Indian History reveal the Past

हमारे इस ब्लॉग में भारतीय इतिहास, सांस्कृतिक इतिहास, राजवंशों आंदोलन स्टार्टअप टेक्नोलॉजी कला और वास्तुकला तथा आर्थिक इतिहास से संबंधित विषयों पर जानकारी दी जाती है। हम कम से कम शब्दों में ज़्यादा से ज़्यादा जानकारी देने की कोशिश कर रहे हैं।

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2026-10-12

ऊदा देवी

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प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम महान क्रांतिकारी महिला स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ऊदा देवी के बारे में बात करने जा रहे है जिन्हें हम उदय देवी पासी के नाम से भी जानते है। लखनऊ विद्रोह के दौरान उन्होंने एक गुप्त बंदूक निशाने के बाज जिसे अंग्रेजी में स्नाइपर भी कहते है की भूमिका निभा थी।

उनके प्रारम्भिक जीवन के बारे में ज्यादा साक्ष्य नहीं मिल पायें है मगर इसका मतलब यह नहीं है कि उनके कार्यों के हमारे द्वारा भुलाया जा सके। लखनऊ विद्रोह के दौरान उनकी अहम भूमिका थी।

जीवन परिचय

उदय देवी का जन्म उत्तर प्रदेश के लखनऊ के पास उजियरांव जिसे वर्तमान समय में गोमती नगर  एक साधारण गरीब परिवार में हुआ था। उनके प्रारंभिक जीवन के बारे में ऐतिहासिक दस्तावेज बहुत कम मिल पायें हैं जिनके कारण उनके बारे में अधिक जानकारी नहीं मिल पायी है। बताया यह भी जाता है कि उस समय काल के दौरान आम और गरीब तबके के स्वतंत्रता सेनानियों का लिखित ब्योरा कम ही रखा जाता था।

ऊदा देवी का विवाह मक्का पासी से हुआ था जो कि अपने समय के जाने माने पहलवान थे और अवध के नवाब वाजिद अली शाह की सेना में सैनिक थे। विवाह के बाद उन्होंने लखनऊ में समाज संघर्ष को काफी करीब से देखा था। जब ब्रिटिश सेना ने अवध के नवाब को उनके पद से हटा दिया और लखनऊ में ब्रिटिश राज की स्थापना की।

तब लखनऊ में ब्रिटिश राज के खिलाफ असंतोष फैल गया जिसके परिणामस्वरूप लखनऊ विद्रोह की शुरुआत हुई। इस समय काल के दौरान ऊदा देवी के परिवार पर भी इस संघर्ष का गहरा असर पड़ा। 1857 को विद्रोह के दौरान जब ब्रिटिश सेना ने लखनऊ की रेजिडेंसी को घेर लिया और भीषण संघर्ष छेड़ दिया तब ऊदा देवी ने चुपचाप अपनी भूमिका तैयार की विद्रोहियों के साथ युद्ध में शामिल हुईं।

इस प्रकार उन्होंने तथा अन्य वीर महिलाओं पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर युद्ध में अपने भूमिका अदा की।

विद्रोह की घटना

1857 की वर्षा ऋतु में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बढ़ते प्रभुत्व के विरुद्ध दिल्ली झांसी और कानपुर के क्षेत्रों में एक व्यापक विद्रोह भड़का इस विद्रोह के दौरान ही लखनऊ में भी विद्रोह भड़का जिसके तहत विद्रोहियों ने लखनऊ को विद्रोहियों ने घेर लिया 

इस बीच लखनऊ में 2200 ब्रिटिश सैनिकों की एक छोटी टुकड़ी गोमती नदी के किनारे विद्रोहियों से घिरी हुई थी और उनके पास पर्याप्त राशन समाप्त हो गया था। जिसके कारण भूख से मरने की अपेक्षा ब्रिटिश सैनिकों का राहत दस्ता आगे बढ़ा जिनके पास पर्याप्त हथियारों की भी कमी थी का सामना ऊदा देवी की विद्रोही सेना से होता है।

सिकंदर बाग का युद्ध

क्रांतिकारी ऊदा देवी ने 16 नवंबर 1857 में सिकंदर बाग की लड़ाई में हिस्सा लिया था। वे अपनी बटालियन को निर्देश देने के बाद स्वयं एक पीपल के पेड़ पर चढ़ गईं और आगे बढ़ते ब्रिटिश सैनिकों पर गोलीबारी शुरु कर दी। एक ब्रिटिश अधिकारी ने उन्हें देख लिया वे उस समय अपने सहयोगियों को निर्देश दे रही थी साथ ही उन्हें भी गोलियों से कई घाव लगे थे।

अतः अंग्रेजों द्वारा देखे जाने के कारण उन्हें गुप्त स्नाइपर समझ कर ब्रिटिश अधिकारियों ने पेड़ की तरफ सैनिकों को गोली चालने का आदेश दिया जिसके परिणामस्वरूप ऊदा देवी जमीन पर गिरकर मारीं गईं। इस घटना का वृतांत देते हुए विलिय फोर्ब्स मिटचेल अपनी किताब रेमिनिसेंस आफ द ग्रेट म्यूटिनी में लिखते है कि वे दो भारी पुराने पैटर्न की घुड़सवार सेना पिस्तौल से लैस थीं जिनमें से एक अभी भी भरी हुई थी और उनकी बैल्ट में लटक रही थी।

और उनकी गोलियों की  थैली अभी भी आधी भरी हुई थी जबकि हमले से पहले सावधानी पूर्वक तैयार किए गए अपने ठिकाने से उन्होंने लगभग आधे दर्जन से अधिक लोगों को मार गिराया था।

भारत सरकार द्वारा उनके नाम पर किए कार्य

उत्तर प्रदेश सरकार ने उनके नाम पर 20 मार्च 2021 को प्रांतीय सशस्त्र आरक्षित पुलिस बल महिला बटालियन की स्थापना की  जिसे हम PAC के नाम से भी जानते है। इसके साथ ही सरकार ने घोषणा की कि ऊदा देवी के साथ ही रानी अवंतीबाई झलकारीबाई के नाम पर भी पीएसी महिला बटालियन की स्थापना की जायेगी।

इस सभी बयान यूपी सरकार के तत्कालीन मुख्य मंत्री योगी आदित्य नाथ द्वारा रानी अवंतीबाई लोधी की पुण्य तिथि पर आयोजित एक कार्यक्रम सभा को संबोधित करते हुए कहा गया।

हाल ही में लखनऊ में वीरांगना ऊदा देवी के शौर्य को चिरस्थाई बनाने के लिए उनकी भव्य प्रतिमा की स्थापना सिकंदर बाग और वृंदावन कालोनी क्षेत्र के पास स्थापित की गई है जिसका अनावरण यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ जी द्वारा किया गया है।

इसके साथ ही नई पीढ़ी को देश के गुमनाम नायकों और स्थानीय स्वतंत्रता सेनानियों के इतिहास से जोड़ने के लिए बेसिक शिक्षा परिषद के पाठ्यक्रम की किताबों में उनके जीवन और संघर्ष से जुड़े अध्यायों को शामिल किया गया है।

हर साल 16 नवंबर को उनके बलिदान दिवस के दिन सरकारी स्तर पर विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है जहां देश के बड़े नेता और प्रशासनिक अधिकारी उनके बलिदान को याद करते हुए उन्हें नमन करते है।

खास बात यह भी है कि वर्तमान समय में सरकार द्वारा उन सभी ऐतिहासिक स्थलों और स्मारकों का पुनरुद्धार कराया जा रहा है जिनका संबंध 1857 की क्रांति और स्वतंत्रता सेनानियों के इतिहास से जुड़ा हुआ है।

उत्तर प्रदेश के अलावा अन्य राज्यों में भी उनके सम्मान में कार्य किए गए है। उदाहरण के लिए मध्य प्रदेश के महू छावनी में उनकी मूर्ति की स्थापना और लोकार्पण किया गया है ताकि देश उनको स्मरण रख सके।

उनके नाम पर एक पंजीकृत सामाजिक संगठन की स्थापना की गई है ताकि उनके आदर्शों महिला सशक्तिकरण और सामाजिक न्याय के विचारों को आगे बढ़ाया जा सके।  

निष्कर्ष

ऊदा देवी का जीवन यह सिद्ध करता है कि देश की स्वतंत्रता के लिए केवल पुरुष ही नहीं बल्कि महिलाएं भी उतनी ही आक्रामकता और वीरता से आगे आईं। सिकंदर बाग के पेड़ पर बैठकर अकेले ही ब्रिटिश सेना के दांत खट्टे कर देना उनके अदम्य साहस का सर्वोच्च उदाहरण है।

वे समाज के उस वंचित और शोषित वर्ग से आती थीं जिन्हें पारंपरिक इतिहास में लंबे समय तक उचित स्थान नहीं मिल पाया था। उनका संघर्ष यह बताता है कि देश की आजादी में हर वर्ग और हर जाति के लोगों ने बराबर का बलिदान दिया है।

इसके साथ ही ऊदा देवी जैसी वीरांगनाओं का जीवन हमें यह सिखाता है कि इतिहास के पन्नों को पहचानना और सम्मन देना हमारा राष्ट्रीय दायित्व है जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर हमारी वर्तमान स्थिति को अग्रसर किया। 

उनका जीवन आज की पीढ़ी और विशेषकर महिलाओं के लिए प्रेरणा स्रोत है। उनका बलिदान सिखाता है कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अन्याय के खिलाफ डटकर मुकाबला कैसे किया जाता है। सरकार और समाज द्वारा उनके नाम पर बनाई गई बटालियन और मूर्तियां और स्मारक केवल उनके नाम को ही जीवित नहीं रखते बल्कि आने वाली पीढ़ियों को देश प्रेम और देश भक्ति का निरंतर पाठ पढ़ाते रहेंगे।

2026-10-11

लखनऊ विद्रोह

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प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में लखनऊ विद्रोह के दौरान हुई प्रमुख घटनाओं साथ विद्रोह के भड़कने के प्रमुख कारण तथा अंग्रेजों द्वारा विद्रोह को दबाने के प्रमुख प्रयासों के बारे में चर्चा की गयी है। खास बात यह है कि यह विद्रोह 1857 के दौरान ही हुआ था जिसमें मुख्य रुप से सैनिकों ने इसकी शुरुआत की।

दरअसल भारतीय सैनिक पहले से ही कम वेतन पदोन्नति की सीमित अवसरों साथ ही गाय और सूअर चमड़ी का प्रयोग हुई कारतूसों को न चलाने और अवध क्षेत्र के पुनर्गठन से जुड़ी शिकायतों के कारण हुआ था। 

ब्रिटिश अधिकारों ने अवध के नवाब वाजिद अली शाह को प्रशासन को ठीक से न चला पाने के आरोप में उनके पद से हटा दिया तथा अवध की राजधानी लखनऊ पर अपना अधिकार स्थापित करने के साथ ही वाजिद अली शाह को कलकत्ता में ले जाकर नजरबंद कर दिया।

अपने अपमान का बदला लेने के लिए वाजिद अली शाह की पत्नी बेगम हज़रत महल ने आगे आकर कमान संभाली और अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह छेड़ दिया।

परिचय

अवध राज्य को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने अधीन कर लिया था और नवाब वाजिद अली शाह को विद्रोह शुरू होने से एक साल पहले कलकत्ता निर्वासित कर दिया गया था। ईस्ट इंडिया कंपनी की इस मनमानी कार्रवाई का राज्य और भारत के अन्य हिस्सों में कड़ा विरोध हुआ।

नव अधिग्रहित क्षेत्र में नियुक्त पहले ब्रिटिश आयुक्त वास्तव में राज्यपाल कवरली जैक्सन था। उसका व्यवहार अकुशल था और एक अत्यंत अनुभवी प्रशासक सर हेनरी लॉरेंस ने विद्रोह शुरू होने से मात्र छह सप्ताह पहले पद भार ग्रहण किया था।

पिछले कुछ वर्षों में ईस्ट इंडिया कंपनी की बंगाल प्रेसीडेंसी सेना के सिपाही लगातार परेशान होते जा रहे थे क्योंकि उन्हें लगता था कि कंपनी के धर्म प्रचार के प्रयासों से उनके धर्म और रीति-रिवाजों को खतरा है।

लॉरेंस अपने अधीन भारतीय सैनिकों जिनमें अवध राज्य की पूर्व सेना से भर्ती किए गए अवध अनियमित सैनिकों की कई इकाइयाँ शामिल थीं के विद्रोही स्वभाव से भलीभांति परिचित थे।18 अप्रैल को उन्होंने गवर्नर जनरल लॉर्ड कैनिंग को असंतोष के कुछ संकेतों के बारे में आगाह किया और कुछ विद्रोही टुकड़ियों को दूसरे प्रांत में स्थानांतरित करने की अनुमति मांगी।

विद्रोह की शुरुआत एनफील्ड राइफल के प्रचलन से हुई ऐसा माना जाता था कि इस हथियार के कारतूसों पर गोमांस और सूअर की चर्बी का मिश्रण लगा होता था जिससे हिंदू और मुस्लिम दोनों भारतीय सैनिकों का अपमान होता था। 1 मई को अवध की सातवीं अनियमित पैदल सेना ने कारतूस को चबाने से इनकार कर दिया और 3 मई को अन्य रेजिमेंटों ने उन्हें निहत्था कर दिया।

10 मई को मेरठ में भारतीय सैनिकों ने खुले आम विद्रोह कर दिया और दिल्ली की ओर कूच किया। जब इसकी खबर लखनऊ पहुंची तो लॉरेंस ने संकट की गंभीरता को समझा और अपने घरों से पेंशन भोगियों के दो समूहों को बुलाया।

जिनमें एक सिपाहियों का और दूसरा तोपखाने के सैनिकों का। इन पेंशन भोगियों सिखों और कुछ हिंदू सिपाहियों की वफादारी के कारण ही रेजिडेंसी की सफल रक्षा संभव हो पाई।

प्रारम्भिक घटना

23 मई को लॉरेंस ने रेजिडेंसी को मजबूत करना और घेराबंदी के लिए रसद जुटाना शुरू कर दिया बड़ी संख्या में ब्रिटिश नागरिक दूर दराज के जिलों से वहां पहुंचे। 30 मई मुस्लिम त्योहार ईद-उल-फितर को लखनऊ में तैनात अवध और बंगाल की अधिकांश सेना ने खुले आम विद्रोह कर दिया। 

स्थानीय रूप से भर्ती किए गए पेंशनभोगियों के अलावा लॉरेंस के पास ब्रिटिश 32वीं पैदल सेना रेजिमेंट की अधिकांश टुकड़ियां भी उपलब्ध थीं और वे विद्रोहियों को शहर से खदेड़ने में सफल रहे।

4 जून को लखनऊ से 82 किलो मीटर दूर स्थित एक बड़े और महत्वपूर्ण केंद्र सीता पुर में विद्रोह हुआ। इसके बाद प्रांत के सबसे महत्वपूर्ण शहरों में से एक फैजाबाद में भी विद्रोह हुआ और दरिया बाद सुल्तानपुर और सलोन में भी विद्रोह भड़क उठे। इस प्रकार दस दिनों के भीतर अवध में ब्रिटिश सत्ता लगभग समाप्त हो गई।

30 जून 1857

30 जून को लॉरेंस को पता चला कि विद्रोही लखनऊ के उत्तर में इकट्ठा हो रहे हैं और उपलब्ध जानकारी की गुणवत्ता कम होने के बावजूद उन्होंने एक विस्तृत टोही अभियान का आदेश दिया। हालाँकि उन्हें सैन्य अनुभव अपेक्षाकृत कम था फिर भी लॉरेंस ने स्वयं इस अभियान का नेतृत्व किया। यह अभियान बहुत सुव्यवस्थित नहीं था।

सैनिकों को भीषण गर्मी में दिन के सबसे गर्म समय में बिना भोजन और पर्याप्त पानी के मार्च करने के लिए मजबूर होना पड़ा, और चिनहट की लड़ाई में उनका सामना बरकत अहमद के नेतृत्व में एक सुव्यवस्थित विद्रोही सेना से हुआ, जिसमें घुड़सवार सेना और खाइयों में स्थापित तोपखाना शामिल था।

जब उन पर हमला हो रहा था लॉरेंस के कुछ सिपाही और भारतीय तोपची विद्रोहियों के साथ मिल गए उन्होंने अपनी तोपों को उलट दिया और उनके निशान काट दिए ।  उनके थके हुए ब्रिटिश सैनिक अव्यवस्थित रूप से पीछे हट गए। कुछ रेजिडेंसी के पास ही लू लगने से मर गए।

13 वीं  नेटिव इन्फैंट्री के लेफ्टिनेंट विलियम जॉर्ज क्यूबिट को कई साल बाद विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित किया गया क्योंकि उन्होंने पीछे हटने के दौरान 32 वीं  रेजिमेंट ऑफ फुट के तीन जवानों की जान बचाई थी।

उनका यह कार्य कोई अनोखा नहीं था। ब्रिटिशों के प्रति वफादार सिपाहियों विशेष रूप से 13 वीं  नेटिव इन्फैंट्री के सिपाहियों ने कई ब्रिटिश सैनिकों की जान बचाई यहां तक ​​कि अपने घायल सैनिकों को छोड़ने की कीमत पर भी जिन्हें भारतीय सिपाहियों ने टुकड़ों में काट डाला था।

1 जुलाई 1857

घेराबंदी की शुरुआत में हुए पहले बमबारी हमलों में से एक 30 जून को हुआ जिसमें  एक नागरिक गिरती हुई छत के नीचे दब गया था। 32 वीं  फुट रेजिमेंट के कॉर्पोरल विलियम ऑक्सनहैम ने भारी गोलीबारी के बीच उसकी जान बचाई और बाद में उन्हें विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित किया गया।

पहला हमला 1 जुलाई को विफल कर दिया गया जब रेजिडेंसी के पूर्व में स्थित माछी भवन पैलेस  की अलग चौकी को खाली कराकर उड़ा दिया गया। इसमें भारी मात्रा में बिजली और गोला-बारूद जमा था।

ठीक अगले दिन सर हेनरी लॉरेंस एक गोले से बुरी तरह घायल हो गए और 4 जुलाई को उनकी मृत्यु हो गई। 32 वीं रेजिमेंट  के कर्नल जॉन इंग्लीस ने  गैरीसन की सैन्य कमान संभाली। लॉरेंस ने मेजर जॉन बैंक्स को कार्यवाहक सिविल कमिश्नर नियुक्त किया। कुछ समय बाद जब बैंक्स एक स्नाइपर की गोली से मारे गए तो इंग्लीस ने समग्र कमान संभाल ली।

विद्रोह में शामिल हुए लगभग 8000 सिपाही और जमींदारों के कई सौ सिपाही रेजिडेंसी को घेरे हुए थे। उनके पास कुछ आधुनिक तोपें थीं और कुछ पुरानी तोपें भी थीं जिनसे तरह-तरह के तात्कालिक गोले दागे जा सकते थे।

घेराबंदी के पहले सप्ताह के दौरान रक्षा पंक्ति पर हमला करने के कई दृढ़ प्रयास किए गए लेकिन विद्रोहियों के पास एक एकीकृत कमान का अभाव था जो घेराबंदी करने वाली सभी सेनाओं का समन्वय न कर सके।

सैन्य कार्रवाई और बीमारियों के कारण जिनकी संख्या लगातार कम होती जा रही थी फिर भी रक्षकों ने उन्हें पराजित करने के सभी प्रयासों को विफल कर दिया। इसके अलावा उन्होंने कई हवाई हमले किए गए जिनका उद्देश्य विद्रोहियों के सबसे खतरनाक ठिकाने की प्रभावशीलता को कम करना और उनकी तोपों को खामोश करना था।

16 जुलाई 1857

16 जुलाई को मेजर जनरल हेनरी हैवलॉक  के नेतृत्व में एक सेना ने लखनऊ से 77 किलोमीटर दूर कानपुर पर पुनः कब्जा कर लिया। 20 जुलाई को उन्होंने  लखनऊ को राहत देने का प्रयास करने का निर्णय लिया। लेकिन 1500 सैनिकों की अपनी टुकड़ी को गंगा नदी के पार ले जाने में छह दिन लग गए। 

29 जुलाई को हैवलॉक ने उन्नाव में एक युद्ध जीता लेकिन हताहतों बीमारियों और लू लगने से उनकी सेना घटकर 850 रह गई और उन्हें पीछे हटना पड़ा।

इसके बाद हैवलॉक और कानपुर में तैनात अभिमानी ब्रिगेडियर जेम्स नील के बीच तीखी चिट्ठी-पत्री हुई। हैवलॉक को अंततः 257 अतिरिक्त सैनिक और कुछ और तोपें मिलीं और उन्होंने फिर से आगे बढ़ने का प्रयास किया। 4 अगस्त को उन्होंने उन्नाव के पास एक और विजय प्राप्त की। लेकिन एक बार फिर वे इतने कमजोर हो गए कि आगे बढ़ना जारी नहीं रख सके और पीछे हट गए।

हैवलॉक का इरादा अवध के भीतर गंगा के उत्तरी तट पर बने रहने का था ताकि विद्रोहियों की बड़ी सेना को जो उनका सामना कर रही थी रेजिडेंसी की घेराबंदी में शामिल होने से रोका जा सके। लेकिन 11 अगस्त को नील  ने सूचना दी कि कानपुर पर खतरा मंडरा रहा है। पीछे से हमले से बचने के लिए हैवलॉक फिर से उन्नाव की ओर बढ़े और वहाँ तीसरी विजय प्राप्त की। 

फिर वे गंगा के पार वापस लौटे और नवनिर्मित पुल को नष्ट कर दिया। 16 अगस्त को उन्होंने बिठूर  में विद्रोही सेना को पराजित किया जिससे कानपुर पर मंडरा रहे किसी भी नए खतरे को समाप्त कर दिया गया। हैवलॉक की वापसी सामरिक दृष्टि से आवश्यक थी लेकिन इसके कारण अवध में विद्रोह एक राष्ट्रीय विद्रोह में बदल गया क्योंकि पहले से अनिर्णीत जमींदार भी विद्रोहियों के साथ शामिल हो गए।

15 सितंबर  1857

हेवलॉक की जगह मेजर जनरल सर जेम्स आउटराम को कमान सौंपी गई थी । आउट राम के कानपुर पहुंचने से पहले ही हेवलॉक ने एक और राहत अभियान की तैयारी शुरू कर दी थी। उन्होंने इससे पहले रेजिडेंसी में इंग्लिस को एक पत्र भेजा था। जिसमें उन्होंने सुझाव दिया था कि वे अपना रास्ता बनाते हुए कानपुर पहुंचें।

इंग्लिस ने जवाब दिया कि उनके पास पर्याप्त प्रभावी सैनिक नहीं हैं और बीमार घायल और निष्क्रिय सैनिकों की संख्या बहुत अधिक है इसलिए वे ऐसा प्रयास नहीं कर सकते।

उन्होंने तत्काल सहायता की भी गुहार लगाई। इस बीच विद्रोहियों ने रेजिडेंसी में तैनात सैनिकों पर गोलाबारी जारी रखी और सुरक्षा व्यवस्था के नीचे बारूदी सुरंगें भी बिछाईं जिससे कई चौकियां नष्ट हो गईं। हालांकि सैनिकों ने छिटपुट हमलों और जवाबी हमलों से विद्रोहियों को दूर रखा। लेकिन वे दिन-प्रतिदिन कमजोर होते जा रहे थे और भोजन की भी कमी हो रही थी।

आउट्राम 15 सितंबर को अतिरिक्त सैनिकों के साथ कानपुर पहुंचे । उन्होंने राहत बल की कमान हैवेलॉक को सौंपी और लखनऊ पहुंचने तक नाममात्र के स्वयं सेवक के रूप में उनके साथ रहे। इस बल में 3179 सैनिक थे।

जिनमें छह ब्रिटिश और एक सिख पैदल सेना बटालियन तीन तोपखाना बैटरी शामिल थीं। लेकिन केवल 168 स्वयं सेवक घुड़सवार थे इन्हें दो ब्रिगेड में विभाजित किया गया था। जिनका नेतृत्व नील और 78 वीं  हाइलैंडर्स के कर्नल हैमिल्टन कर रहे थे।

18 सितंबर 1857

18 सितंबर को आक्रमण फिर से शुरू हुआ इस बार विद्रोहियों ने खुले मैदान में कोई ठोस मोर्चा नहीं संभाला और कुछ महत्वपूर्ण पुलों को नष्ट करने में भी असफल रहे। 23 सितंबर को हैवलॉक  की सेना ने विद्रोहियों को आलम बाग से खदेड़ दिया जो रेजिडेंसी से चार मील दक्षिण में स्थित एक चारदीवारी वाला पार्क था।

आलम बाग में एक छोटी सी टुकड़ी के साथ सामान छोड़कर उन्होंने 25 सितंबर को अंतिम आक्रमण शुरू किया। भारी बारिश के कारण शहर के आसपास का अधिकांश खुला मैदान जलमग्न हो गया था जिससे अंग्रेजों को घेराबंदी करने में बाधा उत्पन्न हुई और उन्हें शहर के कुछ हिस्सों से सीधे आगे बढ़ने के लिए मजबूर होना पड़ा।

चार बाग नहर पार करने के प्रयास में बल को भारी प्रतिरोध का सामना करना पड़ा लेकिन वहाँ एक पुल पर हमला करने के दौरान दस में से नौ सैनिक मारे जाने के बाद ही वे सफल हो पाए। इसके बाद वे नहर के पश्चिमी किनारे का अनुसरण करते हुए दाईं ओर मुड़ गए।

78 वीं  हाइलैंडर्स ने गलत मोड़ ले लिया लेकिन कैसर बाग महल जिसे कैसर बाग भी कहा जाता है के पास एक विद्रोही तोपखाने पर कब्जा करने में सफल रहे।

जिसके बाद वे धीरे-धीरे मुख्य बल में वापस लौट आए और भीषण लड़ाई के बाद शाम होते-होते बल मच्छी भवन पहुँच गया। आउट्राम ने बीच में स्थित इमारतों के बीच सुरंगें खोदकर और सुरंगें बिछाकर रेजिडेंसी के रक्षकों से संपर्क करने के लिए रुकने का प्रस्ताव रखा।

लेकिन हैवेलॉक ने तत्काल आगे बढ़ने पर जोर दिया उन्हें डर था कि रेजिडेंसी के रक्षक इतने सतर्क हो चुके हैं कि अंतिम समय में विद्रोही हमले से वे पराजित हो सकते हैं।

यह आक्रमण भारी सुरक्षा वाले संकरे रास्तों से किया गया। नील विद्रोहियों की बंदूक की गोलीबारी में मारे गए लोगों में से एक थे। कुल मिलाकर राहत बल के 2000 सैनिकों में से 535 सैनिक मारे गए जिनमें से अधिकांश इस अंतिम हमले में मारे गए। राहत मिलने तक रेजिडेंसी के रक्षकों ने 87 दिनों की घेराबंदी सहन कर ली थी और उनकी संख्या घटकर केवल 982 लड़ाकू व्यक्तियों तक सीमित हो गई थी।

24 सितंबर 1857

24 सितंबर को 8 वीं द किंग्स रेजिमेंट ऑफ फुट  के कर्नल ग्रेटहेड के नेतृत्व में 2790 ब्रिटिश सिख और पंजाबी सैनिकों का एक दल  लाहौर गेट से होते हुए दिल्ली से कानपुर तक ब्रिटिश शासन की पुनर्स्थापना के लिए आगे बढ़ा। 9 अक्टूबर को ग्रेटहेड  को आगरा के लाल किले में तैनात ब्रिटिश चौकी से सहायता के लिए तत्काल संदेश प्राप्त हुआ। 

उन्होंने अपनी सेना को आगरा की ओर मोड़ दिया जहाँ उन्हें पता चला कि विद्रोही पीछे हट गए हैं। जब उनकी सेना विश्राम कर रही थी तभी पास में ही डेरा डाले हुए विद्रोही सेना ने उन पर अचानक हमला कर दिया। फिर भी उन्होंने एकजुट होकर विद्रोही सेना को पराजित किया और उन्हें तितर-बितर कर दिया। 

आगरा की इस लड़ाई ने दिल्ली और कानपुर के बीच के क्षेत्र से सभी संगठित विद्रोही ताकतों को खदेड़ दिया। हालांकि गुरिल्ला समूह अभी भी मौजूद थे। कुछ समय बाद ग्रेटहेड को दिल्ली से अतिरिक्त सैनिक प्राप्त हुए और मेजर जनरल जेम्स होप ग्रांट को कमान सौंपी गई।

ग्रांट अक्टूबर के अंत में कानपुर पहुंचे जहां उन्हें भारत के नए कमांडर-इन-चीफ सर कॉलिन कैंपबेल से आलम बाग जाने और बीमार व घायल सैनिकों को कानपुर पहुंचाने का आदेश मिला। उन्हें यह भी स्पष्ट रूप से कहा गया था कि कैंपबेल के स्वयं पहुंचने तक वे लखनऊ में किसी भी प्रकार की सहायता के लिए प्रतिबद्ध न हों।

3 नवंबर 1857

जुलाई 1857 में जब कैंप बेल 65 वर्ष के थे तब उन्होंने बंगाल सेना की कमान संभालने के लिए इंग्लैंड छोड़कर भारत भेजा दिया गया। अगस्त के मध्य तक वे कलकत्ता में थे और देश के भीतरी इलाकों में जाने की तैयारी कर रहे थे। सभी तैयारियाँ अक्टूबर के अंत तक पूरी हुईं। 

ग्रैंड ट्रंक रोड पर लड़ते हुए आगे बढ़ते हुए कैंप बेल 3 नवंबर को कानपुर पहुँचे और  लखनऊ की रक्षा शुरू करने से पहले वहाँ के ग्रामीण इलाकों को सुरक्षित कर लिया। कानपुर के आत्मसमर्पण के बाद ब्रिटिश महिलाओं और बच्चों के नरसंहार की यादें अभी भी ताज़ा थीं। अंग्रेजों की नज़र में लखनऊ उनके संकल्प का प्रतीक बन गया था। 

तदनुसार कैंप बेल ने कानपुर की रक्षा के लिए 1100 सैनिकों को वहीं छोड़ दिया और 600 घुड़सवार 3500 पैदल सेना और 42 तोपों के साथ आलमबाग की ओर प्रस्थान किया जिसे सैमुअल स्माइल्स ने महिलाओं और बच्चों को प्राथमिकता के प्रोटोकॉल का एक उदाहरण बताया।

ब्रिटिश युद्ध पोतों को हांगकांग से कलकत्ता भेजा गया। शैनन पर्ल और सैंसपेरिल के नौसैनिकों और नाविकों ने जहाजों की तोपों के साथ एक नौसैनिक ब्रिगेड का गठन किया और कलकत्ता से लड़ते हुए कैम्पबेल की सेना से मिल गए।

लखनऊ में विद्रोहियों की संख्या का व्यापक अनुमान 30000 से 60000 के बीच लगाया गया था। वे पर्याप्त हथियारों से लैस थे उनमें शामिल सिपाही रेजिमेंट अच्छी तरह से प्रशिक्षित थीं। उन्होंने हेवलॉक और आउट्राम द्वारा रेजिडेंसी को पहली बार राहत पहुँचाने के बाद अपनी रक्षा व्यवस्था को और मजबूत कर लिया था। आलम बाग के ठीक उत्तर में स्थित हेवलॉक और आउट्राम द्वारा इस्तेमाल किए गए चार बाग पुल को बंद कर दिया गया था।

दिलकुशा पुल से चार बाग पुल तक चारबाग नहर पर बांध बनाकर उसे पानी से भर दिया गया था ताकि सैनिक या भारी तोपें उसे पार न कर सकें। गोमती नदी के उत्तर में खाइंयों में तैनात तोपें न केवल प्रतिदिन घिरी हुई रेजिडेंसी पर बमबारी करती थीं बल्कि राहत के एकमात्र व्यवहार्य मार्ग पर भी लगातार हमले करती थीं।

हालांकि सिपाहियों के बीच एक एकीकृत कमान संरचना की कमी ने उनकी भारी संख्या और रणनीतिक स्थिति के महत्व को कम कर दिया।

14 नवंबर 1857

14 नवंबर को भोर होते ही कैम्पबेल ने लखनऊ को राहत पहुँचाने का अभियान शुरू किया। उन्होंने अपनी योजना कैवनाघ से मिली जानकारी और लखनऊ राहत दल के पहले दस्ते को हुए भारी जान माल के नुकसान के आधार पर बनाई थी। चारबाग पुल पार करके लखनऊ की तंग और घुमावदार गलियों से होकर लड़ने के बजाय कैम्प बेल ने पूर्व की ओर से घेराबंदी करते हुए दिलकुशा पार्क की ओर बढ़ने का विकल्प चुना। 

इसके बाद वे ला मार्टिनियर ब्रिटिश और एंग्लो-इंडियन लड़कों का एक स्कूल की ओर बढ़े और गोमती नदी के जितना संभव हो सके पास नहर पार की। आगे बढ़ते हुए उन्होंने अपने गोला-बारूद और आपूर्ति की रक्षा करते हुए प्रत्येक स्थान को सुरक्षित किया।

फिर उन्होंने सिकंदरबाग नामक एक चारदीवारी वाले क्षेत्र को सुरक्षित किया और उसे रेजिडेंसी से जोड़ा जिसकी बाहरी सीमा को हैवेलॉक और आउट्राम ने चुत्तूर मंजिल तक बढ़ा दिया था।

आलम बाग के पूर्व में 3 मील तक जब सैन्य टुकड़ी आगे बढ़ी तो उसे किसी प्रतिरोध का सामना नहीं करना पड़ा। जब राहत टुकड़ी दिल कुशा की दीवार पर पहुँची तो सन्नाटा तोपों की गड़गड़ाहट से टूट गया। ब्रिटिश घुड़सवार सेना और तोपखाने ने तेजी से दीवार को भेद दिया। इसके बाद टुकड़ी ला मार्टिनियर की ओर बढ़ी। 

दोपहर तक दिलकुशा और ला मार्टिनियर ब्रिटिश सेना के कब्जे में थे। बचाव कर रहे सिपाहियों ने बैंक हाउस से ब्रिटिश सेना के बाएं हिस्से पर जोरदार हमला किया। लेकिन ब्रिटिश सेना ने जवाबी हमला किया और उन्हें वापस लखनऊ की ओर खदेड़ दिया। कैम्पबेल के दल की तीव्र प्रगति ने उसे आपूर्ति काफिले से काफी आगे कर दिया। 

अगले दिन राहत टुकड़ी ला मार्टिनियर से उत्तरी छोर तक आगे बढ़ी जहाँ नहर गुमती नदी से मिलती है। दिलकुशा पुल के नीचे के क्षेत्र को जलमग्न करने के लिए नहर पर बांध बनाने के कारण नहर उस स्थान पर सूख गई थी। टुकड़ी और तोपें आगे बढ़ीं और फिर सिकंदर बाग की ओर तेज़ी से बाईं ओर मुड़ गईं।

सिकंदर बाग पर हमला

सिकंदर बाग लगभग 100 वर्ग मीटर का एक ऊँची चारदीवारी वाला बगीचा था जिसके प्रत्येक कोने पर प्राचीरें थीं और दक्षिणी दीवार पर एक मेहराब दार मुख्य प्रवेश द्वार था। कैम्पबेल का दस्ता बगीचे की पूर्वी दीवार के समानांतर चलने वाली सड़क से आगे बढ़ा।

पैदल सेना घुड़सवार सेना और तोपखाने के बढ़ते दस्ते को तंग गाँव की गलियों में आगे बढ़ने में काफी कठिनाई हुई। बगीचे के सामने बने ऊँचे सड़क तटबंध ने उन्हें भारी गोलाबारी से कुछ हद तक सुरक्षा प्रदान की। 

सिकंदर बाग और पास की किलेबंद झोपड़ियों में बने छेदों से बंदूकों की गोलियाँ चल रही थीं और दूर स्थित कैसरबाग अवध के पूर्व राजा वाजिद अली शाह का महल से भी तोपों के गोले दागे जा रहे थे। कैम्पबेल ने इस गोलाबारी को रोकने के लिए तोपखाने तैनात किए।

भारी 18-पाउंडर तोपों को भी रस्सी से खींचकर खड़ी सड़क तटबंध के ऊपर से ले जाया गया और बाड़े से 55 मीटर की दूरी पर रखा गया। इन सैन्य अभ्यासों में ब्रिटिश सेना को भारी नुकसान हुआ लेकिन तोपखाने की गोलाबारी ने सिकंदर बाग की दक्षिण-पूर्वी दीवार को भेद दिया।

शाह नजफ पर आक्रमण

दोपहर ढलते-ढलते एड्रियन होप के नेतृत्व में राहत टुकड़ी सिकंदर बाग से अलग होकर शाह नजफ की ओर बढ़ी। शाह नजफ एक चारदीवारी वाला इमामबाड़ा और मस्जिद है जो 1814 में अवध के पहले राजा गाज़ी-उद-दीन हैदर का मकबरा भी था। रक्षकों ने इस बहुमंजिला किलेबंदी को भारी मजबूती से स्थापित कर रखा था। 

जब ब्रिटिश टुकड़ी की पूरी ताकत शाह नजफ पर पहुंची तो सिपाहियों ने लगातार राइफलों तोप के गोलों और कैसर बाग से सहायक तोपों की गोलाबारी के साथ-साथ गोमती नदी के उत्तर में स्थित सुरक्षित तोप खानों से तिरछी गोलाबारी करके जवाब दिया। अत्यधिक असुरक्षित स्थानों से अंग्रेजों ने तीन घंटे तक शाह नजफ की मोटी दीवारों पर भारी तोपों से गोलाबारी की।

दीवारें को कोई नुकसान नहीं हुआ सिपाहियों की गोलाबारी निरंतर जारी रही और अंग्रेजों का नुकसान बढ़ता गया। अतिरिक्त ब्रिटिश हमले विफल रहे और उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ा। हालांकि ब्रिटिश कमान ने उनकी असुरक्षित स्थिति से पीछे हटना भी उतना ही खतरनाक माना।

शाह नजफ तक पहुँचने के लिए वैकल्पिक मार्ग खोजने के लिए पचास हाइ लैंडर्स को भेजा गया। लड़ाई के दूसरी ओर दीवार में एक दरार का पता चलने पर सुरंग खोदने वाले यंत्रों को दरार को चौड़ा करने के लिए आगे भेजा गया। छोटी अग्रिम टुकड़ी इस दरार से अंदर घुसी आंगन पार किया और मुख्य द्वार खोल दिए।

परिणाम

सन 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान लखनऊ का विद्रोह एक अत्यंत महत्वपूर्ण और निर्णायक घटना थी इस विद्रोह का नेतृ्त्व बेगम हजरत महल ने अपने अल्पवयस्क पुत्र बिरजिस कादिर को नवाब घोषित करके किया था।

विद्रोहियों ने लखनऊ स्थित ब्रिटिश रेजिडेंसी को लंबे समय यानी कई महीनों तक घेरे रखा जिसमें की बड़े ब्रिटिश अधिकारी जैसे हैनरी लारेंस कर्नल नील मारे गए। शुरूआत में क्रांतिकारियों और स्थानीय तालुकेदारों जिसमें किसान और भारतीय सैनिक शामिल थे के समर्थन से लखनऊ पर भारतीयों का नियंत्रण स्थापित हो गया।

लखनऊ और अवध के क्षेत्र में इस विद्रोह ने केवल सैनिकों तक सीमित न रहकर एक जन-विद्रोह का रुप ले लिया जिसमें आम किसानों और जमींदारों ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया। 

लेकिन मार्च 1858 में ब्रिटिश सेनापति कालिन कैंप बेल ने भारी सैन्य बल और गोरखा रेजिमेंट की मदद से लखनऊ पर पुनः ब्रिटिश शासन को स्थापित किया। इसके बाद बेगम हज़रत महल ने आत्मसमर्पण करने से इनकार कर दिया और नेपाल की तराई में चली गईं जहां बाद में उनकी मृत्यु हो गई।

व्यापक दीर्घकालिक परिणाम
इस विद्रोह के चलते ब्रिटिश सेना को अधिनियम 1858 पारित करना पड़ा जिसके तहत भारत शासन सीधे ब्रिटिश क्राउन के हाथों में चला गया और ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त हो गया।

सेना का पुनर्गठन
क्योंकि अवध के सैनिकों और किसानों ने इस विद्रोह में सबसे आक्रामक भूमिका निभाई थी जिसके कारण से ब्रिटिश सरकार ने सेना में अवध बिहार और मध्य भारत के सैनिकों अनुपात कम कर दिया तथा गोरखा सिख और पठानों को अधिक प्राथमिकता दी।
 
इसके साथ ही अंग्रेजों ने भविष्य में असंतोष रोकने के लिए राज्यों के विलय की नीति यानी Doctrine of Lapse को त्याग दिया और भारतीय राजाओं तथा जमींदारों के अधिकारों व दत्तक पुत्र लेने के अधिकार को मान्यता दी।

निष्कर्ष

संक्षिप्त में हम कह सकते है कि लखनऊ विद्रोह भारतीय इतिहास में ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध सबसे लंबे संगठित और उग्र विद्रोह में से एक था। यह केवल एक सैनिक विद्रोह नहीं था भले ही इसकी शुरुआत सैनिकों के विद्रोह से हुई थी लेकिन इस विद्रोह में किसान आम जनता और जमींदारों ने भारी संख्या में भाग लिया था।

लखनऊ विद्रोह में यह साबित किया की यदि भारतीय संगठित होकर लड़ें तो अंग्रेजों की नींव हिलाई जा सकती है। इसे कुचलने के लिए अंग्रेजों को अपनी सबसे ताकतवर सेना और गोरखा रेजिमेंट का उपयोग करना पड़ा था। इस विद्रोह ने ब्रिटिश सरकार की आँखें खोल दीं जिसके चलते उन्हें भारत सरकार अधिनियम 1858 लाना पड़ा।

जिसके चलते ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन भारत से पुरी तरह समाप्त हो गया। हम भारतीयों को इस विद्रोह ने एक चीज़ और सिखाई वे थी एकता अगर हम एक जुट हुए तो किसी को भी खुद पर शासन करने से रोक सकते है। शायद ये हमें य भारतीय शासकों को यह पहले ही पता होता तो गुलामी के दिन आते ही नहीं।

वर्तमान समय में ही ज्यादातर राजनेता और जातिवाद को बढ़ावा देने वाले लोग यह प्रयोग हम पर आजमाते है ताकि हम पर शासन कर सकें हमें मूर्ख बना सकें। अब ये आप पर निर्भर करता है कि आप गुलाम बन कर रहना पसंद करते है कि स्वतंत्र।

2026-10-09

द्वितीय एंग्लो-सिख विद्रोह

illustration of second anglo sikh war

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम पंजाब के सिख साम्राज्य द्वारा लड़े द्वितीय एंग्लो-सिख युद्ध बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे। इसके साथ ही हम युद्ध के मुख्य कारण तथा प्रमुख घटनाओं पर भी विचार करेंगे तथा इस युद्ध के मुख्य पात्रों जिन्होंने इस युद्ध में अहम भूमिका निभाई थी के बारे में जानेंगे।

इस युद्ध के परिणाम के चलते सिख साम्राज्य पूर्ण रुप से ब्रिटिश साम्राज्य में विलय हो गया था सिख साम्राज्य का पुरी तरह से पतन हो गया। यह युद्ध एक प्रकार से एक बहाना था जबकि अंग्रेज महाराजा रणजीत सिंह के समय काल से ही पंजाब को ब्रिटिश साम्राज्य में विलय करने के प्रयास कर रहे थे। 

हलांकि उनके जीते जी उनके मनसूबे पूरे न हो सके। मगर उनके मरते ही अंग्रेजों ने सिख साम्राज्य में सेंध लगाना प्रारम्भ कर दिया। परिणामस्वरूप उनके बेटों की रहस्यमय तरीकों से मौतों का सिलसिला प्रारम्भ हो गया।

अंत में सिख साम्राज्य के अंतिम शासक राजा दलीप सिंह गद्दी पर बैठे जो कि 5 वर्ष के बालक थे। मौके का फायदा उठाते हुए ब्रिटिश सेना ने युद्ध करना प्रारम्भ किया। जिसमें सिख सेना पहला एंग्लो-सिख युद्ध हार गए। 

परिचय

यह युद्ध 18 अप्रैल 1848 से प्रारम्भ हो कर 3 मार्च 1849 तक चला। युद्ध के प्रारम्भिक कारणों में प्रथम अंग्ल सिख युद्ध के बाद सिखों पर थोपी गई अपमानजनक शर्तें और असंतोष था इसके साथ ही रानी जिंद कौर को अपमानजनक तरीके से सत्ता से निष्कासित कर बनारस भेजा जाना था। जिसके चलते मुल्तान गवर्नर मुल राज ने विद्रोह किया। दूसरी तरफ छत्तर सिंह और शेर सिंह द्वारा अंग्रेजों के विरुद्ध बगावत कर दी।

मुल्तान की विद्रोह

इस क्षेत्र को राजा रणजीत सिंह ने 1818 में अपने कब्जे में लिया और 1848 में पंजाबी वायसराय दीवान मुल राज को मुल्तान का शासन सौंपा। प्रथम एंग्लो सिख युद्ध की समाप्ति के बाद जब  ब्रिटिश नियंत्रित दरबार ने उनसे बढ़े हुए कर और बकाया राजस्व का भुगतान करने को कहा तो मुल राज ने अपने परिवार के शासक पद को बनाए रखने के लिए सत्ता अपने पुत्र को सौंपने का प्रयास किया। 

दूसरी तरफ ब्रिटिश सेना सरदार कहान सिंह मान को अपना राज्यपाल नियुक्त किया।कर वसूली के लिए कहान सिंह मान के साथ ब्रिटिश एजेंट लेफ्टिनेंट पैट्रिक वैन्स एग्यू को एक अन्य अधिकारी को साथ भेजा। 18 अप्रैल 1848 को दोनों अधिकारी एक छोटे से अंगरक्षक दल के साथ मुल्तान पहुंचे।

मुल राज ने चाबियां तो सौंप दी मगर जैसे ही अंगरक्षकों ने कब्जा करने का प्रयास किया तैसे ही उन पर मूल राज के सैनिकों ने तथा शहर से आयी भीड़ ने हमला कर दिया दोनों अधिकारी घायल हो गए कहान सिंह ने उन्हें बचाया और शहर के बाहर एक मस्जिद में ले जाकर छिपा दिया।

कहान सिंह के अंगरक्षक मुल राज के पक्ष में चले गए और अगले दिन भीड़ ने दोनों अधिकारियों की हत्या कर दी। हलांकि मूल राज ने ऐसा करने के लिए किसी को प्रेरित नहीं किया था लेकिन इन्हीं कारणों के चलते मूल राज को अंग्रेजों के प्रति विद्रोह करना पड़ा। 

अतः वंस अग्रेव का सिर कहान सिंह को दिया और उसे लाहौर ले जाने को कहा। इन हत्याओं की खबर पूरे पंजाब में फैल गयी। इस घटना के बाद बड़ी संख्या में सिख सैनिक ब्रिटिश दरबार के प्रति वफादारी छोड़ कर मूल राज के साथ विद्रोह करने के लिए तैयार हो गए।

किन्येरी का विद्रोह

जब वान्स एग्न्यू की हत्या हुई तब लेफ्टिनेंट हर्बर्ट एडवर्डस मुल्तान के पास ही थे मगर वे उसे बचाने में असफल रहा। इसने जल्दबाजी में कुछ पख्तून सैनिकों की भर्ती की। इसके बाद 18 जून 1848 में फतेह मोहम्मद खान के नेतृत्व में 8000 बहावल पिरियों ने लेफ्टिनेंट एडवर्सन के नेतृत्व में तथा 

कुछ 3000 अनियमित सिख सैनिकों की सहायता से रंग राम के नेतृत्व में 8000 सिखों से युद्ध किया। बहावलपुरियों को  सिख सैनिकों को हमले से अपने ठिकानों से पीछे हटना पड़ा।

लेकिन लेफ्टिनेंट हर्बर्ट एडवर्डस  की तोपों के आने से सिखों पर अंग्रेज भारी पड़े। दूसरे प्रयास में सिखों ने खईयों पर धावा बोला जिसके चलते अंग्रेजों के 300 सैनिक मारे गए दूसरी तरफ सिखों के 500 सैनिक शहीद है गए। अंत सिखों को पीछे हटना पड़ा मुल्तान भागते हुए कई सिख शहीद हो गए।अंत सिखों को पीछे हटना पड़ा मुल्तान भागते हुए कई सिख शहीद हो गए।

सुद्दूसैन का युद्ध

1 जुलाई 1848 को हुई इस लड़ाई में लेफ्टिनेंट एडवर्डस के नेतृत्व में 18000 सैनिकों ने बहावलपुरी और ब्रिटिश सेना का सामना मुरलाज के नेतृत्व में 12000 सिखों से हुआ। सिखों ने हमला किया लेकिन ब्रिटिश तोपखाने की श्रेष्ठता के कारण उन्हें भारी नुकसान के साथ पीछे हटना पड़ा। इसके बाद बहावलपुरी सेना ने बचे हुए बिखरे सिखों का मुल्तान तक पीछा किया।

इसके बाद 1848 में लेफ्टिनेंट एडवर्डस ने लगभग 12000 सैनिकों के साथ मुल्तान को घेर लिया। क्यूरी ने बंगाल सेना के कमांडर इन चीफ सर ह्ययुगाफ को पत्र लिखकर सिफारिश की क एक बड़ी ब्रिटिश सेना को तुरंत मुल्तान पर आक्रमण करने के लिए भेजा जाए। मगर गवर्नर जनरल डलहौजी ने भीषण गर्मी के कारण सेना भेजने से इनकार कर दिया।

18 से 28 अगस्त के बीच मुल्तान में एडवर्ड्स से सेना इकट्ठा हुईं। पेशावर में तैनात अनियमित घुड़सवार सेना का नेतृत्व कर रहे कैप्टन जान निकोल्सन ने सिंधु नदी पर स्थित अटक किले पर कब्जा कर लिया जब वे विद्रोह के लिए तैयार नहीं थे। 14 सितंबर को शेर सिंह की सेना ने मुल्तान में खुलेआम विद्रोह कर दिया हलांकि वे मूलराज के साथ नहीं गया। व्हिश ने 27 दिसंबर को 17000 सैनिकों और 64 तोपों के साथ मुल्तान की घेराबंदी कर दी। 

भारी बमबारी के बाद 2 जनवरी 1849 को शहर पर कब्जा कर लिया गया। 22 जनवरी को मुलराज ने किले से आत्मसमर्पण कर दिया। उन्हें जीवन भर के लिए कैद कर लिया गया। घेराबंदी समाप्त होने से व्हिश को भारी तोपों की बड़ी संख्या के साथ ह्युग गफ के नेतृत्व वाली सेना सुदृढ़ करने का मौका मिला।

लाहौर विद्रोह

रंगुर मुजल किला शेर सिंह अटारी वाला के नियंत्रण में था और यह लाहौर दरबार से विद्रोह का पहला संकेत था। सेना के सिखों ने ब्रिटिश सैनिकों को आते देखा और उन पर पूरी ताकत से हमला कर दिया। सिखों ने युद्ध तो जीत लिया, लेकिन जल्द ही उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया क्योंकि उनकी सेना बहुत छोटी थी। 

शाहपुर कंडी कब्जा
14 अगस्त 1848 की रात को, वज़ीर राम सिंह पठानिया ने अपनी छोटी राजपूत सेना के साथ रावी नदी के किनारे स्थित शाहपुर कंडी किले पर हमला किया और उस पर कब्जा कर लिया, लेकिन होशियारपुर से आए जॉन लॉरेंस की मजबूत सेना द्वारा 3 से 18 सितंबर 1848 तक किले की घेराबंदी के बाद वह अपने 400 साथियों के साथ सिख कमांडर शेर सिंह अटारी वाला और बसाखा सिंह के रसूल गुजरात शिविर में शरण ले ली।

रामनगर का युद्ध

सर ह्यू गॉफ ने शेर सिंह की सेना के विरुद्ध अपनी मुख्य सेना का नेतृत्व किया, जिसने कई हफ्तों तक चिनाब नदी के किनारे की रक्षा की थी। 22 नवंबर को रामनगर के युद्ध में सिखों ने नदी के पूर्वी किनारे पर स्थित एक पुल पर ब्रिटिश घुड़सवार सेना के हमले को विफल कर दिया। 

हालांकि बाद में वे अपने असुरक्षित पुल से पीछे हट गए सिखों ने एक ब्रिटिश तोप पर कब्जा कर लिया और ब्रिटिश सेना को भारी नुकसान पहुंचाया। उन्होंने इस युद्ध को अपनी जीत माना और उनका मनोबल बढ़ गया।

सादुलपुर का युद्ध

3 दिसंबर 1848 को गफ ने मेजर जनरल जोसेफ थैकवेल के नेतृत्व में एक घुड़सवार सेना को रामनगर के ऊपर चेनाब नदी पार करने और सिखों के बाएं हिस्से को घेरने के लिए भेजा लेकिन थैकवेल ने पैदल सेना की मदद के लिए रुक गए जिससे सिखों को बिना किसी हस्तक्षेप के पीछे हटने का मौका मिल गया। गफ ने इस अनिर्णायक कार्रवाई को जीत घोषित किया।

चिल्लियांवाला का युद्ध

डलहौजी ने पहले गफ को मुल्तान के पतन की प्रतीक्षा में अभियान रोकने का आदेश दिया था जिससे व्हिश को उनकी सेना में शामिल होने का अवसर मिल जाता। अटक के पतन की खबर मिलने पर उन्होंने गफ को आदेश दिया कि छत्तर सिंह के शेर सिंह से मिलने से पहले ही शेर सिंह की सेना को नष्ट कर दिया जाए।

13 जनवरी 1849 को झेलम नदी के पास गफ का सामना अचानक शेर सिंह की स्थिति से हो गया। शेर सिंह ने चालाकी से अपनी सेना को छुपा रखा था और गफ के सामने पीछे हटने या दिन ढलने के समय हमला करने का विकल्प था। गफ ने बिना किसी हिचकिचाहट के हमला करने का विकल्प चुना।

परिणामस्वरूप चिल्लियां वाला का युद्ध हुआ जो बेहद भयंकर था। प्रभावी तोपखाने के समर्थन के बिना घनी झाड़ियों में हमला करने वाले गफ के सैनिकों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। कुछ टुकड़ियों ने अपने झंडे खो दिए  जिसे एक अपमान माना गया और एक ब्रिटिश घुड़सवार रेजिमेंट का एक हिस्सा घबराकर भाग गया।

जिसके परिणामस्वरूप चार तोपों का नुकसान हुआ जिसे भी एक अपमान माना गया। शेर सिंह की सेना को भी भारी नुकसान हुआ उसकी बारह तोपें नष्ट हो गईं।

तीन दिनों तक भारी बारिश हुई जिससे दोनों पक्षों का युद्ध फिर से शुरू करने का इरादा बदल गया। तीन दिनों तक दोनों सेनाओं के आमने-सामने रहने और कोई कार्रवाई न होने के बाद दोनों पीछे हट गईं।

शेर सिंह उत्तर की ओर बढ़ते हुए छत्तर सिंह से जा मिले जिससे यह युद्ध अंग्रेजों के लिए एक रणनीतिक हार बन गया। फिर भी गफ ने जीत का दावा किया जिसे डलहौजी ने तिरस्कारपूर्वक शायद काव्यात्मक करार दिया।

दुल्लाह की लड़ाई

चिल्लियनवाला के बाद शेर सिंह अटारीवाला ने सिख रेजिमेंट के 500 पैदल सैनिकों के साथ 100 घुड़सवारों की एक टुकड़ी भेजी और 16 जनवरी 1849 को दुल्ला की पहाड़ियों पर अंग्रेजों के साथ एक और लड़ाई लड़ी। सिख सरदारों ने राम सिंह पठानिया और उनके राजपूत साथियों का समर्थन किया। जवाब मे अंग्रेजों ने ब्रिगेडियर व्हीलर की कमान में एक विशाल सेना भेजी। इसमें भी सिखों की हार हुई।

गुजरात का युद्ध

द्वितीय एंग्लो-सिख युद्ध का सबसे निर्णायक युद्ध था। इसी बीच व्हिश की सेना ने मुल्तान के चारों ओर घेराबंदी पूरी कर ली। उनकी तोपों ने गोलाबारी शुरू कर दी और सुरक्षा घेरा तोड़ दिया जिस पर पैदल सेना ने धावा बोल दिया। 

मुलराज ने 22 जनवरी को आत्मसमर्पण कर दिया। घेराबंदी समाप्त होने से व्हिश को गौघ में अतिरिक्त सैनिक भेजने का अवसर मिला । विशेष रूप से व्हिश की टुकड़ी के पास भारी तोपों की बड़ी संख्या थी जो सिखों के पास नहीं थीं।

जैसे ही गफ की सेना सिख सेना के करीब पहुंची उसने सिख सेना की स्थिति का पता लगाने के लिए विलियम हॉडसन को भेजा। शेर सिंह ने अंतिम बार घेराबंदी करने का प्रयास किया उसने चेनाब नदी पार करने और गफ के पीछे से वापस आने के लिए घुड़सवार सेना भेजी। 

भारी बारिश के कारण नदी पार करना मुश्किल हो गया और हैरी बर्नेट लम्सडेन के नेतृत्व में ब्रिटिश अनियमित घुड़सवार सेना ने उन्हें विफल कर दिया। 21 फरवरी को गफ ने गुजरात के युद्ध में सिख सेना पर हमला किया ।

यहाँ उसने लगभग 100 तोपों से तीन घंटे की बमबारी के साथ युद्ध शुरू किया जिसने सिखों को उनकी जल्दबाजी में बनाई गई खाइयों से खदेड़ दिया। फिर उसने सर जोसेफ थैक्वेल के नेतृत्व में अपनी घुड़सवार सेना और घुड़सवार तोपखाने को उनके पीछे भेजा जो चार घंटे तक चला। 

सिख धीरे-धीरे मुस्लिम ग्रामीणों से भरे उबड़-खाबड़ इलाके में पीछे हटने लगे जो मुख्य रूप से सिखों के खिलाफ अंग्रेजों का समर्थन कर रहे थे। सिखों का नुकसान 3000 से 5000 सैनिकों और 53 तोपों के बीच होने का अनुमान था। ब्रिटिश पक्ष के 96 सैनिक मारे गए और 700 घायल हुए।

12 मार्च को छत्तर सिंह और शेर सिंह ने रावल पिंडी के पास सर वाल्टर गिल्बर्ट के सामने आत्मसमर्पण कर दिया । लगभग 20,000 सैनिकों मुख्य रूप से अनियमित घुड़सवार सेना ने अपने हथियार डाल दिए। अफ़गान टुकड़ी ने जल्दबाजी में अटक और पेशावर से होते हुए पीछे हट गई ।

जिन पर अंग्रेजों ने पुनः कब्जा कर लिया। बाद में दोस्त मोहम्मद खान ने इन शहरों पर ब्रिटिश कब्जे को स्वीकार करते हुए एक संधि पर हस्ताक्षर किए। अंग्रेजों ने खैबर दर्रे पर भी नियंत्रण प्राप्त कर लिया जो ब्रिटिश राज की पश्चिमी सीमा बन गया। 

स्थानीय मुस्लिम आबादी ने ब्रिटिश शासन का व्यापक रूप से स्वागत किया जो सिख साम्राज्य के शासन से घृणा करती थी । इसका एक कारण यह भी था कि अंग्रेजों ने मुसलमानों की नमाज की अज़ान को पुनः अनुमति दे दी थी जिसे सिखों के शासन में प्रतिबंधित कर दिया गया था।

परिणाम


लॉर्ड डलहौज़ी ने 2 अप्रैल 1849 को पंजाब पर ब्रिटेन के कब्ज़े की घोषणा की। उनके विदेश सचिव हेनरी मेयर्स इलियट रीजेंसी परिषद के सदस्यों और दलीप सिंह के हस्ताक्षर प्राप्त करने के लिए लाहौर पहुँचे। लाहौर किले में एक दरबार आयोजित किया गया जहाँ सिंह ने उस दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किए जिससे कब्ज़े की पुष्टि हुई। 

सिखों की पराजय के कई कारण थे। पंजाब की आबादी पर उनका प्रशासन कमज़ोर था जिसका अर्थ था कि उनकी विशाल सेनाओं को पर्याप्त भोजन प्राप्त करने में कठिनाई हो रही थी जबकि ईस्ट इंडिया कंपनी ने उनके विरुद्ध भारी सैन्य बल का प्रयोग किया था।

1848-49 के दूसरे एंग्लो-सिख युद्ध के बाद निम्नलिखित जिलों के क्षेत्रों को अंग्रेजों द्वारा कब्जा कर लिया गया अमृतसर गुरदासपुर रोहतक बन्नू डेरा गाजी खान डेरा इस्माइल खान गुजरांवाला गुजरात हजारा झंग झेलम कोहाट लाहौर मोंटगोमरी मुल्तान मुजफ्फरगढ़ पेशावर रावलपिंडी शाहपुर और सिया कोट जिले।

एंग्लो-सिख युद्धों ने दोनों पक्षों को एक-दूसरे की युद्ध क्षमता के प्रति आपसी सम्मान प्रदान किया हालाँकि युद्ध स्वयं वीरतापूर्ण ढंग से नहीं लड़ा गया था। सिखों ने चिल्लियां वाला में कोई कैदी नहीं बनाया और अंग्रेजों ने गुजरात में कोई कैदी नहीं बनाया था। ब्रिटिश कमान के अधीन पंजाब अनियमित बल में पंजाब के विभिन्न समुदायों के लोगों की भर्ती में वृद्धि हुई।

इन रंगरूटों ने 1857 के भारतीय विद्रोह के दौरान ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए विद्रोहियों और अन्य विरोधियों मुख्यत पूर्वी प्रांतों के उच्च जाति के हिंदू और शिया मराठा और मुगल शासकों की सेनाओं या वफादारों के खिलाफ लड़ाई लड़ी। 

इन पंजाबी रंगरूटों को बंगाल सेना के हिंदू विद्रोहियों के प्रति विशेष रूप से कम सहानुभूति थी विडंबना यह है कि एंग्लो-सिख युद्धों में अंग्रेजों की मदद करने में बंगाल सेना की भूमिका ने इस सहानुभूति को और मजबूत किया। 

मुगल शासन के साथ सिखों की लंबे समय से चली आ रही शत्रुता ने भी विद्रोहियों के पक्ष में कोई मदद नहीं की क्योंकि उन्होंने बहादुर शाह जफर को एक प्रतीकात्मक नेता के रूप में चुना था।

इस युद्ध के बाद भी भाई महाराज सिंह  कर्नल रचपाल सिंह और नारायण सिंह ने कुछ प्रतिरोध जारी रखा जिन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में घूमकर किसानों को विदेशियों के खिलाफ भड़काया। अंग्रेजों ने उन पर जिंदा या मुर्दा पकड़ने का इनाम रखा।

अंतत सभी षड्यंत्रकारियों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया या मार डाला। नारायण सिंह को जिंदा पकड़ा गया और कर्नल रचपाल सिंह अलीगढ़ के पास गंभीर रूप से घायल हो गए। भाई महाराज सिंह पर उनकी गिरफ्तारी या मृत्यु पर 10000 रुपये का इनाम था।

लेकिन उन्हें 28 दिसंबर 1849 को 21 अनुयायियों के साथ गिरफ्तार कर लिया गया। बाद में उन्हें सिंगापुर में कारावास की सजा सुनाई गई जहाँ उनकी मृत्यु हो गई।

निष्कर्ष

इस युद्ध के बाद सिख महाराजा रणजीत सिंह द्वारा स्थापित सिख साम्राज्य का अंत हो गया और पंजाब पूरी तरह से समाप्त हो गया। 29 मार्च 1849 को गवर्नर जनरल लार्ड डलहौजी ने अधिकारिक घोषणा के तहत पंजाब का ब्रिटिश भारत में विलय कर लिया।

चिलियां वाला की शुरुआती अनिर्णायक लड़ाइयों के बाद गुजरात के युद्ध में अंग्रेजों की निर्णायक जीत ने यह साबित कर दिया  कि आधुनिक हथियारों और तोपखाने से लैस ब्रिटिश सेना के सामने पारंपरिक भारतीय रियासतें लंबे समय तक नहीं टिक सकती थीं।

अंतिम सिख शासक  महाराजा दलीप सिंह को उनके पद से हटा दिया गया और उन्हें पेंशन देकर ब्रिटेन भेज दिया गया। इसके साथ ही प्रसिद्ध कोहिनूर हीरा भी अंग्रेजों के अधिकार में चला गया।

2026-10-08

एंग्लो सिख विद्रोह

digital painting of anglo sikh war

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में पंजाब के एंग्लो सिख युद्ध के बारे में चर्चा की गई इस लेख प्रथम एंग्लो सिख युद्ध के साथ ही द्वितीय एंग्लो सिख युद्ध के बारे में भी चर्चा की गई इसके साथ ही युद्ध के मुख्य पात्र तथा युद्ध के मुख्य कारणों के बारे में भी चर्चा करेंगे। बताते चलें कि पंजाब का सिख साम्राज्य महाराजा रण जीत सिंह के समय काल में एक शक्तिशाली साम्राज्य था।

इनके जीते-जी अंग्रेजों की हिम्मत नहीं थी की पंजाब में अपना आधिपत्य स्थापित कर सकें वहीं जब इनका देहांत हुआ तभी से सिख साम्राज्य के पतन की कहानी प्रारम्भ होती है।

जब पहला एंग्लो-सिख युद्ध तो राजा दिलीप सिंह पंजाब की गद्दी पर असित थे जो कि एक बालक थे क्योंकि जब दिलीप सिंह गद्दी पर बैठे तो उनकी उम्र मात्र 5 वर्ष थी अतः उपरोक्त कारणों का फायदा उठाते हुए अंग्रेजों ने सिख सैनिकों को उकसाया जिसके परिणामस्वरूप पहला एंग्लो सिख युद्ध हुआ।

परिचय

सिख साम्राज्य के संस्थापक के रुप में महाराजा रणजीत सिंह को याद किया जाता है। उनका जन्म पाकिस्तान के गुजरवाला में 13 नवंबर 1780 में हुआ था। उनकी माता का नाम राजकौर था तथा पिता का नाम महासिंह जो कि सुकरचकिया मिसल के प्रमुख थे। इनका राज्य अभिषेक 1801 में हुआ था तथा इन्होंने अपनी राजधानी लहौर को 1799 में स्थापित कि तथा धार्मिक राजधानी अमृत सर थी।

1798-99 के समय काल में अफगान शासक जमाल शाह की 16 तोपें चिनाब नदी में गिर गईं थी जिसे महाराजा रणजीत सिंह ने निकलवा कर जमाल शाह को वापस कर दीं। जमाल शाल ने खुश हो कर उन्हें राजा की उपाधि प्रदान की तथा लाहौर को रियासत उन्हें सौंपी।

खास बात यह की अभी तक रणजीत सिंह जी राजा नहीं बने थे इसके बाद ही 1801 में राज्य अभिषेक होने के बाद उन्होंने अपने साम्राज्य का विस्तार किया।

वे कश्मीर पेशावर लाहौर अमृतसर मुल्तान रावल पिंड़ी तथा अनंदपुर कि रियासतों के शासक थे। इतिहास के पन्नों पर यह पंजाब का स्वर्ण युग था। उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों के दौरान महाराजा रणजीत सिंह द्वारा पंजाब के सिख साम्राज्य का जब विस्तार किया जा रहा था

उसी समय काल में ब्रिटिश नियंत्रित क्षेत्रों को विजय व विलय के माध्यम से पंजाब की सीमाओं तक बढ़ाया जा रहा था। 

राजा रणजीत सिंह जानते थे कि जल्द ही ब्रिटिश पंजाब में घुसने की कोशिश करेंगे। अतः महाराजा रणजीत सिंह ने अंग्रेजों के साथ सतर्क मित्रता की नीति अपनाई। जिसके चलते उन्होंने अंग्रेजों के साथ अमृतसर की संधि की।

अमृतसर की संधि

25 अप्रैल 1809 में अमृतसर की संधि हुई जिसके तहत सतलज नदी को सीमा बनाया गया जिसके तहत महाराजा रणजीत सिंह ने स्वीकार किया कि वे दक्षिण पूर्व की तरफ विस्तार नहीं करेंगे जिसके चलते मालवा पटियाला नाभा जींद की रियासत अंग्रेजों के अधीन चली गई। दूसरी तरफ अंग्रेजों ने वादा किया की वे उत्तर पश्चिम में रणजीत सिंह की रियासत में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करेंगे।

हलांकि इस संधि के बाद भी रणजीत सिंह जानते थे कि अंग्रेजों पर विश्वास नहीं किया जा सकता जिसके चलते उन्होंने अपनी सेना का विस्तार किया। महाराज ने यूरोपीय सेना की तर्ज पर Napoleon Bonaparte की सेना कई पुराने आफीसर को अपनी सेना में शामिल कर फौजें-ए- खास नामक गुट की स्थापना की।

उन्होंने फ्रांस की सेना के सेनापति jean Francois Allard को तथा Cloude Augusete Court अपने तोप खानों को विकसित करने के लिए बुलाया वहीं पैदल सेना के लिए Jean Baptiste Ventura तथा Paolo Avitabile को बुलाया ताकी पैदल सेना को भी विकसित किया जा सके।

फौजें-ए- खास  को  jean Francois Allard संचालित करते थे वहीं फौजे-ए-बेकवायद को Jean Baptiste Ventura संचालित करते थे।

बताते चलें कि 1814 में अफगान शासक शाह शुजा ने ही महाराजा रणजीत सिंह को कोहिनूर हिरा दिया था जो बाद में अंग्रेजों ने उनके साम्राज्य से छिन लिया था फिर यह हिरा रानी एलीजाबेथ के ताज में देखा गया था। 27 जून 1939 में महाराजा रणजीत सिंह की लहौर में मृत्यु हो गयी जिसके बाद से ही अंग्रेजों ने पंजाब पर अपना अधिकार स्थापित करने के लिए षड्यंत्र रचना प्रारम्भ कर दिया था।

रणजीत सिंह के बाद के शासक

उनकी मौत के बाद उनके बडे़ बेटे माहाराजा खड़क सिंह राजगद्दी पर बैठे जिन्हें अफीम में जहर देकर मार डाला गया था 1840 में उनकी मौत हो गयी। इसके बाद कुंवर नौं निहास सिंह राजगद्दी पर बैठते जो की महाराजा रणजीत सिंह के पौते तथा खड़क सिंह के बेटे थे।

अपनी पिता का अंतिम संस्कार करने के बाद लौटते समय लाहौर किले के दरवाजे पर जिसे हज़ूरी बाग के दरवाज़े के नाम से भी जाना जाता है से टकराने से इनकी मौत हो गयी मगर इनकी मौत का कारण कुछ ओर ही था। इसके बाद कुछ समय के लिए महारानी चांद सिंह कौर राजगद्दी पर बैंठी जिन्होंने 1840 से 1841 तक प्रशासन का कार्य भार संभाला।

वे महाराज रणजीत सिंह की बहु थीं। इसके बाद महाराजा शेर सिंह गद्दी पर बैठे जिन्होंने 1841 से 1843 तक का कार्य भार संभाला। ये महाराजा रणजीत सिंह और महारानी मेहताब कौर के बेटे थे। और खड़क सिंह के सौतेले भाई थे। 1843 में संध्यावालीया सरदारों ने इनकी हत्या कर दी थी।

इसके बाद महाराजा दिलीप सिंह राजगद्दी पर बैठे जो कि महाराजा रणजीत सिंह के तथा महारानी जींद कौर के बेटे थे। वे मात्र 5 वर्ष की अल्प आयु में राजगद्दी पर बैठे जिस कारण से ज्यादातर प्रशासनिक कार्य उनकी माता यानी महारानी जींद कौर ने ही संभाला।

पहला एंग्लो-सिख युद्ध

यह युद्ध 1845 से 1846 के समय काल तक चला जिसके दौरान तीन युद्ध हुए। पहला युद्ध मुदकी का था दूसरा युद्ध फिरोजशाह का था तथा तीसरा युद्ध सबराओ का था। इस युद्ध की समाप्ति के बाद लाहौर की संधि हुई थी जिसमें गुलाब सिंह ने सिखों के साथ गद्दारी की थी जिसके चलते उसे 1 करोड़ रुपये में कश्मीर की रियासत दी गयी थी।

खास बाद यह है कि इन्हीं के उत्तराधिकारी राजा हरी सिंह थे जो कि आगे चलकर कश्मीर क्षेत्र के शासक हुए।

मुदकी का युद्ध 

यह युद्ध 18 दिसंबर 1845 में सतलज नदी के किनारे हुआ जो की उस समय में फिरोजपुर के अंतर्गत आता था। दरअसल अमृतसर संधि के दौरान सिखों को सतलज नदी को पार करके अंग्रेजों के अधिग्रहण वाले क्षेत्र में नहीं जाना था मगर अंग्रेजों के उकसाने पर सिख सैनिक इस क्षेत्र में प्रवेश कर गये।

अतः महाराजा रणजीत सिंह के साथ की गई अमृत सर की संधि इस घटना से टूट जाती है और अंग्रेजों द्वार इस युद्ध को अंजाम दिया जाता है।

दूसरी तरफ अंग्रेज इसी अवसर का इंतजार कर रहे थे। पहली सेना तेज सिंह की थी जिन्होंने सतलज नदी को पार करके फिरोजपुर की ब्रिटिश चौकी की तरफ बढ़ी तथा दूसरी सेना लाल सिंह के नेतृत्व में 18 दिसंबर की देर रात मुदकी के युद्ध में गौ और हार्डिंग ब्रिटिश सेना के साथ झड़प की। बिना योजना की इस लड़ाई में अंग्रेजों की जीत हुई।

फिरोज़ पुर का युद्ध

फिरोज़ पुर का युद्ध 21 दिसंबर 1845 में लड़ा गया। इस युद्ध के दौरान ब्रिटिश सेना अध्यक्ष गफ की सेना ने फिरोजपुर में सिखों के विशाल किला बंदी के पास पहुंची। गफ तुरंत हमला करना चाहते थे लेकिन हार्डिंग जो की उस समय गवर्नर जनरल थे ने उन्हें फिरोजपुर से आने वाली सिखों की टुकड़ियों का इंतजार करने को कहा।

जब सिख 21 दिसंबर को देर शाम को पहुंचे तब गफ ने दिन के कुछ बचे घण्टों में ही हमला कर दिया। सिखों के कुशल तोपखाने ने अंग्रेजों को भारी नुकसान पहुंचाया तथा सिख पैदल सेना ने बहादुरी से लड़ी। दूसरी तरफ सिख की घुड़सवार सेना कुलीन सैनिक अंग्रेजों की पैदल सेना तथा घुड़सवार सेना के लिए अप्रभावी निकले। क्योंकि लाल सिंह ने उन्हें युद्ध के मैदान से दूर रखा था।

शाम होते-होते गफ की सेना के कुछ सैनिक सिखों के ठिकानों तक पहुँचने में सफल रहे लेकिन बाकी टुकड़ियाँ थकने के कारण पीछे हट गईं। हार्डिंग को अगले दिन हार की आशंका थी जिसके चलते उसने मुदकी में मौजूद सरकारी दस्तावेजों को जलाने का आदेश दिया था।

हलांकि अगली सुबह ब्रिटिश और बंगला की टुकड़ियाँ एकजुट हुईं और सिखों को उनके किले में खदेड़ने में सफल रहीं। दूसरी तरफ लाल सिंह ने अपनी सेना को पुनः एकत्रित करने का प्रयास नहीं किया।

इसी बीच तेज सिंह की सेना वहां आ पहुंची एक बार फिर से युद्ध प्रारम्भ हुआ लेकिन अंग्रेजों की थकी सेना को देखकर उन्होंने युद्ध के दौरान घोषणा की कि ब्रिटिश  सेना पीछे हट रही है जबकि ऐसा नहीं था ब्रिटिश सेना के घुड़सवार और तोपखाना वास्तव में घेराबंदी कर रहे थे।

इस बीच  ब्रिटिश सेना के थके होने के कारण उन्हें आराम की जरूरत जिसके कारण वे अस्थायी रुप से रुक गए।

बद्दोवाल का युद्ध

यह युद्ध 21 जनवरी 1846 को लड़ा गया था जिसे  देसा सिंह मजीठिया जो कि महाराजा रणजीत सिंह के अधीन सबसे योग्य मंत्रियों में से एक थे उन्हीं के रणजोद सिंह मजीठिया बेटे थे। उन्होंने विशाल सेना का गठन किया जिसमें 10000 पैदल सैनिक और साठ तोपों सहित कुछ नियमित घुड़सवार सैनिक शामिल थे।

उन्होंने बड़ी संख्या के साथ सतलज नदी को पार किया यहां से लाडवा के अजीत सिंह ने भी उनका साथ दिया और उनके साथ शामिल हो गए। वे सभी लुधियाना की और बढ़े और ब्रिटिश छावनी के एक हिस्से को जला दिया। लुधियाना को राहत देने के लिए भेजे गए सर हैरी स्मिथ , फिरोजपुर से पूर्व की और बढ़े और सतलज से कुछ मील की दूरी बनाए रखी।

सिख सेना की ताकत का पता लगाने पर तथा गफ के आदेश पर स्मिथ ने अपनी सेना को जगराओं के रास्ते आगे बढ़ाया और वहां से एक ब्रिटिश रेजिमेंट को अपने साथ लेकर सिख सेना की मुख्य टुकड़ी से पहले लुधियाना पहुंच गए। 21 जनवरी को जब वे बद्दोवाल से निकले तो सिख अनियमित घुड़सवार सेना ने लगातार उनकी पिछली टुकड़ियों पर हमला किया।

उन्होंने स्मिथ के अधिकांश सामान ढोने वाले जानवरों को पकड़ लिया और पीछे छूटे हुए सैनिकों को मार गिराया। फिर भी थकी-हारी हालत में लुधियाना पहुँचने में सफल रहे। दिल्ली से सैनिकों की एक  ब्रिगेड जिसमें दो गोरखा बटालियन शामिल थीं उन्होंने उसकी मदद की।

अलीवाल का युद्ध

28 जनवरी 1846 को यह युद्ध लड़ा गया था अपनी सेना को आराम देने के बाद स्मिथ एक बार फिर बद्दोवाल की ओर आगे बढ़े सिख सतलज नदी के किनारे अवीवाल में शरण लिए हुए थे और अतिरिक्त सैनिक की प्रतीक्षा कर रहे थे।

28 जनवरी को स्मिथ ने पहले ही सावधानी बरतते हुए सिखों पर हमला कर दिया। जिसके चलते उसे शानदार जीत हासिल हुई।रणजोद सिंह मजीठिया की सभी तोपों को तथा उनकी सेना को जब्त कर लिया गया।

सोब्राओन की लड़ाई

सोबराओन की लड़ाई 10 फरवरी 1846 को लड़ी गई थी। सिख अपनी हार और कमांडरों की निष्क्रियता से स्थायी रुप से निराश थे, लेकिन जब शाम सिंह की सेना तथा अटारीवाला सहित सहित नई सैना उनसे जुड़ी तो वे एकजुट हुए और महारानी जिंद कौर ने 500 चयनित सिपाहियों को नए सिरे से युद्ध प्रयास करने के लिए प्रेरित किया।

गफ ने स्मिथ की टुकड़ी के लुधियाना से वापस आने पर सोबाओन में सिख सेना की इकाइयों पर हमला करने की योजना बनाना प्रारम्भ किया। लेकिन हार्डिंग ने उन्हें बंगाल सेना की भारी तोपों के आने का इंतजार करने को कहा।

आखिरकार तोपों के आने पर ब्रिटिश सेना 10 फरवरी की सुबह आगे बढ़ी। घने कोहरे के कारण युद्ध देरी से प्रारम्भ हुआ मगर जैसे की कोहरा हटा वैसे ही ब्रिटिश सेना की 35 तोपों तथा सैनिकों ने गोलीबारी शुरु कर दी।

लेकिन सिख सेना पर इसका कोई खास असर नहीं पड़ा दूसरी तरफ गफ को पता चला की गोला बारूद कम हो रहा है। हैरी स्मिथ और मेजर जनरल सर वाल्टर गिल्बर्ट की सेना ने दो टुकड़ियों में बट कर सिखों के दाहिने हिस्से पर हमला किया जहां रक्षात्मक संरचनाएं नरम रेत की बनी थीं 

जो की बाकी मोर्चों की अपेक्षा कमजोर थीं। माना जाता है कि लाल सिंह ने यह जानकारी गफ के मुख्यालय में राजनीतिक एजेंट हेनरी लारेंस को दी थी।

फिर भी सिख मोर्चे के भीतर शुरुआती बढ़त हासिल करने के बाद भी डिक की टुकड़ी सिखों की जवाबी हमलों के चलते पीछे हट गई थी जिसमें डिक मारा गया। जैसे ही ब्रिटिश सेना पीछे हटी तभी सिख सैनिकों ने घायल ब्रिटिश सैनिकों पर हमला कर दिया। जिससे ब्रिटिश सैनिक भड़क उठे।

ब्रिटिश सेना की गोरखा और बंगाल रेजिमेंट ने पूरी किले बंदी पर अपने हमले तेज़ कर दिये और कई जगहों से किले बंदी तोड़ दी। जिससे ब्रिटिश सैनिकों को सिखों पर किले की दरार से हमला करने का मौका मिल गया। मौका देख कर तेज सिंह युद्ध क्षेत्र से बाग गए। दूसरी तरफ नदी का पुल टूटने के कारण 20000 सिख सैनिक पूर्वी तट पर फंस गए मगर किसी ने आत्मसमर्पण नहीं किया। 

शाम सिंह अटारी वाला की कमांड वाली सिख सेना ने अंत तक लड़ाई लड़ी। कुछ सिख सैनिक नदी में कूद कर तलवार लेकर ब्रिटिश सैनिकों पर टूट पड़े।मगर तोपखाने ने नदी के किनारे से मोर्चा संभाला और पानी में मौजूद सिखों पर गोलीबारी की।

जब गोलीबारी बंद हुई तब सिखों के लगभग 10000 सैनिक मारे जा चुके थे। अंग्रेजों ने सिखों की 67 तोपें जब्त कर ली इस प्रकार युद्ध में सिखों की हार हुई।

लाहौर संधि

9 मार्च 1846  में युद्ध की समाप्ति के बाद  लाहौर की संधि हुई जिसमें सिखों पर 1.5 की जुर्माना लगाया गया। जिसे तत्काल में जुटा पाना संभव नहीं था इसलिए सिख साम्राज्य ने कश्मीर हजारा व्यास और सिंध नदी के बीच स्थित पहाड़ी क्षेत्रों के सभी किलो, क्षेत्र के अधिकार को ब्रिटिश कंपनी को 1 करोड़ रुपये में बेच दिया।

कश्मीर वाले क्षेत्र को अमृत सर संधि को दौरान गुलाब सिंह द्वारा 75 लाख रुपये का भुगतान करके ब्रिटिश सेना से खरीद लिया और कश्मीर के महाराजा की उपाधि हासिल की।

प्रथम आंग्ल सिख युद्ध की समाप्ति के बाद ब्रिटिश सेना ने अंबाला फिरोजपुर होशियार पुर जलंधर और लुधियाना जिलों पर अधिकार स्थापित हुआ।

बुद्धोवाल और आलीवाल में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाले अजीत सिंह की लाड़वा जागीर 1846 में जब्त कर ली गई थी।17 नवंबर 1846 को वे लंदन भेजे गए। 22 सितंबर 1847 को एक सनद के जरिए अंग्रेजों ने हरिद्वार स्थित उनका घर पटियाला के राजा को दे दिया।

अजीत सिंह  को हिरासत में लेकर उन्हें इलाहाबाद किले में कैद कर लिया गया। मगर अपने रखवाले पहरेदार को मारकर भागने में वे सफल रहे।

पहाडि़यों में लंबे समय तक भटकने के बाद कश्मीर में उनकी मौत हो गई। उनके बच्चे भदौर सरदारों के साथ संयुक्त रुप से आठ गांवों के मालिक थे जिन्हें अंग्रेजों द्वारा  बेच दिया गया।

निष्कर्ष

संक्षेप में कहे तो प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध सिख साम्राज्य के लिए एक निर्णायक मोड़ था जिसने पंजाब की राजनीतिक स्वतंत्रता को समाप्त कर दिया और ब्रिटिश साम्राज्य के उत्तर-पश्चिम विस्तार को पुर्णता प्रदान की।

इस युद्ध के बाद लाहौर की संधि हुई जिसने पंजाब की संप्रभुता को भारी आघात पहुँचाया। जिसके चलते सिखों पर भारी युद्ध हर्जाना लगाया गया और जलंधर दोआब क्षेत्र परअंग्रेजों का अधिकार हो गया। हर्जाना न चुका पाने के कारण कश्मीर को डोगरा शासक गुवाब सिंह को बेच दिया गया।

लाहौर दरबार में एक ब्रिटिश रेजिडेंट की नियुक्ति की गई जिससे पंजाब की राजनीति और प्रशासन पर अंग्रेजों का सीधा प्रभाव स्थापित हो गया। इसके साथ ही अंग्रेजों द्वारा महाराजा रणजीत सिंह द्वारा बनाई की शक्तिशाली सिख सेना को सीमित और कमजोर कर दिया गया।

यह युद्ध सिख साम्राज्य के पतन की शुरुआत साबत हुआ। हलांकि सिखों ने अपनी स्वायत्तता बचाने के लिए कड़ा संघर्ष किया। लेकिन द्वितीय आंग्ल-सिख युद्ध में सिख साम्राज्य को पुरी तरह से ब्रिटिश साम्राज्य में विलय कर लिया गया

2026-10-07

वांडीवाश का युद्ध

digital painting of a battle of wandiwash

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम वांडीवाश युद्ध के बारे में बात करने जा रहे है जो फ्रांस ईस्ट इंडिया कंपनी के पतन का मुख्य कारण बना। यह युद्ध तीसरे कर्नाटक युद्ध के दौरान हुआ। वांडीवाश का यह युद्ध दक्षिण भारत में एक निर्णायक सैन्य संघर्ष था भारत उप महाद्वीप में यूरोपीय शक्ति संतुलन को स्थायी रुप में बदल दिया। इस युद्ध के परिणामों के बाद ही पेरिस की संधि पूर्ण हुई। इस संधि में ज्यादा लाभ यूरोप को हुआ।

परिचय

22 जनवरी 1760 को लड़ा यह युद्ध ब्रिटिश और फ्रांस ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच वर्चस्व की लडाई थी। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की तरफ से सर आयर कूट ने नेतृत्व किया था वहीं फ्रांस ईस्ट इंडिया कंपनी का नेतृत्व कर्नल काम्टे डी लैली, काऊंट थामस आर्थर, बैरन डी टोलेड़ल ने किया था।

यह युद्ध कर्नाटक के तीसरे युद्ध का दौरान हुई घटना का हिस्सा था जो 1756 से 1763 तक लगभग 7 सालों तक चलता रहा। इस युद्ध के नामकरण की बात करें तो इसे भारतीय भाषा में वंद वासी कहा जाता था लेकिन ब्रिटिश अधिकारियों ने इसे वांडीवाश बना दिया। यह युद्ध तमिलनाडु के तिरुवन्नमलाई जिले के वंदवासी यानी वांडीवाश स्थान पर लड़ा गया था जो कोरोमंडल तट से करीब 5किलो मीटर दूर है।

इसे कर्नाटक युद्ध क्यों कहा जाता है

इसे कर्नाटक युद्ध इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह युद्ध 18वीं शताब्दी के ऐतिहासिक कर्नाटक क्षेत्र में लड़ा गया था। यहां नाम को लेकर भ्रम होना स्वाभाविक है क्योंकि 18वीं सदी के कर्नाटक और वर्तमान कर्नाटक राज्य दोनों बिल्कुल अलग है।

वर्तमान कर्नाटक राज्य
18वीं सदी में यह क्षेत्र मैसूर साम्राज्य के अंतर्गत आता था जिसके विभिन्न क्षेत्रों कई अन्य शासकों के द्वारा नियंत्रित किए जाते थे जैसे कि हैदर अली टीपू सुलतान फिर हैदराबाद के निजाम और मराठा साम्राज्य के अधीन था। 

18वीं सदी में जहां यह युद्ध हुआ वह वर्तमान तमिलनाडु और दक्षिणी आंध्रा प्रदेश का तटीय इलाका कोरोमंडल तट था। प्राचीन कर्नाटक के अंतर्गत अर्काट चेन्नई पांडिचेरी वंदवासी और तिरुतिरापल्ली  आते थे जो वर्तमान समय में भी तमिलनाडू का हिस्सा है।

नामकरण कि बात करें तो यह विजय नगर साम्राज्य का प्रभाव है मूल रुप से कर्नाटक शब्द दक्कन के पठार में रहने वाले कन्नड़ भाषी क्षेत्र के लिए इस्तेमाल होता था। खास बात यह है कि जब विजय नगर साम्राज्य का विस्तार पूर्व और दक्षिण में तमिलनाडु के मैदानों तक हुआ तो पठार के नीचे के इस इलाके को भी कर्नाटक कहा जाने लगा।

युद्ध की मुख्य घटना

दरअसल यह युद्ध सिर्फ वर्चस्व की लड़ाई थी जिसमें शोषण सिर्फ भारतीयों का ही हुआ था क्योंकि फ्रांसीस ईस्ट इंडिया कंपनी की तरफ से भी भारतीय लड़ रहे थे और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की तरफ से भी भारतीय ही अधिक मात्रा में लड़ रहे थे यानी जान भारतीयों की जाती और सत्ता दोनों ही और से ओर से कोई और चलाता।

19वीं सदी की किताब एनल्स आफ द एटीन सेंचुरी के अनुसार लेखक एडुआर्ड कास्ट लिखते है कि फ्रांसीसी सेना में 300 यूरोपीय घुड़सवार लगभग 2300 यूरोपीय सेना 1300 भारतीय सैनिक जवान और तीन हजार मराठा योद्धा और 16 तोपें शामिल थीं। जबकि ब्रिटिश सेना में 80 यूरोपीय घोड़े 250 भारतीय घोड़े 1950 यूरोपीय पैदल सेना और 2000 से अधिक भारतीय सेना के सिपाही एवं 26 तोपें शामिल थी।

युद्ध की शुरुआती घटना में फ्रांस ईस्ट इंडिया कंपनी का वांडीवास फोर्ट सेंट डेविड किले पर अधिकार था जिसे ब्रिटिश सैनिकों ने अपने नियंत्रण में ले लिया था जिसे पुनः प्राप्त करने के लिए फ्रांसीस सेना ने आक्रमण किया। इस युद्ध में फ्रांसिस सेना का साथ स्थानीय पोलीगारों और पिल्लई परिवार ने दिया लेकिन इनके समर्थन के बावजूद फ्रांस सेना को नौसैनिक सहायता और धन की कमी का सामना करना पड़ा।

बताया यह भी जाता है कि फ्रांस की ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में नस्लीय भेद-भाव होने के कारण आपसी मतभेद भी चल रहा था। क्योंकि इन्होंने सेना को वाई एण्ड ब्लैक यानी रंग भेद के आधार पर सुसज्जित किया था। इस युद्ध में शायद इन्हीं कारणों से फ्रांस ईस्ट इंडिया कंपनी की हार हुई।

युद्ध के परिणाम

लैली की सेनापति मार्किस डी बुसी को बंदी बना लिया गया  इसके बाद फ्रांसीसी सेना पुडुचेरी तक ही सीमित रह गई, जिसने भारी संघर्ष के बाद 16 जनवरी 1761 को आत्मसमर्पण कर दिया। लैली को बाद में पेरिस में चले मुकदमे के चलते राजद्रोह का आरोप लगने के कारण कैद कर लिया गया औऱ फांसी दे दी गई।

1761 को समर्पण के बाद भारत में फ्रांसीसी स्थिति का पतन उन घटनाओं में से एक था जिसने फ्रांस को पेरिस संधि पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर किया जिससे भारत में फ्रांसीसी केवल व्यापारी बनकर रह गए और भारत देश में फ्रांसीसी साम्राज्य वादी महत्वाकांक्षाओं का प्रभावी रुप से अंत हो गया। 

दूसरी ओर ब्रिटेन ने अन्य यूरोपीय शक्तियों पर भारत में अपनी सर्वोच्चता स्थापित कर ली। इस हार के बाद फ्रांसीसी अधिकृत क्षेत्र चेटपट्टू तिरुवन्नामलाई तिंडीवनम और पेरुमुक्कल आदि क्षेत्रों पर ब्रिटिशस का अधिकार स्थापित हुआ। इसके साथ ही फ्रांसीसी सेना ने जिंजी माहे और कराईकल सहित कई अन्य रणनीतिक केंद्र खो दिए।

फ्रांस ने पांडिचेरी और चंदन नगर को केवल व्यापार के लिए अपने पास रखा ये क्षेत्र भी उन्हें इस शर्त पर दिए गए थे कि वे न तो किले बंदी करेंगे और न ही सैनिक तैनात करेंगे।

1763 की पेरिस संधि

हालांकि यह संधि वांडीवाश के युद्ध के बाद नहीं की गई थी बल्कि तीसरे कर्नाटक युद्ध में मिली जीत के बाद हस्ताक्षरित की गई थी मगर इसके मुख्य तार वांडीवाश की ब्रिटिश जीत से आधारित थे य जुड़े थे। क्योंकि इसी सात वर्षीय कर्नाटक विद्रोह को ही अमेरिका में फ्रांसीसी और भारतीय युद्ध के नाम से जाना जाता है।

इस संधि पर हस्ताक्षर होने के साथ ही उत्तरी अमेरिका पर नियंत्रण को लेकर फ्रांस और ग्रेट ब्रिटेन के बीच का संघर्ष औपचारिक रुप से समाप्त हो गया और यूरोप  से बाहर ब्रिटिश प्रभुत्व के एक नए युग की शुरूआत हुई। संधि के बाद ब्रिटेन और फ्रांस दोनों ने युद्ध के दौरान कब्जा किए गए अधिकांश क्षेत्र वापस कर दिए।

वहीं ब्रिटेन को उत्तरी अमेरिका में फ्रांस के कई क्षेत्र प्राप्त हुए। इसके अलावा ब्रिटेन ने भविष्य में रोमन कैथोलिक धर्म को समाप्त करने का प्रयास न करने पर सहमति दी। इस संधि में परशिया और आस्ट्रिया देश शामिल नहीं थे जिसके चलते इन्होंने पांच दिन बाद हयूबर्टसबर्ग की संधि पर हस्ताक्षर किया था।

इस 7 वर्षीय कर्नाटक युद्ध के बाद ब्रिटेन ने कनाडा ग्वाडेलूम सेंट लूसिया मार्टीनिक डोमिनिका कनाडा सेंट विसेंट औऱ ग्रेनाडाइन्स तथा टोबैगो की फ्रांसीसी उपनिवेशों चंदन नगर और पांडिचेरी सहित भारत में फ्रांसीसी कारखानों तथा व्यापारिक चौंकियों और गौरी दास का व्यापारिक केंद्र , सेनेगल नदी और उसकी बस्तियों, फिलीपींस के मनीला, क्यूबा के हवाना में स्पेनिश उपनिवेशों पर विजय प्राप्त की थी। 

इसमें फ्रांस ने मिनोर्का और सुमात्रा में ब्रिटिश व्यापारिक चौंकियों पर कब्जा कर लिया था जब्कि स्पेन ने पुर्तगाल में अल्मेडा के सीमावर्ती किलों और दक्षिण अमेरिका में कोलोनिया डेल सैक्रामेंटों पर कब्जा कर लिया था। 

यहां खास बात यह भी यह कि पेरिस संधि के बाद उत्तरी अमेरिका का एक नया नक्शा तैयार किया गया था। संधि के अधिकांश क्षेत्रों को उनके मूल स्वामी को वापस कर दिये गए थे लेकिन ब्रिटेन को काफी ज्यादा लाभ रखने की अनुमति दी गई।

निष्कर्ष

इसमें अंग्रेजों की निर्णायक जीत हुई 22 जनवरी 1676 में ब्रिटिश सेनापति सर आयर कूट ने फ्रांसीसी सेनापति सर काम्टे डी लाली को पराजित किया। जिससे फ्रांसीसी ठिकानों का पतन हुआ। वांडीवाश की हार के बाद 1761 में अंग्रेजों ने पांडिचेरी जिंजी और माहे पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया, जिससे भारत में फ्रांसीसी सैन्य शक्ति पूरी तरह ध्वस्त हो गई।

वांडीवाश का युद्ध पेरिस की संधि का पहला चरण था जिसे हम कर्नाटक के तीसरे युद्ध के अन्तर गत हुई एक घटना के रुम में जानते है यह यूरोप में चल रहे सप्त वर्षीय युद्ध का परिणाम था जिसके चलते इस सप्त वर्षीय युद्ध के अंत में पेरिस की संधि हुई। इस संधि के चलते अंग्रेजों ने पांजिचेरी और चंद्र नगर जैसे फ्रांसीसी क्षेत्रों को वापस तो कर दिया मगर उन पर कड़ी शर्तें थोपी गई।

फ्रांसीसीयों को अपने क्षेत्रों की किलाबंदी करने और वहां सैन्य बल रखने से स्थायी रुप से रोक दिया गया। फ्रासीसी ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत में सिर्फ व्यापारिक संस्था के रुप में काम करने की अनुमति मिली।
 

2026-10-05

दुर्गा दास राठौर

digital painting of a durgadas rathore

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में मारवाड़ की सेना में राजपूत सेनापति एवं राजनेता दुर्गा दास राठौर के कार्यों तथा उनके जीवन पर प्रकाश डाला गया है। दुर्गा दास जी एक सच्चे देश भक्त के साथ-साथ एक बहादुर सेनापति भी थे। मुगल सत्ता ने उन्हें कई बार प्रलोभन देकर अपने साथ मिलाने का प्रयास किया मगर दुर्गा दास उनके प्रलोभन में नहीं फंसे वे चाहते तो जन समर्थन से मारवाड़ की गद्दी भी ले सकते थे मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया।

वे अपनी स्वामी भक्ति से वचन बद्ध रहे जिसका खामियाजा भी उन्हें ही भुगतना पड़ा। उनके शौर्य और राजनीतिक सूझबूझ के चलते राजा से ज्यादा लोग उनकी प्रशंसा करते थे जिसके कारण मारवाड़ के राजा को उनसे ईर्ष्या होने लगी जिसके चलते राजा ने उन्हें अपने साम्राज्य से बाहर निकाल दिया य यूं कहे तो देश निकाला कर दिया। 

जबकि मारवाड़ के राजा दुर्गा  दास के प्रयासों से ही मारवाड़ के राजा बन पाये थे मगर  दोस्तों ईर्ष्या इतनी खराब चीज़ होती है कि यह आपको अपने खास य प्रिय लोगों से भी दूर ले जाती है। जिसका एक अच्छा खासा उदाहरण हमें दुर्गा दास जी की इस कहानी में देखने को मिलेगा।

जीवन परिचय

उनका जन्म राजस्थान की मारवाड़ रियासत में 13 अगस्त 1968 में हुआ था। उनके पिता आस्करण राठौर तात्कालिक  राजा जसवंत सिंह के राज मंत्री थे। तथा उनके दादा राव रणमल राजपूत वंश कराना से संबंध रखते थे। हलांकि कुछ ग्रंथों में दुर्गा दास  राठौर को मारवाड़  राजा के दूर के चाचा के बेटे के रुप में भी दर्शाया गया है। उनकी माता का नाम बाई जी नेत कंवर जी था जो कि सलवासा गांव से थीं।

राठौर साहब की दो पत्नियां थी  पहली का नाम लक्ष्मण कंवर तथा दूसरी का नाम केसर कंवर था। इनके चार पुत्र हुए जिनका नाम इस प्रकार है पहले का नाम अभय सिंह दूसरे का नाम तेज सिंह तीसरे का नाम अनोप सिंह तथा चौथे पुत्र का नाम दिलीप सिंह था। दुर्गा दास राठौर तीन भाई थे उनके भाइयों का नाम सुजान सिंह और जोरावर सिंह था।

उन्हें मुख्य रुप से राजा जसवंत सिंह के उत्तराधिकारी के रुप में जाना जाता है दरअसल एक युद्ध के दौरान राजा की हत्या कर दी गयी थी अतः षड्यंत्रकारियों से राजा के उत्तराधिकारी की रक्षा करने के लिए उन्होंने उनके पुत्र का संरक्षण किया तथा उन्हें पुनः राजगद्दी पर स्थापित करने अहम भूमिका निभाई। 

बचपन की घटना

अपने बचपन में दुर्गा दास राठौर लुनावे गांव में मकई की खेती किया करते थे। एक दिन राईका  यानी ऊंट चराने वाले ने उनके खेतों में अपने ऊंटों के चरने के लिए छोड़ दिया। परिणामस्वरूप पूरी फसल बर्बाद हो गयी जब वे राईका के ऊंटों द्वारा हुए अपने नुकसान का मुआवजा लेने के लिए गए तो राईका ने उन्हें बुरा भला कहा तथा राजा को भी टूंडा कहा है।

दरअसल उस समय राजा जसवंत सिंह मुगल साम्राज्य के अधीन एक सामंत के रुप में प्रशासन चलाया करते थे। मगर ऊंट चरवाहे की बातों को दुर्गा दास राठौर ने बहुत गंभीरता से और क्रोध में आकर उसकी जान ले ली।

मामला राज दरबार में पहुंचा तब दुर्गा दास के पिता भी राज दरबार में उपस्थित थे मगर उन्होंने अपने बेटे की तरफ से राजा से पैरवी नहीं की जबकि वे चाहते तो ऐसा कर सकते थे क्योंकि वे राज दरबार में ही मंत्री पद पर आसित  थे।

हलांकि राजा ने उन्हें बोलने का मौका दिया उन्होंने उनके पिता अस्करण से पुछा गया क्या ये तुम्हारा बेटा है तो उन्होंने जवाब देते हुए कहा महाराज कुपुत्र को पुत्र नहीं कहते। इसके बाद जब राजा ने दुर्गा दास से उनके अपराध के बारे में पुछा तो उन्होंने बड़ी निर्भीकता से अपराध को स्वीकार किया और राजा को बताया कि।

महाराज मैंने उस राईका की हत्या इस लिए की क्योंकि वे मेरे और आपके बारे में गलत बातें कर रहा था जो मुझसे सहन नहीं हुआ और मैंने उसकी हत्या कर दी। बालक की निर्भीकता से राजा बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने दुर्गा दास राठौर की पीठ थपथपाई।

बालक अजीत सिंह का सरंक्षण

28 नवंबर 1678 में जमरुद वर्तमान अफगानिस्तान  में युद्ध के दौरान राजा की मौत हो गयी। राजा  की दो रानियां थी पहली का नाम जादम और दूसरी का नाम नरुकी था जब राजा मरे उस समय काल ये दोनों गर्भवती थी। मगर राजा को अन्य वंशज राजगद्दी संभालने के लिए जीवित नहीं था। अतः मुगल साम्राज्य के सामंत होने नाते सभी फैसले मारवाड़ प्रशासन के लिए औरंगज़ेब द्वारा लिए जाते थे जिसके चलते मुगल शासन ने राजा जसवंत सिंह के भाई अमर सिंह के पौत्र इंद्र सिंह को मारवाड़ की गद्दी का कार्यभार सौंपा।

हलांकि वे नाम मात्र का  राजा था सभी कार्य मुगल प्रशासन द्वारा ही संभाला जाता था इंद्र सिंह की निगरानी के लिए राज दरबार में मुगल सैनिक तैनात किए गए थे। दूसरी तरफ जब 1679 में औरंगज़ेब को जसवंत सिंह की रानियों के गर्भवती होने की सूचना मिली तो उन दोनों को साथ दुर्गा दास राठौर के माध्यम से दिल्ली बुलाया गया। दिल्ली पहुंचने पर दोनों रानियों को नजरबंद कर दिया गया।

हलांकि दुर्गा दास बालकों के संरक्षण के लिए मुगल सम्राट के समक्ष गये थे क्योंकि विद्रोही जसवंत सिंह के वंशज छोटे राजकुमारों की हत्या की साज़िश रच रहे थे। रानियों के नजरबंद करने पर दुर्गा दास को मुगल सम्राट की नीतियों पर शक होने लगा इससे पहले की वे कोई प्रतिक्रिया दे पाते उससे पहले ही छोटे राजकुमार दल भंजन जिन्हें कहीं-कहीं दल चंबन भी कहा गया है कि हत्या कर दी गयी। अब राजा जसवंत सिंह के इकलौते उत्तराधिकारी अजीत सिंह बचे थे। 

प्रलोभन देने का प्रयास

जब दुर्गा दास समेत मारवाड़ के कई प्रमुख सरदार अजीत सिंह को उत्तराधिकारी के रुप में मान्यता दिलाने के लिए दिल्ली गए तब औरंगज़ेब में उनकी विनती को ठुकरा दिया हलांकि उसने राजकुमार अजीत सिंह के  बालिग होने पर उसे उपाधि और जागीर देने का प्रस्ताव रखा। 

मगर औरंगज़ेब ने शर्त यह रख दी की बालक का पालन-पोषण शाही हरम ही होगा और रानियां भी वहीं रहेंगी। समकालीन ग्रंथों में यहां तक मिलता है कि औरंगज़ेब ने अजीत सिंह को जोधपुर की गद्दी देने का प्रस्ताव रखा मगर बच्चे का पालन पोषण मुस्लिम धर्म में होगा। यानी उसे एक मुस्लिम राजा बनाया जायेगा।

औरंगज़ेब ने अपनी इस नीति को अंजाम देने के लिए दुर्गा दास राठौर के अपनी एक रियासत देने का प्रलोभन दिया ताकि वे अन्य सरदारों को उसके इस कृत्य पूर्ण करने के लिए सहमत कर सकें। मगर दुर्गा दास ने उनके इस प्रलोभन को अस्वीकार कर दिया।

इस प्रकार दुर्गा दास जी ने सारी बात अपने सहयोगी सरदारों को बताई जिसके चलते औरंगज़ेब का रवैया राठौर प्रतिनिधिमंडल को स्वीकार्य नहीं था इसलिए उन्होंने अजीत सिंह और रानियों को दिल्ली से छुड़ाने का प्रण लिया। हलांकि वे सभी जानते थे इस कार्य को अंजाम देने में उनमें से कई लोगों की मारे जा सकतें है मगर वे पीछे नहीं हटे।

25 जून 1679 को ही वे शहर से निकलने में सफल रहे मगर मुगल सैनिकों ने उनका पिछा किया राजकुमार अजीत सिंह की रक्षा के लिए दुर्गा दास राठौर ने कई भंयकर और घातक बाचव अभियानों को अंजाम दिया। सैनिकों का पिछा शाम तक जारी रहा जब तक कि वे थक नही गए मगर अंत में वे रानियों और राजकुमार के लेकर भागने में सफल रहे।

अंत में राजकुमार को बलुंडा ले जाया गया जहां प्रतिनिधिमंडल के एक सदस्य की पत्नी ने बालक को एक वर्ष तक अपने पास रखा। उसके बाद बालक को मारवाड़ के दक्षिण छोर पर दूरस्थ कस्बे सिरोही के पास अरावली पहाड़ियों में सुरक्षित स्थान पर ले जाया गया। यहां के वासी जयदेव नामक ब्राह्मण ने राजकुमार की परवरिश की।

कुशल निर्णायक

दुर्गा दास राठौर को पहले से ही पता था कि कभी न कभी मुगल सैनिक राजकुमार को खोजते हुए पहाड़ियों में जरुर आ जायेंगे अतः राजा की सुरक्षा का जिम्मा लेते हुए दुर्गादास ने जोधपुर के राजा राजसिंह से पहले ही मदद मांग ली थी बदले में जोधपुर के राजा ने उन्हें अपनी केलवा की जागीर का पट्टा दिया था।

अतः यह क्षेत्र मारवाड़ प्रशासन से बाहर का क्षेत्र था जहां मुगल सैनिकों को अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर का होने के नाते जाने की मनाही थी सो वे वहां नही जा सकते थे। इस प्रकार राजकुमार यहां सुरक्षित थे।

कुशल कुटनीतिकार

दुर्गा दास एक योद्धा होने के साथ ही एक कुशल कूटनीति कार भी थे। एक तरफ उन्होंने राजकुमार की रक्षा की दुसरी तरफ अपनी मातृभूमि मारवाड़ की भी रक्षा की। जब औरंगज़ेब ने अपने बेट अकबर को मारवाड़ पर आक्रमण करने के लिए भेजा तब दुर्गा दास राठौर और जोधपुर के राजा राजसिंह ने मिलकर कूटनीतिक चाल चलकर कर बाप-बेटे को ही आपस में लड़ा दिया इस प्रकार मारवाड़ की सुरक्षा को सुनिश्चत किया।

अतः राजकुमार के बड़े होने पर राजा अजीत सिंह को गद्दी पर बिठाने में सफल रहे।

अंतिम समय

दुर्गा दास राठौर के अंतिम समय में महाराजा अजीत सिंह के साथ कुछ कारणों से अनबन हो  गयी थी दरअसल दुर्गा दास का कदीमी ठिकाना गांगाणी ठिकाना किसी और राजा द्वारा दे दिया गया था। दरअसल राजा अजीत सिंह दुर्गा दास की ख्याती से जलने लगे थे उन्हें ऐसा लगने लगा था कि राजा होने के नाते जो सम्मान दुर्गादास जी को  मिल रहा था वो उन्हें मिलना चाहिए।

अंत राजा ने अपने ईष्यालु चरित्र तथा सम्मान की लालच में दुर्गादास को मारवाड़ से बाहर निकाल दिया। अपने कर्तव्यों को पुरा करने के बाद और राजा जसवंत सिंह से किए अपने वादे को निभाने के बाद मारवाड़ छोड़ दिया। इसके बाद वे कुछ समय जोधपुर उदय पुर  रामपुरा  भानपुरा क्षेत्रों में घुमें फिर पुजा करने के लिए महाकाल उज्जैन चले गए।

उनका अंतिम समय उज्जैन में बिता जहां उन्होंने 22 नवंबर 1718 को अंतिम सांस ली। जब उनका देहांत हुआ तब उनकी उम्र 81 वर्ष की थी। राजघरानों पर व्यंग्य करते हुए एक बारहठ ने लिखा-
इण घर री आ ही रीत दुरगो सिफरो दागियो। कहने का मतलब है राजा अपनी गद्दी के लिए अपनों की भी जान ले सकता है।

हलांकि इतिहास गवाह है कि हर कोई राजकुमार य राजा अजीत  सिंह की तरह घटिया नही होता।

निष्कर्ष

वीर दुर्गादास राठौड़ भारतीय इतिहास में अदम्य साहस निस्वार्थ स्वामी भक्ति और उच्च नैतिक मूल्यों के अनूपम प्रतीक है। औरंगजेब की साम्राज्यवादी नीतियों के विरुद्ध लगभग तीन दशकों तक चला उनका अनवरल संघर्ष केवल मारवाड़ के सिंहासन की रक्षा का प्रयास नही था, बल्कि अपनी मातृभूमि क स्वाभिमान और संस्कृति की रक्षा का संकल्प था।

सत्ता और पद की लालसा से परे रहकर उन्होंने महाराजा अजीत सिंह को उनका अधिकार दिलाया और मुगलों के समक्ष भी अपने अनुशासित व उच्च चरित्र की छाप छोड़ी। उनका जीवन यह संदेश देता है कि सच्चा नेतृत्व त्याग कूटनीति और नैतिक दृढ़ता में निहित है।