प्रस्तुत लेख में हम वांडीवाश युद्ध के बारे में बात करने जा रहे है जो फ्रांस ईस्ट इंडिया कंपनी के पतन का मुख्य कारण बना। यह युद्ध तीसरे कर्नाटक युद्ध के दौरान हुआ। वांडीवाश का यह युद्ध दक्षिण भारत में एक निर्णायक सैन्य संघर्ष था भारत उप महाद्वीप में यूरोपीय शक्ति संतुलन को स्थायी रुप में बदल दिया। इस युद्ध के परिणामों के बाद ही पेरिस की संधि पूर्ण हुई। इस संधि में ज्यादा लाभ यूरोप को हुआ।
परिचय
22 जनवरी 1760 को लड़ा यह युद्ध ब्रिटिश और फ्रांस ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच वर्चस्व की लडाई थी। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की तरफ से सर आयर कूट ने नेतृत्व किया था वहीं फ्रांस ईस्ट इंडिया कंपनी का नेतृत्व कर्नल काम्टे डी लैली, काऊंट थामस आर्थर, बैरन डी टोलेड़ल ने किया था।
यह युद्ध कर्नाटक के तीसरे युद्ध का दौरान हुई घटना का हिस्सा था जो 1756 से 1763 तक लगभग 7 सालों तक चलता रहा। इस युद्ध के नामकरण की बात करें तो इसे भारतीय भाषा में वंद वासी कहा जाता था लेकिन ब्रिटिश अधिकारियों ने इसे वांडीवाश बना दिया। यह युद्ध तमिलनाडु के तिरुवन्नमलाई जिले के वंदवासी यानी वांडीवाश स्थान पर लड़ा गया था जो कोरोमंडल तट से करीब 5किलो मीटर दूर है।
इसे कर्नाटक युद्ध क्यों कहा जाता है
इसे कर्नाटक युद्ध इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह युद्ध 18वीं शताब्दी के ऐतिहासिक कर्नाटक क्षेत्र में लड़ा गया था। यहां नाम को लेकर भ्रम होना स्वाभाविक है क्योंकि 18वीं सदी के कर्नाटक और वर्तमान कर्नाटक राज्य दोनों बिल्कुल अलग है।
वर्तमान कर्नाटक राज्य
18वीं सदी में यह क्षेत्र मैसूर साम्राज्य के अंतर्गत आता था जिसके विभिन्न क्षेत्रों कई अन्य शासकों के द्वारा नियंत्रित किए जाते थे जैसे कि हैदर अली टीपू सुलतान फिर हैदराबाद के निजाम और मराठा साम्राज्य के अधीन था।
18वीं सदी में जहां यह युद्ध हुआ वह वर्तमान तमिलनाडु और दक्षिणी आंध्रा प्रदेश का तटीय इलाका कोरोमंडल तट था। प्राचीन कर्नाटक के अंतर्गत अर्काट चेन्नई पांडिचेरी वंदवासी और तिरुतिरापल्ली आते थे जो वर्तमान समय में भी तमिलनाडू का हिस्सा है।
नामकरण कि बात करें तो यह विजय नगर साम्राज्य का प्रभाव है मूल रुप से कर्नाटक शब्द दक्कन के पठार में रहने वाले कन्नड़ भाषी क्षेत्र के लिए इस्तेमाल होता था। खास बात यह है कि जब विजय नगर साम्राज्य का विस्तार पूर्व और दक्षिण में तमिलनाडु के मैदानों तक हुआ तो पठार के नीचे के इस इलाके को भी कर्नाटक कहा जाने लगा।
युद्ध की मुख्य घटना
दरअसल यह युद्ध सिर्फ वर्चस्व की लड़ाई थी जिसमें शोषण सिर्फ भारतीयों का ही हुआ था क्योंकि फ्रांसीस ईस्ट इंडिया कंपनी की तरफ से भी भारतीय लड़ रहे थे और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की तरफ से भी भारतीय ही अधिक मात्रा में लड़ रहे थे यानी जान भारतीयों की जाती और सत्ता दोनों ही और से ओर से कोई और चलाता।
19वीं सदी की किताब एनल्स आफ द एटीन सेंचुरी के अनुसार लेखक एडुआर्ड कास्ट लिखते है कि फ्रांसीसी सेना में 300 यूरोपीय घुड़सवार लगभग 2300 यूरोपीय सेना 1300 भारतीय सैनिक जवान और तीन हजार मराठा योद्धा और 16 तोपें शामिल थीं। जबकि ब्रिटिश सेना में 80 यूरोपीय घोड़े 250 भारतीय घोड़े 1950 यूरोपीय पैदल सेना और 2000 से अधिक भारतीय सेना के सिपाही एवं 26 तोपें शामिल थी।
युद्ध की शुरुआती घटना में फ्रांस ईस्ट इंडिया कंपनी का वांडीवास फोर्ट सेंट डेविड किले पर अधिकार था जिसे ब्रिटिश सैनिकों ने अपने नियंत्रण में ले लिया था जिसे पुनः प्राप्त करने के लिए फ्रांसीस सेना ने आक्रमण किया। इस युद्ध में फ्रांसिस सेना का साथ स्थानीय पोलीगारों और पिल्लई परिवार ने दिया लेकिन इनके समर्थन के बावजूद फ्रांस सेना को नौसैनिक सहायता और धन की कमी का सामना करना पड़ा।
बताया यह भी जाता है कि फ्रांस की ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में नस्लीय भेद-भाव होने के कारण आपसी मतभेद भी चल रहा था। क्योंकि इन्होंने सेना को वाई एण्ड ब्लैक यानी रंग भेद के आधार पर सुसज्जित किया था। इस युद्ध में शायद इन्हीं कारणों से फ्रांस ईस्ट इंडिया कंपनी की हार हुई।
युद्ध के परिणाम
लैली की सेनापति मार्किस डी बुसी को बंदी बना लिया गया इसके बाद फ्रांसीसी सेना पुडुचेरी तक ही सीमित रह गई, जिसने भारी संघर्ष के बाद 16 जनवरी 1761 को आत्मसमर्पण कर दिया। लैली को बाद में पेरिस में चले मुकदमे के चलते राजद्रोह का आरोप लगने के कारण कैद कर लिया गया औऱ फांसी दे दी गई।
1761 को समर्पण के बाद भारत में फ्रांसीसी स्थिति का पतन उन घटनाओं में से एक था जिसने फ्रांस को पेरिस संधि पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर किया जिससे भारत में फ्रांसीसी केवल व्यापारी बनकर रह गए और भारत देश में फ्रांसीसी साम्राज्य वादी महत्वाकांक्षाओं का प्रभावी रुप से अंत हो गया।
दूसरी ओर ब्रिटेन ने अन्य यूरोपीय शक्तियों पर भारत में अपनी सर्वोच्चता स्थापित कर ली। इस हार के बाद फ्रांसीसी अधिकृत क्षेत्र चेटपट्टू तिरुवन्नामलाई तिंडीवनम और पेरुमुक्कल आदि क्षेत्रों पर ब्रिटिशस का अधिकार स्थापित हुआ। इसके साथ ही फ्रांसीसी सेना ने जिंजी माहे और कराईकल सहित कई अन्य रणनीतिक केंद्र खो दिए।
फ्रांस ने पांडिचेरी और चंदन नगर को केवल व्यापार के लिए अपने पास रखा ये क्षेत्र भी उन्हें इस शर्त पर दिए गए थे कि वे न तो किले बंदी करेंगे और न ही सैनिक तैनात करेंगे।
1763 की पेरिस संधि
हालांकि यह संधि वांडीवाश के युद्ध के बाद नहीं की गई थी बल्कि तीसरे कर्नाटक युद्ध में मिली जीत के बाद हस्ताक्षरित की गई थी मगर इसके मुख्य तार वांडीवाश की ब्रिटिश जीत से आधारित थे य जुड़े थे। क्योंकि इसी सात वर्षीय कर्नाटक विद्रोह को ही अमेरिका में फ्रांसीसी और भारतीय युद्ध के नाम से जाना जाता है।
इस संधि पर हस्ताक्षर होने के साथ ही उत्तरी अमेरिका पर नियंत्रण को लेकर फ्रांस और ग्रेट ब्रिटेन के बीच का संघर्ष औपचारिक रुप से समाप्त हो गया और यूरोप से बाहर ब्रिटिश प्रभुत्व के एक नए युग की शुरूआत हुई। संधि के बाद ब्रिटेन और फ्रांस दोनों ने युद्ध के दौरान कब्जा किए गए अधिकांश क्षेत्र वापस कर दिए।
वहीं ब्रिटेन को उत्तरी अमेरिका में फ्रांस के कई क्षेत्र प्राप्त हुए। इसके अलावा ब्रिटेन ने भविष्य में रोमन कैथोलिक धर्म को समाप्त करने का प्रयास न करने पर सहमति दी। इस संधि में परशिया और आस्ट्रिया देश शामिल नहीं थे जिसके चलते इन्होंने पांच दिन बाद हयूबर्टसबर्ग की संधि पर हस्ताक्षर किया था।
इस 7 वर्षीय कर्नाटक युद्ध के बाद ब्रिटेन ने कनाडा ग्वाडेलूम सेंट लूसिया मार्टीनिक डोमिनिका कनाडा सेंट विसेंट औऱ ग्रेनाडाइन्स तथा टोबैगो की फ्रांसीसी उपनिवेशों चंदन नगर और पांडिचेरी सहित भारत में फ्रांसीसी कारखानों तथा व्यापारिक चौंकियों और गौरी दास का व्यापारिक केंद्र , सेनेगल नदी और उसकी बस्तियों, फिलीपींस के मनीला, क्यूबा के हवाना में स्पेनिश उपनिवेशों पर विजय प्राप्त की थी।
इसमें फ्रांस ने मिनोर्का और सुमात्रा में ब्रिटिश व्यापारिक चौंकियों पर कब्जा कर लिया था जब्कि स्पेन ने पुर्तगाल में अल्मेडा के सीमावर्ती किलों और दक्षिण अमेरिका में कोलोनिया डेल सैक्रामेंटों पर कब्जा कर लिया था।
यहां खास बात यह भी यह कि पेरिस संधि के बाद उत्तरी अमेरिका का एक नया नक्शा तैयार किया गया था। संधि के अधिकांश क्षेत्रों को उनके मूल स्वामी को वापस कर दिये गए थे लेकिन ब्रिटेन को काफी ज्यादा लाभ रखने की अनुमति दी गई।
निष्कर्ष
इसमें अंग्रेजों की निर्णायक जीत हुई 22 जनवरी 1676 में ब्रिटिश सेनापति सर आयर कूट ने फ्रांसीसी सेनापति सर काम्टे डी लाली को पराजित किया। जिससे फ्रांसीसी ठिकानों का पतन हुआ। वांडीवाश की हार के बाद 1761 में अंग्रेजों ने पांडिचेरी जिंजी और माहे पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया, जिससे भारत में फ्रांसीसी सैन्य शक्ति पूरी तरह ध्वस्त हो गई।
वांडीवाश का युद्ध पेरिस की संधि का पहला चरण था जिसे हम कर्नाटक के तीसरे युद्ध के अन्तर गत हुई एक घटना के रुम में जानते है यह यूरोप में चल रहे सप्त वर्षीय युद्ध का परिणाम था जिसके चलते इस सप्त वर्षीय युद्ध के अंत में पेरिस की संधि हुई। इस संधि के चलते अंग्रेजों ने पांजिचेरी और चंद्र नगर जैसे फ्रांसीसी क्षेत्रों को वापस तो कर दिया मगर उन पर कड़ी शर्तें थोपी गई।
फ्रांसीसीयों को अपने क्षेत्रों की किलाबंदी करने और वहां सैन्य बल रखने से स्थायी रुप से रोक दिया गया। फ्रासीसी ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत में सिर्फ व्यापारिक संस्था के रुप में काम करने की अनुमति मिली।
