Indian History reveal the Past

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गुरुवार, 4 अप्रैल 2024

कुकी विद्रोंह 1850-1919

 

kuki revolt

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम कुकी विद्रोह के मुख्य कारण कुकी जनजाति एवं इनकी धार्मिक सभ्यता संस्कृति तथा इनके तथा नागा जनजाति मध्य हुआ तात्कालिक जन विद्रोह था। इस विद्रोह के मुख्य कारण के बारे में जानेंगे। इसके साथ ही हम कुकी जनजाति के इतिहास तथा भारत में मणिपुर के अलावा अन्य क्षेत्रों में इनके विस्तार को जानेंगे।

विद्रोह के मुख्य नेता

कुकी विद्रोह तीन चरणों में हुआ।
प्रथम चरण का विद्रोह 1850 में त्रिपुरा में हुआ। विद्रोह का नेतृत्व प्रीक्षित और कीर्ति नामक दो कबीले के सदस्यों द्वारा किया गया। इस समय त्रिपुरा के राजा ईशानचंद्र मानकिय थे।

दूसरे चरण का विद्रोह 1860 से 1861 तक चला। विद्रोह के मुख्य नेता रतनपुइया नामक व्यक्ति थे। यह विद्रोह त्रिपुरा में हुआ इस समय भी त्रिपुरा के राजा ईशानचंद्र मानकिय थे।

तीसरे विद्रोह के मुख्य नेता नागा जनजाति के रोगमई जादोनांगक थे। इस विद्रोह का मुख्य लक्ष्य सामाजिक एकता लाना पुराने रीति रिवाजों के खतम करना प्राचीन धर्म को पुनः जीवित करना था। 1931 में जादोनांगक को फांसी दे दी गई। इसके बाद आंदोलन का नेतृत्व 17 वर्षीय नागा युवती ने गौडिनल्यू ने अपने हाथों में लिया। 1932 में इन्हे गिरफ्तार कर लिया गया इन्हे जेल से रिहा आज़ादी के बाद किया गया।

1917 से 1919 के विद्रोह के मुख्य नेता के रूप में गौडिनल्यू का नाम ही आता है क्योंकि वे जीवित थीं और जेल में थीं। यह एक निष्क्रिय प्रतिरोध का चरण था। क्यूंकि किसी नेता के बिना विद्रोह अधूरा था। मुख्य रूप से यह विद्रोह प्रथम विश्व युद्ध के दौरान फ्रांस के श्रमिक कोर में कुकी जनजाति की जबरन भर्ती को लेकर हुआ था।

करीब दो वर्षो के बाद विद्रोह को अंग्रेजों द्वारा दबा दिया जाता है। इस विद्रोह को पुस्तक द एंग्लो कुकी वॉर 1917-1919- A frontier uprising against imperialism during the first world war के अनुसार तीन चरण में विभाजित किया गया है। पहला 1917 मार्च-अक्टूबर का समय काल। दूसरा समय काल अक्टूबर 1917 जिसे शास्त्र प्रतिरोध की अवधि का काल कहा जाता है। तीसरा अप्रैल 1919 के आगे का समय जिसे समस्त मुकदमों और आपत्तियों की अवधि कहते है। कुकी जनजाति जिन्होंने पहले कभी नौकर शाही नियंत्रण के अधीन कार्य नही किया था। मगर अब अंग्रेजों ने उन्हें इसके लिए मजबूर किया।

कुकी जनजाति का इतिहास

बताया जाता है की कुकी समुदाय के लोग 18वीं शताब्दी में के अंत में और 19वी शताब्दी की शुरआत में म्यांमार से मणिपुर आए थे। कुछ लोग म्यांमार सीमा पर बसे तो कुछ लोग नागा समुदाय वाले गांवों में आकर बस गए। रिसोर्स इंडियन एक्सप्रेस न्यूज के अनूसार वे भारत के उत्तर पूर्वी भाग म्यांमार बर्मा और बांग्लादेश के कुछ हिस्सों में बसे एक जाति समुदाय को शामिल होते हैं। 

कूकी विद्रोह का एक जटिल इतिहास है जो कई दशकों को आवृत्त करता है और भूमि के अधिकार पहचान समस्याओं और उपनिवेशीय और पोस्ट-कोलोनियल प्रशासनों के साथ संघर्षों जैसे विभिन्न कारकों को शामिल करता है। विद्रोह की जड़ें 19वीं सदी में हैं जब भारत में ब्रिटिश उपनिवेशीक प्रशासन ने इन क्षेत्रों पर नियंत्रण बनाना शुरू किया।

ब्रिटिश अधिकार को समाप्त करने की कोशिश में कुकी समुदाय को बढ़ते दबाव का सामना करना पड़ा जिसके चलते उनकी आज़ादी सिमीत हो गई। जिसके चलते ब्रिटिश अधिकारीयों के खिलाफ विरोध अनियमित हो गया।

पहले विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिशस द्वारा कुकी समुदाय के लोगों को भारतीय सेना में श्रमिकों और सैनिकों के रूप में भर्ती किया। भूमि अलगाव आर्थिक शोषण और सांस्कृतिक दमन जैसी समस्याओं के कारण कुकी समुदाय में असंतोष बढ़ गया। यह असंतोष अंत में एक प्रमुख विद्रोह में परिणत हुआ जिसे 1917-1919 का
विद्रोह ही कुकी विद्रोह कहा जाता है।

विद्रोह को गौरिल्ला युद्ध और ब्रिटिश संस्थानों पर हमलों के द्वारा चिह्नित किया जाता था जिसमें कुकी सेनानियों ने बड़ी धैर्य और सैन्य कुशलता का प्रदर्शन दिया। हालांकि विद्रोह को आखिरकार हार का सामना करना पड़ा जिस के चलते कुकी जनजाति को भारी हानि हुई और विस्थापन प्रारम्भ हुआ। स्वतंत्रता के बाद काल में कुकी लोग भारत की निकटवर्ती देशों और भारत म्यांमार और बांग्लादेश की सरकारों के साथ विभिन्न चुनौतियों का सामना करते रहे हैं। स्वायत्तता भूमि के अधिकार और सांस्कृतिक संरक्षण के लिए लड़ाई लगातार जारी रही है।

कुकी सभ्यता एवं संस्कृति

कुकी लोग उत्तर पूर्वी भारत म्यांमार बर्मा और बांग्लादेश के कुछ हिस्सों में बसे हुए एक जनजाति समुदाय हैं। उन्हें एक अलग और सांस्कृतिक विशेषता के रूप में जाना जाता है और उनकी संस्कृति में उनकी प्राचीन परंपराओं का उल्लेख किया जाता है। वे अपनी भाषा साहित्य और रहन-सहन में विशेषता रखते हैं और जनजातीय समुदायों में भारतीय और तिब्बती श्रृंगार के लिए प्रसिद्ध हैं।

कुकी लोग अपने प्राचीन इतिहास और समाज पर गर्व करते हैं जिसमें उनकी समुदायिक संगठन परंपरागत उपज और धार्मिक अनुष्ठानों का महत्वपूर्ण स्थान है। वे अपनी जीवनशैली में पहाड़ी जंगली और अपनी विशेष संस्कृति के साथ प्रमुख रूप से जुड़े हैं। 

कुकी लोगों की संस्कृति में संगीत नृत्य और लोक कथाएँ भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। वे अपने परंपरागत संगीत जैसे कि Thadou और Guite संगीत के माध्यम से अपनी सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करते हैं। उनकी सामाजिक संगठन में गांवों में परंपरागत गाँव सरपंचों की महत्वपूर्ण भूमिका है जो अपने समुदाय के मामलों को स्यवं संभालते हैं।

कुकी लोग खासतौर पर पश्चिमी आदिवासी लोगों के साथ मिलकर अपनी परंपरागत वाणिज्य खेती और चिकित्सा प्रथाओं को बनाए रखते हैं। उनका समाज और संस्कृति में बड़े बदलाव के साथ-साथ उनकी भूमिकाओं में भी बदलाव आया है जो आधुनिकीकरण के साथ संबंधित हैं। लेकिन वे अपनी विरासत और परंपरागत मूल्यों को संरक्षित रखने की कड़ी प्रतिबद्धता रखते हैं।

कुकी समुदाय का धर्म

कुकी धर्म एक मिश्रित धर्म है जिसमें हिंदू और इसाई धर्म का प्रभाव शामिल हैं। बहुत से कुकी लोग हिंदू धर्म के अनुयायी हैं और उनके पास अपने खास पूजा और उत्सवों की परंपराएँ हैं। वे अपने गाँव के देवता और पूजा स्थलों को महत्व देते हैं। वे हिंदू धर्म के प्रभाव को भी महसूस करते हैं और कुछ कुकी लोग  इसाई धर्म के अनुयायी हैं और उनके पास अपने चर्च और पूजा की प्रथाएँ होती हैं। कुछ कुकी लोग भी अपनी परंपरागत धर्म की पूजा के लिए उपयुक्त धार्मिक गतिविधियों का पालन करते हैं।

कुकी लोगों के धार्मिक विश्वास में जीवन के विभिन्न पहलुओं को समेटा गया है जैसे कि जन्म मृत्यु विवाह और समुदायिक समारोहों को मनाना। धार्मिक ग्रंथों गानों और कथाओं के माध्यम से धार्मिक शिक्षा दी जाती है और समुदाय के विभिन्न सदस्यों को लोक प्रथाओ गानों और कहानियों के माध्यम से एक साथ लाया जाता है। यह धार्मिक अनुष्ठानों की एक अविच्छिन्न और महत्वपूर्ण भाग है जो कुकी समुदाय की एकता और विशेषता को बनाए रखने में मदद करता है।

विद्रोह का मुख्य कारण

कुकी विद्रोह का मुख्य कारण ब्रिटिश शासन के खिलाफ कुकी समुदाय की आर्थिक सामाजिक और सांस्कृतिक में असंतोष था। उन्हें भूमि के अलगाव आर्थिक शोषण और सांस्कृतिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ा जिसके कारण उनका विरोध उभरा। विद्रोह के दौरान वे अपने अधिकारों की रक्षा करने के लिए संघर्ष किया और ब्रिटिश सरकार के खिलाफ उठे।

इसके अलावा ब्रिटिश शासन द्वारा कुकी समुदाय के सांस्कृतिक और धार्मिक प्रथाओं पर प्रतिबंध लगाने ने भी उनका आक्रोश भड़काया। यह सभी कारण एक संघर्षपूर्ण विद्रोह की ओर ले गया जिसने कुकी समुदाय के ब्रिटिश सत्ताधारियों के खिलाफ उम्मीदें और आवाज़ उठाई।

आंग्लो-कुकी युद्ध

जिसे कुकी विद्रोह के रुप में भी जाना जाता है एक महत्वपूर्ण घटना थी जो ब्रिटिश शासन के समय उत्तर पूर्वी भारत में हुई। यह युद्ध कुकी लोगों के और ब्रिटिश सत्ताधारियों के बीच हुआ था। यह युद्ध विशेषत 1917 से 1919 के बीच हुआ था जब कुकी लोगों के बीच ब्रिटिश शासन के खिलाफ विरोध उभरा था। इस युद्ध के दौरान कई बड़ी और छोटी लड़ाईयां हुईं जिसे कई कुकी समुदाय की सेनाओं ने ब्रिटिश सेना के खिलाफ लड़ा।

युद्ध के बाद ब्रिटिश सरकार ने कठोर कार्रवाई की और कई कुकी लोगों को सज़ा दीं। युद्ध के दौरान कुकी सेनाओं ने गौरील्ला युद्ध और अविश्वसनीय युद्ध रणनीतियों का प्रदर्शन किया। यह युद्ध भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय रहा है जिसमें कुकी समुदाय की बहादुरी और संघर्ष दिखाया को गया हैं। युद्ध के परिणामस्वरूप कुकी विद्रोह को दबाया गया और ब्रिटिश सत्ताधारियों का शासन बरकरार रहा। इस युद्ध ने कुकी समुदाय के जीवन में बड़े परिवर्तन का कारण बना। जिसने उनकी समझ में राजनीतिक और सामाजिक जागरूकता को बढ़ाया।

विद्रोह का नतीजा

मणिपुर का पुनर्गठन 1919 में विद्रोह के समापन के बाद प्रशासनिक सुगमता की दृष्टि से मणिपुर राज्य को चार भागों में विभाजित कर दिया गया। ये इस प्रकार है 1इम्फाल 2 चुराचंदपुर 3 तमेंलोग 4उखरूल। इम्फाल चुराचंदपुर तमेंगलोग में कुकी जनजाति कबुई नागा एवं कत्था नागा जनजाति रहती हैं। वहीं अखरूल में कुकी एवं तंगकुल नागा जनजाति वास करती हैं।

2017-19 कुकी और नागा जनजाति विवाद

2017 में कुकी विद्रोह की घटना को याद करते हुए कुकी समुदाय द्वारा शताब्दी समारोह का आयोजन किया गया। कुकी विद्रोह को युद्ध के रूप में मानने को लेकर मैतेई और नागा समुदाय के लोग ने विरोध किया। बाद में विद्रोह ने विकराल रूप धारण कर लिया और नरसंघार की घटनाएं सामने आने लगी। सरकार द्वारा मणिपुर में धारा 144 लगाई गई और इंटरनेट सुविधाओ को बंद कर दिया गया।

बताते चले की विद्रोह का एक अन्य कारण मैतेई जनजाति का st category में रिजर्वेशन लिस्ट में आने मुद्दा भी है। दरअसल मैत्तेई जनजाति स्वयं को st category में पंजीकृत कराने को लेकर राज्य सरकार को कई बार याचिका डाल चुकी हैं जिसके चलते कई प्रोग्रामों का आयोजन भी किया था। 

जिसमें कूकी जनजाति ने विरोध किया की यह एक सम्पन्न जनजाति है अतः आरक्षण की st सूची शामिल करने से यह क्षेत्र के अन्य इलाकों में भी जमीनें खरीदने के हकदार हो जायेंगे जो कुकी समुदाय के लिए समस्या का विषय है कुकी समुदाय का कहना है कि यह पहले से ही सम्पन्न जनजाति हैं। मणिपुर में कुल 60 सीटे हैं जिनमें से 19 सीटे कुकी या अनूसुचीत जनजाति के लिए आरक्षित है जो की वर्तमान समय में खाली है। 

तथा अन्य 40 सीटो में से 39 सीटों पर नागा और मैतेई  जनजाति सत्ता में हैं। वे स्वयं को शुद्ध हिंदू मानते हैं। तथा कुकी जनजाति को म्यांमार से आई जनजाति मानते है यानी उन्हें भारतीय नही मानते। इसके साथ ही मैतेई जनजाति के लोग भारत के नए कानून  C.A.A  यानि Citizenship Amendment Act 2021 के तहत कार्यवाही करना चाहते हैं।

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