9b45ec62875741f6af1713a0dcce3009 Indian History: reveal the Past

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मंगलवार, 26 मई 2026

अष्टांग हृदय

ashtanga hridaya

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम आयुर्वेद विज्ञान के सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ अष्टांग ह्रदय के बारे में चर्चा करने जा रहे है आयुर्वेद विज्ञान के इस ग्रंथ के साथ ही हम अन्य महत्वपूर्ण ग्रंथों के बारे में भी जानेंगे। इसके साथ ही हम जानेंगे इस ग्रंथ का इतिहास तथा इसे किन ग्रंथों की छाया प्रति के रुप में सरलीकरण करके प्रस्तुत किया गया है। 

दोस्तों यह विषय इसलिए भी महत्वपूर्ण क्योंकि हाल ही में हमने और आपने कफ़ सिरप कांड के बारे से सुना होगा जिसमें लगभग 150 से अधिक नवजात बच्चों कि जाने चली गयीं। हमारे कहने का मतलब यह है कि हम एक ऐसे देश में रहते है जहां मौतें होने के बाद पता चलता है कि हमें यह दवा नहीं खानी है। सोच कर देखें तो जिन छोटे बच्चों का हम जान से भी ज्यादा ख्याल करते है उनकी जान एक दवा खाने से जा रही है और ऐसा भारत जैसे देश में ही नहीं अमेरिका जैसे विकसित देशों में भी हो रहा कोविड 19 की दवा के दौरान भी ऐसा हो चुका है कम्पनी पर अमेरिकन कोर्ट द्वारा भारी जुर्माना भी लगाया गया था।

मगर सोचकर देखीए इन दवाओं से जिन लोगों की जानें गयी क्या वो लोट कर सकते है नहीं तो ऐसे में हमें खुद से अपने ओर अपने चाहने वालों ख्याल रखना होगा सरकार के भरोसे पड़े रहने से कुछ नहीं होने वाला। हम सलाह देते है आयुर्वेद को अपनाईये हम ऐसा नहीं कहते है आयुर्वेद के नुकसान नहीं है मगर इसका शरीर पर धीरे धीरे असर पड़ता है जिसके कारण जान का खतरा कम रहता है समय से इलाज हो सकता है। रासायनिक सब्जीयों का इस्तेमाल कम करें तथा आर्गेनिक फलों तथा सब्जियों को खाना प्रारम्भ करें और स्वास्थ्य रहें।

इतिहास

यह ग्रंथ आयुर्वेद विज्ञान का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और कालजयी ग्रंथ है । इसकी रचना महर्षि वाग्भट्ठ द्वारा छठवीं तथा सातवीं शताब्दी के मध्य कालीन समय में की गई थी। आयुर्वेद के इतिहास में इसे वृहतत्रयी यानी तीन महान ग्रंथ संहिता सुश्रुत संहिता चरक संहिता तथा एक अज्ञात तीसरे ग्रंथ को समा योजित कर एक मुख्य ग्रंथ का रुप दिया गया है । जिसके कारण इस ग्रंथ को वृहतत्रयी भी कहा जाता है। आयुर्वेद के इतिहास में अष्टांग हृदय का आना एक क्रांतिकारी मोड़ था। सबसे पहले इसे आयुर्वेद के दो मुख्य रुपों में बांटा गया। प्रथम आत्रेय सम्प्रदाय तथा धन्वन्तरि सम्प्रदाय।

आत्रेय सम्प्रदाय
यह काया चिकित्सा विज्ञान पर आधारित है जिसे हम जनरल मेडीसिन के नाम से भी जानते है। इसे चिकित्सा के प्रमुख ग्रंथ चरक संहिता से लिया गया है।

धन्वन्तरि सम्प्रदाय
यह शल्य तन्त्र  पर आधारित है जिसे हम सर्जरी पर आधारित भी मानते है इसे सुश्रुत संहिता से लिया गया है।

यह दोनों ग्रंथ बहुत विशाल थे जिसके कारण आम चिकित्सकों के लिए दोनों का संपूर्ण अध्ययन करना और इन्हें याद रखना काफी कठिन था। ऋषि वाग्भट ने इस समस्या को समझते हुए चरक संहिता की चिकित्सा और सुश्रुत संहिता की शल्यक्रिया के सर्वोत्तम ज्ञान को समेटकर , इसे सरल और काव्यात्मक रुप में पिरोया। उन्होंने आयुर्वेद के आठ अंगों का सार निकालकर इस ग्रंथ की रचना की जिसके कारण इसका नाम आष्टांग हृदय पड़ा।


एक महत्वपूर्ण ग्रंथ क्यों है

इस ग्रंथ में आयुर्वेद के सभी आठ विभागों का ज्ञान एक ही जगह मिल जाता है जिन्हें हम क्रमबद्ध तरीके से नीचे प्रस्तुत कर रहे है
1.काय चिकित्सा जिसे हम जनरल मेडिसिन के नाम भी जानते है
2.बाल चिकित्सा जिसे हम कौमारभृत्य या paediatrics के नाम से भी जानते है।
3.ग्रह चिकित्सा इसे हम भूत विद्या यानी psychiatry or Spiritual healing के नाम से भी जानते है ।
4.ऊध्वाग चिकित्सा यानी शालाक्य तन्त्र य ENT and Ophthalmology को नाम से भी जानते है।
5.दृंष्ट्राचिकित्सा य अगदतन्त्र अथवा Toxicology के नाम से भी जानते है।
6.जरा चिकित्सा य रसायन या Geriatics Rejuvenation के नाम से भी जानते है।
7.वृष्यचिकित्सा य वाजीकरण Aphrodisiac therapy नाम से भी जानते है।
8.शल्य चिकित्सा जिसे हम surgery के रुप में भी जानते हैं।


ग्रंथ की संरचना

इस ग्रंथ में कुल 6 भाग तथा 120 अध्याय है इसमें आयुर्वेद के मूल सिद्धांतों दिनचर्या ऋतुचर्या आहार विहार और रोगों के कारण बताए गए है।
1.सूत्र स्थान 
इसके अन्तर गत सिद्धांत दिनचर्या ऋतुचर्या आहार विहार और रोगों के बारे में अध्याय 30  में बताया गया है।
2.सूत्र स्थान
अध्याय 6 के अन्तर गत मानव शरीर की रचना ,गर्भधारण और भ्रूण के विकास के बारे में जानकारी दी गई है।
3.निदान स्थान
अध्याय 16 को अंतर्गत रोगों के लक्षण उनके कारण और बीमारियों की पहचान के तरीके बताए गए हैं।
4. चिकित्सा स्थान
अध्याय 22 के अंतर्गत विभिन्न बीमारियों के नुस्खे दिए गए हैं।
5.कल्प सिद्धि स्थान
अध्याय 66 के अंतर्गत पंचकर्म वमन विरेचन और औषधियों कको बनाने की विधि बताई गई है।
6.अत्तर स्थान
इसमें बाल रोग, आंख कान नाक के रोग मानसिक रोग और विष विज्ञान के बारे में तथा इनकी शाखाओं का विस्तृत वर्णन किया गया है।

ग्रंथ की भाषा सरल और काव्यात्मक होना

चरक और सुश्रुत संहिता गद्य prose यानी जटिल भाषा में थी लेकिन वाग्भट ने अष्टांग हृदयम् के श्लोकों में लिखा। अतः छंद में होने के कारण इसके सिद्धांतों और जड़ी-बूटियों के फार्मूला को याद रखना चिकित्सकों के लिए बेहद आसान हो गया।

सूत्र स्थान

शुरुआती अध्याय में आयुर्वेद जगत में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इसमें दिनचर्या यानी डेली रुटीन ऋतुचर्या यानी सिज़नल रुटीन  आहार विहार और रोगों के मूल कारणों को इतनी सटीकता से समझाया गया है कि यदि कोई सामान्य व्यक्ति भी इसका पालन करे तो वे जल्दी बीमार न पड़े।
व्यावहारिक और संक्षिप्त
वाग्भट जी वे पुराने ग्रंथों की अति विस्तृत और दार्शनिक बातों को हटाकर सीधे उपचार और चिकित्सा पर ध्यान केंद्रित किया है इस ग्रंथ में । इस ग्रंथ में दी गई दवाओं योग आज भी सबसे ज्यादा प्रभावी और आसानी से तैयार होने वाले माने जाते है।

वैश्विक स्वीकारता

अष्टांग हृदयम् का महत्व केवल भारत तक सीमित नहीं रहा है इसका प्राचीन काल में ही अनुवाद तिब्बती अरबी फारसी और जर्मन जैसी भाषाओं में हो चुका है। तिब्बती चिकित्सा पद्धति पर तो इस ग्रंथ का बहुत गहरा असर है।