Indian History reveal the Past

हमारे इस ब्लॉग में भारतीय इतिहास, सांस्कृतिक इतिहास, राजवंशों आंदोलन स्टार्टअप टेक्नोलॉजी कला और वास्तुकला तथा आर्थिक इतिहास से संबंधित विषयों पर जानकारी दी जाती है। हम कम से कम शब्दों में ज़्यादा से ज़्यादा जानकारी देने की कोशिश कर रहे हैं।

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2026-09-15

टेलीकिनेसिस


digital painting of how to do telekinesis

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में टेलीकिनेसिस के बारे में चर्चा करेंगे इसके साथ ही इस तकनीक पर हुई रिसर्च के परिणाम तथा वास्तविकता में क्या यह संभव इस पर बात करेंगे। खास बात यह है कि अमेरिका और रुस जैसे देश इस पर पहले ही रिसर्च कर चूकें है। इसके साथ ही हम कुछ ऐसे उदाहरण पेश करेंगे कि जिससे यह साबित होता है कि यह अस्तित्व में तो है मगर आम इंसान का इसे प्रयोग कर मुश्किल है।

परिचय

टेलीकिनेसिस शब्द ग्रीक भाषा से लिया गया है जिसका अर्थ है। दूर से किसी वस्तु में गति करवाना। यानी किसी निर्जीव वस्तु को अपने मन की शक्ति से उठाना मोड़ना य फिर तोड़ देना। अकसर फिल्मों में ऐसा होते हुए देखा गया है जिसमें व्यक्ति किसी औब्जेक्ट को बिना छूए ही उसे हिला सकता है। भारतीय इतिहास की दंत कथाओं में भी इसका जिक्र मिलता है। भारतीय योग शास्त्र में इसे ध्यान और समाधि की अवस्था में मिलने वाली अष्ट सिद्धियों से जोड़ा जाता है। इस तकनीक पर की गई रिसर्च की बात करें तो अमेरिका की CIA एजेंसी ने इस पर रिसर्च की जिसे इन्होंने Stargate project का नाम दिया था।

स्टारगेट प्रोजेक्ट

1970 से 1990 दशक के दौरान अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA और अमेरिकी सेना ने इस प्रोजेक्ट को मिलकर अंजाम दिया था। इस प्रोजेक्ट पर लगभग 20 मिलियन डालर खर्च किए गए थे। सेना का लक्ष्य था कि अगर इस प्रोजेक्ट में सफलता मिलती है तो सेना इसका प्रयोग जासूसी और युद्ध में विरोधी सेना के हथियारों के निष्क्रिय करने के लिए जा सकता है। मगर दुख की बात यह रही की प्रोजेक्ट में सफलता नहीं मिली। 1995 में इस प्रोजेक्ट को पुरी तरह से बंद कर दिया गया।

जे बी राइन की रिपोर्ट
ये ड्यूक यूनिवर्सिटी में एक प्रोफेसर थे जिन्हें पैससाइकोलाजी का जनक भी कहा जाता है उन्होंने अपने प्रयोग में पाया मन से पासे के गिराने से नंबर प्रभावित होते है। शुरूआत में इनकी रिसर्च में सकारात्मक परिणाम देखने को मिले मगर जब अन्य वैज्ञानिकों ने इस प्रयोग को कड़े नियमों से साथ दुबारा प्रयोग किया तो परिणाम निराशा जनक निकले।

प्रिंसटन यूनिवर्सिटी की पैयर लैब
1979 से 2007 तक यूनिवर्सिटी ने इस पर लगभग 28 सालों तक रिसर्च की मगर परिणाम अभी भी  निराशाजनक ही थे।

उपरोक्त सभी रिपोर्ट से यह साबित होता था कि बिना छूए किसी ओब्जेक्ट को हिला पाना मुमकिन नहीं है विज्ञान के मुताबिक टेलीकिनोसिस भौतिकी के स्थापित नियमों जैसे उष्मा गति की और संवेग संरक्षण का सीधे तौर पर विरोध करता है। वहीं न्यूरोसाइंस के अनुसार हमारे मस्तिष्क से निकलने वाली विद्युत तरंगें इतनी कमजोर होती है कि वे खोपड़ी के बाहर जाकर किसी भी ठोस वस्तु पर बल नहीं लगा सकती। ये आज से कई वर्ष पहले कि रिपोर्ट थी। मगर वर्तमान समय में न्यूरोसाइंस ने ही इस तकनीक को पहले सही साबित करके दिखाया है।

वैसे दोस्तों हमारा मानना यह है की विज्ञान किसी चीज़ को तब तक सही नहीं मानता जब की उसे साबित करने के ठोस प्रमाण न हो। लेकिन इस बात का यह मतलब बिल्कुल भी  नहीं है कि विज्ञान जिसे न माने वे हो नहीं सकता। एक समय था जब हवाई जहाज़ की खोज नहीं हुई थी। तब इस पर रिसर्च करने वाले वैज्ञानिकों को मूर्ख ही समझा जाता रहा होगा मगर वर्तमान समय को देखे तो परिणाम हमारे सामने है।

ब्रेन कम्पयूटर इंटरफेस BCI

दोस्तों भले ही टेलीकिनेसिस रहस्यमय या जादुई साबित हुआ हो मगर न्यूरोसाइंस ने इस तकनीक को साबित करके के दिखाया है। इस तकनीक में इंसान के सर पर सेंसर लगाए जाते हैं जो मस्तिष्क से सिगनल को पढ़ते है फिर इन सिगनल को ब्लूटूथ या कंप्यूटर के जरिये मशीनों तक भेजा जाता है। इस तरह से एक लकवा ग्रस्त इंसान भी सोच समझ कर कंप्यूटर का कर्सर हिला सकता है।

उदाहरण के लिए आप मशहूर और जाने माने वैज्ञानिक Stephen Hawking को तो जानते ही होंगे। 22 साल की उम्र से ही उन्होंने एक लकवा ग्रस्त शरीर होने के नाते कुर्सी पर ही अपनी सारी रिसर्च अपने दिमाग से भेजे सिग्नल से ही की थी। हां मगर यह उनके समय में भी अधूरा था मगर वर्तमान समय में कृत्रिम बौद्धिक क्षमता से यह कर पाना लगभग मुमकिन है। 

सवाल फिर वही है दूर से किसी ओब्जेक्ट को कैसे उठाया जा सकता है।

सोवियत यूनियन की रिपोर्ट

शीत युद्ध के दौरान रुस की रहनी वाली Nina Kulagina नामक महिला ने कड़े प्रयोगशाला परीक्षण किए वे दावा करती थीं कि वे अपनी दिमागी शक्ति से चीजों के हिला सकती हैं। हलांकि बाद में कई वैज्ञानिकों और जादूगरों ने इसे हाथ की सफाई और छिपे हुए धागों का खेल कहा। 

लेकिन हमारा मानना है कि यह संभव हो सकता है। बस हमें उस फ्रिवेंसी को खोजने की जरूरत है जिस पर यह काम करता है। लगभग-लगभग हर वैज्ञानिक को अपने शुरुआती प्रयोग में सफलता मिली थी भले ही बाद में उनके प्रयोगों का प्रमाणीकरण नहीं मिल पाया है। उदाहरण के लिए एक ब्लूटूथ डिवाइस को ही लेते है य अपने मोबाइल का नेटवर्क ही ले सकते है। ये किसी खास प्रक्वेंसी पर हमारे फोन में नेटवर्क प्रदान करती है जिससे हमारे दैनिक कार्य आसान हो जाते है।

हो सकता है दोस्तों जिस तरह से हाइब्रेड सब्जियों को बनाया गया उसी प्रकार इंसानों पर रिसर्च करके भविष्य में हमारे लिए यह संभव हो सके। लेकिन मज़ा तो तभी आयेगा जब एक आम इंसान  टेलीकिनेसिस तकनीक  को खुद से काबू कर सके या इसका उपयोग कर सके। वैसे आपकी इसके बारे में क्या राय है हमें जरूर लिखें। 

2026-08-30

उक्कु य मूषा इस्पात

ilustration of wootz steel

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में भारत की सबसे प्राचीन धातु जिसके द्वारा बनायी गई तलवार सबसे मजबूत मानी जाती थी और जिसे हम wootz steel के नाम से जानते है के इतिहास के बारे में चर्चा करेंगे। बताते चलें की इस धातु को भारत में मूषा इस्पात के नाम से भी जानते है। इस लेख में इस धातु के इतिहास तथा इसे बनाने के तरीके एवं इसकी निर्माण कला के पतन के बारे में चर्चा करेंगे। इसके साथ ही इस धातु से बनी तलवारों के विदेशी व्यापार पर भी चर्चा करेंगे। इस धातु की खास बात यह थी कि यह अपनी मजबूती के साथ इसकी सतह पर बनी लहर धार आकृतियों के चलते भी बहुत प्रचलित हुईं थी।

परिचय

भारत ने प्राचीन काल में ही मानव इतिहास की सबसे उन्नत इस्पात तकनीक को विकसित कर लिया था जिसे हम उक्कु इस्पात के नाम से जानते है जिसे हम Wootz steel के नाम से भी जानते है। प्रारम्भिक समय में इसका निर्माण कार्य भारत के तमिलनाडु कर्नाटक तथा आंध्र प्रदेश के क्षेत्रों में प्रारम्भ हुआ। धीरे-धीरे पूरे विश्व में अपनी मजबूती का डंका बजाया। ज्यादातर इस स्टील से बनी तलवार का  व्यापार अरब देशों के साथ किया जाता था।

वूट्ज स्टील की निर्माण की कहानी हमें यह बताती है कि भारतीय प्राचीन धातु वैज्ञानिकों के असाधारण शिल्प कौशल और अपनी विद्वता का प्रदर्शन करते हुए ऐसे इस्पात का निर्माण किया जिसने सदियों तक वैश्विक धातु निर्माण की परंपराओं को प्रभावित किया। वूट्स स्टील की विरासत हमें याद दिलाती है कि महान इंजीनियरिंग की शुरुआत सामग्री यों की जानकारी में महारत हासिल करने होती है न की उसके निर्माण में।

इस स्टील की शुरूआत ईसा पूर्व के समय काल में भारतीय राज्य तेलंगाना के गोलाकोंडा क्षेत्र से हुई इसके बाद के अन्य क्षेत्र जैसे कर्नाटक तमिलनाडु और श्रीलंका में हुई। इस स्टील को लोहे के एक ठोस टुकड़े के रुप में निर्यात किया जाता था जिसे मूषा इस्पात कहते थे। श्रीलंका में स्टील बनाने की प्रारंभिक विधि के रुप में मानसूनी हवाओं से चलने वाली एक अनोखी भट्टी के माध्यम से बनाया जाता था।

इसके साक्ष्य हमें अनुराधापुरा तिस्सामहारमा औस समनालावेवा जैसे स्थलों के सर्वे के दौरान मिला। इसके साथ ही इतिहासकारों को कोडुमल से प्राचीन लोहे और इस्पात की कलाकृतियां भी प्राप्त की गईं है। 2018 में मन्नार जिले में स्थित योधावेवा स्थल की खुदाई में एक गोलाकार भट्टी का निचला आधा भाग मिला है। शोधकर्ताओं के अनुसार यह ढ़क्कन क्रूसिबल इस्पात का बना है। 

इसी खोज के दौरान श्रीलंका के दक्षिण-पूर्व के क्षेत्रों में शास्त्रीय कला संबंधित कुछ सबसे पुराने लोहे और इस्पात की कलाकृतियाँ पाईं गईं है। अरब सागर के रास्ते भारत और श्रीलंका के समुद्री व्यापार के चलते अरब देशों को वूट्स स्टील के बारे में पता चला। इस का पता हमें  इस्लामीक ग्रंथों में मुहन्नद और हेन्देय शब्द मिलने से चलता है जो कि भारतीय स्टील से बनी तलवारों की ओर इशारा करते है। अरबी कविताओं में भी इसका उल्लेख मिलता है जिसके तहत वूट्ज स्टील से बनी तलवार अत्यधिक मूल्यवान थी।

आगे चलकर इस प्रकार की स्टील का व्यापार विस्तार अन्य देशों तक हुआ जिसके चलते दमिश्क स्टील का निर्माण हुआ। इसके अलावा 12वी शताब्दी के अरब यात्री एड्रिसी ने भी भारतीय स्टील को दुनिया की सर्वश्रेष्ठ धातु बताया। अरब लेख तेलिंग में स्टील की प्रसिद्धि के लिए तेलंगाना क्षेत्र के संदर्भ में लिखा गया है। जिसमें बताया गया कि तेलंगाना का गोलाकांडा क्षेत्र स्पष्ट रुप से पश्चिम एशिया में उक्कू स्टील के निर्माण का प्रमुख केंद्र है।

वूट्स शब्द का अर्थ

17वीं शताब्दी में यूरोपीय यात्रियों ने दक्षिण भारत के गोलाकोंडा मालाबार और मैसूर क्षेत्र की यात्रा की और इस्पात निर्माण के क्षेत्र का दौरा किया। जिसके तहत उन्हें इस स्टील के नाम के पीछे का अर्थ समझ आया। वूट्ज शब्द तमिल शब्द उरुक्कू से लिया गया है जिसका अर्थ है पिघलाना। इसी प्रकार द्रविड़ भाषा में इसी प्रकार के मिलते जुलते शब्द का प्रयोग किया गया। वहीं तेलुगु में इस स्टील को उक्कू तथा मलयालम में इसे उरुक्कू नाम से जाना जाता था। इसी प्रकार इस स्टील को मैसूर में उक्कू टूंडू के नाम से जाना जाता था।

17वी से 19वीं शताब्दी के समय काल में यूरोपीय वैज्ञानिकों में इस स्टील के बारे में जानने की जिज्ञासा हुई। उस समय काल के दौरान यूरोपीय वैज्ञानिकों को कार्बन मिश्रित धातुओं की जानकारी बहुत कम थी। मगर उनके द्वारा वूट्ज स्टील के शोध ने आधुनिक अंग्रेजी फ्रांसीसी और रुसी धातु विज्ञान के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
 

प्रजनन अनुसंधान

19वीं शताब्दी के समय काल में ही वूट्ज स्टील पर गहन अध्ययन के लिए रॅायल स्कूल आफ साइंस द्वारा इसे पुनः बनाने के लिए प्रयास किया जिसके चलते 1795 में  डॅा. पियर्सन ने वूट्ज स्टील की रासायनिक रुप पर जांच की जो कि इस स्टिल पर रिसर्च करने वाले पहले व्यक्ति थे।

पावेल पेट्रोविच अनोसोव

ये रुस के धातु वैज्ञानिक थे वे वूट्ज स्टील अपने सभी प्राचीन गुणों के साथ पुनः बनाने में सफल रहे। उनके द्वारा निर्मित स्टील पारंपरिक वूटज के लगभग समान ही था। उन्होंने इस प्रकार के स्टील के उत्पादन के चार अलग-अलग तरीकों के बारे में लिखा जो कि एक पारंपरिक पैटर्न प्रदर्शित करते थे। उनका यह कार्य बुलैट स्टील्स नाम से भी जाना जाता है। जिसे माइंनिग जनरल पत्रिका में इसी शीर्षक के नाम से प्रकाशित किया गया था।

रीबोल्ट एट अल के अनुसार

इन्होंने अपने विश्लेषण में सीमेंटटाइट के नैनोवायरों को घेरने वाले कार्बन नैनोट्यूब की उपस्थिति के बारे में बताया। इसके साथ ही उन्हें धातु पर वैनेडियम मोलिब्डेनम और क्रोमियम के कुछ अंश मिले जिसके चलते उन्हें पता चला की धातु की अशुद्धियों को निकालने के लिए और वूट्ज स्टील को मजबूती प्रदान करने के लिए इसे गर्म ठंडा और जमाने जैसे चरणों से गुजारा गया है। जिसके कारण ही यह स्टील लचीला होने के कारण भी अपनी मजबूत पकड़ को नहीं छोड़ता।

वूट्ज स्टील बनाने का तरीका

इस इस्पात का निर्माण एक खास प्रक्रिया द्वारा किया जाता है जिसके दौरान लोहे के कार्बन युक्त पदार्थ के साथ सील बंद भट्टियों में पिघलाया जाता है। जिसके चलते अंत में हमें शुद्ध स्टील प्राप्त होता है जिस पर अद्वितीय सूक्ष्म संरचनाएं होती है।

कच्चे लोहे का चयन
सबसे पहले कच्चे लोहे का चयन सावधानीपूर्वक शुद्धता के आधार पर किया जाता था। धातु की संरचना में एक स्वरुप सुनिश्चित करने के लिए अशुद्धियों को कम से कम किया जाता था।

क्रूसिबल स्टील का उत्पादन
कठोर मिट्टी के बने छोटे-छोटे बर्तन जो की लोहे और कार्बन युक्त पदार्थों जैसे चारकोल आदि से बने होते थे। खास बात यह है कि इस कार्बन निर्माण के लिए बांस की पत्तियों को जला कर तथा अन्य पौधों को जलाकर प्राप्त किया जाता था।

नियंत्रित कार्बन अवशोषण

अब गर्म करने की प्रक्रिया के दौरान कार्बन लोहे में समाहित हो जाता था और एक उच्च कोटि के कार्बन इस्पात में बदल जाता था। इस चरण में धातु की भंगुरता को रोकने के लिए एक निश्चित तापमान की आवश्यकता होती थी जिसके अधिक या कम होने पर स्टील अपनी मजबूती खो देता था।

धीमी शीतलता
धातु के भट्टी में पिघलाने के बाद भट्टियों को धीरे-धीरे ठंडा किया जाता था। जिसके कारण एक नियंत्रित शीतलता के कारण धातु पर आंतरिक संरचनाएं बनी, जिन्होंने आगे चलकर ढलाई को दौरान दमिशक आकृति का धातुरुप धारण कर लिया। अंत में हमें एक ठोस स्टील का पिंड मिलता है।

वूट्ज स्टील के गुण
यह स्टील न केवल अपनी दिखावट के लिए बल्कि अपने यांत्रिक प्रदर्शन के लिए भी जाना जाता है। इस स्टील के माध्यम से बने बेल्ड प्राचीन काल में अन्य स्टील की तुलना में अधिक मजबूत हुआ करते थे। वैज्ञानिकों ने इसकी सूक्ष्म संरचना का अध्ययन करके पता लगाया की इस स्टील की मजबूती का मुख्य राज ये सूक्ष्म संरचनाएं ही है जो इसकी मजबूती के साथ इसके लचीलेपन में भी योगदान देती हैं।

दमिश्क स्टील की उत्पत्ति और वूट्ज स्टील से संबंध

कई लोग पौराणिक तलवारों का सम्बन्ध दमिश्क स्टील से जोड़ते है जो वूट्ज स्टील की तरह ही अन्य आकृति बहते पानी की आकृतियों के लिए प्रसिद्ध है। हलांकि खोज कर्ताओं का यह मानना है कि दमिश्क तलवारों के बनाने में भी इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल भारत में उत्पादित वूट्ड स्टील के क्षेत्र से ही आता था।

भारतीय इस्पात की सिल्लियों को व्यापार मार्गों के माध्यम से मध्य पूर्व में निर्यात किया जाता था। इसके बाद वहां के कुशल कारीगरों द्वारा इन्हें ढालकर ब्लेड़ बनाते थे। विशेष ढलाई तकनीकों के माध्यम से इन सिल्लियों पर विशिष्ट दमिश्क पैटर्न निर्मित होता था।

2026-07-21

आचार्य जगदीश चन्द्र बोस

portrait photo of jagadish chandra bose

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम भारत देश के महान न्युरोबायोलोजिस्ट तथा वैज्ञानिक आचार्य जगदीश चन्द्र बोस के बारे में चर्चा करने जा रहे है। वे देश के पहले वैज्ञानिक थे जिन्हें रोयल सोसाईटी ने अपना फेलोशिप बनाया था तथा उन्हें हाईयेस्ट साइंटिफीक हानर से सम्मानित किया गया था। इन्हें हम father of plant neurobiology के नाम से भी जानते हैं। दोस्तों इनकी महानता इनकी महानता का प्रमाण यह भी है कि इन्होंने अपनी किसी भी रिसर्च को पेटेंट नहीं कराया। क्योंकि वे मानते थे कि उनकी खोज पर सभी भारतीय के साथ पुरी मानव जाति का अधिकार है।

जीवन परिचय

उनका जन्म 30 नवंबर  1858 को विक्रम पुर  वर्तमान मुंशीगंज बांग्लादेश में हुआ था। उनके पिता भगवान चन्द्र बोस एक डिप्टी मजिस्ट्रेट थे। उनके पिता जी भी प्रतिभा के धनी व्यक्ति थे वे चाहते थे कि बोस अपनी मातृभाषा और संस्कृति को पहले समझें। उनकी प्रारम्भिक पढ़ाई अंग्रेजी को छोड़कर बांग्ला भाषा यानी एक वर्नाक्यूलर स्कूल में हुई। उनके सहपाठी किसानों तथा मछुआरों के बच्चे थे। यहीं से उनके मन में प्रकृति पौधों एवं जीव जन्तुओं के प्रति गहरा लगाव पैदा हुआ।

इसके बाद उन्होंने कोलकाता के सेंट जेवियर्स कालेज से स्नातक की पढ़ाई पुरी की। 1880 में वे चिकित्सा की पढ़ाई के लिए इंगलैंड गए लेकिन स्वास्थ्य खराब होने के कारण इन्हें पढ़ाई छोड़नी पड़ी। इसके बाद इन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के christ कालेज से प्राकृतिक विज्ञान में tripos तथा लंदन विश्वविद्यालय से बी एस सी की डिग्री हासिल की।

नस्लीय भेदभाव के खिलाफ संघर्ष

1885 में भारत लौटने पर उन्हें कोलकाता के प्रसिद्ध  प्रेसीडेंसी कालेज में भौतिकी के प्राध्यापक के रुप में अस्थाई नियुक्त किया गया। लेकिन उन्हें भारी नस्लीय भेदभाव का सामना करना पड़ा। अंग्रेजों का मानना था कि भारतीय वैज्ञानिक पढ़ाने के लिए योग्य नहीं है। इसलिए उन्हें एक अंग्रेज प्रोफेसर की तुलना में केवल एक तिहाई वेतन देने का प्रस्ताव रखा गया।

दरअसल 1901 में इन्होंने ही सबसे पहले कहा था कि पेड़ पौधों में जान होती है को प्रमाणित किया मगर उस समय काल के वैज्ञानिक पौधों को एक निर्जीव वस्तु ही मानते थे  यानी वे मानते थे  कि पेड़ पौधों में जीवन नहीं होता। इन्हीं कारणों के चलते उनकी इस खोज को वैज्ञानिकों ने एक जादू कहा और उनका मज़ाक उड़ाया और इसे विज्ञान मानने से इनकार कर दिया। रोयल सोसाइटी ने अगले दस सालों तक उनके रिसर्च पेपर को प्रकाशित करने पर प्रतिबंध लगा दिया। लेकिन 100 साल बाद उनकी इसी खोज के चलते उन्हें फादर आफ प्लांट न्यूरोबायलोजी के नाम से सम्मानित किया गया।

स्वाभिमानी बोस ने इस अपमान को स्वीकार नहीं किया परिणामस्वरूप उन्होंने तीन साल तक बिना वेतन लिए छात्रों को पढ़ाया। अतः उनकी खोज के चलते स्कूल प्रशासन को झुकना पड़ा। इस प्रकार उन्हें पूरा वेतन दिया जाने लगा तथा उनका पद भी स्थायी कर दिया गया।

प्रमुख आविष्कार


क्रेस्कोग्राफ
यह उनकी सबसे प्रसिद्ध खोज थी दरअसल इसी खोज के चलते वे सफल हो सके यह प्रमाणित करने में जी पौधों में जान होने का प्रमाण दिया। इनकी द्वारा खोजे गये इस यन्त्र के चलते ही पौधों कि गतिविधियों को रिकार्ड कर पाना सम्भव हो सका। यह पौधे की छोटी सी छोटी गति को 10000 गुणा बढ़ा कर दिखाता है। इसके अलावा उन्होंने पौधों के जहर देकर उन्हें मार कर तथा कोलोरोफार्फ दे कर बेहोश करके तथा  पौधे की pulse rate चेक  करके भी दिखाया। उनकी इस खोज ने प्रमाणित कर दिया की पौधे में भी जीवन और संवेदनाएं होती है। वे भी प्रकाश आवाज और ज़हर जैसी चीजों पर जानवरों की तरह प्रतिक्रिया करते है।

Millimeter waves
मार्कोनी से पहले 1895 में कोलकाता में बोस सर ने वायरलेस कम्युनिकेशन का सार्वजनिक प्रदर्शन किया था। उन्होंने एक  विशेष प्रकार के सिगनल को तीन दीवारों से आर पार करके उस पार लगे घण्टे को बजा कर दिखाया इसके साथ ही इस फ्रिक्वेंसी के प्रयोग से सामान्य बारूद के ढेर में आग लगा कर दिखाई।

इसके साथ ही उन्होंने गैलिना क्रिस्टल डिटेक्टर्स का भी आविष्कार किया, जिसे आज के सेमीकंडक्टर और माइक्रोवेव तकनीक की नींव माना जाता है।

पेटेंट से इनकार

उन्होंने अपने किसी भी आविष्कार का पेटेंट नहीं कराया, क्योंकि उनका मानना था कि वैज्ञानिक खोज पर पूरी मानवता का अधिकार होना चाहिए। शायद यहीं वे पीछे रह गए क्योंकि वर्तमान समय में एक छोटी सी चीज़ का भी लोग पेटेंट कराकर लाखों करोड़ों रुपये कमा रहे है काश उन्होंने पेटेंट कराया होता तो आज हमारी वर्तमान प्रस्थिति ऐसी नहीं रहती हमें भी यानी भारत को भी रिवार्ड के रुप में इसका लाभ होता। उदाहरण के लिए वर्तमान समय में विकसित देश इन्हीं कारणों के चलते हमसे आगे हैं।

उनके नाम पर बने महत्वपूर्ण स्मारक

1. J.C Bose University of Science and Technology यह विश्वविद्यालय हरियाणा राज्य के फरिदाबाद जिले में स्थापित है। अपने प्रारम्भिक समय में इसका नाम Y M C A I E था जिसे 2018 में बदलकर उनके नाम पर रखा  गया। इसके अलावा उनके नाम पर कोलकाता में एक कालेज की स्थापना के साथ ही इसके साथ ही उनके नाम पर AJCB Indian Botanic Garden की भी स्थापना की गयी है जहां का विशाल बरगद का वृक्ष पूरे भारत में प्रसिद्ध है।

इसकी खास बात यह है कि इसकी जड़ों का पता लगा पाना असंभव है क्योंकि बरगद की बेलों को बांस की ड़ण्डीयों से जोड़कर  जमीन से जोड़ दिया गया है जिसके कारण इसकी मुख्य जड़ को देख पाना मुश्किल है। इस वृक्ष की खास बात यह भी है कि यह लगभग 250 सालों से भी अधिक पुराना है।

दोस्तों इस लेख से संबंधी अगर आपके पास भी कोई जानकारी हो तो हमें जरूर बताएं ।

2026-07-14

आयाम किसे कहते हैं

dimensions-physics
प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम दुनिया में पाये जाने वाले उन सभी आयामों के बारे में जानेंगे जो कि खोजें गए है य जिनकी कल्पना कर पाना सम्भव है। यह जानना इस लिए भी जरूरी है क्योंकि दुनिया की सभी रिसर्च और इनोवेशन खोज इन्हीं आयामों की मदद से हुई है। आपको यह जानकार हैरानी होगी कि क्वांटम कम्पयूटर की खोज भी दुनिया के इन्हीं आयामों को जानकर हो पायी है। इसके साथ ही जिन्हें हम भूत प्रेत य पैरानोरमल गतिविधि का नाम देते है वे भी इन्हीं आयामों में से किसी एक आयाम का जीव है। हमारे हिन्दू धर्म में भी इन आयामों का जिक्र हुआ है जैसे की मरने के बाद मनुष्य की आत्मा एक आयाम से दूसरे आयाम में चली जाती है। वेद पुराण में इन्हीं आयामों को लोक के रुप में दर्शाया गया है जैसे पृथ्वी लोग आकाश लोक एवं पाताल लोक आदि। लेकिन अगर शास्त्रों का गहनता से अध्ययन किया जाये तो हमें पता चलता है कि इन लोकों की संख्या तीन न होकर के चौदह है।

वास्तविक आयाम

वास्तविक आयामों की बात करें तो यह सिर्फ चार है जिन्हें हम देख सकते है य महसूस कर सकते  है और आसानी से समझ सकते है। वैज्ञानिकों का दावा है कि मनुष्य तीसरे आयाम में रहता है। वहीं सिट्रिंग थ्योरि के अनुसार आयामों की संख्या 11 है । इसी प्रकार बोसोनिक स्ट्रिंग थ्योरि के मुताबिक आयामों की संख्या 26 बताई गई है। हलांकि इसे सही तरीके अभी तक परिभाषित नहीं किया जा सका इस लिए इसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता है मगर विशेषज्ञों ने इसके माध्यम से गणित की समस्याओं को हल करने में सफलता हासिल की है जिसके के कारण बोसोमनिक थ्योरि को महत्व दिया जाता है। कुछ थ्योरि तो यहां तक कहती है कि हम 64 आयामी दुनिया में रहते है मगर सवाल वही है इसे परिभाषित कौन करेगा।

स्ट्रींग थ्योरि

यहां स्ट्रींग थ्योरि के हिसाब से जो 11 आयामों को परिभाषित किया गया है हम इन्हीं के बारे में चर्चा करेंगे क्योंकि अगर किसी आयामों को परिभाषित करने की सही परिभाषा नहीं निकल पाती तो उन पर बात करना मायने नहीं रखता। मगर इसका मतलब यह नहीं है कि वे वजूद में नहीं है। लगातार वैज्ञानिक इस पर अपनी रिसर्च कर रहें है।

आयामों की संरचना

1.पहला आयाम
इसे हम एक साधारण रेखा से समझ सकते जिस पर रहने वाला व्यक्ति एक छोर से दूसरे छोर पर ही जा सकता है। इसे ऐसे समझें की कोई व्यक्ति विशेष रुप से पूर्व से पश्चिम की यात्रा तो कर सकता है मगर उत्तर से दक्षिण की यात्रा नहीं कर सकता। उदाहरण के लिए कुछ ऐसे जीव है जो पृथ्वी की सतह पर रेंगते है जो कि सिर्फ आगे पीछे ही जा सकते हैं यहां चींटी को ही लेते है ये जीव सिर्फ गंध की दिशा में चलती है य एक लाईन बना कर चलती है।

2.दूसरा आयाम
इस आयाम का जीव पहले आयाम की तुलना में अधिक कुशल होता है वे पूर्व से पश्चिम एवं उत्तर से दक्षिण दिशा में भी चल सकता है। कागज पर बना मानचित्र एवं घर की बनावट का नक्शा इसी का उदाहरण हो सकता है।  दूसरे उदाहरण में हम एक पक्षी को लेते है जो की आकाश में उड़ता है और चारों दिशाओं में यात्रा कर सकता है।

3.तीसरा आयाम
इस आयाम में हम मनुष्य आते है। हलांकि हमारे तरह अन्य जीव भी इस आयाम में आते है मगर मनुष्य को बौद्धिक क्षमता मिलने के कारण ही हम तीसरे आयाम में आते हैं। जैसे हम एक चींटी के पूरे जीवन चक्र को देख सकते है उसे समझ सकते है। इसी प्रकार हम एक पक्षी के जीवन चक्र को भी देख और समझ सकते है। मगर ये दोनों जीव जो कि हमें देखते तो हैं मगर हमारे जीवन चक्र को नहीं समझ सकते। शायद मनुष्य ने इन्हीं जैसे जीवों के जीवन के समझ कर रेलगाड़ी, हवाई जहाज़ एवं पानी में चलने वाली पण्डुब्बी का निर्माण किया होगा। जिसके चलते मनुष्य तीसरे आयाम में भी यात्रा कर सकता है।
हलांकि की किसी वस्तु को तीन तरफ या 3D डाइमेंशन से देख पाना इसका सबसे सरल उदाहरण है। मगर आगे के आयामों को समझने के लिए हमें सभी आयामों में रहने वाले जीवों के दुनिया को देखने का नजरिया भी समझना जरूरी है।

4.चौथा आयाम
इस आयाम को समय से परिभाषित किया गया है। यह वह आयाम है जिसे हम देख नहीं सकते और न ही काबू कर सकते मगर इसे महसूस करते है जैसे दिन य रात का होना। हमारा जीवन समय के साथ आगे बढ़ रहा है हम इसे पीछे नहीं कर सकते य अपनी उम्र को बढ़ने से नहीं रोक सकते। दूसरे उदाहरण से मान लीजिए आप को किसी से मिलने जाना है उस व्यक्ति ने किसी विशेष जगह का पता बताया और आप वहां पहुंच गए लेकिन वह व्यक्ति वहां नहीं है। अब गलती यहां यह हुई है कि उस व्यक्ति ने मिलने का समय नहीं बताया। अतः समय न बताने के कारण य पुछने के कारण आप उस व्यक्ति से नहीं मिल पाये। इस प्रकार समय हमें तो कंट्रोल कर सकता है मगर हम समय को नहीं।

5.पांचवां आयाम
इस आयाम में रहने वाला व्यक्ति समय को कंट्रोल कर सकता है यानी वे समय में आगे पीछे जा सकता है। या फिर भूत भविष्य वर्तमान में यात्रा कर सकता है। उदाहरण के लिए वे अपने बचपन को फिर से जी सकता है य अपनी मौत के कारण को य उसे देख सकता है। यहां सबसे खास बात यह है कि वह इसे बदल नहीं सकता। 

वार्महोल

वर्तमान समय में हम समय यात्रा जैसे कथित घटनाओं के बारे में सुनते है लेकिन इसके उचित प्रमाण हमें नहीं मिलते। जैसे वार्महोल से आर पार जाने पर हम समय से आगे पीछे  जाते तो है मगर कितना इसे हम कंट्रोल नहीं कर सकते य फिर वार्महोल कहां पाये जाते है इसका कोई उचित प्रमाण अब तक नहीं मिला है।  पांचवें आयाम की परिकल्पना से हम सिर्फ इतना पता लगा पायें है कि वार्महोल की मदद से समय यात्रा कि जा सकती है यानी सिर्फ इसके अस्तित्व का ही पता चल पाया है।

6.छठवां आयाम
इस आयाम में रहने वाला व्यक्ति अपने साथ  होने वाली सभी संभावनाओं को एक साथ देख सकता है। जैसे 1.अगर उसने पढ़ाई की तो आगे चल कर वे डाक्टर बना य इंजीनियर 2.य फिर उसने पढ़ाई नहीं की तो वे मजदूरी करेगा य खुद का कोई रोजगार करेगा। 3.य फिर उसने अपने जीवन में कुछ नहीं किया अंत में किसी कारण वश मारा गया।
इसी तरह की वे 6 से 7  संभावना होते हुए देख सकता है और उसी के हिसाब से अपने वास्तविक जीवन में बदलाव कर सकता है। ज्योतिष शास्त्र की संरचना इसी आयाम से सम्बन्धित है। इस आयाम में रहने वाले व्यक्ति की खास बात यह है कि इन होने वाली सभी जीवन धारा में से किसी एक जीवन धारा का जीवन ही जी सकता है। बताते चलें की क्वांटम कम्प्यूटर की परिकल्पना भी इसी आयाम की मदद से की गयी है।

7. सातवां आयाम
इस आयाम का व्यक्ति किसी भी समय धारा  के जीवन में जा सकता है और उस दुनिया में अपने ही वर्जन य अपने जैसे दिखने वाले व्यक्ति से मिल सकता है और उसके कार्यों में अपनी इच्छा के मुताबिक परिवर्तन कर सकता है। यहां एक जैसी कई दुनिया की परिकल्पना की गई है जिसे हम पैरलल युनिवर्स भी कहते  है।

8.आठवां आयाम
इस आयाम का व्यक्ति उन सभी समय धारा को देख सकता है जो संभावित तो है लेकिन उनका समय अलग तरीके से चलता है जैसे किसी समय धारा य दुनिया में व्यक्ति 80 वर्षों तक जीता है तो किसी में 150 वर्षों तक तो किसी में 800 से 900 वर्षों तक का जीवन संभव है। यानी उम्र के साथ वहां के वातावरण गुरुत्वाकर्षण बल,  गति एवं  प्रकाश में विशेष अंतर पाया जाता है।. यहां पर एक ऐसे भी ब्राह्माण भी परिकल्पना की गई है जिसका समय उलटा चलता है।

कुल मिलाकर आठवें आयाम में हमें उन सभी दुनिया को देखने का अधिकार मिल जाता है जिन्हें हम सोच भी नहीं सकते। ये सभी ब्राह्माण एक पेड़ के समान दिखते है जिनकी जड़ें एक ही जगह पर जा कर जुड़ी हुई है। मगर यहां एक दुनिया अपने करीब दुनिया से बिल्कुल अलग है। जैसे पृथ्वी ग्रह की तरह एक दुसरा ग्रह है जहां आक्सीजन, पानी और सूर्य का प्रकाश नहीं है मगर वहां जीवन सम्भव है। इस ग्रह पर जीवन का स्रोत  कुछ और ही है यहां का मनुष्य धरती पर रहने वाले मनुष्य से बिल्कुल अलग है।
इस प्रकार आठवें आयाम में रहने वाले व्यक्ति इन सभी दुनिया या समय धारा की यात्रा तो नहीं कर सकता मगर इन्हें देख  सकता  है कारण जैसा की हमने बताया वहां जीवन का मुख्य स्रोत  अलग- अलग हैं।

9. नोवां आयाम
इस आयाम में भी छठे आयाम की तरह दुसरी दुनिया में जाने के लिए वार्महोल की संकल्पना की गई है अंतर बस इतना है की छठे आयाम में रहने वाला व्यक्ति अपने समान दिखने वाली दुनिया या समय धारा में जा सकता है वहीं नौवें आयाम में रहने वाला व्यक्ति अपनी दुनिया य समय धारा से अलग दिखने वाली दुनिया य समय धारा में जा सकता है। जैसा की हमने बताया की एक ऐसी दुनिया भी है जहां समय उलटा चलता है।

वार्महोल

यह वही रास्ता है जिसके माध्यम से समय यात्रा य एक दुनिया से दूसरी दुनिया में यात्रा की जा सकती है जिसके बारे में हमने छठे एवं नौवें आयाम में अभी बताया। वार्महोल को साधारण भाषा में समझें तो मान लीजिए यह दुनिया  एक A4 साइज़ का पेपर है अब इस दुनिया य समय धारा से दुसरी समय धारा में जाने के लिए पेपर  के एक छोर से दूसरे छोर पर जाना है। इस यात्रा के दौरान कई प्रकाश वर्ष का समय लगता है। अब इसी पेपर को अगर हम बीचोबीच से  मोड़ देते है तो कुछ घण्टों में ही हम एक  दुनिया से दूसरी की दुनिया में आसानी से जा सकते है। इसी को वार्म होल कहा गया है।

10. दसवां आयाम
ये वही आयाम है जहां बिगबैंग होते हुए देखा जा सकता है य फिर इसी आयाम के चलते बिगबैंग थ्योरि का निर्माण हुआ। इस आयाम में रहने वाला व्यक्ति ढेर सारी दुनिया का अंत होते और उन्हें बनते हुए देख सकता है। हर एक नई दुनिया का निर्माण दो पुरानी दुनिया के आपस में टकराने से य उनके खतम होने से होता है । शायद इसी आयाम में रहने वाले व्यक्ति को ईश्वर य भगवान कहा जाता है। यानी यह वही आयाम है जिसमें वह सभी संभव संभावना हो चुकी है जो हम सोच भी नहीं सकते य उससे भी ऊपर और अधिक संभावित घटनाएं हो चुकी है जिनकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते।

11. ग्यारहवां आयाम
1990 के दशक में वैज्ञानिकों ने देखा की स्ट्रिंग थ्योरि को अलग- अलग तरह के ब्राह्माण आपस में टकरा रहे हैं। जिसके परिणामस्वरूप एम थ्योरि के मुताबिक ग्यारहवें आयाम की खोज की गई। इस आयाम में यह परिकल्पना की गई कि इस आयाम में हमारे सभी दसों आयाम एक पतले पर्दे की तरह हवा में तैर रहे हैं। यहां हवा ही वह विशेष पावर य शक्ति है जो इन आयामी दुनियाओं को निश्चत समय पर टकराने की संभावनाएं पैदा करती है। 

यानी इस आयाम में प्रत्येक दुनिया का जीवन चक्र तय किया जाता है। इस आयाम में पाया जाने वाला व्यक्ति ही शायद गाड आफ सुप्रीम यानी भगवानों के भगवान कहलाता है।
दोस्तों इस तरह से हमने इस लेख में वैज्ञानिकों द्वारा खोजे गए सभी ग्यारह आयामों को  एक  सरल भाषा में समझाया है। हो सकता है कि वास्तविकता इससे थोड़ी अलग हो। क्योंकि अभी भी इन आयामों पर रिसर्च चल ही रही है। 

बोसोनिक स्ट्रींग थ्योरि 

इस थ्योरि के मुताबिक कुल 26 आयाम है। लेकिन अभी इन पर ठीक से रिसर्च नहीं हुई हैं। हलांकि इस थ्योरि का निर्माण गणित समीकरणों को सही से बैठाने के लिए किया गया था। जिस कारण इसे भी महत्व दिया  जाता है।

 हिन्दू धर्म के मुताबिक 

हिन्दू धर्म के मुताबिक आयामों की संरचना 14 बताई गयी है जिनके नाम नीचे दिए गए है। खास बात यह है कि हिन्दू धर्म के मुताबिक हम सातवें आयाम में रहते है जिसे हिन्दू धर्म मुताबिक इसे भू-लोक कहा गया है।
इन चौदह आयामों की बात करें तो वे इस प्रकार है 1.सत्यलोक 2 तपलोक 3 जना लोक 4 महार लोक 5 स्वर्ग लोक 6  भवर लोक 7 भू लोक 8 अटला 9 विटला 10 सुहला 11 तलातला 12 गहातला 13 रसा तला 14 पाताला आदि। 
वैसे कुछ वैज्ञानिकों ने तो 64 आयामों तक की परिकल्पना कर दी है। मगर जब तक पूर्ण साक्ष्य हमें नहीं मिलते तब तक हम कोई निश्चित निर्णय तक नहीं पहुंच सकते है।
इस लेख के बारे मे अगर कोई सवाल हैं तो हमसे अवश्य पुन्छे। 

2026-07-07

unbreakable glass

unbreakable glass

प्रस्तावना

इस लेख में हम हाल ही में खोज किए गये एक विशेष प्रकार के ग्लास य शीशे के बारे में बात करने जा रहे है। इस ग्लास की खास बात यह है कि यह टूटने के बाद अपने आप से जुड़ जाता है। हलांकि कई देश जैसे जापान और इज़ारायल ने इसकी खोज पहले ही कर ली थी मगर अब इन देशों की श्रेणी में भारत का नाम भी जुड़ गया है। वैसे देखा जाए तो भारत इस प्रकार की रिसर्च में हमेशा पीछे रहता है और जब तक हम इस प्रकार की खोज में सफल हो पाते है तब तक विदेशी हमसे आगे निकल जाते है और हमें उस खोज का सही लाभ नहीं मिल पाता है।

लेकिन इस बार मामला थोड़ा सा पलट गया है हमने शायद समय से इस खोज को अंजाम दिया है जिससे हम अन्तर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने में सफल हुए हैं। बताते चलें कि इस प्रकार के ग्लास का प्रयोग वर्तमान समय में मोबाइल फोन तथा एल ई डी पैनल में किए जाने का प्लान है ताकि उन्हें और मजबूत बनाया जा सकें तथा नुकसान को कम किया जा सके। इसके अलावा इस प्रकार के ग्लास का इस्तेमाल अन्य महत्वपूर्ण तकनीकों में भी किया जा सकता है।

बाइ पाइराज़ोल कार्बिनक क्रिस्टल

भारत मूल के वैज्ञानिकों ने इसे बाइ पाइराज़ोल कार्बिनक क्रिस्टल का नाम दिया है। इसकी खोज कलकत्ता के IISER यानी इण्डियन इंस्टीटूयुट आफ साइंस इडोकेशन एण्ड रिसर्च सेंटर के द्वारा की गयी है। खास बात यह भी है कि इस रिसर्च का सबसे पहले प्रकाशन दूनिया की सबसे प्रसिद्ध जानी मानी प्रशिक्षित साइंस जनरल की पत्रिका ने 2021 में किया था। इसके बाद नेचर पत्रिका जिसे हम नेचर कम्युनिकेशन के नाम से भी जानते हैं  ने भी इस रिसर्च का प्रकाशन अपने पत्रिका में किया था। लेकिन दुःख की बात यह है की अभी तक इस रिसर्च का कोई पेटेंट और  सैंपल हम भारतीयों अभी तक देखने को नहीं मिला है।

रिसर्च के मुख्य कार्यकर्ता

इस रिसर्च को IISER KOLLKATA कैमिकल साइंस की प्रोफेसर माला रेड़्डी एवं भौतिकी विज्ञान की प्रोफेसर निर्मला घोष ने  तथा आई आई टी खरगपुर की टीम ने एक साथ मिलकर पूरा किया था।

फडींग

इस रिसर्च को भारत सरकार की संस्था DST तथा SERB यानी साइंस एण्ड इंजीनियरिंग रिसर्च बोर्ड के सर्वणाज्यंति फालोशीप प्रोग्राम के तहत फडींग दी गयी थी।

सांइटीफिक नाम

इस ग्लास का सांइटीफिक नाम बाइपाइराज़ोल कार्बनिक क्रिस्टल या पिजोइलेक्ट्रिक आणविक क्रिस्टल के नाम से भी जाना जाता है। अगर आप खुद से इस रिसर्च के बारे में पता करना चाहते है तो अपको dst.gov.in के पेज पर जाकर सर्च करना है self healing property spoted in organic crystals आपको सारे नतीजे मिल जायेंगे। इसके अलावा आप दूसरे लिंक यानी गुगल पर cmalla raddy self healing research आपको रिसर्च पेपर मिल जायेंगा।

इज़ारायल

इज़ारायल ने इस ग्लास का नाम पेप्टाइड आधारित ग्लास रखा है जिसकी खोज telaviv university ने बायोलोजिकल मोलिक्योल में अमीनो एसिड और peptides का इस्तेमाल करके बनाया है। इस ग्लास की खास बात यह कि यह पर्यावरण के अनुकूलित है। अगर यह ग्लास टुट जाता है तो रुम टेम्परेचर या सामान्य वातावरण में ही नमी मिलते ही अपने आप को जोड़ लेता है।

जापान

जापान की टोकीयो युनिवर्सीटी के एक छात्र ने गलती से इस प्रकार के मटेरियल की खोज कर दी। इस पर पहले से किसी टीम को नहीं लगाया गया था। 
 खास बात यह है कि  यह ग्लास भी टूटने पर सामान्य वातावरण में कुछ सेकंड य मिनटों तक आपस में जोड़े रहने पर आपस में अपने आप जुड़ जाता है। यहां हम इस बात का ख्याल रखना है कि टूटा हुआ हिस्सा खोना नहीं चाहिए।

2026-05-24

मेघनाथ साहा

meghnad saha

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में देश के महान वैज्ञानिक एवं क्रांतिकारी नेता मेंघनाथ साहा तथा उनके द्वारा की गई महत्वपूर्ण खोज के बारे में बताया गया है। ये वही वैज्ञानिक है जिनका नाम 6 नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया था मगर नोबेल पुरस्कार नहीं मिल पाया। कुछ लोग इस के पीछे के कारण उनका छोटी जात का होना मानते है। मगर कुछ विचारकों का मानना है कि इसके पीछे का कारण उनकी खोज के प्रमाणीकरण को सही न मानना था। इसके साथ ही हम इस लेख में उनके नाम पर बनी महत्वपूर्ण स्मारक स्थल के बारे में चर्चा करेंगे।

प्रारम्भिक जीवन 

उनका जन्म 6 अक्तूबर 1893 को शाओराटोली वर्तमान बंगला देश में हुआ था। अपने परिवार के निर्धन होने के बावजूद भी अपनी प्रतिभा के दम पर छात्र वृत्ति हासिल कर अपनी पढ़ाई जारी रखी। इसके साथ ही उन्होंने कलकत्ता प्रेसडेंसी कालेज से शिक्षा हासिल की और पढ़ाई। इनके मित्रों कि सूची में सत्येन्द्र नाथ बोस का नाम आता है। इनके प्रिय शिक्षक की सूची में जगदीश चन्द्र बोस तथ  प्रफुल्ल चन्द्र राय का नाम आता है।

इनके द्वारा किए गए कार्य

1.साहा समीकरण
1920 में इन्होंने साहा आयनीकरण समीकरण का प्रतिपाद किया। यह समीकरण खगोल भौतिकी के बुनियादी स्तंभों में से एक है। इसका महत्व समझें इस समीकरण की मदद से हमें पता चलता है कि किस तरह से किसी तारे जैसे सूर्य के अत्यधिक तापमान के कारण उसके तत्व किस तरह से आयनित यानि lonize होते हैं। इसके साथ ही इस समीकरण की मदद से वैज्ञानिक दूर स्थित तारों के तापमान, दबाव और वहां मौजूद तत्वों जैसे हाई़़ड्रोजन हीलियम की मात्रा का सटीक पता लगाने में सक्षम हुए। प्रसिद्ध खगोल शास्त्री नोरिस रसेल ने इसे गैलीलियो के बाद खगोल विज्ञान की सबसे बड़ी खोज बताया था।

2.साहा इंस्टीट्यूट आफ न्यूक्लियर फिजिक्स की स्थापना इनके द्वारा कलकत्ता में की गई जो कि परमाणु भौतिकी के रिसर्च का एक प्रमुख केंद्र बना। मेघनाद साहा केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रहे ,उन्होंने भारत में विज्ञान के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य किये।
3.इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अन्तर गत भौतिकी विभाग को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
4.विज्ञान के प्रचार एवं प्रसार तथा लोगों को विज्ञान के प्रति जागरूक करने के लिए इन्होंने साइंस एंड कल्चर पत्रिका की शुरुआत की।
5.वैज्ञानिक कार्य के साथ ही इन्होंने भारतीय सामाजिक कार्य तथा राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण कार्य किया। भारत में बाढ़ की समस्या के निपटने के लिए दामोदर घाटी परियोजना तथा भाखड़ा नांगल बांध परियोजना की रुप रेखा तैयार करने में अहम भूमिका निभाई।

6.राष्ट्रीय योजना सनिति की स्थापना
नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के आग्रह पर भारत के योजनाबद्ध विकास के लिए इस समिति का गठन में अहम भूमिका निभाई जिसके अध्यक्ष बाद में जवाहर लाल नेहरु जी बने।

7.कैलेंडर सुधार में अहम भूमिका निभाई इन्होंने शाक कैलंडर त्रुटि सुधार में महत्वपूर्ण कार्य किया।
8.वे एक ऐसे वैज्ञानिक थे जिनका मानना था कि वैज्ञानिकों की आवाज उठाने के लिए सांसद में एक सीट होने चाहिए जिसके चलते 1952 में उत्तर पश्चिम कलकत्ता सीट से एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रुप में भारी बहुमत से लोकसभा सांसद चुने गए।

निधन

16 फरवरी 1956 तो नई दिल्ली में योजना आयोग के दफ्तर जाते समय दिल का दौरा पड़ने के कारण उनका निधन हो गया। मेघनाथ साहा का जीवन इस बात का प्रतीक है कि कैसे एक व्यक्ति अभावों से उठकर न केवल वैश्विक विज्ञान को नई दिशा दे सकता है, बल्कि अपने देश के विकास में भी अद्वितीय योगदान दे सकता है। 

नोबेल पुरस्कार न का कारण

यह विज्ञान के इतिहास का सबसे बड़ा विवाद और अन्यायों में से एक माना जाता है। नोबेल पुरस्कार पाने के लिए किसी वैज्ञानिक का नाम आधिकारिक रुप से नामांकित किया जाना जरूरी होता है। मेघनाद साहा का नाम 1930 1937 1939 1940 1951 1955 में भौतिकी के नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया। लेकिन कुछ प्रमुख कारणों के चलते हुन्हें नोबेल पुरस्कार नहीं मिल पाया।

मूल्यांकन कर्ताओं की राय

नोबेल समिति के मुख्य मूल्यांकन कर्ता स्वीडिश भौतिक विज्ञानी कार्ल सीगबान थे। उनका मानना था कि साह कि खोज खगोलीय अनुप्रयोग है न कि शुद्ध भौतिकी मानने में थोड़ा संकीर्ण सोच रखती है। इसके साथ ही यह भी कहा गया कि उनकी खोज सैद्धांतिक है। उन्होंने गणित और भौतिकी के नियमों का उपयोग करके समीकरण दिया था। नोबेल समिति अक्सर उन खोजों को प्राथमिकता देती थी जिनका प्रयोगशाला में व्यावहारिक प्रदर्शन तुरंत हो चुका हो।

राजनीति और वैश्विक समीकरण

1920 से 1950 के बीच का समय काल विज्ञान की दूनिया पर यूरोपीय और अमेरिकी वैज्ञानिकों का वर्चस्व था। औपनिवेशिक भारत से आने वाले वैज्ञानिकों को वैश्विक मंच पर वह समर्थन नहीं मिल पाता था।

अन्य वैज्ञानिकों की प्राथमिकता

1930 के समय काल में जब साहा का नाम चर्चा में था तब क्वांटम मैकेनिक्स और न्यूक्लियर फिजिक्स में कई अन्य बड़ी खोजें जैसे न्यूट्रान की खोज और पाजिट्रान की खोज पर काम करने वाले वैज्ञानिकों की तरफ ज्यादा चला गया।

प्रसिद्ध वैज्ञानिकों की राय

नोबेल पुरस्कार न मिलने के बावजूद दुनिया के सर्वोत्तम वैज्ञानिकों ने उनके काम की सरहना की उनके काम को सर्वोच्च माना। ब्रिटीश खगोल शास्त्री सर आर्थर एडिंगटन और नोरेस रसेल जैसे दिग्गजों ने स्पष्ट कहा था कि खगोल भौतिकी में साहा का योगदान किसी भी नोबेल पुरस्कार से कही बढ़कर है। भारतीय विज्ञान जगत में उन्हें हमेशा एक ऐसे नायक के रुप में देखा जाता है जिसने सीमित संसाधनों में ब्राम्हांड के सबसे बड़े रहस्यों को सुलझाया।

2026-01-04

पानी की याददाश्त

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प्रस्तावना

हेलो दोस्तों प्रस्तुत लेख में हम बात करेंगे पानी की जैसे हमारी याददाश्त होती है ठीक उसी प्रकार पानी की भी याददाश्त होती है यह अपने आप में एक चौकाने  वाला रहस्य है इसे जानना हमारे लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हमारे दैनिक जीवन को  प्रभावित करता है क्योंकि मानव शरीर भी लगभग 75% पानी से ही बना है अतः जिस प्रकार का पानी हम पीते हैं वह हमारे शरीर और विचारधारा को प्रभावित करता है इस लेख के माध्यम से हम इस बात के तथ्यों के प्रमाणीकरण पर बात करेंगे।

Schizophrenia

एक मानसिक बीमारी है। जो किसी व्यक्ति के सुनने महसूस करने और व्यवहार करने के तरीकों को प्रभावित करती है। इस बीमारी के चलते मनुष्य वास्तविकता से दूर हो जाता है या उससे मतिभ्रम  हल्लुसीनेशन जैसी समस्याएं होती है।.खास बात यह है कि इसका कोई इलाज नहीं है। बस कुछ उपचार के तरीके जिससे इसे नियंत्रित किया जा सकता है। मतिभ्रम के अलावा इसके अन्य लक्षणों में डीस ऑर्गेनाइज्ड थिंकिंग अव्यवस्थित सोच एवं भाषण और डिसआर्गेनाइज्ड बिहेवियर यानी अव्यवस्थित व्यवहार या नकारात्मक लक्षण या भावनाओं  को न व्यक्त कर पाना है। इसके अंतर्गत ना बात कर पता है रुचि न ले पाना य प्रेरणा मोटिवेशन की कमियां भी आता है। 

कारण

इसके होने के मुख्य कारण है जिनमें ब्रेन केमिस्ट्री में असंतुलन और तनाव पूर्ण जीवन की घटनाएं इसके अलावा कुछ विज्ञानको ने इसे जेनेटिक डिसऑर्डर तथा पर्यावरणीय कारकों को भी शामिल किया है अब यहां पर्यावरणीय कारकों में मुख्य रूप से पानी की ओर इशारा किया गया है। समझिए धूप बरसात या सर्दी या आपदा संकट का हम एक निश्चित समय तक सामना करते हैं। 

ऐसी घटना में हमें आसपास में रहने वाले सहयोगियों का सहयोग मिलता है मगर पानी हमारे रोजाना के जीवन की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है और यह हमें इस प्रकार की बीमारियों से ग्रसित भी बन सकता है अगर हम शुद्ध पानी नहीं पीते यहां शुद्धता का मतलब साफ पानी से नहीं है बल्कि जिस बर्तन में उस पानी को पीते हैं जिस स्थान य जिस वस्तु या सामान के बगल में उस पानी को रखते से हैं।

 उसी प्रकार हमारा दिमाग भी पानी से भरा होता है और हमारी बातों एवं विचारों विचार जो हम  सोचते हैं उसे सुनता है अगर आप रोज नेगेटिव बातें बहुत सोचते हैं तो यह निश्चित रूप से आप वह काम नहीं कर पाएंगे लेकिन अगर आप पॉजिटिव बातें करते हैं किसी काम को लेकर  तो आपकी बॉडी कार्य करने की क्षमता और पॉजिटिव एनर्जी का विकास करती है।
 निम्नलिखित वैज्ञानिकों द्वारा किए गए कुछ महत्वपूर्ण शोध 

जैक्स बेनवेनिस्ट का शोध

यह फ्रांसिस इम्यूनो लोजिस्ट  immunologist है ।1988 में नेचर पत्रिका में इनका एक लेख प्रकाशित हुआ जिसमें उन्होंने बताया कि पानी एंटीबॉडीज की याददाश्त बनाए रखता है हालांकि इस लेख पर काफी विवाद हुआ बाद में इस प्रकार के प्रयोग को लैब या प्रयोगशाला में दोहराया नहीं गया शोध के मुख्य बिंदु कहते कि अपनी अपने संपर्क में आए पदार्थ की जानकारी या उसके गुणों को याद रखता है। 

मसरू इमोटो Masaru Emoto

यह एक जापानी शोध करता थे जिन्होंने अपनी शोध में क्रिस्टल पर विचार और भावना के प्रभाव का प्रयोग किया लेकिन उनके प्रयोग में वैज्ञानिकी कार्य प्रणाली की कमी थी जिस कारण उनकी भी खोज को वैज्ञानिक प्रमाणित नहीं माना गया इस रिसर्च पर छपी उनकी किताब  the hidden message in water 2004 my best seller thi अमेरिका में।

उन्होंने पानी पर दो प्रकार की शोध है किये पहले शोध में उन्होंने क्रिस्टल वाटर को यानी पानी को जमा कर उनके अगल-बगल कुछ संगीत या शब्दों का प्रयोग करके उन में बनने वाली आकृतियों पर रिसर्च की।
खराब आकृति वाले रिसर्च में पता लगा कि अगर उनके सामने गलत शब्द का प्रयोग या फिर गलत चीज बोली जा रही है तो हमें गलत आकृतियां बन रही है वहीं अगर सुरीले संगीत मधुर बातों या अच्छी बातों का उजागर किया जा रहा है तो अच्छे क्रिस्टल बने।

दूसरे शोध में तीन जार को लिया गया जिनमें कुछ चावल रखे गए और उन्हें पानी से भर दिया गया इसके बाद तीनों जार को एक महीने तक एक कमरे में रखा गया। मसारू  इमिटो रोजाना तीनों जार के पास रोजाना जाते पहले जाकर पास जाकर अच्छी बातें कहते हैं । दूसरे जार के पास जाकर उसे नजर अंदाज करते और तीसरे जार के पास जाकर उसे भला बुरा कह कर चले आते यह प्रक्रिया क्या लगातार 30 दिनों तक की गई उसके बाद परिणाम कुछ इस प्रकार है कि पहले जार के चावल अच्छे फूल गए और उन्हें फफूंद भी नहीं लगी थी दूसरे जार के चावल जो कि ना तो सड़े ना ही प्रॉपर तरीके से फूल मतलब प्रक्रिया धीरे हो गई। तीसरी जार के चावल सड़ गए।.

उनके रिसर्च का मुख्य मकसद

मसरी मोटा के पानी के प्रयोग का परिचय देते हुए बताया कि पानी पर सकारात्मक और नकारात्मक शब्द विचार और भावनाओं का असर पड़ता है यह मोटो का मानना था कि पानी एक मौलिक और सार्वजनिक पदार्थ है जो मानवीय भावनाओं और इरादों से गहराई से प्रभावित होता है मसारु एमिटो का मानना था कि पानी को पराबैंगनी प्रकाश या कुछ विद्युत चुंबकीय तरंगों के संपर्क में ला कर बदलावों को पूरी तरह ठीक किया जा सकता है।

भारतीय समाज से इसका संबंध

प्राचीन काल में तमाम मौलाना बाबा साधु या जब किसी व्यक्ति की तबीयत खराब होती थी या कोई जादू करना होता था तो उसे पानी को फूंक कर देते थे उसे समय हमें लगता था कि यह अंधविश्वास है मगर असल में यह एक वैज्ञानिक तरीका था इलाज की खास बात यह थी कि यह पानी असर भी करता था।
भारतीय समाज में पानी को रखने से लेकर पीने तक के त कुछ नियम बनाए गए थे पुराने जमाने में पीने के पानी को पहले तांबे के बर्तन में 10 से 12 घंटे तक छोड़ दिया जाता था उसके बाद उस पानी को पिया जाता था ऐसा करने से तांबा पानी के साथ अभिक्रिया करके उसे आयुर्वेदिक औषधि बना देता था और उसमें मौजूद विषैला कण सतह पर बैठ जाते थे।

भारतीय समाज में पुराने जमाने में हर प्रातः काल पानी वाले बर्तन को इमली से मजा जाता था उसके बाद थोड़ी  विभूति और थोड़ा कुमकुम लगाकर पानी वाली बर्तन की पूजा की जाती थी। 
भारतीय समाज ने शुद्ध पानी के लिए बहुत सी लड़ाइयां भी लड़ी जैसे 20 मार्च 1927 में बी आर अंबेडकर ने महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में जमादार तालाब पर पानी पीने का अधिकार अछूत को दिलाया हालांकि अधिकतर अछूतों की मिला मगर थे वे भारतीय ही।.सोर्स मीडिया लैंड नेटवर्क और दैनिक जागरण

2025-11-08

मोहम्मद रईस मारकानी

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प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम भारत के एक कार मकैनिक एवं वैज्ञानिक मोहम्मद रईस के बारे में बात करने जा रहे है वे चर्चा में इसलिए है क्योंकि हाल ही में उन्होंने एक नये प्रकार के कार इंजन का अविष्कार किया जोकि पानी से चलता है। यानि अब कार पानी से भी चल सकती है।. हांलकि इस विषय पर पहले भी रिसर्च हो चुकी थी जैसे कि स्टीम इंजन के द्वारा कार आदि को चलना मगर इस प्रकार के इंजन में समस्या यह थी कि यह अत्याधिक गर्म होते थे ,जिसके कारण लम्बे समय तक चलना या लम्बी यात्रा करना इससे सम्भव नही था।. अतः मोहम्मद रईस की यह खोज एक महत्वरुर्ण कदम साबित हो सकती है।.

मोहम्मद रईस कौन हैं

मोहम्मद रईस मकरानी मध्य प्रदेश के एक कार वैज्ञानिक है जिन्होंने लगभग पांच साल मेहनत करके के इस प्रकार के इंजन का अविष्कार किया। यह एक ऐसी खोज है जिसने पुरी दुनिया को चौंका दिया है। इस प्रकार की खोज से देशी ही नही विदेशी उद्योगपतियों कि होश उड़ा दियें है। मोहम्मद रईस के बारे में बात करे तो 2016 के उनके वायरल विडीयो के बाद से उनके बारे में कोई खबर ,समाचार पत्र य किसी न्युज़ चैनल य किसी सोशल मिडीया प्लेटफार्म पर कोई खबर नही है।.मो.रईस मकरानी ने अपनी इस तकनीक का पेटेंट भी करा रखा है जि एक अच्छी बात है। आपको बताते चले कि उनकी यह तकनीक चीन भी अपनाना चाहता था मगर मो.रईस मकरानी ने शर्त रखी की कार बनाने कि फैक्ट्री उनके होम टाउन यानि मध्य प्रदेश में सर्वप्रथम लगायी जायेगी।
मगर चाईना ने यह शर्त रखी की वे उनके प्रोजक्ट मे तभी निवेश करेंगे जब कम्पनी चीन में लगाई जायेगी। दुसरी तरफ हमारी भारत सरकार ने भी स्वयं उनके इस प्रोजक्ट पर कोई ध्यान नही दिया। जिसके कुछ प्रमुख कारण है जिसके बारे में हम आगे के भाग में बात करेंगे।.

पानी ईधन के रुप में प्रयोग

दरअसल पानी ईधन नही है ,बल्कि पानी की जगह ,पानी और कैल्शियम कार्बाइट के रियेक्शन निकलने वाली एसटीलिन गैस ईधन है। हांलकि इसे ईधन के रुप में प्रयोग करने के लिए कार इंजन में कुछ बदलाव करने पड़ते है जिसके बाद आप इस गैस को आसानी से इस्तेमाल कर सकते है। जो कि एक मैकेनिक व्यक्ति आसानी से कर सकता है। इसके लाभ के बारे में बात करे तो 1.एसिटिलीन गैस का प्रयोग करने से ईधन खर्च लगभग दो रुपये प्रति किलोमीटर पड़ता है ,जोकि अपने आप में एक कमाल की बात है। 2.इसके साथ ही यह पर्यावरण के अनुकूल है यानि इससे पर्यावरण प्रदूषण न के बराबर होता है।.
रासायनिक अभिक्रिया देखें तो-
पानी (H2o)जब कैल्शियम कर्बाइट(cac2) के साथ अभिक्रिया करता है तो एसटिलीन गैस (c2H2)बनती है जो कि ज्वलनशील होती है। जिसका प्रयोग ईधन के रुप में किया जा सकता है।.

सरकार की लापरवाही का कारण

1.सरकारी तथा गैर सरकारी कम्पनी का ढ़ेर सारा निवेश
कम्पनीयां अपनी रोजगार को ज्यादा समयावधि के लिए जारी रखने को लिए दस साल से लेकर बीस साल तक का समझौता करते है ताकि एक ही दाम पर वे कच्चामाल सालों साल खरीद सके और महंगे दामों में बेच सके। अतः इसके लिए समझौते के अनुसार एक बार में ही बड़ी रकम जमा करनी होती है जो कि करोड़ों में हो सकती है। यहां हम कुछ सरकारी एवं गैर कम्पनीयों एवं उनके मार्केट कैप के बारे में बात करने जा रहे ताकि आप अन्दाज़ा लगा सके। 1.OIL 77करोड़ 2. MRPL 27करोड़ 3.HPCL 83करोड़ 4.LNG 51करोड़ 5.GAIL 1 लाख 27करोड़ यह सब तो सरकारी कंपनी है इसके अलावा नायरा,जीयो बीपी,के पर्न आयल एण्ड गैस आदि है जो पेट्रोलियम में निवेश करती है।.
2.अचानक या तत्कालीन प्रभाव
किसी भी तकनीक तत्कालीन प्रभाव से अपनाना का कठिन कार्य है क्योंकि कम्पनीयाों को अपनी मैन्युफैक्चरींग तकनीक में बदलाव लाना होता है जो की धीरे धीरे सालो के प्रयास से ही सम्भव हो पाता है।.
3.विदेशी राजनीतिक दबाव
जैसा की हम जानते है कि भारत में पेट्रोल विदेश से निर्यात किया जाता है ,जिनमें दो पर्टियों के बीच समझौता किया जाता है जो कि पांच साल ,दस साल य उससे ज्यादा का हो सकता है। अब समझीये की हर देशी -विदेशी कम्पनी अपनी सरकार एवं अर्थव्यवस्था में अपनी अहम भूमिका निभाती हैं। अतः पहला कारण तो यह होता है कि अचनाक से किसी कम्पनी से समझौता तोड़ना य किसी नयी तकनीक में तत्तकालीन प्रभाव से निवेश करना सम्भव नहीं है, इससे कम्पनी के व्यापार कि छवि पर गलत असर पड़ सकता है। दुसरा कारण विदेशी देश अपने से छोटे देशों को इन्हीं कम्पनीयो के समझौतों की मदत से शौषण करते है, जिसके कारण से प्रशासनिक और राजनीतिक दबाव बढ़ता है।

वैज्ञानिकों को हमारा सुझाव

1.देखीये कोई भी खोज एक खजाने की तरह होती है। इसे कब, कहां ,कौन , कैसे कर दे कुछ कहा नहीं जा सकता है। मगर इस खजाने को सहेज पाना सबके बस कि बात नहीं है । भारत में अभी भी ऐसी कम्पनीयां एवं सरकारे नहीं बन पायी हैं जो कि तत्काल में किसी तकनीक में निवेश कर सकें।
2.दोस्तों आप माने या न माने लेकिन हर खोज कि शुरुआत एक गलती से य एक घटना से होती है। जिसे देख कर वैज्ञानिक के दिमाग में ढेर सारी सम्भावनाये उठती है। जो आगे चलकर एक खोज का रुप ले लेती है।.अब ऐसे में 5 साल कि विदेशी शिक्षा का टैग लेकर घुमने वाले लोग यह मानने को तैयार ही हो पाते है कि , कोई हाईस्कूल पास व्यक्ति किसी इनोवेशन य तकनीक की खोज कर सकता है। इसे वो अपनी बेईज्जती के रुप में लेते है। हांलकि सब एक जैसे नहीं होते।.
3. अपनी खोज को कई भागों में विभाजित करके रखे, ताकि ज़रुरत पड़ने पर आप ही उसका इस्तेमाल कर सकें।.
4.अपनी क्षमता को परखे, निवेश करने से पहले अपनी चल-अचल सम्पत्ति का विवरण ले य विचार करें तथा उसका तीस प्रतीशत हिस्सा ही निवेश करें।.
5. बाहरी लोंगो पर अपनी निर्भरता कम रखें तथा अगर सम्पत्ति का अभाव है तो सम्पत्ति को जोड़ें ।. अगर निवेश में अधिक समय लग रहा है तो अपनी आने वाली पिढ़ी को वे सौंपे मगर परखने के बाद क्योंकि हर कोई अपकी खोज की कद्र नहीं कर सकता ।
6.अच्छे ओर भरोसे मंद लोगों की टीम बनाये।
7.अतः उपरोक्त सभी कार्यों को करने बाद अपनी खोज का खुलासा करें।
हम भी चाहते है्ं कि आपको आपकी मेहनत का पुरा क्रेडीट मिले ,ये आपका हक है।
सोर्स-युट्यूब,विकीपिडीया,Indiatv.in

2025-10-19

डाक्टर वासुदेवन

Plastic-Man-of-India
प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम भारतीय इंजीनियर एवं वैज्ञानिक डाक्टर राजगोपालन वासुदेवन के बारे में चर्चा करेंगे । 2018 में उन्हें भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म श्री से सम्मानित किया गया। इसके अलावा उन्हें तामिलनाडु सरकार की संस्था प्लास्टिक मैन्यफैक्चर्स एसोसिएशन कि तरफ से टैपमैन पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया है । इसके साथ ही उन्हे रोटरी क्लब आफ तिरुनगर की तरफ से सर्वश्रेष्ठ व्यवसायिक पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया है ।  इन्होंने प्लास्टिक वेस्ट का इस्तेमाल सड़कों के निर्माण करके ,भारत देश को प्रगति के मार्ग पर अग्रसर किया है । जैसा कि हम लोग जानते हैं कि आये दिन प्लास्टिक वेस्ट पुरी दुनिया के लिए एक समस्या का कारण बनता जा रहा है चुंकि इसे रिसाइकल करना बहुत ही कठिन कार्य है । अतः यह पर्यावरण प्रदूषण का मुख्य कारक है जिसके निपटा रण के लिए हर देश प्रयास कर रहा है । ऐसे में उनकी यह पहल एक अहम कदम साबित हो रही है । उनके इस प्रयोग के चलते सड़क निर्माण की लागत में  तथा सड़कों के  रखरखाव में भारी कमी आयी है । सरकार द्वारा उनकी तकनीक अपनाते होये 11 राज्यों में सड़कों का निर्माण भी किया जा चुका है।

प्रारम्भिक जीवन एवं शिक्षा

1965 से 1967 के समय काल में उन्होंने मद्रास विश्वविद्यालय से विज्ञान विषय से स्नातक एवं एम.एसी की शिक्षा एवं पी.एचडी की उपाधि ग्रहण की। 1995 में त्याग राज कालेज आफ इंजीनियरिंग में प्रवक्ता के रुप में अपना करियर प्रारम्भ किया। 1998 में वे इसी कालेज के प्रोफेसर बन गये। इन्हें प्लास्टिक मैन आफ इण्डिया के नाम से भी जाना जाता है।. इनका पुरा नाम राजगोपालन वासुदेवन है। अपनी रिसर्च के दौरान इन्होने पाया की प्लास्टिक और बिटुमेन दोनों ही पेट्रोलियम से निकलने वाले उत्पाद है और दोनों ही ज्वलनशील भी है अतः इन्होंने दोनो के मिलान से एक टिकाऊ और मजबूत पदार्थ का निर्माण किया जिसका प्रयोग वर्तमान समय में सड़क निर्माण में किया जाता है। 
शुरुआती समय में सड़क निर्माण के लिए छोटे छोटे पत्थरो में बिटुमेन तथा अन्य सामग्री का मिश्रण किया जाता था ।  सर्दियों के मौसम में बिटुमेन सिकूड़ कर मजबूत हो जाता था जोकि अच्छी बात थी. लेकिन गर्मीयों के मौसम में पिघलने लगता था जिसके कारण भारी वाहन के आने जाने से सड़के टूट जाती थीं। परिणामस्वरूप सालों साल इनकी मरम्मत का कार्य चलता रहता था। जिसमें समय और लागत दोनों का नुकसान होता था।.

बिटूमेन

इसे डामर भी कहते है इसके अलावा इसे चौवा य राल जैसे शब्दों से भी संम्बोधित किया जाता है। सरल भाषा में बात कि जाये तो यह एक पेट्रोलियम का अर्ध ठोस ,चिपचिपा और काला पदार्थ है जिसका प्रयोग सड़कों तथा छतों की वाटरप्रुफिंग के य नमी रोधी परते बनाने ,हवाईअड्डो के फुटपाथ निर्माण में किया जाता है । इसके साथ ही इसका प्रयोग इमारतो की नीव में तथा लकड़ी को सड़ने से बचाने के लिए किया जाता है।. नदीयों के किनारों पर खड़ी नाव में आप इसे देख सकते है ।.

प्लास्टोन

यह प्लास्टिक का डामर होता है जिसका प्रयोग बाहरी जगहों अथवा सिमेंट ब्लाकों के स्थान पर किया जाता है।.

प्लास्टिक मैन आफ इण़्डिया 

डाक्टर वासुदेवन को प्लास्टिक मैन आफ इण़्डिया के नाम से भी जाना जाता है । उनके द्वारा किये गये कुछ महत्वपुर्ण कार्य निम्नलिखित है।.

  1. विभाग आवधि कार्य
  2. चेन्नई निगम 14/07/2002 सड़क निर्माण के लिए अपशिष्ठ प्लास्टिक
  3. चेपम्मा द्वारा आयोजित संगोष्ठी नेपाल 15/11/2002 सड़क निर्माण के लिए अपशिष्ठ प्लास्टिक
  4. एनावायरो भारतीय उद्योग परिसंघ 15/12/2002 सड़क निर्माण के लिए अपशिष्ठ प्लास्टिक
  5. तूतीकोरिन पोर्ट ट्रस्ट       05/12/2002 सड़क निर्माण के लिए अपशिष्ठ प्लास्टिक
  6. राजमार्ग अनुसंधान केन्द्र 11/12/2002 सड़क निर्माण के लिए अपशिष्ठ प्लास्टिक
  7. फिक्की मुंबई द्वारा अपशिष्ठ प्रबंधन पर 
  8. राष्ट्रीय संगोष्ठी       26/02/2003  सड़क निर्माण के लिए अपशिष्ठ प्लास्टिक
  9. आई पी एफ कोलकत्ता 20/08/2004 सड़क निर्माण के लिए अपशिष्ठ प्लास्टिक
  10. सी पी आई मुंबई कोर्प 08/10/2004 सड़क निर्माण के लिए अपशिष्ठ प्लास्टिक
  11. सी आई आई और आई आई टी चेन्नई 26/07/2004 सड़क निर्माण के लिए अपशिष्ठ प्लास्टिक

आगे की राह 


दोस्तो देखा जाये तो प्लास्टिक का इस्तेमाल वर्तमान समय पर काफी जोरो से हो रहा है सरकार चाह कर भी इस पर रोक नहीं लगा सकती क्योंकि ज्यादातर पेट्रोल रिफाइनरी सरकार द्वारा ही की जाता है जैसे कि भारत पेट्रोलियम,आयल इण्डिया लिमिटेड,गेल,एस.आर.पी.एल,एल.एन.जी इसके आलावा कुछ निजी कम्पनीयां भी है तो कचरे के तौर पर पाया जाने वाला ये प्लास्टिक प्योरिफाई करके मार्केट में बिकने के लिए भेज दिया जाता है जिससे इनका प्रयोग मोबाइल डिवाइस,पोलीथीन बनाने,सस्ते किस्म के घरेलु समान बनाने तथा रोजमर्रा के समानो की पेकेजिंग के लिए किया जाता है। इस प्रकार हम किसी न किसी बहाने 10 प्रतिशत प्लास्टिक रोज खाते हैं चाहे वो नमकीन चिप्स का पैकेट हो य किसी सोफ्ट या कोल्ड ड्रिंग का बोतल।.अभी भी अपको यकीन नहीं हो रहा होगा तो बताते चले कि एक निश्चत तापमान से अधिक तापमान होने पर प्लास्टिक पिघलने लगता है और हमारे खाने पिने की वस्तुओं में मिल जाता है । दोस्तों प्लास्टिक के प्रयोग से कैंसर जैसी जानलेवा बिमारियां होती है ।. तो कृप्या करके अपने और अपनों चाहने वालों कि सुरक्षा के लिए प्लास्टिक का प्रयोग कम से कम करें।.

2025-09-30

Bharos

 
bharos

परिचय

प्रस्तुत लेख हमारी historyindia वेब पेज टेक सेक्शन का महात्वपुर्ण भाग है। इस लेख के अंतर्गत भारतीय तथा अन्य देशों के महत्वपूर्ण ओपरेटिंग सिस्टम के बारे में बात करेंगे। इसके साथ वर्तमान समय तथा भविष्य में आने वाले नये बदलावों एवं प्रगति के बारे में भी बात करेंगे।

लेख का महत्वपूर्ण बिंदू

जैसा की हम जानते है कि पुरी दूनिया में एन्ड्रौड़ और आई.ओ.एस का बोलबाला है । जोकि अमेरिका की दो महत्वपु्र्ण कम्पनीयां है , दोनों ही कम्पनीयां स्मार्टफोन जगत में अपना एक उच्च स्थान ग्रहण किये हुए है इसमें कोई शक नहीं है। लेकिन आपके य किसी प्रतिव्यक्ति के डाटा सुरक्षा की बात आती है तो दोनों कम्पनीयां खरी नही उतरतीं। हालाँकि डाटा सुरक्षा को भंग य खतम करने को लेकर विदेशी एप्प य एप्लीकेशन की भी अहम भूमिका निभातीं है । मगर किसी एप्लीकेशन को हम अपने फोन या लेपटोप से आसानी से हटा सकते है मगर ओपरेटिंग सिस्टम को हटाने का अप्शन अभी भी हमारे पास नहीं है।.

अतः जिस प्रकार द्वितीय विश्व युद्ध के समय परमाणु बम बनाने की होड़ सभी देशों में लगी हुई थी । ठीक उसी प्रकार वर्तमान समय में स्वदेशी operating system बनाने की होड़ सभी देशों में लगी पड़ी है। जो कि समय ,सुरक्षा  और गोपनीयता के लिए ज़रुरी भी है। जिसकी सबसे पहले पहल चीन ने अपना Harmony OS बना कर की।. जिसके चलते उसे अमेरिका की तरफ से कई जोखिम भी उठाने पड़े। इसके बारे में  हम आगे बात करेंगे ,इससे पहले हम इस ओपरेटिंग सिस्टम की खुबीयों के बारे में बात करेंगे।

यह पुरी तरह से एन्ड्रोयड के ओप सोर्स प्रोजक्ट का हिस्सा है लेकिन गुगल कि किसी भी सेवा से सम्बन्धित नही है । इसमें से गुगल के प्लेस्टोर एवं प्ले सर्विस को पुरी तरह से हटाने के साथ एन्ड्रोयड की सभी प्री इस्टाल एप्प को भी हटा दिया गया है । जिसके कारण यह ओपरेंटिग सिस्टम गोपनियता और सुरक्षा के मामले में एपल ओर गुगल कम्पनी को  मात देता नजर आ रहा है। इस ओरेटिंग सिस्टम के चलते चीन की अमेरिका पर निर्भर रहने संभावनाओं में गिरावट आयी है जो कि चीन के लिए एक अच्छी बात है।. लेकिन अमेरिका  के लिए बुरी खबर थी जिसके चलते अमेरिका गुस्से में है क्योंकि चीन ने उसकी मोनोपलि तो़ड़ने का काम किया है । अतः अमेरिका ने अपनी तनाशाही कायम रखने के लिए चीन पर ढेर सारे प्रतिबन्ध एवं कर में बढ़ोतरी की है वर्तमान के कुछ वर्षों में , जोकि उसके तानाशाही रवैये को दर्शाता है हालांकि भारत पर भी इसी वर्ष विदेशी निर्यात कर में 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी की गयी है क्योंकि चीन का लगभग 38 प्रतिशत  मार्केट भारत में ही है। इस तरह से भारत चीन कि अर्थव्यवस्था में अहम भूमिका निभाता है। इसके आलावा और अन्य भी कारण हो सकते है।

हांलकि भारत ने भी ए.ओ.एस.पी आधारित स्वदेशी भार ओ.एस बनाया है । लेकिन वर्तमान समय में इस ओ.एस सम्बन्धित किसी समार्टफोन के लान्च होने कि पुष्टि नहीं हो पायी है। इसके पिछे भी एक महत्वपुर्ण वजह है , जिस कारण से भारतीय इंजीनियर में डर का माहौल है, जिसके बारे में आगे के लेख में आपको  पता चलेगा।.

हारमोनी ओ.एस

यह चीन का स्वदेशी ओ.एस है जिसे चीन की हुआवे कम्पनी ने बनाया है ।. जिसको बनाने के बाद से ही चीन और अमेरिका में तनाव का माहौल है। इस ओ.एस को बनने के बाद अमेरिकी सरकार तथा गुगल ने मिलकर हुआवे कम्पनी पर ढेर सारे प्रतिबन्ध लगा दिये। जिसके चलते हुआवे अपनी डिवाइस को चीन को छोड़कर किसी अन्य देश में नहीं बेच सकती । इसके साथ ही हुआवे की सब ब्रांड कम्पनी हानर का एन्ड्रायड लाइसेन्स रद्द कर दिया गया। जिसके कारण हानर कम्पनी रातोंरात मार्केट से गायब हो गई। अतः परिणामस्वरूप हुआवे को भारी नुकसान उठाना पड़ा। अगर सही समय पर चीन की सरकार हुआवे का समर्थन न करती तो वह पूर्णतः बर्बाद हो गयी होती। हालंकि इस घटना के कुछ समय बाद हानर कम्पनी को पुनः लाईसेन्स जारी किया गया। लेकिन हुआवे ने हानर पर विशेष ध्यान न देकर अपने हारमोनी ओ.एस पर ज्यादा ध्यान देना जारी रखा। 

म्युरेना ओ.एस

यह एक यूरोपियन कम्पनी द्वारा गुगल की साझेदारी के साथ लांच किया गया है । जहां तक हमारी जानकारी के अनुसार यह भी ए.ओ.एस.पी प्रोजक्ट का ही हिस्सा है , इसमें से भी प्ले स्टोर ओर प्ले सर्विस को हटा दिया गया।.लेकिन इन सब के बावजूद भी इसे पुरा सपोर्ट प्रदान किया जा रहा है । म्युरेना ओ.एस मार्केट में सेमसंग की एस सिरीज़ तथा पिक्सल सिरीज़ की यूरोपियन डिवाइस में मार्केट में देखने को मिल रहा है। इसके आलावा कन्पनी ने फेयरफोन नाम की स्मार्टफोन कम्पनी से साझेदारी की है ।.

फेयरफोन

यह भी एक यूरोप की ही कम्पनी है जो कि दूनिया का पहला समार्ट फोन मार्केट में लेकर आये है, जो अपने ग्राहकों को एक साल की अपेक्षा 5 साल की वारन्टी  देता है । इसके साथ ही यह दूनिया का पहला फोन होगा जो अपने ग्राहकों के अपनी इच्छा अनुसार ओपरेटिंग सिस्टम की चूनने की आजादी देता है।.फोन के साथ अगर आप एन्ड्रोयड को चुनते है तो आपको 8 साल का ओ. एस. अपडेट मिलता है, वहीं अगर आप म्युरेना ओ,एस को चुनते है तो कम्पनी आप को 5 साल का ओ. एस. अपडेट प्रदान करती है । यह खास इस लिए भी है क्योंकि गुगल के पिक्सल फोन के साथ जाने पर आपको 7 साल के ही ओ. एस. अपडेट मिलते है। एक खास बात ओर बता दें अपको यह कोल्कोम के प्रोक्सेसर 7 जेन 2 के साथ मार्केट में उतारा गया है। जिससे आप ओवर हिटिंग कि समस्या से सुरक्षित रह सकते है।.

भारत देश के लिए आगे कि राह

भारतीय इंजीनियर को भी अपने भार ओ.एस को मार्केट में लाना चाहिए । माना कि कम्पनी को कुछ हद तक जोखिम उठाना पड़ सकता है । लेकिन मार्केट में मौजूद डिवाइस पर ओपशन के तौर इसे इस्तेमाल करने का मौका देना चाहिए। ताकि युज़र इक्सपीरिंस को धिरे धिरे बढ़िया किया जा सके। शुरुआत में इ्से वही लोग इस्तेमाल करेंगे जो अपने डाटा को लेकर ज्यादा सेंसटिव है । इस पहल के चलते भारत स्वयं पर अमेरिका की निर्भरता को कम कर सकता है ।

वैसे वर्तमान समय में बहोत सी कम्पनीयां मेड इन इंडिया के नाम पर भारतीयों को मुर्ख बना ही रही है । भले ही उनके पार्ट किसी भी देश से आये मगर असेम्बलींग को मेड इन इंडिया का नाम देना तो गलत ही है। हम यह भी मानकर चलते है कि भार ओ.एस को मार्केट में लाने से उत्पादकों को ज्यादा लाभ नहीं होगा,मगर देश की सूरक्षा के लिए यह एक अहम कदम हो सकता है । धीरे-धीरे लोग इस पर स्विच करना प्रारम्भ कर ही देंगे।.

अन्य महत्वुपुर्ण लिंक

2025-02-15

Quantum Ai

quantum-ai

प्रस्तावना

 प्रस्तुत लेख में हम क्वांटम कम्प्युटिंग में कृत्रिम बुद्दिमत्ता के प्रयोग तथा इससे होने वाले लाभ तथा भविष्य में इसकी मदत से हमारे जीवन मे होने वाले लाभ और परिवर्तन के बारे में जानेंगे। (QAI) क्वांटम कंप्यूटिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के मिलन से बना है, जो लगभग हर उद्योग को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित कर सकता है। QAI मौजूदा AI प्रणालियों की क्षमताओं को बढ़ाने के लिए क्वांटम कंप्यूटिंग का उपयोग कर रहा है।

  QAI कैसे काम करता है

क्वांटम कंप्यूटर क्वांटम मैकेनिक्स के सिद्धांतों पर आधारित हैं, जिससे वे पारंपरिक कंप्यूटरों की तुलना में कुछ प्रकार की समस्याओं को तेज़ी से हल कर सकते हैं।

   मशीन लर्निंग मॉडल, कॉम्बिनेटरिक्स चुनौतियों का समाधान करने का प्रयास करते हैं, जिसमें कई चर और जटिल गणनाएँ शामिल होती हैं।

    पारंपरिक कंप्यूटरों पर AI का उपयोग करके इन समस्याओं को हल करने में बहुत समय लगता है, लेकिन क्वांटम कंप्यूटरों के साथ AI मॉडल का उपयोग करके ऐसी समस्याओं को सेकंडों में हल किया जा सकता है।

    क्वांटम कंप्यूटर बड़े डेटासेट में पैटर्न भी ढूंढ सकते हैं, जो पारंपरिक कंप्यूटर नहीं कर सकते, और वे अधूरे या करप्ट डेटा से निपटने के लिए बेहतर ढंग से लैस हैं।

  QAI के फायदे 

  • मार्गदर्शन और स्वायत्त प्रणाली -   QAI मार्ग निर्धारण या नेविगेशन के बेहतरीन रास्ते सुझा सकता है और स्वायत्त प्रणालियों में सुधार ला सकता है।
  •  दवा और चिकित्सा -   यह दवाओं की खोज को आगे बढ़ा सकता है, चिकित्सा और उपचार में सुधार कर सकता है।
  •  आपूर्ति श्रृंखला अनुकूलन -   QAI आपूर्ति श्रृंखला से जुड़े जटिल निर्णयों को अनुकूलित कर सकता है।
  •  वित्तीय अनुप्रयोग -   QAI जोखिम मूल्यांकन, धोखाधड़ी का पता लगाने, पोर्टफोलियो प्रबंधन और ऑप्शन प्राइसिंग जैसे कार्यों को अधिकतम रूप से अनुकूलित कर सकता है। शेयर बाज़ार के बर्ताव की सटीक भविष्यवाणी के लिए क्वांटम न्यूरल नेटवर्क मॉडल विकसित किए जा चुके हैं।
  • सुरक्षित संचार -   क्वांटम नेटवर्किंग व्यक्तिगत कणों के भौतिक हस्तांतरण के बिना क्वांटम अवस्थाओं को स्थानांतरित करने के लिये क्वांटम टेलीपोर्टेशन का लाभ उठा सकती है, सुरक्षित संचार को पुनर्परिभाषित कर सकती है और संभावित रूप से ‘क्वांटम इंटरनेट’ का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।

हालाँकि, QAI अभी भी विकास के अधीन है, इसलिए इसे व्यवहारिक रूप से अपनाने में तकनीकी प्रगति, विनियमों और उद्योग की निवेश करने की इच्छा पर निर्भर करता है।

क्वांटम कंप्यूटर के अन्य फायदे हैं, जिनमें शामिल हैं -

     गति और कार्य क्षमता -   क्वांटम कंप्यूटर क्लासिकल कंप्यूटर की तुलना में बहुत तेजी से गणना करते हैं, जिससे जटिल एल्गोरिदम का तेजी से निष्पादन संभव होता है।. यह कंप्यूटर एक ही समय में अधिक डेटा को समझ और गणना कर सकता है।. क्वांटम कंप्यूटरों में क्यूबिट्स का उपयोग किया जाता है, जो एक ही समय में 0 और 1 दोनों स्थितियों में हो सकते हैं, जिससे उन्हें सामान्य कंप्यूटरों की तुलना में अधिक गणनात्मक शक्ति मिलती है।.

      महत्वपुर्ण जानकारी को सुरक्षीत सहायक -   क्वांटम एआई इंजिनियरिंग  क्रिप्टोग्राफी डेटा को अविश्वसनीय रूप से सुरक्षित बना सकती है।. क्वांटम कंप्यूटर उन्नत एन्क्रिप्शन और क्वांटम क्रिप्टोग्राफी से उच्च गोपनीयता और डेटा सुरक्षा प्रदान करते हैं, जिससे संवेदनशील जानकारी को अनधिकृत पहुंच से बचाया जा सकता है।.

      आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का विकास -   क्वांटम कंप्यूटर का उपयोग भविष्य में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (कृत्रिम बुद्धि) के विकास के लिए किया जाएगा।. क्वांटम कंप्यूटरों की तेजी से गणना करने की क्षमता AI और मशीन लर्निंग के क्षेत्र में तथा समय यात्रा य भविष्य में नयी तकनीक के विकास में अहम भूमिका निभा सकता है।.

  1. समस्या को सुलझाना -   क्वांटम कंप्यूटर जटिल गणितीय गणनाओं, अनुकूलन और सिमुलेशन को हल करने में उत्कृष्ट है और वैज्ञानिक अनुसंधान और नवाचार के लिए नए रास्ते खोलता है।.
  2. सर्च इंजन में सुधार -   क्वांटम कंप्यूटिंग सर्च इंजन एल्गोरिदम में क्रांति लाने, अधिक सटीक और प्रासंगिक खोज परिणाम (Search Result) प्रदान करने और उपयोगकर्ता अनुभव को बेहतर बनाने में सक्षम है।.
  3. जलवायु मॉडलिंग -   क्वांटम कंप्यूटिंग जलवायु मॉडलिंग सिमुलेशन की परिशुद्धता और गति को बढ़ा सकती है, जिससे जलवायु परिवर्तन से संबंधित चुनौतियों को बेहतर ढंग से समझा और संबोधित किया जा सकता है।.
  4. वैज्ञानिक खोज -   क्वांटम-AI अभिसरण में बड़े डेटासेट को अधिक कुशलता से संभालने और विश्लेषण कर वैज्ञानिक खोज में तेजी लाने की क्षमता है।.
  5. अन्य -   क्वांटम कंप्यूटर का उपयोग दवा उद्योगों में कठिन रासायनिक गणनाओं को करने, यातायात अनुकूलन प्रणालियों को विकसित करने और साइबर हमलों से बचने के लिए किया जा सकता है।. क्वांटम कंप्यूटिंग से सामग्री विज्ञान, दवा खोज, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और क्वांटम संचार में खोज को सक्षम किया जा सकता है।. क्वांटम कंप्यूटर त्वरित कम्प्यूटेशनल गति प्रदान करते हैं, जिससे जल्द निर्णय लेने, बाज़ार में कम समय में पहुँचने और विभिन्न उद्योगों में उत्पादकता में वृद्धि होती है।.
  6. वर्तमान में क्वांटम एआई (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) का इस्तेमाल कई क्षेत्रों में हो रहा है -

      वित्तीय बाजार -   क्वांटम एआई का उपयोग जोखिम मूल्यांकन और धोखाधड़ी का पता लगाने, पोर्टफोलियो प्रबंधन और ऑप्शन प्राइसिंग में किया जा रहा है।. यह शेयर बाजार के बर्ताव की सटीक भविष्यवाणी के लिए क्वांटम न्यूरल नेटवर्क मॉडल विकसित करने में भी मदद करता है।.

      स्वास्थ्य सेवा -   क्वांटम कंप्यूटिंग अणुओं की पारस्परिक क्रियाओं की नकल करके दवा की खोज में तेजी ला सकती है और मेडिकल इमेजिंग में क्रांति ला सकती है।. यह बीमारियों की भविष्यवाणी और व्यक्तिगत ज़रूरतों के हिसाब से इलाज की विधि तैयार करने के लिए मशीन लर्निंग एल्गोरिदम को बढ़ा सकता है।.

      रसद और आपूर्ति श्रृंखला -   क्वांटम एआई माल ढुलाई के लिए रास्ते की योजना बनाने, गोदाम प्रबंधन और भंडार अनुकूलन को बेहतर बना सकता है, जिससे तेज और किफायती डिलीवरी हो सकेगी।. यह रुकावटों की भविष्यवाणी कर सकता है और संचालन को सुव्यवस्थित कर सकता है।.

      नेविगेशन -   क्वांटम कंप्यूटिंग जीपीएस (GPS) सटीकता को बढ़ा सकती है, जिससे चुनौतीपूर्ण वातावरणों में सटीक स्थिति बनाने की क़वायद को सक्षम किया जा सकता है।. क्वांटम एआई एल्गोरिदम वास्तविक समय में रास्तों से जुड़ी गणनाओं को अनुकूलित कर सकता है, जिससे यातायात प्रवाह में सुधार होगा और भीड़भाड़ कम होगी।.

      पर्यावरण -   क्वांटम एआई जटिल जलवायु परिदृश्यों के मॉडल तैयार कर सकता है और इकोलॉजी पर उनके प्रभावों की अधिक सटीक भविष्यवाणी कर सकता है]।. यह कुशल ऊर्जा उत्पादन और भंडारण के लिए अनोखी सामग्रियों की खोज का कारण बन सकता है।.

      सुरक्षा -   क्वांटम एआई उपकरण स्वायत्त हथियार और ड्रोन जैसे मोबाइल प्लेटफॉर्म प्रदान कर सकते हैं।. इनमें जीपीएस की सहायता से वंचित क्षेत्रों में उन्नत सेंसिंग, नेविगेशन और पोजिशनिंग विकल्प आदि शामिल हैं।.

      जलवायु मॉडलिंग -   क्वांटम कंप्यूटिंग जलवायु मॉडलिंग सिमुलेशन की परिशुद्धता और गति को बढ़ा सकती है, जिससे जलवायु परिवर्तन से संबंधित चुनौतियों को बेहतर ढंग से समझा और संबोधित किया जा सकता है।.

      वैज्ञानिक खोज -   क्वांटम-एआई अभिसरण बड़े डेटासेट को अधिक कुशलता से संभालने और विश्लेषण कर वैज्ञानिक खोज में तेजी लाने की क्षमता रखता है।.

क्वांटम एआई का उपयोग करने वाली कंपनियाँ

क्वांटम एआई का उपयोग करने वाली कई कंपनियाँ हैं, जो विभिन्न क्षेत्रों में इस तकनीक का लाभ उठा रही हैं-

  •  गूगल- गूगल ने क्वांटम कंप्यूटिंग में महत्वपूर्ण प्रगति की है और इसका उपयोग मशीन लर्निंग के लिए किया जा रहा है। यह कंपनी क्वांटम एआई के माध्यम से जटिल डेटा सेट्स का विश्लेषण और समस्याओं को हल करने में तेजी लाने पर ध्यान केंद्रित कर रही है।.
  •  आईबीएम- आईबीएम क्वांटम कंप्यूटिंग प्लेटफॉर्म विकसित कर रहा है, जो विभिन्न उद्योगों में डेटा विश्लेषण और अनुकूलन समस्याओं को हल करने में मदद करता है। आईबीएम का "क्वांटम एआई" प्रोजेक्ट स्वास्थ्य सेवा और वित्तीय सेवाओं में सुधार के लिए काम कर रहा है।.
  •  रिगेटी- रिगेटी एक क्वांटम कंप्यूटिंग कंपनी है जो अपने प्लेटफॉर्म पर क्वांटम एआई समाधान विकसित कर रही है। यह कंपनी विशेष रूप से वित्तीय सेवाओं और दवा खोज में क्वांटम एआई का उपयोग करने पर ध्यान केंद्रित कर रही है।.
  •  आयनक्यू- आयनक्यू भी क्वांटम कंप्यूटिंग में सक्रिय है और अपने उत्पादों के माध्यम से मशीन लर्निंग और डेटा एनालिटिक्स में सुधार करने का प्रयास कर रहा है। यह कंपनी स्वास्थ्य सेवा और लॉजिस्टिक्स में क्वांटम एआई का उपयोग कर रही है।.
  •  भारतीय सेना- भारतीय सेना ने हाल ही में एक क्वांटम कंप्यूटिंग प्रयोगशाला स्थापित की है, जो सुरक्षा और सैन्य अनुप्रयोगों के लिए क्वांटम एआई तकनीकों का विकास कर रही है।.
  • ये कंपनियाँ विभिन्न उद्योगों में क्वांटम एआई के उपयोग से जटिल समस्याओं को तेजी से हल करने, बेहतर निर्णय लेने और नए उत्पादों एवं सेवाओं के विकास की दिशा में अग्रसर हैं।
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