Indian History reveal the Past

हमारे इस ब्लॉग में भारतीय इतिहास, सांस्कृतिक इतिहास, राजवंशों आंदोलन स्टार्टअप टेक्नोलॉजी कला और वास्तुकला तथा आर्थिक इतिहास से संबंधित विषयों पर जानकारी दी जाती है। हम कम से कम शब्दों में ज़्यादा से ज़्यादा जानकारी देने की कोशिश कर रहे हैं।

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2026-10-15

नालन्दा विश्वविद्यालय

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प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम नालन्दा विश्वविद्यालय के इतिहास के बारे में बात करने जा रहें है एक समय ऐसा था जब देश विदेश के लोग यहां शिक्षा ग्रहण करने के लिए आते थे। यहां खगोल शास्त्र गणित तथा दर्शनशास्त्र आदि जैसे वैज्ञानिक विषयों को पढ़ाया जाता था। खास बात यह है कि इसी भारतीय विश्वविद्यालय में शून्य की खोज की गई थी।

इसके साथ ही यहां पाई का मान तथा चिकित्सा विज्ञान की ऐसी तकनीकों की खोज उस समय के काल में ही कर ली गयी थी जो आज के वैज्ञानिक खोजने में ही वर्षों का समय लगा देते है। यहां के प्रसिद्ध शिक्षक नागार्जुन जी ने माध्यमिक सूत्र नाम का एक ग्रंथ लिखा था जिसमें उन्होंने थ्योरी आप रिलेचीविटी का सिद्धांत दिया था।

जिसे हम वर्तमान समय में आईंस्टीन की थ्योरी आफ रिलेटीविटी के नाम से जानते है। हलांकि प्राचीन काल में इसका नाम कुछ ओर ही था मगर वर्तमान समय में हम इस आईंस्टीन की थ्योरी के नाम से ही जानते है।

इतिहास

इस विश्वविद्यालय की स्थापना गुप्त राजवंश के राजा कुमार गुप्त द्वारा की गई थी। हलांकि एक तरह से देखा जाये तो इसकी स्थापना का मुख्य श्रेय उनके पिता चंद्रगुप्त को जाता है जिन्हें हम विक्रमादित्य के नाम से भी जानते है।

क्योंकि उन्होंने ही अपने साम्राज्य को इतना समृद्ध बनाया की राजा कुमार गुप्त को उस समय काल की प्रसिद्ध आक्रमण नीति से दूर हटके तथा किसी बाहरी शासक के आक्रमण के भय को दूर करने में अहम भूमिका निभाई।

महाराज विक्रमादित्य के दरबार में नौ रत्न थे जो कि अपने अलग-अलग विषयों में महारत हासिल किए हुए थे। प्रथम कालिदास जो कि संस्कृत के महाकवि और नाटककार थे। द्वितीय धनवंतरि जो कि आयुर्वेद के महान आचार्य और चिकित्सक थे। इन्हें शल्य चिकित्सा और औषधीय विज्ञान का ज्ञाता माना जाता था।

तृतीया क्षपणक थे ज्योतिष शास्त्र और बौद्ध दर्शन के ज्ञाता थे। चौथे शंकु थे जिन्हें एक महान वास्तुकार और शिल्पकार गणितज्ञ माना जाता था। पांचवें अमर सिंह थे इन्हें महान संस्कृत का ज्ञाता और व्याकरण शास्त्री माना जाता थ। इन्होंने ही संस्कृत शब्दकोश अमरकोश की रचना की थी।

छठवें बेताल भट्ट वे जादू तंत्र-मंत्र और नीति शास्त्र के प्रकांड विद्वान थे सातवें घटकर्पर वे संस्कृत व्याकरण के ज्ञाता और शिल्प और कविता के ज्ञाता थे। आठवें वराहमिहिर थे वे प्राचीन भारत के महान खगोल शास्त्री और गणितज्ञ थे। इनकी प्रमुख रचना पन्चसिद्धान्तिका तथा बृहत्संहिता आदी थीं।

अंतिम वररुचि जी थे जिन्हें हम व्याकरण और प्राकृत भाषाओं के आचार्य के रुप में जानते हैं। इन्होंने पाणिनि की व्याकरण पर की टीकाएं लिखी थी।

महाराज कुमार गुप्त

415 ईस्वी में जब महाराज कुमार गुप्त ने मगध की गद्दी को सम्भाला तो उन्हें एक ऐसा साम्राज्य मिला जहां न तो पैसों की कमी थी और न ही दुश्मनों का डर चारों तरफ सुख और शांति का माहौल था। ऐसे में राजा कुमारगुप्त के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि साम्राज्य को इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए अमर कैसे किया जाए।

उनकी इसी सोच ने दुनिया के सबसे बड़े विश्व विद्यालय के निर्माण की योजना को जन्म दिया। इस प्रकार 427 ईस्वी के लगभग इसका निर्माण प्रारम्भ करवाया।

आचार्य नागार्जुन

भले ही महाराज कुमार गुप्त ने इसका निर्माण प्रारम्भ करवाया मगर इस मिट्टी में ज्ञान का बीच सदियों पहले आचार्य नागार्जुन द्वारा ही बोया गया था। वे बौद्ध धर्म के महान दार्शनिक और चिकित्सक थे जो कि कुमार गुप्त के शासन काल से 200 वर्ष पहले के थे। उन्होंने रस चिकित्सा की खोज की तथा धातुओं की भस्म बनाने की विधि से चिकित्सा करने की खोज की।

इसके साथ ही उन्होंने माध्यमिक सूत्र नाम एक ग्रंथ की रचना की जिसमें उन्होंने शून्य का सिद्धांत दिया। जो की वर्तमान समय में आइंस्टीन की थ्योरी आफ रिलेटिविटी से मिलता जुलता है। नागार्जुन और उनके शिष्यों ने राजगृह के जंगलों में छोटे-छोटे आश्रम बना रखे थे जहां देश-विदेश के छात्र शिक्षा ग्रहण करने के लिए आते थे।

जब कुमारगुप्त राजा बने तो उन्होंने देखा कि ज्ञान का यह समंदर छोटे-छोटे और अलग-अलग आश्रमों में बिखरा हुआ है। उन्होंने सोचा की तलवार के दम पर बनाए गए साम्राज्य की एक समय सीमा होती है मगर भारत को हमेशा के लिए विश्व गुरु बनाने के लिए हमें जमीन के बदले इंसनी दिमाग को जीतना होगा और ज्ञान की शक्ति पर भरोसा करना होगा।

कुमार गुप्त की रणनीति

राजा कुमार गुप्त स्वयं के पक्के सनातनी थे और भगवान कार्तिकेय के उपासक थे लेकिन वे ज्ञान का सम्मान करते थे। उनका उद्देश्य एक ऐसा महाविहार य विद्यालय खड़ा करने का था जहां विदेशी छात्र तथा जनता सेना देखकर नहीं बल्कि भारतीय आचार्यों का दिमाग देख कर दंग रह जाएं।

इसके लिए उन्होंने राजगीर के पास एक पवित्र जमीन को चुना जहां पहले आमों का बगीचा हुआ करता था यह वही स्थान है जहां पर आचार्य नागार्जून के शिष्यों के आश्रम थे। इस स्थान के इतिहास के बारे में बताया जाता है की प्राचीन व्यापारियों ने यह स्थान खरीद कर भगवान बुद्ध को अर्पित किया था।

विश्वविद्यालय को हमेशा के लिए आत्मनिर्भर बनाने के लिए कुमार गुप्त ने एक योजना बनाई अतः इसके परिणामस्वरूप नालन्दा विश्वविद्यालय के आसपास के 100 सबसे अमीर गांवों की एक सूची तैयार करवाई और इन गांवों के लिए एक कानून पास किया की इन गांवों से मिलने वाला सारा कर अनाज दूध घी और कपड़ा आदि सीधे नालन्दा विश्वविद्यालय के कोश में जाएगा।

इसका सिधा मतलब यह था कि विश्वविद्यालय को अपने खर्च के वहन के लिए सरकार पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।

निर्माण कार्य की रणनीति

इस प्रकार 427 ई.में नालन्दा विश्वविद्यालय का निर्माण कार्य शुरु हुआ। चारों तरफ पत्थरों की 40 फुट के लगभग की पत्थरों की दीवारों का निर्माण करवाया गया। जिससे एक सुरक्षित किले का निर्माण हो सके इसके साथ ही अंदर आने जाने के लिए सिर्फ मुख्य द्वारा को ही रखा गया। नालन्दा में कुल 8 बड़े हाल परिसर और 300 से ज्यादा  कमरों का निर्माण करवाया गया।

उस समय काल में बिजली की व्यवस्था नहीं थी जिसका ख्याल रखते हुए प्राकृतिक रोशनी को परिसर में पहुंचाने की उचित व्यवस्था की गई इसके साथ ही हवा के आवागमन का भी इमारत के निर्माण में उचित ख्याल रखा गया। छात्रों के कमरों में पत्थर की खाट का निर्माण किया गया ताकि वे ज्यादा दिन चलें और उन्हें सुरक्षा प्रदान करें।

किताबों के शेल्फ

किताबों को रखने के लिए दुर्लभ शेल्फ का निर्माण किया गया था ताकि हाथ से लिखी पोथियां नमी और दीमक लगने से खराब न हो सकें। परिसर में समय देखने के लिए तांबे के कटोरे का इस्तेमाल किया जाता था जिसकी सतह में एक छेद होता था जो की धीरे-धीरे कटोरे के बर्तन को पानी भरता रहता था।

अतः जब कटोरा डूब जाता था तो एक घण्टा पूरा होता था। इस प्रक्रिया को पूरे दिन में 12 बार दोहराया जाता था। कटोरे के भरने पर भिक्षु एक बड़ा नगाड़ा बजाते थे जिससे विषय के बदलने तथा भोजन के समय का पता चलता था।

द्वारपाल की भूमिका

नालन्दा विश्वविद्यालय के द्वारपाल एक ज्ञानी आचार्य होते थे जिन्हें सभी विषयों का अच्छा ज्ञान होता था। वे ही सुनिश्चित करते थे कि किन छात्रों के विश्वविद्यालय में प्रवेश दिया जायेगा और किन को नहीं। वे विश्वविद्यालय पर आये सभी छात्रों का स्वागत करते थे और उनकी बुद्धि की परख करने के लिए उनसे प्रश्न पुछते थे। 

जो उनके सवालों का सही जवाब देता था उसे ही विश्वविद्यालय में प्रवेश की अनुमति मिलती थी। इस प्रकार से लिए प्रवेश के बाद छात्रों का सम्पूर्ण खर्च विश्वविद्यालय वहन करता था छात्रों का एक पैसा भी नहीं लगता था।

परिसर में सिर्फ 10000 छात्रों को ही प्रवेश की अनुमति थी जिन्हें 1500 आचार्यों द्वारा प्रशिक्षित किया जाता था।

आर्यभट्ट का सिद्धांत

476 ईसा  पूर्व के  समय में जब लोग मानते  थे कि पृथ्वी चपटी है और राहु-केतु के प्रकोप से ग्रहण लगता है। तब इसी विद्यालय के गणितज्ञ आर्यभट्ट ने नालन्दा के  वेधशाला में बैठकर तारों की गणना पहले स्वयं सिखा तथा इससे पर शोध किया। शोध के बाद उन्होंने दुनिया को बताया की पृथ्वी गोल है और अपनी धुरी पर घुमती है और ग्रहण किसी राक्षस के कारण नहीं बल्कि पृथ्वी और चंद्रमा की परछाई के कारण लगता है।

उन्होंने पाई का मान जो कि 3.146 को निकाला तथा शून्य की खोज की। परिणामस्वरूप उनकी इन्हीं सब खोजो ने नालन्दा को दुनिया का सबसे बड़ा साइंटिफिक रिसर्च हब बना दिया था।

ह्वेनसांग का आगमन 

630 ईसा पूर्व ह्वेनसांग जो कि एक चीनी यात्री था भारत आया तो वे नालन्दा परिसर प्रसिद्धि से बहुत हैरान हुआ परिणामस्वरूप उसने विश्वविद्यालय का परीक्षण करना चाहा। वे नालन्दा में कुलपति शीलभद्र का शिष्य बना। लगभग 5 सालों तक उसने योगशास्त्र तथ संस्कृत भाषा को यहां रहकर सिखा। उसने अपनी किताब में नालन्दा की विशाल लाइब्रेरी धर्मगंज का वर्णन किया।

जिसमें वह बताता है कि इसके तीन मुख्य हिस्से थे पहला रत्नासागर जो कि एक तीन मंज़िला इमारत थी जिसमें गणित और  विज्ञान कि किताबें थी। दूसरा रन्तोदधि जहां वेद और पवित्र ग्रंथ आदि रखे जाते थे। तीसरा रत्न रंजक जहां कला और आयुर्वेद के नुस्खों की किताबों का संग्रह रखा जाता था।

नालन्दा के पतन की कहानी

1193 ई.में क्रूर तुर्क शासक एवं कमांडर इख्तियारउद्दीन मोहम्मद बिन बख्तियार खिलजी भारत को लूटने के लिए भारत आया। जब उसने नालन्दा के क्षेत्र बिहार में लूट की घटनाओं को अंजाम देना प्रारम्भ किया तब उसकी तबीयत खराब हो गई जिसके चलते वह एक भयंकर लाइलाज बीमारी से पीड़ित हो गया। उसके हकीमों द्वारा किए गए सारे इलाज असफल होने पर वह मौत के कगार  पर पहुंच गया।

तब उसके एक दरबारी ने सलाह दी कि वह नालन्दा के आयुर्वेद विभाग के मुख्य आचार्य राहुल श्री भद्र से ठीक हो सकता है। उसके अन्दर इस बात को लेकर हीन भावना ने जन्म लिया कि ऐसा क्या है जिससे उसके खुद के वैद्य अंजान हैं और भारतीय वैद्य उनसे निपुण है। दरअसल वह भारतीयों को नीची नजर से देखता था। अतः परीक्षण के लिए उसने आचार्य राहुल श्री भद्र को बुलाया और उनके आगे शर्त रखी की उसे बिना किसी दवा के ठीक करके के दिखायें।

ऐसा करने न कर पाने उन्हें मौत की सज़ा दी जायेगी श्री भद्र जी ने चुनौती को स्वीकार किया बख्तियार खिलजी का ठीक करने का भरोसा देकर वे अपनी वैद्य शाला में वापिस आ गये। आचार्य ने एक दवा बनाई और उसे कुरान जैसी पाख किताबों के पन्नों पर लगा दिया और दो दिन बाद खिलजी को इस्लाम की पवित्र किताब कुरान देते हुए कहा कि उसे रोज इसके कुछ पन्ने पढ़ने होंगे।

धीरे-धीरे खिलजी ठीक होने लगा क्योंकि कुरान के पन्नों पर लगी औषधि ने अपना काम करना प्रारम्भ कर दिया था। ठीक होने के बाद खिलजी के मन में हीन भावना ने घर कर लिया जिसके चलते आचार्य को इनाम देने की बजाय उसने पूरे नालन्दा को नष्ट करने का निर्णय लिया। क्योंकि भारत को गुलाम बनाने के लिए उनकी रीढ़ की हड्डी नालन्दा विश्वविद्यालय को नष्ट करना आवश्यक था।

खिलजी की आक्रमण

जब खिलजी अपनी सेना लेकर नालन्दा पहुंचा तब उसने देखा कि वहां कोई सैनिक नहीं था सिर्फ निहत्थे बौद्ध भिक्षु और बूढ़े आचार्य थे। खिलजी की सेना ने निहत्थे छात्रों और विद्वानों का बेरहमी से कत्लेआम प्रारम्भ किया। सदियों के शोध को नष्ट करने के लिए उसने नालन्दा की विशाल लाईब्रेरी धर्मगंज में आग लगवा दी। इस पुस्तकालय में 9 लाख से ज्यादा दुर्लभ किताबों का ढेर था जिसके कारण यह पुस्तकालय पूरे तीन महीनों तक जलता रहा।

इस प्रकार भारत का उज्वल भविष्य और हमारा गौरव आग की लपटों में जलकर राख हो गया।


सरकार द्वारा किए गए कार्य

वर्तमान समय में नालन्दा विश्वविद्यालय भारत के बिहार राज्य के प्राचीन शहर राजगीर में स्थित एक केंद्रीय अनुसंधान विश्वविद्यालय है। सरकार द्वारा राष्ट्रीय महत्व और उत्कृष्टता के संस्थान के रुप में नांलन्दा भारत के विदेश मंत्रालय का एक प्रमुख अंग है। इसकी पुनः स्थापना 2010 में की गई। 

वर्तमान समय में यह स्नातकोत्तर अनुसंधान संस्थान के रुप में कार्य करता है और केवल मास्टर और पीएचडी डिग्री प्रदान करता है। परंपरागत रुप से भारत की ऐतिहासिक विरासत के प्रतीक के रुप में माना जाने वाला नया नालन्दा विश्वविद्यालय राष्ट्र में एक प्रतिष्ठित संस्थान रुप में काम करता है।

इसका पुनः निर्माण1993.32 करोड़ कि लागत से बना यह विश्वविद्यालय वर्तमान समय में 485 एकड़ की जमीन पर फैला हुआ है। यह भारत के सभी विद्यालयों के परिसरों में से सबसे बड़ा परिसर है। 

वर्तमान समय में यह विश्वविद्यालय 
1.School of Historical Studies यानी SHS
2.School of Ecology and Environment Studies यानी SEES
3.School of Buddhist Studies यानी SBS
4.School of Philosophy and Comparative Religions यानी SPCR
5.School of Languages and Literature and Humanities यानी SLLH
6.School of Management Studies यानी SMS

जैसे विषयों में डिग्री प्रदान करता है इसके साथ ही यहां संस्कृत पाली तिब्बती जापानी और कोरियाई जैसी भाषाओं में डिप्लोमा प्रदान किया जाता है। नालन्दा के नए परिसर का उद्घाटन भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने 19 जून 2024 को किया है।

इसके साथ ही विश्वविद्यालय में तीन विशिष्ट संस्थान है जो धार्मिक समुदाय के विभिन्न संप्रदायों को एक साथ लेकर चलने के दृष्टिकोण का हिस्सा है। इनमें बंगाल की खाड़ी का केंद्र संघर्ष समाधान और शांति निर्माण केंद्र और सामान्य अभिलेखीय संसाधन केंद्र शामिल है।

वर्तमान समय में नालन्दा विश्वविद्यालय विश्व भर के कई विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों के साथ-साथ ICWA, IIPHG, ISI, ICCR, ISAS, IIAS और CSIR के साथ मिलकर काम करता है।

निष्कर्ष

नालन्दा विश्वविद्यालय केवल प्राचीन भारत का एक शिक्षा केंद्र नहीं था बल्कि यह भारत के विश्व-गुरु होने का जीवंत प्रमाण था। जहां की समृद्ध ज्ञान परंपरा बहु सांस्कृतिक अध्ययन और उत्कृष्ट अध्ययन-अध्यापन प्रणाली ने दुनिया भर के विद्वानों को आकर्षित किया। यद्यपि आक्रमणकारियों द्वारा इसके विनाश ने इतिहास के एक स्वर्णिम युग का अंत कर दिया।

लेकिन नालन्दा की आत्मा और विचार आज भी अमर है। हाल ही में नालन्दा का पुनरुद्धार इस बात का प्रतीक है कि भारत अपनी महान ज्ञान की विरासत को सहेजकर पुनः वैश्विक शिक्षा के क्षेत्र में नई ऊँचाइयों को छूने के लिए तैयार है।

2026-10-13

लाल किला

 
digital painting of redfort

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम लाल किला के इतिहास के बारे में विस्तार से चर्चा करने जा रहे हैं तथा भारतीय इतिहास के में इसके महत्व के बारे में समझने की कोशिश करेंगे। इसके साथ ही हम लाल किले के समीप शहर शाहजहानाबाद के ऐतिहासिक महत्व के बारे में चर्चा करेंगे।

इसके साथ ही हम लाल किले पर हुए हमलों तथा लुट की घटना पर चर्चा करेंगे खास बात यह है कि लाल किला कभी भी किसी युद्ध का केंद्र नहीं था।

परिचय

यह एक ऐतिहासिक मुगल किला है जिसे मुगल शासकों द्वारा आगरा से दिल्ली को अपनी राजधानी स्थानांतरित करने के दौरान बनवाया गया था। इस किले का निर्माण मुगल शासक शाहजहाँ द्वारा 12 मई 1639 में करवाया गया था। किले के निर्माण में फारसी और भारतीय स्थापत्य कला शैली का प्रयोग किया गया है। इस किले का प्राचीन नाम किला-ए-मुबारक था जो कि शाही परिवार का निवास स्थान था।

किले के निर्माण में सफेद और लाल पत्थर का इस्तेमाल किया जाने के कारण इस लाल किला कहा जाता है। जिसमें लाल शब्द हिंदी भाषा का है वहीं किला शब्द फारसी भाषा से लिया गया है। खास बात यह है कि इस किले के निर्माण का कार्य उस्ताद अहमद लाहौरी को सौंपा गया था ये वहीं शख्स हैं जिन्होंने ताज महल का निर्माण किया था। जो वर्तमान समय में भी अपनी निर्माण कला शैली तथा अपनी खूबसूरती के लिए प्रसिद्ध है।

लाल किला यमुना नदी के किनारे बनवाया गया तथा इसके किनारों पर गहरी खाईयां  खुदवाईं गयी थी। इसका निर्माण कार्य पवित्र इस्लाम के महीने और मुहर्रम के समय में 13 मई 1638 में शुरु किया गया था। इसके साथ ही शाहजहां की देख रेख में यह पूरा किला 6 अप्रैल 1648 में बन कर पूर्ण हुआ। यह किला पूरे शाहजहानाबाद का केंद्र बिंदु था जिसे हम वर्तमान समय में पुरानी दिल्ली के नाम से जानते है।

शाहजहां की मृत्यु के बाद उनके उत्तराधिकारी औरंगजेब ने सम्राट के निजी कमरों में मोती मस्जिद का निर्माण करवा कर लाला किले और समृद्ध बनाने में अपना योगदान दिया। इसके साथ ही उन्होंने महल तक के मार्ग को अधिक घुमावदार बनाने के लिए मुख्य द्वारों के सामने दो बुर्ज का निर्माण भी करवाया था।

पहली लूट की घटना

किले को पहली बार फारसी सम्राट नादिर शाह ने 1739 में लुटा जब उसने 2लाख सैनिक टुकड़ी के साथ मुगल सेना को पराजित किया था। इस समय मुगल सम्राट औरंगजेब की मौत हो चुकी थी जिसके बाद 1712 में जहांदर शाह को मुगल शासन की गद्दी पर बिठाया गया था लेकिन एक वर्ष बाद ही षड्यंत्र कारियों ने उसकी हत्या कर दी गयी। इस प्रकार 1739 के समय काल में फर्रुखसियर को मुगल शासक बनाया जा चुका था।

अतः फर्रुखसियर की हार के बाद नादिर शाह ने लाल किले को लूटा। इस लूट में मुगल साम्राज्य का मयूर सिंहासन भी था जिसे लूट कर नादिर शाह फारस ले गया। हलांकि इससे पहले वह दिल्ली में लगभग तीन महीनों तक रुका रहा। इस आक्रमण ने शहर को काफी नुकसान पहुंचाया इसी बीच अगला मुगल शासक मुहम्मद शाह को गद्दी पर बिठाया गया। इसके शुरुआती शासन काल से ही मुगल साम्राज्य कमजोर होना प्रारम्भ हो गया था।

मराठों द्वारा शोषण

इस आंतरिक कमजोरी के कारण मुगल शासन सिर्फ नाम मात्र का ही रह गया था। इसी बीच मराठों की बढ़ती ताकत के चलते मुगलों को 1752 में मराठों के साथ संधि हस्ताक्षरित करनी पड़ी। इस संधि के तहत मराठों को  दिल्ली सिंहासन का संरक्षक घोषित किया गया।

1758 में मराठों ने सरहिंद में अफगान शासकों पर अपनी विजय स्थापित की मगर आगे चलकर पानीपत की लड़ाई में मराठों की हार हुई। इस घटना ने मराठों को अहमद शाह दुर्रानी के साथ संघर्ष में धकेल दिया। दुर्रानी से हारने के बाद कर्ज अथवा मुआवजा चुकाने के लिए 1760 में मराठों ने दुर्रानी सेना से दिल्ली की रक्षा के लिए धन जुटाने हेतु दीवाने-ए-खास की चांदी की छत को उतारकर पिघला दिया।

मराठा 1761 में दुर्रानी सेना द्वारा पानीपत की तीसरी लड़ाई में हारने के बाद दुर्रानी सेना ने दिल्ली पर आक्रमण किया। जिसके बाद दिल्ली पर रोहिल्ला अफगान शासक दुर्रानी का प्रशासन 10 सालों तक रहा। जिसके बाद सम्राट शाह आलम द्वितीय के आदेश पर मराठों ने एक बार फिर से आक्रमण किया और दुर्रानी सेना को हराकर फिर से दिल्ली पर मुगल प्रशासन स्थापित किया।

1764 का आक्रमण

यह आक्रमण भरत पुर के जाट शासक महाराजा जवाहर सिंह द्वारा किया गया जिसमें उन्हें जीत भी हासिल हुई। जवाहर सिंह ने 40000 सैनिक टुकड़ी के साथ अवध से जोधपुर तक फैले क्षेत्र को लूटा। बात चीत के बाद सिख सेना दिल्ली से पीछे हटने और मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय को गद्दी पर बिठाने के लिए सहमत तो हुई मगर दिल्ली छोड़ने से पहले जाट समुदाय ने यह शर्त रखी की मुगल शासक दिल्ली में सात सिख गुरुद्वारों का निर्माण करवायेंगे।

मुगल प्रशासन द्वारा इस पर सहमति भी दी गयी अंत में दिल्ली में गुरु द्वारों का निर्माण भी करवाया गया जिसमें से गुरुद्वारा सिस गंज साहिब भी एक था।

1788 का आक्रमण

यह आक्रमण रोहिल्ला गुलाम कादिर ने किया था जो कि नजीब अद-दौला का पोता था। इसने मुगल शाही परिवार की महिलाओं की हत्या करवा दी तथा सम्राट शाह आलम द्वितीय को भी कैद कर दिया। बदले में मराठा शासक महादजी शिंदे ने अपने सैनिकों को शाह आलम को छुड़ाने और रोहिलखंड के घोसगढ़ में छिपे होने की जानकारी मिलने पर उस पर हमला कर दिया और पकड़ कर उसका सर कलम कर दिया गया।

इस जीत की उपलब्धि के रुप में मराठा ध्वज को 1803 तक यानी 15 सालों तक लाल किले पर मराठा ध्वज फहराने की अनुमति दी गई।

1803 का आक्रमण

द्वितीय एंग्लो-मराठा युद्ध के दौरान ब्रिटिश सेना ने दिल्ली के युद्ध में दौलत राव सिंधिया के संचालन में लड़ रही मराठा सेना को हराया। जिस कारण से दिल्ली पर लाल किला सहित मराठों का शासन समाप्त हुआ। इसके बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ने मुगल क्षेत्रों का प्रशासन अपने हाथों में ले लिया।

किले पर कब्जा करने वाले अंतिम मुगल शासक बहादुर शाह जफर ने भारत में कंपनी शासन के खिलाफ 1857 की क्रांति में भाग लिया और अंग्रेजों के विद्रोही बन गए। इस विद्रोह में उनका साथ शाहजहानाबाद की जनता ने दिया।

1857 का विद्रोह

मुगल सत्ता की राजधानी होने और अपनी रक्षात्मक क्षमताओं के बावजूद लाल किला 1857 के विद्रोह के दौरान किसी भी संघर्ष का स्थल नहीं थी। बहादुर शाह ने 17 सितंबर 1857 में किला छोड़ दिया और बाद में ब्रिटिश सेना द्वारा उसे पकड़ लिया गया। 1858 ब्रिटिश सेना द्वारा उन पर मुकदमा चलाने से पहले उन्हें दोबारा लाल किले में लाया गया जिसके बाद इसी वर्ष 7 अक्तूबर को रंगून भेज दिया गया।

मगर विद्रोह के समाप्त होने के बाद ब्रिटिश अधिकारियों ने लाल किले को ध्वस्त करने का आदेश जारी किया जिसके चलते किले की 80 प्रति शत संरचनाएं ध्वस्त कर दी गईं। जिनमें वह पत्थर की दीवार भी शामिल थी जो कभी किले को नदी की ओर वाले आगे के हिस्से पर बने मंडपों से जोड़ती थी।

अंग्रेजों द्वारा किले का सारा फर्नीचर य तो हटा दिया गया य नष्ट कर दिया गया। हरम के कमरे नौकरों की कमरे और बगीचों को ध्वस्त कर दिया गया और उनके ऊपर पत्थर की बैरक की एक पंक्ति खड़ी कर दी गई। शाही परिसर के पूर्वी हिस्से में स्थित संगमरमर की इमारतें पूर्ण विनाश से बच गईं।

हलांकि विध्वंस के दौरान उन्हें नुकसान पहुंचाया गया था इसके साथ ही रक्षात्मक दीवारें और मीनार सुरक्षित रह गए। आंतरिक संरचनाओं का दो-तिहाई से अधिक हिस्सा ध्वस्त कर दिया गया। इसके बाद लार्ड कर्ज़न जो की 1899 से 1905 के समय काल तक भारत के वायसराय थे ने लाल किले का जीर्णोद्धार करने का प्रयास किया। जिसके तहत इसकी दीवारों का पुनः निर्माण करवाया गया और मीनारें सुरक्षित की गयी।

1947 की घटना

प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने लाहौर गेट के ऊपर से  15 अगस्त 1947 को पहली बार तिरंगा फहराया जो भारत के पहले स्वतंत्रता दिवस का प्रतीक बन गया।

2000 का आतंकवादी हमला

लाल किले पर 22 दिसंबर 2000 को लश्कर-ए-तैबा के छह सदस्यों ने आतंकवादी हमला किया था। इस हमले में दो सैनिक और एक नागरिक मारे गए थे। समाचार मीडिया ने इसे तत्कालीन चल रही भारत-पाकिस्तान शांति वार्ता को पटरी से उतारने का प्रयास बताया था।

2003

21वीं सदी के बाद इस स्थल में कुछ ही परिवर्तन हुए और लाल किले का उपयोग सैन्य छावनी के रुप में जारी रहा। लाल किले का एक महत्वपूर्ण हिस्सा 22 दिसंबर 2003 तक भारतीय सेना के नियंत्रण में रहा, जब इसे जीर्णोद्धार और संरक्षण के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को सौंपा गया।

2009 में किले के पुनरुद्धार के लिए सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के तहत भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा तैयार की गई व्यापक संरक्षण और प्रबंधन योजना सी सी एम पी की घोषणा की गई।

2018 डालमिया समूह

अप्रैल 2018 में डालमिया समूह ने सरकार की विरासत गोद लें योजना के तहत 25 करोड़ के अनुबंध के माध्यम से पांच साल की अवधि के लिए लाल किले के रखरखाव विकास और संचालन का जिम्मा लिया था। पर्यटन और संस्कृति मंत्रालय तथा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए।

एक निजी संस्था द्वारा लाल किले को गोद लेने से व्यापक आक्रोश और बहस छिड़ गई, जिससे जनता इतिहासकारों और राजनीतिक दलों की आलोचना हुई। इस कदम के कारण सोशल मिडीया पर सरकार की बहुत बदनामी हुई। इसके बाद कांग्रेस सरकार ने मई 2018 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने केंद्रीय पुरातत्व सलाहकार बोर्ड निष्पक्ष समीक्षा किए जाने तक समझौते को निलंबित करने की मांग की।

2019 के दौरान 

21 वीं सदी में लाल किला परिसर में कई संग्रहालय और दीर्घाएं जोड़ी गई हैं। इनमें से चार संग्रहालय जिनका उद्घाटन 2019 में हुई था। परिसर के भीतर औपनिवेशिक काल की बैरकों में स्थित हैं। बैरक बी1 1857 की स्वतंत्रता संग्राम को समर्पित है। बैरक बी 4 जिसे दृश्यकला के नाम से जाना जाता है भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और दिल्ली आर्ट गैलरी के बीच एक सहयोग है और भारतीय कला का प्रदर्शन करता है।

भारतीय स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालय मुमताज महल संग्रहालय और नौबत खान संग्रहालय सहित पहले के संग्रहालयों को बंद कर दिया गया है और उनके प्रदर्शनों को इन नव स्थापित संग्रहालयों में स्थानांतरित कर दिया गया है।

2021 भारतीयों किसानों का विरोध स्थल

26 जनवरी 2021 को भारतीय किसानों ने गणतंत्र दिवस विरोध प्रदर्शन के दौरान प्रदर्शनकारी किसानों के एक समूह ने किले में घुसपैठ की और विद्रोह के प्रचार में झंडे फहराने के लिए किले के गुंबदों पर चढ़ गए। प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़पों के कारण किले को नुकसान पहुंचा। पुलिस की चेतावनी के बाद इसे खाली करा लिया गया।

2025 दौरान

यह स्मारक पर्यावरणीय प्रदूषण के कारण प्रभावित हो रही है जिसके कारण लाल किले का रंग लाल से काला हो गया है। सितंबर 2025 में हुए हालिया इतालवी-भारतीय अध्ययनों के अनुसार वायु प्रदूषण की बार-बार होनी वाली घटनाओं ने लाल किले की दीवारों पर चिपचिपी काली पपड़ी बनने में योगदान दिया है। ये काली पपड़ी प्रदूषण के कारण होती है जिनमें मुख्य कण नाइट्रोजन डाइआक्साइड कार्बन मोनोआक्साइड और सीसा तांबा और जस्ता जैसी जहरीली धातुएं शामिल है।

निष्कर्ष

यह किला केवल पत्थरों की इमारत नहीं बल्कि भारत के गौरवशाली इतिहास और मुगल काल की स्थापत्य काला का अद्भुत प्रतीक है। हर साल यहां 15 अगस्त को प्रधान मंत्री द्वारा तिरंगा झण्ड़ा फहराया जाना देश की आजादी और सम प्रभुता की याद दिलाता है। अतः हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए ये हमारी जिम्मेदारी है की हम इस ऐतिहासिक धरोहर को सुरक्षित रखें ताकि हमारे आगे आने वाली पीढ़ियां हमारे इतिहास और संस्कृति को याद रखें।

लाल किले को वर्ष 2007 के समय काल के दौरान यूनेस्को की विश्व धरोहर की सूची में शामिल किया गया था। जिसका मुख्य कारण मुगल वास्तु कला ऐतिहासिक महत्व तथा इसमें मिलने वाले इस्लामी पर्सियन तिमुरिद तथा हिंदू कला के संयोजन के कारण इसे यह दर्जा दिया गया है। 

2026-10-06

मार्तंड सुर्य मंदिर

portrait photo of martand sun temple

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में मार्तंड सूर्य मंदिर के इतिहास के बारे में चर्चा की गई है। मंदिर की खास बात यह है कि इस मंदिर के निर्माण में गांधार  गुप्त ग्रीक रोमन सीरियाई-बीजान्टिन तथा चीन की स्थापित्व कला शैलियों के उत्कृष्ट मिश्रण से बनाया गया है।

मगर वर्तमान समय काल में यह मंदिर वीरान पड़ा हुआ मगर फिर भी अतीत की यादों को हमेशा ताज़ा रखता है यात्रियों को अपने आकर्षित कला के कारण आकर्षित करता है। यह मंदिर जम्मू-कश्मीर के अनंत नाग ज़िले के मत्तन नामक स्थान पर स्थित है। यह स्थान जम्मू-कश्मीर से लगभग 8 किलोमीटर दूर स्थित है।

परिचय

मार्तंड मंदिर जम्मू कश्मीर राज्य कश्मीर घाटी के अनंत नाग जिले के मट्टन नामक स्थान पर स्थापित किया गया था। जिसका निर्माण आठवीं शताब्दी के समय काल में हुआ था जो कि हिंदू धर्म के भगवान सूर्य को समर्पित है। सूर्य देवता का ही दूसरा नाम मार्तंड है जिस नाम पर ही इस मंदिर का निर्माण करवाया गया था।

इस मंदिर का निर्माण कार कोटा वंश के शासक ललिता दित्य द्वारा करवाया गया था। मंदिर का निर्माण नक्काशीदार काले पत्थरों से किया गया था यह मंदिर एक अद्वितीय भव्यता का अनुभव कराता है। जो कि प्रारंभिक मध्य युगीन भारतीय वास्तुकला की चमक को दर्शाती है। काले पत्थरों का चुनाव संरचना की मजबूती और स्थायित्व प्रदान करती है और आस पास का शांत परिदृश्य के बीच इस मंदिर की भव्यता को और बढ़ता है।

यद्यपि वर्तमान समय में यह खंडहर हो चुका है मगर मंदिर के अवशेष क्षितिज के समक्ष एक गौरवशाली आकृति के रुप में खड़े है जो आगंतुकों यानी यात्रियों को इसके अतीत की भव्यता की झलक प्रदान करते है। इस मंदिर की विशाल संरचना और इसकी विस्तृत सजावट इसके रचनाकारों की कलात्मक निपुणता और आध्यात्मिक गहराई की झलक प्रदान करती है। यह स्थापित्व प्राचीन शिल्प कला का प्राचीन शिल्प कौशल और अध्यात्मिक विरासत का प्रमाण है।

मार्तंड मंदिर को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी ए एस आई द्वारा राष्ट्रीय महत्व का स्थल घोषित किया गया है। यह मंदिर दुनिया भर से आगंतुकों को इसकी शाश्वत सुंदरता और ऐतिहासिक महत्व को देखकर आश्चर्यचकित होने के लिए आकर्षित करता है।

वास्तुकला

मंदिर का मुख्य आकर्षण केन्द्र इसका विशाल प्रांगण है जिसमें एक केंद्रीय गर्भगृह है जो स्तंभों की एक श्रृंखला और 84 छोटे मंदिर के बीच में स्थित है। यह प्रांगण 220 फुट लंबा और 142 फुट चौड़ा है। इसमें पहले निर्मित एक छोटा मंदिर भी आता है। इस प्रकार यह मंदिर एक अविस्मरणीय स्थापित्व संयोजन का निर्माण करता है जो कभी तीर्थ यात्रियों के पद चिन्हों और प्राचीन अनुष्ठानों के मंत्रों से गूंजता रहता था।

मार्तंड मंदिर एक पठार की चोटी पर बनाया गया था जहां स पूरी कश्मीर घाटी का नजारा देखा जा सकता था। खंडहरों तथा इससे सम्बन्धित पुरातात्विक खोजों से कहा जा सकता है कि यह कश्मीरी वास्तुकला का एक उत्कृष्ट उदाहरण था। यह मंदिर कश्मीर में पेरिस्टाइल का सबसे बड़ा उदाहरण है जो कि अपने विभिन्न कक्षों के कारण जटिल है।

यह निर्माण माप आकार में आनुपातिक और मंदिर की समग्र परिधि के साथ संरेखित है। मंदिर का मुख्य प्रवेश द्वारा प्रांगण के पश्चिमी भाग में स्थित है जिसकी चौड़ाई मंदिर के बराबर ही है जो की इस मंदिर की भव्यता को प्रदर्शित करती है।

मंदिर की केंद्रीय संरचना मंदिर के मुख्य भाग में स्थित है जो कि इसका शीर्ष है जिसकी संरचना पिरामिडनूमा की गयी थी। यह कश्मीर में बने मंदिरों की एक सामान्य विशेषता है। मंदिर के प्रवेश कक्ष में विभिन्न नक्काशियां की गई है जिनमें सूर्य देवता के अलावा विष्णु तथा नदी देवियों जैसे की गंगा और यमुना को दर्शाया गया है।

मंदिर के विनाश का कारण

इतिहासकार हसन अली के अनुसार इस मंदिर को 1430 के आसपास के समय काल में सूफी उपदेशक मीर मुहम्मद की सलाह पर समाज का इस्लामी करण करने के उत्साह के चलते सिकंदर शाह मिरी द्वारा 1389 से 1413 के समय में नष्ट कराया गया। खास बात यह है कि हिंदूओं में फूट डालने के लिए इस मंदिर को नष्ट करने का सारा इल्जाम सिकंदर शाह मिरी ने अपने मुख्य सलाहकार सुहभट्टा पर मढ़ दिया। 

यह वृतांत इतिहासकार जोनराजा द्वारा अपनी किताब राजतरंगिणी द्वितीय में दिया गया है। पहली राजतंरगिणी 12वीं शताब्दी में कल्हण द्वारा लिखी  गई थी।

जो कि हिंदू धर्म के  ब्राह्मण परिवार से था मगर अपना धर्म परिवर्तन कर के इस्लाम कबूल किया था  इसे स्थानीय  हिंदूओं पर भीषण अत्याचार करने का दोषी माना जाता  था। जिसका परिवर्तित नाम अली था जिसने विशेष रुप से सिकंदर शाह मिरी के आदेशों की पुष्टि की। यानी उसने स्वयं से ऐसा कुछ नहीं किया था। दरअसल मुस्लिम हिंदू धर्म में फूट डालना चाहते थे। 

दरअसल मुस्लिम पूर्व हिंदू शासकों की तरह ब्राह्मणों पर राज्य शक्ति का दावा करके और ब्राह्मण वादी संस्थानों द्वारा नियंत्रित धन तक अपनी पहुंच बनाना चाहते थे और राजनीतिक वैधता हासिल करने का प्रयास कर रहे थे। 

वहीं कुछ इतिहासकार इस बात का खंडन करते है जोनराजा के अनुसार मुस्लिम ब्राह्मण वादी अभिजात वर्ग को राजपरिवार में वापस लाना चाहते थे जबकि बाद के मुस्लिम इतिहासकारों के अपने उद्देश्य थे जिसके चलते उन्होंने अतीत की रूढ़ि वादी इस्लामी नैतिकता को एक आदर्शवादी कहानी में ढालने का प्रयास किया।

निष्कर्ष

मार्त़़ंड सूर्य मंदिर 8वीं शताब्दी की कश्मीरी वास्तुकला और पत्थर की नक्काशी का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है। यह सम्राट ललितादित्य मुक्तापीड़ की विशाल दृष्टि और सूर्य उपासना की प्राचीन परंपरा का प्रमाण है। वर्तमान में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा संरक्षित यह ऐतिहासिक मंदिर स्थल हमारी सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखने और नई पीढ़ी को इतिहास से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम है।

अपनी विशाल ज्यामितीय संरचना स्तंभों की नक्काशी और सूर्य देव के प्रति समर्पण के कारण यह मंदिर भारतीय इतिहास में एक विशेष स्थान रखता है। मार्तंड सूर्य मंदिर  केवल पत्थरों ढांचा नहीं है बल्कि प्राचीन भारत की वास्तुकला समृद्ध संस्कृति और उत्कृष्ट अभियांत्रीकी का एक अद्वितीय प्रतीक है।

यद्यपि समय के थपेड़ों ने इसकी भौतिक भव्यता को क्षति पहुंचाई है किंतु इसके अवशेष आज भी भारतीय सभ्यता की सांस्कृतिक  ऊंचाइयों और शिल्पकला की अमर गाथा गाते है। इस धरोहर को भावी पीढ़ियों के लिए संरक्षित और संवर्धित करना हमारी साझी जिम्मेदारी है।

2026-09-30

मुज़िरिस बंदरगाह

illustration of port muziris

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम दक्षिण भारत में स्थित मुज़िरिस बंदरगाह के बारे में जानेंगे इसके साथ ही इसके आर्थिक महत्व को समझेंगे। तामिलनाडु में पेरियार नदी पर स्थित यह प्राचीन बंदरगाह शहर का केंद्र है। जिसे प्राचीन समय में मुज़िरिस बंदरगाह के नाम से जाना जाता था। जिसका उल्लेख हमें तमिल भाषा के प्राचीन ग्रंथों में भी मिलता है। इसके साथ ही इस बंदरगाह का उल्लेख हमें ग्रिक और  रोमन के प्राचीन और शास्त्रीय ग्रंथों में भी मिलता है।

परिचय

पुरातत्व विज्ञान के साक्ष्यों के आधार पर इस बंदरगाह की सटीक लोकेशन य स्थान केरल राज्य में कोंडुंगल्लूर यानी त्रिशुर के आसपास के क्षेत्र में स्थित थी। 2007 में केरल के उत्तरी परवूर के पास पट्टनम में इस रिसर्च का आजमा दिया गया था जिसने खोज कर्ताओं को इस स्थान को बंदरगाह के प्राचीन स्थल के रुप में मान्यता प्रदान करने के लिए समर्थन दिया है।

प्राचीन तमिल ग्रंथ जैसे कि संगम साहित्य तथा तमिल कविताओं में इस बंदरगाह का जिक्र मिलता है। इस बंदरगाह को मुख्य रुप से हिंद महासागर के मसाला व्यापार के रुप महत्व दिया जाता था इतिहासकारों अनुसार दक्षिण भारत की यह मुज्रिरस बंदरगाह कई शताब्दियों तक एक महत्वपूर्ण बंदरगाह के रुप में उपयोग होती रही है। 1341 में पेरियार नदी की विनाशकारी बाढ़ के कारण यह बंदरगाह समुद्र में समा गयी थी। खास बात यह है कि  2007 की रिसर्च से पहले इस बंदरगाह के सटीक स्थान को लेकर विवाद होता रहा है। 

नामकरण

मुज़िरिस नाम की उत्पत्ति स्थानीय  नाम मुच्चिरि से  मानी जाती है  जो कि पुराने तमिल शब्द फटे होंठ से लिया गया है दरअसल पेरियार नदी भी इस  स्थान पर कटे होंठों की तरह दो भागों में विभाजित  हो जाती है। मुज़िरिस को अक्सर संगम कविताओं में जैसे अकननुरु रचयिता एरुक्कत्तुर तयनकन्नानार कविता संग्रह के गीत संख्या 149 में तथा कवि पुराणनुरु द्वारा रचित कविता संग्रह के गीत 343 इसके साथ ही कवि पथित्रुपथु आदि ने मुच्चिरि के रुप में संदर्भित  किया है।

 इस के साथ ही इस बंदरगाह का उल्लेख भारत के सुप्रसिद्ध महाकाव्य रामायण में मुरासिपप्पट्टणन के नाम से इसका जिक्र मिलता है।इस बंदरगाह का उल्लेख यहूदी ताम्रपत्र में चेरा शासक के  11वीं शताब्दी के शासन काल को दौरान मिलता है।

जगह का प्रमाण

पहले इस बंदरगाह की पहचान कर्नाटक राज्य के दक्षिण-पश्चिम में मंगलौर के आसपास के क्षेत्र के रुप में की जाती थी। बाद में यह परिकल्पना दी  गयी कि यह बंदरगाह वर्तमान में कोडुंगल्लूर के आसपास स्थित थी जो  कि केरल राज्य के त्रिशूर जिले का एक शहर और तालुक है। खास बात यह है कि  यह क्षेत्र दक्षिण भारतीय इतिहास के द्वितीय चोल काल के चेरा शासकों के केंद्र के रुप  में प्रमुखता दिखाता है।

मगर 2007-08 को समय काल को दौरान हुई कोडुंगल्लूर और उत्तरी परवर के बीच पट्टनम गाँव में खुदाई की गई तब यह पता लगाया गया कि मुजिरिस का खोयी हुई बंदरगाह मिल गयी है जिससे नई परिकल्पना की शुरुआत हुई जिसने पट्टनम को मुज़िरिस के रुप में पहचाने जाने से इतिहासकारों के बीच विवाद पैदा कर दिया।

व्यापार

मुज़िरिस बंदरगाह भारत और फारस मध्य पूर्व उत्तरी अफ्रीका और ग्रीक-रोमन भू-मध्यसागरीय क्षेत्रों क बीच व्यापारिक संबंधों का एक महत्वपूर्ण केंद्र था। इतिहासकार प्लिनी द एल्डर में अपने नेचुरल हिस्ट्री रिसर्च बुक में मुज़िरिस को भारत का पहला व्यापारिक केंद्र बताया है। हालांकि 5वीं से भारत और रोम व्यापार में गिरावट आयी फिर भी मुज़िरिय न अन्य क्षेत्रों जैसे कि फारस और अरबों का ध्यान आकर्षित किया।

इस बंदरगाह से निर्यात की जाने वासी वस्तुओं में मुख्य रुप से मसाले जैसे कि काली मिर्च मालाबैथ्रोन आदि थे इसके बाद कुछ कीमती पत्थर जैसे बैरिल मोती हीरे और नीलम थे। इनके अलावा हाथी दांत चीनी रेशम कछुओं की खोल तथा गंगा में पायी जानी वाली स्पाइकानार्ड का भी व्यापार किया जाता था।

वहीं रोमन नाविक सोने के सिक्के पोरिडाट पतले कपड़े डिज़ाइनर लिनेन और बहुरंगी वस्त्र के साथ-साथ तांबा सीसा टिन मूंगा सल्फाइड तथा कच्चा कांच शराब और रियलगर और आर्पिमेंट लाते थे।

प्रारम्भिक साक्ष्य

रेशम मार्ग प्राचीन व्यापार मार्गों का एक समूह था जो पूर्व और पश्चिम को जोड़ता था तथा रोम की दो महान सभ्यताओं को बीच वस्तुओं और विचारों का आदान-प्रदान करने का माध्य था। मानचित्रों पर स्थलीय मार्ग लाल और समुद्री मार्ग नीले रंग में दर्शाया जाता गए है। 

संगम साहित्य

मुज़िरिस का उल्लेख तमिल के शास्त्रीय संगम साहित्य में मिलता है जो मुख्य रुप से 100 से 250 ईसा पूर्व के समय काल के वर्णन को दर्शाता है। एक शास्त्रीय तमिल कृति पुराणपनुरु में मुजिरिस को एक हलचल भरे बंदरगाह के रुप में वर्णित किया गया है जहां आंतरिक वस्तुओं का आयतित सोने के बदले आदान-प्रदान किया जाता था। ऐसा प्रतीत होता है कि कविता इस रचना के आधार पर प्रमुख रोमन व्यापारियों के साथ अपने संपर्कों को सीधे वाणिज्यिक सौदों का बजाय उपहार विनिमय के रुप में मान्यता देते थे।

एरिथ्रियन सागर का पेरिप्लस

पहली शताब्दी के ग्रीक यात्रा वृत्तांत पेरिप्लस आफ द एरिथ्रियन सी के अज्ञात लेखक जिसका अर्थ है लाला सागर की यात्रा चेरा साम्राज्य का विस्तृत वर्णन देता है जिसमें इस बंदरगाह के महत्व का वर्णन किया गया है। इसके बाद नौरा और टिंडिस का जिक्र मिलता है जो कि लिमरिके के पहले बाज़ार थे और मुज़िरिस और नेल्किंडा जो अब सबसे महत्वपूर्ण थे। टिंडिस सेरोबोथ्रा राज्य का वह हिस्सा है जो समुद्र के किनारे पर स्थित एक गांव है।

इसी क्षेत्र में मुज़िरिस में अरब और यूनानियों द्वारा माल से भरे जहाज़ बड़ी संख्या में आया करते थे। यह एक नदी पर स्थित है जो कि समुद्र से 92.5 किलोमीटर दूर था इसी को यूनान की दूरी मापने की इकाई के अनुसार 500 स्टेडिया कहा जाता है जिसमें एक स्टेडिया 185 मीटर का होता है। यहां से काली मिर्च का निर्यात होता है जिसका उत्पादन उन बाज़ारों के पास के एक क्षेत्र में होता था जिसे काट नारा कहा जाता है।

पेरिप्लस के अनुसार

यह प्राचीन यूनानी यात्रा समुद्री यात्रा विवरण के अनुसार पता चलता है कि मुज़िरिस की बड़ी बस्ती विदेशी व्यापार के माध्यम स चेरा रियासत के लिए एक समृद्ध मुख्य व्यापारिक बंदरगाह का काम करती थी। पास की पहाड़ियों से काली मिर्च स्थानीय उत्पादकों द्वारा मु़्ज़िरिस लाई जाती थी और रोमन व्यापारियों के आगमन की प्रतीक्षा में गोदामों में ढेर लगा कर रखी जाती थी।

क्योंकि मुज़िरिस में उथले पानी के कारण गहरे पतवार वाले जहाज बंदरगाह तक नदी के ऊपर की ओर नहीं जा सकते थे इसलिए रोमन मालवाहक जहाजों को लैगून के किनारे पर शरण लेनी पड़ती थी वही जबकि उनका माल छोटे जहाजों पर नदी के ऊपर की ओर स्थांतरित किया जाता था।

इस यात्रा लेख में यह भी दर्ज है कि मुज़िरिस जैसे स्थानों पर अनाज की विशेष खेप  भेजी गई थी रिसर्च कर्ताओं मानना है कि ये डिलीवरी स्थानीय रोमन निवासियों के लिए थी जिन्हें चावल के स्थानीय आहार के पूरक के रुप में कुछ चाहिए था।

सिलप्पतिकारम का अनुसार

दूसरी शताब्दी ईस्वी में कोडुंगल्लूर के जैन कवि राजकुमार इंलगो अडिगल द्वारा रचित तमिल  महाकाव्य सिलप्पतिकारम जिसका हिंदी में नाम पायल की कहानी है के अनुसार मु़ज़िरिस को एक ऐसे स्थान के रुप में दर्शाया गया है जहां यूनानी व्यापारी जहाज आकर सोने के बदले काली मिर्च खरीदते थे। इसमें यह भी उल्लेख किया गया है कि वस्तु विनिमय व्यापार के समय लगने के कारण व्यापारी एक अनोखी जीवन शैली जीते थे जो स्थानीय आश्चर्य की स्रोत थी।

इसके साथ ही सिलप्पतिकारम यूनानी व्यापारियों के देश वापसी  का वर्णन करते हुए लिखा मिलता है कि दक्षिण के विशाल किरणों वाला सूर्य उदय होता है और शीत ऋतु के आगमन में सफेद बादल बनने लगते है तब गहरे उफनते सागर को पार करने का समय आ जाता है। टिंडिस के शासक चील की लकड़ी रेशम चंदन मसाले और तरह-तरह के कपूर से लदे जहाज़ भेजते है।

बंदरगाह के गायब होने का कारण

इस बंदरगाह के गायब होने का मुख्य कारण 1341 में पेरियार नदी में आई बाढ़ थी जिसके कारण से यह बंदरगाह  सभी प्राचीन काल के ज्ञात मानचित्रों से गायब हो गई। इतिहासकार राजन गुरुक्कल तथा डिक व्हिटैकर द्वारा प्रकाशित एक लेख के माध्यम से बताया की इस बाढ़ की घटना ने कोच्चि के वर्तमान बंदरगाह और वेम्बनाड बैकवाटर प्रणाली को समुद्र से जोड़ दिया तथा इस क्षेत्र में एक नई भूमि का निर्माण किया जो अब कोच्चि के पास स्थित वाइपिन द्वीप के रुप में जाना जाता है। वैसे इनके द्वारा प्रकाशित इस लेख का नाम नीशीर्षक मुज़िरिस की खोज था।

इन दोनों खोजकर्ताओं अध्ययन से पता चल पाया कि इस क्षेत्र के भू-भौतिकी सर्वेक्षण से हमें पता चला कि 200 से 300 वर्ष पूर्व तटरेखा वर्तमान तट स लगभग 3 किलोमीटर पूर्व में स्थित थी इसी क्रम में 2000 साल पहले यही तटरेखा और भी पूर्व में लगभग 6.5 किलोमीटर आगे रही होगी।

उन्होंने अनुमान लगाया कि यदि रोमन काल में मुज़िरिस यहां कहीं स्थित होता तो उस समय तटरेखा अपनी वर्तमान रेखा से लगभग 4 से 5 किलोमीटर पूर्व में फैली होत। नदी मुहाने पर नियमित रुप से गाद  जमा होने के कारण अंततः इस स्थान को बंदरगाह के रुप में इस्तेमाल करना बंद करना पड़ा होगा।

पुरातत्व खुदाई के साक्ष्य

1945 में कोडुंगल्लूर के क्षेत्र में की गई खुदाई में 13वीं शताब्दी से पहले की कोई वस्तु नहीं मिल पाई। वहीं इसी क्षेत्र से 2 किलोमीटर दूर 1969 में की गई खुदाई में 13वी शताब्दी के साथ-साथ 16वीं शताब्दी की भी प्राचीन वस्तुओं की प्राप्ति हुई थी। इसी क्रम 1983 में इस क्षेत्र से लगभग 10 किलोमीटर दूर के क्षेत्र में खुदाई के दौरान रोमन सिक्कों का एक बड़ा भण्डार मिला जो  कि इस बात का संकेत देता है कि मुज़िरिस से पालघाट दर्रे और कावेरी घाटी के रास्ते भारत से पूर्वी तट तक विदेशी व्यापार क्षेत्र था।

इसके बाद 2007 में के सी एच आर ने पुरातात्विक खोजों के आधार पर पट्टनम में मुज़िरिस की संभावित खोजो में बड़ी संख्या में कलाकृतियां मिली हैं। खास बात यह है कि अब तक पट्टनम में उत्खनन के सात सत्र 2007 से 2014 तक पूरे हो चुके हैं। इन्हीं खोज के आधार पर जब के सी एच आर ने पुरातात्विक खोजों के आधार पट्टनम में ही मुज़िरसि बंदरगाह होने की संभावना जाहिर की तब अन्य इतिहासकारों और पुरातत्वविदों ने इसकी आलोचना की।

जिसमें मुख्य रुप से आर नागस्वामी के एन पणिक्कर और एमजीएस नारायण जैसे इतिहासकारों ने आलोचना करते हुए आगे के विश्लेषण की मांग की। हलांकि अन्य लोगों ने इसका समर्थन किया जिनमें इतिहासकार और शिक्षाविद राजन गुरुक्कल भी शामिल थे यद्यपि वे भी इस स्थल को क्षेत्रीय व्यापारियों की बस्ती अलावा और कुछ नहीं मानते थे क्योंकि इसमें विकसित प्रशासन या परिष्कार का अभाव था यदि मुज़िरिस कहीं और स्थित होता तो उन्हें लिखित साक्ष्य की उम्मीद थी।

खोज में मिले साक्ष्य 

इस 2007 की खुदाई के दौरान सफेद रंग के चीनी मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े तथा लाल रंग एवं काले रंग के मिट्टी के बर्तन के टुकड़े इसके साथ ही रत्न में कांच के मोती अर्ध कीमती पत्थरों के मोती जड़े हुए आभूषण और मुहर के छल्ले इसके साथ ही कैमयो ब्लैंक के अधूरे टुकड़े जो कि खास कर कांच य धातु के बने हुए हैं तथा कैमियो छवि व डिज़ाइन के लिए आधार बनाने के लिए डिज़ाइन किए जाते हैं इसके साथ ही सिक्के मसाले और टेराकोटा की वस्तुएं मिली हैं।

इसके साथ ही पक्की ईंटों से बना संरचनात्मक घाट परिसर है जिसमें नावों को खड़ा करने के लिए नौ बोलार्ड थे इसके साथ ही पट्टनम में मिली एक और रोचक चीज तीन तमिल ब्राह्मी लिपियों में से एक थी यह एक बर्तन के किनारे पर खुदी हुई थी और लगभग दूसरी शताब्दी ईस्वी की है जिस पर अ मा ना लिखा हुआ था जो प्रतीत होता है

जिसका मलयालम अर्थ है जैन होगा। यदि खोज कर्ताओं द्वारा अन्य प्रमाणों द्वारा यह व्याख्या और अर्थ प्रमाणित हो जाता है तो यह स्थापित होता है कि जैन धर्म कम से कम दूसरी शताब्दी से मालाबार तट पर प्रचलित था।

यह पहली बार है जब खोजकर्ताओं को प्राचीन केरल में एक धार्मिक प्रणाली से संबंधित साक्ष्य मिले है। इसके साथ ही पट्टनम में मिले कंकाल के नमूनों के डी एन ए विश्लेषण से मुज़िरिस में अतीत में पश्चिमी यूरेशियाई आनुवंशिक छाप वाले लोगों की उपस्थिति की पुष्टि होती है। इसे प्राचीन बंदरगाह शहर के अतीत में रखे गए विशाल अंतरराष्ट्रीय महत्व का संकेत माना जा रहा है।

निष्कर्ष

हम कह सकते है कि मुज़िरिस बंदरगाह केवल एक बंदरगाह ही नहीं था बल्कि वह प्राचीन भारत को वैश्विक व्यापार के शीर्ष पर स्थापित करने वाला एक जीवंत केन्द्र है। काली मिर्च जिसे काला सोना भी कहा जाता था ने व्यापार से समृद्ध यह नगर प्राचीन रोम यूनान और अरब देशों के साथ भारत के आर्थिक व सांस्कृतिक संबंधों की रीढ़ बना।

यद्यपि 1341 में पेरियार नदी की बाढ़ ने इस ऐतिहासिक नगर को इतिहास के पन्नों में समेट दिया और कोच्चि बंदरगाह के उदय का मार्ग प्रशस्त किया लेकिन संगम साहित्य में वर्णित इसकी गाथाएं और आधुनिक पुरातात्विक उत्खनन आज भी भारत की महान समुद्री विरासत का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

इसके साथ ही हमें पता चला की मुज़िरिस प्राचीन व्यापार का केंद्र जहां विशेषकर काली मिर्च और मसालों का व्यापार किया जाता था। यह शहर सांस्कृतिक संगम का केंद्र था जहां ग्रीक  रोमन यहूदी और अरब व्यापारियों की उपस्थिति से विकसित हुई। हाल ही में 2007 से 2014 की खोज में मिले साक्ष्यों का कारण यह चर्चा में है।

2026-09-23

बप्पा रावल

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प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में गुहिलोत वंश के आठवें एवं अंतिम शासक तथा मेवाड़ वंश के संस्थापक बप्पा रावल के बारे में बात करेंगे। तथा उनके द्वारा लड़े गए अरब आक्रमण के बारे में चर्चा करेंगे। बप्पा रावल ने अपने बचपन से ही कई कठिनाइयों का सामना किया था उनका बचपन कैसा बिता तथा उनके बचपन का क्या नाम था वे कैसे एक राजा बने इन सम्पूर्ण घटनाओं की चर्चा इस लेख में करेंगे।

जीवन परिचय

इनके पिता का नाम रावल महेंद्र द्वितीय जिन्हें राजा नागदित्य के नाम से भी जाना जाता था तथा इनकी माता का नाम अज्ञात है बस इतना पता चलता है कि वे परमार वंश के राजा मान मोरी की बहन थीं। यानी राजा मान मोरी बप्पा रावल के मामा थे। बताया जाता है कि राजा महेंद्र मेवा़ड़ के दक्षिण-पश्चिम में स्थित नागदा कस्बे पर शासन किया करते थे।

इतिहासकारों द्वारा बताया जाता है कि राजा रावल महेंद्र के धर्मभ्रष्ट होने के कारण उनकी हत्या कर दी गई थी। उस समय बप्पा रावल की उम्र मात्र तीन वर्ष की थी जो कि शासन चलाने के लिए उपयुक्त नहीं थी।

इस बीच नागदा के शासकों ने गुहिलोत सिंहासन के युवा राजकुमार को मारने का प्रयास किया था लेकिन राजा के करीबी भील मित्रों ने जो की स्थानीय आदिवासी समुदाय से आते थे ने उनके प्रयासों को असल कर दिया। बेटे कि सुरक्षा के लिए रानी साहिबा अपने पति की पुरानी राजधानी नागदा के आसपास के बीहड़ और दुर्गम ग्रामीण इलाके में लौट आयीं। यहीं क्षेत्र ब्राह्मणों का निवास स्थान था। जो भगवान शिव की स्थापित मूर्ति एक लिंग  जी  पूजा किया करते थे।

राजा महेंद्र रावल की विधवा ने अपने छोटे बेटे को एक स्थानीय ब्राह्मण पुजारी की पत्नी जो की कुल की पुरोहित भी थीं को देखभाल के लिए सौंप दिया। चूंकि बप्पा रावल बहुत छोटे थे जिस कारण उनके बालिग होने तक शासन उनके नाम पर  ही चला। खास बात  यह है कि बप्पा रावल को पुजारी को सौंपने का वृतांत बताता है कि उन्हें उनके पिता के हत्यारों से बचाने के लिए यह कार्य किया गया होगा।

बचपन का वृतांत

बप्पा रावल ने अपना बचपन नागदा के नीचे पहाड़ियों में स्थित एक धार्मिक आश्रम में बिताया। वे ब्राह्मणों के पशुओं को चराने के काम किया करते थे। इस प्रकार उनके बचपन का नाम काल भोज पड़ा। काल शब्द का अर्थ भगवान शिव के महाकाल रुप से लिया गया है। ऐसा इस लिए था जहां बप्पा रावल रहते थे सभी ब्राह्मण परिवार एकलिंग जी यानी भगवान शिव पूजा-अर्चना के प्रति गहरी निष्ठा रखते थे। पशुओं को चराना ब्राह्मणों के बच्चों के लिए एक सम्मानजनक एवं गौरवपूर्ण पेशा था।

यहां रहते हुए बप्पा रावल का स्थानीय भील समुदाय के साथ गहरा संबंध बन गया। बचपन में ही बप्पा रावल घुड़सवारी और तलवार बाजी में महारत हासिल कर चुके थे। काल भोज के गुरु हरित राशि नामक एक ऋषि अंतर्मुखी और दूरदर्शी व्यक्तित्व के धनी थे। उन्होंने बालक को नैतिकता का ज्ञान सिखाया। शिव का आराधना करना सिखाया विधान सभाओं के लिए दीक्षित किया। इस प्रकार बप्पा रावल हरित ऋषि के शिष्य बने महर्षि को जल्द ही ज्ञात हो गया कि बालक के पास अद्वितीय बुद्धि और सहानुभूति की क्षमता है।

उनकी प्रतिभा के देखते हुए उनके गुरु ने भविष्यवाणी की कि ठीक 16 वर्ष बाद यह बालक मेवाड पर शासन करेगा। उनके गुरु ने उन्हें विशेष आशीर्वाद दिया और बप्पा रावल को पालन करने के लिए विशिष्ट आचार संहिता प्रदान की।

16 वर्ष के बाद

जब 18 वर्ष के हुए तब वे चितौड़ गए इतिहासकारों द्वारा बताया जाता है कि उस समय किले के नीचे स्थित कस्बे में मेला चल रहा था वहां बप्पा रावल ने एक ऐसी लड़ाई का प्रदर्शन किया जिसने मान मोरी और परमार सरदारों को भयभीत कर दिया। जब मान मोरी को पता चला की वे उनका भांजा है तो उन्होंने उनका स्वागत किया और उन्हें किले के विद्वानों में शामिल किया इसके साथ ही उनके मामा ने एक जागीर भी भेंट में दी।

इतिहासकारों अनुसार बताया जाता है कि उनके पिता की हत्या भील सरदारों द्वारा षड्यंत्र रच कर की गयी थी इनमें किसी राजा या सम्राट का नाम नहीं मिलता बस कुछ क्षेत्रीय मुखियों तथा सरदारों ने मिल कर इस कार्य का अंजाम दिया था बड़े होने के बाद सबसे पहले अपने पिता के हत्यारों तथा षड्यंत्र कर्ताओं को दंडित किया और अपना साम्राज्य फिर से हासिल किया।

इसके वाद अपनी वंशावली को छोड़ते हुए यानी गुहिलात वंश जिसे गुहिला वंश कहते है को समाप्त करके मेवाड़ राजवंश की 734 ईस्वी में स्थापना की। इस प्रकार लगभग 21 वर्ष की आयु में उन्होंने अपने पिता रावल महेंद्र द्वितीय का स्थान लिया। बताया जाता है कि बप्पा रावल नाम उनकी बहादुरी के कारण उपाधि की रुप में उनकी प्रजा ने उन्हें दिया था और उनका वास्तविक नाम जो कि वे स्वयं स्वीकार करते थे कालभोज ही था

अरबों अथवा अम्मयद साम्राज्य का आक्रमण 

सन 712 ईस्वी और आठवीं शताब्दी के समय काल में मुहम्मद बिन कासिम जो कि अरब साम्राज्य का राजा था जिसे हम उम्मयद साम्राज्य umayyad dynasty के नाम से भी जानते है ने सिंध के राजा दाहिर सेन को पराजित कर सिंध पर अपना शासन स्थापित किया इसके बाद के समय काल में अरब सेनापतियों जैसे कि जुनैद और तमीम ने राजस्थान गुजरात तथा मालवा पर हमला के छोटे-छोटे राज्यों पर हमला करना प्रारम्भ किया। जिससे इन क्षेत्रों के आसपास के राजा जैसे की मान मोरी इन लगातार आक्रमणों से कमजोर हो रहे थे।

इसी बीच जब अरब आक्रमणकारी मोहम्मद बिन कासिम ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया तो राजा मान मोरी ने अपनी प्रजा से आक्रमणकारी सेना जुटाने का आदेश दिया लेकिन अरबों की दहशत के चलते सभी जागीरदार अपनी जागीरें छोड़कर भाग खड़े हुए तब अंत में उन्होंने अपने भतीजे बप्पा रावल को बुलावा भेजा। इस प्रकार परमार राजा ने बप्पा रावल को अपनी सेना का सेनापति नियुक्त किया।

जागीरों से बेदखल किए जाने के बावजूद सरदार शर्मिंदगी से कारण उनके साथ चले गए। इतिहासकार कर्नल जेम्स टाड और अन्य पारंपरिक ग्रंथों के अनुसार बप्पा रावल ने अपनी वीरता और सैन्य कौशल का परिचय देते हुए अरब आक्रमणकारियों को करारी शिकस्त दी और उन्हें खदेड़ दिया। उनके समर्थन में प्रतिहार शासक नागभट्ट प्रथम तथा क्षेत्रीय राजाओं ने भी उनका सहयोग किया और अरबों को भारी शिकस्त दी।

चारण और भाट साहित्य की कथाओं अनुसार बप्पा रावल ने केवल अपनी सीमाओं की रक्षा ही नहीं की बल्कि भागती हुई अरब सेना का पीछा करते हुए उन्हें उत्तर-पश्चिम में काफी दूर तक खदेड़ा। बताया जाता है कि बप्पा रावल चौकियां और छावनीयां गजनी वर्तमान अफगानिस्तान तथा पाकिस्तान के रावलपिंडी शहर तक थी कहा यह भी जाता है कि रावलपिंडी नाम भी उनके द्वारा ही दिया गया था।
बताया जाता है कि बप्पा रावल की अरबों की इस ऐतिहासिक जीत ने कई सदियों तक उत्तर-पश्चिम भारत पर इस्लामिक आक्रमणों का रास्ता बंद कर दिया।

अंतिम समय

इतिहासकारों द्वारा बताया जाता है कि बप्पा रावल ने अपने जीवन के अंतिम समय में राजपाट और मोह-माया का त्याग किया और ध्यान और साधना में अपना मन लगाया। जिसके लिए मेवाड़ से उत्तर की ओर यात्रा करते हुए नागदा से आगे बढ़े खुरासान में अपना अंतिम समय बिताया और अपने गुरु हारित ऋषि के मार्ग पर चलते हुए योग साधना के बल पर 753 ईस्वी के आसपास अपना शरीर त्याग दिया।

ऐतिहासिक साक्ष्य

कुछ शिलालेखों में बप्पा रावल का उल्लेख मिलता है जिनमें गुहिला वंश की वंशावली यानी सूची दी गई थी। लेकिन अन्य शिलालेखों में उनका उल्लेख नहीं मिलता है। उदाहरण के तौर पर देखा जाए तो 959 ईस्वी के उनावास शिलालेख तथा 971 ईस्वी के एकलिंग शिलालेख में उनका उल्लेख नहीं मिलता है। इसके साथ ही 977 ईस्वी के अतपुर शिलालेख में इसके साथ ही 1083 ईस्वी के कदमल शिलालेख में भी उनका उल्लेख नहीं मिलता है।

इतिहासकारों का मानना है कि बप्पा रावल का गुहिला शासकों में से किसी एक का उपनाम नाम था इसके साथ ही अलग-अलग विद्वानों ने अलग-अलग गुहिला राजाओं से जोड़ने का प्रयास किया है। अतपुर और कदमल शिलालेखों के अनुसार गुहिला शासक महेंद्र के बाद कालभोज शासक बने। जी एच ओझा जैसे कई इतिहासकारों ने बप्पा रावल को कालभोज के रुप में पहचाना है।
क्योंकि 977 ईस्वी के अतपुर शिलालेख में खुमाना को कालभोज का पुत्र बताया गया है।

1404 ईस्वी के महारावल पाटा के उपरागणवा यानी डूंगरपुर शिलालेख में खुमाना को बप्पा रावल का पुत्र बताया गया है। आर.वी.सोमानी इस पहचान का समर्थन करते है लेकिन चेतावनी देते है क साक्ष्य निर्णायक नहीं है बप्पा रावल गुहिला वंश की किसी अन्य शाखा से संबंधित कोई अन्य शासक हो सकते है।

अतपुर शिलालेख में बप्पा रावल के नाग का उत्तराधिकारी और अपराजित का पूर्वज बताया गया है। 1460 के कुंभलगढ़ शिलालेख में बप्पा रावल को नाग का उत्तराधिकारी और अपराजित का पूर्वज बताया गया है। इससे पता चलता है कि बप्पा रावल कालभोज के परदादा शिलादित्य का दूसरा नाम था।

इस प्रमाण के आधार पर दशरथ शर्मा और डीसी सिरकार ने बप्पा रावल की पहचान शिलादित्य के रुप में की है। वहीं आर.वी. सोमानी इस पहचान का खंडन करते हुए कहते है कि इस शिलालेख में कई त्रुटियां है जिनमें बप्पा रावल को गुहादत्त के पिता के रुप में दर्शाया गया है जबकि कुछ शिलालेखों में उन्हें राजवंश का संस्थापक दर्शाया गया है।

कुछ अन्य इतिहासकारों ने बप्पा रावल को जैसे कि डी.आर. भंडारकर ने गुहिला शासकों के औसत शासनकाल की गणना के आधार पर कालभोज के पुत्र खुमाना के रुप में पहचाना है।
वहीं लखनऊ विश्वविद्यालय के श्याम मनोहर मिश्रा ने यह सिद्धांत दिया कि बप्पा रावल मूल रुप से मोरी शासक मनुरजा यानी मान मौर्य के जागीरदार थे। 

उन्होंने संभवतः अरबों के विरुद्ध मोरी अभियान का नेतृत्व किया था जिससे वे अपने अधिपति से अधिक प्रसिद्ध  हो गए थे। खोज कर्ताओं का मानना है कि य तो उन्होंने मनुराज को पदच्युत कर दिया या फिर मनुराज की निःसंतान मौत के बाद खुद राजा बन गए।

चित्तौड़ शिलालेख के अनुसार उन्होंने कर्नाटक और चोलों के साथ भी संघर्ष किया था अरबों के आक्रमण के बाद बप्पा रावल ने प्रतिहारों और राष्ट्रकूटों के साथ संघर्ष किया था। बताया जाता है कि राष्ट्रकूट राजा दंतिदुर्ग ने उज्जैन पर कब्जा कर लिया। हलांकि थोड़े समय में राष्ट्रकूट वहां से चले गए और नागभट ने अपनी सत्ता पुनः प्राप्त कर ली थी। 

इतिहासकार आर. वी. सोमानी का सिद्धांत है कि इन संघर्षों में बप्पा रावल ने प्रतिहारों की सहायता करके दंतिदुर्ग की सेनाओं का सामना किया और इस प्रकार मेवाड क्षेत्र के पूर्वी हिस्सों पर कब्जा करने में सफल रहें।

सोने के सिक्के

जी.एच.ओझा जैसे प्रख्यात इतिहासकारों ने नागरी लिपि में श्री वोप्पा य श्री वोप्पाराजा अंकित कई सोने के सिक्कों को बप्पा रावल से संबंधित माना है। हलांकि कुछ मुद्रा शास्त्रियों ने इस मान्यता पर विवाद किया है तर्क देते हुए 1960 में भारतीय मुद्रा शास्त्र सोसायटी के एक जर्नल ने तर्क देते हुए कहा उस समय मेवाड उतना बड़ा साम्राज्य नहीं था

कि वें सोने के सिक्के जारी कर सके और इसके साथ ही उन्होंने तर्क दिया कि हो सकता है कि ये सिक्के सुरसेना वंश के राजा वप्पुका के हो सकते है जिनका उल्लेख 955 ईस्वी के एक शिलालेख में मिलता है।

फिर भी सिक्कों पर स्पष्ट रुप से शैव प्रतीक चिन्ह जैसे त्रिशूल लिंग और बैल के चिन्ह मिलते है जो कि बप्पा रावल की भगवान एक लिंगनाथ जी के प्रति निष्ठा और उनकी दृढ़ता से मेल खाता है। इसके साथ ही इन सिक्कों पर शैव प्रतीकों के नीचे एक व्यक्ति की लेटी हुई छवि है। उस व्यक्ति का कान बड़े और छिद्रित हैं और छेद अतिरंजित प्रतीत होते है।

इंडोलाजिस्ट डेविड गार्ड़न व्हाइट के अनुसार यह बप्पा के शैव संप्रदाय में दीक्षा का प्रतीक हो क्योंकि कान छिदवाने की प्रथा शैल संप्रदाय से जुड़ी हुई है । जो सोलहवीं शताब्दी से पहले एक लिंग जी मंदिर के संरक्षक हुआ करते थे।

हलांकि व्हाइट का मानना है कि बप्पा के पशुपात संप्रदाय में दीक्षा लेने की संभावना अधिक है क्योंकि पशु पात नाम आमतौर पर राशि में समाप्त होते थे इस प्रकार हरित ऋषि संभवतः एक पशु पात ऋषि थे। इसके आगे वे कहते है कि रावल संस्कृत शब्द राजकुल शाही-वंश 8वीं शताब्दी में पशुपती के बीच एक कुल का नाम था। जो की 13वीं में कुल नाथ संप्रदाय में समाहित हो गया था।

इसी प्रकार के एक सिक्के पर धनुष-बाण पकड़े हुए श्री राम की आकृति बनी है उनके बाई ओर एक बैल और दाई ओर एक हाथी है। सिक्के के दूसरी तरफ सिंहासन पर बैठे शासक की आकृति है जिनके दोनों और सेवक है और नीचे श्री वोप्पा य बप्पा लिखा हुआ है।
इसी प्रकार के एक सिक्के पर श्री वोप्पाराजा लिखा हुआ है जिसमें एक बैल एक त्रिशूल एक लिंग और एक परिचारक की छवियां है और दूसरी ओर एक गाय अपने बछड़े को दूध पिला रही है।

निष्कर्ष

साहस और पराक्रम का प्रतीक
बप्पा रावल केवल मेवाड़ के संस्थापक ही नहीं बल्कि भारतीय इतिहास के एक अत्यंत साहसी और प्रतापी योद्धा थे। उनके धैर्य के आगे विदेशी आक्रमणकारी विशेष कर अरबों के कदम ठहर न सकें जिससे देश की सीमाएं सुरक्षित हुईं।

धार्मिक और सांस्कृतिक निष्ठा
वे महान शासक होने के साथ-साथ धर्मनिष्ठ और भगवान शिव के परम भक्त थे। उन्होंने राजनीति और आध्यात्मिकता का अनूठा समन्वय प्रस्तुत किया जहां मेवाड़ के शासक खुद को भगवान का दीवान मानकर प्रजा की सेवा करते थे।

दूरगामी प्रभाव
उनके द्वारा स्थापित मेवाड का राजवंश आगे चलकर भारतीय इतिहास में वीरता त्याग और स्वाभिमान का प्रतीक बना।

संक्षेप में कहा जा सकता है कि बप्पा रावल का जीवन साहस कर्तव्यनिष्ठा और राष्ट्र प्रेम का अनूठा संगम था। उन्होंने न केवल विषम परिस्थितियों से निकलकर मेवाड़ में सुदृढ़ साम्राज्य की नींव रखी बल्कि विदेशी आक्रमणों के खिलाफ दीवार बनकर भारतीय संस्कृति और सीमाओं की रक्षा की।

उनकी वीरता जन हितकारी नीतियां और आध्यात्मिक जीवन-शैली सदियों तक आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देती रहेंगी और भारतीय इतिहास में उनका नाम एक अमर शासक के रुप में स्वर्ण अक्षरों में अंकित रहेगा।

2026-09-16

वाकटक वंश

oil painting of vakataka dynasty
प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में वाकटक वंश के उदय होने तथा अंत होने के साथ-साथ वाकटक वंश की चार प्रमुख शाखाओं तथा हाल ही के समय में खुदाई के दौरान वाकटक वंश से संबधित साक्ष्यों पर प्रकाश डाला गया है। माना जाता है कि वाकटक वंश का उदय उत्तर के मालवा से लेकर दक्षिण में तुंगभद्रा नदी तक तथा पश्चिम में अरब सागर से लेकर पूर्व में छत्तीसगढ़ के  छोर तक फैला हुआ था। बताया जाता है कि वे गुप्त वंश के समकालीन थे।

परिचय

इतिहासकारों के अनुसार यह भारत का सबसे प्राचीनतम राजवंश था। जिसकी स्थापना विंध्य शक्ति नामक राजा द्वारा 250  से 270 ईसा पूर्व में की गई। हलांकि इस राजा के बारे में ज्यादा जानकारी इतिहासकारों को नहीं मिल पाई है लेकिन कुछ साक्ष्य मिलते है कि जो साबित करते है कि वाकटक वंश की स्थापना विंध्य शक्ति नामक राजा द्वारा ही की गई। अंजता की गुफाओं से  मिले शिलालेखों से यह अनुमान लगाया गया है। साम्राज्य का विस्तार विंध्य शक्ति के बेटे प्रवरसेन के शासन काल से प्रारम्भ होता है।

इतिहासकारों क मतानुसार  प्रवरसेन के शासन काल के बाद वाकटक वंश चार शाखाओं में विभाजित हो गया। खास बात यह है कि इन चार शाखाओं में से सिर्फ दो शाखाओं के ही उचित प्रमाण मिल पाये है जिसके कारण बाकी की दो शाखाओं को सिर्फ पुराणों के संकेतों के आधार पर समझा गया है यानी कोई पुख्ता सबूत अभी नहीं मिल पाया है। पहली शाखा का नाम प्रवरपुर नंदीवर्धन शाखा तथा दूसरी शाखा का  नाम वत्सगुल्म शाखा था।

प्रवरपुर नंदी वर्धन शाखा

यह मुख्य और सबसे शक्तिशाली शाखा थी जिसमें नंदी वर्धन जिसका मुख्य रुप से शासन काल नागपुर और प्रवरपुर में शासन किया था। इस शाखा के प्रमुख शासकों में पृथ्वीषेण प्रथम तथा रुद्रसेन द्वितीय और प्रवरसेन द्वितीय शामिल थे।

रुद्रसेन प्रथम
इस शासक के इतिहास के बारे में ज्यादा साक्ष्य नहीं मिल पायें है हलांकि इनके पिता का नाम गौतमीपुत्र था। इस शासक ने नागपुर से 30 किलो दूर रामटेक पहाड़ी पास नंदीवर्धन से शासन किया। रुद्रसेन प्रथम के शासन काल का अब तक एक मात्र शिला लेख मिल पाया जो चंद्रपुर के देवटेक में मिला है। कुछ इतिहासकार इसे ही रुद्रदेव को ही रुद्रसेन मानते है लेकिन इस बात पर अभी मतभेद है। इस बात  का सम्बन्ध इलाहाबाद स्तंभ शिलालेख से लगाया जाता है जिसपर आर्यवर्त के अन्य शासकों के नाम के साथ ही रुद्रदेव का भी नाम मिलता है।

कुछ इतिहासकार इस बात का विरोध इसलिए करते है क्योंकि रुद्रसेन प्रथम का वध समुद्रगुप्त द्वारा किया गया था अंत अपने पिता की मृत्यु के हत्यारे की बेटी प्रभावती गुप्त को अपनी बहु कैसे स्वीकार करता। इतिहासकारों के अनूसार रुद्रसेन प्रथम के पुत्र पृथ्वीविशेष प्रथम का विवाह गुप्त राजकुमारी हुआ इलाहाबाद के अभिलेख के अनुसार बताते है।

रुद्रसेन द्वितीय

इसका शासन काल 380 से 385 ईसा पूर्व तक का था इस शासक का विवाह गुप्त राजा चंद्रगुप्त द्वितीय जिसका शासन काल 375 से 413 तक का था कि पुत्री प्रभावती गुप्त से हुआ था। इस बात की पुष्टि रामटेक के शिला लेख से होती है। 385 ईसा पूर्व में रुद्रसेन द्वितीय का आकस्मिक निधन हो जाता है जिससे पता चलता है कि उसका शासन काल बहुत छोटा था। इसके बाद प्रभावती गुप्त दो बेटों ने 385 से 405 तक वाकटक वंश का राज संभाला। गुप्त रानी के दोनों बेटों के नाम दिवाकरसेना और दामोदरसेना था।

दामोदरसेना को ही हम प्रवरसेना द्वितीय के नाम से जानते है । इस प्रकार प्रवरसेना द्वितीय ने लगभग 20 वर्षों तक शासन किया। इस समय काल को ज्यादातर इतिहासकार वाकाटक-गुप्त युग के नाम से जानते है क्योंकि इस समय काल में वाकाटक साम्राज्य पर व्यावहारिक रुप से गुप्त साम्राज्य का ही शासन काल था। इस बात की पुष्टि प्रभावती  गुप्त के शिलालेख में उनके पिता देव गुप्त के उल्लेख से मिलता है। कुछ इतिहास कार देव गुप्त को ही चंद्रगुप्त द्वितीय मानते है। लेकिन इस बात का कोई उचित प्रमाण नहीं मिलता है।

बताया जाता है कि प्रवरसेन द्वितीय ने महाराष्ट्री प्राकृत में सेतुबंध की रचना की थी। गहा सत्तासाई के कुछ श्लोकों में उनका जिक्र मिलता है। इसी राजा ने अपनी राजधानी नंदिवर्धन से स्थानांतरित करके प्रवरपुरा को बनाया जो कि इसी राजा स्थापित किया गया एक नया शहर था। इस नई राजधानी में विष्णु अवतार राम को समर्पित एक भव्य मंदिर का भी निर्माण इस राजा द्वारा करवाया गया था। प्रवरसेन द्वितीय के बारे एक खास बात यह भी है कि अब तक वाकटक वंश के संबन्धित 17 ताम्रपत्र प्रवरसेन द्वितीय से ही संबन्धित है।

नरेंद्रसेन
प्रवरसेन द्वितीय के बाद का शासन काल नरेंद्रसेन द्वितीय का था। इस राजा का शासन काल 440 से 460 ईसा पु्र्व तक का था अपने शासन काल के दौरान वाकाटक वंश का साम्राज्य विस्तार मध्य भारत के कुछ राज्यों तक फैल गया था।

पृथ्वीसेन द्वितीय
यह प्रवरपुर नंदी वर्धन शाखा का अंतिम शासक था जिसने अपने पिता नरेंद्रसेन के बाद राजगद्दी को संभाला और 460 ईसा तक शासन किया। इस राजा को विष्णुकुंडिना राजा माधव वर्मा द्वितीय ने पराजित किया था। 480 में राजा की मृत्यु के बाद संभवतः उनके राज्य को वत्सगुलमा शाखा के हरिषेण ने अपने राज्य में मिला लिया होगा।

वत्सगुलमा शाखा

यह शाखा प्रवरसेन प्रथम के दूसरे बेटे सर्वसेना द्वारा बनाई गई थी। राजा सर्वसेना न महाराष्ट्र के वाशिम जिले में वत्सगुलमा को अपनी राजधानी बनाया। यह शाखा सहिद्री पर्वतमाला और गोदावरी नदी के बीच में स्थित थी। इस शाखा के शासकों ने अजंता की कुछ बौद्ध गुफाओं को संरक्षण दिया। इतिहासकारों के मतानुसार अजंता गुफाओं का सम्पूर्ण निर्माण वाकाटक शासकों की वत्सगुलमा शाखा द्वारा किया गया था जिसके साक्ष्य में अजंता गुफाओं का विहंगम दृश्य तथा गुफा संख्या 9 का प्रवेश द्वार आदि को मानते है।

सर्वसेन
इस राजा का शासन काल 330 से 355 ईसा पूर्व का माना जाता है इस राजा ने धर्म महाराज की उपाधि धारण की थी। इस राजा को ज्यादा प्रसिद्ध प्राकृत भाषा के हरिविजय के लेख से मिली थी। जो कृ्ष्ण द्वारा स्वर्ग से पारिजात वृक्ष लाने की कथा पर आधारित थी। वर्तमान समय में यह रचना विलुप्त हो चुकी है हलांकि सर्वसेन के समय काल के बाद के रचना कारों ने इसे सराहा था।

विंध्यसेन

सर्वसेन के शासन काल के समाप्त  होने के बाद उसके बेटे विंध्यसेन ने शासन किया। इस राजा का शासन काल 355 से 400 ईसा पूर्व का माना जाता है इसका दूसरा नाम विंध्यशक्ति द्वितीय था। इसकी प्रसिद्ध वाशिम शिलालेखों से मिलती है जिसमें राजा के 37वं वर्ष में नंदीकाता जिसे हम वर्तमान समय में नांदेढ़ के नाम से जानते है नामक गांव के अनुदान का उल्लेख मिलता है। खास बात यह है कि यह किसी वाकटक शासक द्वारा किया गया पहला ज्ञात अनुदान था। इस अनुदान की वंशावली संस्कृत और प्राकृत भाषा में लिखी गई है। विंध्यसेना ने अपने दक्षिणी पड़ोसी कुंतल के शासक को परास्त किया।  इतिहासकारों के अनुसार इस राजा के मंत्री का नाम प्रवरा था।

प्रवरसेन
राजा विंध्यसेन की मृत्यु के बाद उसका बेटा प्रवरसेन द्वितीय गद्दी पर बैठा जिसने लगभग 400 से 415 तक शासन किया। जिसके बारे में अजंता की गुफा सोलह के शिलालेख के अलावा बहुत कम जानकारी है जिसमें बताया गया है कि प्रवरसेन ने अपने परोपकारी तथा उदारवादी एवं शक्तिशाली प्रशासन व्यावस्था के चलते उच्च पद प्राप्त किए। हलांकि इस राजा का शासन काल बहुत छोटा था। प्रवरसेन की मृत्यु के बाद उसका  बेटा जो कि मात्र 8 वर्ष का था राजगद्दी पर बैठा जिसे देवसेन का नाम से जाना गया। अंजता गुफाओं से इस शासक के साक्ष्य लुप्त हो चुकें है।

सभ्याता और संस्कृति

वाकटक शासक हिंदू धर्म को मानते थे तथा शैव संप्रदाय का पालन करते थे। वहीं गुप्त वंश वैष्णव धर्म संप्रदाय का अनुपालन करते थे। इसका प्रमाण हमें रामटेक में पाए गए वैष्णव संप्रदाय से जुड़े कई धार्मिक ढ़ाचे पाये गए जो कि रानी प्रभावती के शासन काल में बनवाये गए थे। जबकि रानी प्रभावती का विवाह वाकटक वंश में हुआ था जो कि शैव संप्रदाय को मानता था। इस प्रकार हम कह सकते  है कि रानी को शासीका के रुप में प्राप्त शक्तियों ने उसे अपने आराध्य यानी विष्णु देव की पुजा करने का अधिकार प्रदान किया।

शोधकर्ताओं के अनुसार महाराष्ट्र में नरसिंह की पूजा करने की प्रथा रामटेक से ही निकली थी साध ही महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में वैष्णव प्रथाओं के प्रचार रानी प्रभावती की महत्वपूर्ण भूमिका थी। इस रानी वाकटक  वंश  की राजगद्दी पर लगभग 10 वर्षों तक शासन किया।

खुदाई के दौरान इन क्षेत्रों से एक पूजा स्थल एक लोहे की छेनी हिरण के  चित्रण वाला एक पत्थर और टेराकोटा की चूड़ियों के साथ ही भगवान गणेश की अखंड मूर्ति जिसमें अलंकारों से सजाया नहीं गया था मिली है। जो इस बात को प्रमाणित करते है कि उस समय काल के दौरान भगवान गणेश की भी पूजा की जाती थी।

वर्तमान खोज


हाल ही में वर्ष 2015 से 2018  के बीच समय काल के दौरान नागपुर के करीब रामटेक तालुका में खुदाई की गयी। इस खुदाई के दौरान तीसरी और पाँचवीं शताब्दी के दौरान इस क्षेत्र पर शासन करने वाले वाकटक वंश के जीवन धर्म तथा व्यापार के विषय में जानकारी मिली है। यहां नागपुर  के  गांव नागार्धन का में यह खुदाई की गई थी जो कि रामटेक तालुका से 6 किलोमीटर दूर लगभग एक से डेढ़ किलोमीटर के क्षेत्र में पुरातात्विक अवशेष पाये गए हैं।

खोजकर्ताओं द्वारा बताया गया है कि मौजूदा नागार्धन गांव प्राचीन बस्ती य गांव के स्थान पर ही स्थित है। इसी क्षेत्र में नदी किनारे कोटेश्वर मंदिर स्थित है और नागार्धन किला गांव के दक्षिण में स्थित है । बताया जा रहा है कि इस किले का निर्माण गोंड राजा के समय काल में हुआ था। अठारहवीं शताब्दी में इस किले का नवीनीकरण भोसलों द्वारा करवाया गया। किले के आसपास के क्षेत्र में वर्तमान समय में खेती जी जाती है वहीं पर ये पुरातात्विक अवशेष मिले है।

अभी तक वाकटक वंश के बारे में जो भी जानकारी प्राप्त थी वे महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र से सम्बन्धित थी जो कि कुछ साहित्यिक रचनाओं और ताम्र पत्रों से मिली थी। अभी तक यही माना जाता था कि नागार्धन गांव वाकटक वंश की पूर्वी शाखा नंदीवर्धन की राजधानी थी। मगर उचित प्रमाण नहीं मिल रहे थे। लेकिन इन पुरातत्विक साक्ष्यों के मिलने से इस बात को बल मिला है कि शायद यह सच में पूर्वी शाखा की राजधानी थी।
खुदाई के दौरान वाकटक शासकों के जीवन के विषय अधिक जानकारी मिल पायी है कि वे किस राजवंश से जुड़ाव रखते थे तथा उनके महलों को बनाने का प्रकार  क्या था इसके साथ ही शासकों के शासन काल के दौरान जारी किए गए सिक्कों और मुहरों के बारे में तथा उनके व्यापारिक क्षेत्रों के बारे में जानकारी मिली है।

धर्म 

वाकटक वंश के शासक ब्राह्मण धर्म के पक्षधर थे
इन्होंने ब्राह्मणों को खूब भूमि अनुदान दिये थे। सांस्कृतिक महत्व की बात करें तो ब्राह्मण धर्म को आदर्शों और सामाजिक संस्थाओं की दक्षिण की ओर बढ़ाने में इनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

खोज खास क्यों है

यह पहली बार हुआ है जब नागार्धन में खुदाई के दौरान मिट्टी की मुहरें मिली हैं। बताया जा रहा है कि यह अंडाकार मुहरें प्रभातगुप्त की रानी के समय काल की है। इन मुहरों पर शंख के चित्रण के साथ ब्राह्मी लिपि में रानी का नाम मुद्रित है। मुहर का वज़न लगभग 6.40 ग्राम बताया गया है। इतिहासकारों द्वारा बताया गया है कि यह मुहरें 1500 वर्ष पुरानी है तथा इनकी माप प्रति मुहर 35.71 mm 24.20mm और मोटाई 9.50mm है। मोहर पर मुद्रित शंख के विषय में इतिहासकारों ने इसे वैष्णव सम्प्रदाय से संबन्धित बताया है।

इन मोहरों का प्रयोग राजधानी में जारी शाही अनुमति के रुप में किया गया होगा। इसके अलावा इन संकेतों का उपयोग उन दस्तावेजों पर किया गया होगा जिनके लिए शाही अनुमति अनिवार्य होती होगी। यह सब बाते इस बात कि ओर इशारा करती है की रानी प्रभावती वास्तव में एक शक्तिशाली महिला शासिका रही होगी।.

2026-09-09

भानगढ़ का किला

 
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प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम भान गढ़ किले के निर्माण के समय काल तथा इससे संबन्धित राजा एवं इस किले के भुतिया होने के पीछे के कारण के बारे में जानेंगे। इसके साथ ही भान गढ़ किले में प्रयोग की गई वास्तुकला के इतिहास पर भी प्रकाश डालेंगे। खास बात यह है कि भारत  के प्रमुख पर्यटन स्थलों आने के बावजूद तथा वास्तुकला की आलोकनीय छाया प्रति होने के बावजूद यह यूनेस्को कि विश्व धरोहर की सूची में शामिल नहीं है।

निर्माण कार्य

इस किले को 17वीं शताब्दी में राजा भगवंत दास शासन काल में उनके दूसरे पुत्र राजकुमार माधो सिंह के निवास स्थान के रुप में स्थापित किया गया था। यह किला राजस्थान राज्य जिले जयपुर और अलवर के बीच सरिस्का अभयारण्य से 50 किलोमीटर दूर स्थित है। इस किले के निकटतम गांव गोला का बास है। राजा का महल का खंडहर  पहाड़ियों की निचली ढलान पर स्थित है इसके साथ ही पेड़ तालाब और एक प्राकृतिक जल धारा परिसर के अंदर स्थित तालाब में गिरती है। बताते चलें कि किले के निर्माण कार्य के समय राजकुमार माधो सिंह के बड़े भाई मान सिंह मुगल सेना के एक शक्तिशाली सेनापति थे। राजमहल के अलावा भानगढ़ में 1720 ई. तक नौ हज़ार से अधिक घर थे धिरे-धिरे इनकी आबादी भी समाप्त हो गई।

यह किला अरावली पर्वत श्रृंखला के समीप होने तथा वास्तुकला के चमत्कार के कारण बड़ी संख्या में पर्यटकों को आकर्षित करता है।

किला परिसर

मुख्य द्वारा के अलावा किले में चार द्वार है जिन्हें लाहौरी द्वार  अजमेरी द्वार फुवबाड़ी द्वार और दिल्ली द्वार के नाम से जाना जाता है। खास बात यह है कि खंडहरों में होने के बावजूद भी किला भव्य दिखता है और हरे भरे वातावरण के कारण शांति का अनुभव कराता है। भानगढ़ किले के अंदर मंदिरो महलों और हवेलियों के खंडहरों कि एक श्रृंखला देखने को मिलती है।

किले मुख्य प्रवेश द्वारा से ही मंदिरों को देखा जा सकता है इन श्रृंखला में गोपीनाथ मंदिर केशव राय मंदिर मंगला देवी मंदिर तथा सोमेश्वर मंदिर और श्री गणेश मंदिर प्रमुख हैं। सभी मंदिर में भारत की प्राचीन नागर शैली का इस्तेमाल किया गया है। गोपीनाथ मंदिर का निर्माण चौदह फुट ऊंचे चबूतरे पर किया गया है। मंदिर में मुख्य पुजारी का निवास स्थान भी है जिसे पुरोहित की हवेली के नाम से भी जाना जाता है। किले परिसर में अन्य कई भव्य हवेलियां भी मौजूद थी जो वर्तमान समय में खंडहर में तबदील हो चुकीं है।

मुख्य रुप से नर्तकियों की हवेलीयां है जो कि नर्तकियों का निवास स्थान भी हुआ करती थीं। परिसर में एक बाजार के लगने के साक्ष्य मिलते है परिसर के भीतर के अंतिम छोर पर राजा का राजमहल का खंडहर देखने को मिलता है। बताया जाता है कि एक समय यह राजमहल सात मंज़िला इमारत के रुप में विद्यमान था मगर वर्तमान समय में यह भारी वर्षा और तूफान के प्रकोप के कारण मात्र चार मंज़िल ही रह गया है।

वैसे खास बात यह है कि भानगढ़ का कला भले ही खंडहर हो गया हो मगर पहाड़ी की तलहटी और हरे-भरे शांत वातावरण क बीच होने के कारण बेहद खूबसूरत दिखता है।

लोककथाएँ

इस किले को लेकर बहुत सी लोक कथाएं प्रचलित है जिनमें मुख्य दो के बारे में हम यहां जानकारी देंगे। पहली कथा  राज कुमारी रत्नावती की है-
कहानी के अनुसार भानगढ़ में एक राजकुमारी रहती थी जो कि बेहद खूबसूरत थी अगल-बगल के राज घरानों में उसकी सुन्दरता की चर्चा हुआ करती थी। बताया जाता है कि एक तांत्रिक साधु का दिल उस राजकुमारी पर आ गया मगर राजा के सिपाहियों तथा उसके संरक्षकों के चलते राजकुमारी तक पहुंच पाना मुश्किल था। राजकुमारी से मिलने के कई प्रयासों के बावजूद सफलता न मिलने के कारण साधु ने अपनी तांत्रिक नीति को अपनाने पर विवश हुआ।

एक दिन बाजार में राजकुमारी को इत्र खरीदता देख तांत्रिक ने इत्र की शीशी में अपने द्वारा तांत्रिक सिद्धि से साधित किया हुआ इत्र राजकुमारी पर डालना चाहा। इसके लिए दुकानदारों कि मिली भगत पर राज कुमारी ने शीशी खरीद ली मगर उसे दुकानदार द्वार अत्याधिक दबाव तथा सस्ते में देने के कारण शक हुआ सो उसने शीशी तो ली मगर एक बड़े पत्थर पर फेंक दी।

तांत्रिक के रानी के पीछे आने पर तथा ढलान होने के कारण पत्थर लुढ़कने लगा और तांत्रिक के पीछे होने के कारण वे उसके नीचे दब कर मर गया। जिस कारण से क्षेत्रीय लोगों ने यह कथा बना दी की तांत्रिक ने मरते दम भानगढ़ किले को श्राप दिया कि जैसे वे मर रहा है उसी प्रकार एक दिन पूरा भानगढ़ अचानक से समाप्त हो जायेगा।

दूसरी कहानी

बाबा बालूनाथ

बताया जाता है कि राजमहल के बनने से पहले बाबा बालूनाथ इस क्षेत्र विशेष पर विशेष रुप से रहते थे और तपस्या किया करते थे तथा यहीं अपनी कूटी बना कर रहा करते थे। समय अंतराल के बाद राजा ने इस क्षेत्र पर महल बनाने की चेष्टा की साधु बाबा के आदेश पर ही महल को बनाया गया। महल बनाने से पहले बाबा बालूनाथ ने निर्देश दिया था कि महल मेरी कूटी से ज्यादा ऊंचा नहीं होना चाहिए क्योंकि मेरे यह कूटी मेरे उस ईश्वर का प्रतीक जिसकी साधना के लिए मैं यहां हूं। जिस दिन मेरी इस कूटी पर महल की छाया पड़ी उस दिन तुम्हारा विनाश हो जाएगा।

महल अगर मेरी कूटी से ऊंचा हुआ तो समझो मेरे ईश्वर का अपमान हुआ और जल्द ही तुम्हारा विनाश होना तय है। हलांकि महल के शुरुआती निर्माण के दौरान बाबा की बातों पर अमल किया गया मगर जब माधो सिंह के पोते अजब सिंह का शासन काल आया तो उसने बाबा की बातों को नजरंदाज किया और किले की ऊंचाई बढ़ा दी। अंत में मुगल सेना का राज्य पर आक्रमण हुआ और पूरे राज्य का पतन हो गया।
ये लोक कथाएं है तो इन पर बिना प्रामाणिक साक्ष्य के मिले बिना महल के विनाश का मुख्य कारण जान पाना मुश्किल है।

यात्रा के लिए पर्यटन स्थल

दोस्तों यह किला पर्यटन के लिए एक उत्तम स्थल है जो कि राजस्थान के अलवर जिलें अरावली पर्वत श्रृंखला के समीप स्थित है। सड़क यात्रा की बात करें तो यह दिल्ली से लगभग 200 किलोमीटर दूर है तथा कार या बस से यात्रा करने पर तीन घंटे का समय लगता है। राज्य मार्ग 29 के माध्य से जाया जा सकता है जो की मुख्य रुप से असम नागालैंड और मणिपुर से होकर गुजरता है। इसके साथ ही यह उत्तर प्रदेश के वाराणसी सारनाथ सैदपुर गाजीपुर मऊ दोहरीघाट और गोरखपुर को भी जोड़ता है।

हवाई मार्ग 
भानगढ़ किले के सबसे नज़दीक जयपुर का अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा है जो लगभग 85 किलोमीटर दूर स्थित है यहां से आप कैब य भाड़े पर टैक्सी बूक करके जा सकते है। 

2026-08-30

उक्कु य मूषा इस्पात

ilustration of wootz steel

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में भारत की सबसे प्राचीन धातु जिसके द्वारा बनायी गई तलवार सबसे मजबूत मानी जाती थी और जिसे हम wootz steel के नाम से जानते है के इतिहास के बारे में चर्चा करेंगे। बताते चलें की इस धातु को भारत में मूषा इस्पात के नाम से भी जानते है। इस लेख में इस धातु के इतिहास तथा इसे बनाने के तरीके एवं इसकी निर्माण कला के पतन के बारे में चर्चा करेंगे। इसके साथ ही इस धातु से बनी तलवारों के विदेशी व्यापार पर भी चर्चा करेंगे। इस धातु की खास बात यह थी कि यह अपनी मजबूती के साथ इसकी सतह पर बनी लहर धार आकृतियों के चलते भी बहुत प्रचलित हुईं थी।

परिचय

भारत ने प्राचीन काल में ही मानव इतिहास की सबसे उन्नत इस्पात तकनीक को विकसित कर लिया था जिसे हम उक्कु इस्पात के नाम से जानते है जिसे हम Wootz steel के नाम से भी जानते है। प्रारम्भिक समय में इसका निर्माण कार्य भारत के तमिलनाडु कर्नाटक तथा आंध्र प्रदेश के क्षेत्रों में प्रारम्भ हुआ। धीरे-धीरे पूरे विश्व में अपनी मजबूती का डंका बजाया। ज्यादातर इस स्टील से बनी तलवार का  व्यापार अरब देशों के साथ किया जाता था।

वूट्ज स्टील की निर्माण की कहानी हमें यह बताती है कि भारतीय प्राचीन धातु वैज्ञानिकों के असाधारण शिल्प कौशल और अपनी विद्वता का प्रदर्शन करते हुए ऐसे इस्पात का निर्माण किया जिसने सदियों तक वैश्विक धातु निर्माण की परंपराओं को प्रभावित किया। वूट्स स्टील की विरासत हमें याद दिलाती है कि महान इंजीनियरिंग की शुरुआत सामग्री यों की जानकारी में महारत हासिल करने होती है न की उसके निर्माण में।

इस स्टील की शुरूआत ईसा पूर्व के समय काल में भारतीय राज्य तेलंगाना के गोलाकोंडा क्षेत्र से हुई इसके बाद के अन्य क्षेत्र जैसे कर्नाटक तमिलनाडु और श्रीलंका में हुई। इस स्टील को लोहे के एक ठोस टुकड़े के रुप में निर्यात किया जाता था जिसे मूषा इस्पात कहते थे। श्रीलंका में स्टील बनाने की प्रारंभिक विधि के रुप में मानसूनी हवाओं से चलने वाली एक अनोखी भट्टी के माध्यम से बनाया जाता था।

इसके साक्ष्य हमें अनुराधापुरा तिस्सामहारमा औस समनालावेवा जैसे स्थलों के सर्वे के दौरान मिला। इसके साथ ही इतिहासकारों को कोडुमल से प्राचीन लोहे और इस्पात की कलाकृतियां भी प्राप्त की गईं है। 2018 में मन्नार जिले में स्थित योधावेवा स्थल की खुदाई में एक गोलाकार भट्टी का निचला आधा भाग मिला है। शोधकर्ताओं के अनुसार यह ढ़क्कन क्रूसिबल इस्पात का बना है। 

इसी खोज के दौरान श्रीलंका के दक्षिण-पूर्व के क्षेत्रों में शास्त्रीय कला संबंधित कुछ सबसे पुराने लोहे और इस्पात की कलाकृतियाँ पाईं गईं है। अरब सागर के रास्ते भारत और श्रीलंका के समुद्री व्यापार के चलते अरब देशों को वूट्स स्टील के बारे में पता चला। इस का पता हमें  इस्लामीक ग्रंथों में मुहन्नद और हेन्देय शब्द मिलने से चलता है जो कि भारतीय स्टील से बनी तलवारों की ओर इशारा करते है। अरबी कविताओं में भी इसका उल्लेख मिलता है जिसके तहत वूट्ज स्टील से बनी तलवार अत्यधिक मूल्यवान थी।

आगे चलकर इस प्रकार की स्टील का व्यापार विस्तार अन्य देशों तक हुआ जिसके चलते दमिश्क स्टील का निर्माण हुआ। इसके अलावा 12वी शताब्दी के अरब यात्री एड्रिसी ने भी भारतीय स्टील को दुनिया की सर्वश्रेष्ठ धातु बताया। अरब लेख तेलिंग में स्टील की प्रसिद्धि के लिए तेलंगाना क्षेत्र के संदर्भ में लिखा गया है। जिसमें बताया गया कि तेलंगाना का गोलाकांडा क्षेत्र स्पष्ट रुप से पश्चिम एशिया में उक्कू स्टील के निर्माण का प्रमुख केंद्र है।

वूट्स शब्द का अर्थ

17वीं शताब्दी में यूरोपीय यात्रियों ने दक्षिण भारत के गोलाकोंडा मालाबार और मैसूर क्षेत्र की यात्रा की और इस्पात निर्माण के क्षेत्र का दौरा किया। जिसके तहत उन्हें इस स्टील के नाम के पीछे का अर्थ समझ आया। वूट्ज शब्द तमिल शब्द उरुक्कू से लिया गया है जिसका अर्थ है पिघलाना। इसी प्रकार द्रविड़ भाषा में इसी प्रकार के मिलते जुलते शब्द का प्रयोग किया गया। वहीं तेलुगु में इस स्टील को उक्कू तथा मलयालम में इसे उरुक्कू नाम से जाना जाता था। इसी प्रकार इस स्टील को मैसूर में उक्कू टूंडू के नाम से जाना जाता था।

17वी से 19वीं शताब्दी के समय काल में यूरोपीय वैज्ञानिकों में इस स्टील के बारे में जानने की जिज्ञासा हुई। उस समय काल के दौरान यूरोपीय वैज्ञानिकों को कार्बन मिश्रित धातुओं की जानकारी बहुत कम थी। मगर उनके द्वारा वूट्ज स्टील के शोध ने आधुनिक अंग्रेजी फ्रांसीसी और रुसी धातु विज्ञान के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
 

प्रजनन अनुसंधान

19वीं शताब्दी के समय काल में ही वूट्ज स्टील पर गहन अध्ययन के लिए रॅायल स्कूल आफ साइंस द्वारा इसे पुनः बनाने के लिए प्रयास किया जिसके चलते 1795 में  डॅा. पियर्सन ने वूट्ज स्टील की रासायनिक रुप पर जांच की जो कि इस स्टिल पर रिसर्च करने वाले पहले व्यक्ति थे।

पावेल पेट्रोविच अनोसोव

ये रुस के धातु वैज्ञानिक थे वे वूट्ज स्टील अपने सभी प्राचीन गुणों के साथ पुनः बनाने में सफल रहे। उनके द्वारा निर्मित स्टील पारंपरिक वूटज के लगभग समान ही था। उन्होंने इस प्रकार के स्टील के उत्पादन के चार अलग-अलग तरीकों के बारे में लिखा जो कि एक पारंपरिक पैटर्न प्रदर्शित करते थे। उनका यह कार्य बुलैट स्टील्स नाम से भी जाना जाता है। जिसे माइंनिग जनरल पत्रिका में इसी शीर्षक के नाम से प्रकाशित किया गया था।

रीबोल्ट एट अल के अनुसार

इन्होंने अपने विश्लेषण में सीमेंटटाइट के नैनोवायरों को घेरने वाले कार्बन नैनोट्यूब की उपस्थिति के बारे में बताया। इसके साथ ही उन्हें धातु पर वैनेडियम मोलिब्डेनम और क्रोमियम के कुछ अंश मिले जिसके चलते उन्हें पता चला की धातु की अशुद्धियों को निकालने के लिए और वूट्ज स्टील को मजबूती प्रदान करने के लिए इसे गर्म ठंडा और जमाने जैसे चरणों से गुजारा गया है। जिसके कारण ही यह स्टील लचीला होने के कारण भी अपनी मजबूत पकड़ को नहीं छोड़ता।

वूट्ज स्टील बनाने का तरीका

इस इस्पात का निर्माण एक खास प्रक्रिया द्वारा किया जाता है जिसके दौरान लोहे के कार्बन युक्त पदार्थ के साथ सील बंद भट्टियों में पिघलाया जाता है। जिसके चलते अंत में हमें शुद्ध स्टील प्राप्त होता है जिस पर अद्वितीय सूक्ष्म संरचनाएं होती है।

कच्चे लोहे का चयन
सबसे पहले कच्चे लोहे का चयन सावधानीपूर्वक शुद्धता के आधार पर किया जाता था। धातु की संरचना में एक स्वरुप सुनिश्चित करने के लिए अशुद्धियों को कम से कम किया जाता था।

क्रूसिबल स्टील का उत्पादन
कठोर मिट्टी के बने छोटे-छोटे बर्तन जो की लोहे और कार्बन युक्त पदार्थों जैसे चारकोल आदि से बने होते थे। खास बात यह है कि इस कार्बन निर्माण के लिए बांस की पत्तियों को जला कर तथा अन्य पौधों को जलाकर प्राप्त किया जाता था।

नियंत्रित कार्बन अवशोषण

अब गर्म करने की प्रक्रिया के दौरान कार्बन लोहे में समाहित हो जाता था और एक उच्च कोटि के कार्बन इस्पात में बदल जाता था। इस चरण में धातु की भंगुरता को रोकने के लिए एक निश्चित तापमान की आवश्यकता होती थी जिसके अधिक या कम होने पर स्टील अपनी मजबूती खो देता था।

धीमी शीतलता
धातु के भट्टी में पिघलाने के बाद भट्टियों को धीरे-धीरे ठंडा किया जाता था। जिसके कारण एक नियंत्रित शीतलता के कारण धातु पर आंतरिक संरचनाएं बनी, जिन्होंने आगे चलकर ढलाई को दौरान दमिशक आकृति का धातुरुप धारण कर लिया। अंत में हमें एक ठोस स्टील का पिंड मिलता है।

वूट्ज स्टील के गुण
यह स्टील न केवल अपनी दिखावट के लिए बल्कि अपने यांत्रिक प्रदर्शन के लिए भी जाना जाता है। इस स्टील के माध्यम से बने बेल्ड प्राचीन काल में अन्य स्टील की तुलना में अधिक मजबूत हुआ करते थे। वैज्ञानिकों ने इसकी सूक्ष्म संरचना का अध्ययन करके पता लगाया की इस स्टील की मजबूती का मुख्य राज ये सूक्ष्म संरचनाएं ही है जो इसकी मजबूती के साथ इसके लचीलेपन में भी योगदान देती हैं।

दमिश्क स्टील की उत्पत्ति और वूट्ज स्टील से संबंध

कई लोग पौराणिक तलवारों का सम्बन्ध दमिश्क स्टील से जोड़ते है जो वूट्ज स्टील की तरह ही अन्य आकृति बहते पानी की आकृतियों के लिए प्रसिद्ध है। हलांकि खोज कर्ताओं का यह मानना है कि दमिश्क तलवारों के बनाने में भी इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल भारत में उत्पादित वूट्ड स्टील के क्षेत्र से ही आता था।

भारतीय इस्पात की सिल्लियों को व्यापार मार्गों के माध्यम से मध्य पूर्व में निर्यात किया जाता था। इसके बाद वहां के कुशल कारीगरों द्वारा इन्हें ढालकर ब्लेड़ बनाते थे। विशेष ढलाई तकनीकों के माध्यम से इन सिल्लियों पर विशिष्ट दमिश्क पैटर्न निर्मित होता था।