का मौका न देना। ताकि जब तक राजा को खबर लगे तब तक उसे पुरी तरह से घेर लिया जाए। इसका परिणाम यह होता था कि विरोधी राजा को भागने का मौका य सतर्क होने का मौका ही नहीं मिल पाता था। जिसके परिणामस्वरूप य तो उसे हार माननी पड़ती या फिर संधि करनी पड़ती।

मजबूत नौ सेना टुकड़ी का होना
श्री विजया साम्राज्य के खिलाफ उन्होंने सुंदर जलडमरूमध्य से होकर ऐसा अप्रत्याशित नौसैनिक हमला किया कि दुश्मन संभल ही नहीं पाए। राजेंद्र चोल के पास अपने विश्वास पात्र लोगों का एक पूरा जखीरा था जिसे वे युद्ध के दौरान दुश्मन मुल्क को घेरने का कार्य करते थे।

आर्थिक और व्यावसायिक प्रभुत्व
उनकी युद्ध नीति केवल राज्य विस्तार तक सीमित नहीं थी। बल्कि व्यापारिक मार्गों जिनमें समुद्री मार्गों महत्वपूर्ण थे को सुरक्षित रखने और एकाधिकार तोड़ने के लिए अहम भूमिका निभाते थे। अतः व्यापार में बाधा तथा जीवन यापन की आवश्यक वस्तुओं पर रोक लगाकर पर युद्ध में विजय हासिल करने का प्रयास किया जाता था।

स्थानीय सहायता और कूटनीति
वह सीधे शासन करने के बजाय क्षेत्रों को अपने अधीन कर व्यापारिक और राजनीतिक प्रभाव स्थापित करते थे। राजेंद्र चोल अपने अगल बगल की स्थानीय रियासतों को व्यापारिक मार्ग पर कब्जा होने के कारण उन्हें अन्य देशों से व्यापार करने की अनुमति कुछ शर्तों के आधार पर देते थे। 

जिस कारण उस क्षेत्र विशेष में उनका शासन न होने के कारण भी उनका प्रभाव बना रहता था। जिस कारण से उन रियासतों के आंतरिक मामलों और राजनीति गतिविधियों पर उनकी नजर हमेशा बनी रहती थी। य यूं कहे तो उन रियासतों में सेंध लगाना तथा उनके अंतरिक भेद निकालना आसान हो जाता था।

उपरोक्त सभी कारणों के बावजूद राजेंद्र चोल एक बहादुर एवं साहसी राजा थे जिन्होंने अपने दुश्मन को युद्ध में कभी पीठ नहीं दिखाई। अपने कठोर दृढ़ संकल्प के चलते उन्होंने इतना बड़ा साम्राज्य स्थापित किया। इसके साथ ही राजेंद्र चोल एक अच्छे विद्वान होने साथ अपनी प्रजा की भलाई के लिए समय-समय पर महत्वपूर्ण कार्य और समारोह का आयोजन भी कराते थे।

रविवार, 23 अगस्त 2026

रानी अब्बक्का

rani abbakka

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम रानी अब्बक्का के बारे में जानेंगे उन्हें प्रथम स्वतंत्रता सेनानी के रुप में भी जाना जाता है। वर्तमान समय में भी दक्षिणी भारत के क्षेत्रों में रानी अब्बक्का को लोकगीतों तथा कहानीयों के माध्यम से याद किया जाता है। इसके साथ ही इन क्षेत्रों में प्रसिद्ध तुलु नाडू नाटक भी उन पर ही बनाया गया है। इन्होंने सर्वप्रथम भारतीय आक्रमणकारी पुर्तगालीयों को कई बार युद्ध में हराया लेकिन अपने पति द्वारा धोखा दिये जाने के कारण बंदी बना ली गयी।

इस लेख के माध्यम से हम उनके प्रारम्भिक जीवन तथा उनके द्वारा किए गए महत्वपूर्ण कार्य एवं उनके  द्वारा लड़े गए महत्वपूर्ण युद्ध के बारे में चर्चा करेंगे। इसके साथ ही हम उनके प्रशासनिक व्यवस्था तथा राजनीतिक गतिविधियों के बारे में चर्चा करेंगे।

प्रारम्भिक जीवन

वे भारतीय तुलुवा वंश से थीं इस राज वंश का प्रशासन भारत के कर्नाटक राज्य तटीय क्षेत्र तुलु नाडु पर था। विजय नगर साम्राज्य के सामंत के रुप में चौटा तुलुवा वंश का राज घराना कार्य करता था। या ऐसा समझें की वे विजय नगर साम्राज्य के एक सहयोगी राजा के रुप में कार्य करते थे।इनकी राज धानी पु्ट्टिगे थी। उनके चाचा तिरुमला राय ने उन्हें चौटस समुदाय की प्राचीन वंश परम्परा अलियासंताना का पालन करते हुए उन्हें  उल्लाल नगर की राजगद्दी पर बिठाने का कार्य किया। रानी अब्बाक्का ने बचपन से ही युद्ध कला और राज कला में प्रशिक्षण प्राप्त किया था। उन्हें बचपन से ही घुड़सवारी निशानेबाजी और तलवार बाजी का शौक था।

बताते चलें कि उल्लाल चौटा के राजा थिरुमाला राय तृतीया की राजधानी थी जो कि रानी अब्बक्का के पिता थे। यहां खास बात यह है कि रानी अब्बक्का किसी भी प्रकार से हिन्दू  धर्म से सम्बन्धित नहीं थीं लेकिन इसके बावजूद उनकी प्रजा में सभी प्रकार  के धर्मों के लोग शामिल थे। 16 शताब्दी में उनके शासन काल के  दौरान शोध से पता चला है कि बेरी समुदाय के लोगों ने उनकी नौसेना में नाविक के रुप में कार्य किया था। इसके साथ ही जब रानी अब्बक्का ने जब मलाली बांध के निर्माण कार्य को जब स्वयं के निरीक्षण में करवाया तभी भी पत्थरों की पहचान और नक्काशी के लिए बेरी समुदाय के लोगों को ही चुना गया था।

उनकी सेना में सभी धर्म और जाति के लोग शामिल थे। इसके साथ ही उन्होंने कालीकट के ज़मोरिन शासक  से गठबंधन किया था। इसके अलावा बिदनूर के प्रभावशाली एवं शक्तिशाली राजा वेंकटप्पनायका का सहयोग भी उन्हें मिला। जिसके कारण उन्होंने पुर्तगाली सेना को कई बार धुल चटाई।

इनके चाचा तिरुमला राय ने इनकी शादी मैंगलोर की बंगा रियासत के राजा लक्ष्मप्पा अरसा बंग राजा द्वितीय से करायी थी। हलांकि यह विवाह ज्यादा समय तक टिक नहीं पाया जिसके कारण रानी वापिस उल्लाल चौटा वापिस आना पड़ा।दरअसल मैंगलोर के राजा ने पुर्तगालीयों के साथ गठबंधन कर लिया था और ये लोग मिलकर तुलुवा वंश कि रियासत के अंतर्गत आने वाली मंगलौर बंदरगाह पर अपना शासन स्थापित करना चाहते थे।

मंगलौर बंदरगाह

उल्लाल नगर की यह बंदरगाह एक समृद्ध बंदरगाह थी जिसके माध्यम से अरब तथा पश्चिम के कई देशों के साथ व्यापार किया जाता था इसके साथ ही भारत देश के मसालों को अन्य देशों तक पहुंचाया जाता था। एक व्यापारिक केन्द्र होने के कारण तथा व्यापार में अधिक लाभ कमाने की मंशा से पुर्तगाली डच एवं ब्रिटिशस आपस में हमेशा लड़ते रहते और राजनीतिक चालें चलते रहते थे। मगर स्थानीय शासक की मजबूती के कारण हमेशा असफल होते रहते थे। हलांकि इस क्षेत्र के लोग अलग- अलग धर्मों से थे मगर इन्होंने जाति धर्म से ऊपर उठ कर एक मजबूत संगठन बना रहा था। जिसके कारण इस क्षेत्र में प्रवेश करने पर भी अन्य प्रशासकों को अनुमति लेनी पड़ती थी।

पुर्तगालीयों  के साथ यू्द्ध


रानी अब्बक्का ने पुर्तगालीयों के हमलों को चार दशकों तक विफल किया मगर अंत में हार का सामना उन्हें करना पड़ा। यहां हम कुछ महत्वपूर्ण युद्धों के बारे में ही चर्चा करेंगे जो की महत्वपूर्ण है।

1525 का युद्ध
इस समय काल में रानी हाल ही में गद्दी पर बैठीं थी पुर्तगालीयों को लगा एक रानी को हराना बहोत ही आसान होगा। इसलिए उन्होंने गोवा क्षेत्र पर विजय प्राप्त करने के बाद उल्लाल चौटा पर आक्रमण किया और उन्हें बुरी हार का सामना करना पड़ा।

1555 का युद्ध
इस युद्ध का नेतृत्व पुर्तगालीयों की तरफ से एडमिरल डोम अव्वारो दा सिल्वेरा ने किया। इस युद्ध की शुरुआत पुर्तगालीयों द्वारा कर देने के लिए मजबूर करने के कारण हुई जिसके विपरीत रानी से सिधा कर देने से इनकार कर दिया। इस बार भी पुर्तगालीयों को हार का सामना करना पड़ा।

1557 का युद्ध
इस पुर्तगालियों ने मंगलौर को लुटा और उसे बरबाद कर दिया लेकिन इस बार भी अंत में जीत रानी अब्बक्का की ही हुई। हलांकि लूटपाट एवं इमारतों के नष्ट होने के कारण रानी अब्बक्का को भी भारी नुकसान का सामना करना पड़ा।

1568 का यु्द्ध
इस बार के युद्ध का नेतृत्व पुर्तगाली वायसराय एंटोनियो नोरोन्हा के द्वारा भेजे गये सेनापति जोआओ पेइक्सोटो द्वारा किया गया। ये अपने साथ एक बड़ी सेना के साथ आया था। अब कि बार पुर्तगाली उल्लाल नगर पर कब्जा करने में सफल रहे। रानी अब्बक्का बच निकली और एक मस्जिद में शरण ली। उसी रात में रात के दूसरे पहर में रानी ने 200 सैनिकों के साथ पुर्तगालियों पर हमला कर दिया और उन्हें बंदी बनी लिया गया। सेनापति जोआओ पेइक्सोटो को मार दिया गया। इस प्रकार एक बार फिर से पुर्तगाली सेना की हार हुई और उन्हें मंगलौर के किले को खाली करना पड़ा।

1570 का युद्ध
इस युद्ध के दौरान पुर्तगालीयों को रानी अब्बक्का के पति का समर्थन मिल गया था। इधर रानी को अहमदनगर के सुल्तान और कालीकट के ज़मेरिन का सहयोग मिला। ज़ंमोरिन के सेनापति कुट्टी मार्कर ने रानी अब्बक्का की ओर से लड़ाई लड़ी और मंगलौर पर अपनी आधिपत्य स्थापित किए पुर्तगालीयों को मार गिराया लेकिन वापिस आते वक्त धोखे से उसकी हत्या कर दी गई। इन हारों के चलते तथा अपने पति के धोखे के कारण युद्ध हार गईं। उन्हें गिरफ्तार करके कारागार में डाल दिया गया। जेल में भी उन्होंने कई बार विद्रोह किया। मगर अंत में वे वीरगति को प्राप्त हुईं।  

शनिवार, 22 अगस्त 2026

शकों का आक्रमण

shakas dynasty

प्रस्तावना

इस लेख में शकों के भारत पर आक्रमण के साथ ही इनके वंश के संस्थापक एवं डूडो सिथियन राज वंश की स्थापना तथा बैक्ट्रिया पर इनके अधिकार के साथ ही भारत में प्रवेश तथा भारत में शकों की पांच शाखाओं इनके प्रमुख शासकों तथा शकों के अंत का मुख्य कारण जानेंगे। इसके साथ ही हम शक शासक द्वारा संस्कृत भाषा में लिखे सबसे लम्बे अभिलेख के बारे में चर्चा करेंगे और अंत में शक शासकों द्वारा जारी किए गए सिक्कों के इतिहास के बारे में चर्चा करेंगे।

इंडो सिथियन राज

मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद शकों का आक्रमण भारत के पश्चिमोत्तर भाग पर हुआ। यह मूल रुप से मध्य एशिया के सिर दरिया क्षेत्र के रहने वाली खाना बदोश जनजाति से थे। जिन्होंने भारत में इंडो सिथियन राज वंश की स्थापना की थी। यूची कबीले के लोगों ने जो कि चीनी सीमाओं के पास रहते थे ने शकों को उनकी मातृभूमि से खदेड़ दिया था। परिणामस्वरूप अपनी जान बचाने के लिए इन्होंने दक्षिण की और जाना उचित समझा। इस प्रकार वे प्राचीन बैक्ट्रीया में पहुंचे जिसे वर्तमान समय में आफगानिस्तान के यवन नाम से जानते है। यवन को तबाह करने के बाद वे भारत की तरफ आये।

भारत में प्रवेश

शकों ने हिंदूकुश पर्वत को पार करके लगभग प्रथम शताब्दी के समय काल में भारत पर आक्रमण किया। कई क्षेत्रों को जीतने के बाद शकों ने भारत में अपनी पांच शाखाओं की स्थापना की। क्रमवार इन्होंने अफगानिस्तान पंजाब मथुरा पश्चिमी भारत तथा दक्षिण के क्षेत्रों पर अपना राज्य स्थापित किया।

भारत में शकों की 5 शाखाएं

पहली शाखा
यह भारत की मुख्य भूमि से बाहर अफगानिस्तान में स्थापित की गई मगर उस समय काल के अनुसार अफ्गानिस्तान पर भी भारतीय का ही शासन स्थापित था। दूसरी शाखा
शकों ने अपनी दूसरी शाखा को पंजाब राज्य के क्षेत्र में स्थापित किया जिसकी राजधानी तक्षशिला थी। इस शाखा का पहला प्रसिद्ध राजा माउस था। जिसने सिंधु घाटी के क्षेत्र में शकों को स्थापित  किया।

तीसरी शाखा
यह शाखा भारत के उत्तर प्रदेश के जिले मथुरा में स्थापित की गई जिसकी राजधानी मथुरा ही थी। इस शाखा का प्रमुख  शासक  राजुवुल था। चौथी शाखा- यह पश्चिमी भारत पर शासन करने वाली शाखा थी जिसने मालवा गुजरात कोंकण पर अपना शासन स्थापित किया।

पाँचवीं शाखा
इन्होंने दक्षिणी भारत के ऊपरी हिस्से पर अपना शासन स्थापित किया।

शकों के प्रमुख शासक

शक अपने भारतीय राजाओं को सत्रप कहते थे जो कि दो मुख्य वंशों में विभाजित थे। पहला क्षहरात वंश था वहीं दूसरा कार्दमक वंश था।

1.क्षहरात वंश 
इस वंश ने नासिक क्षेत्र में अपना शासन स्थापित किया। इस वंश का सबसे प्रतापी राजा नहपान था। इसने सातवाहन साम्राज्य के कई क्षेत्र विशेष के जीता था। लेकिन कुछ समय के बाद सातवाहन वंश के शासक गौतमी पुत्र शातकर्णी ने नाहपान को युद्ध में पराजित कर मार डाल। इस बात का प्रमाण हमें जोगलथम्बी से प्राप्त हुए सिक्कों से मिलता है।

2.कार्दमक वंश
इस वंश ने उज्जयिनी के क्षेत्र में अपना शासन स्थापित किया। इन्हें उज्जयिनी के सत्रप के नाम से भी जाना जाता है। इस वंश के संस्थापक ने उज्जयिनी को अपनी राजधानी बनाया।

संस्कृत भाषा का अभिलेख

रुद्र दामन प्रथम इसने गुजरात के जूनागढ़ में प्रसिद्ध गिरनार अभिलेख का निर्माण करवाया जो की पूरी संस्कृत भाषा में लिखा गया सबसे बड़ा अभिलेख था। इसके साथ ही रुद्र दामन ने मौर्य काल की प्रसिद्ध सुदर्शन झील को भी अपने नीजी खर्च पर जीर्णोद्धार करवाया था। बताते चलें कि रुद्र दामन अपने समय काल का तथा शक इतिहास का सबसे प्रसिद्ध एवं शक्तिशाली राजा था। इसने सातवाहन वंश के राजा वशिष्ठीपुत्र पुलुमावी को युद्ध में दो बार पराजित किया था। लेकिन वैवाहिक संबंध होने के कारण उसे छोड़ दिया।

विक्रम संवत

57 ईसा पूर्व के समय काल में मालवा यानी उज्जैन के स्थानीय राजा ने शकों को युद्ध में बुरी तरह से पराजित करके भारत से खदेड़ दिया। इस ऐतिहासिक जीत के उपलक्ष्य में उन्होंने विक्रमादित्य की उपाधि धारण की और 57 ईसा पूर्व के समय काल में ही विक्रम संवत की शुरुआत की। इसके बाद से ही विक्रमादित्य एक प्रसिद्ध शाही उपाधि बन गई

शकों का अन्त
चौथी शताब्दी के समय काल में गुजरात में शक शासन को जड़ से उखाड़ फेंकने कार्य गुप्त वंश के महान सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय द्वारा किया गया। इनके द्वारा अंतिम शक शासक रुद्र सिंह तृतीय को युद्ध में पराजित कर मारा दिया गया इस प्रकार भारत से पुरी तरह से शक साम्राज्य का अंत हुआ। इस जीत के बाद चंद्र गुप्त द्वितीय ने शाकरि की उपाधि धारण की जिसका अर्थ है शकों का विनाश करने वाला। इसी समय काल में उनके द्वारा व्याघ्र शैली में लिखे चांदी के सिक्के जारी किए गए

धातुओं का प्रयोग

1 चांदी के सिक्के
पश्चिमी क्षत्रप यानी रुद्रदामन ने सबसे पहले व्यवस्थित रुप से चांदी के सिक्के जारी किए। इन सिक्कों का द्रुम कहा जाता था

2 तांबा और सीसा 
आम जनता रोजमर्रा के व्यापार के लिए तांबे और सीसे के सिक्के प्रयोग करती थी जिन्हें भारी मात्रा में शक शासकों द्वारा बनाया गया था

3 सोने के सिक्के 
शकों द्वारा कोई भी सोने का सिक्का नहीं जारी किया गया। सोने के सिक्कों का श्रेय मुख्य रुप से कुषाणों और गुप्त वंश को जाता है

खास बात यह है कि भारतीय इतिहास में पश्चिमी क्षत्रप पहले ऐसे शासक थे जिन्होंने अपने सिक्कों पर टंकण का वर्ष लिखना शुरु किया था जिसके चलते इतिहासकारों के लिए शकों का सटीक कालक्रम और राजाओं के शासन काल का पता लगाना बेहद आसान हो गया। इन सिक्कों पर लिखी तिथियों की खास बात यह भी थी कि इन्हें शक संवत के आधार पर लिखा जाता था

सिक्कों में द्विभाषी लिपि का प्रयोग किया जाता था। सिक्के के सामने वाले भाग पर ग्रीक भाषा में राजा का नाम लिखा जाता था तथा सिक्के के पिछले भाग पर स्थानीय भाषा प्राकृत या ब्राह्मी  य खरोष्ठी लिपि का प्रयोग किया जाता था

इसके अलावा सिक्कों पर राजा का चित्र बनाया जाता था जिसमें राजा मध्य एशियाई शैली में टोपी पहने हुए होता था इस प्रकार के सिक्के की  दूसरी तरफ तीन चोटियों वाले पहाड़ की आकृति कुरेदी जाती थी। इसके साथ ही कुछ सिक्कों पर सूर्य चंद्रमा वज्र और कभी कभी देवी देवताओं के चित्र भी कुरेदे जाते थे

कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न

1 भारत में शक मूल रुप से किस क्षेत्र से आये थे। उत्तर शक मूल रुप से मध्य एशिया के स्टेपी क्षेत्र से आए थे जिन्हें बाद में इंडो सिथियन के नाम से जाना गया।

2 क्षहरात वंश के प्रमुख शासक नहपान को किस सात वाहन वंश के  राजा ने पराजित किया था
उत्तर गौतमी पुत्र सातकर्णि ने नहपान को बुरी तरह से पराजित किया था और उनके द्वारा जारी किए गए सिक्कों पर अपने नाम की मुहर लगवाई।

3 किस शक शासक ने संस्कृत भाषा में सबसे पहला और लम्बा अभिलेख जिसे हम जूनागढ़ अभिलेख के रुप में भी जानते हैं को जारी किया।उत्तर इसका नाम रुद्र दामन था यह कर्दमक वंश से सम्बन्धित था यह भारत का सबसे लंबा पहला शिला लेख था।

4 पश्चिमी क्षत्रपों की मुख्य राजधानी कहां थी।उत्तर उज्जैन य उज्जयिनी थी।

5 भारत में शक सत्ता का अंतिम रुप से उन्मूलन किस गुप्त शासक ने किया।
उत्तर चंद्र गुप्त द्वितीय ने रुद्र सिंह तृतीया को पराजित करके।

यवन अथवा यूनान का आक्रमण

 
indo greek war

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम यवन यानी यूनान द्वारा भारत पर किए आक्रमण के बारे में चर्चा करेंगे। इसके साथ ही हम यूनान को राजा डेमोट्रियस सिकंदर महान एवं मिनांडर तथा पुरातात्विक साक्ष्य तथा पंतजलि के महाकाव्य के बारे में चर्चा करेंगे। इसके साथ ही हम इस आक्रमण के प्रभाव एवं भारत में कला खगोल शास्त्र एवं भारतीय रंगमंच के बारे में भी चर्चा करेंगे। अंत में हम यूनान शासकों द्वारा भारतीय धर्मों के अंगीकरण पर भी चर्चा करेंगे।

प्रथम यूनान आक्रमण

यह आक्रमण सिकंदर द्वारा 326 ईसा पूर्व के समय काल में किया गया था। यह युद्ध सिकंदर और भारत के पंजाब क्षेत्र के राजा पोरस के बीच लड़ा गया था। पोरस उस समय काल में पंजाब के राजा था। सिकंदर को पोरस पर आक्रमण करने के लिए हिंदू कूश पर्वत श्रृंखला को पार कर पंजाब पर आक्रमण करना पड़ा था। इस युद्ध में पोरस की हार हुईं। इसके बाद मौर्य साम्राज्य के राजा चंद्रगुप्त मौर्य ने यूनानी राजा को हरा कर यूनानी साम्राज्य को सीमित कर दिया था।

द्वितीय युद्ध

इसे हम इंडो- ग्रिक युद्ध के नाम से भी जानते है। मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद यूनानियों का आक्रमण एक बार फिर से हुआ। वे मध्य एशिया यानी बैक्ट्रिया से आये थे। इस युद्ध का समय काल लगभग 200 ईसा पूर्व का था।

तीसरा युद्ध

यह युद्ध लगभग 183-180 ईसा पूर्व में किया गया। जिसे डेमोट्रियस प्रथम द्वारा अंजाम दिया गया। इसने पंजाब सिंध एवं अफगानिस्तान के बड़े हिस्से को जीत कर साकल यानी वर्तमान सियालकोट को अपनी राजधानी बनाया। इसके साथ ही मिनांडर की सेना ने भारत के भीतर साकेत यानी अयोध्या पांचाल और मौर्यों की राजधानी पाटलिपुत्र वर्तमान पटना पर अपना अधिकार स्थापित किया। मिनांडर ने बौद्ध भिक्षु नागसेन से प्रभावित होकर बौद्ध धर्म को अपना लिया। इस बात का उल्लेख हमें मिलिंदपन्हो ग्रंथ में मिलती है। 

यूनानियों से कड़ा मुकाबला शुंग वंश राजाओं द्वारा किया गया। जिसमें शुंग वंश के संस्थापक पुष्यमित्र शुंग और उनके पोते वसुमित्र शुंग का नाम आता है। इस युद्ध का उल्लेख कालिदास के नाटक मालविकाग्निमित्रम् में मिलता है। नाटक के अनुसार वसुमित्र ने यूनानियों से युद्ध सिंधु नदी के तट पर किया था।

युद्ध के पुरातात्विक साक्ष्य

1.पतंजलि का महाभाष्य
इसमें लिखा हुआ है कि अरुणद् यवनः साकेतम्। अरुणद् यवनो मध्यमिकाम् जिसका अर्थ है कि यवनों ने साकेत यानी अयोध्या और माध्यमिका यानी चित्तौड़ को घेर लिया था।

2.गार्गी संहिता
यह युग पुराण से लिया गया है जिसमें बताया गया है कि यवन सेना द्वारा साकेत पांचाल और पाटिपुत्र पर किए गए भयंकर आक्रमण के कारण वहां के नगर नष्ट हो गये थे।

यूनान आक्रमण का प्रभाव

1 सिक्के का चलन
भारत में सबसे पहले सोने के सिक्कों का चलन तथा राजाओं के नाम वाले सिक्के यूनान शासकों द्वारा चलाये गए थे। इसके साथ ही सांचे के ढले सिक्के तथा निश्चित वजन वाले सिक्कों का चलन प्रारम्भ किया। इसके साथ ही यूनानियों ने द्विभाषी सिक्के भी चलाये जिनमें एक तरफ राजा का नाम एवं चित्र होता था तथा दूसरी तरफ भारतीय देवी देवताओं का चित्र एवं खरोष्ठी या ब्राह्मी लिपि में लेख लिखा होता था।

2 कला
यूनानी कला और भारतीय कला शैली के मिश्रण से भारतीय उत्तर पश्चिम गंधार कला शैली का विकास हुआ। बुद्ध की मूर्तियों का निर्माण इसी कला शैली के प्रभाव से यूनानी देवता अपोलो की तर्ज पर घुंघराले बाल यधार्थवादी शारीरिक बनावट और सिलवटों के साथ कपड़ों का तराशा गया।

3 ज्योतिश व विज्ञान
भारतीयों ने यूनानियों से हेलियोडोरस स्तंभ जैसी वास्तुकला और उन्नत खगोल विज्ञान को सिखा। ज्योतिष में नए आयाम जूड़े जैसे सप्ताह में सातों दिनों का विभाजन और राशियों पर आधारित ज्योतिषीय गणना में यूनानी प्रभाव को देखा जा सकता है। प्राचीन गार्गी संहिता में यह स्वीकार किया गया है कि यद्यपि यूनानी विदेशी थे लेकिन खगोल विज्ञान में उनके ज्ञान के कारण वे सम्मान के पात्र है।

4 भारतीय रंगमंच
भारतीय नाटकों में मंच के पर्दे के लिए यवनिका शब्द का प्रयोग प्रारम्भ किया जाना प्रारम्भ किया गया जिसे यवन संस्कृति का प्रभाव माना जाता है। इस प्रकार यूनान शासकों के आगमन से भारतीयों ने संस्कृति कला सिक्के निर्माण और विज्ञान के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण कला सीखी। 

धर्मों का अंगीकरण

यूनान शासकों ने भारत आकर यहां की संस्कृति को अपना लिया। यूनान शासक मिनांडर ने बौद्ध  विद्वान नागसेन से प्रभावित होकर बौद्ध धर्म को अपनाया था जिसका उल्लेख हमें मिलिंदपन्हो ग्रंथ में मिलता है।  गरुड़ स्तंभ  का निर्माण यूनान राजदूत हेलियोजोरस में भगवान विष्णु के  धर्म वैष्णव को स्वीकार करके ही बनवाया था। इसके अलावा मध्य प्रदेश के विदिशा यानी बेसनगर के  प्रसिद्ध गरुड़ ध्वज स्तंभ को स्थापित करवाना भी यूनानियों के भारतीय धर्म को स्वीकार करने का प्रमाण है।

मंगलवार, 18 अगस्त 2026

दुर्गावती देवी

durgawati devi kon thi

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम महान क्रांतिकारी नेता दुर्गावती देवी जी जिन्हें हम दुर्गा भाभी के नाम से भी जानते है के बारे में चर्चा करेंगे। इसके साथ ही उनके द्वारा किए गए महत्वपूर्ण कार्य जैसे लार्ड हैली की हत्या का प्रयास, हिमालयन टायलेट्स, भगत सिंह की मदद, करतार सिंह सराभा की शहादत की घटना तथा उनके प्रारम्भिक जीवन पर भी प्रकाश डाला गया है। दुर्गावती जी देश की उन गिनी चुनी महिला क्रांतिकारी में से एक थीं जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए अपने परिवार तक को न्योछावर कर दिया।

जीवन के प्रारम्भिक समय में वे एक साधारण महिला ही थीं मगर भगवती चरण वोहरा से शादी होने के बाद वे क्रांतिकारी संगठन से जुड़ गई। दरअसल उनके पति भगवती चरण जी हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के सदस्य थे। जो कि एक क्रांतिकारी संगठन था जिसका का देश की आज़ादी में महत्वपूर्ण योगदान था। इन्हीं से शादी होने के बाद उनकी पहचान एक दुर्गा भाभी के रुप में हुई।

जीवन परिचय

दुर्गावती देवी का जन्म 7 अक्तूबर 1907 में इलाहाबाद के  शहजाद पुर ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम पण्डित बांके बिहारी था जो कि इलाहाबाद के कलेक्ट्रेट में नाजिर थे। इनके बाबा महेश प्रसाद भट्ट जालौन जिला में थानेदार के पद पर तैनात थे। 10 वर्ष की आयु में इनका विवाह लाहौर के भगवती चरण बोहरा के साथ हो गया था। इनके ससुर शिव चरण जी रेलवे में एक उच्च अधिकारी थे। इनके ब्रिटिश सरकार ने राय साहब की उपाधि दी थी। इनके पति भगवती चरण बोहरा, राय साहब का पुत्र होने के बाद भी अंग्रेज़ी शासन के खिलाफ थे। मगर अपने पिता के कारण शांत रहते  थे लेकिन अपने पिता की मृत्यु के बाद से इन्होंने अंग्रेजों का खुल कर विरोध किया और  एक क्रांतिकारी के रुप में सामने आये।

1923 में इनके पति भगवती चरण बोहरा ने बी. ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की और दुर्गावती जी ने प्रभाकर में डिग्री हासिल की जो कि संगीत में ली जाती है इसकी अवधि 6 वर्ष की होती है और यह बी. ए. के समकक्ष होती है। 28 मई 1930 में इनके पति बोहरा जी रावी नदी के तट पर बम परीक्षण के दौरान शहीद हो गए। उनके शहीद होने के  बाद भी दुर्गा जी क्रांतिकारियों के साथ सक्रिय रही।

1.लार्ड हैली की हत्या का प्रयास

9 अक्तूबर 1930 को दुर्गा भाभी ने गर्वनर हैली पर गोली चलाई मगर वह बच गया मगर वे मुंबई के पुलिस कमिश्नर मारने में सफल रहीं।   लेकिन इस घटना के कारण पुलिस इनके पीछे पड़ गई। जिसके परिणामस्वरूप इन्हें मुंबई के एक फ्लैट से तथा इनके सहयोगी यशपाल को गिरफ्तार कर लिया गया।

2.चन्द्र शेखर आजाद की पिस्तौल

दुर्गावती देवी का क्रांतिकारी संगठन में मुख्य कार्य राजस्थान से पिस्तौल लाना और ले जाना था। चंद्र शेखर आजाद की पिस्तौल भी दुर्गावती देवी जी ने उन्हें उपलब्ध करायी थी तथा इसकी ट्रेनिंग के दौरान भी जब वे लाहौर में व कानपुर में थे तब वे उनके साथ ही थीं।

3.करतार सिंह सरा भा की शहादत

दुर्गावती देवी तब ज्यादा सुर्खियों में आयीं जब उन्होंने 16 नवंबर 1926 को  करतार सिंह सरा भा की शहादत की 11वीं वर्षगांठ मनाने का फैसला लिया। बताते चलें की करतार सिंह सराभा गदर पार्टी के सबसे सक्रिय सदस्य थे। 15 वर्ष की अल्पायु में इन्होंने गदर पार्टी को चुना और 19 वर्ष की उम्र में ही इन्हें नवंबर 1915 में लाहौर की केंद्रीय जेल में फांसी दे दी गयी। बताते चले की गदर पार्टी को कैलिफोर्निया के पंजाबी सरदारों ने भारत को आज़ाद करने के उद्देश्य से 15 जुलाई 1913 में बनाया था।

4.भगत सिंह की मदद

अंग्रेज़ अफसर सांडर्स की हत्या के बाद 19 दिसंबर 1928 को क्रांतिकारी सुख देव जी दुर्गावती  देवी से मिले तथा उनसे भगत सिंह और उन्हें लाहौर से बाहर निकालने के लिए मदद मांगी। उनके कार्यों से प्रभावित होकर दुर्गा देवी उनकी मदद के लिए तैयार हो गयीं। योजना के अनुसार अगली सुबह सुख देव, दुर्गा भाभी तथा उनके बेटे सुचेन्द्र तथा भगत सिंह ने कलकत्ता जाने वाली रेलगाड़ी जो कि लाहौर से बठिंडा होते हुए कलकत्ता जाती थी को पकड़ने का फैसला किया। दुर्गावती देवी ने भगत सिंह की पत्नि का किरदार अपनाया और अपने बेटे को उनकी गोद में बिठा दिया और सुख देव ने उनके नौकर का रुप धारण कर लिया।

रात को  ही योजना के अनुसार सुख देव ने भगत सिंह की दाढ़ी और मुंछे  कटावा दीं और दुर्गावती जी से उनका परिचय एक नए साथी के रुप में करवाया। अतः मुलाकात के दौरान दुर्गावती जी भगत सिंह को पहचानने में असफल रहीं, जिससे सुख देव जी को अन्दाज़ा हो गया कि अगर वे नहीं पहचान पायी तो पुलिस वाले भी नहीं पहचान पायेंगे। अगली सुबह भगत  सिंह ने अपनी पहचान छुपा कर लाहौर स्टेशन से तीन टिकट लिए दो प्रथम श्रेणी और एक तृतीया श्रेणी का टिकट लिया। दोनों साथियों के पास अपनी रिवाल्वर भी था अपातकालीन  स्थिति से निपटने के लिए। 

कानपुर पहुंचकर उन्होंने अपनी ट्रेन बदल दी क्योंकि लाहौर से सीधा कलकत्ता की यात्रा करने वाली ट्रेन की पुलिस जांच करती थी। वे लखनऊ जाने वाली ट्रेन में चढ़ गए और राज गुरु बनारस के लिए चले गए। इस प्रकार वे ट्रेन बदलकर हावड़ा आसानी से पहुंच गए। कुछ दिनों बाद दुर्गावती जी अपने बच्चे के साथ लाहौर वापिस लौट आयीं।

5.हिमालयन टायलेट्स

दुर्गा जी अपने पति तथा HSRA के सदस्य विमल प्रसाद जैन की मदद से दिल्ली के कुतुब रोड स्थित हिमलयन टायलेट्स के अन्दर बम बनाने का कारखाना चलाते थे। इस कारखाने में बम बनाने के लिए पिफ्रिक एसिड़, मरकरी फुलमिनेट नाइट्रोग्लिसरीन का इस्तेमाल किया जाता था।

6.63 दिनों की भूख हडताल

हड़ताल करने का मुख्य कारण कैदियों के गंदे कपड़े, कीड़े मकोड़ो वाला खाना और पढ़ने लिखने की सुविधा का न होना था। इसके साथ युरोपियन कैदियों की तुलना में भारतीय कैदियों के साथ अमानवीय व्यवहार किया जाना था। अतः इन सभी मांगो को लेकर के  जातिन दास ने 63 दिनों की भूख  हड़ताल का संकल्प लिया। परिणामस्वरूप 63 दिन वे शहीद हो गए। 13 सितंबर 1929 को उनकी उम्र मात्र  24 वर्ष की थी। उनकी अंतिम विदाई यात्रा जो कि लाहौर से कलकत्ता तक की थी का नेतृत्व दुर्गावती देवी जी ने किया। ट्रेन जिस स्टेशन पर रुकती हज़ारों की संख्या में लोग उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए उमड़ पड़ते थे।

कलकत्ता पहुंचने पर नेता सुभाष चन्द्र बोस की उपस्थिति में करीब दो मील लंबा जुलूस निकाला गया था। दुर्गावती जी के कुशल प्रबंधन ने देश के युवाओं में देश भक्ति की लहर दौड़ा दी।आज़ादी के बाद दुर्गावती जी ने अपना अंतिम समय गुमनामी में गाजियाबाद में बिताया, बाद में उन्होंने लखनऊ के गरीब बच्चों के लिए एक स्कूल खोला। उनका देहांत 15 अक्तूबर 1999 को गाजियाबाद में  92 वर्ष की आयु में हुआ। 

शनिवार, 25 जुलाई 2026

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प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में बंगाल के प्रसिद्ध मंदिर मां तारा पीठ के बारे में चर्चा करेंगे। यह हिन्दू धर्म के अनुयायियों का एक प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है। इस लेख में हम इस मंदिर के निर्माण के पीछे के मुख्य कारण के बारे में बात करेंगे। इसके साथ ही हम इस मंदिर के हिन्दू धर्म से सम्बन्धित धार्मिक तथ्यों के बारे में चर्चा करेंगे। साथ ही देवघर से तारा पीठ की दूरी तथा कलकत्ता से तारा पीठ की दूरी मंदिर तक पहुंचाने वाले साधनों की सम्पूर्ण चर्चा करेंगे।

तारा पीठ मंदिर पश्चिम बंगाल के बीर भूम जिले में स्थित एक प्रसिद्ध धार्मिक स्थल और सिद्ध पीठ है। यह महानगर कोलकाता से लगभग 222 किलोमीटर की दूरी पर है। बीरभूम जिले को शक्ति पीठ का स्थल का रुप में जाना जाता है। जहाँ 51 शक्ति पीठों में से पांच स्थित हैं। जिनमें बकु रेश्वर नाल हाटी बन्दीकेश्वरी फुलोरा देवी और तारा पीठ शामिल हैं।

 पौराणिक मान्यताओं के अनुसार

माँ तारा देवी के मंदिर की स्थापना वामा खेपा संन्यासी द्वारा की गयी थी। मान्यताओं के अनुसार माँ तारा देवी ने साधु वामा खेपा को साक्षात दर्शन दिये थे। जिसके बाद ही सन्यासी बाबा ने यहां पर मंदिर की नींव रखी। हिन्दू धर्म में इस मंदिर की मान्यता माता सती के 51 शक्ति पीठ में की जाती है। कहा जाता है कि जब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर को छिन्न-भिन्न कर दिया था तो उनके आंखें यहाँ गिरीं थीं। बंगाली में नेत्र गोलक को "तारा" कहते हैं, इसलिए इस जगह का नाम तारा पीठ पड़ा।

यह मंदिर शिव जी के विनाशकारी स्वरूप के रुप में माँ काली के भंयकर रुप को दर्शाता है। हिंदू परंपराओं के अनुसार, माँ तारा को ज्ञान की 10 देवियों में से दूसरे स्थान के रुप में माना जाता है और उन्हें कालिका, भद्र काली और महाकाली के नाम से भी जाना जाता है।

विशेषताएं

यह मंदिर तंत्र साधना के लिए एक विशेष स्थान है और यहाँ पर स्थित श्मशान का भी विशेष महत्व है। यह स्थान अघोरियों के लिए भी बहुत पवित्र माना जाता है। कहा जाता है कि राम कृष्ण परमहंस की तरह सिद्ध संत वामा खेपा को माँ महा काली ने यहीं पर दर्शन और दिव्य ज्ञान दिया था। जब वे केवल 18 वर्ष के थे। तारा पीठ में माँ तारा बाघ की खाल पहने हुए, एक हाथ में तलवार, एक हाथ में कमल का फूल, एक हाथ में कंकाल की खोपड़ी और एक हाथ में अस्त्र लिए हुए प्रकट हुई थीं। मंदिर में प्रसाद के रूप में शराब और मछली भी पेश की जाती है, जिसे तांत्रिक साधु न केवल माता को चढ़ाते हैं बल्कि स्वयं भी पीते हैं।

यहाँ बकरे की बलि भी दी जाती है। मंदिर के निकट स्थित प्रेत-शिला पे लोग अपने पितृों की आत्मा की शांति के लिए पिंड दान करते हैं। मान्यता है कि भगवान राम ने भी अपने पिता का तर्पण और पिंडदान इसी स्थान पर किया था। मंदिर के सामने महा श्मशान घाट है, जहाँ द्वारिका नदी दक्षिण से उत्तर की दिशा में बहती है। जबकि भारत की अन्य नदियाँ उत्तर से दक्षिण की ओर बहती हैं। मंदिर को सड़क, रेल और वायु मार्ग से आसानी से जोड़ा गया है यह पूर्वी रेलवे के रायपुर हाल्ट स्टेशन से चार मील की दूरी पर स्थित है। हर दिन हजारों भक्त माँ तारा के दर्शन के लिए मंदिर में आते हैं।

द्वारिका नदी

इसे बाबला नदी भी कहा जाता है, भारत के पश्चिम बंगाल और झार खंड राज्यों में बहने वाली एक महत्वपूर्ण नदी है। यह हुगली नदी की उपनदी है और इसकी कुल लंबाई लगभग 156.5 किलोमीटर है।

भौगोलिक विवरण उत्पत्ति
द्वारका नदी की उत्पत्ति झार खंड के संथाल परगना क्षेत्र में होती है। प्रमुख क्षेत्र- यह नदी देऊचा, मयूरेश्वर और रामपुर हाट के क्षेत्रों से होकर बहती है और अंत- मुर्शिदा बाद जिले में भागीरथी नदी में मिल जाती है। विशेषताएँ- यह एक मध्यम आकार की नदी है, जिसमें कई छोटी सहायक नदियाँ और जल निकाय शामिल हैं। इसका जल प्रवाह मुख्यत- पहाड़ी क्षेत्रों से होता है। जहाँ इसके तल में कंकड़ और पीले मिट्टी की भरपूर कण होती है।

बांध और जलाशय देऊचा बांध
द्वारका नदी पर देऊचा में एक बांध स्थित है जिसकी क्षमता 1,700,000 घन मीटर लगभग 1,400 एकड़ फुट है। यह बांध राष्ट्रीय राजमार्ग nh60 के पश्चिमी किनारे पर स्थित है।
सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व

द्वारका नदी का उल्लेख स्थानीय संस्कृति और जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह आसपास के क्षेत्रों की कृषि और जल आपूर्ति के लिए आवश्यक है। द्वारका नदी न केवल एक प्राकृतिक संसाधन है, बल्कि यह क्षेत्र की पारिस्थितिक और संस्कृति का भी अभिन्न हिस्सा है।

देवघर से तारा पीठ यात्रा 1. रेल मार्ग सीधी ट्रेन सेवा- हाल ही में देवघर से इस मंदिर के लिए सीधी रेल सेवा शुरू हुई है, जिससे यात्रा आसान हो गई है। ट्रेन के माध्यम से यात्रा- देवघर से मंदिर की दूरी लगभग 150 किलोमीटर है और ट्रेन द्वारा यात्रा करने में लगभग 5 घंटे लगते हैं, खासकर डुम का के रास्ते। 

2.सड़क मार्ग बस सेवा- देवघर से तारा पीठ मंदिर के लिए बसें भी उपलब्ध हैं। जो यात्रियों को किफायती दरों पर यात्रा करने की सुविधा प्रदान करती हैं। बस यात्रा की लागत लगभग ₹200 होती है। कैब या आटो- स्थानीय स्तर पर कैब या आटो रिक्शा भी किराए पर लेकर यात्रा की जा सकती है। विशेषकर जब आप रायपुर हाट या तारा पीठ रोड स्टेशन से आगे बढ़ते हैं।

3.यात्रा का समय ट्रेन या बस द्वारा यात्रा करते समय, यात्रा का समय सामान्यत- 5 से 6 घंटे के बीच होता है जो मार्ग और ट्रैफिक पर निर्भर करता है। इन साधनों का उपयोग करके श्रद्धालु आसानी से देवघर से तारा पीठ पहुँच सकते हैं और माता तारा के दर्शन कर सकते हैं। कलकत्ता से तारा पीठ यात्रा कोलकाता से इस मंदिर की यात्रा के लिए कई साधन उपलब्ध हैं, जो यात्रियों को सुविधाजनक तरीके से इस प्रसिद्ध धार्मिक स्थल तक पहुँचाते हैं- 1. बस यात्रा बस टिकट की कीमत- कोलकाता से इस मंदिर के लिए बस टिकट की न्यूनतम कीमत ₹190 है,
जबकि अधिकतम किराया ₹230 तक हो सकता है। 

यात्रा का समय- बस द्वारा यात्रा करने में लगभग 6 घंटे 30 मिनट का समय लगता है, हालाँकि यह मार्ग और ट्रैफिक की स्थिति पर निर्भर करता है। बोर्डिंग पॉइंट- कोलकाता में प्रमुख बोर्डिंग पॉइंट Esplanade है, जहाँ से बसें संचालित होती हैं। 2. रेल यात्रा ट्रेन सेवाएँ- कोलकाता से मंदिर के लिए लगभग 2 ट्रेनें दैनिक चलती हैं, जैसे SDAH RPH EXPRESS और विश्व भारती पैसें जर। इसके अलावा भी कई अन्य ट्रेन भी चलती है। निकट तम रेलवे स्टेशन: तारापीठ रोड रेलवे स्टेशन और रामपुर हाट रेलवे स्टेशन निकटतम हैं। जहाँ से आप टैक्सी या ऑटो लेकर मंदिर तक पहुँच सकते हैं।

4.कार यात्रा स्वयं की कार या टैक्सी- अगर आप अपनी कार से यात्रा कर रहे हैं, तो यह एक सुविधाजनक विकल्प हो सकता है। कोलकाता से तारा पीठ की दूरी लगभग 222 किलोमीटर है, और यात्रा का समय लगभग 5 से 6 घंटे हो सकता है।

5.वायु यात्रा निकट तम हवाई अड्डे- दुर्गापुर में काजी नजरुल इस्लाम एयरपोर्ट सबसे नजदीकी हवाई अड्डा है, जो तारा पीठ से लगभग 105 किलोमीटर दूर है. यहाँ से आप टैक्सी लेकर सीधे तारा पीठ पहुँच सकते हैं। इन विकल्पों के माध्यम से आप आसानी से कोलकाता से तारा पीठ की यात्रा कर सकते हैं और माँ तारा के दर्शन का लाभ उठा सकते हैं। तारा पीठ के समीप पाये जाने वाले धार्मिक स्थल तारा पीठ के समीप कई प्रमुख धार्मिक स्थल हैं, जो श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र हैं।

महत्वपूर्ण स्थलों की जानकारी 

1.बकुरेश्वर स्थान- बीरभूम जिले में स्थित विशेषता- यह भी एक शक्ति पीठ है, जहाँ देवी सती के शरीर का एक अंग गिरा था। यह स्थान तंत्र साधना के लिए प्रसिद्ध है।

2.नालहाटी स्थान- तारा पीठ से लगभग 30 किलोमीटर दूर। विशेषता- यह भी एक शक्ति पीठ है और यहाँ देवी सती की पूजा की जाती है। नालहाटी में भी भक्तों की बड़ी संख्या आती है।
 
3.बंदीकेश्वरी स्थान- बर्दवान जिले में स्थित।विशेषता- यह मंदिर देवी दुर्गा का एक रूप है और यहाँ भी भक्तों की भीड़ रहती है। इस स्थान को शक्ति के रूप में पूजा जाता है।

4.फुलोरा देवी स्थान- तारा पीठ के निकट विशेषता- यह मंदिर देवी फुलोरा को समर्पित है और यहाँ विशेष पूजा अर्चना होती है।

5.एक चक्र धाम स्थान- तारा पीठ से लगभग 20 किलोमीटर दूर। विशेषता- यह स्थान भगवान नित्य नंद का जन्मस्थान माना जाता है और यहाँ भक्तों की संख्या अधिक होती है। 
6.मुण्डा मालिन माँ  तारा देवी के मंदिर से विपरीत दिशा में यह पवित्र स्थान स्थित है जो अपने-आप में एक विशेष महत्व रखता है। इन धार्मिक स्थलों के अलावा, तारा पीठ क्षेत्र में कई अन्य मंदिर और तीर्थ स्थल भी हैं, जो श्रद्धालुओं के लिए आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करते हैं। तारा पीठ का क्षेत्र अपनी तंत्र साधना और देवी पूजा के लिए प्रसिद्ध है, जिससे यह स्थान विशेष महत्व रखता है।

मंगलवार, 7 जुलाई 2026

मनुस्मृति

मनुस्मृति क्या है

प्रस्तावना 

प्रस्तुत लेख में हम भारतीय इतिहास के विवादित ग्रंथ मनुस्मृती के इतिहास के बारे में चर्चा करेंगे इसके साथ ही हम देखेंगे की इस ग्रंथ के कौन कौन से वो श्लोक है जो विवाद का मुख्य कारण है। इस ग्रंथ पर यह आरोप भी लगता रहा है कि यह किताब कालसुत्रों के आधार पर उनके श्लोकों को निकाल कर बनाई गई है। कुछ लोगों का तो मानना यह भी है कि यह किताब मानवों के अधिकारों का दमन करती है।

इतिहास

भारुचि
मनुस्मृती के सबसे प्राचीन लेखक का खिताब इन्ही को दिया जाता है इतिहासकारों के अनुसार इन्होंने इस ग्रंथ की रचना 10शताब्दी से उत्तरार्ध  तथा 11वीं शताब्दी के आरम्भिक काल में की थी। मगर विदेशी लेखक अलिवेल इस ग्रंथ की रचना का समय काल 600 से 800 शताब्दी के बीच का मानते है।

इसके आलावा मनुस्मृती के कयी संस्करण भी प्रकाशित भी किए गये है जैसे मनुटिका जिसकी रचना 11वी. शताब्दी में की गयी थी इसके अलावा मानवर्थ मुक्तावली जैसे नाम भी आते है। अब तक मनुस्मृती सम्बन्धित पचास से भी ज्यादा पांडुलिपियां मिल चुकी है जो की 18वी. शताब्दी से अब तक खोजी गईं हैं। 

खास बात यह है कि इन सभी पांडुलिपियों का सिधा सम्बन्ध सीधे तौर पर मनुस्मृती से नहीं है । बस इतना पता चलता है कि इन सभी पांडुलिपियों के श्लोकों का प्रयोग  मनुस्मृती में किया गया है।

नामकरण

मनुस्मृती शीर्षक एक आधुनिक शब्द है जो संस्कृत से लिया गया है। लेकिन इसके वर्तमान मूल में ऐसा कोई विभाजन नहीं था। किताब के मुख्य रुप को चार भागों में विभाजित किया गया है। 1 इसमें दुनिया की रचना 2 धर्म का स्रोत 3 चारो सामाजिक वर्गों का धर्म 4 कर्म का नियम पुनर्जन्म और अंतिम मुक्ति के बारे में चर्चा कि गई है।

खास बात यह कि इन प्राप्त पांडुलिपि में इसे ही लिए श्लोको के प्रयोग से ही आचार संहिता के रुप में परिभाषित किया गया है। इसके अलावा हम मनुस्मृती को मानव धर्म शास्त्र के रुप में भी जानते है। वेदों के बाद यह हिन्दू धर्म का महत्वपूर्ण ग्रंथ है।

मुख्य ग्रंथ को श्लोकों में परिभाषित किया गया है। यह ग्रंथ एक संवाद को प्रदर्शित करता है जिसमें एक शिष्य अपने गुरु से सवाल करता है यहां गुरु स्वयं मनु है । शुरुआत के 58 श्लोक मनु को समर्पित किए गये हैं। एवं बाकी के श्लोक उनके शिष्य भृगु को समर्पित किए गये हैं।

खास रचनात्मक श्लोक

यहां हम श्लोक न लिखकर उनका अर्थ लिख रहे है। जैसे 1. धर्म से सभी शूद्र होते है, कर्मों के आधार पर उनका नया वर्ण बनता है। अतः सभी द्विज कहलाते है।

2.धर्म के 10 लक्षण है जैसे धैर्य क्षमा संयम चोरी न करना स्वच्छता इन्द्रियों को वश में रखना बुद्धि विद्या सत्य और क्रोध न करना आदि।
3.किसी को अपना जूठा न खिलाना और न ही किसी का जूठा न खाना, न अधिक भोजन करना और न ही भोजन करने के बाद हाथ मुंह धोये बिना इधर उधर जाना।
4.जो मनुष्य धर्म शास्त्र एवं वेद शास्त्र के अनुकूल तर्क द्वारा अनुसंधान और चिन्तन करता है वही धर्म के वास्तविक स्वरुप को समझ पाता है।

मनुस्मृती के विवादित श्लोक 

1.अध्याय 9 श्लोक 3
महिला को कभी स्वतंत्रता नहीं मिलनी चाहिए, बचपन में पिता , युवावस्था में पति और बुढ़ापे में पुत्रों को उसे नियंत्रण में रखना चाहिए।

2. अध्याय 10 श्लोक 122
शूद्रों को भोजन के लिए दूसरों का जूठा अन्न, पहनने के लिए फटो पुराने कपड़े और बिछाने के लिए टूटी-फूटी चटाई य धान के पौधे या पुआल दिया जाना चाहिए।

3. अध्याय 8 श्लोक 270
यदि कोई नीची जाति का व्यक्ति ऊंची जाति के व्यक्ति को जानबूझकर नुकसान पहुंचाता है य कटु शब्द कहता है तो उसे अत्यंत कठोर शारीरिक दंड देना चाहिए य जीभ काट देनी चाहिए जबकि उच्च वर्ग के लोगों के लिए सज़ा का अनुपात काफी कम है।

4. अध्याय 8 श्लोक 271
यदि कोई शूद्र उच्च वर्ग के व्यक्ति का नाम और जाति लेकर अहंकार से अपमान करता है तो उसके मुंह में 10 अंगुलि के बराबर लोहे की जलती कील डाल देनी चाहिए।

5.अध्याय 8 श्लोक 272
यदि कोई शूद्र गर्व से उन्हें धर्म उपदेश देता है तो राजा को उसके कान और मुंह में खौलता हुआ तेल डलवा देना चाहिए।

6.अध्याय 8 श्लोक 279
यदि कोई निम्न वर्ग का व्यक्ति श्रेष्ठ वर्ण के व्यक्ति को अपने जिस अंग से नुकसान पहुंचाता है तो राजा को उसका वही अंग काट देना चाहिए।

7.अध्याय 8 श्लोक 268
अगर कोई उच्च वर्ग का व्यक्ति अपने से निम्न वर्ग के व्यक्ति का अपमान करता है य उपरोक्त सभी दण्ड निम्न वर्ग के व्यक्ति को देता है तो राजा को उसे सिर्फ मामूली आर्थिक दण्ड देना चाहिए य सर मुण्डवा कर देश से निकाल देना चाहिए।

8. अध्याय 8 श्लोक 379/380
ब्राह्मण चाहे कितना भी बड़ा अपराध क्यों न करें उसे कभी भी मृत्यु दंड नहीं देना चाहिए य अंग भंग जैसी शारीरिक सजा नहीं दी जा सकती है, उसे केवल देश निकाला य मुंडन की सजा दी जा सकती है।

दोस्तों शायद उपरोक्त कारणों एवं भेदभाव के  चलते ही बी आर अम्बेडकर ने मनुस्मृती को जलाया था और संविधान को सर्वोपरि पुस्तक का दर्जा दिया था। इतिहास में बहुत सी ऐसी चीज़े और किताबें मिलती है जो की भेदभाव के बढ़ावा देतीं है। जिनमें बदलते वक्त के साथ परिवर्तन की जरूरत है।

क्योंकि हमारा मानना है कि प्राकृत ने हम सभी को बनाया है और समय के साथ यह हमें मिटायेगी भी। प्राकृति हमारे साथ-साथ सभी जीव- जन्तुओं  का संरक्षण भी करती है। ऐसे में न तो कोई मनुष्य बहुत बड़ा हो सकता है और न ही बहुत छोटा।

तो इस प्रकार इस ग्रंथ की ज्यादातर मान्यताऐं गलत है। क्योंकि धर्म को मानने के लिए मनुष्य का होना आवश्यक है, कुछ चुनिंदा लोग मात्र कुछ भी नियम बनाकर किसी धर्म को नहीं चला सकते यह हम समझते हैं। खास बात यह है कि इस प्रकार के ग्रंथों को मनुष्यों द्वार ही लिखा गया है तो जाहिर सी बात है वे अपने भी विचार इन ग्रंथों में पिरोते होंगे।