प्रस्तावना
विदेशी देश सदैव हमें नीचा दिखाने की कोशिश करते रहें है। इसके लिए हम लोग भी कोई कसर नहीं छोड़ते क्योंकि जो लोग हमें मूर्ख बनाते है, उन्हीं लोगों को हम ज्यादा तवज्जो देते है। खुद के इतिहास को न जानकर अन्य विदेशी लोगो के द्वारा गढ़े इतिहास को ही सत्य मान बैठे है।ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि 11 से अधिक विदेशी आक्रमण हमारे देश पर हुए। काफी लम्बा हमारी गुलामी का कार्य काल रहा। जिसकी वजह से हमारे इतिहास को मिटाने अनेको प्रयास किए गए। क्योंकि जो भी विदेशी भारत आया उन्होंने स्वयं के कानून हम पर थोपे और हमारे पूर्वजों द्वारा की खोज को भी अपनी खोज बता कर प्रस्तुत किया। जैसे गुरुत्वाकर्षण बल की खोज को हमें बताया गया की सर आइजैक न्यूटन ने की। मगर यह पूर्ण सत्य नही है। आज हम इस ब्लॉग में सर्व प्रथम गुरुत्वाकर्षण बल के भारतीय खोज करता महर्षि कणाद के बारे में जानेंगे। तथा उन साक्ष्यों को देखेंगे जो ये प्रमाणित करते है कि सर्वप्रथम गुरुत्वाकर्षण बल की खोज भारत में हुई थी।
चर्चा का विषय क्यों है
2007 में इंग्लैंड की menchester university की ऑफिशियल वेबसाइट पर प्रकाशित यह लेख है जिसका शीर्षक ही यही था कि "newton was not discoverd gravity" लेख को मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर डॉ George G Joseph की सौंपी रिपोर्ट के अनुसार प्रकाशित किया गया है। डॉ George ने साक्ष्यों को प्रकाशित करते हुए यह दावा किया की करीब 1300 AD में भारतीय केरल राज्य के विद्यालयों में यह ज्ञान उपलब्ध था।मगर तब तक सर आईजैक न्यूटन का जन्म ही नहीं हुआ था। तो गुरुत्वाकर्षण बल के बारे में उन्हें जानकारी कहा से मिली? यानी यह बात साफ होती है कि गुरुत्वाकर्षण बल की खोज 1300 AD से पहले ही हो चुकी थी। ऐसा हो सकता है कि ब्रिटिश ऐरा में कृश्चान मिशनरी जब भारत आए तो उन्होंने यह जानकारी इकट्ठा की होगी। 25 दिसंबर 1642 में Sir Iseac Newton का जन्म होता है। और जब गुरुकुल समाप्त हुए तब भारत की खोज को ब्रिटिश या अंग्रेज़ों की खोज बता कर प्रथम खोज कर्ताओं को हटा दिया गया होगा।
वैशेषिक सूत्र
डॉo George ने बताया कि गुरुत्वाकर्षण बल के बारे वैशेषिक सूत्र के रचयिता महर्षि कणाद द्वारा 2 सदी से लेकर 6वी सदी के मध्य में लिखा गया। जिसके परिणाम स्वरूप केरल राज्य के साथ साथ भारत के अन्य कई क्षेत्रों में इस विषय के बारे में पढ़ाया गया होगा। वैशेषिक सूत्र सूत्र शैली में लिखा गया है। इसमें 370 सूत्र और 10 अध्याय है।सर्वप्रथम इस किताब को कन्नड़ भाषा में लिखा गया था। इसके साथ ही इस किताब के अन्य संस्करण भी उपलब्ध है। जैसे मोती चंद्र द्वारा रचित "पदार्थ शास्त्र" जो की संस्कृत में रचित है। इसके साथ ही इसका एक अन्य संस्करण युआन जुआंग द्वारा चीनी भाषा में भी किया गया है।
1.इच्छा शक्ति के कारण होने वाली घटना।
2.विषय वस्तु के संयोजन से होने घटना।
गुरुत्वाकर्षण बल की घटना विषय वस्तु के संयोजन से होने वाली घटना के अंतर्गत आती है।
जैसे: वस्तुओं के ज़मीन पर गिराना। आग का ऊपर की ओर बढ़ना। घास का ऊपर की ओर बढ़ना। वर्षा और तूफान की प्रकृति। तरल पदार्थों का प्रवाह दिशा की ओर गति। इसके साथ ही महर्षि कणाद ने इस अध्याय में मानव शरीर से जुड़ी क्रियाओं तथा मन से जुड़ी क्रियाओं के बारे विस्तृत रूप से चर्चा की हैं।
पांचवा अध्याय में की गई है चर्चा
वैशेषिक सूत्र के पांचवें अध्याय में गुरुत्वाकर्षण बल के बारे में चर्चा करते हुए महर्षि कणाद लिखते है कि घटनाए दो प्रकार की होती है।1.इच्छा शक्ति के कारण होने वाली घटना।
2.विषय वस्तु के संयोजन से होने घटना।
गुरुत्वाकर्षण बल की घटना विषय वस्तु के संयोजन से होने वाली घटना के अंतर्गत आती है।
जैसे: वस्तुओं के ज़मीन पर गिराना। आग का ऊपर की ओर बढ़ना। घास का ऊपर की ओर बढ़ना। वर्षा और तूफान की प्रकृति। तरल पदार्थों का प्रवाह दिशा की ओर गति। इसके साथ ही महर्षि कणाद ने इस अध्याय में मानव शरीर से जुड़ी क्रियाओं तथा मन से जुड़ी क्रियाओं के बारे विस्तृत रूप से चर्चा की हैं।
इसके साथ ही किताब में द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समन्वय नामक छः पदार्थों के बारे में वर्णन किया गया है। किताब में में प्रकृति वादी, परमाणु के उपयोग करके ब्रह्माण्ड के निर्माण और इसके अस्तित्व के बारे में अपने सिद्धांत दिए है। कणाद लिखते है कि "सृष्टि की सभी वस्तु परमाणु से बनी है। जो एक दूसरे से मिलकर अणु बनते है, अणु के संयोजन से परमाणु बनता है, परमाणु के संयोजन से भौतिक संसार का निर्माण होता है।
अनुभव की छः श्रेणी का वर्गीकरण
महर्षि कणाद ने अनुभव को छः भागो में वर्गीकृत करते हुए बताया की 1.पदार्थ 2.गतिविधी 3.विशिष्टता 4.गुणवत्ता 5.सामान्यता 6.अंतर्निहितता आदि है।महर्षि कणाद
वायु पुराण के अनुसार महर्षि कणाद का जन्म प्रभास पाटण बताया गया है। महर्षि कणाद को कश्यप ऋषि के नाम से भी जाना जाता है।.विद्वानों के अनुसार उनका जन्म बौद्ध धर्म के आगमन के पहले हुआ था।जिसके कारण वैशेषिक सूत्र किताब में बौद्ध धर्म का या बौद्ध धर्म के सिद्धांतों का कोई उल्लेख नहीं है।डॉ George Gheverghese Joseph
Docter जार्ज indo-African गणितयज्ञ है। इनका जन्म केरल में हुआ था। इन्होंने गणित के इतिहास में विशेष रूप से रिसर्च करी। 9 साल के उम्र में इनका परिवार मोंबासा केनिया चला गया। केनिया में इन्होंने प्रारंभिक शिक्षा हासिल की। अपनी गणित यज्ञ की डिग्री इन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ Leicester से ली। इसके साथ ही mechester यूनिवर्सिटी से master की डिग्री हासिल की। इन सभी डिग्रियों के अलावा mathemetical programming,demography,applied mathemeticsऔर statices में रिसर्च की। अपनी शोध के दौरान इन्होने ने पाया गणित की अनंत श्रृंखला का अविष्कार यूरोपीय लोगों ने नही बल्कि 1350 में केरल के गणितयज्ञ द्वारा किया गया था।तो इस प्रकार डॉक्टर जार्ज भी एक भारतीय ही है। ऐसे ही बोहत सी भारतीय खोजे है जिनके अस्तित्व को भारत के नक्शे से ही मिटा दिया गया। दोस्तों कोई भी वैज्ञानिक चाहे वो किसी भी देश से संबंधित हो अपने आप में किसी कोहिनूर हीरे से कम नहीं होता। हमें इनका सम्मान करना चाहिए और संरक्षण भी।
हाल ही के दिनों में हमे एक ऐसे भारतीय वैज्ञानिक के बारे में पता चला जिन्होंने पानी से चलने वाली कार बना कर दिखा दी। धर्म से वे मुसलमान थे मगर ये एक राजनीतिक दांव पेच की बाते है। मगर अगर आप भारत से है तो ये बात बहुत मायने रखती है। जिन्हेंं एक तरफ कहा जाता है हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई भाई-भाई वही धर्म के नाम पर कुछ लोग बड़ी राजनीति करते है। धर्म के नाम पर हिंसा भी करते है।
हाल ही के दिनों में हमे एक ऐसे भारतीय वैज्ञानिक के बारे में पता चला जिन्होंने पानी से चलने वाली कार बना कर दिखा दी। धर्म से वे मुसलमान थे मगर ये एक राजनीतिक दांव पेच की बाते है। मगर अगर आप भारत से है तो ये बात बहुत मायने रखती है। जिन्हेंं एक तरफ कहा जाता है हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई भाई-भाई वही धर्म के नाम पर कुछ लोग बड़ी राजनीति करते है। धर्म के नाम पर हिंसा भी करते है।
दोस्तों दरअसल ये वे लोग है जो उद्योग पतियों के लिए काम करते हैं। क्योंकि हमारे वैज्ञानिक की खोज से इनको बहुत घाटा होता है। चाहे वे भारतीय उद्योग पति हो या विदेशी इसलिए वे इनको विलुप्त करवा देते है यानी रिसर्च का अस्तित्व ही मिटा देते है। इस प्रकार हमारे भारतीय कोहिनूर (यानी भारतीय वैज्ञानिकों)को संरक्षण की जरूरत है। सरकार से ज्यादा भारतीय जनता को इनका संरक्षण करना होगा। शायद तभी हम एक विकसित देश की श्रेणी में आ सकते है।

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