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रविवार, 24 मई 2026

मेघनाथ साहा

meghnad saha

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में देश के महान वैज्ञानिक एवं क्रांतिकारी नेता मेंघनाथ साहा तथा उनके द्वारा की गई महत्वपूर्ण खोज के बारे में बताया गया है। ये वही वैज्ञानिक है जिनका नाम 6 नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया था मगर नोबेल पुरस्कार नहीं मिल पाया। कुछ लोग इस के पीछे के कारण उनका छोटी जात का होना मानते है। मगर कुछ विचारकों का मानना है कि इसके पीछे का कारण उनकी खोज के प्रमाणीकरण को सही न मानना था। इसके साथ ही हम इस लेख में उनके नाम पर बनी महत्वपूर्ण स्मारक स्थल के बारे में चर्चा करेंगे।

प्रारम्भिक जीवन 

उनका जन्म 6 अक्तूबर 1893 को शाओराटोली वर्तमान बंगला देश में हुआ था। अपने परिवार के निर्धन होने के बावजूद भी अपनी प्रतिभा के दम पर छात्र वृत्ति हासिल कर अपनी पढ़ाई जारी रखी। इसके साथ ही उन्होंने कलकत्ता प्रेसडेंसी कालेज से शिक्षा हासिल की और पढ़ाई। इनके मित्रों कि सूची में सत्येन्द्र नाथ बोस का नाम आता है। इनके प्रिय शिक्षक की सूची में जगदीश चन्द्र बोस तथ  प्रफुल्ल चन्द्र राय का नाम आता है।

इनके द्वारा किए गए कार्य

1.साहा समीकरण
1920 में इन्होंने साहा आयनीकरण समीकरण का प्रतिपाद किया। यह समीकरण खगोल भौतिकी के बुनियादी स्तंभों में से एक है। इसका महत्व समझें इस समीकरण की मदद से हमें पता चलता है कि किस तरह से किसी तारे जैसे सूर्य के अत्यधिक तापमान के कारण उसके तत्व किस तरह से आयनित यानि lonize होते हैं। इसके साथ ही इस समीकरण की मदद से वैज्ञानिक दूर स्थित तारों के तापमान, दबाव और वहां मौजूद तत्वों जैसे हाई़़ड्रोजन हीलियम की मात्रा का सटीक पता लगाने में सक्षम हुए। प्रसिद्ध खगोल शास्त्री नोरिस रसेल ने इसे गैलीलियो के बाद खगोल विज्ञान की सबसे बड़ी खोज बताया था।

2.साहा इंस्टीट्यूट आफ न्यूक्लियर फिजिक्स की स्थापना इनके द्वारा कलकत्ता में की गई जो कि परमाणु भौतिकी के रिसर्च का एक प्रमुख केंद्र बना। मेघनाद साहा केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रहे ,उन्होंने भारत में विज्ञान के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य किये।
3.इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अन्तर गत भौतिकी विभाग को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
4.विज्ञान के प्रचार एवं प्रसार तथा लोगों को विज्ञान के प्रति जागरूक करने के लिए इन्होंने साइंस एंड कल्चर पत्रिका की शुरुआत की।
5.वैज्ञानिक कार्य के साथ ही इन्होंने भारतीय सामाजिक कार्य तथा राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण कार्य किया। भारत में बाढ़ की समस्या के निपटने के लिए दामोदर घाटी परियोजना तथा भाखड़ा नांगल बांध परियोजना की रुप रेखा तैयार करने में अहम भूमिका निभाई।

6.राष्ट्रीय योजना सनिति की स्थापना
नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के आग्रह पर भारत के योजनाबद्ध विकास के लिए इस समिति का गठन में अहम भूमिका निभाई जिसके अध्यक्ष बाद में जवाहर लाल नेहरु जी बने।

7.कैलेंडर सुधार में अहम भूमिका निभाई इन्होंने शाक कैलंडर त्रुटि सुधार में महत्वपूर्ण कार्य किया।
8.वे एक ऐसे वैज्ञानिक थे जिनका मानना था कि वैज्ञानिकों की आवाज उठाने के लिए सांसद में एक सीट होने चाहिए जिसके चलते 1952 में उत्तर पश्चिम कलकत्ता सीट से एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रुप में भारी बहुमत से लोकसभा सांसद चुने गए।

निधन

16 फरवरी 1956 तो नई दिल्ली में योजना आयोग के दफ्तर जाते समय दिल का दौरा पड़ने के कारण उनका निधन हो गया। मेघनाथ साहा का जीवन इस बात का प्रतीक है कि कैसे एक व्यक्ति अभावों से उठकर न केवल वैश्विक विज्ञान को नई दिशा दे सकता है, बल्कि अपने देश के विकास में भी अद्वितीय योगदान दे सकता है। 

नोबेल पुरस्कार न का कारण

यह विज्ञान के इतिहास का सबसे बड़ा विवाद और अन्यायों में से एक माना जाता है। नोबेल पुरस्कार पाने के लिए किसी वैज्ञानिक का नाम आधिकारिक रुप से नामांकित किया जाना जरूरी होता है। मेघनाद साहा का नाम 1930 1937 1939 1940 1951 1955 में भौतिकी के नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया। लेकिन कुछ प्रमुख कारणों के चलते हुन्हें नोबेल पुरस्कार नहीं मिल पाया।

मूल्यांकन कर्ताओं की राय

नोबेल समिति के मुख्य मूल्यांकन कर्ता स्वीडिश भौतिक विज्ञानी कार्ल सीगबान थे। उनका मानना था कि साह कि खोज खगोलीय अनुप्रयोग है न कि शुद्ध भौतिकी मानने में थोड़ा संकीर्ण सोच रखती है। इसके साथ ही यह भी कहा गया कि उनकी खोज सैद्धांतिक है। उन्होंने गणित और भौतिकी के नियमों का उपयोग करके समीकरण दिया था। नोबेल समिति अक्सर उन खोजों को प्राथमिकता देती थी जिनका प्रयोगशाला में व्यावहारिक प्रदर्शन तुरंत हो चुका हो।

राजनीति और वैश्विक समीकरण

1920 से 1950 के बीच का समय काल विज्ञान की दूनिया पर यूरोपीय और अमेरिकी वैज्ञानिकों का वर्चस्व था। औपनिवेशिक भारत से आने वाले वैज्ञानिकों को वैश्विक मंच पर वह समर्थन नहीं मिल पाता था।

अन्य वैज्ञानिकों की प्राथमिकता

1930 के समय काल में जब साहा का नाम चर्चा में था तब क्वांटम मैकेनिक्स और न्यूक्लियर फिजिक्स में कई अन्य बड़ी खोजें जैसे न्यूट्रान की खोज और पाजिट्रान की खोज पर काम करने वाले वैज्ञानिकों की तरफ ज्यादा चला गया।

प्रसिद्ध वैज्ञानिकों की राय

नोबेल पुरस्कार न मिलने के बावजूद दुनिया के सर्वोत्तम वैज्ञानिकों ने उनके काम की सरहना की उनके काम को सर्वोच्च माना। ब्रिटीश खगोल शास्त्री सर आर्थर एडिंगटन और नोरेस रसेल जैसे दिग्गजों ने स्पष्ट कहा था कि खगोल भौतिकी में साहा का योगदान किसी भी नोबेल पुरस्कार से कही बढ़कर है। भारतीय विज्ञान जगत में उन्हें हमेशा एक ऐसे नायक के रुप में देखा जाता है जिसने सीमित संसाधनों में ब्राम्हांड के सबसे बड़े रहस्यों को सुलझाया।

रविवार, 4 जनवरी 2026

पानी की याददाश्त

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प्रस्तावना

हेलो दोस्तों प्रस्तुत लेख में हम बात करेंगे पानी की जैसे हमारी याददाश्त होती है ठीक उसी प्रकार पानी की भी याददाश्त होती है यह अपने आप में एक चौकाने  वाला रहस्य है इसे जानना हमारे लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हमारे दैनिक जीवन को  प्रभावित करता है क्योंकि मानव शरीर भी लगभग 75% पानी से ही बना है अतः जिस प्रकार का पानी हम पीते हैं वह हमारे शरीर और विचारधारा को प्रभावित करता है इस लेख के माध्यम से हम इस बात के तथ्यों के प्रमाणीकरण पर बात करेंगे।

Schizophrenia

एक मानसिक बीमारी है। जो किसी व्यक्ति के सुनने महसूस करने और व्यवहार करने के तरीकों को प्रभावित करती है। इस बीमारी के चलते मनुष्य वास्तविकता से दूर हो जाता है या उससे मतिभ्रम  हल्लुसीनेशन जैसी समस्याएं होती है।.खास बात यह है कि इसका कोई इलाज नहीं है। बस कुछ उपचार के तरीके जिससे इसे नियंत्रित किया जा सकता है। मतिभ्रम के अलावा इसके अन्य लक्षणों में डीस ऑर्गेनाइज्ड थिंकिंग अव्यवस्थित सोच एवं भाषण और डिसआर्गेनाइज्ड बिहेवियर यानी अव्यवस्थित व्यवहार या नकारात्मक लक्षण या भावनाओं  को न व्यक्त कर पाना है। इसके अंतर्गत ना बात कर पता है रुचि न ले पाना य प्रेरणा मोटिवेशन की कमियां भी आता है। 

कारण

इसके होने के मुख्य कारण है जिनमें ब्रेन केमिस्ट्री में असंतुलन और तनाव पूर्ण जीवन की घटनाएं इसके अलावा कुछ विज्ञानको ने इसे जेनेटिक डिसऑर्डर तथा पर्यावरणीय कारकों को भी शामिल किया है अब यहां पर्यावरणीय कारकों में मुख्य रूप से पानी की ओर इशारा किया गया है। समझिए धूप बरसात या सर्दी या आपदा संकट का हम एक निश्चित समय तक सामना करते हैं। 

ऐसी घटना में हमें आसपास में रहने वाले सहयोगियों का सहयोग मिलता है मगर पानी हमारे रोजाना के जीवन की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है और यह हमें इस प्रकार की बीमारियों से ग्रसित भी बन सकता है अगर हम शुद्ध पानी नहीं पीते यहां शुद्धता का मतलब साफ पानी से नहीं है बल्कि जिस बर्तन में उस पानी को पीते हैं जिस स्थान य जिस वस्तु या सामान के बगल में उस पानी को रखते से हैं।

 उसी प्रकार हमारा दिमाग भी पानी से भरा होता है और हमारी बातों एवं विचारों विचार जो हम  सोचते हैं उसे सुनता है अगर आप रोज नेगेटिव बातें बहुत सोचते हैं तो यह निश्चित रूप से आप वह काम नहीं कर पाएंगे लेकिन अगर आप पॉजिटिव बातें करते हैं किसी काम को लेकर  तो आपकी बॉडी कार्य करने की क्षमता और पॉजिटिव एनर्जी का विकास करती है।
 निम्नलिखित वैज्ञानिकों द्वारा किए गए कुछ महत्वपूर्ण शोध 

जैक्स बेनवेनिस्ट का शोध

यह फ्रांसिस इम्यूनो लोजिस्ट  immunologist है ।1988 में नेचर पत्रिका में इनका एक लेख प्रकाशित हुआ जिसमें उन्होंने बताया कि पानी एंटीबॉडीज की याददाश्त बनाए रखता है हालांकि इस लेख पर काफी विवाद हुआ बाद में इस प्रकार के प्रयोग को लैब या प्रयोगशाला में दोहराया नहीं गया शोध के मुख्य बिंदु कहते कि अपनी अपने संपर्क में आए पदार्थ की जानकारी या उसके गुणों को याद रखता है। 

मसरू इमोटो Masaru Emoto

यह एक जापानी शोध करता थे जिन्होंने अपनी शोध में क्रिस्टल पर विचार और भावना के प्रभाव का प्रयोग किया लेकिन उनके प्रयोग में वैज्ञानिकी कार्य प्रणाली की कमी थी जिस कारण उनकी भी खोज को वैज्ञानिक प्रमाणित नहीं माना गया इस रिसर्च पर छपी उनकी किताब  the hidden message in water 2004 my best seller thi अमेरिका में।

उन्होंने पानी पर दो प्रकार की शोध है किये पहले शोध में उन्होंने क्रिस्टल वाटर को यानी पानी को जमा कर उनके अगल-बगल कुछ संगीत या शब्दों का प्रयोग करके उन में बनने वाली आकृतियों पर रिसर्च की।
खराब आकृति वाले रिसर्च में पता लगा कि अगर उनके सामने गलत शब्द का प्रयोग या फिर गलत चीज बोली जा रही है तो हमें गलत आकृतियां बन रही है वहीं अगर सुरीले संगीत मधुर बातों या अच्छी बातों का उजागर किया जा रहा है तो अच्छे क्रिस्टल बने।

दूसरे शोध में तीन जार को लिया गया जिनमें कुछ चावल रखे गए और उन्हें पानी से भर दिया गया इसके बाद तीनों जार को एक महीने तक एक कमरे में रखा गया। मसारू  इमिटो रोजाना तीनों जार के पास रोजाना जाते पहले जाकर पास जाकर अच्छी बातें कहते हैं । दूसरे जार के पास जाकर उसे नजर अंदाज करते और तीसरे जार के पास जाकर उसे भला बुरा कह कर चले आते यह प्रक्रिया क्या लगातार 30 दिनों तक की गई उसके बाद परिणाम कुछ इस प्रकार है कि पहले जार के चावल अच्छे फूल गए और उन्हें फफूंद भी नहीं लगी थी दूसरे जार के चावल जो कि ना तो सड़े ना ही प्रॉपर तरीके से फूल मतलब प्रक्रिया धीरे हो गई। तीसरी जार के चावल सड़ गए।.

उनके रिसर्च का मुख्य मकसद

मसरी मोटा के पानी के प्रयोग का परिचय देते हुए बताया कि पानी पर सकारात्मक और नकारात्मक शब्द विचार और भावनाओं का असर पड़ता है यह मोटो का मानना था कि पानी एक मौलिक और सार्वजनिक पदार्थ है जो मानवीय भावनाओं और इरादों से गहराई से प्रभावित होता है मसारु एमिटो का मानना था कि पानी को पराबैंगनी प्रकाश या कुछ विद्युत चुंबकीय तरंगों के संपर्क में ला कर बदलावों को पूरी तरह ठीक किया जा सकता है।

भारतीय समाज से इसका संबंध

प्राचीन काल में तमाम मौलाना बाबा साधु या जब किसी व्यक्ति की तबीयत खराब होती थी या कोई जादू करना होता था तो उसे पानी को फूंक कर देते थे उसे समय हमें लगता था कि यह अंधविश्वास है मगर असल में यह एक वैज्ञानिक तरीका था इलाज की खास बात यह थी कि यह पानी असर भी करता था।
भारतीय समाज में पानी को रखने से लेकर पीने तक के त कुछ नियम बनाए गए थे पुराने जमाने में पीने के पानी को पहले तांबे के बर्तन में 10 से 12 घंटे तक छोड़ दिया जाता था उसके बाद उस पानी को पिया जाता था ऐसा करने से तांबा पानी के साथ अभिक्रिया करके उसे आयुर्वेदिक औषधि बना देता था और उसमें मौजूद विषैला कण सतह पर बैठ जाते थे।

भारतीय समाज में पुराने जमाने में हर प्रातः काल पानी वाले बर्तन को इमली से मजा जाता था उसके बाद थोड़ी  विभूति और थोड़ा कुमकुम लगाकर पानी वाली बर्तन की पूजा की जाती थी। 
भारतीय समाज ने शुद्ध पानी के लिए बहुत सी लड़ाइयां भी लड़ी जैसे 20 मार्च 1927 में बी आर अंबेडकर ने महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में जमादार तालाब पर पानी पीने का अधिकार अछूत को दिलाया हालांकि अधिकतर अछूतों की मिला मगर थे वे भारतीय ही।.सोर्स मीडिया लैंड नेटवर्क और दैनिक जागरण

शनिवार, 8 नवंबर 2025

मोहम्मद रईस मारकानी

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प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम भारत के एक कार मकैनिक एवं वैज्ञानिक मोहम्मद रईस के बारे में बात करने जा रहे है वे चर्चा में इसलिए है क्योंकि हाल ही में उन्होंने एक नये प्रकार के कार इंजन का अविष्कार किया जोकि पानी से चलता है। यानि अब कार पानी से भी चल सकती है।. हांलकि इस विषय पर पहले भी रिसर्च हो चुकी थी जैसे कि स्टीम इंजन के द्वारा कार आदि को चलना मगर इस प्रकार के इंजन में समस्या यह थी कि यह अत्याधिक गर्म होते थे ,जिसके कारण लम्बे समय तक चलना या लम्बी यात्रा करना इससे सम्भव नही था।. अतः मोहम्मद रईस की यह खोज एक महत्वरुर्ण कदम साबित हो सकती है।.

मोहम्मद रईस कौन हैं

मोहम्मद रईस मकरानी मध्य प्रदेश के एक कार वैज्ञानिक है जिन्होंने लगभग पांच साल मेहनत करके के इस प्रकार के इंजन का अविष्कार किया। यह एक ऐसी खोज है जिसने पुरी दुनिया को चौंका दिया है। इस प्रकार की खोज से देशी ही नही विदेशी उद्योगपतियों कि होश उड़ा दियें है। मोहम्मद रईस के बारे में बात करे तो 2016 के उनके वायरल विडीयो के बाद से उनके बारे में कोई खबर ,समाचार पत्र य किसी न्युज़ चैनल य किसी सोशल मिडीया प्लेटफार्म पर कोई खबर नही है।.मो.रईस मकरानी ने अपनी इस तकनीक का पेटेंट भी करा रखा है जि एक अच्छी बात है। आपको बताते चले कि उनकी यह तकनीक चीन भी अपनाना चाहता था मगर मो.रईस मकरानी ने शर्त रखी की कार बनाने कि फैक्ट्री उनके होम टाउन यानि मध्य प्रदेश में सर्वप्रथम लगायी जायेगी।
मगर चाईना ने यह शर्त रखी की वे उनके प्रोजक्ट मे तभी निवेश करेंगे जब कम्पनी चीन में लगाई जायेगी। दुसरी तरफ हमारी भारत सरकार ने भी स्वयं उनके इस प्रोजक्ट पर कोई ध्यान नही दिया। जिसके कुछ प्रमुख कारण है जिसके बारे में हम आगे के भाग में बात करेंगे।.

पानी ईधन के रुप में प्रयोग

दरअसल पानी ईधन नही है ,बल्कि पानी की जगह ,पानी और कैल्शियम कार्बाइट के रियेक्शन निकलने वाली एसटीलिन गैस ईधन है। हांलकि इसे ईधन के रुप में प्रयोग करने के लिए कार इंजन में कुछ बदलाव करने पड़ते है जिसके बाद आप इस गैस को आसानी से इस्तेमाल कर सकते है। जो कि एक मैकेनिक व्यक्ति आसानी से कर सकता है। इसके लाभ के बारे में बात करे तो 1.एसिटिलीन गैस का प्रयोग करने से ईधन खर्च लगभग दो रुपये प्रति किलोमीटर पड़ता है ,जोकि अपने आप में एक कमाल की बात है। 2.इसके साथ ही यह पर्यावरण के अनुकूल है यानि इससे पर्यावरण प्रदूषण न के बराबर होता है।.
रासायनिक अभिक्रिया देखें तो-
पानी (H2o)जब कैल्शियम कर्बाइट(cac2) के साथ अभिक्रिया करता है तो एसटिलीन गैस (c2H2)बनती है जो कि ज्वलनशील होती है। जिसका प्रयोग ईधन के रुप में किया जा सकता है।.

सरकार की लापरवाही का कारण

1.सरकारी तथा गैर सरकारी कम्पनी का ढ़ेर सारा निवेश
कम्पनीयां अपनी रोजगार को ज्यादा समयावधि के लिए जारी रखने को लिए दस साल से लेकर बीस साल तक का समझौता करते है ताकि एक ही दाम पर वे कच्चामाल सालों साल खरीद सके और महंगे दामों में बेच सके। अतः इसके लिए समझौते के अनुसार एक बार में ही बड़ी रकम जमा करनी होती है जो कि करोड़ों में हो सकती है। यहां हम कुछ सरकारी एवं गैर कम्पनीयों एवं उनके मार्केट कैप के बारे में बात करने जा रहे ताकि आप अन्दाज़ा लगा सके। 1.OIL 77करोड़ 2. MRPL 27करोड़ 3.HPCL 83करोड़ 4.LNG 51करोड़ 5.GAIL 1 लाख 27करोड़ यह सब तो सरकारी कंपनी है इसके अलावा नायरा,जीयो बीपी,के पर्न आयल एण्ड गैस आदि है जो पेट्रोलियम में निवेश करती है।.
2.अचानक या तत्कालीन प्रभाव
किसी भी तकनीक तत्कालीन प्रभाव से अपनाना का कठिन कार्य है क्योंकि कम्पनीयाों को अपनी मैन्युफैक्चरींग तकनीक में बदलाव लाना होता है जो की धीरे धीरे सालो के प्रयास से ही सम्भव हो पाता है।.
3.विदेशी राजनीतिक दबाव
जैसा की हम जानते है कि भारत में पेट्रोल विदेश से निर्यात किया जाता है ,जिनमें दो पर्टियों के बीच समझौता किया जाता है जो कि पांच साल ,दस साल य उससे ज्यादा का हो सकता है। अब समझीये की हर देशी -विदेशी कम्पनी अपनी सरकार एवं अर्थव्यवस्था में अपनी अहम भूमिका निभाती हैं। अतः पहला कारण तो यह होता है कि अचनाक से किसी कम्पनी से समझौता तोड़ना य किसी नयी तकनीक में तत्तकालीन प्रभाव से निवेश करना सम्भव नहीं है, इससे कम्पनी के व्यापार कि छवि पर गलत असर पड़ सकता है। दुसरा कारण विदेशी देश अपने से छोटे देशों को इन्हीं कम्पनीयो के समझौतों की मदत से शौषण करते है, जिसके कारण से प्रशासनिक और राजनीतिक दबाव बढ़ता है।

वैज्ञानिकों को हमारा सुझाव

1.देखीये कोई भी खोज एक खजाने की तरह होती है। इसे कब, कहां ,कौन , कैसे कर दे कुछ कहा नहीं जा सकता है। मगर इस खजाने को सहेज पाना सबके बस कि बात नहीं है । भारत में अभी भी ऐसी कम्पनीयां एवं सरकारे नहीं बन पायी हैं जो कि तत्काल में किसी तकनीक में निवेश कर सकें।
2.दोस्तों आप माने या न माने लेकिन हर खोज कि शुरुआत एक गलती से य एक घटना से होती है। जिसे देख कर वैज्ञानिक के दिमाग में ढेर सारी सम्भावनाये उठती है। जो आगे चलकर एक खोज का रुप ले लेती है।.अब ऐसे में 5 साल कि विदेशी शिक्षा का टैग लेकर घुमने वाले लोग यह मानने को तैयार ही हो पाते है कि , कोई हाईस्कूल पास व्यक्ति किसी इनोवेशन य तकनीक की खोज कर सकता है। इसे वो अपनी बेईज्जती के रुप में लेते है। हांलकि सब एक जैसे नहीं होते।.
3. अपनी खोज को कई भागों में विभाजित करके रखे, ताकि ज़रुरत पड़ने पर आप ही उसका इस्तेमाल कर सकें।.
4.अपनी क्षमता को परखे, निवेश करने से पहले अपनी चल-अचल सम्पत्ति का विवरण ले य विचार करें तथा उसका तीस प्रतीशत हिस्सा ही निवेश करें।.
5. बाहरी लोंगो पर अपनी निर्भरता कम रखें तथा अगर सम्पत्ति का अभाव है तो सम्पत्ति को जोड़ें ।. अगर निवेश में अधिक समय लग रहा है तो अपनी आने वाली पिढ़ी को वे सौंपे मगर परखने के बाद क्योंकि हर कोई अपकी खोज की कद्र नहीं कर सकता ।
6.अच्छे ओर भरोसे मंद लोगों की टीम बनाये।
7.अतः उपरोक्त सभी कार्यों को करने बाद अपनी खोज का खुलासा करें।
हम भी चाहते है्ं कि आपको आपकी मेहनत का पुरा क्रेडीट मिले ,ये आपका हक है।
सोर्स-युट्यूब,विकीपिडीया,Indiatv.in

रविवार, 19 अक्टूबर 2025

डाक्टर वासुदेवन

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प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम भारतीय इंजीनियर एवं वैज्ञानिक डाक्टर राजगोपालन वासुदेवन के बारे में चर्चा करेंगे । 2018 में उन्हें भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म श्री से सम्मानित किया गया। इसके अलावा उन्हें तामिलनाडु सरकार की संस्था प्लास्टिक मैन्यफैक्चर्स एसोसिएशन कि तरफ से टैपमैन पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया है । इसके साथ ही उन्हे रोटरी क्लब आफ तिरुनगर की तरफ से सर्वश्रेष्ठ व्यवसायिक पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया है ।  इन्होंने प्लास्टिक वेस्ट का इस्तेमाल सड़कों के निर्माण करके ,भारत देश को प्रगति के मार्ग पर अग्रसर किया है । जैसा कि हम लोग जानते हैं कि आये दिन प्लास्टिक वेस्ट पुरी दुनिया के लिए एक समस्या का कारण बनता जा रहा है चुंकि इसे रिसाइकल करना बहुत ही कठिन कार्य है । अतः यह पर्यावरण प्रदूषण का मुख्य कारक है जिसके निपटा रण के लिए हर देश प्रयास कर रहा है । ऐसे में उनकी यह पहल एक अहम कदम साबित हो रही है । उनके इस प्रयोग के चलते सड़क निर्माण की लागत में  तथा सड़कों के  रखरखाव में भारी कमी आयी है । सरकार द्वारा उनकी तकनीक अपनाते होये 11 राज्यों में सड़कों का निर्माण भी किया जा चुका है।

प्रारम्भिक जीवन एवं शिक्षा

1965 से 1967 के समय काल में उन्होंने मद्रास विश्वविद्यालय से विज्ञान विषय से स्नातक एवं एम.एसी की शिक्षा एवं पी.एचडी की उपाधि ग्रहण की। 1995 में त्याग राज कालेज आफ इंजीनियरिंग में प्रवक्ता के रुप में अपना करियर प्रारम्भ किया। 1998 में वे इसी कालेज के प्रोफेसर बन गये। इन्हें प्लास्टिक मैन आफ इण्डिया के नाम से भी जाना जाता है।. इनका पुरा नाम राजगोपालन वासुदेवन है। अपनी रिसर्च के दौरान इन्होने पाया की प्लास्टिक और बिटुमेन दोनों ही पेट्रोलियम से निकलने वाले उत्पाद है और दोनों ही ज्वलनशील भी है अतः इन्होंने दोनो के मिलान से एक टिकाऊ और मजबूत पदार्थ का निर्माण किया जिसका प्रयोग वर्तमान समय में सड़क निर्माण में किया जाता है। 
शुरुआती समय में सड़क निर्माण के लिए छोटे छोटे पत्थरो में बिटुमेन तथा अन्य सामग्री का मिश्रण किया जाता था ।  सर्दियों के मौसम में बिटुमेन सिकूड़ कर मजबूत हो जाता था जोकि अच्छी बात थी. लेकिन गर्मीयों के मौसम में पिघलने लगता था जिसके कारण भारी वाहन के आने जाने से सड़के टूट जाती थीं। परिणामस्वरूप सालों साल इनकी मरम्मत का कार्य चलता रहता था। जिसमें समय और लागत दोनों का नुकसान होता था।.

बिटूमेन

इसे डामर भी कहते है इसके अलावा इसे चौवा य राल जैसे शब्दों से भी संम्बोधित किया जाता है। सरल भाषा में बात कि जाये तो यह एक पेट्रोलियम का अर्ध ठोस ,चिपचिपा और काला पदार्थ है जिसका प्रयोग सड़कों तथा छतों की वाटरप्रुफिंग के य नमी रोधी परते बनाने ,हवाईअड्डो के फुटपाथ निर्माण में किया जाता है । इसके साथ ही इसका प्रयोग इमारतो की नीव में तथा लकड़ी को सड़ने से बचाने के लिए किया जाता है।. नदीयों के किनारों पर खड़ी नाव में आप इसे देख सकते है ।.

प्लास्टोन

यह प्लास्टिक का डामर होता है जिसका प्रयोग बाहरी जगहों अथवा सिमेंट ब्लाकों के स्थान पर किया जाता है।.

प्लास्टिक मैन आफ इण़्डिया 

डाक्टर वासुदेवन को प्लास्टिक मैन आफ इण़्डिया के नाम से भी जाना जाता है । उनके द्वारा किये गये कुछ महत्वपुर्ण कार्य निम्नलिखित है।.

  1. विभाग आवधि कार्य
  2. चेन्नई निगम 14/07/2002 सड़क निर्माण के लिए अपशिष्ठ प्लास्टिक
  3. चेपम्मा द्वारा आयोजित संगोष्ठी नेपाल 15/11/2002 सड़क निर्माण के लिए अपशिष्ठ प्लास्टिक
  4. एनावायरो भारतीय उद्योग परिसंघ 15/12/2002 सड़क निर्माण के लिए अपशिष्ठ प्लास्टिक
  5. तूतीकोरिन पोर्ट ट्रस्ट       05/12/2002 सड़क निर्माण के लिए अपशिष्ठ प्लास्टिक
  6. राजमार्ग अनुसंधान केन्द्र 11/12/2002 सड़क निर्माण के लिए अपशिष्ठ प्लास्टिक
  7. फिक्की मुंबई द्वारा अपशिष्ठ प्रबंधन पर 
  8. राष्ट्रीय संगोष्ठी       26/02/2003  सड़क निर्माण के लिए अपशिष्ठ प्लास्टिक
  9. आई पी एफ कोलकत्ता 20/08/2004 सड़क निर्माण के लिए अपशिष्ठ प्लास्टिक
  10. सी पी आई मुंबई कोर्प 08/10/2004 सड़क निर्माण के लिए अपशिष्ठ प्लास्टिक
  11. सी आई आई और आई आई टी चेन्नई 26/07/2004 सड़क निर्माण के लिए अपशिष्ठ प्लास्टिक

आगे की राह 


दोस्तो देखा जाये तो प्लास्टिक का इस्तेमाल वर्तमान समय पर काफी जोरो से हो रहा है सरकार चाह कर भी इस पर रोक नहीं लगा सकती क्योंकि ज्यादातर पेट्रोल रिफाइनरी सरकार द्वारा ही की जाता है जैसे कि भारत पेट्रोलियम,आयल इण्डिया लिमिटेड,गेल,एस.आर.पी.एल,एल.एन.जी इसके आलावा कुछ निजी कम्पनीयां भी है तो कचरे के तौर पर पाया जाने वाला ये प्लास्टिक प्योरिफाई करके मार्केट में बिकने के लिए भेज दिया जाता है जिससे इनका प्रयोग मोबाइल डिवाइस,पोलीथीन बनाने,सस्ते किस्म के घरेलु समान बनाने तथा रोजमर्रा के समानो की पेकेजिंग के लिए किया जाता है। इस प्रकार हम किसी न किसी बहाने 10 प्रतिशत प्लास्टिक रोज खाते हैं चाहे वो नमकीन चिप्स का पैकेट हो य किसी सोफ्ट या कोल्ड ड्रिंग का बोतल।.अभी भी अपको यकीन नहीं हो रहा होगा तो बताते चले कि एक निश्चत तापमान से अधिक तापमान होने पर प्लास्टिक पिघलने लगता है और हमारे खाने पिने की वस्तुओं में मिल जाता है । दोस्तों प्लास्टिक के प्रयोग से कैंसर जैसी जानलेवा बिमारियां होती है ।. तो कृप्या करके अपने और अपनों चाहने वालों कि सुरक्षा के लिए प्लास्टिक का प्रयोग कम से कम करें।.

मंगलवार, 30 सितंबर 2025

Bharos

 
bharos

परिचय

प्रस्तुत लेख हमारी historyindia वेब पेज टेक सेक्शन का महात्वपुर्ण भाग है। इस लेख के अंतर्गत भारतीय तथा अन्य देशों के महत्वपूर्ण ओपरेटिंग सिस्टम के बारे में बात करेंगे। इसके साथ वर्तमान समय तथा भविष्य में आने वाले नये बदलावों एवं प्रगति के बारे में भी बात करेंगे।

लेख का महत्वपूर्ण बिंदू

जैसा की हम जानते है कि पुरी दूनिया में एन्ड्रौड़ और आई.ओ.एस का बोलबाला है । जोकि अमेरिका की दो महत्वपु्र्ण कम्पनीयां है , दोनों ही कम्पनीयां स्मार्टफोन जगत में अपना एक उच्च स्थान ग्रहण किये हुए है इसमें कोई शक नहीं है। लेकिन आपके य किसी प्रतिव्यक्ति के डाटा सुरक्षा की बात आती है तो दोनों कम्पनीयां खरी नही उतरतीं। हालाँकि डाटा सुरक्षा को भंग य खतम करने को लेकर विदेशी एप्प य एप्लीकेशन की भी अहम भूमिका निभातीं है । मगर किसी एप्लीकेशन को हम अपने फोन या लेपटोप से आसानी से हटा सकते है मगर ओपरेटिंग सिस्टम को हटाने का अप्शन अभी भी हमारे पास नहीं है।.

अतः जिस प्रकार द्वितीय विश्व युद्ध के समय परमाणु बम बनाने की होड़ सभी देशों में लगी हुई थी । ठीक उसी प्रकार वर्तमान समय में स्वदेशी operating system बनाने की होड़ सभी देशों में लगी पड़ी है। जो कि समय ,सुरक्षा  और गोपनीयता के लिए ज़रुरी भी है। जिसकी सबसे पहले पहल चीन ने अपना Harmony OS बना कर की।. जिसके चलते उसे अमेरिका की तरफ से कई जोखिम भी उठाने पड़े। इसके बारे में  हम आगे बात करेंगे ,इससे पहले हम इस ओपरेटिंग सिस्टम की खुबीयों के बारे में बात करेंगे।

यह पुरी तरह से एन्ड्रोयड के ओप सोर्स प्रोजक्ट का हिस्सा है लेकिन गुगल कि किसी भी सेवा से सम्बन्धित नही है । इसमें से गुगल के प्लेस्टोर एवं प्ले सर्विस को पुरी तरह से हटाने के साथ एन्ड्रोयड की सभी प्री इस्टाल एप्प को भी हटा दिया गया है । जिसके कारण यह ओपरेंटिग सिस्टम गोपनियता और सुरक्षा के मामले में एपल ओर गुगल कम्पनी को  मात देता नजर आ रहा है। इस ओरेटिंग सिस्टम के चलते चीन की अमेरिका पर निर्भर रहने संभावनाओं में गिरावट आयी है जो कि चीन के लिए एक अच्छी बात है।. लेकिन अमेरिका  के लिए बुरी खबर थी जिसके चलते अमेरिका गुस्से में है क्योंकि चीन ने उसकी मोनोपलि तो़ड़ने का काम किया है । अतः अमेरिका ने अपनी तनाशाही कायम रखने के लिए चीन पर ढेर सारे प्रतिबन्ध एवं कर में बढ़ोतरी की है वर्तमान के कुछ वर्षों में , जोकि उसके तानाशाही रवैये को दर्शाता है हालांकि भारत पर भी इसी वर्ष विदेशी निर्यात कर में 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी की गयी है क्योंकि चीन का लगभग 38 प्रतिशत  मार्केट भारत में ही है। इस तरह से भारत चीन कि अर्थव्यवस्था में अहम भूमिका निभाता है। इसके आलावा और अन्य भी कारण हो सकते है।

हांलकि भारत ने भी ए.ओ.एस.पी आधारित स्वदेशी भार ओ.एस बनाया है । लेकिन वर्तमान समय में इस ओ.एस सम्बन्धित किसी समार्टफोन के लान्च होने कि पुष्टि नहीं हो पायी है। इसके पिछे भी एक महत्वपुर्ण वजह है , जिस कारण से भारतीय इंजीनियर में डर का माहौल है, जिसके बारे में आगे के लेख में आपको  पता चलेगा।.

हारमोनी ओ.एस

यह चीन का स्वदेशी ओ.एस है जिसे चीन की हुआवे कम्पनी ने बनाया है ।. जिसको बनाने के बाद से ही चीन और अमेरिका में तनाव का माहौल है। इस ओ.एस को बनने के बाद अमेरिकी सरकार तथा गुगल ने मिलकर हुआवे कम्पनी पर ढेर सारे प्रतिबन्ध लगा दिये। जिसके चलते हुआवे अपनी डिवाइस को चीन को छोड़कर किसी अन्य देश में नहीं बेच सकती । इसके साथ ही हुआवे की सब ब्रांड कम्पनी हानर का एन्ड्रायड लाइसेन्स रद्द कर दिया गया। जिसके कारण हानर कम्पनी रातोंरात मार्केट से गायब हो गई। अतः परिणामस्वरूप हुआवे को भारी नुकसान उठाना पड़ा। अगर सही समय पर चीन की सरकार हुआवे का समर्थन न करती तो वह पूर्णतः बर्बाद हो गयी होती। हालंकि इस घटना के कुछ समय बाद हानर कम्पनी को पुनः लाईसेन्स जारी किया गया। लेकिन हुआवे ने हानर पर विशेष ध्यान न देकर अपने हारमोनी ओ.एस पर ज्यादा ध्यान देना जारी रखा। 

म्युरेना ओ.एस

यह एक यूरोपियन कम्पनी द्वारा गुगल की साझेदारी के साथ लांच किया गया है । जहां तक हमारी जानकारी के अनुसार यह भी ए.ओ.एस.पी प्रोजक्ट का ही हिस्सा है , इसमें से भी प्ले स्टोर ओर प्ले सर्विस को हटा दिया गया।.लेकिन इन सब के बावजूद भी इसे पुरा सपोर्ट प्रदान किया जा रहा है । म्युरेना ओ.एस मार्केट में सेमसंग की एस सिरीज़ तथा पिक्सल सिरीज़ की यूरोपियन डिवाइस में मार्केट में देखने को मिल रहा है। इसके आलावा कन्पनी ने फेयरफोन नाम की स्मार्टफोन कम्पनी से साझेदारी की है ।.

फेयरफोन

यह भी एक यूरोप की ही कम्पनी है जो कि दूनिया का पहला समार्ट फोन मार्केट में लेकर आये है, जो अपने ग्राहकों को एक साल की अपेक्षा 5 साल की वारन्टी  देता है । इसके साथ ही यह दूनिया का पहला फोन होगा जो अपने ग्राहकों के अपनी इच्छा अनुसार ओपरेटिंग सिस्टम की चूनने की आजादी देता है।.फोन के साथ अगर आप एन्ड्रोयड को चुनते है तो आपको 8 साल का ओ. एस. अपडेट मिलता है, वहीं अगर आप म्युरेना ओ,एस को चुनते है तो कम्पनी आप को 5 साल का ओ. एस. अपडेट प्रदान करती है । यह खास इस लिए भी है क्योंकि गुगल के पिक्सल फोन के साथ जाने पर आपको 7 साल के ही ओ. एस. अपडेट मिलते है। एक खास बात ओर बता दें अपको यह कोल्कोम के प्रोक्सेसर 7 जेन 2 के साथ मार्केट में उतारा गया है। जिससे आप ओवर हिटिंग कि समस्या से सुरक्षित रह सकते है।.

भारत देश के लिए आगे कि राह

भारतीय इंजीनियर को भी अपने भार ओ.एस को मार्केट में लाना चाहिए । माना कि कम्पनी को कुछ हद तक जोखिम उठाना पड़ सकता है । लेकिन मार्केट में मौजूद डिवाइस पर ओपशन के तौर इसे इस्तेमाल करने का मौका देना चाहिए। ताकि युज़र इक्सपीरिंस को धिरे धिरे बढ़िया किया जा सके। शुरुआत में इ्से वही लोग इस्तेमाल करेंगे जो अपने डाटा को लेकर ज्यादा सेंसटिव है । इस पहल के चलते भारत स्वयं पर अमेरिका की निर्भरता को कम कर सकता है ।

वैसे वर्तमान समय में बहोत सी कम्पनीयां मेड इन इंडिया के नाम पर भारतीयों को मुर्ख बना ही रही है । भले ही उनके पार्ट किसी भी देश से आये मगर असेम्बलींग को मेड इन इंडिया का नाम देना तो गलत ही है। हम यह भी मानकर चलते है कि भार ओ.एस को मार्केट में लाने से उत्पादकों को ज्यादा लाभ नहीं होगा,मगर देश की सूरक्षा के लिए यह एक अहम कदम हो सकता है । धीरे-धीरे लोग इस पर स्विच करना प्रारम्भ कर ही देंगे।.

अन्य महत्वुपुर्ण लिंक

शनिवार, 15 फ़रवरी 2025

Quantum Ai

quantum-ai

प्रस्तावना

 प्रस्तुत लेख में हम क्वांटम कम्प्युटिंग में कृत्रिम बुद्दिमत्ता के प्रयोग तथा इससे होने वाले लाभ तथा भविष्य में इसकी मदत से हमारे जीवन मे होने वाले लाभ और परिवर्तन के बारे में जानेंगे। (QAI) क्वांटम कंप्यूटिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के मिलन से बना है, जो लगभग हर उद्योग को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित कर सकता है। QAI मौजूदा AI प्रणालियों की क्षमताओं को बढ़ाने के लिए क्वांटम कंप्यूटिंग का उपयोग कर रहा है।

  QAI कैसे काम करता है

क्वांटम कंप्यूटर क्वांटम मैकेनिक्स के सिद्धांतों पर आधारित हैं, जिससे वे पारंपरिक कंप्यूटरों की तुलना में कुछ प्रकार की समस्याओं को तेज़ी से हल कर सकते हैं।

   मशीन लर्निंग मॉडल, कॉम्बिनेटरिक्स चुनौतियों का समाधान करने का प्रयास करते हैं, जिसमें कई चर और जटिल गणनाएँ शामिल होती हैं।

    पारंपरिक कंप्यूटरों पर AI का उपयोग करके इन समस्याओं को हल करने में बहुत समय लगता है, लेकिन क्वांटम कंप्यूटरों के साथ AI मॉडल का उपयोग करके ऐसी समस्याओं को सेकंडों में हल किया जा सकता है।

    क्वांटम कंप्यूटर बड़े डेटासेट में पैटर्न भी ढूंढ सकते हैं, जो पारंपरिक कंप्यूटर नहीं कर सकते, और वे अधूरे या करप्ट डेटा से निपटने के लिए बेहतर ढंग से लैस हैं।

  QAI के फायदे 

  • मार्गदर्शन और स्वायत्त प्रणाली -   QAI मार्ग निर्धारण या नेविगेशन के बेहतरीन रास्ते सुझा सकता है और स्वायत्त प्रणालियों में सुधार ला सकता है।
  •  दवा और चिकित्सा -   यह दवाओं की खोज को आगे बढ़ा सकता है, चिकित्सा और उपचार में सुधार कर सकता है।
  •  आपूर्ति श्रृंखला अनुकूलन -   QAI आपूर्ति श्रृंखला से जुड़े जटिल निर्णयों को अनुकूलित कर सकता है।
  •  वित्तीय अनुप्रयोग -   QAI जोखिम मूल्यांकन, धोखाधड़ी का पता लगाने, पोर्टफोलियो प्रबंधन और ऑप्शन प्राइसिंग जैसे कार्यों को अधिकतम रूप से अनुकूलित कर सकता है। शेयर बाज़ार के बर्ताव की सटीक भविष्यवाणी के लिए क्वांटम न्यूरल नेटवर्क मॉडल विकसित किए जा चुके हैं।
  • सुरक्षित संचार -   क्वांटम नेटवर्किंग व्यक्तिगत कणों के भौतिक हस्तांतरण के बिना क्वांटम अवस्थाओं को स्थानांतरित करने के लिये क्वांटम टेलीपोर्टेशन का लाभ उठा सकती है, सुरक्षित संचार को पुनर्परिभाषित कर सकती है और संभावित रूप से ‘क्वांटम इंटरनेट’ का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।

हालाँकि, QAI अभी भी विकास के अधीन है, इसलिए इसे व्यवहारिक रूप से अपनाने में तकनीकी प्रगति, विनियमों और उद्योग की निवेश करने की इच्छा पर निर्भर करता है।

क्वांटम कंप्यूटर के अन्य फायदे हैं, जिनमें शामिल हैं -

     गति और कार्य क्षमता -   क्वांटम कंप्यूटर क्लासिकल कंप्यूटर की तुलना में बहुत तेजी से गणना करते हैं, जिससे जटिल एल्गोरिदम का तेजी से निष्पादन संभव होता है।. यह कंप्यूटर एक ही समय में अधिक डेटा को समझ और गणना कर सकता है।. क्वांटम कंप्यूटरों में क्यूबिट्स का उपयोग किया जाता है, जो एक ही समय में 0 और 1 दोनों स्थितियों में हो सकते हैं, जिससे उन्हें सामान्य कंप्यूटरों की तुलना में अधिक गणनात्मक शक्ति मिलती है।.

      महत्वपुर्ण जानकारी को सुरक्षीत सहायक -   क्वांटम एआई इंजिनियरिंग  क्रिप्टोग्राफी डेटा को अविश्वसनीय रूप से सुरक्षित बना सकती है।. क्वांटम कंप्यूटर उन्नत एन्क्रिप्शन और क्वांटम क्रिप्टोग्राफी से उच्च गोपनीयता और डेटा सुरक्षा प्रदान करते हैं, जिससे संवेदनशील जानकारी को अनधिकृत पहुंच से बचाया जा सकता है।.

      आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का विकास -   क्वांटम कंप्यूटर का उपयोग भविष्य में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (कृत्रिम बुद्धि) के विकास के लिए किया जाएगा।. क्वांटम कंप्यूटरों की तेजी से गणना करने की क्षमता AI और मशीन लर्निंग के क्षेत्र में तथा समय यात्रा य भविष्य में नयी तकनीक के विकास में अहम भूमिका निभा सकता है।.

  1. समस्या को सुलझाना -   क्वांटम कंप्यूटर जटिल गणितीय गणनाओं, अनुकूलन और सिमुलेशन को हल करने में उत्कृष्ट है और वैज्ञानिक अनुसंधान और नवाचार के लिए नए रास्ते खोलता है।.
  2. सर्च इंजन में सुधार -   क्वांटम कंप्यूटिंग सर्च इंजन एल्गोरिदम में क्रांति लाने, अधिक सटीक और प्रासंगिक खोज परिणाम (Search Result) प्रदान करने और उपयोगकर्ता अनुभव को बेहतर बनाने में सक्षम है।.
  3. जलवायु मॉडलिंग -   क्वांटम कंप्यूटिंग जलवायु मॉडलिंग सिमुलेशन की परिशुद्धता और गति को बढ़ा सकती है, जिससे जलवायु परिवर्तन से संबंधित चुनौतियों को बेहतर ढंग से समझा और संबोधित किया जा सकता है।.
  4. वैज्ञानिक खोज -   क्वांटम-AI अभिसरण में बड़े डेटासेट को अधिक कुशलता से संभालने और विश्लेषण कर वैज्ञानिक खोज में तेजी लाने की क्षमता है।.
  5. अन्य -   क्वांटम कंप्यूटर का उपयोग दवा उद्योगों में कठिन रासायनिक गणनाओं को करने, यातायात अनुकूलन प्रणालियों को विकसित करने और साइबर हमलों से बचने के लिए किया जा सकता है।. क्वांटम कंप्यूटिंग से सामग्री विज्ञान, दवा खोज, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और क्वांटम संचार में खोज को सक्षम किया जा सकता है।. क्वांटम कंप्यूटर त्वरित कम्प्यूटेशनल गति प्रदान करते हैं, जिससे जल्द निर्णय लेने, बाज़ार में कम समय में पहुँचने और विभिन्न उद्योगों में उत्पादकता में वृद्धि होती है।.
  6. वर्तमान में क्वांटम एआई (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) का इस्तेमाल कई क्षेत्रों में हो रहा है -

      वित्तीय बाजार -   क्वांटम एआई का उपयोग जोखिम मूल्यांकन और धोखाधड़ी का पता लगाने, पोर्टफोलियो प्रबंधन और ऑप्शन प्राइसिंग में किया जा रहा है।. यह शेयर बाजार के बर्ताव की सटीक भविष्यवाणी के लिए क्वांटम न्यूरल नेटवर्क मॉडल विकसित करने में भी मदद करता है।.

      स्वास्थ्य सेवा -   क्वांटम कंप्यूटिंग अणुओं की पारस्परिक क्रियाओं की नकल करके दवा की खोज में तेजी ला सकती है और मेडिकल इमेजिंग में क्रांति ला सकती है।. यह बीमारियों की भविष्यवाणी और व्यक्तिगत ज़रूरतों के हिसाब से इलाज की विधि तैयार करने के लिए मशीन लर्निंग एल्गोरिदम को बढ़ा सकता है।.

      रसद और आपूर्ति श्रृंखला -   क्वांटम एआई माल ढुलाई के लिए रास्ते की योजना बनाने, गोदाम प्रबंधन और भंडार अनुकूलन को बेहतर बना सकता है, जिससे तेज और किफायती डिलीवरी हो सकेगी।. यह रुकावटों की भविष्यवाणी कर सकता है और संचालन को सुव्यवस्थित कर सकता है।.

      नेविगेशन -   क्वांटम कंप्यूटिंग जीपीएस (GPS) सटीकता को बढ़ा सकती है, जिससे चुनौतीपूर्ण वातावरणों में सटीक स्थिति बनाने की क़वायद को सक्षम किया जा सकता है।. क्वांटम एआई एल्गोरिदम वास्तविक समय में रास्तों से जुड़ी गणनाओं को अनुकूलित कर सकता है, जिससे यातायात प्रवाह में सुधार होगा और भीड़भाड़ कम होगी।.

      पर्यावरण -   क्वांटम एआई जटिल जलवायु परिदृश्यों के मॉडल तैयार कर सकता है और इकोलॉजी पर उनके प्रभावों की अधिक सटीक भविष्यवाणी कर सकता है]।. यह कुशल ऊर्जा उत्पादन और भंडारण के लिए अनोखी सामग्रियों की खोज का कारण बन सकता है।.

      सुरक्षा -   क्वांटम एआई उपकरण स्वायत्त हथियार और ड्रोन जैसे मोबाइल प्लेटफॉर्म प्रदान कर सकते हैं।. इनमें जीपीएस की सहायता से वंचित क्षेत्रों में उन्नत सेंसिंग, नेविगेशन और पोजिशनिंग विकल्प आदि शामिल हैं।.

      जलवायु मॉडलिंग -   क्वांटम कंप्यूटिंग जलवायु मॉडलिंग सिमुलेशन की परिशुद्धता और गति को बढ़ा सकती है, जिससे जलवायु परिवर्तन से संबंधित चुनौतियों को बेहतर ढंग से समझा और संबोधित किया जा सकता है।.

      वैज्ञानिक खोज -   क्वांटम-एआई अभिसरण बड़े डेटासेट को अधिक कुशलता से संभालने और विश्लेषण कर वैज्ञानिक खोज में तेजी लाने की क्षमता रखता है।.

क्वांटम एआई का उपयोग करने वाली कंपनियाँ

क्वांटम एआई का उपयोग करने वाली कई कंपनियाँ हैं, जो विभिन्न क्षेत्रों में इस तकनीक का लाभ उठा रही हैं-

  •  गूगल- गूगल ने क्वांटम कंप्यूटिंग में महत्वपूर्ण प्रगति की है और इसका उपयोग मशीन लर्निंग के लिए किया जा रहा है। यह कंपनी क्वांटम एआई के माध्यम से जटिल डेटा सेट्स का विश्लेषण और समस्याओं को हल करने में तेजी लाने पर ध्यान केंद्रित कर रही है।.
  •  आईबीएम- आईबीएम क्वांटम कंप्यूटिंग प्लेटफॉर्म विकसित कर रहा है, जो विभिन्न उद्योगों में डेटा विश्लेषण और अनुकूलन समस्याओं को हल करने में मदद करता है। आईबीएम का "क्वांटम एआई" प्रोजेक्ट स्वास्थ्य सेवा और वित्तीय सेवाओं में सुधार के लिए काम कर रहा है।.
  •  रिगेटी- रिगेटी एक क्वांटम कंप्यूटिंग कंपनी है जो अपने प्लेटफॉर्म पर क्वांटम एआई समाधान विकसित कर रही है। यह कंपनी विशेष रूप से वित्तीय सेवाओं और दवा खोज में क्वांटम एआई का उपयोग करने पर ध्यान केंद्रित कर रही है।.
  •  आयनक्यू- आयनक्यू भी क्वांटम कंप्यूटिंग में सक्रिय है और अपने उत्पादों के माध्यम से मशीन लर्निंग और डेटा एनालिटिक्स में सुधार करने का प्रयास कर रहा है। यह कंपनी स्वास्थ्य सेवा और लॉजिस्टिक्स में क्वांटम एआई का उपयोग कर रही है।.
  •  भारतीय सेना- भारतीय सेना ने हाल ही में एक क्वांटम कंप्यूटिंग प्रयोगशाला स्थापित की है, जो सुरक्षा और सैन्य अनुप्रयोगों के लिए क्वांटम एआई तकनीकों का विकास कर रही है।.
  • ये कंपनियाँ विभिन्न उद्योगों में क्वांटम एआई के उपयोग से जटिल समस्याओं को तेजी से हल करने, बेहतर निर्णय लेने और नए उत्पादों एवं सेवाओं के विकास की दिशा में अग्रसर हैं।
सोर्स-wipedia,drishtiias,youtube,cdn.visionias

शुक्रवार, 2 अगस्त 2024

भारतीय वातानुकूलीन सिस्टम

air conditioning

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम भारत एवं अन्य देशों में प्रयोग होने वाले वातानुकूलीन air conditioner के बारे में चर्चा करेंगे इसके साथ ही हम यह देखेंगे कि वर्तमान समय में किस नयी तकनीक के माध्य से हम नये वातानुकूलीन उपकरणों को बना सकते है जो हमारे पर्यावरण को कम नुकसान य न के बराबर नुकसान पहुंचाते है।इस संस्करण में हम Ice Battery Air Conditioner, Geo Thermal Air Conditioner, Ambiator, Asian Technic Air Conditioner जीसे Terracotta cooling system भी कहते है,आदि के बारे मेंं चर्चा करेंगे। इसके साथ ही हम मोनिश सीरिपुरापू के बारे में चर्चा करेंगे जिन्होने इस भारतीय एयर कंडिश्नर को बनाने में अपनी अहम भूमिका निभाई हैं।

Ice Battery Air conditioner

इस तकनीक का अविष्कार थर्मल ऊर्जा भण्डारण के लिए बर्फ का उपयोग करने कि प्रक्रिया है। इस तकनीक का इस्तेमाल करके कम बिजली खर्च पर पूरे घर को ठण्डा कर सकते है। आइस बैटरी प्रोजेक्ट एक नये तरह का एनर्जी स्टोरेज करने का तरीका है। इसका मुख्य उद्देश्य रेन्युवेबल ऊर्जा को संग्रहित करना और इसका इस्तेमाल करना है। इस तरह के प्रोजेक्ट में बर्फ को ऊर्जा संग्रहण के लिए इस्तेमाल किया जाता है ताकि बिजली की खपत को कम किया जा सके।

इस प्रोजेक्ट में विद्युत उपकरणों कि मदत से बर्फ को जमाया जाता है,और जब बिजली कि डिमांड बढ़ जाती है तब ऊर्जा के रुप में प्रयोग किया जाता है। अतः ऐसा करने से  बिजली की डिमांड घट जाती है। इस कुलींग प्रक्रिया का इस्तेमाल बिजली पैदा करने और घरो को ठण्डा करने के लिए किया जाता है।

Outlet Part

यह पुर्णतः घरेलु ए0सी0 के कुलींग सिस्टम के समान ही होता है कुछ विशेष बदलावों के साथ। इसके outlet भाग में ढ़ेर सारे कम्परेसर लगे होते है, इसके साथ ही पानी स्टोर करने वाला एक य आकार के हिसाब से कई सारे स्टोरेज टैंकर को लगाया जाता है। रात के समय मौसम ठण्डा होने पर सभी कम्प्रेसर को चालु कर दिया जाता है जो कि एक निश्चत समय अंतराल पर पानी को जमा देता है। 

पानी के जम जाने पर सभी कम्प्रेसर को बन्द कर दीया जाता है ताकि बिजली की बचत कि जा सके। कंडेसर य टियूब में एक विशेष प्रकार कि गैस भरी जाती है जिसे हम R32 के नाम से जानते है,जो कि गर्म और ठण्डे वातावरण के हिसाब से अपना तापमान बदलती रहती है अतः इस कन्डेसर (टियूब) को बर्फ वाले टैंकर में बिछाते हुए घर य आफिस  के inlet भाग में बिछाया जाता है।

Inlet part

कंडेसर टियूब को बिछाने के बाद इसके बिछे एक पंखा लगाया जाता है ताकि हवा कंडेसर टियूब को छुते हुये वातावरण में प्रवेश करें। अतः कंडेसर में प्रवाहित होने वाली गैस जब जमी हुई बर्फ के कटेंनर का चक्कर लगाकर घरों में लगे हुए कंडेसर में प्रवेश करती है तो वह ठण्डी हो चूकी होती है जिसको परिणामस्वरुप हम मात्र पंखा या ब्लोअर चला कर कमरे य उस विशेष एरिया का ठण्डा कर सकते है जिसे हम ठण्डा करना चाहते है। कमरे का तापमान को नियंत्रित करने के लिए हमें बस पंखे की स्पीड को नियंत्रित करना होता है।

लाभ

  • इस तकनिक का इस्तेमाल करके बिजली बिल में कटौती की जा सकती है,क्योंकि एक सामान्य एयर कंडिश्नर कमरे को ठण्डा करने के लिए लगातार कम्प्रेसर को काम करना पड़ता है।.आईस बैटरी प्रोजेक्ट में सिर्फ बर्फ को जमाने तक ही कम्प्रेसर का इस्तेमाल किया जाता है और बाकि के 12 घण्टे इसे बंद कर दिया जाता है जिससे बिजली कि बचत होती है।
  • सामान्य एयर कंडिश्नर  में कमरे को जल्दी ठण्डा करने के लिए कम्प्रेसर को और तेज़ी से काम करना पड़ता है जबकि आईस बैटरी एयर कंडिश्नर  मात्र पंखे कि स्पीड को बढ़ाकर के कमरा ठंडा किया जा सकता है।
  • एक सामान्य  एयर कंडिश्नर  एक कमरे य एक हाल को ठंडा करने कि क्षमता रखता है, एक आईस बैटरी एयर कंडिश्नर  पुरे घर को ठंडा करने कि क्षमता रखता है,इसके साथ ही इसकी क्षमता बढ़ाने पर यह पुरे सिटी को ठंडा करने की क्षमता रखता है।
  • वर्तमान समय में इस तकनिकी का इस्तेमाल शिकागो जैसे शहरों में बड़े पैमाने पर किया जा रहा है।

हानी

  • यह आकार में बड़ा होने के कारण सामान्य एयर कन्डिश्नर की तुलना में तीन से चार गुणा अधिक मंहगा होता है।
  • इसे इंस्टाल करवाने के लिए दो से तीन अनुभवी टेक्नीशियन की आवश्यकता होती है। जबकि एक सामान्य एयर कन्डिश्नर लगवाने के लिए मात्र एक टेक्नीशियन से ही काम चल जाता है।
  • सामान्य एयर कन्डिश्नर की अपेक्षा आईस बैटरी एयर कन्डिश्नर का मेटनेंस खर्च अधिक आता है।
  • हालाकि यह कम बिजली की खपत करता है मगर इसमें प्रयोग होने वाली गैस हमारे पर्यावरण को नुकसान पहुंचाती है। इसमें R 32 गैस का इस्तेमाल किया जाता है। जो हमारे पर्यावरण के लिए घातक है।

Geothermal Air Conditioner

इस प्रकार के एयर कन्डिश्नर का इस्तेमाल ज्यादातर कनाडा,नोर्वे,अमेरिका,आदि देशों में किया जाता है। मगर हाल ही के समय में भारतीय मूल की कम्पनी GIBSS ने इस प्रकार के प्रोजेक्ट पर काम करना प्रारम्भ किया है।यह भी एक इको फ्रेडंली एयर कन्डिश्नर है जो हमारे घरों में बिजली की कटौती को 60 प्रतिशत तक कम करने की क्षमता रखता है। यह एक सामान्य एयर कन्डिश्नर की तुलना में यह इसलिए खास है क्योंकि इसमें Outlet भाग कि अपेक्षा दोनों Inlet भाग ही होते है। यह अपने कुलींग फैक्टर के लिए पुर्णतः वातावरण पर निर्भर रहता है। यह समान्य एयर कन्डिश्नर से मंहगा और आईस बैटरी एयर कन्डिश्नर से सस्ता होता है। इसकी मेंटनेंस लागत कम होती है जबकि इंस्टालेशन लागत अधिक होती है।

वातावरण से सम्बन्ध

सामान्य तौर पर जब हम गर्मीयों के मौसम में जमीन से पानी निकालते है तो वह ठण्डा होता है, उसी प्रकार जब हम सर्दीयों के मौसम में जमीन के नीचे से पानी निकालते है तो वह गर्म होता है। धरती के इसी हिटींग और कूलींग फैक्टर का इस्तेमाल  एयर कन्डिश्नर के रुप में किया  जाता है। सामान्य ऐसी साईकिल का इस्तेमाल यहां भी किया जाता है मगर कम्परेसर को उतनी मेहनती नही करनी पड़ती जितनी की एक सामान्य एयर कन्डिश्नर को करनी पड़ती है। इस तकनीक नें कंडेसर य टियूब को जमीन के निचे बिछाया जाता है तथा दुसरा भाग कमरे में य उस Particular area लगाया जाता है जिसे ठण्डा करना होता है।

टियूब में डाली गयी गैस कम्परेस्र के कम्परेस करने पर अत्याधिक गर्म हो जाती है, धरती के आतंरिक वातावरण में जा कर ठण्डी हो जाती है। अब दुबारा इसे कमरे के इनलेट भाग में ले जाया जाता है यहां एक पंखे या ब्लोअर के आगे से गुजारी जाती है। जिसके परिणामस्वरुप पंखे को चलाने पर हमें ठण्डी हवा मिलती है। यहाँ भी आईस बैटरी एयर कन्डिश्नर की तरह की पंखे की स्पीड़ को कंट्रोल करके इसके कुलींग सिस्टम को कंट्रोंल किया जा सकता है।

लाभ

  • इस प्रकार का एयर कन्डिश्नर को लगाने पर  यह लगभग 15 से 20 साल तक आसानी चल सकता है।
  • बिजली की बचत करता है, भारत में 5 स्टार रेटींग वाले  एयर कन्डिश्नर से भी 60 प्रतिशत कम बिजली खपत करता है।
  • यह दो प्रकार के संस्करण में आते है पहला Open loop system दुसरा Closed loop system।
  • पहला सस्कंरण यालि औपेन लूप सिस्टम ज्यादा उपयोग में नही लिया जाता क्योंकि यह पानी को दूषित करता है, दूसरा क्लोस्ड लुप सिस्टम अधिक पैमाने पर इस्तेमाल में लिया जाता है।
  • क्लोस्ड लुप सिस्टम को तीन भागों में वर्गीकृत किया गया है। जैसे होरिजेंटल क्लोस्ड सिस्टम, वर्टीकल क्लोस्ड सिस्टम, कोइल क्लोस्ड सिस्टम। मुख्य तौर पर इनका वर्गीकरण पाइप बिछाने कि प्रक्रिया के आधार पर किया गया है।

GIBSS

इसका पुरा नाम ग्रिन इंडिया बिल्डिंग सिस्टम एण्ड सर्विसेज़ है। वर्तमान समय में यह कम्पनी जियोथर्मल एयर कन्डिश्नर को बनाने का कार्य करती है। इसकी भारत में स्थापना वर्ष 2010 में विनय कुमार गुप्ता के द्वारा कि गई है। अपने शुरुआती दिनों में कम्पनी ने दो पयालट प्रोजेक्ट पर काम किया जो कि पुर्णतया सफल रहें है। इनका पहला प्रोजेक्ट चण्डीगढ़ के पास मौहाली के इ्ण्डियन स्कूल आफ बिज़नेस के लिए किया गया था।

तथा दुसरा प्रोजेक्ट मुम्बई में किया गया था।हालकि वर्तमान समय में कम्पनी कुछ खास लाभ नही कमा पा रही है मगर अपको बताते चले कि जियो थर्मल एयर कंडिश्नर का ग्लोबल मार्केट लगभग 9.5 मिलीयन डाॅलर का है यानि भारतीय रुपयों में लगभग 79 करोड़ का मार्केट है। यानि वर्तमान समय में भारत में भी उम्मीद लगाई जा सकती है कि इसका मार्केट बढ़े।

Asian Tech Air Conditioner

इस तकनिक को टेराकोटा तकनिकी भी कहा जाता है जिसे भारतीय  मूल के वैज्ञानिक मौनिश सिरीपुरुपू ने तथा उनकी सहयोगी टीम ने विकसीत किया है। हालांकि श्री मौनिश ने इस तकनिकी को विस्तार रुप देने के लिए किसी भी प्रकार की कम्पनी को भारत में रजिस्टर नही किया है मगर अपनी खास युनिकनेस के कारण यह चर्चा का विषय है। इसकी कार्य प्रणाली को समझने के लिए हमें इसकी बनावट को समझना होगा। जोकि एक साधारण एवं सरल तरीके से कार्य करती है।

1.सर्वप्रथम इसके निर्माण के लिए कच्ची मिट्टी कि नलकियों को बनाया जाता है जिनकी लम्बाई लगभग 1 फुट य उससे अधिक य कम हो सकती है आंतरिक छेद की चौड़ाई लगभग 10 से 12 य सेंटीमीटर से कम या अधिक हो सकती है। अतः इन्हे आग में पकाने के बाद गोलाकार ढांचे में बिठाया जाता है। इन्हें इस प्रकार से बिठाया जाता है कि ताकि हवां इनके छेद से आसानी से आ,जा सके। 

2.इन सभी नलकियों को पानी से भिगोया जाता है य इन्हें हमेशा गिला रखने के लिए इनके ऊपर पानी कि पाईप लाइन पिछाई जाती है।

3.जब सारी मिट्टी की नलकियां पानी को सोख लेती है तो इनकी एक तरफ इसके आकार अनुसार बडे़ या छोटे पंखों को लगाया जाता है। अब ठण्ड़ी नलकियों के सम्पर्क में आने से हवा ठण्ड़ी हो जाती है जिसके परिणाम स्वरुप हमें दुसरी तरफ ठण्ड़ी हवा मिलती है। अतः इवेपोरेटर तकनीक के माध्यम से पुरे घर को ठण्डा किया जा सकता है।

लाभ

  • यह ओज़ोन लेयर को किसी भी प्रकार का नुकसान नही पहुँचाता है।
  • अन्य तकनिकी उपकरण जैसे कम्प्रेसर आदि के न होने के कारण यह सबसे अधिक बिजली की बचत करता है।
  • किसी भी प्रकार कि गैस का इस्तेमाल न होने के कारण यह इकोफ्रेंडली है।
  • इसके मेंटनेंस का खर्चा ना के बराबर आता है।
  • यह किसी भी प्रकार का ध्वनि प्रदुषण नही करता।
  • कम लागत तथा इकोफ्रेडंली होने के साथ-साथ कम बिजली की खपत करने के कारण यह एयर कंडीश्नर की श्रेणी में सबसे सर्वोच्चत्तम स्थान पर अपनी जगह बनाता है।
वैसे दोस्तों भारत एवं विदेशी मुल्कों में कुछ ऐसे मुर्ख भी पाये जाते है जो अपना ज्यादातर जीवन शौ-आफ में बिताना पसन्द करते है ऐसे लोगों का कहिं कुछ नही हो सकता। वे शायद इस तकनीक के महत्व को न समझें वैसे अगर आप समझते है तो हमारे इस लेख से ज़रुर लाभ उठाने का प्रयास करें।

Monish Siripurapu

यह एक इंडियन इनोवेटर और इंतरोपिनोर है जिन्होंने इण्डिया का पहला इको-फ्रेंडली ए0सी0 बनाने का खिताब हासिल किया है।इन्हे इनकी इस खोज तथा अन्य कार्यों सर्वजनिक कार्यों के चलते द बेस्ट इनिवेटर आवार्ड तथा ग्रिन इण्डिया आवार्ड मिल चुका है। इन्होंने अपने मकैनिकल इंजीनियरिंग की डिग्री (आर.वी.काॅलेज आफ कर्नाटक )से हासिल कि है। इनका निवास स्थान कर्नाटका के बैंगलुरू में है। आपको बताते चले कि श्री मोनिश को कृत्रिम एयर कंडिश्नर को बनाने का आइडिया मधुमक्खी के छत्ते को देख कर आया था।

AMBIATOR

इस कम्पनी की स्थापना 2022 में टाइगर एस्टर और जीतेन देसाई द्वारा हैदराबाद में कि गई। दोनों IIT के कुशल  इंजीनीयर है। कम्पनी का मुख्यालय भारत के हैदराबाद शहर में है। यह पर्यावरण सहयोगी एयर कंडीश्नर हैं इसलिए इसके बारे में भी जानना आवश्यक है।

कार्य प्रणाली

इस कुलिंग सिस्टम में भी दो भाग होते है पहला आउट लेट दुसरी इनलेट भाग। हालांकि इसमें कम्प्रेसर की जगह हीट एक्सचेंजर लगा होता है। एम्बीयेटर का एक युनिट एक सममान्य 5 टन के ए0सी0 के बराबर होता है। एम्बीयेटर का आउटलेट भाग बाहर की हवा को एक सेंसीबल हीट एक्सचेंजर के माध्यम से गुजाराता है जो हवा को ठंडा करता है पर हवा में बाहरी नमी को प्रवेश नही करने देता है। 

इसके बाद हवा एम्बीयेटर के इनलेट भाग में जाती है जहाँ हवा को वाष्पीकरण कूलर के माध्यम से गुजारा जाता है यहां पानी के वाष्पीकरण द्वारा हवा और ठण्डी हो जाती है। इस प्रक्रिया द्वारा हवा में नमी बढ़ जाती है और ठण्डक का प्रभाव भी बढ़ जाता है।

अतः यह हमारे कमरे या घर को ठंड पहुँचाने का कार्य पुर्ण करता है। एम्बीयेटर में किसी भी प्रकार की रेफ्रीजरेंट या गैस का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। पुर्णतः पर्यावरण में विद्ममान हवा पर कार्य करता है।.इस प्रणाली में प्रयोग होने वाले उपकरण कुछ इस प्रकार है 1.सेंसीबल हीट एक्सचेंजर 2. वाष्पीकरण कूलर 3.फिल्टर - हवा में से धूल एवं अन्य कणों को हटाता है।4.पंखे- हवा को प्रसारित करने का कार्य करते है।.5.पानी की टंकी और पंप-वाष्पीकरण कूलर में पानी की आपूर्ति पुर्ण करने के लिए।.6.निंयत्रण प्रणाली-तापमान और नमी को नियंत्रीत करने के लिए।.इसकी कार्य क्षमता CFM यानि क्युबिक फीट प्रति मिनट में आंकी जाती है। उदाहरण- HMX AMBIATOR 10k 10000 CFM, 20K 20000CFM,40K 40000CFM आदि।

लाभ

1.बिजली की बचत करता है। 2. पर्यावरण उपयोगी है। 3.बढ़ींया सर्विस देता है यानि एक बार लगवाने पर 5 से 10 सालों तक की छुट्टी।

हानी

माना कि कंपनी अच्छा काम कर रही है लेकिन पर्यावरण संरक्षण के लिए यह भी जरुरी है कि यह आम आदमी के बजट में आये। उदाहरण के लिए कम्पनी का सबसे कम बजट का प्रोजेक्ट एम्बीयेटर 5 TR लगभग 3 लाख रुपये का है, वहीं एक आम एयर कन्डीश्नर की कीमत तीस से चालीस हज़ार रुपये होती है ऐसे में कोई आम आदमी 6 गुणा कीमत देकर एम्बीयेटर क्यों लगवायेगा। विदेशों में यह महंगे दामों में बिके तो ठीक है क्योंकि वे सक्षम है, मगर भारतीयों को यह कम दामों में मिलेगा तभी लाभ होगा क्योंकि भारत एक विकासशील देश होने के साथ-साथ दूनिया का सबसे बड़ा मार्केट भी है।

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शुक्रवार, 7 जून 2024

समय यात्रा

 
time travel
प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम भारत के कर्नाटक राज्य में पाये जाने वाले लालमिरी मंदिर तथा इसके निर्माण कर्ता राजा नरसिंह वर्मन द्वितीय के बारे में चर्चा करेंगे।. इसके  साथ ही हम यह परिभाषित करने कि कोशिश करेंगे कि लालमिरी मंदिर में पाये जाने वाली कलाक्रती 695 ई0 के समय काल में हमारी वर्तमान तकनिकों को परिभाषित करती है।.इन सभी घटनाओं के साथ हि हम समय यात्रा के बारे में चर्चा करेंगे।.

चर्चा का विषय

वर्तमान समय में कर्नाटक के लालमिरी मंदिर में पत्थर की दिवार पर एक नकाशी उकेरी गई है जिसमें वर्तमान समय के कम्पयुटर,किबोर्ड को दर्शाया गया है।.इस मंदिर को 1400 साल पहले पल्लव वंश के राजा नरसिंह द्वितीय द्वारा बनवाया गया था। ऐसे में मंदिर में कम्पयूटर की नकाशी का चित्र होना लोगो को चकित करने के लिए काफी है कि 1400 साल पहले जब विद्युत बिजली की खोज भी नही कि गई थी तब बिजली से चलने वाले इस कम्प्यूटर उपकरण को यहां कैसे चित्रीत किया जा सकता है। हालांकि ASI यानि Archaeological Survey of India की रिपोर्ट आना अभी बाकि है। हो सकता है कि मंदिर में इस चित्र को तत्तकालीक समय में कुरेदा गया हो या 695 ई के समयकाल में, इस बात का निर्णय रिपोर्ट आने के बाद ही किया जा सकता है।.चित्र को देखने से ऐसा प्रतित होता है कि यह एक हाईटेक कंट्रोल रुम या किसी उन्नत अंतरिक्ष यान का एक सटीक चित्रण है।.

रहस्य और मान्यताएं

  1. कुछ लोगो का मानना है कि प्राचीन भारतीय ऋषि-मुनि भविष्यवाणी करने में सक्षम थे उन्होंने भविष्य में होने वाली तकनिकी उन्नति की कल्पना पहले हि कर ली थी।.इस नकाशी को उसी भविष्यवाणी का प्रमाण माना जा सकता है।.
  2. वर्तमान इतिहासकारों का अनुमान है कि हो सकता है अतीत में कोई बाहरी अंतरीक्ष यात्री धरती पर आया हो जिसे देखकर उसकी परिकल्पना करके इस चित्र को कुुरेदा गया हो।.
  3. यहि कुछ विद्वानों का मानना है कि यह एक मान्यता है कि यह चित्रण सिर्फ काल्पनिक था कालाकारों ने अपनी कल्पना शक्ति का प्रयोग करके इस आकृति का निर्माण किया हो।.
  4. कुछ लोगो का यह भी मानना है कि हो सकता है कि इस नकाशी को आधुनिक कलाकारों द्वार वर्तमान काल के किसी समय में कुरेदा गया हो।.
चित्र को लेकर मान्यताएं बहुत है मगर यह भी सम्भव हो सकता है कि यह चित्र-समय यात्रा या दुसरे ग्रह के वासियों के अस्तित्व का प्रमाण हो।.फिलहाल जो भी हो विज्ञानिकों द्वारा मंदिर की नकाशी पर जाँच चल रही है कि इन्हें कितने समय पहले कुरेदा गया होगा।.

समय यात्रा

वैज्ञानिकों ने यह दावा किया है कि समय यात्रा संभव है ऐसा आइंस्टीन के समीकरणों का प्रयोग करने से यह गणितीय प्रमाण प्रमाणित करते है कि "यदि लाईट स्पीड (प्रकाश 1 कि गति ) से यदि कोई व्यक्ति यात्रा करना संभव कर सकता है तो वह समय यात्रा कर सकता है।.हालांकि इस तकनिकी पर अभी भी जांच चल रही है लेकिन क्वांटन कम्प्युटिंग के तकनिकी  विकास, क्वांटम भौतिकी (Quantum Physics) के गहन अध्ययन से भविष्य में यह संभव हो सकता है।.दूसरे शब्दों में यदि हम देंखे तो एक समय था जब लोग पैदल यात्रा करते थे मगर अब तकनिकी विकास के कारण हम परिवाहन का प्रयोग करते है जिससे हम एक निश्चत समय में एक स्थान से अपने गंतव्य स्थान पर यात्रा कर सकते है यानि जीस स्थान पर हमें दो घण्टे बाद बहुंचना था उस स्थान पर हम मात्र आधे घण्टे में पहुंच जा रहे है।. 

यह समय यात्रा को समझने का एक सरल प्रमाण हो सकता है मगर यह एक उचित प्रमाण नही है।.विज्ञानिकों के मतानुसार समय-यात्रा से त्तातपर्य यह है कि भविष्य में होने वाली घटनाओं को पहले ही देख लेना,दुसरे शब्दों में अतित में घटित घटनाओं को दुबारा घटित होता देखना।.इसका सटिक उदाहरण हमारा लालमिरी के मंदिर की कम्प्युटर नकाशी हो सकती है।.इसके अलावा भविष्य में ऐसी बहुत सि घटनाओं के प्रमाण मिलें है जो समय यात्रा को प्रमाणित करते है।.

जो एच ब्रेनन नाम के लेखक अपनी किताब A new Perspective में स्काॅटलैण्ड के एक पायलट का जिक्र किया है जिसे 1935 में स्काॅटलैंड के एडिनबर्ग के एक एयरबेस का हाल जानने के लिए भेजा गया था।किताब के मुताबिक जब वे एयरबेस के उपर से गुजरे तो उन्होने देखा कि वो बंद पडा है उस पर घास उग गयी है और गाय,भैंस उस पर चर रही है।. ऐयरबेस किसी खंडहर से कम नही लग रहा था।.आगे बढ़ने के दौरान उन्हे खराब मौसम के कारण दुबरा उसी एयरबेस कि तरफ लौटना पड़ा।. ऐयरबेस कि तरफ दुबारा आने पर उन्हे एहसास हुआ कि अचानक धुप निकाल आयी है मौसम एकदम से साफ हो गया है इसके साथ ही ऐयर बेस पर काफी लोगो को चलते फिरते देखा गया,खाकी वर्दी के बजाय निली वर्दी मेें लोगो को देखा गया।. हवाई जहाज़ भी पिले कि जगह सिल्वर नजर आ रहे थे अतः विक्टर वहां से लौट आये लेकिन वे हैरान तब, हुये जब चार साल बाद उन्हे उसी स्थान पर भेजा गया और अपने साथ हुई घटना को दुबारा याद किया.

1988 में स्ट्रेंज मैगज़ीन द्वारा एक आर्टिकल पब्लिश किया गया था जिसमें पुराने जमाने कि एक नयी चमचमाती कार का जिक्र था।.कहानी 1969 में एलसी बैक और उसके साथी पर अधारित थी जिसमें सड़क पर अपनी कार में डार्विंग करते समय अचानक पुराने ज़माने कि नयी कार को देखा गया था जिसे एक महिला चला रही थी जिसके साथ उसकी बच्ची भी थी उन्होने 1940 के दशक के कपडे पहन रखे थे।. कार को पत्रिका के किरदारों द्वारा रुकवाने का प्रयास किया गया तो वो नही रुकी अंत में उन्होने कार के आगे ले जाकर अपनी कार को रोककर दुबारा कार का मुआयना करना चाहा मगर अपनी कार से उतरने के बाद उन्होंने देखा कि वह पुरानी कार गायब हो चुकी थी।.

1954 मे जापान के एयरपोर्ट पर एक शख्स आया जिसने अपने आप को Taured नाम के देश से आया हुआ बताया उसका पासपोर्ट भी सही था मगर उस समय काल के दौरान टाओरेड नाम का कोई देश ही नही था।. नक्शे को दिखाने पर उसने स्पेंन और फ्रांस के बिच की एक जगह बताई जिसे उस समयकाल के लोग प्रिंसीपिल्टी आफॅ एंडोरा कहते थे जिसे सुनकर उस नागरिक का दिमाग खराब हो गया कि आखिर उसके देश को सुरक्षा कर्मी किसी अन्य नाम से कैसे बुला रहे है।.अतः उसे नज़दीकी होटल के कमरे में कैदी बना कर रखा गया मगर बाहर खड़े पैहरेदारों को पता ही नही चला कि वो कमरे से गायब कैसे हो गया।.

नरसिंह वर्मन द्वितीय


कर्नाटक के लालमिरी मंदिर के निर्माता पल्लव वंश के राजा नरसिंह वर्मन द्वितीय थे जिन्हे हम राजमल्ल और राजसिंह के नाम से भी जानते है।.ये एक हिन्दु राजा थे इनके पिता परमेंश्वर वर्मन प्रथम थे। इनकी दो रानियां थी पहली रानी का नाम रंगपताका तथा दूसरी रानी का नाम लोकमादेवी था।.इन्होने 695ई0 से 728 ई0  तक शासन किया वे अपने समयकाल के प्राक्रमी हिन्दू राजा थे जिन्होने अपने साम्राज्य का विस्तार करने के साथ ही विभिन्न मंन्दिरो का निर्माण भी करवाया था। जिनमें से प्रमुख मंदिर निम्नवत है जैसे कर्नाटक का लालमिरी का मंदिर,शोर मंदिर परिसर,पनवलाई का तालागिरश्वर मंदिर,कांची का कैलासनाथर मंदिर,शोर मंदिर,मामल्लपुरम में ईश्वर और मुकुंद मंदिर इसके सात ही एक बौद्ध विहार के निर्माण का श्रेय इन्हे जाता है जिसे हम वर्तमान समय में चीन पैगोड़ा के नाम से भी जानते है।. इतिहासकारों के अनुसार नरसिंह वर्मन अपने पुर्वज महेंद्रवर्मन प्रथम और नरसिंह वर्मन द्वितीय के समान ही एक महान यौद्धा थे।.

विदेशी सम्बंध

695 के समयकाल में इनके वंश को एक प्रमुख  शक्ति के रुप में मान्यता दि गई है इनके तांग चीन से घनिष्ठ सम्बंध थे.लक्ष्यद्वीप के द्वीपपालक्षम अभिलेख से यह पता चला है कि एक समय काल में राजा का प्रशासन लक्ष्यदीप पर था।.चीनी सम्राट जुआनजोंग के अनुरोध पर नरसिंहवर्मन द्वितीय ने तांग चीन को अपना दूतवास भेजा था। जिसका उल्लेख इतिहासकार नीलकण्ठ शास्त्री अपनी रचनाओं में करते है शास्त्री जी के अनुसार प्राचीन काल में चीन भारत का दूश्मन ना होकर के मित्र था और चीन का दूश्मन ता-चो यानि वर्तमान अरब का क्षेत्र तथा तोउपो यानि वर्तमान तिब्बत का क्षेत्र, उसके दुश्मन थे जिनकी शक्तियों को दबाने के लिए चीन के सम्राट के अनुरोध पर राजा ने 720 ई0 में दूतावास को चीन भेजा था।.इतिहासकार निलकंठ शास्त्री के अनुसार इस दूतावास का नेतृत्व बौद्ध भिक्षु बज्रबोधि ने किया था।.चीनी सम्राट ने दक्षिणी भारत के पल्लव वंश के राजा को दक्षिणी चीन के जनरल की उपाधि प्रदान करने के लिए राजदूत के माध्यम से शिला लेख भिजवाया जीस पर लिखा गया थाकि कोई-होआ-से जिसका अर्थ होता है कि पुण्य लौटाने का कारण बनना।.

साहित्यीक योगदान

 राजा नरसिंह वर्मन कुशल नाटककार और कवि थे।.उन्होंने संस्कृत में कई रचनाएं कि कुटियाट्टम इसे नृत्य नाटक का सबसे प्राचीन रुप माना जाता है।.सस्कृत साहित्यकार दंडिन ने राजा के दरबार में कई वर्षों तक कार्य किया था।.

वास्तुकला संरक्षण

राजा ने अपने समय काल में अनेक मंदिरो का निर्माण करवाया जिनमें से कर्नाटक का लालमिरी मंदिर प्रमुख है,इसके साथ ही कांची पुरम का कैलासनाथ मंदिर,बैकुण्ठ पेरुमल मंदिर,महाबलीपुरमशेर मंदिर सहित कई अन्य मंदिरों का निर्माण करवाया।.इसके अलावा तालागिरीश्वर पनमलाई मंदिर और इरावतेश्वर मंदिर को बनवाने का श्रेय भी इन्ही को जाता है इनके समय काल की वास्तुकला उस समय काल में भी आने वाले य आज के भविष्य को परिभाषित करती है।.जिसका प्रमाण लालमिरी का मंदिर है जिसके बारे में आप उपर पढ़ चुके है।.

सोर्स -विकीपिडीया, news18 एवं अन्य  रिसोर्स

मंगलवार, 28 मई 2024

anti gravity jar


anti-gravity-jar

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम भारत के प्राचीन कलाकारी के उदाहरण गुरुत्वाकर्षण विरोधी जार के बारे में चर्चा करेंगे इसके साथ हि इस तथ्या का पता लगाने की कोशिश करेंगे कि आखिर यह इतना खास क्यों है, इसके अलावा हम गुरुत्वाकर्षण विरोधी स्तम्भ के बारे में भि चर्चा करेंगे जिसका प्रयोग पुराने ज़माने में भुकम्प मापने के लिए किया जाता था इसके साथ हि यह सदियों से अपने विलक्षण तरीके से खाड़ा रहने के कारण यह प्राचीन भारतीय वास्तुकला कला का एक अनोखा उदाहरण है।.

गुरुत्वाकर्षण विरोधी जार

दरसल इसे गुरुत्वाकर्षण विरोधी जार इस लिए कहा जाता है कि क्योंकि यह न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के नियम को झुठलाता है।.इसकी बनावट ने सभी को चकित कर दिया है कि आखिर कैसे ऊपर और निचे कि स्तह में छेद होने के कारण भी जार में रखा पानी निचे नही गिरता।.दरसल इस जार कि निचे कि सतह में पांच छेद है यही से जार को उल्टा करके पानी को भरा जाता है मगर सिधा करके के रखने पर भी पानी इसमें से निचे नही गिरता।. जार कि उपरी सतह पर भी कई सारे छेद है मगर पानी न तो यहां से भरा जा सकता है और न ही निकाला जा सकता है हमेशा पानी जार के नल से ही निकलता है।. इस प्राचीन जार को तामिलनाडु के कांचीपुरम म्युज़ीयम में रखा गया। भारतीय पुरात्तत्व विभाग ने यह दावा किया है कि इसका चलन भारत में लगभग 2000 वर्ष पहले था।. इसे कारीगरी जार के नाम से भी जाना जाता है जो प्राचीन भारत के कुम्हारों के अद्भुत कौशल को दिखाता है।.इस जार को तामिलनाडु के कांचीपुरम मिज़ियम में रखा गया है शोधकर्ताओं का दावा है कि यह जार लगभग 400 साल पुराना है।.

जार का मैक्निस्ज़म काम कैसे करता है

इस जार के अद्नर दो कोण आकार के नल लगे होते और दोनों कोण के अंतिम छोर पर दो एल आकार के एलबो लगे होते है। जिसके कारण जब आप इसको उल्टा करके इसमें पानी ड़ालते है तो सिधा करने पर तथा एलबो के कारण पानी को बाहर निकलने का रास्ता नही मिल पाता।.अतः पानी बाहर नही गिरता है। हमेशा पानी निकालने के लिए जार के नल का हि इस्तेमाल किया जा सकता है।इस जार को निर्माण करने कि तकनीक बताती है कि आज से 2000 हजार सालो पहले भी भारत पर रहने वाले मानव को गुरुत्वाकर्षण बल के बारे में मालुम था।.यानि न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण बल के सिद्धांत देने से पहले भी भारत में गुरुत्वाकर्षण बल के बारे में जानते थे।.हमारे ग्रंथों में गुरुत्वाकर्षण शब्द के लिए गुरुत्व मोहिनी शब्द का प्रयोग किया गया है इस का सर्वप्रथम  प्रयोग 628 ई0 पुर्व भारतीय खगोलशास्त्री एवं गणीतज्ञ श्री ब्रह्मगुप्त जी द्वारा किया गया था।.

गुरुत्व मोहिनी

गुरुत्व मोहिनी के माध्यम से गुरुत्वाकर्षण के बल को परिभाषित किया गया है।.इसका प्रमाण हमें 17 सितम्बर 2022 में कर्नाटक राज्य के हसन जीले में 12 वीं सदी में बना चेन्नाकेशवा के मंदिर में मिले है।.दरसल मंदिर में ऐसी कलाकृतीयां तथा स्तम्भ मिले हैं जो यह प्रमाणित करते है कि उस समय के वास्तुकला के जानकार गुरुत्वाकर्षण बल से भली-भांति परीचित थे।. इस मंदिर का निर्माण 1171 ई0 में राजाविष्णु वर्धन द्वारा होयसल साम्राज्य की प्रारम्भिक राजधानी बेलूर मेंं यागाची नदी के तट पर बनवाया गया था।.इस मंदिर को केशवा य बेलूर के विजयनारायण मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।. बताया जाता है कि 1926 में महात्मा गांधी तथा पं0 जवाहर लाल नेहरु एवं उनके साथी एवं पाकिस्तान के प्रथम प्रधानमंत्री मोहम्मद अली जिन्ना भी इस मूर्ति कला को देखने के लिए कई बार इस मंदिर में गये थे।.

गुरुत्वमोहिनी मुर्ति का वर्णन इस प्रकार है कि मुर्ति के सर पर रखे हाथ से पानी की एक बूंद नीचे कि तरफ गिरती है जो मोहिनी के माथे के बीचों-बिच से होते हुुए मुर्ति के बाँए स्तन के निप्पल को छुते हुये, दोनो पैरों के बिच बांए पैर के अंगुठे पर जा कर गिरती है और उसके बाद धरती पर आकर गिरती है। ऐसी अद्भुत कला कृति पर अभी तक विज्ञानिकों द्वारा किसी प्रकार को शौध संभव नही हो पाया है कि आखिर यह किस कौशलकला का प्रमाण है।.लेकिन देखा जाये तो सम्पुर्ण प्रशनों का जवाब हमें मंदिर की अन्य मुर्तियों के माध्यम से मिलता है।.
मंदिर की सम्पुर्ण कला कृतियों से आकर्षण के अस्तित्व कि व्याख्या बड़े सूक्ष्म ढ़ंग से कि गई है जैसे सम्पुर्ण वस्तुएं अपने से बड़ी वस्तुओं कि प्रति आकर्षित होती है इसके प्रमाण के लिए गुरुत्वमोहिनी कि एक बड़ी मुर्ति मिलती है जिसके अगल बगल जो साधुओं कि मुर्ति मिलती है जीनके लिंग का झुकाव गुरुत्व मोहिनी की तरफ है।. अतः यह आकर्षण बल को समझाने का इक उचित प्रमाण है।.इसी प्रकार एक अन्य गुरुत्वमोहिनी कि मूर्ति की लकड़ी की मूर्ति में मोहिनी कि नाभी ही नही है यानि वे कभी पैदा ही नही हुई है।.जो प्रमाणित करता है कि स्त्री का माध्यम लेकर गुरुत्वाकर्षण बल को समझाया गया है।.शोधकर्ताओं द्वारा देखा गया कि इस मुर्ति के समान हि कई अन्य मूर्ति में भी नाभी नही थी यानि यह प्रमाणित होता है कि नाभि न बनाने का कार्य त्रुटिवश नही किया गया है।.

खोज का मुख्य आधार 

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17 सितम्बर 2022 में खोज को आधार तब मिला जब मंदिर के बाहर खड़े स्तम्भ से एक गोल पत्थर जमीन पर गिरा।.इसी बिच इस क्षेत्र विशेष में 2.3 रीयेक्टर पैमाने की आधार गति से भुकंप का आना था काफी पुराना होने का कारण लोगों का लगा लगी कि स्तम्भ गिरने वाला है मगर गोल पत्थर के गिरने से सबके मन से उत्सुकता जागृत कि आखीर यह पत्थर ऊपर कैसे पहुंचा और भुकंप के समय हि क्यों गिरा।.अतः जांच प्रारम्भ हुई जिसमें पता लगा कि स्तम्भ बिना किसी ने के समर्थन के खड़ा है इसके साथ हि इसके स्तम्भ मात्र तीन स्लैव पर हि खड़ा है यानि स्तम्भ का एक स्लैव सदा हवा में रहता है इसके प्रमाणन के लिए कपड़े कि एक पतली शीट को आर-पार करके देखा गया।. उपरोक्त कारणों ने शोधकर्ताओं को सोच में ड़ाल दिया कि आखीर स्तम्भ किस आधार पर खड़ा है इसके साथ हि स्तम्भ के ऊपर की तरफ लम्बाई 42 फिट कि है और यह तीन फीट चौड़ा है जिसका वज़न लगभग 45 टन अनुमानित किया गया है स्तम्भ के उपर कि ओर एक नट के आकार कि आकृति का पत्थर है और उसके उपर एकआयता कार पत्थर रखा गया है जिस के चारो तरफ जंग लगी घंटीयां थी देखने से ऐसा लगता है कि एक समय में काल के दौनान ये तेज गति से आये भुक्पं के कारण बजती रही होंगी ओर ये नट के आकार की पत्थर की आकृति गति करती होगी।.
अतः प्रमुख शोधकर्ताओं द्वारा यह दावा किया गया है कि यह मंदिर अदभुत कलाकृति के साथ गुरुत्वाकर्षण के अस्तित्व को प्राचीन समय से जानकारी  होने को प्रमाणित करता है।.
(स्रोत parveen moahan youtube channel and google research)

शनिवार, 18 मई 2024

भारतीय लाॅरेल वृक्ष

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प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम भारतीय वृक्ष टर्मिनलिया टोमेंटोसा के बारे में चर्चा करेंगे,इसके साथ ही हम इसकी आंतरिक खुबियों के बारे में तथा भारत में बढ़ रही जल आपदा के एवं भूमि जल के हो रहे लगातार दौहन के बारे में चर्चा करेंगे।.इसके साथ ही हम जल आपदा संकट से निकपटने के लिए प्रमुख कार्यो के बारे में चर्चा करेंगे।.

टर्मिनलिया टोमेंटोसा ट्री

इस पेड़ की खोंज पापिकोंड़ा राष्ट्रीय उद्यान में वन अधिकारियों द्वारा की गयी है।.पेंड़ की खासियत यह है कि इसके तने से पानी किसी सामान्य नल के तरह निकलता है।.इसकी खोज कोंड़ा रेड्डी समुदाय के लोगों द्वारा सर्वप्रथम किया गया था।.जो सदियों से इस पेड़ के पानी से अपनी प्यास बुझाते रहे है।.अतः इसकी खोज आन्ध्र प्रदेश के अल्लूरी सीतारामा राजू जीले में स्थीत पापडीया राष्ट्रीय उद्यान में आन्ध्र प्रदेश के वन विभाग टीम द्वारा कि गयी।.

वृक्ष के महत्वपुर्ण गुण
इस पेड़ की विशेषता यह है कि यह गर्मियों के दिनों में अपने तने में लगभग 1000 गैलन पानी अवशोषित कर सकता है।.जिसका प्रयोग एक जैसे सामान्य परिवार अपने उपभोग के लिए इस्तेमाल कर सकते है।.वन विभाग के अधिकारी जी.जी.नारेंद्रन ने बताया कि गर्मियों में पेड़ के तने में पानी इकट्ठा होता है जिसमें से एक विशेष प्रकार कि गन्ध आती है पीने में इस पानी का स्वाद खट्टा होता हैं।.इण्डियन सिल्वर ओक के रुप में जाने वाली इंण्डियन लाॅरेल वृक्ष कि इस लकड़ी का व्यासायिक मूल्य अधिक होता है।.इसका पौधा सूखे और नमी वाले जंगलों में पाया जाता है।.

इस पेड़ कि सबसे खास बात यह है कि इसका तना अन्य पेड़ो कि अपेक्षा अधिक फायर प्रुफ होता है यानि इसमें जल्दी आग नही पकड़ती है।.इस पेड़ का सांइटिफीक नाम Ficus Microcorpa जो आमतौर पर आस्ट्रेलिया,पैसेफिक आईलैंड़,एशिया,वेस्टर्न क्षेत्रों में और अब खोज के दौरान भारत में भी पाया जाता है। पेड़ अपना खाना Photosynthesis प्रक्रिया से बनाता है। जिसमें पौधे य पेड़ को हवा,पानी,कार्बन ड़ाईअक्साइड,धूप कि आवश्यकता होती है।.

आसमोसिस क्रिया Osmosis
इस प्रक्रिया के दौरान पेड़ पानी को अपनी जड़ों से अवशोषित करता और उसके बाद capillary action द्वारा कोशीकाओं द्वारा पानी छाल,तने तथा पत्तों तक पहुंचाया जाता है।.इसके साथ हि पेड़ कि पत्तीयों,तनों,फूलों एवं जड़ों से पानी निकालने कि प्रक्रिया Evoporation कहते है।. वैज्ञानिकों के अनुसार यह अनुमान लगाया है कि एक पेड़ अपना भोजन बनाने कि लिए लगभग 1000 गैलन पानी को अपने अन्दर अवशोषित कर सकता है।आप प्रक्रिया में 10% पानी को छोड़कर सम्पूर्ण पानी को पेड़ से निकाला जा सकता है। 

जो पेड़ कि ग्रोथ को तथा इसके पौषण को ध्यान में रखकर छोड़ा जाता है।.धार्मिक मान्यता अपने अनोखे गुणों के कारण बौद्धीष्ठ इसे बोधी पेड़ भी कहते है।.1.कोंड़ारेड्डी समुदाय कोंड़ारेड्डी गोदावरी क्षेत्र के पहाड़ी क्षेत्र में रहने वाली एक जनजाति है जो अपने प्राचीन समय काल से ही विशेष पेड़ो के गुणों तथा उनके लाभों के बारे जानकारी रखने के लिए जानि जाती हैं दरसल सर्वप्रथम इन्ही लोगो के द्वारा ही इस पेड़ कि खोज कि गयी थी।.

water crisis

भारत में जस समस्या के कई कारण होना संभव है जैसे गांवों का शहरीकरण,भुजल का अत्याधिक दौहन,अपर्याप्त जल निकायों का प्रदुषण,अकुशल कृषि सिंचाई विधियां य प्रक्रिया।.बढ़ती पानी की समस्या के कारण भारत मे ताज़ा पानी के जल स्त्रोत मात्र 4प्रतिशत ही बचा है जिसे भारतीय आबादी के 18प्रतिशत में पहुंचाना होता है।.2010 कि केन्द्रीय जल आयोग कि रिपोर्ट के अनुसार भारत में कुल 70प्रतिशत ताजे जल स्त्रोत का उपयोग सिंचाई के लिए किया जाता है।,जो वर्ष 2050 तक समाप्त हो जायेगा।.सिंचाई के लिए भारत में भूमिगत जल का उपयोग 63 प्रतिशत तथा नहरो के जल का प्रयोग 24प्रतिशत तक इसके साथ हि जलकुंड और टैकंरो से 2 प्रतिशत एवं अन्य स्त्रोतों से11प्रतिशत सिंचाई कि जाती है।.

भूजल कि समस्या भूजल के अत्याधिक दौहन के कारण नदियों के प्रवाह में कमी आयी है,इसके साथ ही भूजल संसाधनों के स्तर मे कमी आयी है कुछ तटीय क्षेत्रों में जलभृतों में लवण जल का आवाछिंत प्रवेश हो रहा है।.इसके साथ ही Eucalyptus पेड़ की मांग के कारण भी कमी आयी है दरसल यह पेड़ एक दिन में 1000 लीटर पानी का अवशोषण करता है जिसके कारण अगर यह किसी क्षेत्र विशेष में अधिक मात्रा में पाया जाता है तो उस क्षेत्र में पानी कि समस्या को देखा जा सकता है।.

Hybird Eucalyptus
इसे हिन्दी में नीलगीरी का पेड़ या सफेद पेड़ भी कहते है।.आम बोलचाल कि भाषा में इसे प्यासा पेड़ या The Thirsty Tree कहते है क्योंकि इसे अत्याधिक पानी कि आवश्यकता होती है।.इसे गोंद के पेड़ के रुप में भी जाना जाता है।.इस पेड़ को उपयोग लुगदी यानि कागज़ बनाने,शहद उत्पादन,एवं आवश्यक तेल निकालने के लिये किया जाता है।.इसकी लकड़ी काफी मजबूत होने के कारण घरेलु फर्नीचर अथवा अन्य कार्यो में उपयोगी होती है। इस पेड़ कि लकड़ी और पत्तियां जल्दी आग पकड़ती है अन्य पेड़ों कि अपेक्षा।.अपने इन्ही गुणों के कारण भारतीय बाज़ार में किमत अधिक होती है जिसके कारण किसान अपने खेतों में इनकों लगाते है काफी लम्बा होने के कारण उनकी फसलों को भी इससे कोई नुकसान नही होता।.

मगर हाल हि के दिनों इस पेड़ की हाइब्रड प्रजाति का आगमन भारत में हुआ जो कि 10वर्षों कम में ही जल्दी तैयार हो जाती है।.अतः किसानों तथा अन्य लोगों द्वारा अत्याधिक लाभ कमाने के चक्कर में इस हाइब्रड़ प्रजाति को जोरों शोरो से लगाया गया जिसके परिणाास्वरुप 5वर्षों के समय काल में ही उस क्षेत्र विशेष में भूमिगत पानी की समस्या देखी जाने लगी है।.राज्य स्तर के अधिकारियों द्वारा इस पेड़ पर काफी देर बाद प्रतिबंध लगाया गया। इस पेड़ की अत्याधिक जल दौहन की प्रक्रिया द्वारा वर्तमान समय में जो क्षेत्र भूमिगत जल कि समस्या से जूझ रहे है सरकार उन क्षेत्रों में जल टंकी एवं पाइप लाइन के द्वारा जल प्रबंधन कि व्यवस्था कर रही है।.

अतः सरकार द्वारा पेड़,पौधो,फूलों कि प्रजातियों पर एक कुशल प्ररिक्षण करने के बाद तथा उसके लाभ हानी का विशलेषण करने के बाद हि किसानों के हाथ में सौपना चाहिए।.