Indian History reveal the Past

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शुक्रवार, 28 अगस्त 2026

नाना साहब

nana saheb

प्रस्तावना

‎प्रस्तुत लेख में हम महान भारतीय क्रांतिकारी नाना साहेब के बारे मे चर्चा करेंगे। जिन्हें हम भारतीय प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के शिल्पकार के नाम से भी जानते हैं। इसके साथ ही हम उनके द्वारा किये गए महत्वपूर्ण कार्यों के बारे में चर्चा करेंगे। तथा उनके जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओ जैसे की पेंशन का निलंबन, कानपुर विद्रोह इसके साथ ही 1857 की क्रांति के दौरान कल्पी दिल्ली और लखनऊ यात्रा की घटना का ज़िक्र किया गया है। इसके अलावा मेरठ क्रांति की पूर्ण घटना का ज़िक्र किया गया है। इसके साथ ही doctrine of lapse कानून के बारे मे ज़िक्र किया गया है।

जीवन परिचय

19 मई 1824 को इनका जन्म वेनगांव के माधवराव नारायण भट्ट के घर हुआ। उनकी माता का नाम मैनावती था। उनके पिता पेशवा के बाजीराव द्वितीय के चचेरे भाई थे।

बाजीराव पेशवा ने नाना राव को अपना दत्तक पुत्र स्वीकार किया और उनकी शिक्षा दीक्षा का जिम्मा अपने हाथों में लिया। नाना राव के बचपन का नाम धन्डोपंत था।  बचपन से बाजीराव द्वितीय की छत्र छाया मे ही उन्हें तलवार और बंदूक चलना तथा घुड़सवारी को सिखाया गया। नाना साहेब की तीन पत्नियां थी। जिनके नाम कुछ इस प्रकार थे कृष्णबायी सर्जाबायी काशीबाई था।

‎नाना साहब 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता के प्रमुख नेताओं मे से एक थे, इन्होंने अपना विद्रोह कानपुर में ब्रिटिश शासन के खिलाफ किया था।

‎पेंशन का निलंबन

‎लार्ड डलहोजी की हड़प नीति अंग्रेजों की इसी नीति को Doctrine of Lapse के नाम से भी जाना जाता हैं। इस नियम के तहत अंग्रेजों ने नाना राव को बाजीराव द्वितीया का वैध उत्तराधिकारी मनाने से मना कर दिया था। इस प्रकार उनकी वार्षिक पेंशन बंद कर दी गयी। पेशवा बाजीराव के मरने के बाद नाना साहब ने पेशवा की सभी उपाधियों को धारण कर लिया।
‎इसके साथ ही उन्होंने अपने वकील के सहयोग से ब्रिटिश सरकार को आवेदन किया और पेश वाई पेनशन को चालू करवाने की न्यायोचित मांग कानपुर के कलेक्टर के पास रखी मगर उनकी मांग को खारिज कर दिया गया और उन्हे सूचना दी गयी की ब्रिटिश सरकार उनकी पेश वाई उपाधि को स्वीकार नही करती।

‎लंदन मिशन

‎नाना साहब ने अपनी पेंशन बहाल करने के कई प्रयास किये मगर असफल रहे। इसके बाद क्षेत्रीय वकीलों का सहारा लिया मगर वे भी असफल रहे। अंत मे नाना साहब ने प्रसिध्द राजनेता एवं वकील अजीमुल्ला खान को इंग्लैंड भेजा लेकिन सारे प्रयास असफल रहे। अंत मे नाना साहब को अंग्रेजों की कूटनीति के बारे मे पता चला। दरासल अंग्रेज पेशवा बाजीराव की संपूर्ण सम्पति को जब्द करके अपनी टरेट्री में शामिल करना चाहते थे।
‎इन्ही कारणों से नाना साहब की पेंशन को बंद किया गया था। अजीमूल्ला खां ने बोहत प्रयास किये मगर असफल रहे। लौटते वक्त अजीमूल्ला खां ने रूस इटली फ्रांस की यात्रा की और वापिस आकर अंग्रेजों की वस्तविक साज़िश और यूरोप मे चल रहे स्वधिनता आंदोलन से रूबरू कराया।

‎1857 की क्रांति

‎इस क्रांति के दौरान नाना साहब ने लखनऊ दिल्ली की यात्रा की और कानपुर वापस आकर अपने परम मित्र कुवर सिंह से मुलाकात की जो की बिहार के रहने वाले थे इनसे मिलने के बाद इन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति करने की बात पर विचार विमर्श किया।

‎इसी दौरान मेरठ में अंग्रेजों के प्रति विद्रोह भड़क उठा जिसमें नाना राव ने गुप्त रूप से मदद की। जिसके परिणाम स्वरूप क्रांति कारियों ने ब्रिटिश खजाने से लगभग 9 लाख की नकदी और असलाह बारूद बरामद हुए। कानपुर के एक गढ़ में अंग्रेजों को कैद कर लिया गया और गढ़ पर भारतीय ध्वज फरया गया।

‎दिल्ली प्रस्थान

‎लूट की घटना के बाद सभी क्रांति कारी कानपुर मे दिल्ली जाने के लिए इकट्ठा हुए यांहा नाना साहब ने सभी का सहयोग किया मगर दिल्ली जाने मे बोहत खतरा था अतः सेना और हटियारों की कमी के कारण दिल्ली प्रस्थान के लिए नाना साहब को ना जाने की सलाह दी गयी।

‎जिसके परिणाम स्वरुप नाना साहब ने कानपुर से ही युद्ध का नेतृत्व किया और कानपुर के कल्याणपुर से युद्ध की घोषणा की। उन्होंने अपने सैनिकों को कई टुकड़ों मे बाँटा जिन्होंने अंग्रेजों को कड़ी टक्कर दी। परिणाम स्वरुप अंग्रेज पीछे हटने को मजबूर हुए। सेना के नेता ने अंग्रेज अफसर जनरल टु व्हीलर को पत्र लिखा और उन्हे इलाहाबाद वापिस बुलाने की गुजारिश की। टु व्हीलर ने उन्हे सुरक्षित इलाहाबाद लाने का वायदा किया।

‎सती चौरा घाट पर जब अपने साथी सैनिकों के लिए नाव की व्यवस्था की तब क्रांतिकारियों ने उन पर गोलियां चला दी जिसमें अनेकों अंग्रेज सैनिक मारे गए। ब्रिटिश सरकार इसका दोषी नाना साहब को ही मानती हैं।

‎बदले मे जनरल ने बड़ी सेना कानपुर मे भेजी क्रांति कारियों की पत्नियों को गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें मार डाला गया। इस घटना के बाद एक बार फिर से कानपुर मे ब्रिटिश शासन स्थापित हो गया।

‎लखनऊ प्रस्थान

‎इस घटना के बाद नाना साहब कानपुर से भागने मे सफल रहे। अंग्रेजों की बढ़ती सेना को देख कर नाना साहब गंगा नदी पर कर लखनऊ चले गए। अपने साथ भाईयों के सहयोग से एक बार फिर नाना साहब कानपुर वापस लौट आये। एक बार फिर से विद्रोह करने का प्रयास किया मगर अंग्रेजों ने कानपुर और लखनऊ मार्ग पर अपना अधिपत्य स्थापित कर लिया जिसे कारण नाना साहब को रुहेलखंड की और भगाना पड़ा।

‎रुहेलखंड मे विद्रोह

‎रुहेलखंड पहुंचकर उन्हें खान बहादुर खान का समर्थन मिला जिसके कारण एक बार फिर उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह प्रारंभ किया। अब अंग्रेजों को समझ आगया की जब तक नाना साहब पकड़े नही जाते तब तक विद्रोह को दबाना मुश्किल हैं। परिणाम स्वरूप अपने मुखबिरों को करांतिकारियो के संगठन मे शामिल किया ताकि उनकी हर गतिविधि पर नजर रख कर उन्हें पकड़ा जा सके।

‎मगर इन प्रयासों के बावजूद भी नाना साहब भागने मे सफल रहे और बरेली चले गए। बरेली विद्रोह मे क्रांति कारियों की हार हुई लेकिन नाना साहब महाराणा प्रताप की तरह बहादुरी से लड़े। अंत मे अपने सहयोगियों के कहने पर उन्हे नेपाल जाना पड़ा क्योंकि उनका मानना था अगर वे यानी उनका नेता पकड़ा गया तो विद्रोह समाप्त हो जायेगा।

जिस कारण नाना साहब नेपाल चले गए और यंही से उन्हे प्रधानमंत्री के संरक्षण मे रहना पड़ा। 

‎अंत मे 24 सितम्बर 1859 मे इनका देहांत हो गया। नाना साहब के बलिदान को इतनी आसानी से भूलना देश वासियों के लिए किसी देश द्रोह से का नही हैं।

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