प्रस्तावना
प्रस्तुत लेख में हम सिंधु घाटी सभ्यता के इतिहास पर प्रकाश डालेंगे इसके साथ ही सिंधु घाटी सभ्यता की खोज के दौरान मिली लिपि के इतिहास पर प्रकाश डालेंगे। आगे लेख में हम यह जानने की कोशिश करेंगे की सिंधु वासियों द्वारा अपनी लिपि का प्रयोग मुख्य रुप से किन-किन क्षेत्रों में किया जाता था। इसके साथ ही हम जानेंगे की किसी तरह से इस लिपि के खोज कर्ताओं द्वारा द्रविड़ और संस्कृत से सम्बन्धित बताया गया। इसके अलावा हम यह समझने कि कोशिश करेंगे कि क्यों कुछ विद्वान इसे कोई लिपि न समझकर इस एक गणी तिय प्रणाली मानते थे।
लिपि का परिचय
इस लिपि की खोज वर्ष 1920 के दशक में सर जान मार्शल द्वारा की गई थी जिसे मोहरों टेराकोटा की पट्टियों तथा धातु पर अंकित पशुओं मानवों तथा लेखों से प्राप्त किया गया है। बताया जाता है कि यह लिपि लगभग 2600-1900 ईसा पूर्व की अनुमानित है। जिसे मुख्य रुप से भारत के उत्तर पश्चिमी हिस्से तथा पाकिस्तान के सिंधु क्षेत्र वाले भाग से प्राप्त किया गया है। इस लिपि से संभवतः एसी भाषा का प्रतिनिधित्व होता जिनके अक्षरों में समानता न होने के कारण इसका अध्ययन कर पाना मुश्किल हो जाता है।
वर्ष 1982 में खोज कर्ता एस आर राव ने इस लिपि के 62 संकेत को प्रस्तावित किया। इसी क्रम में आगे चलकर 1994 में रिसर्च कर्ता असको परपोला ने इस लिपि के 425 संकेतों के बारे बताया। इसी प्रकार वर्ष 2016 में शोधकर्ता ब्रायन के वेल्स ने 676 संकेतों की खोज की। लेकिन सटीक संख्या एवं इनके अर्थ पर अभी भी खोज जारी है।
लिपि को सही से न समझ पाने का मुख्य कारण विशेषज्ञ यह बताते है कि अभी तक हमें हड़्प्पा मोहरों का सीमित संग्रह ही मिल पाया जिनमें मात्र 3500 हड़प्पा मोहरों का ही जिक्र किया जाता है लेकिन अभी भी सटीक संख्या अज्ञात है। इसके साथ ही समय के प्रभाव के कारण कलाकृतियों का क्षरण भी एक मुख्य कारण है।
लिपि की मुख्य बातें
सिंधु घाटी सभ्यता की लिपि को हड़प्पा सभ्यता की लिपि भी कहा जाता है जो की आज तक पुरी तरह से पढ़ी नहीं जा सकी है। हाल ही में भारतीय राज्य तमिलनाडु के मुख्य मंत्री जिनका नाम एम के स्टालिन है ने सिंधु घाटी सभ्यता की लिपि को सफलतापूर्वक समझाने वाले व्यक्ति के लिए 1 मिलियन अमेरिकन डालर के इनाम की घोषणा की थी। यह घोषणा पिछले वर्ष 9 जनवरी 2025 को की गई थी। जिसमें बहुत से विद्वानों ने प्रयास किया मगर सफलता हासिल न कर पायें।
लेखन शैली
लिपि को दाएं से बाएं की और लिखा जाता था इसके साथ ही लिपि को लिखते वक्त अक्षरों की दिशाओं में परिवर्तन भी किया गया है । जिस कारण कुछ विद्वान इसी लिपि को लोगोसिलेबिक प्रणाली का दर्जा भी देते है जिसका अर्थ है। जिसका अर्थ है कि यह लिपि चित्रलेखों तथा अक्षरों के संयोजन द्वारा लिखी गयी है। अधिकांश लेख इतने छोटे है कि पांच अक्षर में पूर्ण हो जाते है अतः लम्बे लेखों की कमी के कारण व्याकरण तथा वाक्य विन्यास व भाषा की व्याख्या के पैटर्न को समझने की क्षमता सिमीत हो जाती है।
लिपि का मुख्य कार्य
मुख्य रुप से लिपि का प्रयोग व्यापारिक कार्यों कर अभिलेखों एवं पहचान आदि के लिए किया जाता था। लिपि में गुणज स्वास्तिक और जोड़ जैसे चिन्ह भी मिले है जिसके कारण विद्वानों में यह भ्रम भी है शायद इस लिपि का प्रयोग शिक्षा सांस्कृतिक कार्यों में भी किया जाता था। हलांकि इस बात पर अभी रिसर्च होना बाकी है।
द्रविड़ भाषा से सम्बन्ध
कुछ शोधकर्ताओं जैसे इरावत महादेवन एवं असको परपोला ने इस सम्बन्ध द्रविड़ भाषा से स्थापित करने की कोशिश क्योंकि लिपि में मछली का चिन्ह तारों का पर्यायवाची के रुप में किया जाता है ठीक इसी प्रकार तमिल शब्दावली में भी मछली का पर्यायवाची तारा ही होता है । इसी प्रकार संख्या और मछली के चिन्ह द्वारा तारा समूह को परिभाषित किया जाता है।
संस्कृत से सम्बन्ध
एस आर राव जैसे विद्वानों न इस लिपि का सम्बन्ध संस्कृत से जोड़ते हुए इसे वैदिक काल यानी 1500-600 से संबंधित बताया। लेकिन हड़प्पा एवं वैदिक सभ्यता संस्कृति की विसंगतियों के कारण इस पर विवाद है। स्टीव फार्मर एवं पैगी मोहन जैसे विद्वानों ने इस तर्क की आलोचना कि है।
हड़प्पा सभ्यता की लिपि का समझना ज़रुरी क्यों है।
क्योंकि इसी मदद से इतिहासकारों और हमें हड़प्पा की धार्मिक मान्यताओं सामाजिक रीति रिवाजों सामाजिक मानदंडों तथा राजनीतिक संरचनाओं को समझने में सहायता मिलेंगी। इसके साथ ही हमें यह जानने को मिलेगा की इस क्षेत्र विशेष के लोग किन क्षेत्र विशेष के लोगों से अधिक प्रभावित थे तथा नगर निर्माण की आधुनिक शैली तथा नगर के कचरे की निकासी से लिए उच्चतम प्रबंध बिना किसी उच्च तकनीक के कैसे विकसित की।
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