Indian History reveal the Past

हमारे इस ब्लॉग में भारतीय इतिहास, सांस्कृतिक इतिहास, राजवंशों आंदोलन स्टार्टअप टेक्नोलॉजी कला और वास्तुकला तथा आर्थिक इतिहास से संबंधित विषयों पर जानकारी दी जाती है। हम कम से कम शब्दों में ज़्यादा से ज़्यादा जानकारी देने की कोशिश कर रहे हैं।

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रविवार, 30 अगस्त 2026

उक्कु य मूषा इस्पात

wootz steel

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में भारत की सबसे प्राचीन धातु जिसके द्वारा बनायी गई तलवार सबसे मजबूत मानी जाती थी और जिसे हम wootz steel के नाम से जानते है के इतिहास के बारे में चर्चा करेंगे। बताते चलें की इस धातु को भारत में मूषा इस्पात के नाम से भी जानते है। इस लेख  में इस धातु के इतिहास बनाने के तरीके एवं इसकी निर्माण कला के पतन के बारे में चर्चा करेंगे। इसके साथ ही इस धातु से बनी तलवारों के  विदेशी व्यापार पर भी चर्चा करेंगे। इस धातु की खास बात यह थी कि यह अपनी मजबूती के साथ इसकी सतह पर बनी लहर धार आकृतियों के चलते भी बहुत प्रचलित हुईं थी।

परिचय

भारत ने प्राचीन काल में ही मानव इतिहास की सबसे उन्नत इस्पात तकनीक को विकसित कर लिया था जिसे हम उक्कु इस्पात के नाम से जानते है जिसे हम Wootz steel के नाम से भी जानते है। प्रारम्भिक समय में इसका निर्माण कार्य भारत के तमिलनाडु कर्नाटक तथा आंध्र प्रदेश के क्षेत्रों में प्रारम्भ हुआ। धीरे-धीरे पूरे विश्व में अपनी मजबूती का डंका बजाया। ज्यादातर इस स्टील से बनी तलवार का  व्यापार  अरब देशों के साथ किया जाता था।

वूट्ज स्टील की निर्माण की कहानी हमें यह बताती है कि भारतीय प्राचीन धातु वैज्ञानिकों के असाधारण शिल्प कौशल और अपनी विद्वता का प्रदर्शन करते हुए ऐसे इस्पात का निर्माण किया जिसने सदियों तक वैश्विक धातु निर्माण की परंपराओं को प्रभावित किया। वूट्स स्टील की विरासत हमें याद दिलाती है कि महान इंजीनियरिंग की शुरुआत सामग्री यों की जानकारी में महारत हासिल करने होती है  न की उसके निर्माण में।

इस स्टील की शुरूआत ईसा पूर्व के समय काल में भारतीय राज्य तेलंगाना के गोलाकोंडा क्षेत्र से हुई इसके बाद के अन्य क्षेत्र जैसे कर्नाटक तमिलनाडु और श्रीलंका हुई। इस स्टील को लोहे के एक ठोस टुकड़े के रुप में निर्यात किया जाता था जिसे मूषा इस्पात कहते थे। श्रीलंका में स्टील बनाने की प्रारंभिक विधि के रुप में मानसूनी हवाओं से चलने वाली एक अनोखी भट्टी के माध्यम से बनाया जाता था। इसके साक्ष्य हमें अनुराधापुरा तिस्सामहारमा औस समनालावेवा जैसे स्थलों के सर्वे के दौरान मिला। इसके साथ ही इतिहासकारों को कोडुमल से प्राचीन लोहे और इस्पात की कलाकृतियां भी प्राप्त की गईं है। 2018 में मन्नार जिले में स्थित योधावेवा स्थल की खुदाई में एक गोलाकार भट्टी का निचला आधा भाग मिला है। शोधकर्ताओं के अनुसार यह ढ़क्कन क्रूसिबल इस्पात का बना है। 

इसी खोज के दौरान श्रीलंका के दक्षिण-पूर्व के क्षेत्रों में शास्त्रीय कला संबंधित कुछ सबसे पुराने लोहे और इस्पात की कलाकृतियाँ पाईं गईं है। अरब सागर के रास्ते भारत और श्रीलंका के समुद्री व्यापार के चलते अरब देशों को वूट्स स्टील के बारे में पता चला। इस का  पता हमें  इस्लामीक ग्रंथों में मुहन्नद और हेन्देय शब्द मिलने से चलता है जो कि भारतीय स्टील से बनी तलवारों की ओर इशारा करते है। अरबी कविताओं में भी इसका उल्लेख मिलता है जिसके तहत वूट्ज स्टील से बनी तलवार अत्यधिक मूल्यवान थी।

आगे चलकर इस प्रकार की स्टील का व्यापार विस्तार अन्य देशों तक हुआ जिसके चलते दमिश्क स्टील का निर्माण हुआ। इसके अलावा 12वी शताब्दी के अरब यात्री एड्रिसी ने भी भारतीय स्टील को दुनिया की सर्वश्रेष्ठ धातु बताया। अरब लेख तेलिंग में स्टील की प्रसिद्धि के लिए तेलंगाना क्षेत्र के संदर्भ में लिखा गया है। जिसमें बताया गया कि तेलंगाना का गोलाकांडा क्षेत्र स्पष्ट रुप से पश्चिम एशिया में उक्कू स्टील के निर्माण का प्रमुख केंद्र है।

वूट्स शब्द का अर्थ

17वीं शताब्दी में यूरोपीय यात्रियों ने दक्षिण भारत के गोलाकोंडा मालाबार  और मैसूर क्षेत्र की यात्रा की और इस्पात निर्माण के क्षेत्र का दौरा किया। जिसके तहत उन्हें इस स्टील के नाम के पीछे का अर्थ समझ आया। वूट्ज शब्द तमिल शब्द उरुक्कू से लिया गया है जिसका अर्थ है पिघलाना। इसी प्रकार द्रविड़ भाषा में इसी प्रकार के मिलते जुलते शब्द का प्रयोग किया गया। वहीं तेलुगु में इस स्टील को उक्कू तथा मलयालम से इसे उरुक्कू नाम से जाना जाता था। इसी प्रकार इस स्टील को मैसूर में उक्कू टूंडू के नाम से जाना जाता था।

17वी से 19वीं शताब्दी के समय काल में यूरोपीय वैज्ञानिकों इस स्टील के बारे में जानने की जिज्ञासा हुई। उस समय काल के दौरान यूरोपीय वैज्ञानिकों को कार्बन मिश्रित धातुओं की जानकारी बहुत कम थी। मगर उनके द्वारा  वूट्ज स्टील के शोध ने आधुनिक अंग्रेजी फ्रांसीसी और रुसी धातु विज्ञान के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
 

प्रजनन अनुसंधान

19वीं शताब्दी के समय काल में ही वूट्ज स्टील पर गहन अध्ययन के लिए रॅायल स्कूल आफ साइंस द्वारा इसे पुनः बनाने के लिए प्रयास किया जिसके चलते 1795 में  डॅा. पियर्सन ने वूट्ज स्टील की रासायनिक रुप पर जांच की जो कि इस स्टिल पर रिसर्च करने वाले पहले व्यक्ति थे।

पावेल पेट्रोविच अनोसोव

ये रुस के धातु वैज्ञानिक थे वे वूट्ज स्टील अपने सभी प्राचीन गुणों के साथ पुनः बनाने में सफल रहे। उनके द्वारा निर्मित स्टील पारंपरिक वूटज के लगभग समान ही था। उन्होंने इस प्रकार के स्टील के उत्पादन के चार अलग-अलग तरीकों के बारे में लिखा जो कि एक पारंपरिक पैटर्न प्रदर्शित करते थे। उनका यह कार्य बुलैट स्टील्स नाम से भी जाना जाता है। जिसे माइंनिग जनरल पत्रिका में इसी शीर्षक के नाम से प्रकाशित किया गया था।

रीबोल्ट एट अल के अनुसार

 इन्होंने अपने विश्लेषण में सीमेंटटाइट के नैनोवायरों को घेरने वाले कार्बन नैनोट्यूब की उपस्थिति के बारे में बताया। इसके साथ ही उन्हें धातु पर वैनेडियम मोलिब्डेनम और क्रोमियम के कुछ अंश मिले जिसके चलते उन्हें पता चला की धातु की अशुद्धियों को निकालने के लिए वूट्ज स्टील मजबूती प्रदान करने के लिए इसे गर्म ठंडा और जमाने जैसे चरणों से गुजारा गया है। जिसके कारण ही यह स्टील लचीला होने के कारण भी अपनी मजबूत पकड़ को नहीं छोड़ता।

वूट्ज स्टील बनाने का तरीका

इस इस्पात का निर्माण एक खास प्रक्रिया द्वारा किया जाता है जिसके दौरान लोहे के कार्बन युक्त पदार्थ के साथ सील बंद भट्टियों में पिघलाया जाता है। जिसके चलते अंत में हमें शुद्ध स्टील प्राप्त होता है जिस पर अद्वितीय सूक्ष्म संरचनाएं होती है ।

कच्चे लोहे का चयन
सबसे पहले कच्चे लोहे का चयन सावधानीपूर्वक शुद्धता के आधार पर किया जाता था। धातु की संरचना में एक स्वरुप सुनिश्चित करने के लिए अशुद्धियों को कम से कम किया जाता था।

क्रूसिबल स्टील का उत्पादन
कठोर मिट्टी के बने छोटे-छोटे बर्तन जो की लोहे और कार्बन युक्त पदार्थों जैसे चारकोल आदि से बने होते थे। खास बात यह है कि इसके लिए कार्बन निर्माण बांस की पत्तियों को जला कर तथा अन्य पौधों को जलाकर प्राप्त किया जाता था।

नियंत्रित कार्बन अवशोषण

अब गर्म करने की प्रक्रिया के दौरान कार्बन लोहे में समाहित हो जाता था और एक उच्च कोटि के कार्बन इस्पात में बदल जाता था। इस चरण में धातु की भंगुरता को रोकने के लिए एक निश्चित तापमान की आवश्यकता होती थी जिसके अधिक या कम होने पर स्टील अपनी मजबूती खो देता था।

धीमी शीतलता
धातु के भट्टी में पिघलने के बाद भट्टियों को धीरे-धीरे ठंडा किया जाता था। जिसके कारण एक नियंत्रित शीतलता के कारण धातु पर आंतरिक संरचनाएं बनी, जिन्होंने आगे चलकर ढलाई को दौरान दमिशक आकृति का रुप धातु पर लिया। अंत में हमें एक ठोस स्टील का पिंड मिलता है।

वूट्ज स्टील के गुण
यह स्टील न केवल अपनी दिखावट के लिए बल्कि अपने यांत्रिक प्रदर्शन के लिए भी जाना जाता है। इस स्टील के माध्यम से बने बेल्ड प्राचीन काल में अन्य स्टील की तुलना में अधिक मजबूत हुआ करते थे। वैज्ञानिकों इसकी सूक्ष्म संरचना का अध्ययन करके पता लगाया की इस स्टील की मजबूती का मुख्य राज ये सूक्ष्म संरचनाएं ही है जो इसकी मजबूती के साथ इसके लचीलेपन भी योगदान देती हैं।

दमिश्क स्टील की उत्पत्ति और वूट्ज स्टील से संबंध

कई लोग पौराणिक तलवारों का सम्बन्ध दमिश्क स्टील से जोड़ते है जो वूट्ज स्टील की तरह ही अन्य आकृति बहते पानी की आकृतियों के लिए प्रसिद्ध है। हलांकि खोज कर्ताओं का यह मानना है कि दमिश्क तलवारों के बनाने में इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल भारत में उत्पादित वूट्ड स्टील के क्षेत्र से ही आता था।

भारतीय इस्पात की सिल्लियों को व्यापार मार्गों के माध्यम से मध्य पूर्व में निर्यात किया जाता था। इसके बाद वहां के कुशल कारीगरों द्वारा इन्हें ढालकर ब्लेड़ बनाते थे। विशेष ढलाई तकनीकों के माध्यम से इन सिल्लियों पर विशिष्ट दमिश्क पैटर्न निर्मित होता था।

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