परिचय
बंगाल में अराजकता के तथा शशांक की मृत्यु के बाद के लगभग एक शताब्दी तक बंगाल की राजगद्दी पर कोई शासक न बैठ पाया। कुछ समय बाद गोपाल नामक सुयोग्य सेना नायक को बंगाल के नागरिकों ने अपना राजा स्वीकार किया। प्रमुख शासक-प्रमुख शासकों की बात की जाए तो इनमे मुख्य तोर पर 8 शासकों के नाम सामने आते है। 1.गोपाल प्रथम 2.धर्मपाल 3.देवपाल 4.विग्रह पाल 5.नारायण पाल 6.राज्यपाल 7.गोपाल द्वितीय 8.विग्रह पाल द्वितीय 9.महिपाल प्रथम 10.नयपाल 11.विग्रहपाल तृतीय 12.महिपाल द्वितीय 13.रामपाल 14.मदन पाल 15.कुमार पाल 16.गोपाल पाल तृतिया 17.मदन पाल 18.गोविंद पाल अंतिम शासक था। इसी प्रकार बंगाल के सेन वंश के शासक की बात करे तो मुख्य रूप से 4 शासकों के नाम सामने आते है।1.सामंत सेन 2.विजय सेन 3.बल्लाल सेन 4.लक्षमण सेन 5.विश्वरूप सेन 6.केशव सेन आदि।
1.गोपाल प्रथम750-770ई.
पाल वंश की स्थापना बौद्ध धर्म के अनुयायी गोपाल ने की थी। 8वी शताब्दी में बंगाल में जो आंतरिक अव्यवस्था फैली हुई थी। उसे मत्स्य न्याय कहा गया है। वहा की जनता ने गोपाल को लक्ष्मी की बांह पकड़ाई ताकि मत्स्य न्याय से छुटकारा पाया जा सके । शासक गोपाल ने इससे पहले ओदंतपुरी में एक मठ का निर्माण करवाया था इस तथ्य का प्रमाण इतिहास कार तारानाथ के अनुसार प्रमाणित किया गया।2.धर्मपाल 770-810ई.-गोपाल प्रथम का उत्तराधिकारी उसका पुत्र धर्म पाल था। धर्म पाल एक उत्साही बौद्ध समर्थक था। उसके लेखों में उसे परम सौगात कहा गया है।
अन्य लेखों में उसे विक्रमशील भी कहा गया है जिसके वजह से उसके नाम पर विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना बिहार भागलपुर में हुई। उसने बिहार के साथ साथ बांग्लादेश सोमपुरी में प्रसिद्ध विहारो की स्थापना करवाई। प्रसिद्ध बौद्ध लेखक हरिभद्र उसकी राजसभा में वास करते थे। धर्म पाल ने बहुत से बौद्ध मठो का निर्माण करवाया था। उसने नालंदा विश्व विद्यालय के व्यय के लिए 200 ग्रामों को दान दिया था। उत्तरी भारत की प्रमुख राज्यो की श्रेणी में अपने नाम को स्थापित किया। कन्नौज के शासक इंद्र युध को पराजित किया धर्मपाल ने और कन्नौज की राजगद्दी पर चक्रयुध को स्वयं संरक्षण देते हुए बिठाया।
11वी शताब्दी में गुजरात के कवि सोडढल ने धर्म पाल को उत्तरपथ स्वामी की उपाधि से संबोधित किया।.3.देवपाल 810-850ई.-मुंगेर को अपनी राजधानी बनाने वाला शासक देवपाल "धर्मपाल" का पुत्र था। प्रतिहार शासक मिहिर भोज का पराजित करते हुए इसने "परम सौगात" की उपाधि धारण की।देवपाल ने बौद्ध धर्म को पुनः स्थापित किया। देव पाल के बाद 4.विग्रह पाल ने शासन संभाला 810-854ई.तक शासन किया। उसके पश्चात् 5.नारायण पाल ने शासन 854-908ई.तक किया। इसके समय काल में पाल वंश का शासन मात्र बंगाल तक सीमित रह गया। लगभग 908-888ई. तक 80 वर्षो में 6.राज्यपाल 7.गोपाल द्वितीय 8.विग्रह पाल द्वितीय ने शासन किया।
9.महिपाल प्रथम988-1036ई.
विग्रह पाल द्वतीय का पुत्र महिपाल प्रथम एक शतिशाली राजा था। उसके समय काल में उनका साम्राज्य मगध तक विस्तृत हो गया। उसने पाल वंश की खोई हुई परतिष्ठा वापिस दिलाई। उसे राजेंद्र चोल और कालपुरी वंश के मांगेय देव से युद्ध में पराजित होना पड़ा । महिपाल ने बौद्ध भिक्षु अतिस के नेतृत्व में तिब्बत के एक धर्म प्रचारक मण्डल को भेजा।10.नयपाल(1038-1053ई.)-यह महिपाल का पुत्र था। इसके जीवन का अधिकांश भाग कल्चुरी वंश के राजा कर्ण के साथ संघर्ष में बीता। उसके उत्तराधिकारी विग्रह पाल तृतीय ने कल्चुरी के राजा कर्ण,चालुक्य नरेश विक्रमादित्य चतुर्थ,कौशल नरेश महाशिव गुप्त के आक्रमण का सामना करते हुए बिताया और पाल साम्राज्य का एक बहुत बड़ा हिस्सा हार गए। मात्र मगध,बंगाल और गौड़ को ही अपने अधीन रख सके।
11.विग्रह पाल तृतीय1054-1072ई.
विग्रह पाल के समय में कलचुरियो ने बंगाल पर अपना प्रभाव स्थापित कर लिया। और अंत में राष्ट्र कूट वंश के शासक मथन देव ने अपना अधिकार कर लिया। गुजरात के चालुक्य ने और सोमवंशी शासकों ने भी बंगाल पर कई आक्रमण किए।विग्रह पाल का साम्राज्य केवल उत्तरी बिहार तक ही सीमित रह गया। विग्रह पाल के बाद पालो में ही ग्रह युद्ध प्रारम्भ हो गया जिसके परिणामस्वरूप उनकी शक्ति और भी कमजोर हो गई।
12.महिपाल द्वितीय1072-1075ई.
गृहयुद्ध युद्ध होने के कारण महिपाल द्वितीय को कैवर्तो के विद्रोह का सामना करना पड़ा। कैवर्त शासक दिव्य ने महिपाल की हत्या करवा दी। और वरेंद्री में स्वतंत्र राज्य की स्थापना कर ली। महिपाल की हत्या के बाद भी 2अन्य (शूरपाल द्वितीय- रामपाल) उतराधिकारी के मध्य संघर्ष जारी रहा। अंत में विजय रामपाल की हुई।
13.रामपाल1077-1130ई.
संध्याकर नंदी के अनुसार रामपाल (रामचरित के नायक) ने बिहार और बंगाल के 13 सामंतो की सहायता से कैवर्त शासक को भी पराजित कर उसकी हत्या कर दी। बंगाल पर अधिकार करके उसने कामरूप और उड़ीसा पर भी विजय हासिल कर ली,लेकिन कर्णिट शासक न्यायदेव ने इसी समय मिथिला पर अधिकार कर लिया। बंगाल पर भी सेना का दबाव बढ़ने लगा। संध्याकर नंदी भी रामपाल की प्रशंसा करता है। उसने जनहित के अनेक कार्य किए। कृषि की उन्नति के लिए अनेक कार्य किए। कृषि की उन्नति के लिए अनेक करो में कमी की। उसने रामावती नरामक एक नई राजधानी बनवा कर इसे सुंदर भवनों एवं मूर्तियों से सुसज्जित किया। अपने मित्र मथन देव की मृत्यु दुःखी होकर रामपाल ने मुंगेर में गंगा में अपने प्राण विसर्जित कर दिए।.
14.मदन पाल1144-1162ई.
रामपाल के 15.कुमारपाल 16.गोपाल तृतिया 17 मदनपाल क्रमशः शासक हुए। मदन पाल इस वंश का अंतिम प्रभावशाली शासक था। कुमार पाल से मदन पाल के शासन काल में पालो की शक्ति लगातार कमजोर होती चली गई। कामरूप स्वतंत्र हो गया। और बंगाल में विजय सेना का प्रभाव बढ़ने लगा। मगध में गढ़वालो का शासन चलने लगा। विजय सेन ने मदन पाल को बंगाल चोदने के लिए मजबूर कर दिया। इस परकार अंतिम शासक 18.गोविंदपाल ने (1155-1159ई.)तक शासन किया। जिसे गढ़वालो ने मारकर पाल राजवंश का अंत कर दिया।
बंगाल का सेन वंश
पाल वंश के बाद सेन वंश की स्थापना बंगाल में हुईं। सेन दक्षिण के कर्णट देश के वासी थे,वह अपनी उत्पत्ति ब्रह्मक्षत्र परम्परा से मानते है। सामंत सेन ने बंगाल के राढ नामक स्थल पर सेन वंश की स्थापना की।1.सामंत सेन एवं हेमन्त सेन 1070-1096ई.बंगाल के सेन वंश का संस्थापक सामंत सेन को माना जाता है। अपने जीवन के आरंभिक चरण में उसने कर्णट में अपनी सैनिक गतिविधियों के साथ राढ में स्थायी रूप से छोटा सा राज्य स्थापित किया।
लेकिन कोई राजकीय पद नहीं लिया।समतसेन का पुत्र हेमन्त सेन उतराधिकारी बना। अभिलेखों में उसे महाराजधिराज की उपाधि से विभूषित किया गया है। 2.विजय सेन(1095-1158 ई.)यह सेन वंश का प्रथम महत्वपूर्ण शासक था। यह हेमंत सेन का भाई और सामंत सेन का पुत्र था। कवि धोयी द्वारा रचित देवपाड़ा प्रशस्ति लेख में विजय सेन की विजय का विल्लेख है। लेख के अनुसार उसने नेपाल और मिथिला को पराजित किया। विजय सेन ने विजयपुरी और विक्रम पूरी नामक दो राजधानियों की स्थापना की।विजय सेन शिव का उपासक था।
इसकी पुष्टि अरिराज बृषभ शंकर की उपाधियों से स्पष्ट होती है। विजय सेन की अन्य उपाधियां परमेश्वर,परम भट्टार्क व महाराजधिराज थी।
3.बल्लाल सेन1158-1178ई.
विजयसेन की मृत्यु के बाद बंगाल का शासक बना। इसे बंगाल में जाति प्रथा और कुलीन प्रथा को संगठित करने का श्रेय प्राप्त है। बल्लालसेन कुलीन वाद के नाम से प्रसिद्ध एक सामाजिक आंदोलन का प्रचलन करता भी था। बल्लाल सेन एक विद्वान शासक और विद्वानों का संरक्षण करता भी था। उसने दानसागर नामक ग्रंथ की रचना भी की। एक अन्य ग्रंथ अदभुत सागर की रचना को प्रारम्भ किया लेकिन उसे पूरा नहीं कर पाया। बल्लाल सेन ने गौडेश्वार व निःशंकर की उपाधियां धारण की।.
4.लक्षमण सेन1178-1205ई.
यह बल्लालसेन का उतराधिकारी था। उसने प्राचीन राजधानी गौड़ के समीप अन्य राजधानी लक्ष्मणवती या लखनौत्ती की स्थापना पश्चिमी बंगाल में करवाई। उसका समकालीन गाहड़वाल शासक जयचंद्र था। लक्ष्मण सेन के दरबार में कई विद्वान कवि वास करते थे। जैसे गीत गोविंद के लेखक जयदेव,ब्राह्मण सर्वस्व के लेखक हलालयुध व पवनदूतम के लेखक धोयी रहते थे। 1202 ई.में मोहम्मद बिन बख्तियार खिलजी ने उसकी राजधानी पर आक्रमण अधिकार कर दिया था। लक्षमण सेन ने लक्ष्मण संवत का प्रचलन किया था। लक्षमण सेन की मृत्यु के बाद उसने 2 पुत्रो ने बंगाल पर अधिकार बनाए रखा
।5.विश्वरूप सेन 1206-1225ई.7.केशवसेन1225-1230ई.इन शासकों की विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं है।

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