Indian History reveal the Past

हमारे इस ब्लॉग में भारतीय इतिहास, सांस्कृतिक इतिहास, राजवंशों आंदोलन स्टार्टअप टेक्नोलॉजी कला और वास्तुकला तथा आर्थिक इतिहास से संबंधित विषयों पर जानकारी दी जाती है। हम कम से कम शब्दों में ज़्यादा से ज़्यादा जानकारी देने की कोशिश कर रहे हैं।

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रविवार, 30 अगस्त 2026

उक्कु य मूषा इस्पात

wootz steel

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में भारत की सबसे प्राचीन धातु जिसके द्वारा बनायी गई तलवार सबसे मजबूत मानी जाती थी और जिसे हम wootz steel के नाम से जानते है के इतिहास के बारे में चर्चा करेंगे। बताते चलें की इस धातु को भारत में मूषा इस्पात के नाम से भी जानते है। इस लेख में इस धातु के इतिहास तथा इसे बनाने के तरीके एवं इसकी निर्माण कला के पतन के बारे में चर्चा करेंगे। इसके साथ ही इस धातु से बनी तलवारों के विदेशी व्यापार पर भी चर्चा करेंगे। इस धातु की खास बात यह थी कि यह अपनी मजबूती के साथ इसकी सतह पर बनी लहर धार आकृतियों के चलते भी बहुत प्रचलित हुईं थी।

परिचय

भारत ने प्राचीन काल में ही मानव इतिहास की सबसे उन्नत इस्पात तकनीक को विकसित कर लिया था जिसे हम उक्कु इस्पात के नाम से जानते है जिसे हम Wootz steel के नाम से भी जानते है। प्रारम्भिक समय में इसका निर्माण कार्य भारत के तमिलनाडु कर्नाटक तथा आंध्र प्रदेश के क्षेत्रों में प्रारम्भ हुआ। धीरे-धीरे पूरे विश्व में अपनी मजबूती का डंका बजाया। ज्यादातर इस स्टील से बनी तलवार का  व्यापार अरब देशों के साथ किया जाता था।

वूट्ज स्टील की निर्माण की कहानी हमें यह बताती है कि भारतीय प्राचीन धातु वैज्ञानिकों के असाधारण शिल्प कौशल और अपनी विद्वता का प्रदर्शन करते हुए ऐसे इस्पात का निर्माण किया जिसने सदियों तक वैश्विक धातु निर्माण की परंपराओं को प्रभावित किया। वूट्स स्टील की विरासत हमें याद दिलाती है कि महान इंजीनियरिंग की शुरुआत सामग्री यों की जानकारी में महारत हासिल करने होती है न की उसके निर्माण में।

इस स्टील की शुरूआत ईसा पूर्व के समय काल में भारतीय राज्य तेलंगाना के गोलाकोंडा क्षेत्र से हुई इसके बाद के अन्य क्षेत्र जैसे कर्नाटक तमिलनाडु और श्रीलंका में हुई। इस स्टील को लोहे के एक ठोस टुकड़े के रुप में निर्यात किया जाता था जिसे मूषा इस्पात कहते थे। श्रीलंका में स्टील बनाने की प्रारंभिक विधि के रुप में मानसूनी हवाओं से चलने वाली एक अनोखी भट्टी के माध्यम से बनाया जाता था।

इसके साक्ष्य हमें अनुराधापुरा तिस्सामहारमा औस समनालावेवा जैसे स्थलों के सर्वे के दौरान मिला। इसके साथ ही इतिहासकारों को कोडुमल से प्राचीन लोहे और इस्पात की कलाकृतियां भी प्राप्त की गईं है। 2018 में मन्नार जिले में स्थित योधावेवा स्थल की खुदाई में एक गोलाकार भट्टी का निचला आधा भाग मिला है। शोधकर्ताओं के अनुसार यह ढ़क्कन क्रूसिबल इस्पात का बना है। 

इसी खोज के दौरान श्रीलंका के दक्षिण-पूर्व के क्षेत्रों में शास्त्रीय कला संबंधित कुछ सबसे पुराने लोहे और इस्पात की कलाकृतियाँ पाईं गईं है। अरब सागर के रास्ते भारत और श्रीलंका के समुद्री व्यापार के चलते अरब देशों को वूट्स स्टील के बारे में पता चला। इस का पता हमें  इस्लामीक ग्रंथों में मुहन्नद और हेन्देय शब्द मिलने से चलता है जो कि भारतीय स्टील से बनी तलवारों की ओर इशारा करते है। अरबी कविताओं में भी इसका उल्लेख मिलता है जिसके तहत वूट्ज स्टील से बनी तलवार अत्यधिक मूल्यवान थी।

आगे चलकर इस प्रकार की स्टील का व्यापार विस्तार अन्य देशों तक हुआ जिसके चलते दमिश्क स्टील का निर्माण हुआ। इसके अलावा 12वी शताब्दी के अरब यात्री एड्रिसी ने भी भारतीय स्टील को दुनिया की सर्वश्रेष्ठ धातु बताया। अरब लेख तेलिंग में स्टील की प्रसिद्धि के लिए तेलंगाना क्षेत्र के संदर्भ में लिखा गया है। जिसमें बताया गया कि तेलंगाना का गोलाकांडा क्षेत्र स्पष्ट रुप से पश्चिम एशिया में उक्कू स्टील के निर्माण का प्रमुख केंद्र है।

वूट्स शब्द का अर्थ

17वीं शताब्दी में यूरोपीय यात्रियों ने दक्षिण भारत के गोलाकोंडा मालाबार और मैसूर क्षेत्र की यात्रा की और इस्पात निर्माण के क्षेत्र का दौरा किया। जिसके तहत उन्हें इस स्टील के नाम के पीछे का अर्थ समझ आया। वूट्ज शब्द तमिल शब्द उरुक्कू से लिया गया है जिसका अर्थ है पिघलाना। इसी प्रकार द्रविड़ भाषा में इसी प्रकार के मिलते जुलते शब्द का प्रयोग किया गया। वहीं तेलुगु में इस स्टील को उक्कू तथा मलयालम में इसे उरुक्कू नाम से जाना जाता था। इसी प्रकार इस स्टील को मैसूर में उक्कू टूंडू के नाम से जाना जाता था।

17वी से 19वीं शताब्दी के समय काल में यूरोपीय वैज्ञानिकों में इस स्टील के बारे में जानने की जिज्ञासा हुई। उस समय काल के दौरान यूरोपीय वैज्ञानिकों को कार्बन मिश्रित धातुओं की जानकारी बहुत कम थी। मगर उनके द्वारा वूट्ज स्टील के शोध ने आधुनिक अंग्रेजी फ्रांसीसी और रुसी धातु विज्ञान के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
 

प्रजनन अनुसंधान

19वीं शताब्दी के समय काल में ही वूट्ज स्टील पर गहन अध्ययन के लिए रॅायल स्कूल आफ साइंस द्वारा इसे पुनः बनाने के लिए प्रयास किया जिसके चलते 1795 में  डॅा. पियर्सन ने वूट्ज स्टील की रासायनिक रुप पर जांच की जो कि इस स्टिल पर रिसर्च करने वाले पहले व्यक्ति थे।

पावेल पेट्रोविच अनोसोव

ये रुस के धातु वैज्ञानिक थे वे वूट्ज स्टील अपने सभी प्राचीन गुणों के साथ पुनः बनाने में सफल रहे। उनके द्वारा निर्मित स्टील पारंपरिक वूटज के लगभग समान ही था। उन्होंने इस प्रकार के स्टील के उत्पादन के चार अलग-अलग तरीकों के बारे में लिखा जो कि एक पारंपरिक पैटर्न प्रदर्शित करते थे। उनका यह कार्य बुलैट स्टील्स नाम से भी जाना जाता है। जिसे माइंनिग जनरल पत्रिका में इसी शीर्षक के नाम से प्रकाशित किया गया था।

रीबोल्ट एट अल के अनुसार

इन्होंने अपने विश्लेषण में सीमेंटटाइट के नैनोवायरों को घेरने वाले कार्बन नैनोट्यूब की उपस्थिति के बारे में बताया। इसके साथ ही उन्हें धातु पर वैनेडियम मोलिब्डेनम और क्रोमियम के कुछ अंश मिले जिसके चलते उन्हें पता चला की धातु की अशुद्धियों को निकालने के लिए और वूट्ज स्टील को मजबूती प्रदान करने के लिए इसे गर्म ठंडा और जमाने जैसे चरणों से गुजारा गया है। जिसके कारण ही यह स्टील लचीला होने के कारण भी अपनी मजबूत पकड़ को नहीं छोड़ता।

वूट्ज स्टील बनाने का तरीका

इस इस्पात का निर्माण एक खास प्रक्रिया द्वारा किया जाता है जिसके दौरान लोहे के कार्बन युक्त पदार्थ के साथ सील बंद भट्टियों में पिघलाया जाता है। जिसके चलते अंत में हमें शुद्ध स्टील प्राप्त होता है जिस पर अद्वितीय सूक्ष्म संरचनाएं होती है।

कच्चे लोहे का चयन
सबसे पहले कच्चे लोहे का चयन सावधानीपूर्वक शुद्धता के आधार पर किया जाता था। धातु की संरचना में एक स्वरुप सुनिश्चित करने के लिए अशुद्धियों को कम से कम किया जाता था।

क्रूसिबल स्टील का उत्पादन
कठोर मिट्टी के बने छोटे-छोटे बर्तन जो की लोहे और कार्बन युक्त पदार्थों जैसे चारकोल आदि से बने होते थे। खास बात यह है कि इस कार्बन निर्माण के लिए बांस की पत्तियों को जला कर तथा अन्य पौधों को जलाकर प्राप्त किया जाता था।

नियंत्रित कार्बन अवशोषण

अब गर्म करने की प्रक्रिया के दौरान कार्बन लोहे में समाहित हो जाता था और एक उच्च कोटि के कार्बन इस्पात में बदल जाता था। इस चरण में धातु की भंगुरता को रोकने के लिए एक निश्चित तापमान की आवश्यकता होती थी जिसके अधिक या कम होने पर स्टील अपनी मजबूती खो देता था।

धीमी शीतलता
धातु के भट्टी में पिघलाने के बाद भट्टियों को धीरे-धीरे ठंडा किया जाता था। जिसके कारण एक नियंत्रित शीतलता के कारण धातु पर आंतरिक संरचनाएं बनी, जिन्होंने आगे चलकर ढलाई को दौरान दमिशक आकृति का धातुरुप धारण कर लिया। अंत में हमें एक ठोस स्टील का पिंड मिलता है।

वूट्ज स्टील के गुण
यह स्टील न केवल अपनी दिखावट के लिए बल्कि अपने यांत्रिक प्रदर्शन के लिए भी जाना जाता है। इस स्टील के माध्यम से बने बेल्ड प्राचीन काल में अन्य स्टील की तुलना में अधिक मजबूत हुआ करते थे। वैज्ञानिकों ने इसकी सूक्ष्म संरचना का अध्ययन करके पता लगाया की इस स्टील की मजबूती का मुख्य राज ये सूक्ष्म संरचनाएं ही है जो इसकी मजबूती के साथ इसके लचीलेपन में भी योगदान देती हैं।

दमिश्क स्टील की उत्पत्ति और वूट्ज स्टील से संबंध

कई लोग पौराणिक तलवारों का सम्बन्ध दमिश्क स्टील से जोड़ते है जो वूट्ज स्टील की तरह ही अन्य आकृति बहते पानी की आकृतियों के लिए प्रसिद्ध है। हलांकि खोज कर्ताओं का यह मानना है कि दमिश्क तलवारों के बनाने में भी इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल भारत में उत्पादित वूट्ड स्टील के क्षेत्र से ही आता था।

भारतीय इस्पात की सिल्लियों को व्यापार मार्गों के माध्यम से मध्य पूर्व में निर्यात किया जाता था। इसके बाद वहां के कुशल कारीगरों द्वारा इन्हें ढालकर ब्लेड़ बनाते थे। विशेष ढलाई तकनीकों के माध्यम से इन सिल्लियों पर विशिष्ट दमिश्क पैटर्न निर्मित होता था।

शनिवार, 29 अगस्त 2026

कैलाश मँदिर

kailasa temple

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में एलोरा गुफाओं में से सबसे प्रसिद्ध गुफा एवं मंदिर के बारे में चर्चा की गई है जिसे हम कैलाश मंदिर के रुप में जानते है। बताते चले कि यह मंदिर यूनेस्को की विश्व धरोहर की सूची में आता है जिसे वर्ष 1983 एलोरा की सम्पूर्ण गुफा सूची जो कि लगभग 100 अभी तक खोजी जा चूंकि हैं के साथ सम्मिलित किया गया। एलोरा की गुफाओं की बात करें तो इन 100 गुफाओं में से सिर्फ 34 गुफाओं को ही लोगों के पर्यटन स्थल के रुप में खोला गया है। 

कैलाश मंदिर इन 34 गुफाओं की सूची में 16वें स्थान पर आता है। इस लेख के माध्यम से हम इस मंदिर की वास्तु शिल्प कला तथा इस मंदिर के निर्माण के पीछे की कहानी एवं इतिहास के बारे में जानेंगे। इसके साथ ही हम यह जानने की कोशिश करेंगे की यह मंदिर इस प्रकार से राष्ट्रकूट  पल्लव वंश चालुक्य शासकों से सम्बन्धित है तथा इसके प्रमाणीकरण पर भी बात करेंगे।

परिचय

यह मंदिर भारतीय राज्य महाराष्ट्र के छत्रपती संभाजी नगर जिले में एलोरा में स्थित मंदिरों की सूची में सबसे बड़ा मंदिर है। यह मंदिर एक पूरे पहाड़ को काट कर बनाया गया है। इस मंदिर का निर्माण राष्ट्रकूट वंश के राजा नरेश प्रथम के द्वारा प्रारम्भ करवाया गया जिनका समय काल 757 से 783 ई. का था। यह मंदिर पूरे विश्व में अपने एक अनूठे ढंग का वास्तु और शिल्प कला का अद्भुत नमूना है। यह खास इस लिए भी है क्योंकि 1200 वर्ष से भी प्राचीन सह्वाद्री पहाड़ियों के कठोर चट्टान जिसे हम बेसाल्ट पत्थर के रुप में भी जानते है काटना इतना आसान नहीं था।

यह भारतीय इतिहास के सबसे प्राचीन मंदिरों की सूची में इस लिए भी प्रसिद्ध है क्योंकि इसका निर्माण कार्य नीचे से प्रारम्भ न करके ऊपर यानी इसके शिखर निर्माण कार्य से प्रारम्भ किया गया था। याद रखने योग्य बात यह भी है कि जिस क्षेत्र विशेष पर यह मंदिर निर्मित किया गया है उसे पहले ओरंगाबाद के बाद के नाम से जाना जाता था जिसे वर्ष 2023 के फरवरी महीने में राज्य और केन्द्र सरकार की मंजूरी पर मराठा साम्राज्य के दूसरे शासक छात्रपति सम्भा जी महाराज के सम्मान में परिवर्तित किया गया।

मंदिर निर्माण का कारण

प्राचीन काल में मंदिर निर्माण का कार्य व्यापारिक मार्गों के निकट किया जाता था ताकि व्यापारी और सौदागर यहां रुक कर विश्राम कर सकें इसके साथ ही यहां रहने वले भिक्षुओं साधुओं और तपस्वियों के साथ लंबी यात्रा करने सहायता और सुविधा भी मिलती थी। बदले में इन धनी व्यापारियों और सौदागरों की तरफ से मंदिर परिसर के संरक्षण के लिए आर्थिक मदद की जाती थी। प्राचीन व्यापारिक मार्ग पर स्थित होने के कारण यह दक्कन क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया था। इसके साथ ही क्षेत्रीय शासकों द्वारा भी इस मंदिर को संरक्षण प्राप्त था।

लोक कथा के अनुसार

दसवीं शताब्दी की एक कथा अनुसार जिसे हम कल्प तरु के नाम से भी जानते है में एक वृतांत के अनुसार राष्ट्रकूट शासक एलु की एक रानी का उल्लेख है जो कि इस प्रकार है। लगभग 8वीं शताब्दी के समय काल में राष्ट्रकूट राजा बीमार पड़ गए। जिसके चलते रानी ने भगवान भोले नाथ की आराधना की और राजा के अच्छे स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना की तथा उन्होंने वादा कि राजा स्वास्थ्य हो गए यानी उनकी मनोकामना पूर्ण हुई तो वे भगवान शिव के भव्य मंदिर का निर्माण करवायेंगी। फलस्वरूप  उनकी इच्छा पूर्ण हुई जिस कारण से रानी ने प्रण लिया कि जब तक वे भगवान शिव के मंदिर का शिखर नहीं देख लेतीं तब वे भोजन नहीं ग्रहण करेंगे।

राजा ने अपने देश के सर्वश्रेष्ठ वास्तुकारों मंदिर निर्माण के लिए आमंत्रित किया। वास्तुकारों ने भव्य मंदिर की संरचना प्रस्तुत की राजा उनसे प्रभावित भी हुए। मगर समस्या यह थी की पूरे मंदिर के निर्माण कार्य में लगभग 1 महीने का समय लग जाता जिसके चलते रानी को पूरे एक महीन के लिए भूखा रहना पड़ता।

अतः पेठन के वास्तुकार कोकासा मंदिर निर्माण की एक अनोखी योजना प्रस्तुत की जिसमें उन्होंने मंदिर को ऊपर स नीचे की तरफ निर्माण करने की बात की। इस योजना के तहत वास्तुकार मंदिर  की शुरुआत उसके शिखर के निर्माण कार्य से कर सकते थे  और मंदिर के शीर्ष को देखकर रानी अपना व्रत तोड़ सकती थी।

शिलालेख के अनुसार

दशा अवतार गुफा में मिले  शिला लेख के अनुसार इसी प्रकार के एक अन्य मंदिर  का निर्माण राष्ट्रकुट वंश के संस्थापक दंतिदुर्ग द्वारा अपने शासन काल यानी 735 से 757 ई. के मध्य के समय काल में करवाया था। इस मंदिर की नक्काशी भी कैलाश मंदिर की नक्काशी के समान शैली द्वारा निर्मित की गयी थी। हलांकि मंदिर परिसर के कुछ हिस्सों के बाद शासकों द्वारा पूर्ण करवाया गया। खास बात यह है कि यह गुफा भी एलोरा की गुफाओं की श्रेणी में 15 स्थान पर आती है और शैव मंदिर निर्माण स्थली के समीप है।

मंदिर की सरंचना

कैलाश मंदिर उन 34 हिंदू जैन और बौद्ध गुफाओं और मठों में सबसे बड़ा है जिन्हें हम सामूहिक रुप से एलोरा की गुफाएं कहते है। जिनमें 17 हिन्दू मंदिर 12 बौद्ध गुफाएं एवं 5 जैन मंदिर को शामिल किया गया है। इस मंदिर का निर्माण कार्य इस लिए भी खास है क्योंकि उस समय काल के दौरान वर्तमान तकनीकी औजार जैसे जैक हैमर उपलब्ध नहीं था जिसके कारण पूर्ण मंदिर का निर्माण हथौड़े व छेनी का इस्तेमाल करने वाले श्रमिकों की सेना के द्वारा तराशा गया।

प्रारम्भ में बेसाल्ट चट्टान के अंदर तीन विशाल खाई खोदी गई और लगभग 20 लाख टन चट्टान को काटकर हटाया गया। अतः इस चरण के बाद ही वास्तविक कार्य प्रारम्भ हुआ। जैसे-जैसे कारीगर नीचे उतरते गए मंदिर परिसर की विभिन्न संरचनाओं को तरशते गए। इनमें मुख्य रुप से गर्भगृह के ऊपर का शिखर स्वतंत्र स्तंभ अलग-अलग मंदिर और विशाल मूर्तियां शामिल थीं। इसके बाद ही मंदिर की बाहरी और आंतरिक सतह पर विस्मयकारी मूर्तिकला को बारीकी से उकेरा गया।

मंदिर का मुख्य मंडप 16 स्तंभों के सहारे पर टिका हुआ है इसके अलावा शिव के वाहन नंदी बैल के लिए अलग मंडप बनाया गया है। चारों तरफ 45 फुट ऊंचे ध्वज स्तंभ का निर्माण किया गया है। इन स्तंभों पर कभी त्रिशूल रखे जाते थे। मंदिर परिसर के अन्दर पांच अलग-अलग मंदिर स्थापित किए गए हैं जिनमें से तीन यमुना सरस्वती और गंगा को समर्पित है। 

नंदी मंदिर के मंडप के अगल-बगल विशालकाय हाथी की मूर्तियों के साथ स्तंभों का निर्माण किया गया है। अगर पूरे मंदिर की लंबाई की बात करें तो यह मंदिर 276 फुट लंबा है और वहीं चौड़ाई की बात करें तो यह 148 फिट चौड़ा है। मंदिर  के आंगन में तीन तरफ कोठरियों को एक सारणी में बनाया गया है। 12 मंजिला इमारत के रुप में निर्मित होने के कारण यह मंदिर सम्पूर्ण एलोरा गुफाओं में विशेष स्थान रखता है। यह एक मात्र गुफा है जो 12 मंजिलों में निर्मित है। मंदिर में मौजूद प्रमुख मुर्तियों की बात करें तो इनमें नटराज यानी भगवान शिव की मूर्ति गजलक्ष्मी अर्धनारीश्वर विष्णु के दशावतार रावणानुग्रह की मु्र्तियां प्रमुख है।

आधुनिक युग की खोज

इस मंदिर पर 1819 में जान स्मिथ नामक ब्रिटिश अधिकारी दुबारा खोजा गया। जान स्मिथ एक दिन शिकार के दौरान औरंगाबाद से 100 किलो मीटर दूर सह्राद्रि की पहाड़ियों की तरफ मौजूद जंगल में चले गए। शिकार के दौरान वे बघौरा नदी के पास पहुंच गए। वहीं उन्हें नदी की ऊपर की पहाड़ियों पर एक मंदिर का मुहाना दिखा। उन्हें लगा की गुफा के अन्दर उन्हें शिकार के लिए जरूर कोई बाघ मिल सकता है जिसके कारण वे अन्दर चले गए। प्रकाश जला के जब उन्होंने अन्दर का द्रश्य देखा तो चकित रह गए। इस प्रकार इन गुफाओं की दुबारा से खोज हो सकी। वे पहला यूरोपीयन शख्स था जो पहली बार इन गुफाओं तक पहुंचा।

लेख से सम्बन्धित अगर आपके पास कोई अन्य जानकारी है तो जरूर हमें बताएं

गुरुवार, 27 अगस्त 2026

सिंधु घाटी सभ्यता की लिपि

indus valley script

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम सिंधु घाटी सभ्यता के इतिहास पर प्रकाश  डालेंगे इसके  साथ ही सिंधु घाटी सभ्यता की खोज के दौरान मिली लिपि के इतिहास पर प्रकाश डालेंगे। आगे लेख में हम यह जानने की कोशिश करेंगे की सिंधु वासियों द्वारा अपनी लिपि का प्रयोग मुख्य रुप से किन-किन क्षेत्रों में किया जाता था। इसके साथ ही हम जानेंगे की किसी तरह से इस लिपि के खोज कर्ताओं द्वारा द्रविड़ और संस्कृत से सम्बन्धित बताया गया। इसके अलावा हम यह समझने कि कोशिश करेंगे कि क्यों कुछ विद्वान इसे कोई लिपि न समझकर इस एक गणी तिय प्रणाली मानते थे।

लिपि का परिचय

इस लिपि की खोज वर्ष 1920 के दशक में सर जान मार्शल द्वारा की गई थी जिसे मोहरों टेराकोटा की पट्टियों तथा धातु पर अंकित पशुओं मानवों तथा लेखों से प्राप्त किया गया है। बताया जाता है कि यह लिपि लगभग 2600-1900 ईसा पूर्व की अनुमानित है। जिसे मुख्य रुप से भारत के उत्तर पश्चिमी हिस्से तथा पाकिस्तान के सिंधु क्षेत्र वाले भाग से प्राप्त किया गया है। इस लिपि  से संभवतः एसी भाषा का प्रतिनिधित्व होता जिनके अक्षरों में समानता न होने के कारण इसका अध्ययन कर पाना मुश्किल हो जाता है।

वर्ष 1982 में खोज कर्ता एस आर राव ने इस लिपि के 62 संकेत को प्रस्तावित किया। इसी क्रम में आगे चलकर 1994 में रिसर्च कर्ता असको परपोला ने इस लिपि के 425 संकेतों के बारे बताया। इसी प्रकार वर्ष 2016 में शोधकर्ता ब्रायन के वेल्स ने 676 संकेतों की खोज की। लेकिन सटीक संख्या एवं इनके अर्थ पर अभी भी खोज जारी है।

लिपि को सही से न समझ पाने का मुख्य कारण विशेषज्ञ यह बताते है कि अभी तक हमें हड़्प्पा मोहरों का सीमित संग्रह ही मिल पाया जिनमें मात्र 3500 हड़प्पा मोहरों का ही जिक्र किया जाता है लेकिन अभी भी सटीक संख्या अज्ञात है। इसके साथ ही समय के प्रभाव के कारण कलाकृतियों का क्षरण भी एक मुख्य कारण है। 

लिपि की मुख्य बातें

सिंधु घाटी सभ्यता की लिपि को हड़प्पा सभ्यता की लिपि भी कहा जाता है जो की आज तक पुरी तरह से पढ़ी नहीं जा सकी है। हाल ही में भारतीय राज्य तमिलनाडु के मुख्य मंत्री जिनका नाम एम के स्टालिन है ने सिंधु घाटी सभ्यता की लिपि को सफलतापूर्वक समझाने वाले व्यक्ति के लिए 1 मिलियन अमेरिकन डालर के इनाम की घोषणा की थी। यह घोषणा पिछले वर्ष 9 जनवरी 2025 को की गई थी। जिसमें बहुत से विद्वानों ने प्रयास किया मगर सफलता हासिल न कर पायें।

लेखन शैली

लिपि को दाएं से बाएं की और लिखा जाता था इसके साथ ही लिपि को लिखते वक्त अक्षरों की दिशाओं में परिवर्तन भी किया गया है । जिस कारण कुछ विद्वान इसी लिपि को लोगोसिलेबिक प्रणाली का दर्जा भी देते है जिसका अर्थ है। जिसका अर्थ है कि यह लिपि चित्रलेखों तथा अक्षरों के संयोजन द्वारा लिखी गयी है। अधिकांश लेख इतने छोटे है कि पांच अक्षर में पूर्ण हो जाते है अतः लम्बे लेखों की कमी के कारण व्याकरण तथा वाक्य विन्यास व भाषा की व्याख्या के पैटर्न को समझने की क्षमता सिमीत हो जाती है।

लिपि का मुख्य कार्य

मुख्य रुप से लिपि का प्रयोग व्यापारिक कार्यों कर अभिलेखों एवं पहचान आदि के लिए किया जाता था। लिपि में गुणज स्वास्तिक और जोड़ जैसे चिन्ह भी मिले है जिसके कारण विद्वानों में यह भ्रम भी है शायद इस लिपि का प्रयोग शिक्षा सांस्कृतिक कार्यों में भी किया जाता था। हलांकि इस बात पर अभी रिसर्च होना बाकी है।

द्रविड़ भाषा से सम्बन्ध

कुछ शोधकर्ताओं जैसे इरावत महादेवन एवं असको परपोला ने इस सम्बन्ध द्रविड़ भाषा से स्थापित करने की कोशिश क्योंकि लिपि में मछली का चिन्ह तारों का पर्यायवाची के रुप में किया जाता है ठीक इसी प्रकार तमिल शब्दावली में भी मछली का पर्यायवाची तारा ही होता है । इसी प्रकार संख्या और मछली के चिन्ह द्वारा तारा समूह को परिभाषित किया जाता है।

संस्कृत से सम्बन्ध

एस आर राव जैसे विद्वानों न इस लिपि का सम्बन्ध संस्कृत से जोड़ते हुए इसे वैदिक काल यानी 1500-600 से संबंधित बताया। लेकिन हड़प्पा एवं वैदिक सभ्यता संस्कृति की विसंगतियों के कारण इस पर विवाद है। स्टीव फार्मर एवं पैगी मोहन जैसे विद्वानों ने इस तर्क की आलोचना कि है।
हड़प्पा सभ्यता की लिपि का समझना ज़रुरी क्यों है।

क्योंकि इसी मदद से इतिहासकारों और हमें हड़प्पा की धार्मिक मान्यताओं सामाजिक रीति रिवाजों सामाजिक मानदंडों तथा राजनीतिक संरचनाओं को समझने में सहायता मिलेंगी। इसके साथ ही हमें यह जानने को मिलेगा की इस क्षेत्र विशेष के लोग किन क्षेत्र विशेष के लोगों से अधिक प्रभावित थे तथा नगर निर्माण की आधुनिक शैली तथा नगर के कचरे की निकासी से लिए उच्चतम प्रबंध बिना किसी उच्च तकनीक के कैसे विकसित की।

मंगलवार, 7 जुलाई 2026

मनुस्मृति

मनुस्मृति क्या है

प्रस्तावना 

प्रस्तुत लेख में हम भारतीय इतिहास के विवादित ग्रंथ मनुस्मृती के इतिहास के बारे में चर्चा करेंगे इसके साथ ही हम देखेंगे की इस ग्रंथ के कौन कौन से वो श्लोक है जो विवाद का मुख्य कारण है। इस ग्रंथ पर यह आरोप भी लगता रहा है कि यह किताब कालसुत्रों के आधार पर उनके श्लोकों को निकाल कर बनाई गई है। कुछ लोगों का तो मानना यह भी है कि यह किताब मानवों के अधिकारों का दमन करती है।

इतिहास

भारुचि
मनुस्मृती के सबसे प्राचीन लेखक का खिताब इन्ही को दिया जाता है इतिहासकारों के अनुसार इन्होंने इस ग्रंथ की रचना 10शताब्दी से उत्तरार्ध  तथा 11वीं शताब्दी के आरम्भिक काल में की थी। मगर विदेशी लेखक अलिवेल इस ग्रंथ की रचना का समय काल 600 से 800 शताब्दी के बीच का मानते है।

इसके आलावा मनुस्मृती के कयी संस्करण भी प्रकाशित भी किए गये है जैसे मनुटिका जिसकी रचना 11वी. शताब्दी में की गयी थी इसके अलावा मानवर्थ मुक्तावली जैसे नाम भी आते है। अब तक मनुस्मृती सम्बन्धित पचास से भी ज्यादा पांडुलिपियां मिल चुकी है जो की 18वी. शताब्दी से अब तक खोजी गईं हैं। 

खास बात यह है कि इन सभी पांडुलिपियों का सिधा सम्बन्ध सीधे तौर पर मनुस्मृती से नहीं है । बस इतना पता चलता है कि इन सभी पांडुलिपियों के श्लोकों का प्रयोग  मनुस्मृती में किया गया है।

नामकरण

मनुस्मृती शीर्षक एक आधुनिक शब्द है जो संस्कृत से लिया गया है। लेकिन इसके वर्तमान मूल में ऐसा कोई विभाजन नहीं था। किताब के मुख्य रुप को चार भागों में विभाजित किया गया है। 1 इसमें दुनिया की रचना 2 धर्म का स्रोत 3 चारो सामाजिक वर्गों का धर्म 4 कर्म का नियम पुनर्जन्म और अंतिम मुक्ति के बारे में चर्चा कि गई है।

खास बात यह कि इन प्राप्त पांडुलिपि में इसे ही लिए श्लोको के प्रयोग से ही आचार संहिता के रुप में परिभाषित किया गया है। इसके अलावा हम मनुस्मृती को मानव धर्म शास्त्र के रुप में भी जानते है। वेदों के बाद यह हिन्दू धर्म का महत्वपूर्ण ग्रंथ है।

मुख्य ग्रंथ को श्लोकों में परिभाषित किया गया है। यह ग्रंथ एक संवाद को प्रदर्शित करता है जिसमें एक शिष्य अपने गुरु से सवाल करता है यहां गुरु स्वयं मनु है । शुरुआत के 58 श्लोक मनु को समर्पित किए गये हैं। एवं बाकी के श्लोक उनके शिष्य भृगु को समर्पित किए गये हैं।

खास रचनात्मक श्लोक

यहां हम श्लोक न लिखकर उनका अर्थ लिख रहे है। जैसे 1. धर्म से सभी शूद्र होते है, कर्मों के आधार पर उनका नया वर्ण बनता है। अतः सभी द्विज कहलाते है।

2.धर्म के 10 लक्षण है जैसे धैर्य क्षमा संयम चोरी न करना स्वच्छता इन्द्रियों को वश में रखना बुद्धि विद्या सत्य और क्रोध न करना आदि।
3.किसी को अपना जूठा न खिलाना और न ही किसी का जूठा न खाना, न अधिक भोजन करना और न ही भोजन करने के बाद हाथ मुंह धोये बिना इधर उधर जाना।
4.जो मनुष्य धर्म शास्त्र एवं वेद शास्त्र के अनुकूल तर्क द्वारा अनुसंधान और चिन्तन करता है वही धर्म के वास्तविक स्वरुप को समझ पाता है।

मनुस्मृती के विवादित श्लोक 

1.अध्याय 9 श्लोक 3
महिला को कभी स्वतंत्रता नहीं मिलनी चाहिए, बचपन में पिता , युवावस्था में पति और बुढ़ापे में पुत्रों को उसे नियंत्रण में रखना चाहिए।

2. अध्याय 10 श्लोक 122
शूद्रों को भोजन के लिए दूसरों का जूठा अन्न, पहनने के लिए फटो पुराने कपड़े और बिछाने के लिए टूटी-फूटी चटाई य धान के पौधे या पुआल दिया जाना चाहिए।

3. अध्याय 8 श्लोक 270
यदि कोई नीची जाति का व्यक्ति ऊंची जाति के व्यक्ति को जानबूझकर नुकसान पहुंचाता है य कटु शब्द कहता है तो उसे अत्यंत कठोर शारीरिक दंड देना चाहिए य जीभ काट देनी चाहिए जबकि उच्च वर्ग के लोगों के लिए सज़ा का अनुपात काफी कम है।

4. अध्याय 8 श्लोक 271
यदि कोई शूद्र उच्च वर्ग के व्यक्ति का नाम और जाति लेकर अहंकार से अपमान करता है तो उसके मुंह में 10 अंगुलि के बराबर लोहे की जलती कील डाल देनी चाहिए।

5.अध्याय 8 श्लोक 272
यदि कोई शूद्र गर्व से उन्हें धर्म उपदेश देता है तो राजा को उसके कान और मुंह में खौलता हुआ तेल डलवा देना चाहिए।

6.अध्याय 8 श्लोक 279
यदि कोई निम्न वर्ग का व्यक्ति श्रेष्ठ वर्ण के व्यक्ति को अपने जिस अंग से नुकसान पहुंचाता है तो राजा को उसका वही अंग काट देना चाहिए।

7.अध्याय 8 श्लोक 268
अगर कोई उच्च वर्ग का व्यक्ति अपने से निम्न वर्ग के व्यक्ति का अपमान करता है य उपरोक्त सभी दण्ड निम्न वर्ग के व्यक्ति को देता है तो राजा को उसे सिर्फ मामूली आर्थिक दण्ड देना चाहिए य सर मुण्डवा कर देश से निकाल देना चाहिए।

8. अध्याय 8 श्लोक 379/380
ब्राह्मण चाहे कितना भी बड़ा अपराध क्यों न करें उसे कभी भी मृत्यु दंड नहीं देना चाहिए य अंग भंग जैसी शारीरिक सजा नहीं दी जा सकती है, उसे केवल देश निकाला य मुंडन की सजा दी जा सकती है।

दोस्तों शायद उपरोक्त कारणों एवं भेदभाव के  चलते ही बी आर अम्बेडकर ने मनुस्मृती को जलाया था और संविधान को सर्वोपरि पुस्तक का दर्जा दिया था। इतिहास में बहुत सी ऐसी चीज़े और किताबें मिलती है जो की भेदभाव के बढ़ावा देतीं है। जिनमें बदलते वक्त के साथ परिवर्तन की जरूरत है।

क्योंकि हमारा मानना है कि प्राकृत ने हम सभी को बनाया है और समय के साथ यह हमें मिटायेगी भी। प्राकृति हमारे साथ-साथ सभी जीव- जन्तुओं  का संरक्षण भी करती है। ऐसे में न तो कोई मनुष्य बहुत बड़ा हो सकता है और न ही बहुत छोटा।

तो इस प्रकार इस ग्रंथ की ज्यादातर मान्यताऐं गलत है। क्योंकि धर्म को मानने के लिए मनुष्य का होना आवश्यक है, कुछ चुनिंदा लोग मात्र कुछ भी नियम बनाकर किसी धर्म को नहीं चला सकते यह हम समझते हैं। खास बात यह है कि इस प्रकार के ग्रंथों को मनुष्यों द्वार ही लिखा गया है तो जाहिर सी बात है वे अपने भी विचार इन ग्रंथों में पिरोते होंगे।

शुक्रवार, 19 जून 2026

indo-greek kingdom इंडो-ग्रीक आक्रमण

indo-greek kingdom
प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम भारत पर हुए तीसरे विदेशी आक्रमण के बारे में चर्चा करने जा रहे हैं जिसे हम इंडों-ग्रिक आक्रमण के नाम से भी जानते है। इसके साथ ही हम देखेंगे की इनके द्वारा कौन कौन से परिवर्तन भारत में किये गए।

मूल निवास

यह मूल रुप से बैक्टीरिया प्रांत के रहने वाले थे। इन का प्रमुख शासक डेमोट्रियस था जिसकी मदद से इन्होंने उत्तर पश्चिम यानी पंजाब हरियाणा मथुरा तथा पाकिस्तान अफगानिस्तान के क्षेत्रों पर अपना शासन स्थापित किया। यह आक्रमण भारत पर 180 ईसा पूर्व में हुआ था।

प्रमुख शासक

डेमोट्रियस के आलवा इनके प्रमुख शासकों की सूची में मिनांडर menandar का नाम आता है। इसने साकल sakal को अपनी राजधानी बनाकर साकेत यानी अयोध्या और पाटिलपुत्र यानी मगध के क्षेत्रों तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया।

बौद्ध धर्म से प्रभावित 

मिनांडर बौद्ध धर्म से अत्यधिक आकर्षित हुआ इसका साक्ष्य हमें बौद्ध भिक्षु नागसेन और मिनांडर के दार्शनिक संवाद से मिलता है जो कि प्रसिद्ध बौद्ध ग्रंथ मिलिदंपन्ह वर्णित है।

भारतीय संस्कृति पर प्रभाव

1.सिक्के
भारत में सर्वप्रथम सोने के सिक्कों का चलन यवन शासकों द्वारा ही चलाया गया। जिस पर उस समय काल के राजा की तस्वीर एवं नाम अंकित रहता था और दूसरी तरफ बौद्ध की आकृति य उनका उपदेश कुरेदा जाता था। डाई से सिक्के बनाने का चलन यवन शासकों द्वारा ही चलाया गया था। इंडो-ग्रीक से पहले भारत में बने सिक्कों का कोई निश्चित आकार य राजा की पहचान नहीं होती थी। डाई द्वारा सिक्के बनाने के कारण सिक्कों का वजन आकार और शुद्धता निश्चित की गई जिससे व्यापार करना बेहद आसान हो गया। उपरोक्त कारणों के चलते भारत की आर्थिक समृद्धि का विकास हुआ। 

2.गांधार कला Gandhara Art
यूनानी मूर्ति कला और भारतीय मूर्ति कला के संगम से गांधार मूर्ति कला का विकास हुआ। इसी कला के माध्यम से भारत में पहली बार महात्मा बुद्ध क मूर्ति यूनानी देवता अपोलो की तरह बनाई गयी थी। इनके युद्ध से पहले भारत में बौद्ध को प्रतीकों चरण और स्तूपों द्वारा दर्शाया जाता था। उनकी मानव रुप में मूर्ति नहीं बनती थी।इनके द्वारा निर्मित गांधार कला शैली के चलते ही बुद्ध के घुंघराले बाल मूंछे और शारीरिक गठन जैसी मूर्तियां बनाई जाने लगीं।

3.खगोल विज्ञान और ज्योतिष कला
सप्ताह के सात दिनों का नामकरण तथा 12 राशियों की खोज यूनानी प्रभाव से ही विकसित हुई। जिसका प्रमाण भारतीय ग्रंथ गार्गी संहिता से मिलता है। जिसमें लिखा है कि यद्यपि यवन एक बर्बर देश है  फिर भी वे ज्योतिष के विद्वान है इसलिए वे पूजनीय है। इनकी ही वैज्ञानिक कला शैली से ग्रहों की गति ग्रहण की भविष्यवाणी और वर्ष की सटीक गणना करने की यूनानी तकनीकों को भारतीय विद्वानों ने अपनाया और अपने ग्रंथों में शामिल किया।

4.रंगमंच और पर्दा
भारतीय नाटक और रंगमंच में परदे का उपयोग शुरु हुआ जिसे आज भी यवनिका कहा जाता है  जो कि यवन शब्द से बना है।

सांस्कृतिक समन्वय

कई यूनानी शासकों और राजदूतों ने भारतीय धर्म को अपनाया ये ही नहीं तक्षशिला के यवन राजदूत हेलियोडोरस ने मध्य प्रदेश के विदिशा में भगवान विष्णु को समर्पित गरुड़ ध्वज स्तंभ की  स्थापना करवाई।इस प्रकार से देखा जाये तो यवन आक्रमण और उनके शासन का भारतीय संस्कृति शासन और व्यापार पर गहरा और दीर्घकालिक प्रभाव पड़ा।

वैश्विक व्यापार

उत्तर-पश्चिम सीमा सुरक्षित होने और ग्रीक संपर्क से भारत का व्यापार मध्य एशिया भू मध्य सागर और रोमन साम्राज्य तक तेजी से फैला।

गुरुवार, 18 जून 2026

शकों का आक्रमण

shak or shaka dynasty

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम भारत पर हुए चौथा विदेशी आक्रमण तथा इसके प्रभाव के साथ भारत में शकों को किन राजाओं ने कड़ी टक्कर दी इसके बारे में चर्चा करेंगे।

मूल निवास

शकों का मूल निवास स्थान सिर दरिया घाटी और चीनी के तुर्किस्तान में था। हूणों और यूचू कबीले के दबाव के कारण उन्हें अपना स्थान छोड़कर भारत की ओर आना पड़ा था।खास बात यह है कि भारत आने के बाद शक साम्राज्य मु्ख्य रुप से 5 भागों में विभाजीत हो गया। मुख्य रुप से इनकी राजधानी अफगानिस्तान पंजाब मथुरा गुजरात मालवा और दक्कन में थी।

शकों का प्रथम आक्रमण 2वीं सदी ईसा पूर्व में माउज़ के सहयोग से उत्तर-पश्चिम के हिस्से यानि गांधार और तक्षशिला के क्षेत्र को इंडे-ग्रिक शासकों के साथ किया था। इनका सबसे प्रतापी राजा रुद्रदामन था।

प्रमुख शासक
मोगा moues
यह भारत का पहला शक राजा माना जाता है इसने गंधार और पंजाब में अपना शासन स्थापित किया था।

रुद्रदामन प्रथम
यह पश्चिमी भारत की शाखा का सबसे प्रसिद्ध शक राजा था जिसने काठियावाड़ की सुदर्शन झील की मरम्मत करवाई थी।

भारत के राजाओं से सामना

इतिहास को कुरदने पर हमें यह पता चलता है कि इनका सामना किसी एक भारतीय राजा से नही बल्कि अलग- अलग कालखंड़ों के तीन महान भारतीय राजवंशों और उनके प्रतापी राजाओं से हुआ था। इन राजाओं ने शकों के केवस कड़ी टक्कर ही नही दी बल्कि उन्हें कई बार बुरी तरह पराजित भी किया।

राजा विक्रमादित्य
57 ईसा पूर्व में जब शकों ने पश्चिमोत्तर से आगे बढ़कर मालवा और उज्जैन पर कब्जा कर लिया, तब उज्जैन के एक स्थानीय हिंदू राजा जिन्हें इतिहास में विक्रमादित्य के नाम से जाना जाता है ने शकों के खिलाफ मोर्चा खोला। यु्द्ध में राजा विक्रमादित्य की जीत हुई। इस समय काल के दौरान भारत में शक सवंत का चलन हो गया था। मगर राजा विक्रमादित्य ने इस विजय के उपरान्त शक सवंत कैलेंडर की जगह विक्रम सवंत का निर्माण करवाया जो कि आज भी चलन में है।

इस विजय के बाद राजा विक्रमादित्य ने शकाारि की उपाधि धारण की थी जिसका अर्थ है शकों का नाश करने वाला।

2.सातवाहन वंश दक्कन 

शकों की क्षहरात शाखा का सबसे शक्तिशाली राजा नहपान था जिसने गुजरात मालवा और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों पर कब्जा कर लिया था। उनका मुकाबला दक्षिण के शक्तिशाली सातवाहन राजाओं से हुआ।
1.गोतमीपुत्र शातकर्णाी 
यह सातवाहन वंश के सबसे महान राजा थे जिन्होंने 106 से 130 ईस्वी तक शासन किया था। इन्होंने शक राजा नहपान पर हमला किया और उसे युद्ध में हराकर मार डाला। इस जीत का प्रमाण नासिक के गुफा अभिलेखों और जोगलम्बी से मिले सिक्कों से मिलता है, जिन पर शातकर्णी ने नहपान के सिक्कों को दोबारा अपने नाम से ढलवाया था।

2.वशिष्ठीपुत्र पुलुमावी 
नहपान की हार के बाद शकों की दूसरी शाखा कार्दमक वंश के राजा रुद्रदामन प्रथम ने खोए हुए क्षेत्रों को वापस पाने के लिए सातबाहनों पर हमला किया। रुद्रदामन ने गौतमीपुत्र के पुत्र वशिष्ठी पुलुमावी के युद्ध में दो बार पराजित किया। हलांकि वैवाहिक संबंधों को कारण सातवाहन वंश के शासकों के नष्ट नही किया दरअसल रुद्रदामन ने अपनी बेटी का विवाह सातवाहन के राजा से किया था जिसके कारण यह युद्ध रिश्तेदारी में बदल गया।

4.गुप्त राजवंश 
इनका शासन काल 4वां शताब्दी से 5वीं शताब्दी तक का था। इधर शकों का शासन काल भारत में लगभग 400 वर्षों तक खिचता रहा। इनका अंत गुप्त साम्राज्य के राजाओं द्वारा किया गया।
1.समुद्र गुप्त 
इनका शासन काल 335 से 375 ईस्वी. तक का था गुप्त वंश के इस महान विजेता ने अपनी दिग्विजय नीति के तहत पश्चिमी भारत के शक शासकों को अपनी अधीनता स्वीकार करने और टैक्स देने प मजबूर कर दिया।

5.चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य

इनाक शासम काल 375 से 415 ईस्वी तक का था। चंद्रगुप्त द्वितीय का तथा शकों का यह युद्ध इतिहास का सबसो निर्णाय युद्ध था। पश्चिमी भारत यानि गुजरात तथा काठियावाड़ में अभी भी शकों के शासन बचा हुआ था जहां का अंतिम राजा रुद्रसिंह तृतीय था। चंद्रगुप्त द्वितीय ने एक विशाल सैन्य अभियान चलाकर रुद्रसिंह तृतीय को जुद्ध में मार गिराया और शकों के अंतिम साम्राज्य को हमेशा के लिए गुप्त साम्राज्य में मिला लिया। इस महाविजय के बाद ही चंद्रगुप्त द्वितीय ने भी विक्रमादित्य और शकारि की उपाधि धारण की।

इस प्राकर मालवा के स्थानीय राजाओं से शुरु हुआ यह संघर्ष सातवाहनों के शौर्य से गुजरते हुए अंततः गुप्त राजवंश के हाथों शकों के पूर्ण विनाश के साथ समाप्त हुआ।

बुधवार, 17 जून 2026

यूनान का आक्रमण

bharat par unani aakraman

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम Battle of hydespes के बारे में चर्चा करेंगे। यह यूनान का पहला तथा भारत पर हुआ दूसरा विदेशी आक्रमण था। इसके साथ ही हम युद्ध के परिणाम और कारणों पर विस्तार से चर्चा करेंगे। इसके साथ ही हम युद्ध के मुख्य कारक यानी के सिकंदर के जीवन पर भी प्रकाश डालेंगे। जो कि भारत को हराने के बाद पुरी दुनिया पर अपना परचम लहराना चाहता था। लेकिन ऐसा क्या हुआ कि भारत के जीतने का बाद भी वे अपने देश वापिस लौट गया। सभी कारणों को समझेंगे विस्तार से।

Battle of Hydespes

भारत पर यूनानी आक्रमण मकदूनिया के राजा सिकंदर महान द्वारा जिसे हम अलेग्जेंडर द ग्रेट के नाम से भी जानते है के द्वारा 326 ईसा पूर्व में किया गया। भारत से पहले सिकंदर ने ईरान के हखनमी वंश का अंत किया था। इसके बाद उसने भारत के उत्तर पश्चिम हिस्से की ओर अपने विजय संकल्प का प्रारम्भ किया।

Hydespes
यह भारत की प्राचीन एवं प्रसिद्ध झेलम नदी का ईरानी नाम है। दरअसल यह युद्ध इसी नदी के किनारे हुआ था जिसके कारण इस युद्ध को Hydespes का युद्ध य Battle of Hydespes भी कहा जाता है।

प्रारम्भ में भारत में सिकंदर का पहले सामना पंजाब के राजा पुरु जिन्हें हम पोरस के नाम से भी जानते है उससे हुआ। राजा पोरस इस युद्ध में बड़ी बहादुरी से लडे़ लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा। सिकंदर पोरस की वीरता से बहुत प्रभावित हुआ जिसके परिणामस्वरूप सिकंदर ने पोरस को उसका राज्य लौटा दिया और उसे अपना सहयोगी बना लिया।

सिकंदर की वापसी का कारण

पोरस से युद्ध के बाद सिकंदर का सामना मगध के शक्तिशाली राजा घनानंद से हुआ। घनानंद नंद राजवंश का एक प्रतापी राजा था। घनानंद की विशाल सेना और हाथियों के डर से सिकंदर के सैनिकों ने व्यास नदी को पार करने से इनकार कर दिया। जिस कारण को सिकंदर को वापिस लौटना पड़ा।

आक्रमण का प्रभाव

1.इस आक्रमण के चलते भारत में गंधार कला शैली का निर्माण हुआ और भारत तथा यूनान के बीच सिधा संपर्क स्थापित हुआ। गंधार कला भारतीय और यूनान की मूर्ति कला का अनूठा मिश्रण है।

2.भारत में पहली बार सूडौल सांचे से ढले सिक्कों का निर्माण हुआ। राजाओं के चित्र वाले सिक्के बनाने की तकनीक यूनानियों द्वार ही भारत लायी गयी।

3.सिकंदर के आक्रमण ने छोटे राज्यों की शक्ति को कुचल दिया। इससे मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चंद्र गुप्त मौर्य और उनके गुरु चाणाक्य को विशाल और एकीकृत भारतीय साम्राज्य स्थापित करने में मदद मिली।

4.सिकंदर के भारत आने तथा हमलों के चलते सिकंदर के सिपाहियों पश्चिम की और जाने वाले चार नए थल और जल मार्गों की खोज की। इससे भारत का व्यापार और पश्चिम एशिया के देशों के साथ सीधे तौर पर बहुत बढ़ गया।

5.भारतीय राजाओं के समझ में आयी कि युद्ध में भारी भरकम हाथियों पर पूरी तरह से निर्भर रहना नुकसान देह हो सकता है। क्योंकि यूनानी सेना के तेज़ रफ्तार घूड़सवार सेना एवं तीरंदाजों ने हाथियों को अपनी ही सेना में लौटने के लिए मजबूर कर दिया। अतः सिकंदर के युद्ध के बाद भारतीय राजाओं अपनी युद्ध कला में परिवर्तन किया।

शुक्रवार, 29 मई 2026

कुल धारा

kuldhara village

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम कुल धारा जिसे एक शापित गांव भी कहते है इसके पीछे की कहानी को जानेंगे इसके साथ ही इतिहास में इस स्थान पर घटी उस घटना पर प्रकाश डालेंगे जिसके कारण 84 हजार ग्राम वासियों को इस गांव को छोड़ना पड़ा। तथा इस राज़ से भी पर्दा उठायेंगे की यह कोई शापित गांव नहीं था। लेकिन लोगों का रहस्यमय तरीके से गायब होना वर्तमान समय में लोगों को जरूर सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर उस गांव में क्या हुआ था। वर्तमान समय में यह गांव पुरातत्व विभाग के अधीन है जहां सूरज ढलने के बाद रुकने पर सख्त मनाही है। तो आइये तथ्यों के आधार पर इस गांव के उत्थान विनाश और आधुनिक वैज्ञानिक खोजो को समझते है। 

इतिहास

13वीं सदी के समय काल में  राजस्थान के जोधपुर की पाली रियासत के राजा के अत्याचारों और भारी कर से तंग आकर ये लोग जैसलमेर रियासत में आ कर बसना इनकी मजबूरी थी। किताब  तवारीख-ए-जैसलमेर के अनुसार कधान नाम  के इस पालीवाल ब्राह्मण ने कुल धारा की नींव रखी तथा इसका निर्माण किया था । पुरा तात्विक साक्ष्यों में मिले शिलालेखों से यह पता चला है कि यह गांव 800 साल पुराना है। ये पालीवाल ब्राह्माण महान वैज्ञानिक और बेहतरीन सिविल इंजीनियर थे। जिसका प्रमाण हमें जल जमा करने की खादीन प्रणाली से मिलता है। यह तकनीक राजस्थान जैसे इलाके जहां 50 डिग्री से भी अधिक तापमान चला जाता है और बारिश भी कम होती है जगह पर किसी खजाने से कम नहीं थी।

खादीन तकनीक

वे पथरीली ढलान वाले इलाके के नीचे मिट्टी का मजबूत बांध बनाते थे, जिससे बारिश का पानी खेतों में जमा हो जाता था। यह पानी जमीन के नीचे रिसकर कूओं को रिचार्ज करता था। इस रिसाव प्रक्रिया से गुजरने के कारण पानी में से नमक निकल जाता था और पानी खेती और पिने योग्य हो जाता था। जिस कारण से यहां गेहूं और चने की बंपर पैदावार होती थी।

वास्तुकला का अच्छा ज्ञान

कुलाधारा वासियों को वास्तुशास्त्र का अच्छा ज्ञान था जिसके कारण इनके गांव आधुनिक तरीकों से प्लांड सिटी की तरह ग्रिड पैटर्न पर बसा हुआ था। गांव के घर 50 डिग्री की गर्मी में भी प्राकृतिक रुप से ठंडे रहते थे। इसके लिए वे मिट्टी की 1.5 फिट की दीवारें बनाते थे तथा घरों में वेंटिलेशन के लिए आंगन में पत्थरों की खूबसूरत नक्काशीदार जालियां बनाते थे जो हवा को तेजी से ठंडा करती थीं।

पलायान का मुख्य कारण

19 सदी में जैसलमेर में महाराजा मूलराज द्वितीय का शासन था जो कि एक प्रभावशाली राजा नहीं थे उनकी अपेक्षा उनका दीवान ही शासन चलाता था जो कि एक क्रूर दीवान था। दीवान सालिम सिंह मेहता बहुत की अय्याश किस्म का व्यक्ति था। एक दिन उसकी नजर कुलधारा के मुखिया की खूबसूरत बेटी पर पड़ी। उसने जबरन कुलधारा के मुखिया को उसकी बेटी से शादी करने का पैगाम भेज दिया और इनकार करने पर पूरे गांव को प्रताडि़त करने की धमकी दी। अपनी बेटी के सम्मान और समुदाय के सम्मान की रक्षा के लिए रात में गांव में एक गुप्त पंचायत बुलाई गयी जिसमें कुलधारा के 84 गांव के मुखिया शामिल हुए । उन्होंने गुलामी स्वीकार करने की बजाय अपनी 500 साल पुरानी पुरखों की जमीन को हमेशा के लिए छोड़ने का फैसला लिया और एक ही रात में पूरा इलाका वीराने में बदल गया।

कहानी का दुसरा पहलू

बताया जाता है की सालिम सिंह के पिता स्वरुप सिंह जो की पहले के दीवान थे ने जब पालीवालों पर जबरन टैक्स लगाना चाहा , तो दरबार में हुए विवाद के कारण राजकुमार राय सिंह ने स्वरुप सिंह की हत्या कर दी थी। उस समय सालिम सिंह सिर्फ 11 वर्ष का था। बड़े होकर जब सालिम सिंह दीवान बना तो पालीवालों पर अत्याचार करना सिर्फ उसका लालच नहीं बल्कि दशकों पुराना उसका प्रतिशोध था। खास बात यह है कि यह की यह वृतांत कर्नल जेम्स टाड की किताब Annals and Antiquites of Rajasthan में भी दर्ज है की सालिम सिंह ने कुलधारा वासीयों पर  भारी टैक्स लाद दिए थे जिससे वे पहले ही परेशान थे। बेटी का विवाद इस उत्पीड़न की आखिरी कड़ी थी।

श्राप के पीछे का कारण य कूटनीति

पालीवाल ब्राह्माण अत्यधिक बुद्धिमान थे वे जानते थे कि सालिम सिंह उनकी उपजाऊ भूमि आलीशान गांव पर कब्जा करना चाहता है। चूंकि वे सेना से लड़ नहीं सकते थे इसलिए उन्होंने श्राप की अपवाह को एक सामाजिक आर्थिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया। उस समय काल के लोग कुछ ज्यादा ही अंध विश्वासी थे जिसके कारण कुलधारा की जमीन को शापित घोषित करने में उन्हें कोई समस्या नहीं हुई। परिणामस्वरूप कोई भी किसान इन ज़मीनों पर दुबारा बसने नहीं आया। अंत में सालिम सिंह के हाथ सिर्फ खण्डहर लगे।

आधुनिक रिसर्च के प्रमाण

ऐतिहासिक जनसंख्या आंकड़ों के अनुसार 18 वीं सदी में यहाँ की आबादी करीब 800 थी जो कि 1890 तक धीरे-धीरे घटकर 37 रह गई । यह प्रमाण बताता है कि पलायन एक रात में नहीं बल्कि कई दशकों में हुआ था। पलायन का मुख्य कारण काकनी नदी का सुखना था क्योंकि कुल धारा इसी नदी के तट पर बसा हुआ था जिसके कारण यहीं उनके जीवन यापन का मुख्य स्रोत थी।

2017 की भूकंप थ्योरी

2017 में जर्नल वैज्ञानिक और उनकी टीम का एक रिसर्च पेपर प्रकाशित हुआ। इस पेपर ने उनकी टीम ने खुलासा किया की कुल धारा और खाबा गांव के घरों की छतें, बीम और खंभे एक ही दिशा में गिरे हुए हैं , की एक विनाशकारी भूकंप का स्पष्ट प्रमाण है। संभव है कि अकाल और टैक्स से परेशान लोगों के घर जब भूकंप में ढह गए , तो बची आबादी ने उसी रात हमेशा के लिए इस जगह को छोड़ दिया।2018 में आई आई टी बाम्बे और कई शीर्ष विश्वविद्यालयों के वैज्ञानिकों ने रेडियो कार्बन डेटिंग और आधुनिक तकनीकों के जरिए इस गांव के मिट्टी के बर्तनों, अनाज और जली लकड़ियों के नमूनों की जांच शुरु की , ताकि तथ्यों को कहानियों से अलग किया जा सके।

डार्क टुरिज्म और भुतिया दांवों का सच

आज कूलधरा भारत के सबसे बड़े डार्क टूरिज्म स्थलों में से एक है। लोग यहां इतिहास से ज्यादा भूतों की कहानियों और पैरानार्मल गतिविधियों जैसे परछाई दिखना, कदमों की आवाजें, अचानक तापमान गिरना का अनुभव करने आते है। लेकिन मनोवैज्ञानिक सच की बात करें तो वैज्ञानिक और शोधकर्ताओं के अनुसार जब आप किसी वीरान सुनसान जगह पर यह सोचकर जाते है कि वह भुतिया है तो आपका दिमाग हवा की सरसराहट या किसी जानवर की परछाई को भी डरावना रुप दे देता है।

हमारे विचार से भी कुल धारा गांव सच में श्रापित  है किसी प्रेत आत्मा से नहीं बल्कि शापित था दीवान सालिम सिंह की क्रूरता से, प्राकृती के सुखे मिजाज से और एक विनाशकारी भूकंप से। आज यह गांव उस भूतिया टैग से शापित जो कि इसके निवासियों के महान विज्ञान अद्भुत जल इंजीनियरिंग, और आत्मसम्मान के लिए सब कुछ न्योछावर करने देने वाले गौरवशाली इतिहास को दबा रहा है। 

मंगलवार, 26 मई 2026

अष्टांग हृदय

ashtanga hridaya

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम आयुर्वेद विज्ञान के सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ अष्टांग ह्रदय के बारे में चर्चा करने जा रहे है आयुर्वेद विज्ञान के इस ग्रंथ के साथ ही हम अन्य महत्वपूर्ण ग्रंथों के बारे में भी जानेंगे। इसके साथ ही हम जानेंगे इस ग्रंथ का इतिहास तथा इसे किन ग्रंथों की छाया प्रति के रुप में सरलीकरण करके प्रस्तुत किया गया है। 

दोस्तों यह विषय इसलिए भी महत्वपूर्ण क्योंकि हाल ही में हमने और आपने कफ़ सिरप कांड के बारे से सुना होगा जिसमें लगभग 150 से अधिक नवजात बच्चों कि जाने चली गयीं। हमारे कहने का मतलब यह है कि हम एक ऐसे देश में रहते है जहां मौतें होने के बाद पता चलता है कि हमें यह दवा नहीं खानी है। सोच कर देखें तो जिन छोटे बच्चों को हम जान से भी ज्यादा ख्याल करते है उनकी जान एक दवा खाने से जा रही है और ऐसा भारत जैसे देश में ही नहीं अमेरिका जैसे विकसित देशों में भी हो रहा कोविड 19 की दवा के दौरान भी ऐसा हो चुका है कम्पनी पर अमेरिकन कोर्ट द्वारा भारी जुर्माना भी लगाया गया था।

मगर सोचकर देखीए इन दवाओं से जिन लोगों की जानें गयी क्या वो लोट कर सकते है नहीं तो ऐसे में हमें खुद से अपने और अपने चाहने वालों ख्याल रखना होगा सरकार के भरोसे पड़े रहने से कुछ नहीं होने वाला। हम सलाह देते है आयुर्वेद को अपनाईये हम ऐसा नहीं कहते है आयुर्वेद के नुकसान नहीं है मगर इसका शरीर पर धीरे धीरे असर पड़ता है जिसके कारण जान का खतरा कम रहता है समय से इलाज हो सकता है। रासायनिक सब्जीयों का इस्तेमाल कम करें तथा आर्गेनिक फलों तथा सब्जियों को खाना प्रारम्भ करें और स्वास्थ्य रहें।

इतिहास

यह ग्रंथ आयुर्वेद विज्ञान का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और कालजयी ग्रंथ है । इसकी रचना महर्षि वाग्भट्ठ द्वारा छठवीं तथा सातवीं शताब्दी के मध्य कालीन समय में की गई थी। आयुर्वेद के इतिहास में इसे वृहतत्रयी यानी तीन महान ग्रंथ सुश्रुत संहिता चरक संहिता तथा एक अज्ञात तीसरे ग्रंथ को समा योजित कर एक मुख्य ग्रंथ का रुप दिया गया है । जिसके कारण इस ग्रंथ को वृहतत्रयी भी कहा जाता है। आयुर्वेद के इतिहास में अष्टांग हृदय का आना एक क्रांतिकारी मोड़ था। सबसे पहले इसे आयुर्वेद के दो मुख्य रुपों में बांटा गया। प्रथम आत्रेय सम्प्रदाय तथा धन्वन्तरि सम्प्रदाय।

आत्रेय सम्प्रदाय
यह काया चिकित्सा विज्ञान पर आधारित है जिसे हम जनरल मेडीसिन के नाम से भी जानते है। इसे चिकित्सा के प्रमुख ग्रंथ चरक संहिता से लिया गया है।

धन्वन्तरि सम्प्रदाय
यह शल्य तन्त्र  पर आधारित है जिसे हम सर्जरी पर आधारित भी मानते है इसे सुश्रुत संहिता से लिया गया है।

यह दोनों ग्रंथ बहुत विशाल थे जिसके कारण आम चिकित्सकों के लिए दोनों का संपूर्ण अध्ययन करना और इन्हें याद रखना काफी कठिन था। ऋषि वाग्भट ने इस समस्या को समझते हुए चरक संहिता की चिकित्सा और सुश्रुत संहिता की शल्यक्रिया के सर्वोत्तम ज्ञान को समेटकर , इसे सरल और काव्यात्मक रुप में पिरोया। उन्होंने आयुर्वेद के आठ अंगों का सार निकालकर इस ग्रंथ की रचना की जिसके कारण इसका नाम आष्टांग हृदय पड़ा।


एक महत्वपूर्ण ग्रंथ क्यों है

इस ग्रंथ में आयुर्वेद के सभी आठ विभागों का ज्ञान एक ही जगह मिल जाता है जिन्हें हम क्रमबद्ध तरीके से नीचे प्रस्तुत कर रहे है
1.काय चिकित्सा जिसे हम जनरल मेडिसिन के नाम भी जानते है
2.बाल चिकित्सा जिसे हम कौमारभृत्य या paediatrics के नाम से भी जानते है।
3.ग्रह चिकित्सा इसे हम भूत विद्या यानी psychiatry or Spiritual healing के नाम से भी जानते है ।
4.ऊध्वाग चिकित्सा यानी शालाक्य तन्त्र य ENT and Ophthalmology को नाम से भी जानते है।
5.दृंष्ट्राचिकित्सा य अगदतन्त्र अथवा Toxicology के नाम से भी जानते है।
6.जरा चिकित्सा य रसायन या Geriatics Rejuvenation के नाम से भी जानते है।
7.वृष्यचिकित्सा य वाजीकरण Aphrodisiac therapy नाम से भी जानते है।
8.शल्य चिकित्सा जिसे हम surgery के रुप में भी जानते हैं।


ग्रंथ की संरचना

इस ग्रंथ में कुल 6 भाग तथा 120 अध्याय है इसमें आयुर्वेद के मूल सिद्धांतों दिनचर्या ऋतुचर्या आहार विहार और रोगों के कारण बताए गए है।
1.सूत्र स्थान 
इसके अन्तर गत सिद्धांत दिनचर्या ऋतुचर्या आहार विहार और रोगों के बारे में अध्याय 30  में बताया गया है।
2.सूत्र स्थान
अध्याय 6 के अन्तर गत मानव शरीर की रचना ,गर्भधारण और भ्रूण के विकास के बारे में जानकारी दी गई है।
3.निदान स्थान
अध्याय 16 को अंतर्गत रोगों के लक्षण उनके कारण और बीमारियों की पहचान के तरीके बताए गए हैं।
4. चिकित्सा स्थान
अध्याय 22 के अंतर्गत विभिन्न बीमारियों के नुस्खे दिए गए हैं।
5.कल्प सिद्धि स्थान
अध्याय 66 के अंतर्गत पंचकर्म वमन विरेचन और औषधियों कको बनाने की विधि बताई गई है।
6.अत्तर स्थान
इसमें बाल रोग, आंख कान नाक के रोग मानसिक रोग और विष विज्ञान के बारे में तथा इनकी शाखाओं का विस्तृत वर्णन किया गया है।

ग्रंथ की भाषा सरल और काव्यात्मक होना

चरक और सुश्रुत संहिता गद्य prose यानी जटिल भाषा में थी लेकिन वाग्भट ने अष्टांग हृदयम् के श्लोकों में लिखा। अतः छंद में होने के कारण इसके सिद्धांतों और जड़ी-बूटियों के फार्मूला को याद रखना चिकित्सकों के लिए बेहद आसान हो गया।

सूत्र स्थान

शुरुआती अध्याय में आयुर्वेद जगत में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इसमें दिनचर्या यानी डेली रुटीन ऋतुचर्या यानी सिज़नल रुटीन  आहार विहार और रोगों के मूल कारणों को इतनी सटीकता से समझाया गया है कि यदि कोई सामान्य व्यक्ति भी इसका पालन करे तो वे जल्दी बीमार न पड़े।
व्यावहारिक और संक्षिप्त
वाग्भट जी वे पुराने ग्रंथों की अति विस्तृत और दार्शनिक बातों को हटाकर सीधे उपचार और चिकित्सा पर ध्यान केंद्रित किया है इस ग्रंथ में । इस ग्रंथ में दी गई दवाओं योग आज भी सबसे ज्यादा प्रभावी और आसानी से तैयार होने वाले माने जाते है।

वैश्विक स्वीकारता

अष्टांग हृदयम् का महत्व केवल भारत तक सीमित नहीं रहा है इसका प्राचीन काल में ही अनुवाद तिब्बती अरबी फारसी और जर्मन जैसी भाषाओं में हो चुका है। तिब्बती चिकित्सा पद्धति पर तो इस ग्रंथ का बहुत गहरा असर है।

मंगलवार, 19 मई 2026

भोज शाला

bhojshala
प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम मध्य प्रदेश धार ज़िले में विद्दमान भोजशाला के बारे में बात करेंगे। इसके साथ ही राजा भोज तथा मंदिर के निर्माण के पीछे के रहस्य तथा वर्तमान समय में यह चर्चा का विषय क्यों बना हुआ है इस विषय पर बात करेंगे। हाल ही में समय में इंदौर हाई कोर्ट ने इस भोज शाला पर एक ऐतिहासिक फैसला दिया है इस फैसले के वर्तमान परिणामों के बारे में चर्चा करेंगे। यह विषय इस लिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह ए एस आई यानी आरकोलोजिकल सर्वे आप इण्डिया द्वारा संरक्षित किया गया है इसके साथ ही यह ऐतिहासिक पुरातत्व स्थल भी है।

भोज शाला

हिंदू समुदाय के लोगों का मानना था कि इस भोज शाला को परमार वंश के राजा भोज ने 11वीं शताब्दी में बनवाया था जिसे शारदा सदन के नाम से भी जाना जाता है। राजा भोज के समय काल में इस भोज शाला में संस्कृत भाषा का पठन पाठन किया जाता है इसे संस्कृत विश्वविद्यालय माना गया था। इसी भोज शाला में वाग्देवी का एक मंदिर भी था जिन्हें हम मां सरस्वती के नाम से भी जानते है। अतः इस मंदिर के कारण ही इस परिसर के शारदा सदन भी कहा जाता था। 

कालांतर में मुस्लिम शासक महमुद शाह खिलजी ने 1457 में शारदा सदन के तुड़वाकर वहां  मस्जिद का निर्माण करा दिया गया। समय अन्तराल के बाद इस मस्जिद में मौलाना कमालुद्दीन नामक मुस्लिम व्यक्ति आ कर रहने लग गये । जब कमालुद्दीन का निधन हो गया तब मुस्लिम मान्यताओं के अनुसार इस परिसर को मौलाना कमालुद्दीन की मस्जिद एवं उसके परिसर के नाम से जाना जाने लगा था। जिसके कारण यह विवाद कई वर्षों से उच्च न्यायालय में विचाराधीन था। उपरोक्त कारणों से यह हिन्दू- मुस्लिम विवाद का मुख्य कारण बना हुआ था।

हाई कोर्ट का फैसला

15 मई 2026 को यह ऐतिहासिक फैसला मध्य प्रदेश के उच्च न्यायालय की इंदौर खण्ड पीठ द्वारा सुनाया गया जिसमें न्यायालय ने कहा की यह वास्तव में राजा भोज द्वारा निर्मित भोज शाला ही है न की कोई मस्जिद। इस फैसले को सुनाने से पहले हाई कोर्ट की बैंच ने ए एस आई द्वारा क्षेत्र विशेष पर किए गए अध्ययन कि रिपोर्ट सौंपी थी जिसमें प्राचीन मंदिर के होने के साक्ष्य मिले थे। अतः कोर्ट का फैसला हिन्दू समाज के पक्ष में आया। अब वे इस परिसर में बिना रोक टोक के पुजा अर्चना कर सकते है। वर्तमान समय में देखा जाये तो ऐसे बहुत से स्थल विवाद पूर्ण हैं जिनमें से बहुत से स्थलों पर मुकदमा कोर्ट में विचाराधीन है।

सोर्स

15 मई 2026 को टाईम्स आफ इण्डिया ने इस फैसले का प्रकाशन अपनी रिपोर्ट में शीर्षक Bhojhsala complex is temple of goddess vag devi, Hindus have right to woship Madhya Pradesh high court के साथ प्रकाशित किया। इसके साथ ही इसका विडियों संस्करण जिसे 18 मई 2026 को प्रकाशित किया जिसमें परिसर में मां सरस्वती की नवीनतम मूर्ति स्थापना तथा पुजा अर्चना करते हुए दिखाया गया है।

17 मई 2026 को द हिन्दू पत्रिका ने भी शीर्षक Madhya Pradesh bhojshala case and the crack in the places of worship Act के नाम से प्रकाशित किया गया है। 
 

मंगलवार, 12 मई 2026

कुतुबमीनार

 
qutb minar
प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम कुतुबमीनार के इतिहास के बारे में चर्चा करेंगे यह विषय इस लिए भी महत्वपूर्ण क्योंकि आज तक हम यही जानते थे कि कुतुबमीनार का निर्माण कुतुबूद्दीन ऐबक ने कराया था मगर यह पूर्ण सच नहीं है क्योंकि इस मुस्लिम शासक ने सिर्फ इसकी मरम्मत करवाई थी। आज के इस लेख में हम कुतुबमीनार के इतिहास , विक्रमादित्य से इसके सम्बन्ध तथा इसके वास्तविक नाम के बारे में चर्चा करेंगे इसके साथ हम इसको बनाने के पीछे छुपे उद्देश्य को समझने की कोशिश करेंगे।

फिरोजशाह तुगलक

अपने प्रारम्भिक समय में कुतुबमीनार एक  चार मंज़िला इमारत थी जिसकी चौथी मंज़िल पर मंदिर का निर्माण कराया गया था अतः एक कट्टर मुस्लिम होने के नाते फिरोजशाह तुगलक ने इसकी चौथी मंज़िल को तुड़वा कर पुनः इसका निर्माण करवाया इनके साथ ही इसने पांचवीं मंज़िल का भी निर्माण करवा दिया। बताते चले कि फिरोजशाह तुगलक ने दिल्ली पर 1325 से लेकर 1351 तक शासन किया। इनके शासन काल के पहले दिल्ली पर इनरे चचेरे भाई मुहम्मद बिन तुगलक का शासन था। यह दिल्ली सल्तनत के तीसरे वंश से सम्बन्धित था। बताते चले कि दिल्ली सल्तनत पर पांच वंशों ने शासन किया जिनके नाम और समय कुछ इस प्रकार है। गुलाम वंश शासन काल 1206 से 1320 ई. तक 2 खिलजी वंश शासन काल 1290 से 1320 ई. तक 3 तुगलक वंश शासन काल 1320 से 1414 तक 4 सैयद वंश शासन काल 1414 से 1451 तक 5लोदी वंश शासन काल 1451 से 1526 तक। बताते चले दिल्ली पर सबसे लंबा शासन काल तुगलक वंश का ही रहा।
 

चन्द्रगुप्त द्वितीय

इनका शासन काल 380 ई से 415 ई तक का माना जाता है । इनके राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र थी मगर उज्जैन भी इनका मुख्य केन्द्र था। कुतुबमीनार की बात करें तो इसे चन्द्रगुप्त द्वतीय ने अपने दरबार के नौ रत्नों में से एक एवं महान खगोल शास्त्री वराह मीहिर के लिए बनवाया था। यह एक सुर्य वेधशाला थी। मगर चौथी मंज़िल पर विष्णु मंदिर होने के कारण कुछ विद्दवान इसे विष्णु स्तंभ भी कहते थे। 

प्रारम्भ में इस मिनार का प्रयोग खगोल विज्ञान के अध्ययन के लिए किया जाता था। इस बात का उल्लेख हमें हरिहार निवास द्विवेदी द्वारा रचित दो प्रसिद्ध पुस्तकों में मिलता है जिनका नाम दिल्ली के तोमर तथा ग्वालियर के तोमर है। बताते चले कि भारत में प्रचलित विक्रम संवत का निर्माण में भी इन्हीं के शासन काल में हुआ था।

तरीखे फिरोज़ शाही

इस किताब के लेखक का नाम सिराज अफिन है जो कि फिरोज़शाह तुगलक के राज दरबार का एक विद्वान था इसने अपनी किताब में लिखा की कुतुबमिनार की चौथी मंज़िल पर बिजली गिर जाने के कारण यह नष्ट हो गयी थी।
इबनेबतुता
यह एक विदेशी यात्री था जो कि मोहम्मद बीन तुगलक के शासन काल में भारत आया था। इसने अपनी किताब उलरहला में लिखा की कुतुबमीनार की चौथी मंज़िल पर सोने की घण्टीयां लगी हुई थी। जिसे ज़ाहिर है मुस्लिम शासन काल के दौरान इन्हें हटाया गया होगा।

कीर्ति स्तम्भ

यह स्तम्भ चितौड़ के दुर्ग के अन्दर राणा कुम्भा द्वारा निर्मित करवाया गया था। अगर आप वर्तमान समय में कुतुवमीनार के वास्तविक एवं प्राचीन रुप रेखा को देखना चाहते है तो यह स्तम्भ उसकी छाया प्रति है साथ में चौथी मंदिर पर विष्णु मंदिर का निर्माण हूबहू कुतुबमीनार के समान ही कराया गया था। 
लेख से सम्बन्धित कोई उल्लेख यदि आपको कहीं मिलता है तो ज़रुर साझा करें।
सोर्स विकीपिडीया,टेस्टबुक,क्योरा,दृष्टि आई ए एस,ईआर रिब्लिकेशन 

शनिवार, 4 अप्रैल 2026

हीनयान और महायान

hinayana and mahayana
 

 प्रस्तावना

बौद्ध धर्म विश्व के प्रमुख धर्मों में से एक है, जिसकी स्थापना गौतम बुद्ध ने 6वीं शताब्दी ईसा पूर्व में की थी उनके उपदेशों ने मानव जीवन के दुखों से मुक्ति पाने का मार्ग दिखाया समय के साथ बौद्ध धर्म में विभिन्न विचारधाराओं और परंपराओं का विकास हुआ, जिनमें से हीनयान Theravada और महायान Mahayana दो प्रमुख शाखाएँ हैं इन दोनों धाराओं में बुद्ध के उपदेशों की व्याख्या, साधना पद्धति और लक्ष्य में कुछ महत्वपूर्ण अंतर देखने को मिलते हैं इस लेख में हम इन दोनों धाराओं का विस्तृत अध्ययन करेंगे।

हीनयान Theravada क्या है

हीनयान का अर्थ होता है "छोटा वाहन" या "संकीर्ण मार्ग" हालांकि यह नाम महायान अनुयायियों द्वारा दिया गया था, इसलिए इसे कुछ हद तक आलोचनात्मक भी माना जाता है हीनयान को आज अधिकतर थेरवाद बौद्ध धर्म के नाम से जाना जाता हैयह बौद्ध धर्म की सबसे प्राचीन शाखा मानी जाती है, जो बुद्ध के मूल उपदेशों के अधिक निकट मानी जाती है यह परंपरा मुख्य रूप से श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड, लाओस और कंबोडिया में प्रचलित है।


 हीनयान की मुख्य विशेषताएँ


1. व्यक्तिगत मोक्ष पर जोर
   हीनयान परंपरा में व्यक्ति अपने प्रयासों से निर्वाण प्राप्त करता है इसमें आत्मसाधना और अनुशासन को अत्यधिक महत्व दिया जाता है।

2. अर्हत आदर्श
   इस परंपरा का मुख्य लक्ष्य अर्हत बनना है, यानी ऐसा व्यक्ति जिसने सभी इच्छाओं और बंधनों से मुक्ति पा ली हो।

3. पालि भाषा का उपयोग
   हीनयान के ग्रंथ पालि भाषा में लिखे गए हैं, जैसे त्रिपिटक।

4. संन्यास जीवन का महत्व
   इसमें भिक्षु जीवन को अत्यधिक महत्व दिया जाता है और आम जन की भूमिका अपेक्षाकृत सीमित होती है।

5. बुद्ध को मानव के रूप में देखना
   हीनयान में बुद्ध को एक महान शिक्षक और मानव के रूप में माना जाता है, न कि किसी देवता के रूप में।

महायान Mahayana क्या है

महायान का अर्थ होता है "महान वाहन" या "विस्तृत मार्ग" यह परंपरा हीनयान की तुलना में अधिक उदार और व्यापक मानी जाती है इसका विकास लगभग पहली शताब्दी ईस्वी में हुआ महायान परंपरा चीन, जापान, कोरिया, तिब्बत और वियतनाम में अधिक प्रचलित है।


 महायान की मुख्य विशेषताएँ


1. सर्वजन मोक्ष का सिद्धांत
   महायान में केवल व्यक्तिगत मोक्ष नहीं, बल्कि सभी प्राणियों की मुक्ति पर जोर दिया जाता है।

2. बोधिसत्त्व आदर्श
   महायान का मुख्य आदर्श बोधिसत्त्व है, जो स्वयं निर्वाण प्राप्त करने के बाद भी दूसरों की सहायता के लिए संसार में रहता है।

3. संस्कृत भाषा का प्रयोग
   महायान ग्रंथ मुख्यत  संस्कृत में लिखे गए हैं, जैसे प्रज्ञापारमिता सूत्र आदि।

4. भक्ति और पूजा का महत्व
   इसमें बुद्ध और बोधिसत्त्वों की पूजा, मूर्तिपूजा और भक्ति का महत्व बढ़ गया है।

5. बुद्ध को दिव्य रूप में देखना
   महायान में बुद्ध को एक दिव्य और अलौकिक शक्ति के रूप में भी माना जाता है।

हीनयान और महायान में अंतर


 आधार             हीनयान            महायान 
 अर्थ            छोटा वाहन            महान वाहन         
 उद्देश्य        व्यक्तिगत निर्वाण   सभी का उद्धार     
 आदर्श          अर्हत                  बोधिसत्त्व        
 भाषा             पालि                   संस्कृत           
 बुद्ध का
 स्वरूप         मानव शिक्षक       दिव्य रूप         
 पूजापद्धति   कम भक्ति           अधिक भक्ति        
 अनुयायी क्षेत्र  दक्षिणपूर्व एशिया  पूर्वी एशिया 

 ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

बौद्ध संगीति के दौरान बौद्ध धर्म में मतभेद उत्पन्न हुए विशेष रूप से चौथी बौद्ध संगीति के बाद बौद्ध धर्म दो प्रमुख धाराओं में विभाजित हो गया। हीनयान और महायान- महायान का उदय उन लोगों के बीच हुआ जो बौद्ध धर्म को अधिक सरल और जनसुलभ बनाना चाहते थे । उन्होंने पूजा, भक्ति और नए ग्रंथों को शामिल किया, जिससे आम जनता के लिए धर्म अधिक सुलभ हो गया।

दर्शन और सिद्धांत

हीनयान दर्शन
चार आर्य सत्य दुःख, दुःख का कारण, दुःख का निवारण, मार्ग अष्टांगिक मार्ग का पालन आत्मशुद्धि और ध्यान पर जोर।

महायान दर्शन
शून्यवाद सब कुछ शून्य है करुणा और दया का महत्व बोधिसत्त्व मार्ग समाज पर गहरा प्रभाव डाला।

हीनयान और महायान दोनों ने समाज पर गहरा प्रभाव डाला है।
हीनयान ने अनुशासन, सादगी और व्यक्तिगत साधना को बढ़ावा दिया।
महायान ने कला, मूर्तिकला और वास्तुकला को समृद्ध किया, जैसे बौद्ध स्तूप और मंदिर।
महायान के प्रभाव से बौद्ध धर्म अधिक लोकप्रिय हुआ और चीन तथा जापान में फैल गया।

वर्तमान स्थिति

आज के समय में- थेरवाद हीनयान श्रीलंका, थाईलैंड और म्यांमार में प्रमुख है महायान चीन, जापान और तिब्बत में प्रचलित है दोनों ही परंपराएँ आज भी बौद्ध धर्म के मूल सिद्धांतों-अहिंसा, करुणा और सत्य का पालन करते हैं।

निष्कर्ष

हीनयान और महायान, बौद्ध धर्म की दो महत्वपूर्ण शाखाएँ हैं, जो अलग-अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत करती हैं। जहां हीनयान व्यक्तिगत मोक्ष और अनुशासन पर जोर देता है, वहीं महायान सामूहिक कल्याण और करुणा को प्राथमिकता देता है दोनों ही धाराएँ अपनेअपने तरीके से मानव जीवन को बेहतर बनाने का मार्ग दिखाती हैं अंततः, इन दोनों परंपराओं का लक्ष्य एक ही है दुःखों से मुक्ति और शांति की प्राप्ति इनके बीच के अंतर केवल मार्ग और दृष्टिकोण के हैं, न कि अंतिम उद्देश्य के।

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2026

बौद्ध धर्म का पतन

baudh dharm ka patan

प्रस्तावना

भारत की प्राचीन धार्मिक परंपराओं में बौद्ध धर्म का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रहा है। बौद्ध धर्म की स्थापना गौतम बुद्ध ने 6वीं शताब्दी ईसा पूर्व में की थी। यह धर्म अहिंसा, करुणा,समानता और मध्यम मार्ग का संदेश देता है। मौर्य सम्राट अशोक के समय बौद्ध धर्म अपने चरम पर था और भारत से बाहर भी तेजी से फैल रहा था।

लेकिन समय के साथ भारत में बौद्ध धर्म का प्रभाव कम होता गया और अंततः यह लगभग लुप्त हो गया। आज यह प्रश्न महत्वपूर्ण है कि इतना महान और लोकप्रिय धर्म भारत में क्यों कमजोर पड़ गया। इस लेख में हम बौद्ध धर्म के पतन के कारण विस्तार से समझेंगे। 

लेख को प्रारम्भ करने से पहले हम अपने पाठकों को बताना चाहते है कि हम किसी भी धर्म का विरोध नही करते मगर हम इतना जरुर मान कर चलते है कि किसी धर्म में कोई खामी न हो यह विचार करने का विषय है क्योंकि प्रत्येक धर्म को किसी न किसी मनुष्य द्वारा ही बनाया गया है और मनुष्य गलतीयों को किये बिना कोई कार्य पूर्ण नही करता।
 
उदाहरण के लिए हम हिन्दू धर्म के देवता श्री राम जी को लेते है जिन्हे भगवान विष्णु का अवतार भी कहा जाता है। धर्म की मान्यता अनूसार कहा जाता है कि भगवान सब जानते है और हम सभी उस ईश्वर की संतान है और एक पिता अपनी संतान के साथ किसी भी तरह का भेद भाव नही कर सकता। लेकिन देखा जाये तो ये गलत है क्योंकि श्री राम ने यह भेदभाव किया है। उन्हें एक राजा के रुप में भी देखा जाये तब भी यह बात न्यायपुर्ण राजा के लिए उचित सिद्ध नही होती।

एक धोबी के कहने पर सीता जी को जंगल में भेजना किसी भी तरह से उचित न्याय नही हो सकता है। यह पुरे नारी समाज के लिए कंलक के समान था जीसकी भुक्त भोगी आज के समाज की स्त्रीयां भी हो रही हैं। हमारे विचार से किसी प्रति व्यक्ति द्वारा किये गये गलत क्रत्य के आधार पर पुरे समज को सजा देना किसी भी तरह से उचित न्याय नही है।

1.बौद्ध धर्म की आंतरिक कमजोरियाँ Internal Weaknesses

बौद्ध धर्म के पतन का सबसे बड़ा कारण इसकी अपनी आंतरिक समस्याएँ थीं।

1.संप्रदायों में विभाजन
समय के साथ बौद्ध धर्म दो प्रमुख शाखाओं में बंट गया। 1.हीनयान 2.महायान
इनके बीच विचारों का मतभेद बढ़ता गया। बाद में वज्रयान जैसे और संप्रदाय भी बने। इस विभाजन से धर्म की एकता कमजोर हो गई और आम जनता भ्रमित होने लगी।

2.अनुशासन में गिरावट
प्रारंभ में बौद्ध भिक्षु अत्यंत अनुशासित जीवन जीते थे, लेकिन बाद में मठों में विलासिता और भ्रष्टाचार बढ़ने लगा।इससे लोगों का विश्वास कम होने लगा।

ब्राह्मण धर्म का पुनरुत्थान

बौद्ध धर्म के पतन में ब्राह्मण धर्म हिंदू धर्म के पुनरुत्थान की भी बड़ी भूमिका रही।
1.भक्ति आंदोलन का प्रभाव- भक्ति आंदोलन के कारण लोगों को सरल पूजापद्धति और व्यक्तिगत ईश्वर की भक्ति का मार्ग मिला। इससे बौद्ध धर्म की तुलना में हिंदू धर्म अधिक आकर्षक लगने लगा।

2.बौद्ध विचारों का समावेश- हिंदू धर्म ने बौद्ध धर्म की कई शिक्षाओं को अपना लिया। यहाँ तक कि गौतम बुद्ध को विष्णु का अवतार माना जाने लगा। इससे बौद्ध धर्म की अलग पहचान कमजोर हो गई।

3.राजकीय संरक्षण का अभाव- बौद्ध धर्म के विकास में राजाओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा था।
1.अशोक के बाद बौद्ध धर्म को वैसा मजबूत संरक्षण नहीं मिला। अन्य राजाओं ने हिंदू धर्म को अधिक बढ़ावा दिया।
2.गुप्त काल में हिंदू धर्म का पुनरुत्थान हुआ और बौद्ध धर्म को कम समर्थन मिला। इससे इसका प्रभाव घटने लगा।

संस्कृत भाषा का प्रयोग

प्रारंभ में बौद्ध धर्म की शिक्षाएँ पाली भाषा में थीं,जो आम जनता के लिए सरल थी। लेकिन बाद में महायान संप्रदाय ने संस्कृत भाषा का उपयोग शुरू किया,जो कठिन थी और आम लोगों की समझ से बाहर थी। इससे बौद्ध धर्म जनसाधारण से दूर होता गया।

मठों की आर्थिक स्थिति

बौद्ध मठों की आर्थिक स्थिति भी पतन का एक बड़ा कारण बनी। मठों में धन और संपत्ति का संचय होने लगा, भिक्षु विलासिता में लिप्त हो गए। जनता से दूरी बढ़ने लगी इससे बौद्ध धर्म की सादगी और नैतिकता प्रभावित हुई।

विदेशी आक्रमण

विदेशी आक्रमणों ने बौद्ध धर्म को गहरा नुकसान पहुँचाया।
1.हूण आक्रमण-हूणों ने कई बौद्ध मठों और विश्वविद्यालयों को नष्ट कर दिया।
2.तुर्क और मुस्लिम आक्रमण-मध्यकाल में तुर्क आक्रमणकारियों ने बौद्ध संस्थानों को भारी क्षति पहुँचाई। विशेष रूप से नालंदा विश्वविद्यालय को नष्ट कर दिया गया, जो बौद्ध शिक्षा का प्रमुख केंद्र था। इससे बौद्ध धर्म की जड़ें कमजोर हो गईं।

बौद्ध धर्म का अत्यधिक दार्शनिक होना

समय के साथ बौद्ध धर्म अत्यधिक दार्शनिक और जटिल हो गया। आम जनता के लिए इसकी शिक्षाएँ कठिन हो गईं
साधारण लोग सरल धार्मिक मार्ग की ओर आकर्षित हुए इससे बौद्ध धर्म का जनाधार कम हो गया।

प्रतिस्पर्धा और अन्य धर्मों का प्रभाव

भारत में कई धर्मों और विचारधाराओं का विकास हुआ। हिंदू धर्म का पुनरुत्थान,जैन धर्म का प्रभाव बाद में इस्लाम का आगमन इन सभी ने बौद्ध धर्म को प्रतिस्पर्धा दी, जिससे इसका प्रभाव धीरे-धीरे कम होता गया।

सामाजिक कारण

1.जनता से दूरी-बौद्ध भिक्षु मठों में सीमित हो गए और आम जनता से उनका संपर्क कम हो गया।
2.जीवन शैली में बदलाव- समाज में बदलती जीवनशैली और आवश्यकताओं के कारण लोग नए धार्मिक मार्गों की ओर आकर्षित हुए।

नेतृत्व की कमी

समय के साथ बौद्ध धर्म में प्रभावशाली नेताओं की कमी हो गई। प्रारंभ में बुद्ध जैसे महान नेता थे बाद में वैसा नेतृत्व नहीं मिल पाया। इससे बौद्ध धर्म का प्रभाव कमजोर पड़ गया।

निष्कर्ष

बौद्ध धर्म का पतन एक जटिल प्रक्रिया थी, जिसमें कई आंतरिक और बाहरी कारण शामिल थे। संप्रदायों में विभाजन, अनुशासन में गिरावट, ब्राह्मण धर्म का पुनरुत्थान, राजकीय संरक्षण की कमी, विदेशी आक्रमण और सामाजिक बदलाव इन सभी ने मिलकर बौद्ध धर्म को कमजोर कर दिया।

हालांकि भारत में इसका पतन हुआ, लेकिन बौद्ध धर्म आज भी चीन, जापान, श्रीलंका और थाईलैंड जैसे देशों में अत्यंत प्रभावशाली है।अंततः, बौद्ध धर्म का इतिहास हमें यह सिखाता है कि किसी भी धर्म या विचारधारा की स्थिरता उसके मूल सिद्धांतों, अनुशासन और समय के साथ बदलाव की क्षमता पर निर्भर करती है।

बुधवार, 18 फ़रवरी 2026

व्रत य आटोफेजी

fasting

प्रस्तावना 

भारतीय संस्कृति में व्रत रखने का एक अलग ही धार्मिक महत्व है वैसे तो बहुत से लोग व्रत रखने को एक अंध विश्वास के नजर से देखते है, लेकिन बहुत ही कम लोग जानते होंगे की ऐसा करने से स्वास्थ्य लाभ भी होता है , क्योंकि यह आयुर्वेद विज्ञान से जुड़ा हुआ है । हम इस बात का दावा नहीं करते बल्कि जापानी वैज्ञानिक जोशि नूरी आस्मी का मानना है। इस शोध के लिए उन्हें वर्ष 2016 में मेडिसिन विज्ञान के नोबल पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया है। इस लेख के माध्य से हम यह जानने कि कोशिश करेंगे कि व्रत के दौरान हमारे शरीर में क्या अभिक्रिया होती है और कैसे यह हमारे लिए लाभकारी है । इसके साथ ही हम इस विषय पर भी चर्चा करेंगे के व्रत को दौरान हमें किन-किन सावधानियों पर ध्यान देना चाहिए।.

व्रत 

व्रत क्या है इसका शाब्दिक अर्थ समझें तो हमें पता चलता है कि यह संस्कृत भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है संकल्प य प्रतिज्ञा लेना। जिसमें व्यक्ति किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए भोजन व अन्य सुख-सुविधाओं का त्याग करता है। दुनिया की अलग -अलग भाषाओं में इसे अलग-2 नामों से जाना जाता है। ग्रिक भाषा में इसे आटोफेजी कहते है जिसका अर्थ है खुद को ही खाना। दरअसल व्रत के दौरान हमारा शरीर इसी प्रक्रिया को दुहराता है। व्रत के दौरान हमारा शरीर फैट को कम करने के साथ-साथ नए इम्यून सिस्टम को भी बनाता है जिससे हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास होता है। वर्तमान समय में हम देखते है कि हर प्रकार के भोजन में मिलावट होने लगी है इसके साथ ही अनिद्रा, मधुमेह, तनाव जैसी बीमारियों से प्रत्येक सातवां व्यक्ति ग्रसित है और इन सभी बीमारियों  से भी छुटकारा पाने के लिए हम रासायनिक दवा का इस्तेमाल करते है जिनको अधिक मात्रा में लेने से हम किसी अन्य बीमारी का शिकार हो जाते है ।  तब हमें एक अच्छा डाक्टर भी यही सलाह देता है कि सुबह व्यायाम करिये , हफ्ते में एक बार व्रत रखिये , मिलावटी समान से परहेज करें । दुःख कि बात दोस्तों यहां यह है कि तब तक बहुत देर हो चुकी होती है  क्योंकि हमारा शरीर तब तक बीमारियों कि गिरफ्त में आ चुका होता है। ‌‌

उपाय

अब जबकि हम पहले से ही जानते है कि प्रत्येक समान में मिलावट हो रही है तो क्यों न हम भी अपने शरीर को उसी प्रकार ढाल ले ताकि हमारा शरीर इनसे होने वाले नुकसान य हानि को आसानी से सह सके और हम बड़ी शारीरिक हानि से बच सके।. दोस्तों व्रत रखना एक अच्छी आदत हो सकती है क्योंकि यह प्रण लेने या खुद से वादा करने जैसा ही है । क्योंकि यह हमारे किसी भी  लक्ष्य को हासिल करने के इरादे य आत्मविश्वास को मजबूती प्रदान करता है । कुछ लोगों का दवा तो यह भी है कि व्रत(fasting) कैंसर जैसी घातक बीमारियों को भी ठीक कर सकता है। हलांकि यह मिथक है जिसे हम नहीं मानते। मगर हम इस बात को भी नहीं झुठलाते है कि व्रत रखने से हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है सो इस प्रकार कुछ हद तक लाभ तो होता है, शरीर पहले से ज्यादा स्वस्थ लगने लगता है मगर कैंसर जैसी बीमारी से लड़ने के लिए डाक्टर कि देख रेख में दवा लेना आवश्यक है।.

उपवास के दौरान शरीर में होनी वाली आन्तरीक अभिक्रिया

उपवास य व्रत के दौरान जब हम कुछ नहीं खाते है तो हमारा शरीर को बाहर से ऊर्जा नहीं मिलनी बंद हो जाती है । जिसके कारण शरीर ऊर्जा के लिए  अंदर जमें हुए कचरे य वेस्ट पर निर्भर  रहता है।  अतः शरीर अपने द्वारा जमा किए गये वेस्ट तो ई़धन की तरह इस्तेमाल करता है य उसी को खाने लगता है।. दुसरी भाषा में जब हम खाना बंद करते है तब हमारा शरीर में एक रासायनिक अभीक्रिया होती है दरअसल अमतौर पर जब हम खाना खाते है तो उसमें से ग्लूकोज खतम हो जाता है तब शरीर हमारे शरीर में जमें फैट को बर्न करना शुरु करता है । अतः इस प्रक्रिया के दौरान हमारे शरीर में किटोंस का निर्माण होता है। ये किटोंस हमारे शरीर के लिए सुपर फुड का काम करता है।
उदाहरण के लिए समझें ग्लूकोज को पेट्रोल समझें और किटोंस को हाइड्रोजन समझें। अब अगर अपकों अन्तर पता होना चाहिए कि एक लीटर पेट्रोल 28 किलोमीटर की माइलेज देता है वहीं हाइड्रोजन एक लीटर में 1000 किलो मीटर कि माइलेज देता है । मशहुर वैज्ञानिक जोशी नूरी आस्मी ने फास्टींग को कयी अलग-अलग स्टेज में विभाजित करते हुए 5 दिनों में विभाजित किया है।

1 पहले दिन में शरीर लीवर औऱ मांसपेशीयों में जमें ग्लाइकोजन का इस्तेमाल करता है खास बात यह कि ग्लाइकोजन के हमारे शरीर के हर छोटे कण के साथ स्टोर होता है। जिसके कारण हमें व्रत के दौरान ज्यादा प्यास लगती है। इसी कारण से प्रारम्भ में हमारा वज़न तेजी से घटता है इसके अलावा फास्टींग के दौरान इंसुलिन का स्तर भी बहुत तेजी से नीचे गिरता है। इसके बाद शरीर अपने अंदर जमी वसा का इस्तेमाल ईधन के रुप में करना प्रारम्भ करता है ।

2. दुसरे दिन हमारा शरीर डीप किटोसिस में चली जाती है यानी गहरी सफाई अभियान प्रारम्भ होता है । इस दौरान हमारे मस्तिष्क में ब्रेन डेराईव़़ड न्यूरो्ट्रॅफिक फैक्टर का लेवल भी बढ़ता है। यह एक ऐसा प्रोटीन माना जाता है जो नये न्यूरान्स को बनाने में मदद करता है। इसकी खास बात यह है कि इस समय के दौरान लोग मेटल क्लेरिटी और खुद को फोक्स महसूस कर सकते है। क्योंकि यह हमारी याददाशत को मजबूत बनाता है।

3. तीसरे दिन मांसपेशीयों का सिकुडना प्रारम्भ होता है खास बात यह है कि हमारा शरीर मांसपेशीयों को ऊर्जा के लिए जलाना प्रारम्भ करता है मगर इससे नई तथा मजबूत मांसपेशीयों का विकास भी होता है। यह हार्मोन हमारी मांसपेशीयों के टिशुस व अणुओं को टूटने से भी बचाता है।
4. चौथे दिन के दौरान हमारे शरीर कि पहली प्रथमिकता जमें हुए फैट और सेल्युलर जंक को साफ करने की होती है।
5.पांचवे दिन हमारा शरीर फैट बर्निंग मशीन बन जाता है तब हमें भूख भी कम लगती है क्योंकि शरीर में जमें फैट से ही ऊर्जा बनाने लगता है। इस समय को दौरान हमारे शरीर में लम्बी उम्र से जूड़े जिन्स भी सक्रिय हो जाते है।

व्रत कि समाप्ति य प्रारम्भ से पहले इन बातों का ध्यान रखें

 1.अगर आप हाल ही में किसी बड़ी बिमारी से ठिक हुए है या किसी प्रकार के आपरेशन य सर्जरी से गुजरे हो तो उसके तीन महीनों तक आपको व्रत नहीं रखना चाहिए इसके अलावा व्रत डाक्टर कि सलाह अनुसार ही रखें यह बहुत आवश्यक है।
 2. किसी बात कि चिंता लेकर व्रत न रखे इससे लाभ की अपेक्षा हानि हो सकती है व्रत के दौरान मन शांत रखें।
 3.व्रत के बाद जब हम भोजन लेना से प्रारम्भ करते है तो यह बहुत ही खास समय होता है इस समय विटामिन और कैल्शीयम युक्त पौषटीक भोजन ही लेना चाहिए। क्योंकि अगर हन ऐसा नहीं करते तो व्रत रखने का कोई फायदा नहीं होने वाला । दरअसल शरीर व्रत के दौरान हमारी पुरानी कोशीकाओं को तोड़ देता है और नई मजबूत कोशिकाओं का निर्माण होता है ऐसे में  अगर हम फिर से अपने शरीर में कचरा डालेंगे तो नई कोशिका स्वस्थ होंगी इसकी कोई गरेंटी नहीं है। भोजन में उबले अण्डे ,दुध ,फल ,हरी सब्जियों का सेवन करें चिनी तथा रिफाइन से बनी चिज़ों से परहेज करें ।.
4. व्रत हर कोई नहीं रख सकता जैसे कि गर्भवती महिलाएं ,मधुमेह के रोगी ,किसी भी बीमारी से पि़ड़ित व्यक्ति य जिसे खाने कि समस्या हो या जो पूरा भोजन नहीं लेते य फिर जिनका वजन कम हो, य फिर लम्बाई के हिसाब से बजन सही न हो।.

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