प्रस्तावना
प्रस्तुत लेख में भारतीय इतिहास के एक ऐसे सच से पर्दा उठाने जा रहे है जिसके बारे में आप सुनकर चौंक जायेंगे। इस विषय को जानना इस लिए भी जरुरी क्योंकि इसी के कारण भारत देश में शोषण का एक बड़ा सिलसिला जारी हुआ जो कि देश की आज़ादी के बाद ही समाप्त हुआ। आज हम भारत की विकराल दीवार जिसे हम ग्रेट वाल आफ इण्डिया के नाम से भी जानते के बारे में चर्चा करेंगे। वैसे आपने ग्रेट वाल आफ चीन के बारे में सुना होगा, इसके साथ ही राजस्थान के राजा महाराणा कुंभा द्वारा निर्माण कराई गयी दीवार के बारे में भी सुना होगा। जिसकी तुलना ग्रेट वाल आफ चाइना के साथ की जाती है। लेकिन यहां मामला थोड़ा अलग है। ये दीवार तो सुरक्षा के लिए बनाई गयी थी जो कि लगभग 26 किलोमिटर तक फैली थी। मगर आज हम जिस दीवार के बारे में बात करने जा रहे है वो लगभग 4000 किलो मीटर तक फैली थी।
इसके साथ ही इस दीवार का निर्माण किसी ईट या पत्थर से नहीं किया गया था बल्कि कटीली झड़ीयों से किया गया था। इसके साथ ही यह दीवार अंग्रेज़ों की शोषण कारी नीति का एक परिणाम थी। आज के इस लेख में हम इस दीवार के बनाने के पीछे के इतिहास तथा उन कंटीली झाड़ीयों के बारे में चर्चा करेंगे जो आज भी किसानों कि समस्या का मुख्य कारण है।
इतिहास
यह बात उस समय की है जब ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी का राज था। कम्पनी का ज्यादातर कमाई के मुख्य स्रोतों में नमक का नाम भी आता था। इस समय काल के दौरान नमक सोने से भी ज्यादा महँगा था।
कहानी की शुरुआत होती है रेम्बलैस एण्ड रिकलैक्शन आफ इण्डिया नामक किताब से जिसमें एक चौप्टर है ट्रांज़िस्ट ड्युटि इन इण्डिया जिसमें बताया गया कि हजारों मिल लम्बी एक दीवार भारत के नक्शे से गायब हो गई। यहीं से दीवार के बारे में चर्चा जोरों से शुरु हूई। इस किताब के लेखक का नाम मेजर जनरल एच डब्लू सुलेमन था जो 1869 के समय काल के दौरान ब्रिटिश सेना के एक अफसर थे।
इन्होंने अपनी इस किताब में बताया की 1757 प्लासी के लड़ाई के बाद से ईस्ट इण्डिया कम्पनी का शासन भारत में शुरु हो गया जो कि 1764 में बक्सर के युद्ध के बाद पुर्णतः स्थापित हो गया । 12 अगस्त 1765 को मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय और राबर्ट क्लाइव के बीच इलाहाबाद की संधि हुई जिसके तहत अंग्रजों को शाही मोहर प्रदान की गई। इस मोहर के चलते ईस्ट इण्डिया कम्पनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा में कर वसूलने का सरकारी अधिकार मिल गया। कम्पनी पहले से ही नमक के क्षेत्र में व्यापार कर ही रही थी मगर सरकारी मोहर के मिलते ही कम्पनी ने नमक के मनमाने दाम लेने प्रारम्भ कर दिये।
जिसके परिणाम स्वरूप कम्पनी ने 1784 से लेकर 1785 के समय काल में केवल नमक से 62 लाख रुपये का मुनाफा कमाया। बंगाल में टैक्स बहुत ज्यादा था वहीं राजस्थान में टैक्स बहुत कम था क्योंकि समुंदर राजस्थान के करीब था अतः नमक आसानी से उपलब्ध हो जाता था। इस दीवार को बनाने का मुख्य कारण यही था कि अगर सस्ता नमक आसानी से बंगाल पहुंच गया था तो ब्रिटीश अधिकारियों का करोड़ों का नुकसान हो जाता। बताते चलें कि इस दीवार का दुसरा नाम लैण्ड कस्टम लाईन था। शुरुआत में यह दीवार कुछ चुने हुए नाकों तथा चौंकी यों तक सिमीत थी
1834 जी एच स्मीथ ने इस दीवार को उत्तर पश्चिम तक फैलाया। 1869 तक यह लाइन हिमालय के तराई इलाकों से लेकर मद्रास प्रेसीडेंसी तक फैल चुकी थी। इतनी बड़ी दीवार की सुरक्षा करना अंग्रेजों के लिए एक समस्या का कारण बन गया। क्योंकि ईंट पत्थर की दीवार को बनाना और बार-बार मरम्मत करवाना महँगा पड़ रहा था और कांटेदार दीवारों को आसानी से काटा जा सकता था। जिसके चलते टैक्स की सुरक्षा के लिए कम्पनी को सेना को लगाना पड़ा लगभग 24000 सैनिकों तैनात किया गया। सेना के जवान 5 से 12 रुपये में 12 से 14 घण्टे दीवार की सुरक्षा करते । जो समय के साथ साथ कम्पनी को महँगा लगने लगा।
ऐलन एक्टिवियन हुमन allan octavian hume
यह वहीं व्यक्ति है जिन्होने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की थी 1867 में यह फिनलैण्ड में कस्टन कम्शिनर थे इसके साथ ही ये व्यक्ति वनस्पति विज्ञान के अच्छे ज्ञाता भी था। इसी व्यक्ति ने कम्पनी के सामने पत्थर और ईंट की जगह कंटीली झाड़ियों से दीवार बनाने का प्रस्ताव रखा ताकि लागत को भी कम किया जा सके और काम भी पूरा हो जायें। इनके सुझाव पर विदेशी बबूल, करोंदा और छुई-मुई की बड़ी प्रजाती के पौधों को बाहरी देश से भारत लाया गया।
इन पौधों के काटें इतने तेज़ थे कि कोई भी सुरक्षा कवच भी इनसे ज्यादा बढ़ीयां सुरक्षा नहीं बना सकता था। परिणामस्वरूप इस व्यक्ति के आदेश पर हजारों मिल लम्बी खाईंया खोदी गई और उपजाऊ मिट्टी डाली गयी तथा लाखों बीजों को बोया गया। 1874 को समय तक यह झाड़ीयां 8 से 12 फिट तक लम्बी हो गयीं। हियुंम ने अपने उच्च अधिकारी का सूचना देते हुए लिखा कि यह झाड़ीयां इतनी अभेदय है कि इन्हें इंसान तो क्या चूहा भी पार नहीं कर सकता।
इसके साथ ही सैनिकों की संख्या को भी घटा दिया गया बताते चले कि यहां ब्रिटीश सेना ने फुट डालों और राज करों कि नीति अपनाई थी क्योंकि दीवार कि देख रेख में जो सैनिक लगाये गये थे वे लगभग सभी मुसलमान थे तथा उन्हें अपने मूल निवास से 100 किलो मीटर की दूरी पर तैनात किया गया था। ताकि क्षेत्रीय लोगों के प्रति उनके मन में हमदर्दी की भावना न आ सके। इस दीवार और नमक व्यापार पे ही आधारित एक उपन्यास लिखा गया है जिसे महान लेखक मुंशी प्रेमचन्द द्वारा लिखा गया है। जिसका शीर्षक नमक का दरोगा है आपको यह उपन्यास एक बार जरुर पढ़ना चाहिए।
कटीली झाड़ीयों का इतिहास
बताते चले कि उस समय काल में लाई गई यह कटीली झाड़ीयां भारत में आज भी मौजूद है जो कि भारतीय उपजाऊ भूमि की उपजाऊ क्षमता को नुकसान पहुंचा रही है। ऐसे में हमें इन कटीली झाडीयों की पहचान करके इन्हें जड़ से समाप्त करने के प्रयास करने होंगे। हमारे श्रोताओं से निवेदन है कि अगर आप इन्हें अपने खेतों के अगल बगल देखें तो जड़ से निकाल कर जला दें।
विदेशी बबूल
इसे आमतौर पर विलायती किकर के नाम से भी जाना जाता है इस पौधे का वैज्ञानिक नाम Prosopis juliflora है। इसे भारत में दक्षिणी अमेरिका और मैक्सीको से भारत लाया गया है।
हानी
1.इस पौधे की जड़े जमीन के अंदर 50 से 60 मीटर अंदर तक चली जाती है जिसके कारण इन्हें जड़ से मिटाना मुश्किल हो जाता है।
2.यह पौधा एक दिन में 7 लीटर से अधिक पानी सोख जाता है यह अपने से 36 फिट दूर तक के क्षेत्र का पानी सोख जाता है। इसके साथ ही यह पौधा पानी की तलाश में जमीन के नीचे 160 फिट तक जाने में सक्षम है।
3.इसकी पत्तियां और जड़े एक खास प्रकार का कैमीकल छोड़ती है जिसके कारण इसके अगल बगल कोई अन्य पौधा या जंगली घास नहीं उग पाती। बताते चले कि अगर कोई जानवर इसे अगर अधिक मात्रा में खा ले तो उसके पेट में सुजन आ जाती है, इसके साथ ही जानवर के दांत झड़ सकते है गम्भीर परिणामों कि बात करें तो इससे जानवर की मौत भी हो सकती है।
mimosa pigra
यह पौधा मूल रुप से दक्षिणी और मध्य अमेरिका से लाया गया है यह दरअसल छुई -मुई पौधे का विक्राल रुप है इसके साथ ही यह छुई मुई के पौधे से थो़ड़ा अलग है। छोटी छुई मुई जमीन पर फैलने वाला एक छोटा पौधा है। मगर यह विशाल ,कांटेदार और बेहद आक्रामक पौधा होता है। इसकी लम्बाई 6 मीटर से 20 फीट की उंचाई तक हो सकती है। छुने पर इसकी भी पत्तीयां सिकुड़ जाती है।
हानी
1.यह दुनिया की 100 सबसे बड़ी आक्रामक झाडियों में से एक है। यह ज्यादातर नदी के किनारे , नहर के किनारे उगता है और तेज़ी से फैलता है जिसके कारण नदी स्रोत तथा दलदली इलाका इससे ढक जाता है। जानवर आदि पानी की तलाश में इसके फंदे में फस कर मर जाते है।
2.यह झाड़ी जहां उगती है उस जगह पर धूप सिधी जमीन पर नहीं आ पाती जिसके कारण स्थानीय वनस्पति समाप्त हो जाती है। नदियों और नहरों के किनारे अत्याधिक मात्रा फैलने के कारण ये पानी के बहाव के रोक देती है। इसके साथ ही इसके बीज पानी में गिरकर दूर दूर तक फैल जाते है।
3.यह पौधा 23 सालों तक जीवित रहता है। धान की खेती को यह अत्यधिक नुकसान पहुंचाता है।
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