Indian History reveal the Past

हमारे इस ब्लॉग में भारतीय इतिहास, सांस्कृतिक इतिहास, राजवंशों आंदोलन स्टार्टअप टेक्नोलॉजी कला और वास्तुकला तथा आर्थिक इतिहास से संबंधित विषयों पर जानकारी दी जाती है। हम कम से कम शब्दों में ज़्यादा से ज़्यादा जानकारी देने की कोशिश कर रहे हैं।

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शनिवार, 29 अगस्त 2026

कैलाश मँदिर

kailasa temple

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में एलोरा गुफाओं में से सबसे प्रसिद्ध गुफा एवं मंदिर के बारे में चर्चा की गई है जिसे हम कैलाश मंदिर के रुप में जानते है। बताते चले कि यह मंदिर यूनेस्को की विश्व धरोहर की सूची में आता है जिसे वर्ष 1983 एलोरा की सम्पूर्ण गुफा सूची जो कि लगभग 100 अभी तक खोजी जा चूंकि हैं के साथ सम्मिलित किया गया। एलोरा की गुफाओं की बात करें तो इन 100 गुफाओं में से सिर्फ 34 गुफाओं को ही लोगों के पर्यटन स्थल के रुप में खोला गया है। 

कैलाश मंदिर इन 34 गुफाओं की सूची में 16वें स्थान पर आता है। इस लेख के माध्यम से हम इस मंदिर की वास्तु शिल्प कला तथा इस मंदिर के निर्माण के पीछे की कहानी एवं इतिहास के बारे में जानेंगे। इसके साथ ही हम यह जानने की कोशिश करेंगे की यह मंदिर इस प्रकार से राष्ट्रकूट  पल्लव वंश चालुक्य शासकों से सम्बन्धित है तथा इसके प्रमाणीकरण पर भी बात करेंगे।

परिचय

यह मंदिर भारतीय राज्य महाराष्ट्र के छत्रपती संभाजी नगर जिले में एलोरा में स्थित मंदिरों की सूची में सबसे बड़ा मंदिर है। यह मंदिर एक पूरे पहाड़ को काट कर बनाया गया है। इस मंदिर का निर्माण राष्ट्रकूट वंश के राजा नरेश प्रथम के द्वारा प्रारम्भ करवाया गया जिनका समय काल 757 से 783 ई. का था। यह मंदिर पूरे विश्व में अपने एक अनूठे ढंग का वास्तु और शिल्प कला का अद्भुत नमूना है। यह खास इस लिए भी है क्योंकि 1200 वर्ष से भी प्राचीन सह्वाद्री पहाड़ियों के कठोर चट्टान जिसे हम बेसाल्ट पत्थर के रुप में भी जानते है काटना इतना आसान नहीं था।

यह भारतीय इतिहास के सबसे प्राचीन मंदिरों की सूची में इस लिए भी प्रसिद्ध है क्योंकि इसका निर्माण कार्य नीचे से प्रारम्भ न करके ऊपर यानी इसके शिखर निर्माण कार्य से प्रारम्भ किया गया था। याद रखने योग्य बात यह भी है कि जिस क्षेत्र विशेष पर यह मंदिर निर्मित किया गया है उसे पहले ओरंगाबाद के बाद के नाम से जाना जाता था जिसे वर्ष 2023 के फरवरी महीने में राज्य और केन्द्र सरकार की मंजूरी पर मराठा साम्राज्य के दूसरे शासक छात्रपति सम्भा जी महाराज के सम्मान में परिवर्तित किया गया।

मंदिर निर्माण का कारण

प्राचीन काल में मंदिर निर्माण का कार्य व्यापारिक मार्गों के निकट किया जाता था ताकि व्यापारी और सौदागर यहां रुक कर विश्राम कर सकें इसके साथ ही यहां रहने वले भिक्षुओं साधुओं और तपस्वियों के साथ लंबी यात्रा करने सहायता और सुविधा भी मिलती थी। बदले में इन धनी व्यापारियों और सौदागरों की तरफ से मंदिर परिसर के संरक्षण के लिए आर्थिक मदद की जाती थी। प्राचीन व्यापारिक मार्ग पर स्थित होने के कारण यह दक्कन क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया था। इसके साथ ही क्षेत्रीय शासकों द्वारा भी इस मंदिर को संरक्षण प्राप्त था।

लोक कथा के अनुसार

दसवीं शताब्दी की एक कथा अनुसार जिसे हम कल्प तरु के नाम से भी जानते है में एक वृतांत के अनुसार राष्ट्रकूट शासक एलु की एक रानी का उल्लेख है जो कि इस प्रकार है। लगभग 8वीं शताब्दी के समय काल में राष्ट्रकूट राजा बीमार पड़ गए। जिसके चलते रानी ने भगवान भोले नाथ की आराधना की और राजा के अच्छे स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना की तथा उन्होंने वादा कि राजा स्वास्थ्य हो गए यानी उनकी मनोकामना पूर्ण हुई तो वे भगवान शिव के भव्य मंदिर का निर्माण करवायेंगी। फलस्वरूप  उनकी इच्छा पूर्ण हुई जिस कारण से रानी ने प्रण लिया कि जब तक वे भगवान शिव के मंदिर का शिखर नहीं देख लेतीं तब वे भोजन नहीं ग्रहण करेंगे।

राजा ने अपने देश के सर्वश्रेष्ठ वास्तुकारों मंदिर निर्माण के लिए आमंत्रित किया। वास्तुकारों ने भव्य मंदिर की संरचना प्रस्तुत की राजा उनसे प्रभावित भी हुए। मगर समस्या यह थी की पूरे मंदिर के निर्माण कार्य में लगभग 1 महीने का समय लग जाता जिसके चलते रानी को पूरे एक महीन के लिए भूखा रहना पड़ता।

अतः पेठन के वास्तुकार कोकासा मंदिर निर्माण की एक अनोखी योजना प्रस्तुत की जिसमें उन्होंने मंदिर को ऊपर स नीचे की तरफ निर्माण करने की बात की। इस योजना के तहत वास्तुकार मंदिर  की शुरुआत उसके शिखर के निर्माण कार्य से कर सकते थे  और मंदिर के शीर्ष को देखकर रानी अपना व्रत तोड़ सकती थी।

शिलालेख के अनुसार

दशा अवतार गुफा में मिले  शिला लेख के अनुसार इसी प्रकार के एक अन्य मंदिर  का निर्माण राष्ट्रकुट वंश के संस्थापक दंतिदुर्ग द्वारा अपने शासन काल यानी 735 से 757 ई. के मध्य के समय काल में करवाया था। इस मंदिर की नक्काशी भी कैलाश मंदिर की नक्काशी के समान शैली द्वारा निर्मित की गयी थी। हलांकि मंदिर परिसर के कुछ हिस्सों के बाद शासकों द्वारा पूर्ण करवाया गया। खास बात यह है कि यह गुफा भी एलोरा की गुफाओं की श्रेणी में 15 स्थान पर आती है और शैव मंदिर निर्माण स्थली के समीप है।

मंदिर की सरंचना

कैलाश मंदिर उन 34 हिंदू जैन और बौद्ध गुफाओं और मठों में सबसे बड़ा है जिन्हें हम सामूहिक रुप से एलोरा की गुफाएं कहते है। जिनमें 17 हिन्दू मंदिर 12 बौद्ध गुफाएं एवं 5 जैन मंदिर को शामिल किया गया है। इस मंदिर का निर्माण कार्य इस लिए भी खास है क्योंकि उस समय काल के दौरान वर्तमान तकनीकी औजार जैसे जैक हैमर उपलब्ध नहीं था जिसके कारण पूर्ण मंदिर का निर्माण हथौड़े व छेनी का इस्तेमाल करने वाले श्रमिकों की सेना के द्वारा तराशा गया।

प्रारम्भ में बेसाल्ट चट्टान के अंदर तीन विशाल खाई खोदी गई और लगभग 20 लाख टन चट्टान को काटकर हटाया गया। अतः इस चरण के बाद ही वास्तविक कार्य प्रारम्भ हुआ। जैसे-जैसे कारीगर नीचे उतरते गए मंदिर परिसर की विभिन्न संरचनाओं को तरशते गए। इनमें मुख्य रुप से गर्भगृह के ऊपर का शिखर स्वतंत्र स्तंभ अलग-अलग मंदिर और विशाल मूर्तियां शामिल थीं। इसके बाद ही मंदिर की बाहरी और आंतरिक सतह पर विस्मयकारी मूर्तिकला को बारीकी से उकेरा गया।

मंदिर का मुख्य मंडप 16 स्तंभों के सहारे पर टिका हुआ है इसके अलावा शिव के वाहन नंदी बैल के लिए अलग मंडप बनाया गया है। चारों तरफ 45 फुट ऊंचे ध्वज स्तंभ का निर्माण किया गया है। इन स्तंभों पर कभी त्रिशूल रखे जाते थे। मंदिर परिसर के अन्दर पांच अलग-अलग मंदिर स्थापित किए गए हैं जिनमें से तीन यमुना सरस्वती और गंगा को समर्पित है। 

नंदी मंदिर के मंडप के अगल-बगल विशालकाय हाथी की मूर्तियों के साथ स्तंभों का निर्माण किया गया है। अगर पूरे मंदिर की लंबाई की बात करें तो यह मंदिर 276 फुट लंबा है और वहीं चौड़ाई की बात करें तो यह 148 फिट चौड़ा है। मंदिर  के आंगन में तीन तरफ कोठरियों को एक सारणी में बनाया गया है। 12 मंजिला इमारत के रुप में निर्मित होने के कारण यह मंदिर सम्पूर्ण एलोरा गुफाओं में विशेष स्थान रखता है। यह एक मात्र गुफा है जो 12 मंजिलों में निर्मित है। मंदिर में मौजूद प्रमुख मुर्तियों की बात करें तो इनमें नटराज यानी भगवान शिव की मूर्ति गजलक्ष्मी अर्धनारीश्वर विष्णु के दशावतार रावणानुग्रह की मु्र्तियां प्रमुख है।

आधुनिक युग की खोज

इस मंदिर पर 1819 में जान स्मिथ नामक ब्रिटिश अधिकारी दुबारा खोजा गया। जान स्मिथ एक दिन शिकार के दौरान औरंगाबाद से 100 किलो मीटर दूर सह्राद्रि की पहाड़ियों की तरफ मौजूद जंगल में चले गए। शिकार के दौरान वे बघौरा नदी के पास पहुंच गए। वहीं उन्हें नदी की ऊपर की पहाड़ियों पर एक मंदिर का मुहाना दिखा। उन्हें लगा की गुफा के अन्दर उन्हें शिकार के लिए जरूर कोई बाघ मिल सकता है जिसके कारण वे अन्दर चले गए। प्रकाश जला के जब उन्होंने अन्दर का द्रश्य देखा तो चकित रह गए। इस प्रकार इन गुफाओं की दुबारा से खोज हो सकी। वे पहला यूरोपीयन शख्स था जो पहली बार इन गुफाओं तक पहुंचा।

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