9b45ec62875741f6af1713a0dcce3009 Indian History: reveal the Past: History

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मंगलवार, 7 जुलाई 2026

मनुस्मृति

मनुस्मृति क्या है

प्रस्तावना 

प्रस्तुत लेख में हम भारतीय इतिहास के विवादित ग्रंथ मनुस्मृती के इतिहास के बारे में चर्चा करेंगे इसके साथ ही हम देखेंगे की इस ग्रंथ के कौन कौन से वो श्लोक है जो विवाद का मुख्य कारण है। इस ग्रंथ पर यह आरोप भी लगता रहा है कि यह किताब कालसुत्रों के आधार पर उनके श्लोकों को निकाल कर बनाई गई है। कुछ लोगों का तो मानना यह भी है कि यह किताब मानवों के अधिकारों का दमन करती है।

इतिहास

भारुचि
मनुस्मृती के सबसे प्राचीन लेखक का खिताब इन्ही को दिया जाता है इतिहासकारों के अनुसार इन्होंने इस ग्रंथ की रचना 10शताब्दी से उत्तरार्ध  तथा 11वीं शताब्दी के आरम्भिक काल में की थी। मगर विदेशी लेखक अलिवेल इस ग्रंथ की रचना का समय काल 600 से 800 शताब्दी के बीच का मानते है।

इसके आलावा मनुस्मृती के कयी संस्करण भी प्रकाशित भी किए गये है जैसे मनुटिका जिसकी रचना 11वी. शताब्दी में की गयी थी इसके अलावा मानवर्थ मुक्तावली जैसे नाम भी आते है। अब तक मनुस्मृती सम्बन्धित पचास से भी ज्यादा पांडुलिपियां मिल चुकी है जो की 18वी. शताब्दी से अब तक खोजी गईं हैं। 

खास बात यह है कि इन सभी पांडुलिपियों का सिधा सम्बन्ध सीधे तौर पर मनुस्मृती से नहीं है । बस इतना पता चलता है कि इन सभी पांडुलिपियों के श्लोकों का प्रयोग  मनुस्मृती में किया गया है।

नामकरण

मनुस्मृती शीर्षक एक आधुनिक शब्द है जो संस्कृत से लिया गया है। लेकिन इसके वर्तमान मूल में ऐसा कोई विभाजन नहीं था। किताब के मुख्य रुप को चार भागों में विभाजित किया गया है। 1 इसमें दुनिया की रचना 2 धर्म का स्रोत 3 चारो सामाजिक वर्गों का धर्म 4 कर्म का नियम पुनर्जन्म और अंतिम मुक्ति के बारे में चर्चा कि गई है।

खास बात यह कि इन प्राप्त पांडुलिपि में इसे ही लिए श्लोको के प्रयोग से ही आचार संहिता के रुप में परिभाषित किया गया है। इसके अलावा हम मनुस्मृती को मानव धर्म शास्त्र के रुप में भी जानते है। वेदों के बाद यह हिन्दू धर्म का महत्वपूर्ण ग्रंथ है।

मुख्य ग्रंथ को श्लोकों में परिभाषित किया गया है। यह ग्रंथ एक संवाद को प्रदर्शित करता है जिसमें एक शिष्य अपने गुरु से सवाल करता है यहां गुरु स्वयं मनु है । शुरुआत के 58 श्लोक मनु को समर्पित किए गये हैं। एवं बाकी के श्लोक उनके शिष्य भृगु को समर्पित किए गये हैं।

खास रचनात्मक श्लोक

यहां हम श्लोक न लिखकर उनका अर्थ लिख रहे है। जैसे 1. धर्म से सभी शूद्र होते है, कर्मों के आधार पर उनका नया वर्ण बनता है। अतः सभी द्विज कहलाते है।

2.धर्म के 10 लक्षण है जैसे धैर्य क्षमा संयम चोरी न करना स्वच्छता इन्द्रियों को वश में रखना बुद्धि विद्या सत्य और क्रोध न करना आदि।
3.किसी को अपना जूठा न खिलाना और न ही किसी का जूठा न खाना, न अधिक भोजन करना और न ही भोजन करने के बाद हाथ मुंह धोये बिना इधर उधर जाना।
4.जो मनुष्य धर्म शास्त्र एवं वेद शास्त्र के अनुकूल तर्क द्वारा अनुसंधान और चिन्तन करता है वही धर्म के वास्तविक स्वरुप को समझ पाता है।

मनुस्मृती के विवादित श्लोक 

1.अध्याय 9 श्लोक 3
महिला को कभी स्वतंत्रता नहीं मिलनी चाहिए, बचपन में पिता , युवावस्था में पति और बुढ़ापे में पुत्रों को उसे नियंत्रण में रखना चाहिए।

2. अध्याय 10 श्लोक 122
शूद्रों को भोजन के लिए दूसरों का जूठा अन्न, पहनने के लिए फटो पुराने कपड़े और बिछाने के लिए टूटी-फूटी चटाई य धान के पौधे या पुआल दिया जाना चाहिए।

3. अध्याय 8 श्लोक 270
यदि कोई नीची जाति का व्यक्ति ऊंची जाति के व्यक्ति को जानबूझकर नुकसान पहुंचाता है य कटु शब्द कहता है तो उसे अत्यंत कठोर शारीरिक दंड देना चाहिए य जीभ काट देनी चाहिए जबकि उच्च वर्ग के लोगों के लिए सज़ा का अनुपात काफी कम है।

4. अध्याय 8 श्लोक 271
यदि कोई शूद्र उच्च वर्ग के व्यक्ति का नाम और जाति लेकर अहंकार से अपमान करता है तो उसके मुंह में 10 अंगुलि के बराबर लोहे की जलती कील डाल देनी चाहिए।

5.अध्याय 8 श्लोक 272
यदि कोई शूद्र गर्व से उन्हें धर्म उपदेश देता है तो राजा को उसके कान और मुंह में खौलता हुआ तेल डलवा देना चाहिए।

6.अध्याय 8 श्लोक 279
यदि कोई निम्न वर्ग का व्यक्ति श्रेष्ठ वर्ण के व्यक्ति को अपने जिस अंग से नुकसान पहुंचाता है तो राजा को उसका वही अंग काट देना चाहिए।

7.अध्याय 8 श्लोक 268
अगर कोई उच्च वर्ग का व्यक्ति अपने से निम्न वर्ग के व्यक्ति का अपमान करता है य उपरोक्त सभी दण्ड निम्न वर्ग के व्यक्ति को देता है तो राजा को उसे सिर्फ मामूली आर्थिक दण्ड देना चाहिए य सर मुण्डवा कर देश से निकाल देना चाहिए।

8. अध्याय 8 श्लोक 379/380
ब्राह्मण चाहे कितना भी बड़ा अपराध क्यों न करें उसे कभी भी मृत्यु दंड नहीं देना चाहिए य अंग भंग जैसी शारीरिक सजा नहीं दी जा सकती है, उसे केवल देश निकाला य मुंडन की सजा दी जा सकती है।

दोस्तों शायद उपरोक्त कारणों एवं भेदभाव के  चलते ही बी आर अम्बेडकर ने मनुस्मृती को जलाया था और संविधान को सर्वोपरि पुस्तक का दर्जा दिया था। इतिहास में बहुत सी ऐसी चीज़े और किताबें मिलती है जो की भेदभाव के बढ़ावा देतीं है। जिनमें बदलते वक्त के साथ परिवर्तन की जरूरत है।

क्योंकि हमारा मानना है कि प्राकृत ने हम सभी को बनाया है और समय के साथ यह हमें मिटायेगी भी। प्राकृति हमारे साथ-साथ सभी जीव- जन्तुओं  का संरक्षण भी करती है। ऐसे में न तो कोई मनुष्य बहुत बड़ा हो सकता है और न ही बहुत छोटा।

तो इस प्रकार इस ग्रंथ की ज्यादातर मान्यताऐं गलत है। क्योंकि धर्म को मानने के लिए मनुष्य का होना आवश्यक है, कुछ चुनिंदा लोग मात्र कुछ भी नियम बनाकर किसी धर्म को नहीं चला सकते यह हम समझते हैं। खास बात यह है कि इस प्रकार के ग्रंथों को मनुष्यों द्वार ही लिखा गया है तो जाहिर सी बात है वे अपने भी विचार इन ग्रंथों में पिरोते होंगे।

शुक्रवार, 19 जून 2026

indo-greek kingdom इंडो-ग्रीक आक्रमण

indo-greek kingdom
प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम भारत पर हुए तीसरे विदेशी आक्रमण के बारे में चर्चा करने जा रहे हैं जिसे हम इंडों-ग्रिक आक्रमण के नाम से भी जानते है। इसके साथ ही हम देखेंगे की इनके द्वारा कौन कौन से परिवर्तन भारत में किये गए।

मूल निवास

यह मूल रुप से बैक्टीरिया प्रांत के रहने वाले थे। इन का प्रमुख शासक डेमोट्रियस था जिसकी मदद से इन्होंने उत्तर पश्चिम यानी पंजाब हरियाणा मथुरा तथा पाकिस्तान अफगानिस्तान के क्षेत्रों पर अपना शासन स्थापित किया। यह आक्रमण भारत पर 180 ईसा पूर्व में हुआ था।

प्रमुख शासक

डेमोट्रियस के आलवा इनके प्रमुख शासकों की सूची में मिनांडर menandar का नाम आता है। इसने साकल sakal को अपनी राजधानी बनाकर साकेत यानी अयोध्या और पाटिलपुत्र यानी मगध के क्षेत्रों तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया।

बौद्ध धर्म से प्रभावित 

मिनांडर बौद्ध धर्म से अत्यधिक आकर्षित हुआ इसका साक्ष्य हमें बौद्ध भिक्षु नागसेन और मिनांडर के दार्शनिक संवाद से मिलता है जो कि प्रसिद्ध बौद्ध ग्रंथ मिलिदंपन्ह वर्णित है।

भारतीय संस्कृति पर प्रभाव

1.सिक्के
भारत में सर्वप्रथम सोने के सिक्कों का चलन यवन शासकों द्वारा ही चलाया गया। जिस पर उस समय काल के राजा की तस्वीर एवं नाम अंकित रहता था और दूसरी तरफ बौद्ध की आकृति य उनका उपदेश कुरेदा जाता था। डाई से सिक्के बनाने का चलन यवन शासकों द्वारा ही चलाया गया था। इंडो-ग्रीक से पहले भारत में बने सिक्कों का कोई निश्चित आकार य राजा की पहचान नहीं होती थी। डाई द्वारा सिक्के बनाने के कारण सिक्कों का वजन आकार और शुद्धता निश्चित की गई जिससे व्यापार करना बेहद आसान हो गया। उपरोक्त कारणों के चलते भारत की आर्थिक समृद्धि का विकास हुआ। 

2.गांधार कला Gandhara Art
यूनानी मूर्ति कला और भारतीय मूर्ति कला के संगम से गांधार मूर्ति कला का विकास हुआ। इसी कला के माध्यम से भारत में पहली बार महात्मा बुद्ध क मूर्ति यूनानी देवता अपोलो की तरह बनाई गयी थी। इनके युद्ध से पहले भारत में बौद्ध को प्रतीकों चरण और स्तूपों द्वारा दर्शाया जाता था। उनकी मानव रुप में मूर्ति नहीं बनती थी।इनके द्वारा निर्मित गांधार कला शैली के चलते ही बुद्ध के घुंघराले बाल मूंछे और शारीरिक गठन जैसी मूर्तियां बनाई जाने लगीं।

3.खगोल विज्ञान और ज्योतिष कला
सप्ताह के सात दिनों का नामकरण तथा 12 राशियों की खोज यूनानी प्रभाव से ही विकसित हुई। जिसका प्रमाण भारतीय ग्रंथ गार्गी संहिता से मिलता है। जिसमें लिखा है कि यद्यपि यवन एक बर्बर देश है  फिर भी वे ज्योतिष के विद्वान है इसलिए वे पूजनीय है। इनकी ही वैज्ञानिक कला शैली से ग्रहों की गति ग्रहण की भविष्यवाणी और वर्ष की सटीक गणना करने की यूनानी तकनीकों को भारतीय विद्वानों ने अपनाया और अपने ग्रंथों में शामिल किया।

4.रंगमंच और पर्दा
भारतीय नाटक और रंगमंच में परदे का उपयोग शुरु हुआ जिसे आज भी यवनिका कहा जाता है  जो कि यवन शब्द से बना है।

सांस्कृतिक समन्वय

कई यूनानी शासकों और राजदूतों ने भारतीय धर्म को अपनाया ये ही नहीं तक्षशिला के यवन राजदूत हेलियोडोरस ने मध्य प्रदेश के विदिशा में भगवान विष्णु को समर्पित गरुड़ ध्वज स्तंभ की  स्थापना करवाई।इस प्रकार से देखा जाये तो यवन आक्रमण और उनके शासन का भारतीय संस्कृति शासन और व्यापार पर गहरा और दीर्घकालिक प्रभाव पड़ा।

वैश्विक व्यापार

उत्तर-पश्चिम सीमा सुरक्षित होने और ग्रीक संपर्क से भारत का व्यापार मध्य एशिया भू मध्य सागर और रोमन साम्राज्य तक तेजी से फैला।

गुरुवार, 18 जून 2026

शकों का आक्रमण

shak or shaka dynasty

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम भारत पर हुए चौथा विदेशी आक्रमण तथा इसके प्रभाव के साथ भारत में शकों को किन राजाओं ने कड़ी टक्कर दी इसके बारे में चर्चा करेंगे।

मूल निवास

शकों का मूल निवास स्थान सिर दरिया घाटी और चीनी के तुर्किस्तान में था। हूणों और यूचू कबीले के दबाव के कारण उन्हें अपना स्थान छोड़कर भारत की ओर आना पड़ा था।खास बात यह है कि भारत आने के बाद शक साम्राज्य मु्ख्य रुप से 5 भागों में विभाजीत हो गया। मुख्य रुप से इनकी राजधानी अफगानिस्तान पंजाब मथुरा गुजरात मालवा और दक्कन में थी।

शकों का प्रथम आक्रमण 2वीं सदी ईसा पूर्व में माउज़ के सहयोग से उत्तर-पश्चिम के हिस्से यानि गांधार और तक्षशिला के क्षेत्र को इंडे-ग्रिक शासकों के साथ किया था। इनका सबसे प्रतापी राजा रुद्रदामन था।

प्रमुख शासक
मोगा moues
यह भारत का पहला शक राजा माना जाता है इसने गंधार और पंजाब में अपना शासन स्थापित किया था।

रुद्रदामन प्रथम
यह पश्चिमी भारत की शाखा का सबसे प्रसिद्ध शक राजा था जिसने काठियावाड़ की सुदर्शन झील की मरम्मत करवाई थी।

भारत के राजाओं से सामना

इतिहास को कुरदने पर हमें यह पता चलता है कि इनका सामना किसी एक भारतीय राजा से नही बल्कि अलग- अलग कालखंड़ों के तीन महान भारतीय राजवंशों और उनके प्रतापी राजाओं से हुआ था। इन राजाओं ने शकों के केवस कड़ी टक्कर ही नही दी बल्कि उन्हें कई बार बुरी तरह पराजित भी किया।

राजा विक्रमादित्य
57 ईसा पूर्व में जब शकों ने पश्चिमोत्तर से आगे बढ़कर मालवा और उज्जैन पर कब्जा कर लिया, तब उज्जैन के एक स्थानीय हिंदू राजा जिन्हें इतिहास में विक्रमादित्य के नाम से जाना जाता है ने शकों के खिलाफ मोर्चा खोला। यु्द्ध में राजा विक्रमादित्य की जीत हुई। इस समय काल के दौरान भारत में शक सवंत का चलन हो गया था। मगर राजा विक्रमादित्य ने इस विजय के उपरान्त शक सवंत कैलेंडर की जगह विक्रम सवंत का निर्माण करवाया जो कि आज भी चलन में है।

इस विजय के बाद राजा विक्रमादित्य ने शकाारि की उपाधि धारण की थी जिसका अर्थ है शकों का नाश करने वाला।

2.सातवाहन वंश दक्कन 

शकों की क्षहरात शाखा का सबसे शक्तिशाली राजा नहपान था जिसने गुजरात मालवा और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों पर कब्जा कर लिया था। उनका मुकाबला दक्षिण के शक्तिशाली सातवाहन राजाओं से हुआ।
1.गोतमीपुत्र शातकर्णाी 
यह सातवाहन वंश के सबसे महान राजा थे जिन्होंने 106 से 130 ईस्वी तक शासन किया था। इन्होंने शक राजा नहपान पर हमला किया और उसे युद्ध में हराकर मार डाला। इस जीत का प्रमाण नासिक के गुफा अभिलेखों और जोगलम्बी से मिले सिक्कों से मिलता है, जिन पर शातकर्णी ने नहपान के सिक्कों को दोबारा अपने नाम से ढलवाया था।

2.वशिष्ठीपुत्र पुलुमावी 
नहपान की हार के बाद शकों की दूसरी शाखा कार्दमक वंश के राजा रुद्रदामन प्रथम ने खोए हुए क्षेत्रों को वापस पाने के लिए सातबाहनों पर हमला किया। रुद्रदामन ने गौतमीपुत्र के पुत्र वशिष्ठी पुलुमावी के युद्ध में दो बार पराजित किया। हलांकि वैवाहिक संबंधों को कारण सातवाहन वंश के शासकों के नष्ट नही किया दरअसल रुद्रदामन ने अपनी बेटी का विवाह सातवाहन के राजा से किया था जिसके कारण यह युद्ध रिश्तेदारी में बदल गया।

4.गुप्त राजवंश 
इनका शासन काल 4वां शताब्दी से 5वीं शताब्दी तक का था। इधर शकों का शासन काल भारत में लगभग 400 वर्षों तक खिचता रहा। इनका अंत गुप्त साम्राज्य के राजाओं द्वारा किया गया।
1.समुद्र गुप्त 
इनका शासन काल 335 से 375 ईस्वी. तक का था गुप्त वंश के इस महान विजेता ने अपनी दिग्विजय नीति के तहत पश्चिमी भारत के शक शासकों को अपनी अधीनता स्वीकार करने और टैक्स देने प मजबूर कर दिया।

5.चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य

इनाक शासम काल 375 से 415 ईस्वी तक का था। चंद्रगुप्त द्वितीय का तथा शकों का यह युद्ध इतिहास का सबसो निर्णाय युद्ध था। पश्चिमी भारत यानि गुजरात तथा काठियावाड़ में अभी भी शकों के शासन बचा हुआ था जहां का अंतिम राजा रुद्रसिंह तृतीय था। चंद्रगुप्त द्वितीय ने एक विशाल सैन्य अभियान चलाकर रुद्रसिंह तृतीय को जुद्ध में मार गिराया और शकों के अंतिम साम्राज्य को हमेशा के लिए गुप्त साम्राज्य में मिला लिया। इस महाविजय के बाद ही चंद्रगुप्त द्वितीय ने भी विक्रमादित्य और शकारि की उपाधि धारण की।

इस प्राकर मालवा के स्थानीय राजाओं से शुरु हुआ यह संघर्ष सातवाहनों के शौर्य से गुजरते हुए अंततः गुप्त राजवंश के हाथों शकों के पूर्ण विनाश के साथ समाप्त हुआ।

बुधवार, 17 जून 2026

यूनान का आक्रमण

bharat par unani aakraman

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम Battle of hydespes के बारे में चर्चा करेंगे। यह यूनान का पहला तथा भारत पर हुआ दूसरा विदेशी आक्रमण था। इसके साथ ही हम युद्ध के परिणाम और कारणों पर विस्तार से चर्चा करेंगे। इसके साथ ही हम युद्ध के मुख्य कारक यानी के सिकंदर के जीवन पर भी प्रकाश डालेंगे। जो कि भारत को हराने के बाद पुरी दुनिया पर अपना परचम लहराना चाहता था। लेकिन ऐसा क्या हुआ कि भारत के जीतने का बाद भी वे अपने देश वापिस लौट गया। सभी कारणों को समझेंगे विस्तार से।

Battle of Hydespes

भारत पर यूनानी आक्रमण मकदूनिया के राजा सिकंदर महान द्वारा जिसे हम अलेग्जेंडर द ग्रेट के नाम से भी जानते है के द्वारा 326 ईसा पूर्व में किया गया। भारत से पहले सिकंदर ने ईरान के हखनमी वंश का अंत किया था। इसके बाद उसने भारत के उत्तर पश्चिम हिस्से की ओर अपने विजय संकल्प का प्रारम्भ किया।

Hydespes
यह भारत की प्राचीन एवं प्रसिद्ध झेलम नदी का ईरानी नाम है। दरअसल यह युद्ध इसी नदी के किनारे हुआ था जिसके कारण इस युद्ध को Hydespes का युद्ध य Battle of Hydespes भी कहा जाता है।

प्रारम्भ में भारत में सिकंदर का पहले सामना पंजाब के राजा पुरु जिन्हें हम पोरस के नाम से भी जानते है उससे हुआ। राजा पोरस इस युद्ध में बड़ी बहादुरी से लडे़ लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा। सिकंदर पोरस की वीरता से बहुत प्रभावित हुआ जिसके परिणामस्वरूप सिकंदर ने पोरस को उसका राज्य लौटा दिया और उसे अपना सहयोगी बना लिया।

सिकंदर की वापसी का कारण

पोरस से युद्ध के बाद सिकंदर का सामना मगध के शक्तिशाली राजा घनानंद से हुआ। घनानंद नंद राजवंश का एक प्रतापी राजा था। घनानंद की विशाल सेना और हाथियों के डर से सिकंदर के सैनिकों ने व्यास नदी को पार करने से इनकार कर दिया। जिस कारण को सिकंदर को वापिस लौटना पड़ा।

आक्रमण का प्रभाव

1.इस आक्रमण के चलते भारत में गंधार कला शैली का निर्माण हुआ और भारत तथा यूनान के बीच सिधा संपर्क स्थापित हुआ। गंधार कला भारतीय और यूनान की मूर्ति कला का अनूठा मिश्रण है।

2.भारत में पहली बार सूडौल सांचे से ढले सिक्कों का निर्माण हुआ। राजाओं के चित्र वाले सिक्के बनाने की तकनीक यूनानियों द्वार ही भारत लायी गयी।

3.सिकंदर के आक्रमण ने छोटे राज्यों की शक्ति को कुचल दिया। इससे मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चंद्र गुप्त मौर्य और उनके गुरु चाणाक्य को विशाल और एकीकृत भारतीय साम्राज्य स्थापित करने में मदद मिली।

4.सिकंदर के भारत आने तथा हमलों के चलते सिकंदर के सिपाहियों पश्चिम की और जाने वाले चार नए थल और जल मार्गों की खोज की। इससे भारत का व्यापार और पश्चिम एशिया के देशों के साथ सीधे तौर पर बहुत बढ़ गया।

5.भारतीय राजाओं के समझ में आयी कि युद्ध में भारी भरकम हाथियों पर पूरी तरह से निर्भर रहना नुकसान देह हो सकता है। क्योंकि यूनानी सेना के तेज़ रफ्तार घूड़सवार सेना एवं तीरंदाजों ने हाथियों को अपनी ही सेना में लौटने के लिए मजबूर कर दिया। अतः सिकंदर के युद्ध के बाद भारतीय राजाओं अपनी युद्ध कला में परिवर्तन किया।

शुक्रवार, 29 मई 2026

कुल धारा

kuldhara village

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम कुल धारा जिसे एक शापित गांव भी कहते है इसके पीछे की कहानी को जानेंगे इसके साथ ही इतिहास में इस स्थान पर घटी उस घटना पर प्रकाश डालेंगे जिसके कारण 84 हजार ग्राम वासियों को इस गांव को छोड़ना पड़ा। तथा इस राज़ से भी पर्दा उठायेंगे की यह कोई शापित गांव नहीं था। लेकिन लोगों का रहस्यमय तरीके से गायब होना वर्तमान समय में लोगों को जरूर सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर उस गांव में क्या हुआ था। वर्तमान समय में यह गांव पुरातत्व विभाग के अधीन है जहां सूरज ढलने के बाद रुकने पर सख्त मनाही है। तो आइये तथ्यों के आधार पर इस गांव के उत्थान विनाश और आधुनिक वैज्ञानिक खोजो को समझते है। 

इतिहास

13वीं सदी के समय काल में  राजस्थान के जोधपुर की पाली रियासत के राजा के अत्याचारों और भारी कर से तंग आकर ये लोग जैसलमेर रियासत में आ कर बसना इनकी मजबूरी थी। किताब  तवारीख-ए-जैसलमेर के अनुसार कधान नाम  के इस पालीवाल ब्राह्मण ने कुल धारा की नींव रखी तथा इसका निर्माण किया था । पुरा तात्विक साक्ष्यों में मिले शिलालेखों से यह पता चला है कि यह गांव 800 साल पुराना है। ये पालीवाल ब्राह्माण महान वैज्ञानिक और बेहतरीन सिविल इंजीनियर थे। जिसका प्रमाण हमें जल जमा करने की खादीन प्रणाली से मिलता है। यह तकनीक राजस्थान जैसे इलाके जहां 50 डिग्री से भी अधिक तापमान चला जाता है और बारिश भी कम होती है जगह पर किसी खजाने से कम नहीं थी।

खादीन तकनीक

वे पथरीली ढलान वाले इलाके के नीचे मिट्टी का मजबूत बांध बनाते थे, जिससे बारिश का पानी खेतों में जमा हो जाता था। यह पानी जमीन के नीचे रिसकर कूओं को रिचार्ज करता था। इस रिसाव प्रक्रिया से गुजरने के कारण पानी में से नमक निकल जाता था और पानी खेती और पिने योग्य हो जाता था। जिस कारण से यहां गेहूं और चने की बंपर पैदावार होती थी।

वास्तुकला का अच्छा ज्ञान

कुलाधारा वासियों को वास्तुशास्त्र का अच्छा ज्ञान था जिसके कारण इनके गांव आधुनिक तरीकों से प्लांड सिटी की तरह ग्रिड पैटर्न पर बसा हुआ था। गांव के घर 50 डिग्री की गर्मी में भी प्राकृतिक रुप से ठंडे रहते थे। इसके लिए वे मिट्टी की 1.5 फिट की दीवारें बनाते थे तथा घरों में वेंटिलेशन के लिए आंगन में पत्थरों की खूबसूरत नक्काशीदार जालियां बनाते थे जो हवा को तेजी से ठंडा करती थीं।

पलायान का मुख्य कारण

19 सदी में जैसलमेर में महाराजा मूलराज द्वितीय का शासन था जो कि एक प्रभावशाली राजा नहीं थे उनकी अपेक्षा उनका दीवान ही शासन चलाता था जो कि एक क्रूर दीवान था। दीवान सालिम सिंह मेहता बहुत की अय्याश किस्म का व्यक्ति था। एक दिन उसकी नजर कुलधारा के मुखिया की खूबसूरत बेटी पर पड़ी। उसने जबरन कुलधारा के मुखिया को उसकी बेटी से शादी करने का पैगाम भेज दिया और इनकार करने पर पूरे गांव को प्रताडि़त करने की धमकी दी। अपनी बेटी के सम्मान और समुदाय के सम्मान की रक्षा के लिए रात में गांव में एक गुप्त पंचायत बुलाई गयी जिसमें कुलधारा के 84 गांव के मुखिया शामिल हुए । उन्होंने गुलामी स्वीकार करने की बजाय अपनी 500 साल पुरानी पुरखों की जमीन को हमेशा के लिए छोड़ने का फैसला लिया और एक ही रात में पूरा इलाका वीराने में बदल गया।

कहानी का दुसरा पहलू

बताया जाता है की सालिम सिंह के पिता स्वरुप सिंह जो की पहले के दीवान थे ने जब पालीवालों पर जबरन टैक्स लगाना चाहा , तो दरबार में हुए विवाद के कारण राजकुमार राय सिंह ने स्वरुप सिंह की हत्या कर दी थी। उस समय सालिम सिंह सिर्फ 11 वर्ष का था। बड़े होकर जब सालिम सिंह दीवान बना तो पालीवालों पर अत्याचार करना सिर्फ उसका लालच नहीं बल्कि दशकों पुराना उसका प्रतिशोध था। खास बात यह है कि यह की यह वृतांत कर्नल जेम्स टाड की किताब Annals and Antiquites of Rajasthan में भी दर्ज है की सालिम सिंह ने कुलधारा वासीयों पर  भारी टैक्स लाद दिए थे जिससे वे पहले ही परेशान थे। बेटी का विवाद इस उत्पीड़न की आखिरी कड़ी थी।

श्राप के पीछे का कारण य कूटनीति

पालीवाल ब्राह्माण अत्यधिक बुद्धिमान थे वे जानते थे कि सालिम सिंह उनकी उपजाऊ भूमि आलीशान गांव पर कब्जा करना चाहता है। चूंकि वे सेना से लड़ नहीं सकते थे इसलिए उन्होंने श्राप की अपवाह को एक सामाजिक आर्थिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया। उस समय काल के लोग कुछ ज्यादा ही अंध विश्वासी थे जिसके कारण कुलधारा की जमीन को शापित घोषित करने में उन्हें कोई समस्या नहीं हुई। परिणामस्वरूप कोई भी किसान इन ज़मीनों पर दुबारा बसने नहीं आया। अंत में सालिम सिंह के हाथ सिर्फ खण्डहर लगे।

आधुनिक रिसर्च के प्रमाण

ऐतिहासिक जनसंख्या आंकड़ों के अनुसार 18 वीं सदी में यहाँ की आबादी करीब 800 थी जो कि 1890 तक धीरे-धीरे घटकर 37 रह गई । यह प्रमाण बताता है कि पलायन एक रात में नहीं बल्कि कई दशकों में हुआ था। पलायन का मुख्य कारण काकनी नदी का सुखना था क्योंकि कुल धारा इसी नदी के तट पर बसा हुआ था जिसके कारण यहीं उनके जीवन यापन का मुख्य स्रोत थी।

2017 की भूकंप थ्योरी

2017 में जर्नल वैज्ञानिक और उनकी टीम का एक रिसर्च पेपर प्रकाशित हुआ। इस पेपर ने उनकी टीम ने खुलासा किया की कुल धारा और खाबा गांव के घरों की छतें, बीम और खंभे एक ही दिशा में गिरे हुए हैं , की एक विनाशकारी भूकंप का स्पष्ट प्रमाण है। संभव है कि अकाल और टैक्स से परेशान लोगों के घर जब भूकंप में ढह गए , तो बची आबादी ने उसी रात हमेशा के लिए इस जगह को छोड़ दिया।2018 में आई आई टी बाम्बे और कई शीर्ष विश्वविद्यालयों के वैज्ञानिकों ने रेडियो कार्बन डेटिंग और आधुनिक तकनीकों के जरिए इस गांव के मिट्टी के बर्तनों, अनाज और जली लकड़ियों के नमूनों की जांच शुरु की , ताकि तथ्यों को कहानियों से अलग किया जा सके।

डार्क टुरिज्म और भुतिया दांवों का सच

आज कूलधरा भारत के सबसे बड़े डार्क टूरिज्म स्थलों में से एक है। लोग यहां इतिहास से ज्यादा भूतों की कहानियों और पैरानार्मल गतिविधियों जैसे परछाई दिखना, कदमों की आवाजें, अचानक तापमान गिरना का अनुभव करने आते है। लेकिन मनोवैज्ञानिक सच की बात करें तो वैज्ञानिक और शोधकर्ताओं के अनुसार जब आप किसी वीरान सुनसान जगह पर यह सोचकर जाते है कि वह भुतिया है तो आपका दिमाग हवा की सरसराहट या किसी जानवर की परछाई को भी डरावना रुप दे देता है।

हमारे विचार से भी कुल धारा गांव सच में श्रापित  है किसी प्रेत आत्मा से नहीं बल्कि शापित था दीवान सालिम सिंह की क्रूरता से, प्राकृती के सुखे मिजाज से और एक विनाशकारी भूकंप से। आज यह गांव उस भूतिया टैग से शापित जो कि इसके निवासियों के महान विज्ञान अद्भुत जल इंजीनियरिंग, और आत्मसम्मान के लिए सब कुछ न्योछावर करने देने वाले गौरवशाली इतिहास को दबा रहा है। 

मंगलवार, 26 मई 2026

अष्टांग हृदय

ashtanga hridaya

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम आयुर्वेद विज्ञान के सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ अष्टांग ह्रदय के बारे में चर्चा करने जा रहे है आयुर्वेद विज्ञान के इस ग्रंथ के साथ ही हम अन्य महत्वपूर्ण ग्रंथों के बारे में भी जानेंगे। इसके साथ ही हम जानेंगे इस ग्रंथ का इतिहास तथा इसे किन ग्रंथों की छाया प्रति के रुप में सरलीकरण करके प्रस्तुत किया गया है। 

दोस्तों यह विषय इसलिए भी महत्वपूर्ण क्योंकि हाल ही में हमने और आपने कफ़ सिरप कांड के बारे से सुना होगा जिसमें लगभग 150 से अधिक नवजात बच्चों कि जाने चली गयीं। हमारे कहने का मतलब यह है कि हम एक ऐसे देश में रहते है जहां मौतें होने के बाद पता चलता है कि हमें यह दवा नहीं खानी है। सोच कर देखें तो जिन छोटे बच्चों का हम जान से भी ज्यादा ख्याल करते है उनकी जान एक दवा खाने से जा रही है और ऐसा भारत जैसे देश में ही नहीं अमेरिका जैसे विकसित देशों में भी हो रहा कोविड 19 की दवा के दौरान भी ऐसा हो चुका है कम्पनी पर अमेरिकन कोर्ट द्वारा भारी जुर्माना भी लगाया गया था।

मगर सोचकर देखीए इन दवाओं से जिन लोगों की जानें गयी क्या वो लोट कर सकते है नहीं तो ऐसे में हमें खुद से अपने ओर अपने चाहने वालों ख्याल रखना होगा सरकार के भरोसे पड़े रहने से कुछ नहीं होने वाला। हम सलाह देते है आयुर्वेद को अपनाईये हम ऐसा नहीं कहते है आयुर्वेद के नुकसान नहीं है मगर इसका शरीर पर धीरे धीरे असर पड़ता है जिसके कारण जान का खतरा कम रहता है समय से इलाज हो सकता है। रासायनिक सब्जीयों का इस्तेमाल कम करें तथा आर्गेनिक फलों तथा सब्जियों को खाना प्रारम्भ करें और स्वास्थ्य रहें।

इतिहास

यह ग्रंथ आयुर्वेद विज्ञान का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और कालजयी ग्रंथ है । इसकी रचना महर्षि वाग्भट्ठ द्वारा छठवीं तथा सातवीं शताब्दी के मध्य कालीन समय में की गई थी। आयुर्वेद के इतिहास में इसे वृहतत्रयी यानी तीन महान ग्रंथ संहिता सुश्रुत संहिता चरक संहिता तथा एक अज्ञात तीसरे ग्रंथ को समा योजित कर एक मुख्य ग्रंथ का रुप दिया गया है । जिसके कारण इस ग्रंथ को वृहतत्रयी भी कहा जाता है। आयुर्वेद के इतिहास में अष्टांग हृदय का आना एक क्रांतिकारी मोड़ था। सबसे पहले इसे आयुर्वेद के दो मुख्य रुपों में बांटा गया। प्रथम आत्रेय सम्प्रदाय तथा धन्वन्तरि सम्प्रदाय।

आत्रेय सम्प्रदाय
यह काया चिकित्सा विज्ञान पर आधारित है जिसे हम जनरल मेडीसिन के नाम से भी जानते है। इसे चिकित्सा के प्रमुख ग्रंथ चरक संहिता से लिया गया है।

धन्वन्तरि सम्प्रदाय
यह शल्य तन्त्र  पर आधारित है जिसे हम सर्जरी पर आधारित भी मानते है इसे सुश्रुत संहिता से लिया गया है।

यह दोनों ग्रंथ बहुत विशाल थे जिसके कारण आम चिकित्सकों के लिए दोनों का संपूर्ण अध्ययन करना और इन्हें याद रखना काफी कठिन था। ऋषि वाग्भट ने इस समस्या को समझते हुए चरक संहिता की चिकित्सा और सुश्रुत संहिता की शल्यक्रिया के सर्वोत्तम ज्ञान को समेटकर , इसे सरल और काव्यात्मक रुप में पिरोया। उन्होंने आयुर्वेद के आठ अंगों का सार निकालकर इस ग्रंथ की रचना की जिसके कारण इसका नाम आष्टांग हृदय पड़ा।


एक महत्वपूर्ण ग्रंथ क्यों है

इस ग्रंथ में आयुर्वेद के सभी आठ विभागों का ज्ञान एक ही जगह मिल जाता है जिन्हें हम क्रमबद्ध तरीके से नीचे प्रस्तुत कर रहे है
1.काय चिकित्सा जिसे हम जनरल मेडिसिन के नाम भी जानते है
2.बाल चिकित्सा जिसे हम कौमारभृत्य या paediatrics के नाम से भी जानते है।
3.ग्रह चिकित्सा इसे हम भूत विद्या यानी psychiatry or Spiritual healing के नाम से भी जानते है ।
4.ऊध्वाग चिकित्सा यानी शालाक्य तन्त्र य ENT and Ophthalmology को नाम से भी जानते है।
5.दृंष्ट्राचिकित्सा य अगदतन्त्र अथवा Toxicology के नाम से भी जानते है।
6.जरा चिकित्सा य रसायन या Geriatics Rejuvenation के नाम से भी जानते है।
7.वृष्यचिकित्सा य वाजीकरण Aphrodisiac therapy नाम से भी जानते है।
8.शल्य चिकित्सा जिसे हम surgery के रुप में भी जानते हैं।


ग्रंथ की संरचना

इस ग्रंथ में कुल 6 भाग तथा 120 अध्याय है इसमें आयुर्वेद के मूल सिद्धांतों दिनचर्या ऋतुचर्या आहार विहार और रोगों के कारण बताए गए है।
1.सूत्र स्थान 
इसके अन्तर गत सिद्धांत दिनचर्या ऋतुचर्या आहार विहार और रोगों के बारे में अध्याय 30  में बताया गया है।
2.सूत्र स्थान
अध्याय 6 के अन्तर गत मानव शरीर की रचना ,गर्भधारण और भ्रूण के विकास के बारे में जानकारी दी गई है।
3.निदान स्थान
अध्याय 16 को अंतर्गत रोगों के लक्षण उनके कारण और बीमारियों की पहचान के तरीके बताए गए हैं।
4. चिकित्सा स्थान
अध्याय 22 के अंतर्गत विभिन्न बीमारियों के नुस्खे दिए गए हैं।
5.कल्प सिद्धि स्थान
अध्याय 66 के अंतर्गत पंचकर्म वमन विरेचन और औषधियों कको बनाने की विधि बताई गई है।
6.अत्तर स्थान
इसमें बाल रोग, आंख कान नाक के रोग मानसिक रोग और विष विज्ञान के बारे में तथा इनकी शाखाओं का विस्तृत वर्णन किया गया है।

ग्रंथ की भाषा सरल और काव्यात्मक होना

चरक और सुश्रुत संहिता गद्य prose यानी जटिल भाषा में थी लेकिन वाग्भट ने अष्टांग हृदयम् के श्लोकों में लिखा। अतः छंद में होने के कारण इसके सिद्धांतों और जड़ी-बूटियों के फार्मूला को याद रखना चिकित्सकों के लिए बेहद आसान हो गया।

सूत्र स्थान

शुरुआती अध्याय में आयुर्वेद जगत में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इसमें दिनचर्या यानी डेली रुटीन ऋतुचर्या यानी सिज़नल रुटीन  आहार विहार और रोगों के मूल कारणों को इतनी सटीकता से समझाया गया है कि यदि कोई सामान्य व्यक्ति भी इसका पालन करे तो वे जल्दी बीमार न पड़े।
व्यावहारिक और संक्षिप्त
वाग्भट जी वे पुराने ग्रंथों की अति विस्तृत और दार्शनिक बातों को हटाकर सीधे उपचार और चिकित्सा पर ध्यान केंद्रित किया है इस ग्रंथ में । इस ग्रंथ में दी गई दवाओं योग आज भी सबसे ज्यादा प्रभावी और आसानी से तैयार होने वाले माने जाते है।

वैश्विक स्वीकारता

अष्टांग हृदयम् का महत्व केवल भारत तक सीमित नहीं रहा है इसका प्राचीन काल में ही अनुवाद तिब्बती अरबी फारसी और जर्मन जैसी भाषाओं में हो चुका है। तिब्बती चिकित्सा पद्धति पर तो इस ग्रंथ का बहुत गहरा असर है।

रविवार, 24 मई 2026

मेघनाथ साहा

meghnad saha

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में देश के महान वैज्ञानिक एवं क्रांतिकारी नेता मेंघनाथ साहा तथा उनके द्वारा की गई महत्वपूर्ण खोज के बारे में बताया गया है। ये वही वैज्ञानिक है जिनका नाम 6 नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया था मगर नोबेल पुरस्कार नहीं मिल पाया। कुछ लोग इस के पीछे के कारण उनका छोटी जात का होना मानते है। मगर कुछ विचारकों का मानना है कि इसके पीछे का कारण उनकी खोज के प्रमाणीकरण को सही न मानना था। इसके साथ ही हम इस लेख में उनके नाम पर बनी महत्वपूर्ण स्मारक स्थल के बारे में चर्चा करेंगे।

प्रारम्भिक जीवन 

उनका जन्म 6 अक्तूबर 1893 को शाओराटोली वर्तमान बंगला देश में हुआ था। अपने परिवार के निर्धन होने के बावजूद भी अपनी प्रतिभा के दम पर छात्र वृत्ति हासिल कर अपनी पढ़ाई जारी रखी। इसके साथ ही उन्होंने कलकत्ता प्रेसडेंसी कालेज से शिक्षा हासिल की और पढ़ाई। इनके मित्रों कि सूची में सत्येन्द्र नाथ बोस का नाम आता है। इनके प्रिय शिक्षक की सूची में जगदीश चन्द्र बोस तथ  प्रफुल्ल चन्द्र राय का नाम आता है।

इनके द्वारा किए गए कार्य

1.साहा समीकरण
1920 में इन्होंने साहा आयनीकरण समीकरण का प्रतिपाद किया। यह समीकरण खगोल भौतिकी के बुनियादी स्तंभों में से एक है। इसका महत्व समझें इस समीकरण की मदद से हमें पता चलता है कि किस तरह से किसी तारे जैसे सूर्य के अत्यधिक तापमान के कारण उसके तत्व किस तरह से आयनित यानि lonize होते हैं। इसके साथ ही इस समीकरण की मदद से वैज्ञानिक दूर स्थित तारों के तापमान, दबाव और वहां मौजूद तत्वों जैसे हाई़़ड्रोजन हीलियम की मात्रा का सटीक पता लगाने में सक्षम हुए। प्रसिद्ध खगोल शास्त्री नोरिस रसेल ने इसे गैलीलियो के बाद खगोल विज्ञान की सबसे बड़ी खोज बताया था।

2.साहा इंस्टीट्यूट आफ न्यूक्लियर फिजिक्स की स्थापना इनके द्वारा कलकत्ता में की गई जो कि परमाणु भौतिकी के रिसर्च का एक प्रमुख केंद्र बना। मेघनाद साहा केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रहे ,उन्होंने भारत में विज्ञान के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य किये।
3.इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अन्तर गत भौतिकी विभाग को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
4.विज्ञान के प्रचार एवं प्रसार तथा लोगों को विज्ञान के प्रति जागरूक करने के लिए इन्होंने साइंस एंड कल्चर पत्रिका की शुरुआत की।
5.वैज्ञानिक कार्य के साथ ही इन्होंने भारतीय सामाजिक कार्य तथा राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण कार्य किया। भारत में बाढ़ की समस्या के निपटने के लिए दामोदर घाटी परियोजना तथा भाखड़ा नांगल बांध परियोजना की रुप रेखा तैयार करने में अहम भूमिका निभाई।

6.राष्ट्रीय योजना सनिति की स्थापना
नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के आग्रह पर भारत के योजनाबद्ध विकास के लिए इस समिति का गठन में अहम भूमिका निभाई जिसके अध्यक्ष बाद में जवाहर लाल नेहरु जी बने।

7.कैलेंडर सुधार में अहम भूमिका निभाई इन्होंने शाक कैलंडर त्रुटि सुधार में महत्वपूर्ण कार्य किया।
8.वे एक ऐसे वैज्ञानिक थे जिनका मानना था कि वैज्ञानिकों की आवाज उठाने के लिए सांसद में एक सीट होने चाहिए जिसके चलते 1952 में उत्तर पश्चिम कलकत्ता सीट से एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रुप में भारी बहुमत से लोकसभा सांसद चुने गए।

निधन

16 फरवरी 1956 तो नई दिल्ली में योजना आयोग के दफ्तर जाते समय दिल का दौरा पड़ने के कारण उनका निधन हो गया। मेघनाथ साहा का जीवन इस बात का प्रतीक है कि कैसे एक व्यक्ति अभावों से उठकर न केवल वैश्विक विज्ञान को नई दिशा दे सकता है, बल्कि अपने देश के विकास में भी अद्वितीय योगदान दे सकता है। 

नोबेल पुरस्कार न का कारण

यह विज्ञान के इतिहास का सबसे बड़ा विवाद और अन्यायों में से एक माना जाता है। नोबेल पुरस्कार पाने के लिए किसी वैज्ञानिक का नाम आधिकारिक रुप से नामांकित किया जाना जरूरी होता है। मेघनाद साहा का नाम 1930 1937 1939 1940 1951 1955 में भौतिकी के नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया। लेकिन कुछ प्रमुख कारणों के चलते हुन्हें नोबेल पुरस्कार नहीं मिल पाया।

मूल्यांकन कर्ताओं की राय

नोबेल समिति के मुख्य मूल्यांकन कर्ता स्वीडिश भौतिक विज्ञानी कार्ल सीगबान थे। उनका मानना था कि साह कि खोज खगोलीय अनुप्रयोग है न कि शुद्ध भौतिकी मानने में थोड़ा संकीर्ण सोच रखती है। इसके साथ ही यह भी कहा गया कि उनकी खोज सैद्धांतिक है। उन्होंने गणित और भौतिकी के नियमों का उपयोग करके समीकरण दिया था। नोबेल समिति अक्सर उन खोजों को प्राथमिकता देती थी जिनका प्रयोगशाला में व्यावहारिक प्रदर्शन तुरंत हो चुका हो।

राजनीति और वैश्विक समीकरण

1920 से 1950 के बीच का समय काल विज्ञान की दूनिया पर यूरोपीय और अमेरिकी वैज्ञानिकों का वर्चस्व था। औपनिवेशिक भारत से आने वाले वैज्ञानिकों को वैश्विक मंच पर वह समर्थन नहीं मिल पाता था।

अन्य वैज्ञानिकों की प्राथमिकता

1930 के समय काल में जब साहा का नाम चर्चा में था तब क्वांटम मैकेनिक्स और न्यूक्लियर फिजिक्स में कई अन्य बड़ी खोजें जैसे न्यूट्रान की खोज और पाजिट्रान की खोज पर काम करने वाले वैज्ञानिकों की तरफ ज्यादा चला गया।

प्रसिद्ध वैज्ञानिकों की राय

नोबेल पुरस्कार न मिलने के बावजूद दुनिया के सर्वोत्तम वैज्ञानिकों ने उनके काम की सरहना की उनके काम को सर्वोच्च माना। ब्रिटीश खगोल शास्त्री सर आर्थर एडिंगटन और नोरेस रसेल जैसे दिग्गजों ने स्पष्ट कहा था कि खगोल भौतिकी में साहा का योगदान किसी भी नोबेल पुरस्कार से कही बढ़कर है। भारतीय विज्ञान जगत में उन्हें हमेशा एक ऐसे नायक के रुप में देखा जाता है जिसने सीमित संसाधनों में ब्राम्हांड के सबसे बड़े रहस्यों को सुलझाया।

शनिवार, 23 मई 2026

शैलेंद्र राजवंश

sailendra dynasty

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम शैलेंद्र राजवंश के इतिहास पर प्रकाश डालेंगे। बताते चलें कि इस राजवंश को कुछ विद्वान भारतीय राजवंश नहीं मानते वहीं कुछ विद्वान हिंदू धर्म से सम्बन्धित होने के कारण भारतीय ही मानते है। शैलेंद्र राजवंश के लोग कट्टर बौध धर्म के अनुयायी थे। इस लेख में हम इस वंश के भारतीय सम्बन्ध तथा इनके साम्राज्य जो कि इंडोनेशिया मलेशिया एवं जावा जैसे देशों फैला हुआ था के बारे चर्चा करेंगे। इतिहास के पन्ने को पलटा जाए तो हमें पता चलता है कि यह राजवंश अपने समय काल में बहुत प्रभावशाली एवं शक्ति शाली हिंदू बौद्ध राजवंश था।

नाम की उत्पत्ति

शैलेंद्र शब्द का अर्थ है पर्वतों का राज हिन्दी में विच्छेदन करें तो हमें पता चलता है कि शैल यानी पर्वत इंद्र देवताओं का राजा इंद्र। आमतौर पर देखा जाए तो इस शब्द का प्रयोग भगवान शिव प्रयोग किया जाता है। इस वंश की उत्पत्ति की बात करें तो इतिहासकारों में इस बात पर मतभेद है कुछ इतिहासकार इन्हें दक्षिण भारत के राजवंश एवं शैल वंश से सम्बन्धित मानते है वही कुछ इतिहासकार इन्हें इंडोनेशिया के मूल निवासी मानते है जिन्होंने भारतीय संस्कृति एवं धर्म को अपनाया था। इनका समय काल 8वीं शताब्दी से 11वीं शताब्दी के बीच का माना जाता है।

धर्म और भाषा

शैलेंद्र वंश के लोग बौद्ध धर्म के कट्टर अनुयायी थे इन्होंने दक्षिण पूर्व एशिया में बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार में अहम भूमिका निभाई। हलांकि इन्होंने कभी हिन्दू धर्म का विरोध नहीं किया। इनके राज्य में शिव के भी उपासक तथा अन्य हिंदू देवताओं के उपासक थे जिसके चलते इन्होंने सप्रंग मन्दिर का निर्माण करवाया था। इन्होंने अपने ग्रंथ संस्कृत भाषा भारतीय पल्लव ग्रंथ लिपि को भी अपनाया। इस वंश के लोग कला प्रेमी भी थे।

बोरोबुदुर स्तूप

इंडोनेशिया के जावा में स्थित यह स्तूप शैलेंद्र राजाओं के संरक्षण में लगभग 780 से 825 ईस्वी के बीच बनाया गया था। जो कि बारीक नक्काशी के साथ-साथ मूर्तिकला एवं वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है। इस स्तूप को यूनेस्को की विश्व धरोहर की सूची में संरक्षित किया गया है। यह दुनिया का सबसे बड़ा बौद्ध स्तूप है जिसमें नौ प्लेट फार्म तथा बुद्ध की 504 मूर्तियां स्थापित की गईं हैं। इस मंदिर कि दीवारों पर बौद्ध दर्शन को तथा उनके जीवन के महत्वपूर्ण पल को दर्शाया गया है।

चांडी सेवूा candi sewu
यह इंडोवेशिया का दूसरा सबसे बड़ा बौद्ध मंदिर है जो प्रमबानान मंदिर के पास स्थित है।

चांडी कलसन candi kalasan
यह भी जावा का सबसे पुराना मंदिर है जिसे शैलेंद्र राजा ने अपने गुरु और देवी तारा के सम्मान में बनवाया था।

भारत के साथ सम्बन्ध

चोल एवं पाल राजवंश के राजाओं के साथ इस राजवंश के सांस्कृतिक व्यापारिक एवं कूटनीतिक सम्बन्ध थे। बताते चलें कि पाल राजाओं के साथ मिलकर शैलेंद्र वंश के राजा बाल पुत्र देव ने मिलकर मगध यानी बिहार के नालंदा विश्वविद्यालय में बौद्ध भिक्षुओं के रहने के लिए एक मठ मनवाया था। इस योजना को पूर्ण करने के लिए उन्होंने पाल राजा देव पाल से पांच गांवों को दान करने का अनुरोध किया था। इसका उल्लेख नालंदा ताम्र पत्र अभिलेख में मिलता है।

शुरुआती समय में शैलेंद्र राजाओं के भारतीय राजा राजा रज चोल तथा राजेंद्र चोल के साथ अच्छे संबंध थे। मगर राजनीतिक कारणों इनमें विरोध हो गया। विरोध से पहले शैलेंद्र राजा श्री मारविजयोत्तुंगवर्मन ने तमिलनाडु के नागपट्टिनम में चूड़ामणि विहार नामक बौद्ध मठ का निर्माण करवाया था। लेकिन इन राजाओं का समय काल बीतने का बाद चोल राजा राजेंद्र चोल ने शैलेंद्र साम्राज्य के राजा श्रीविजय पर व्यापारिक वर्चस्व चलते नौसैनिक हमला किया था।

नौवीं शताब्दी के समय काल में शैलेंद्र राजवंश का प्रशासन इंडोनेशिया में विस्तृत कम होने लगा जिसके बाद शैलेंद्र राजवंश ने सुमात्रा द्वीप वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित  किए। जिसके चलते सुमात्रा द्वीव के श्री विजय साम्राज्य के भी शासक बन गए और  दोनों साम्राज्य की शक्ति एक हो गई। उपरोक्त कारणों के चलते मलक्का जलडमरुमध्य यानी strait of Malacca के व्यापारिक  मार्ग को अपने नियंत्रण में कर लिया।

वंश के समाप्त होने का कारण

11वीं आते-आते चोल साम्राज्य के लगातार नौसैनिक हमलों तथा जावा के मताराम साम्राज्य के साथ आंतरिक संघर्षों के कारण शैलेंद्र वंश और श्री विजय वंश समाप्त हो गया।
नोट इस लेख सम्बन्धित कोई अन्य जानकारी यदि आपके पास है तो जरूर साझा करें।

गुरुवार, 21 मई 2026

विक्रम संवत

vikram samvat calender

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम विक्रम संवत के इतिहास तथा वर्तमान समय में इसके महत्व के बारे में चर्चा करेंगे। यह भारतीय काल गणना का गौरवशाली प्रतीक है। प्रस्तुत लेख में हम विक्रम संवत के साथ ही शक संवत तथा नवीनतम अंग्रेजी कैलंडर के बारे में चर्चा करेंगे। इसके साथ ही हम देखेंगे की आज भी विक्रम संवत क्यों अंग्रेजी कैलंडर से ज्यादा महत्व रखता है।

इतिहास

भारत की प्राचीन  संस्कृति और सभ्यता विश्व की सबसे समृद्ध और वैज्ञानिक संस्कृतियों में से एक है। हमारी इस समृद्ध विरासत का एक अमूल्य हिस्सा है हमारी काल-गणना यानी कलेक्टर प्रणाली । भारत में प्रचलित विभिन्न कैलंडरों में विक्रम संवत का स्थान सर्वोपरि है। यह केवल तिथियों और  महीनों के बदलने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह हमारी गौरवशाली परंपरा, खगोलीय विज्ञान और सांस्कृतिक अस्मिता का प्रतीक है।

विक्रम संवत की शुरुआत ईसा पूर्व 57 बी सी में हुई थी पौराणिक और ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार उज्जैन के महान सम्राट विक्रमादित्य ने अपनी प्रजा को विदेशी आक्रमणकारियों शकों से मुक्ति दिलाई थी। इस विजय के उपलक्ष्य में और अपनी प्रजा को कर्ज मुक्त करने के उद्देश्य से उन्होंने एक नए संवत की शुरुआत की, जिसे विक्रम संवत कहा जाता है। सम्राट विक्रमादित्य अपने अदम्य साहस और जन कल्याण तथा न्याय प्रियता के लिए जाने जाते थे। 

उनके  द्वारा शुरु किया गया यह विक्रम संवत आज भी भारतीय जन मानस के दिलों में बसा हुआ है।वर्तमान के ग्रेगोरियन कैलंडर से इसकी तुलना करें तो विक्रम संवत उससे 57 वर्ष आगे चलता है। यानी वर्तमान समय में अगर 2026 चल रहा है तो विक्रम संवत में 2026+57 2083 होगा।

वैज्ञानिक एवं खगोलीय आधार

विक्रम संवत पूरी तरह से वैज्ञानिक और खगोलीय गणना  पर आधारित है। जहां अंग्रेजी कैलंडर केवल सूर्य की गति पर आधारित होता है जिसका अनुमान सो वर्षों का होता है। वहीं विक्रम संवत लूनि सोलर यानी चंद्र सौर प्रणाली पर आधारित होता है। यानी इसमें चन्द्र और सूर्य दोनों की गतियों का सटीक समन्वय होता है।

वर्ष और महीने 

अंग्रेजी महीने के समान ही इसमें भी 12 महीने होते है बस नाम अलग होता है। जैसे चैत्र वैशाख ज्येष्ठ आषाढ़ श्रावण भाद्रपद जिसे भादों भी कहते है इसी के साथ अश्विन कार्तिक मार्गशीर्ष पौष माघ और अन्त में भादों आता है। यहां हम अंग्रेजी महीने का विक्रम संवत में क्या नाम उसके बारे में बताते चलते है। विक्रम संवत में महीने अंग्रेजी महीने के कैलंडर के मध्य से शुरु होता और अगले महीने के मध्य के मध्य के दिनों में समाप्त होता है। बताते चले कि विक्रम संवत कि शुरुआत चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष की तारीख से होती है।

पक्ष

प्रत्येक महीने को दो पक्षों में बांटा गया है कृष्ण पक्ष यानी अंधेरी रातें तथा शुक्ल पक्ष यानी चांदनी रातें होती है।

अधि मास

इसे हम मलमास के नाम से भी जानते है इसका महत्व देखे तो हमें मालूम है कि हर तीसरा वर्ष एक लीप वर्ष होता है जिसके कारण अग्रेंज़ी महीने में फरवरी 28 की जगह 29 दिनों की हो जाती है मगर विक्रम संवत में एक अलग से महीना जी जोड़ दिया जाता है। जिसे हम पुरुषोत्तम मास के नाम से भी जानते है। प्रक्रिया दर्शाती है की हमारे प्राचीन खगोल शास्त्री कितने उन्नत थे। इससे ऋतुओं का चक्र कभी बिगड़ता ही नहीं है।

सांस्कृतिक और अध्यात्मिक महत्व

 पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इसी दिन ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना शुरु की थी। इसी दिन से चैत्र नव रात्रि का प्रारम्भ होता है जिसमें मां शक्ति की उपासना की जाती है। वसंत ऋतु- यह वह समय होता है जब प्रकृति पुरानी पत्तियों छोड़कर नए पत्तों और फूलों से सजती है। खेतों में फसलें लहलहातीं हैं जो किसानों कि मेहनत ओर खुशहाली का प्रतीक होती है। इसके साथ ही भारत के लगभग सभी त्यौहार जैसे दशहरा दीवाली होली रक्षाबंधन और करवा चौथ विक्रम संवत की तिथियों के अनुसार ही तय किए जाते है।

वर्तमान समय में इस कैलंडर को द्वितीय कैलंडर के रुप में लिया जाता है क्योंकि सरकारी कार्यों में अंग्रेजी कैलंडर का ही प्रयोग किया जाता है। लेकिन एक देश ऐसा भी है जो इस कैलंडर को अधिकारिक राष्ट्रीय कैलंडर के रुप में इस्तेमाल करता है। हम नेपाल देश का सम्मान करते है जिन्होंने हमारी परम्परा का जीवित रखा है। बताते चले कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना में भी विक्रम संवत का उल्लेख किया गया है।

दर्शकों से अनुरोध है कि आप इस लेख को भले ही ज्यादा लोगों में साझा न करें मगर इस लेख से सम्बन्धित अन्य कोई जानकारी आपको अगर है तो जरूर से साझा करें। क्योंकि मैं भी अभी सिख ही रहा हूं।

शक संवत

यह एक भारतीय राष्ट्रीय कैलंडर है जिसे भारत ने 22 मार्च 1957 में यानि 1 चैत्र 1879 को आधिकारिक रुप से अपनायता गया था। यह कैलेंडर भी विक्रम संवत कि तरह ही चैत्र महीने से प्रारम्भ होता है। इस कैलंडर में भी महीनों के नाम विक्रम संवत के समान ही होते है बस अन्तर इतना है कि इस कैलेंडर में सभी महीने अंग्रेजी कैलंडर के साथ मेल खाते है बस लीप वर्ष में जाकर एक  दिन का अतंर आता है।

बुधवार, 20 मई 2026

ग्रेट वाल आफ इण्डिया

 
great wall of india

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में भारतीय इतिहास के एक ऐसे सच से पर्दा उठाने जा रहे है जिसके बारे में आप सुनकर चौंक जायेंगे। इस विषय को जानना इस लिए भी जरुरी क्योंकि इसी के कारण भारत देश में शोषण का एक बड़ा सिलसिला जारी हुआ जो कि देश की आज़ादी के बाद ही समाप्त हुआ। आज हम भारत की विकराल दीवार जिसे हम ग्रेट वाल आफ इण्डिया के नाम से भी जानते के बारे में चर्चा करेंगे। वैसे आपने ग्रेट वाल आफ चीन के बारे में सुना होगा, इसके साथ ही राजस्थान के राजा महाराणा कुंभा द्वारा निर्माण कराई गयी दीवार के बारे में भी सुना होगा। जिसकी तुलना ग्रेट वाल आफ चाइना के साथ की जाती है। लेकिन यहां मामला थोड़ा अलग है। ये दीवार तो सुरक्षा के लिए बनाई गयी थी जो कि लगभग 26 किलोमिटर तक फैली थी। मगर आज हम जिस दीवार के बारे में बात करने जा रहे है वो लगभग 4000 किलो मीटर तक फैली थी।

इसके साथ ही इस दीवार का निर्माण किसी ईट या पत्थर से नहीं किया गया था बल्कि कटीली झड़ीयों से किया गया था। इसके साथ ही यह दीवार अंग्रेज़ों की शोषण कारी नीति का एक परिणाम थी। आज के इस लेख में हम इस दीवार के बनाने के पीछे के इतिहास तथा उन कंटीली झाड़ीयों के बारे में चर्चा करेंगे जो आज भी किसानों कि समस्या का मुख्य कारण है।

इतिहास

यह बात उस समय की है जब ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी का राज था। कम्पनी का ज्यादातर कमाई के मुख्य स्रोतों में नमक का नाम भी आता था। इस समय काल के दौरान नमक सोने से भी ज्यादा महँगा था।
कहानी की शुरुआत होती है रेम्बलैस एण्ड रिकलैक्शन आफ इण्डिया नामक किताब से जिसमें एक चौप्टर है ट्रांज़िस्ट ड्युटि इन इण्डिया जिसमें बताया गया कि हजारों मिल लम्बी एक दीवार भारत के नक्शे से गायब हो गई। यहीं से दीवार के बारे में चर्चा जोरों से शुरु हूई। इस किताब के लेखक का नाम मेजर जनरल एच डब्लू सुलेमन था जो 1869 के समय काल के दौरान ब्रिटिश सेना के एक अफसर थे।

इन्होंने अपनी इस किताब में बताया की 1757 प्लासी के लड़ाई के बाद से ईस्ट इण्डिया कम्पनी का शासन भारत में शुरु हो गया जो कि 1764 में बक्सर के युद्ध के बाद पुर्णतः स्थापित हो गया । 12 अगस्त 1765  को मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय और राबर्ट क्लाइव के बीच इलाहाबाद की संधि हुई जिसके तहत अंग्रजों को शाही मोहर प्रदान की गई। इस मोहर के चलते ईस्ट इण्डिया कम्पनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा में कर वसूलने का सरकारी अधिकार मिल गया। कम्पनी पहले से ही नमक के क्षेत्र में व्यापार कर ही रही थी मगर सरकारी मोहर के मिलते ही कम्पनी ने नमक के  मनमाने दाम लेने प्रारम्भ कर दिये।

जिसके परिणाम स्वरूप कम्पनी ने 1784 से लेकर 1785 के समय काल में केवल नमक से 62 लाख रुपये का मुनाफा कमाया। बंगाल में टैक्स बहुत ज्यादा था वहीं राजस्थान में टैक्स बहुत कम था क्योंकि समुंदर राजस्थान के करीब था अतः नमक आसानी से उपलब्ध हो जाता था। इस दीवार को बनाने का मुख्य कारण यही था कि अगर सस्ता नमक आसानी से बंगाल पहुंच गया था तो ब्रिटीश अधिकारियों का करोड़ों का नुकसान हो जाता। बताते चलें कि इस दीवार का दुसरा नाम लैण्ड कस्टम लाईन था। शुरुआत में यह दीवार  कुछ चुने हुए नाकों तथा चौंकी यों तक सिमीत थी

1834 जी एच स्मीथ ने इस दीवार को उत्तर पश्चिम तक फैलाया। 1869 तक यह लाइन हिमालय के तराई इलाकों से लेकर मद्रास प्रेसीडेंसी तक फैल चुकी थी। इतनी बड़ी दीवार की सुरक्षा करना अंग्रेजों के लिए एक समस्या का कारण बन गया। क्योंकि ईंट पत्थर की दीवार को बनाना और बार-बार मरम्मत करवाना महँगा पड़ रहा था और कांटेदार दीवारों को आसानी से काटा जा सकता था। जिसके चलते टैक्स की सुरक्षा के लिए कम्पनी को सेना को लगाना पड़ा लगभग 24000 सैनिकों तैनात किया गया। सेना के जवान 5 से 12 रुपये में 12 से 14 घण्टे दीवार की सुरक्षा करते । जो समय के साथ साथ कम्पनी को महँगा लगने लगा।

ऐलन एक्टिवियन हुमन allan octavian hume

यह वहीं व्यक्ति है जिन्होने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की थी 1867 में यह फिनलैण्ड में कस्टन कम्शिनर थे इसके साथ ही ये व्यक्ति वनस्पति विज्ञान के अच्छे ज्ञाता भी था। इसी व्यक्ति ने कम्पनी के सामने पत्थर और ईंट की जगह कंटीली झाड़ियों से दीवार बनाने का प्रस्ताव रखा ताकि लागत को भी कम किया जा सके और काम भी पूरा हो जायें। इनके सुझाव पर विदेशी बबूल, करोंदा और छुई-मुई की बड़ी प्रजाती के पौधों को बाहरी देश से भारत लाया गया।

इन पौधों के काटें इतने तेज़ थे कि कोई भी सुरक्षा कवच भी इनसे ज्यादा बढ़ीयां सुरक्षा नहीं बना सकता था। परिणामस्वरूप इस व्यक्ति के आदेश पर हजारों मिल लम्बी खाईंया खोदी गई और उपजाऊ मिट्टी डाली गयी तथा लाखों बीजों को बोया गया। 1874 को समय तक यह झाड़ीयां 8 से 12 फिट तक लम्बी हो गयीं। हियुंम ने अपने उच्च अधिकारी का सूचना देते हुए लिखा कि यह झाड़ीयां इतनी अभेदय है कि इन्हें इंसान तो क्या चूहा भी पार नहीं कर सकता।

इसके साथ ही सैनिकों की संख्या को भी घटा दिया गया बताते चले कि यहां ब्रिटीश सेना ने फुट डालों और राज करों कि नीति अपनाई थी क्योंकि दीवार कि देख रेख में जो सैनिक लगाये गये थे वे लगभग सभी मुसलमान थे तथा उन्हें अपने मूल निवास से 100 किलो मीटर की दूरी पर तैनात किया गया था। ताकि क्षेत्रीय लोगों के प्रति उनके मन में हमदर्दी की भावना न आ सके। इस दीवार और नमक व्यापार पे ही आधारित एक उपन्यास लिखा गया है जिसे महान लेखक मुंशी प्रेमचन्द द्वारा लिखा गया है। जिसका शीर्षक नमक का दरोगा है आपको यह उपन्यास एक बार जरुर पढ़ना चाहिए।

कटीली झाड़ीयों का इतिहास

बताते चले कि उस समय काल में लाई गई यह कटीली झाड़ीयां भारत में आज भी मौजूद है जो कि भारतीय उपजाऊ भूमि की उपजाऊ क्षमता को नुकसान पहुंचा रही है। ऐसे में हमें इन कटीली झाडीयों की पहचान करके इन्हें जड़ से समाप्त करने के प्रयास करने होंगे। हमारे श्रोताओं से निवेदन है कि अगर आप इन्हें अपने खेतों के अगल बगल देखें तो जड़ से निकाल कर जला दें।

विदेशी बबूल
इसे आमतौर पर विलायती किकर के नाम से भी जाना जाता है इस पौधे का वैज्ञानिक नाम Prosopis juliflora है। इसे भारत में दक्षिणी अमेरिका और मैक्सीको से भारत लाया गया है।

हानी
1.इस पौधे की जड़े जमीन के अंदर 50 से 60 मीटर अंदर तक चली जाती है जिसके कारण इन्हें जड़ से मिटाना मुश्किल हो जाता है।
2.यह पौधा एक दिन में 7 लीटर से अधिक पानी सोख जाता है यह अपने से 36 फिट दूर तक के क्षेत्र का पानी सोख जाता है। इसके साथ ही यह पौधा पानी की तलाश में जमीन के नीचे 160 फिट तक जाने में सक्षम है।
3.इसकी पत्तियां और जड़े एक खास प्रकार का कैमीकल छोड़ती है जिसके कारण इसके अगल बगल कोई अन्य पौधा या जंगली घास नहीं उग पाती। बताते चले कि अगर कोई जानवर इसे अगर अधिक मात्रा में खा ले तो उसके पेट में सुजन आ जाती है, इसके साथ ही जानवर के दांत झड़ सकते है गम्भीर परिणामों कि बात करें तो इससे जानवर की मौत भी हो सकती है।

mimosa pigra
यह पौधा मूल रुप से दक्षिणी और मध्य अमेरिका से लाया गया है यह दरअसल छुई -मुई पौधे का विक्राल रुप है इसके साथ ही यह छुई मुई के पौधे से थो़ड़ा अलग है। छोटी छुई मुई जमीन पर फैलने वाला एक छोटा पौधा है। मगर यह विशाल ,कांटेदार और बेहद आक्रामक पौधा होता है। इसकी लम्बाई 6 मीटर से 20 फीट की उंचाई तक हो सकती है। छुने पर इसकी भी पत्तीयां सिकुड़ जाती है।

हानी
1.यह दुनिया की 100 सबसे बड़ी आक्रामक झाडियों में से एक है। यह ज्यादातर नदी के किनारे , नहर के किनारे उगता है और तेज़ी से फैलता है जिसके कारण नदी स्रोत तथा दलदली इलाका इससे ढक जाता है। जानवर आदि पानी की तलाश में इसके फंदे में फस कर मर जाते है।
2.यह झाड़ी जहां उगती है उस जगह पर धूप सिधी जमीन पर नहीं आ पाती जिसके कारण स्थानीय वनस्पति समाप्त हो जाती है। नदियों और नहरों के किनारे अत्याधिक मात्रा फैलने के कारण ये पानी के बहाव के रोक देती है। इसके साथ ही इसके बीज पानी में गिरकर दूर दूर तक फैल जाते है।
3.यह पौधा 23 सालों तक  जीवित रहता है। धान की खेती को यह अत्यधिक नुकसान पहुंचाता है।

मंगलवार, 19 मई 2026

भोज शाला

bhojshala
प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम मध्य प्रदेश धार ज़िले में विद्दमान भोजशाला के बारे में बात करेंगे। इसके साथ ही राजा भोज तथा मंदिर के निर्माण के पीछे के रहस्य तथा वर्तमान समय में यह चर्चा का विषय क्यों बना हुआ है इस विषय पर बात करेंगे। हाल ही में समय में इंदौर हाई कोर्ट ने इस भोज शाला पर एक ऐतिहासिक फैसला दिया है इस फैसले के वर्तमान परिणामों के बारे में चर्चा करेंगे। यह विषय इस लिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह ए एस आई यानी आरकोलोजिकल सर्वे आप इण्डिया द्वारा संरक्षित किया गया है इसके साथ ही यह ऐतिहासिक पुरातत्व स्थल भी है।

भोज शाला

हिंदू समुदाय के लोगों का मानना था कि इस भोज शाला को परमार वंश के राजा भोज ने 11वीं शताब्दी में बनवाया था जिसे शारदा सदन के नाम से भी जाना जाता है। राजा भोज के समय काल में इस भोज शाला में संस्कृत भाषा का पठन पाठन किया जाता है इसे संस्कृत विश्वविद्यालय माना गया था। इसी भोज शाला में वाग्देवी का एक मंदिर भी था जिन्हें हम मां सरस्वती के नाम से भी जानते है। अतः इस मंदिर के कारण ही इस परिसर के शारदा सदन भी कहा जाता था। 

कालांतर में मुस्लिम शासक महमुद शाह खिलजी ने 1457 में शारदा सदन के तुड़वाकर वहां  मस्जिद का निर्माण करा दिया गया। समय अन्तराल के बाद इस मस्जिद में मौलाना कमालुद्दीन नामक मुस्लिम व्यक्ति आ कर रहने लग गये । जब कमालुद्दीन का निधन हो गया तब मुस्लिम मान्यताओं के अनुसार इस परिसर को मौलाना कमालुद्दीन की मस्जिद एवं उसके परिसर के नाम से जाना जाने लगा था। जिसके कारण यह विवाद कई वर्षों से उच्च न्यायालय में विचाराधीन था। उपरोक्त कारणों से यह हिन्दू- मुस्लिम विवाद का मुख्य कारण बना हुआ था।

हाई कोर्ट का फैसला

15 मई 2026 को यह ऐतिहासिक फैसला मध्य प्रदेश के उच्च न्यायालय की इंदौर खण्ड पीठ द्वारा सुनाया गया जिसमें न्यायालय ने कहा की यह वास्तव में राजा भोज द्वारा निर्मित भोज शाला ही है न की कोई मस्जिद। इस फैसले को सुनाने से पहले हाई कोर्ट की बैंच ने ए एस आई द्वारा क्षेत्र विशेष पर किए गए अध्ययन कि रिपोर्ट सौंपी थी जिसमें प्राचीन मंदिर के होने के साक्ष्य मिले थे। अतः कोर्ट का फैसला हिन्दू समाज के पक्ष में आया। अब वे इस परिसर में बिना रोक टोक के पुजा अर्चना कर सकते है। वर्तमान समय में देखा जाये तो ऐसे बहुत से स्थल विवाद पूर्ण हैं जिनमें से बहुत से स्थलों पर मुकदमा कोर्ट में विचाराधीन है।

सोर्स

15 मई 2026 को टाईम्स आफ इण्डिया ने इस फैसले का प्रकाशन अपनी रिपोर्ट में शीर्षक Bhojhsala complex is temple of goddess vag devi, Hindus have right to woship Madhya Pradesh high court के साथ प्रकाशित किया। इसके साथ ही इसका विडियों संस्करण जिसे 18 मई 2026 को प्रकाशित किया जिसमें परिसर में मां सरस्वती की नवीनतम मूर्ति स्थापना तथा पुजा अर्चना करते हुए दिखाया गया है।

17 मई 2026 को द हिन्दू पत्रिका ने भी शीर्षक Madhya Pradesh bhojshala case and the crack in the places of worship Act के नाम से प्रकाशित किया गया है। 
 

मंगलवार, 12 मई 2026

कुतुबमीनार

 
qutb minar
प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम कुतुबमीनार के इतिहास के बारे में चर्चा करेंगे यह विषय इस लिए भी महत्वपूर्ण क्योंकि आज तक हम यही जानते थे कि कुतुबमीनार का निर्माण कुतुबूद्दीन ऐबक ने कराया था मगर यह पूर्ण सच नहीं है क्योंकि इस मुस्लिम शासक ने सिर्फ इसकी मरम्मत करवाई थी। आज के इस लेख में हम कुतुबमीनार के इतिहास , विक्रमादित्य से इसके सम्बन्ध तथा इसके वास्तविक नाम के बारे में चर्चा करेंगे इसके साथ हम इसको बनाने के पीछे छुपे उद्देश्य को समझने की कोशिश करेंगे।

फिरोजशाह तुगलक

अपने प्रारम्भिक समय में कुतुबमीनार एक  चार मंज़िला इमारत थी जिसकी चौथी मंज़िल पर मंदिर का निर्माण कराया गया था अतः एक कट्टर मुस्लिम होने के नाते फिरोजशाह तुगलक ने इसकी चौथी मंज़िल को तुड़वा कर पुनः इसका निर्माण करवाया इनके साथ ही इसने पांचवीं मंज़िल का भी निर्माण करवा दिया। बताते चले कि फिरोजशाह तुगलक ने दिल्ली पर 1325 से लेकर 1351 तक शासन किया। इनके शासन काल के पहले दिल्ली पर इनरे चचेरे भाई मुहम्मद बिन तुगलक का शासन था। यह दिल्ली सल्तनत के तीसरे वंश से सम्बन्धित था। बताते चले कि दिल्ली सल्तनत पर पांच वंशों ने शासन किया जिनके नाम और समय कुछ इस प्रकार है। गुलाम वंश शासन काल 1206 से 1320 ई. तक 2 खिलजी वंश शासन काल 1290 से 1320 ई. तक 3 तुगलक वंश शासन काल 1320 से 1414 तक 4 सैयद वंश शासन काल 1414 से 1451 तक 5लोदी वंश शासन काल 1451 से 1526 तक। बताते चले दिल्ली पर सबसे लंबा शासन काल तुगलक वंश का ही रहा।
 

चन्द्रगुप्त द्वितीय

इनका शासन काल 380 ई से 415 ई तक का माना जाता है । इनके राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र थी मगर उज्जैन भी इनका मुख्य केन्द्र था। कुतुबमीनार की बात करें तो इसे चन्द्रगुप्त द्वतीय ने अपने दरबार के नौ रत्नों में से एक एवं महान खगोल शास्त्री वराह मीहिर के लिए बनवाया था। यह एक सुर्य वेधशाला थी। मगर चौथी मंज़िल पर विष्णु मंदिर होने के कारण कुछ विद्दवान इसे विष्णु स्तंभ भी कहते थे। 

प्रारम्भ में इस मिनार का प्रयोग खगोल विज्ञान के अध्ययन के लिए किया जाता था। इस बात का उल्लेख हमें हरिहार निवास द्विवेदी द्वारा रचित दो प्रसिद्ध पुस्तकों में मिलता है जिनका नाम दिल्ली के तोमर तथा ग्वालियर के तोमर है। बताते चले कि भारत में प्रचलित विक्रम संवत का निर्माण में भी इन्हीं के शासन काल में हुआ था।

तरीखे फिरोज़ शाही

इस किताब के लेखक का नाम सिराज अफिन है जो कि फिरोज़शाह तुगलक के राज दरबार का एक विद्वान था इसने अपनी किताब में लिखा की कुतुबमिनार की चौथी मंज़िल पर बिजली गिर जाने के कारण यह नष्ट हो गयी थी।
इबनेबतुता
यह एक विदेशी यात्री था जो कि मोहम्मद बीन तुगलक के शासन काल में भारत आया था। इसने अपनी किताब उलरहला में लिखा की कुतुबमीनार की चौथी मंज़िल पर सोने की घण्टीयां लगी हुई थी। जिसे ज़ाहिर है मुस्लिम शासन काल के दौरान इन्हें हटाया गया होगा।

कीर्ति स्तम्भ

यह स्तम्भ चितौड़ के दुर्ग के अन्दर राणा कुम्भा द्वारा निर्मित करवाया गया था। अगर आप वर्तमान समय में कुतुवमीनार के वास्तविक एवं प्राचीन रुप रेखा को देखना चाहते है तो यह स्तम्भ उसकी छाया प्रति है साथ में चौथी मंदिर पर विष्णु मंदिर का निर्माण हूबहू कुतुबमीनार के समान ही कराया गया था। 
लेख से सम्बन्धित कोई उल्लेख यदि आपको कहीं मिलता है तो ज़रुर साझा करें।
सोर्स विकीपिडीया,टेस्टबुक,क्योरा,दृष्टि आई ए एस,ईआर रिब्लिकेशन 

मंगलवार, 31 मार्च 2026

pushpak viman kisne banaya



pushpak viman kisne banaya

 प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम प्राचीन मान्यताओं के अनुसार प्राप्त पुष्पक विमान के इतिहास के बारे में चर्चा करेंगे तथा इस बात पर भी विचार करेंगे कि क्या वर्तमान समय में इससे सम्बन्धित कोई साक्ष्य मिले है य नहीं। इसके साथ ही हम देखेंगे कि रावण के पुष्पक विमान के किसने बनाया था इसके साथ ही हम देखेंगे कि क्या सच में प्राचीन काल में विज्ञान के वर्तमान समय के अनुसार  इतनी तरक्की न होने के बावजूद भी यह सम्भव कैसे हुआ।

भारतीय पौराणिक ग्रंथों में वर्णित “पुष्पक विमान” एक अद्भुत और रहस्यमय उड़ने वाला वाहन माना जाता है, जिसका उल्लेख विशेष रूप से रामायण में मिलता है। यह विमान न केवल आकाश में उड़ने की क्षमता रखता था, बल्कि अपनी गति, आकार और सुविधाओं के कारण भी अत्यंत विलक्षण बताया गया है। आज भी पुष्पक विमान को लेकर लोगों में जिज्ञासा बनी हुई है कि आखिर इसे किसने बनाया था और इसकी वास्तविकता क्या है। इस लेख में हम इसी विषय पर विस्तार से चर्चा करेंगे।


पुष्पक विमान का परिचय

पुष्पक विमान का उल्लेख वाल्मीकि रामायण में विस्तार से मिलता है। यह एक ऐसा दिव्य रथ था जो आकाश में उड़ सकता था और मनचाही दिशा में जा सकता था। इसकी सबसे खास बात यह थी कि इसमें बैठने वालों की संख्या के अनुसार इसका आकार अपने आप बढ़ जाता था। इसके अंदर सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी, और यह अत्यंत तेज गति से यात्रा कर सकता था।

पुष्पक विमान का निर्माता कौन था?

पौराणिक कथाओं के अनुसार, पुष्पक विमान का निर्माण देवताओं के दिव्य शिल्पकार विश्वकर्मा ने किया था। विश्वकर्मा को देवताओं का इंजीनियर और वास्तुकार माना जाता है, जिन्होंने अनेक दिव्य अस्त्र-शस्त्र, महल और वाहन बनाए थे। कथा के अनुसार, विश्वकर्मा ने यह विमान धन के देवता कुबेर के लिए बनाया था। कुबेर इस विमान का उपयोग अपनी यात्राओं के लिए करते थे। यह विमान उनके वैभव और शक्ति का प्रतीक था।

रावण और पुष्पक विमान

बाद में, लंका के राजा रावण ने कुबेर को पराजित कर पुष्पक विमान को अपने अधिकार में ले लिया। रावण ने इस विमान का उपयोग कई महत्वपूर्ण कार्यों में किया, जैसे कि माता सीता का हरण।
पुष्पक विमान की विशेषता यह थी कि यह स्वयं संचालित होता था और चालक की आवश्यकता नहीं होती थी। यह अपने स्वामी के आदेशों का पालन करता था और आकाश में बिना किसी बाधा के यात्रा कर सकता था।

भगवान राम और पुष्पक विमान

जब राम ने रावण का वध किया और लंका पर विजय प्राप्त की, तब उन्होंने पुष्पक विमान को अपने अधिकार में ले लिया। इसी विमान के माध्यम से भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण अयोध्या वापस लौटे थे।
यह यात्रा दीपावली के रूप में मनाई जाती है, क्योंकि उसी दिन भगवान राम का अयोध्या आगमन हुआ था। बाद में भगवान राम ने इस विमान को उसके मूल स्वामी कुबेर को लौटा दिया।

पुष्पक विमान की विशेषताएँ

पुष्पक विमान को लेकर कई अद्भुत विशेषताओं का वर्णन मिलता है
1.स्वचालित संचालन – यह विमान बिना किसी चालक के स्वयं चल सकता था।
2आकार परिवर्तन – यात्रियों की संख्या के अनुसार इसका आकार छोटा-बड़ा हो सकता था।
3.तेज गति – यह बहुत तेज गति से एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँच सकता था।
4.आरामदायक यात्रा – इसमें बैठने वालों के लिए सभी प्रकार की सुविधाएँ उपलब्ध थीं।
5.मनचाही दिशा – यह विमान केवल आदेश के अनुसार ही नहीं, बल्कि सोच के अनुसार भी दिशा बदल सकता था।

क्या पुष्पक विमान वास्तव में था?

यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। आधुनिक विज्ञान के दृष्टिकोण से पुष्पक विमान को एक पौराणिक कथा माना जाता है। आज तक इसके अस्तित्व के कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिले हैं। हालांकि, कुछ लोग इसे प्राचीन भारत की उन्नत तकनीक का प्रतीक मानते हैं। कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि प्राचीन ग्रंथों में वर्णित यह विमान संभवतः किसी कल्पना या रूपक का हिस्सा हो सकता है, जो उस समय के लोगों की वैज्ञानिक सोच और कल्पना शक्ति को दर्शाता है।

आधुनिक विज्ञान और पुष्पक विमान

आज के समय में हम हवाई जहाज, हेलीकॉप्टर और अंतरिक्ष यान जैसी तकनीकों का उपयोग करते हैं। यदि पुष्पक विमान की विशेषताओं को देखें, तो यह आधुनिक विमानों से भी अधिक उन्नत प्रतीत होता है। उदाहरण के लिए
 स्वचालित उड़ान आज के ऑटोपायलट सिस्टम जैसा
 आकार बदलने की क्षमता जो अभी संभव नहीं है
 बिना ईंधन के संचालन जिसका कोई प्रमाण नहीं
इससे यह स्पष्ट होता है कि पुष्पक विमान एक कल्पनात्मक या दिव्य अवधारणा हो सकती है।

धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

पुष्पक विमान का भारतीय संस्कृति और धर्म में विशेष स्थान है। यह न केवल एक वाहन के रूप में, बल्कि शक्ति, वैभव और दिव्यता के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है। रामायण में इसका उल्लेख भगवान राम की विजय और उनके अयोध्या लौटने की कहानी को और भी भव्य बनाता है।

रावण का पुष्पक विमान किसने बनाया था

पुष्पक विमान एक अद्भुत पौराणिक कल्पना है, जिसका निर्माण देव शिल्पकार विश्वकर्मा द्वारा किया गया माना जाता है। यह विमान पहले कुबेर के पास था, फिर रावण ने इसे छीन लिया और अंत में भगवान राम ने इसे पुनः कुबेर को लौटा दिया। हालांकि इसके वास्तविक अस्तित्व के कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं हैं, लेकिन यह भारतीय संस्कृति, धर्म और साहित्य का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। पुष्पक विमान हमें यह सिखाता है कि प्राचीन भारतीय ग्रंथों में कितनी समृद्ध कल्पना शक्ति और ज्ञान था, जो आज भी लोगों को प्रेरित करता है।

पुष्पक विमान के वर्तमान साक्ष्य

वर्तमान समय में इससे सम्बन्धित कोई साक्ष्य नहीं मिले है लेकिन इस विमान की चर्चा वाल्मीकि रामायण, सुंदर कांड, युद्ध कांड में मिलती जिसमें बताया गया था कि यह  किसी ईंधन से नहीं बल्कि चालक कि मन की गति से यात्रा करने में सक्षम था। बताया जाता है कि यह विमान सोने का बना था जो अपने ऊपर विराजमान यात्रियों की संख्या अनुसार अपना अकार छोटा बड़ा कर सकता था। देखा जाये तो रावण की लंका त्रिकूट पर्वत श्रृंखला के तीन पर्वत शिखर सुबेल, नील और सुंदर में से सुबेल पर्वत कि चोटी पर बसी हुई थी । जोकि वर्तमान समय में श्री लंका का एक प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है। चोटि पर बने इस महल से उतरने के लिए पहाड़ी को काटा गया है। 

लेकिन यहां से उतरना युद्ध के दौरान इतना आसान नहीं था जो दर्शाता है कि रावण अपने महल से नीचे आने के लिए इस पुष्पक विमान का ही इस्तेमाल करता रहा होगा। जोकी आप इस पर्यटन स्थल की यात्रा से समझ सकते है।
वर्तमान समय में इसरो द्वारा पुष्पक नामक RLV-LEX यानी Reusable Launch vehicle नामक एक विमान का आविष्कार किया है। इसके अलावा वर्तमान समय में इस विमान सम्बन्धित कोई उचित प्रमाण नहीं मिले है जिससे यह प्रमाणित हो सके कि पुष्पक विमान का कोई अस्तित्व था भी य नहि।

बुधवार, 25 मार्च 2026

भीम राव रामजी अम्बेडकर

 
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प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम भारतीय संविधान के जनक अथवा निर्माता बी आर अम्बेडकर के बारे में चर्चा करेंगे तथा साथ ही उनके द्वारा किए महत्वपूर्ण कार्य तथा उनके जीवन संघर्ष के बारे में चर्चा करेंगे। इसके साथ ही हम उनके द्वारा जातिवाद पर दी गयी परिभाषा पर चर्चा करेंगे और देखेंगे की कैसे वर्तमान समय में भी जातिवाद भारत जैसे देश के लिए एक बड़ी समस्या है जो कि देश की तरक्की में बहुत बडे़ रोड़े या पत्थर के समान काम करती है। इसके साथ ही हम देश-विदेश में उनके नाम पर बनी यूनिवर्सिटी ,कालेज और प्रतिमाओं के इतिहास के बारे में चर्चा करेंगे।

जन्म और नामकरण

इनका जन्म 14 अप्रैल 1891 में महाराष्ट्र के रत्नागिरी ज़िले के अंबादवे मंदनगढ तालुका में हुआ था। वे अपनी पिता की 14वीं संतान थे। उनके बचपन का नाम सकपाल था। उनके पिता जी ब्रिटिश सेना में सुबेदार के पद पर असित थे। भीम राव रामजी अम्बेडकर के पिता का नाम रामजी मालोजी सकपाल था और माता का नाम भीमाबाई था। इनके नाना का नाम लक्ष्मण मुरबडकर था। अम्बेडकर साहब का जन्म महार जाति में हुआ था जो कि उस समय दलित जाति के रुप में चर्चित थी यह वह समय था जब जातिवाद अपने चरम पर था। परिणामस्वरूप वे अच्छे परिवार से होने के नाते वे स्कूल जाते थे मगर उनके कक्षा में बैठने पर प्रतिबंध था।



इसके साथ ही उन्हें शिक्षक सहायता बहुत ही कम प्रदान की जाती थी। इसके साथ ही उनके पीने के पानी को छूने पर प्रतिबंध था अगर उन्हें प्यास लगती थी तो चपरासी द्वारा ऊपर से उन्हें पानी पिलाया जाता था अगर चपरासी ने आये तो उस दिन उन्हें पीने के पानी से वंचित रखा जाता था। उनके 14 भाई-बहनों में केवल बलराम,आनंदराव और सकपाल और दो बहनें मंजुला और तुलसा ही जीवित बचीं थी। 

जिनमें से सिर्फ उन्होंने ही हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण की थी। हलांकि उनका उप नाम सकपाल था लेकिन हाईस्कूल की परीक्षा के  दौरान उनके पिता जी ने उनका नाम अंबदावेकर दर्ज कराया था क्योंकि वे अपने पैतृक गांव अंबदावे से आते थे। वर्तमान समय में भी भारत देश के कुछ क्षेत्रों में यह प्रथा आज भी है जहां अपने नाम के साथ अपने गांव का नाम जोड़ा जाता है उदाहरण के लिए मशहूर पंजाबी गीतकार दिल जीत दोसांज के नाम में दोसांज शब्द उनके गांव का नाम है।

मराठी ब्राह्मण शिक्षक कृष्ण जी केशव

सकपाल को शिक्षक सहायता सीमित मिलने पर भी वे एक मेधावी छात्र थे जिसके कारण वे जल्द ही कृष्ण जी केशव के प्रिय छात्र बन गये। इन्होंने ही सकपाल का  नाम अंबादावेकर से बदल कर अम्बेडकर किया था वे ही आगे चलकर सकपाल के शिक्षा ग्रहण करने के मार्ग दर्शक और पहले गुरु बनें। हलांकि हिन्दू धर्म कि मान्यताओं के अनुसार माता-पिता को ही पहला गुरु कहा गया है क्योंकि वे ही हमारी प्रारम्भिक एवं सामाजिक शिक्षा को पूर्ण करते है लेकिन ज्ञान देने वाले व्यक्ति का दर्जा उनसे ऊपर ही माना गया है। उनके धार्मिक व आध्यात्मिक गुरुओं में सर्वप्रथम नाम महात्मा गौतम बुद्ध, ज्योति बा फूले, संत कबीर का आता है। इन सभी बातों के आलावा हम उन्हे भीमराव रामजी अम्बेडकर ,भिवा ,भिम ,विश्व रत्न ,महामानव ,बाबा साहेब ,युगपुरुष ,सकपाल आदि नामों से जानते हैं।

इनकी पहली पत्नी का नाम रामाबाई था तथा1935 में उनके निधन के बाद उनकी  दूसरी पत्नी जिनका नाम पहले सविता अम्बेडकर था शादी के बाद उनका नाम सविता अम्बे़डकर हो गया। उनकी पहली पत्नी से उन्हें 5 संतानें हुई जिनमें से सिर्फ यशवंत अंबेडकर ही जीवित बचें तथा दूसरी पत्नी से उन्हें गंगाधर,रमेश बेटी इंदु और राजरत्न थे। 6 दिसंबर 1956 में नई दिल्ली में 65 साल की उम्र में उनका निधन हो गया।

जातिवाद पर उनके विचार

अम्बेडकर साहब का मानना था कि भारत देश में जातिवाद एक रिवार्ड प्रक्रिया की तरह काम करता है जिसके कारण यह प्रत्येक जाति के लोगों को मानने के लिए उत्साहित करता है। उदाहरण के लिए मान लीजिए की सभी जातियां एक लकड़ी की सीढ़ी है जिसमें सबसे ऊपर का डंडा सबसे उच्च जाति वर्ग का है और सबसे नीचे का डंडा सबसे निम्न जाति वर्ग का है। अब हर एक जातिवर्ग के ऊपर एक उच्च जातिवर्ग बैठा हुआ जो अपने से नीचे बैठे जातिवर्ग के लोगों को दबाता है य उनका शोषण करता है यह प्रक्रिया क्रमवार तरीके से चलती रहती है। यहां प्रत्येक डंडे या जाति के ऊपर का डंडा अपने को सम्मानित समझता जो कि रिवार्ड प्रक्रिया की तरह काम करती है।

यहां दिलचस्प बात यह है कि प्रत्येक जातिवर्ग का एक समझदार व्यक्ति यह जानता है कि यह एक झुठा सम्मान है जो कि समाज के लिए बिना किसी महत्वपूर्ण कार्य को किए बिना दिया गया है। 

अंत में वह समझता है कि यह सम्मान  जातिगत भेदभाव के बढ़ावा देने के लिए दिया गया है मगर वह इस जातिवाद का विरोध इस लिए नहीं कर पाता क्योंकि उसे डर होता है कि कहीं उसके जातिवर्ग और सम्मान को न छिन लिया जाये क्योंकि ऐसा करने पर सबसे पहले उसी के जातिवर्ग के लोग उसकी आलोचना करना प्रारम्भ कर देंगे।इस प्रक्रिया का सबसे बुरा असर उस व्यक्ति पर पड़ता है जो सच में किसी प्रतिभा का धनी होता है मगर उच्च जाति वर्ग द्वारा उसे दबा दिया जाता है और उसके विचारों को स्वयं के विचार बना कर प्रस्तुत किया जाता है।.
 

शिक्षा एवं उपाधि

  • 1.1897 में उनके पिता की  नौकरी जाने के बाद उनका परिवार मुंबई चला गया जहां उन्होंने एल्फिंस्टन हाई स्कूल से हाईस्कूल की परीक्षा 1907 में उत्तीर्ण की। 1906 में 15 साल की उम्र में उनकी 15 अप्रैल 1848 में शादी 9 वर्ष की रामाबाई की गई।
  • 2.1912 में उन्होंने बॅाम्बे विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान में डिग्री प्राप्त कर ली थी। इसी बीच अपने बीमार पिता के देखने के लिए मुंबई लौटना पड़ा जिनकी 2 फरवरी 1913 में मृत्यु हो गई।
  • 3.1913 में 22 साल की उम्र में बड़ौदा राज्य की छात्रवृत्ति योजना के तहत तीन वर्षों के लिए 11.50 पाउंड प्रति माह की राशि प्राप्त होने लगी। इस छात्रवृत्ती का संचालन बड़ौदा के गायवाड़ सायजीराव गायवाड़ तृतीय द्वारा किया गया था। जिसके माध्यम से सकपाल को न्यूयार्क की कोलंबिया विश्वविद्यालय से शिक्षा ग्रहण करने का अवसर मिला, जहां उनकी मुलाकात अपने आजीवन परम मित्र रहे नवेल भाथेना से हुई। 1915 में सकपाल ने अर्थशास्त्र में स्नातक की डिग्री प्राप्त की  इसके साथ ही समाजशास्त्र, इतिहास,दर्शन शास्त्र और मानव शास्त्र जैसे अन्य विषयों का अध्ययन किया।
  • 4.1915 के समय काल के दौरान ही उन्होंने प्राचीन वाणिज्य विषय शोध प्रबंध जिससे थीसिस भी पूर्ण की।
  • 5.1916 में सकपाल ने अपनी दूसरी थीसिस भारतीय राष्ट्रीय लाभांश एक ऐतिहासिक और विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया तथा इसके साथ ही एम.ए की शिक्षा पूर्ण की। इसी समय काल के दौरान अम्बेडकर साहब ने ग्रेज़ इन में बार कोर्स  के लिए दाखिला लिया। इसके साथ ही उन्होंने लंदन स्कूल आप इकोनामीक्स में भी दाखिला लिया।
  • 6. 9 मई 1916 को उन्होंने मानव विज्ञानी अलेक्जेंडर गोल्डन वाइज़र द्वारा आयोजित सेमिनार के समक्ष भारत में जातियां, उनकी क्रिया विधि ,उत्पत्ति और विकास नामक अपना रिसर्च पत्र प्रस्तुत किया।
  • 7. 1921में मास्टर डिग्री पूर्ण की और रुपये की समस्या इसकी उत्पत्ति और इसके समाधान पर अपनी तीसरी थीसिस लिखी।
  • 8. 1927 में कोलंबिया में अर्थशास्त्र में पी एच डी की डिग्री प्राप्त की।
  • 9. बताते चले की 1952 के समय काल तक उनके पास 32 डिग्री और 64 विषयों तथा 9 भाषाओं का ज्ञान हासिल कर विश्व रिकार्ड बनाया था। उनके बाद विश्व के सबसे पढ़े लिखे व्यक्ति का रिकार्ड डॅा0 श्री कांत जिचकर द्वारा बनाया गया 1973-1990 के समय काल तक इन्होंने 42 विश्वविद्यालयों से 20 अधिक से डिग्रियां हासिल की वे महाराष्ट्र के रहने वाले थे। 

उपाधि

1.बाबा साहब की उपाधि- 1927 इस उपाधि के सी.बी.खैरमोड़े साहब ने दी।
2. उन्होंने आई पी एस एवं आई ए एस की परीक्षा भी दी लेकिन दोनों पदों से इस्तीफा दे दिया। 25 साल की उम्र में वे महाराष्ट्र के एस एल ए और एक बार महाराष्ट्र के मंत्री भी रह चुकें है।
3.1952 एवं 1953 में कोलंबिया विश्वविद्यालय एवं उस्मानिया विश्वविद्यालय से मानद डाक्टरेट की उपाधि दी गई।
4. 1954 में नेपाल में आयोजित विश्व बौद्ध परिषद द्वारा बौद्ध भिक्षुओं द्वारा उन्हें बोधिसत्व की उपाधि दी गयी।
5.1990 में उनके मरणोंपरांत भारत सरकार द्वारा सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
सोर्स विकीपिडीया