प्रस्तावना
प्रस्तुत लेख में हम भारतीय इतिहास के विवादित ग्रंथ मनुस्मृती के इतिहास के बारे में चर्चा करेंगे इसके साथ ही हम देखेंगे की इस ग्रंथ के कौन कौन से वो श्लोक है जो विवाद का मुख्य कारण है। इस ग्रंथ पर यह आरोप भी लगता रहा है कि यह किताब कालसुत्रों के आधार पर उनके श्लोकों को निकाल कर बनाई गई है। कुछ लोगों का तो मानना यह भी है कि यह किताब मानवों के अधिकारों का दमन करती है।
इतिहास
भारुचि
मनुस्मृती के सबसे प्राचीन लेखक का खिताब इन्ही के दिया जाता है इतिहासकारों के अनुसार इन्होंने इस ग्रंथ की रचना 10शताब्दी से उत्तरार्ध तथा 11वीं शताब्दी के आरम्भिक काल में की थी। मगर विदेशी लेखक अलिवेल इस ग्रंथ की रचना का समय काल 600 से 800 शताब्दी के बीच का मानते है।
इसके आलावा मनुस्मृती के कयी संस्करण भी प्रकाशित भी किए गये है जैसे मनुटिका जिसकी रचना 11वी. शताब्दी में की गयी थी इसके अलावा मानवर्थ मुक्तावली जैसे नाम भी आते है। अब तक मनुस्मृती सम्बन्धित पचास से भी ज्यादा पांडुलिपियां मिल चुकी है जो की 18वी. शताब्दी से अब तक खोजी गईं हैं।
खास बात यह है कि इन सभी पांडुलिपियों का सिधा सम्बन्ध सीधे तौर पर मनुस्मृती से नहीं है । बस इतना पता चलता है कि इन सभी पांडुलिपियों के श्लोकों का प्रयोग मनुस्मृती में किया गया है।
नामकरण
मनुस्मृती शीर्षक एक आधुनिक शब्द है जो संस्कृत से लिया गया है। लेकिन इसके वर्तमान मूल में ऐसा कोई विभाजन नहीं था। किताब के मुख्य रुप को चार भागों में विभाजित किया गया है। 1 इसमें दुनिया की रचना 2 धर्म का स्रोत 3 चारो सामाजिक वर्गों का धर्म 4 कर्म का नियम पुनर्जन्म और अंतिम मुक्ति के बारे में चर्चा कि गई है।
खास बात यह कि इन प्राप्त पांडुलिपि में इसे आचार संहिता के रुप में परिभाषित किया गया है। इसके अलावा हम मनुस्मृती को मानव धर्म शास्त्र के रुप में भी जानते है। वेदों के बाद यह हिन्दू धर्म का महत्वपूर्ण ग्रंथ है।
मुख्य ग्रंथ को श्लोकों में परिभाषित किया गया है। यह ग्रंथ एक संवाद को प्रदर्शित करता है जिसमें एक शिष्य अपने गुरु से सवाल करता है यहां गुरु स्वयं मनु है । शुरुआत के 58 श्लोक मनु को समर्पित किए गये हैं। एवं बाकी के श्लोक उनके शिष्य भृगु को समर्पित किए गये हैं।
खास रचनात्मक श्लोक
यहां हम श्लोक न लिखकर उनका अर्थ लिख रहे है। जैसे 1. धर्म से सभी शूद्र होते है, कर्मों के आधार पर उनका नया वर्ण बनता है। अतः सभी द्विज कहलाते है।
2.धर्म के 10 लक्षण है जैसे धैर्य क्षमा संयम चोरी न करना स्वच्छता इन्द्रियों को वश में रखना बुद्धि विद्या सत्य और क्रोध न करना आदि।
3.किसी को अपना जूठा न खिलाना और न ही किसी का जूठा न खाना, न अधिक भोजन करना और न ही भोजन करने के बाद हाथ मुंह धोये बिना इधर उधर जाना।
4.जो मनुष्य धर्म शास्त्र एवं वेद शास्त्र के अनुकूल तर्क द्वारा अनुसंधान और चिन्तन करता है वही धर्म के वास्तविक स्वरुप को समझ पाता है।
मनुस्मृती के विवादित श्लोक
1.अध्याय 9 श्लोक 3
महिला को कभी स्वतंत्रता नहीं मिलनी चाहिए, बचपन में पिता , युवावस्था में पति और बुढ़ापे में पुत्रों को उसे नियंत्रण में रखना चाहिए।
2. अध्याय 10 श्लोक 122
शूद्रों को भोजन के लिए दूसरों का जूठा अन्न, पहनने के लिए फटो पुराने कपड़े और बिछाने के लिए टूटी-फूटी चटाई य धान के पौधे या पुआल दिया जाना चाहिए।
3. अध्याय 8 श्लोक 270
यदि कोई नीची जाति का व्यक्ति ऊंची जाति के व्यक्ति को जानबूझकर नुकसान पहुंचाता है य कटु शब्द कहता है तो उसे अत्यंत कठोर शारीरिक दंड देना चाहिए य जीभ काट देनी चाहिए जबकि उच्च वर्ग के लोगों के लिए सज़ा का अनुपात काफी कम है।
4. अध्याय 8 श्लोक 271
यदि कोई शूद्र उच्च वर्ग के व्यक्ति का नाम और जाति लेकर अहंकार से अपमान करता है तो उसके मुंह में 10 अंगुलि के बराबर लोहे की जलती कील डाल देनी चाहिए।
5.अध्याय 8 श्लोक 272
यदि कोई शूद्र गर्व से उन्हें धर्म उपदेश देता है तो राजा को उसके कान और मुंह में खौलता हुआ तेल डलवा देना चाहिए।
6.अध्याय 8 श्लोक 279
यदि कोई निम्न वर्ग का व्यक्ति श्रेष्ठ वर्ण के व्यक्ति को अपने जिस अंग से नुकसान पहुंचाता है तो राजा को उसका वही अंग काट देना चाहिए।
7.अध्याय 8 श्लोक 268
अगर कोई उच्च वर्ग का व्यक्ति अपने से निम्न वर्ग के व्यक्ति का अपमान करता है य उपरोक्त सभी दण्ड निम्न वर्ग के व्यक्ति को देता है तो राजा को उसे सिर्फ मामूली आर्थिक दण्ड देना चाहिए य सर मुण्डवा कर देश से निकाल देना चाहिए।
8. अध्याय 8 श्लोक 379/380
ब्राह्मण चाहे कितना भी बड़ा अपराध क्यों न करें उसे कभी भी मृत्यु दंड नहीं देना चाहिए य अंग भंग जैसी शारीरिक सजा नहीं दी जा सकती है, उसे केवल देश निकाला य मुंडन की सजा दी जा सकती है।
दोस्तों शायद उपरोक्त कारणों एवं भेदभाव के चलते ही बी आर अम्बेडकर ने मनुस्मृती को जलाया था और संविधान को सर्वोपरि पुस्तक का दर्जा दिया था। इतिहास में बहुत सी ऐसी चीज़े और किताबें मिलती है जो की भेदभाव के बढ़ावा देतीं है। जिनमें बदलते वक्त के साथ परिवर्तन की जरूरत है।
क्योंकि हमारा मानना है कि प्राकृत ने हम सभी को बनाया है और समय के साथ यह हमें मिटायेगी भी। प्राकृति हमारे साथ-साथ सभी जीव- जन्तुओं का संरक्षण भी करती है। ऐसे में न तो कोई मनुष्य बहुत बड़ा हो सकता है और न ही बहुत छोटा।
तो इस प्रकार इस ग्रंथ की ज्यादातर मान्यताऐं गलत है। क्योंकि धर्म को मानने के लिए मनुष्य का होना आवश्यक है, कुछ चुनिंदा लोग मात्र कुछ भी नियम बनाकर किसी धर्म को नहीं चला सकते यह हम समझते हैं। खास बात यह है कि इस प्रकार के ग्रंथों को मनुष्यों द्वार ही लिखा गया है तो जाहिर सी बात है वे अपने भी विचार इन ग्रंथों में पिरोते होंगे।
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