Indian History reveal the Past

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सोमवार, 7 सितंबर 2026

सुभास चंद्र बोस

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प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में देश के महान नेता तथा आज़ाद हिंद फौज के संस्थापक एवं तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा का नारा देने वाले महान क्रांतिकारी नेता सुभाष चंद्र बोस के बारे में चर्चा करेंगे। इसके साथ उनके द्वारा किए गए महत्वपूर्ण कार्य तथा उनके पूरे जीवन पर प्रकाश डालेंगे।

परिचय

उनका जन्म 23 जनवरी 1897 में कटक में बंगाली परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम प्रभाबती बोस दत्त और मां का नाम जानकीनाथ बोस था। वे कुल 13 भाई बहन थे में 9 सुभाष जी थे। कटक वर्तमान समय में उड़ीसा राज्य का हिस्सा है मगर 1897 के समय काल में यह ब्रिटिश भारत के बंगाल प्रेसीडेंसी का हिस्सा था। अपनी माता को प्यार से सुभाष चंद्र बोस मां जननी कहते थे। उनके पिता जानकीनाथ जी एक सफल सरकारी वकील थे जो कि ब्रिटिश भारत सरकार के प्रति वफादार और भाषा और कानून के अच्छे जानकार थे।

अपने दम पर सब कुछ हासिल करने की क्षमता रखने वाले उनके पिता ग्रामीण क्षेत्र से आते थे मगर शहर में अपने दम पर उन्होंने अपना घर बनाया था। अंत ग्रामीण क्षेत्र से आने के कारण जानकीनाथ जी अपनी जड़ों से जुड़े रहते थे। समय-समय पर छुट्टियां मिलने पर अपने गांव जाया करते थे।

शिक्षा

अपने 5 बड़े भाइयों के साथ सुभाष जी को जनवरी 1902 में कटक के बैपटिस्ट मिशन के प्रोटेस्टेंट यूरोपीय स्कूल में पढ़ने के लिए भेजा गया। स्कूल इंग्लिश माध्यम का था जहां हिन्दी को छोड़ सभी भाषाओं को पढ़ाया जाता था। खास बात यह थी कि स्कूल का चुनाव उनके पिता जी ने किया था वे चाहते थे कि उनके बेटे त्रुटि हीन क्रमबद्ध तरीके से अंग्रेज़ी बोलना सीखें। क्योंकि स्कूल में कोई भी भारतीय भाषा नहीं पढ़ाई जाती थी जिसके कारण भारत में अंग्रेज़ों तक पहुंचने के लिए अंग्रेजी बोलना सीखना जरूरी था।

इसके बाद 1909 में जब सुभाष 12 वर्ष के थे तब उनका दाखिला कटक के रेवेनशां कालेजिएट में हुआ। इस स्कूल में बंगाली और संस्कृत के साथ वेदों और उपनिषदों जैसे हिंदू धार्मिक ग्रंथों के ऐसे विचार भी पढ़ाए जाते थे जो कि खास तौर पर घर नहीं सिखाए जाते थे। पढ़ाई के दौरान वे अपनी मां को लंबे-लंबे पत्र लिखा करते थे जिसमें वे बंगाली रहस्यवादी रामकृष्ण परमहंस और उनके शिष्य स्वामी विवेकानंद के विचारों और बंकिम चंद्र चटर्जी के उपन्यास आनंद मठ से अपनी मां का परिचय कराते थे।

1912 में कलकत्ता विश्वविद्यालय के तत्वाधान में आयोजित मैट्रिक परीक्षा में दूसरा स्थान प्राप्त किया। 1913 में सुभाष अपने पांच भाइयों के साथ प्रेसिडंसी कालेज कलकत्ता गए जो बंगाल के सम्मानित कालेजों में से एक था। यहां उन्होंने दर्शन शास्त्र का अध्ययन किया जिसमें कांट हेगेल बर्गसन और अन्य पश्चिमी दार्शिन ग्रंथ को पढ़ा। 1914  में अपने धार्मिक गुरु की तलाश में घर से भाग गए थे जिसमें उन्होंने उत्तर कि यात्रा की मगर उन्हें अपने गुरु नहीं मिल पाये। हाल फिलहाल थक हार कर वे घर वापिस लौट आयें।

प्रोफेसर ई एफ ओटेन की घटना

फरवरी 1916 में उनका दाखिला प्रेसिडेंसी कालेज में हुआ जहां से उन्हें प्रोफेसर ई एफ ओटेन के पिटने के कारण निकाल दिया गया । इस घटना के दौरान छात्रों ने दावा किया कि घटना से पहले ओटेन ने भारतीय संस्कृति के बारे में अभद्र टिप्पणीयां करी थी जिसके दौरान उन्होंने कुछ छात्रों का धक्का दिया था। इस घटना के कुछ दिन बाद छात्रों ने प्रोफेसर को सीढ़ियों पर घेर लिया और उन्हें चप्पलों से पिटा और भाग गए। हलांकि घटना के दौरान प्रोफेसर ने उन्हें नहीं देखा था मगर कुछ छात्रों के बयान देने पर उन्हें कालेज से निकाल दिया गया।

परिवार के गुजारिश करने पर कलकत्ता विश्वविद्यालय क सिंडिकेट ने उन्हें वापिस लौटने दिया मगर दूसरे कालेज में इस प्रकार सुभाष जी का दाखिला स्काटिश चर्च कालेज में हुआ और इस प्रकार 1918 में दर्शनशास्त्र में प्रथम श्रेणी से बी.ए. की परीक्षा पास की और उपाधि धारण की। अपने पिता के आग्रह पर बोस साहब लंदन गए ICS की परीक्षा की तैयारी के लिए जिसे वर्तमान समय में IAS के नाम से जाना जाता है। इससे पहले बोस कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय क किसी कलेज में प्रवेश पाना चाहते थे।

मगर प्रवेश का समय समाप्त हो गया था जिसके चलते बोस ने कुछ भारतीय छात्रों और गैर कालेजिएट छात्रों की मदद से बोर्ड से सहायता करने को कहा। इस प्रकार बोर्ड में बिना औपचारिक प्रवेश के बोस को किफायती लागत पर शिक्षा देना प्रारम्भ कर दिया। बोस साहब ने 19 नवंबर 1919 तो विश्वविद्यालय में औपचारिक रुप से अपना नाम दर्ज करवाया। 1920 में आई सी एस की पहली प्रतियोगी परीक्षा को पास किया चौथे स्थान पर आकर मगर ऐतिहासिक फैसला लेते हुए अपनी आगे की परीक्षा नहीं दी।

राजनीतिक कार्य

अपनी शिक्षा पूर्ण करने के बाद सुभाष 16 जुलाई 1921 को सुबह और मुंबई पहुंचे और महात्मा गांधी से मिलने के प्रयासों में जूट गए इस समय 51 वर्षीय गांधी जी असहयोग आंदोलन में जुटे हुए थे और संयोग से गांधी जी मुंबई में ही थे और दोपहर के समय गांधी जी बोस से मिलने के लिए सहमत हो गये। ये मुलाकात कुछ नहीं रही क्योंकि बोस का मानना था कि गांधी जी के जवाब स्पष्ट थे उनके तथा गांधी जी के बीच साधनों को लेकर मतभेद था।

इसके बाद बंगाल में गांधी जी  ने बोस को राष्ट्रवाद  के नेता सी आर दास से मुलाकात करवाई। जो कि गांधी जी की तुलना में अधिक लचीले थे। दास ने ही बोस को राष्ट्रवादी राजनीति में उतारा। इसके बाद बोस ने 1922 में स्वराज अखबार की स्थापना की। 1923 में बोस को बोस भारतीय युवा कांग्रस के अध्यक्ष और बंगाल राज्य कांग्रेस के सचिव चुने गए। इसके चित्तरंजन दास ने उन्हें अपने अखबार फारवर्ड का संपादक बनाया था। इस प्रकार सुभाष चंद्र बोस भारतीय राजनीति का जाना माना चेहरा बन गए।

उनके द्वारा किए गए कार्य

आज़ाद हिंद फौज की स्थापना
1943 में सिंगापुर पहुंचकर नेता जी ने रास बिहारी बोस की मदद से आज़ादी हिंद फौज की स्थापना की उन्होंने भारतीय युद्धबंदियों और प्रवासी भारतीयों को एकजूट करके उन्हें एक अनुशासित सैन्य  बल में बदल दिया।

फारवर्ड ब्लाक की स्थापना
त्रिपुरी कांग्रेस के  बाद गांधी जी से वैचारिक मतभेदों के कारण कांग्रस के अध्यक्ष पद से इस्तिफा देकर उन्होंने काग्रेंस के भितर ही आल इंडिया फारवर्ड ब्लाक की गठन किया ताकि क्रांतिकारी और वामपंथी ताकतों को एकजुट किया जा सके।

रानी झांसी रेजिनेंट की स्थापना
यह एशिया की पहली महिला सैन्य टुकड़ी थी जिसकी स्थापना नेता जी ने कैप्टन लक्ष्मी सहगल के सहयोग से महिला सैन्य बटालियन बनाई।

अंडमान निकोबार की मुक्ति
जापानी सेना से अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का नियंत्रण प्राप्त करने के बाद नेता जी ने 30 दिसंबर 1943 को पोर्ट ब्लेयर में पहली बार तिरंगा फहराया और दोनों द्विप समूहों को शहीद और स्वराज्य नया नाम दिया।

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति
1941 में अंग्रेजों की नज़रबंदी से बच कर भागकर अफगानिस्तान जर्मनी और जापान की यात्रा करके विश्व नेताओं से भारत की आज़ादी के लिए सैन्य समर्थन हासिल किया।

उनका विचार और नारा

उन्होंने राष्ट्रीय नारे दिये जय हिंद, दिल्ली चलो और तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा इस प्रकार देशवासियों में स्वतंत्रता की नई ज्वाला जलायी।
योजना आयोग का विचार
1938 में कांग्रेस अध्यक्ष पद पर रहते हुए उन्होंने पण्डित जवाहर लाल नेहरु की अध्यक्षता में राष्ट्रीय नियोजन समिति की स्थापना की।

आज़ाद हिंद सरकार का गठन
21 अक्तूबर 1943 को सिंगापुर में भारत की पहली अनंतिम सरकार की स्थापना की। इस सरकार का अपना बैंक मुद्रा डाक टिकट और गुप्तचर तंत्र था जिसे जापान और जर्मनी समेत 9 देशों ने मान्यता दी।

मृत्यु

नेता जी सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु आज भी भारतीय इतिहास के सबसे बड़े रहस्यों में से एक मानी जाती है। अधिकारिक विवरण के अनुसार 18 अगस्त 1945 में सुभाष जी बैंकाक से कोक्यो जा रहे थे। ताइवान के ताइहोकू वर्तमान नाम ताइपे हवाई अड्डे से उड़ान भरने के कुछ ही देर बाद उनका विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया। अत्यधिक आग में झुलसने के कारण नेता जी गंभीर रुप से घायल हो गए जिसके कारण उनकी जान चली गई। उनके साथ आज़ाद हिन्द फौज के कर्नल हबीबुर रहमान ने इस हादसे की पुष्टि की थी।
मगर यह पूर्ण सच नहीं माना गया।

 खोसला आयोग 1970
1956 की शाहनाज समिति की रिपोर्ट तथा 1970 की खोसला आयोग की रिपोर्ट के अनुसार नेता जी की मौत ताइपे में हुई विमान दुर्घटना में हुई।

मुखर्जी आयोग
वर्ष 2005 में इस आयोग के द्वारा सौंपी गई रिपोर्ट के अनुसार नेता जी की मौत 18 अगस्त 1945 को ताइपे में विमान दुर्घटना में नहीं हुईं थी। खास बात यह है कि भारत स्वीकार ने इस रिपोर्ट को नहीं स्वीकार किया। भारत में व्यापक धारणा यह भी रही है कि वे साधु का भेष धारण कर उत्तर  प्रदेश के फैजाबाद में गुमनामी बाबा के रुप में जीवन बिता रहे थे।

वहीं कुछ लोगों का यह भी दावा है कि नेता जी विमान दुर्घटना से बच निकले और शरण के लिए सोवियत संघ चले गए थे।
वैसे आप को क्या लगता है कि वे कैसे मरे अगर कोई जानकारी हो तो जरुर साझा करें।

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