Indian History reveal the Past

हमारे इस ब्लॉग में भारतीय इतिहास, सांस्कृतिक इतिहास, राजवंशों आंदोलन स्टार्टअप टेक्नोलॉजी कला और वास्तुकला तथा आर्थिक इतिहास से संबंधित विषयों पर जानकारी दी जाती है। हम कम से कम शब्दों में ज़्यादा से ज़्यादा जानकारी देने की कोशिश कर रहे हैं।

लेबल

Movements लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
Movements लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

2026-10-05

दुर्गा दास राठौर

digital painting of a durgadas rathore

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में मारवाड़ की सेना में राजपूत सेनापति एवं राजनेता दुर्गा दास राठौर के कार्यों तथा उनके जीवन पर प्रकाश डाला गया है। दुर्गा दास जी एक सच्चे देश भक्त के साथ-साथ एक बहादुर सेनापति भी थे। मुगल सत्ता ने उन्हें कई बार प्रलोभन देकर अपने साथ मिलाने का प्रयास किया मगर दुर्गा दास उनके प्रलोभन में नहीं फंसे वे चाहते तो जन समर्थन से मारवाड़ की गद्दी भी ले सकते थे मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया।

वे अपनी स्वामी भक्ति से वचन बद्ध रहे जिसका खामियाजा भी उन्हें ही भुगतना पड़ा। उनके शौर्य और राजनीतिक सूझबूझ के चलते राजा से ज्यादा लोग उनकी प्रशंसा करते थे जिसके कारण मारवाड़ के राजा को उनसे ईर्ष्या होने लगी जिसके चलते राजा ने उन्हें अपने साम्राज्य से बाहर निकाल दिया य यूं कहे तो देश निकाला कर दिया। 

जबकि मारवाड़ के राजा दुर्गा  दास के प्रयासों से ही मारवाड़ के राजा बन पाये थे मगर  दोस्तों ईर्ष्या इतनी खराब चीज़ होती है कि यह आपको अपने खास य प्रिय लोगों से भी दूर ले जाती है। जिसका एक अच्छा खासा उदाहरण हमें दुर्गा दास जी की इस कहानी में देखने को मिलेगा।

जीवन परिचय

उनका जन्म राजस्थान की मारवाड़ रियासत में 13 अगस्त 1968 में हुआ था। उनके पिता आस्करण राठौर तात्कालिक  राजा जसवंत सिंह के राज मंत्री थे। तथा उनके दादा राव रणमल राजपूत वंश कराना से संबंध रखते थे। हलांकि कुछ ग्रंथों में दुर्गा दास  राठौर को मारवाड़  राजा के दूर के चाचा के बेटे के रुप में भी दर्शाया गया है। उनकी माता का नाम बाई जी नेत कंवर जी था जो कि सलवासा गांव से थीं।

राठौर साहब की दो पत्नियां थी  पहली का नाम लक्ष्मण कंवर तथा दूसरी का नाम केसर कंवर था। इनके चार पुत्र हुए जिनका नाम इस प्रकार है पहले का नाम अभय सिंह दूसरे का नाम तेज सिंह तीसरे का नाम अनोप सिंह तथा चौथे पुत्र का नाम दिलीप सिंह था। दुर्गा दास राठौर तीन भाई थे उनके भाइयों का नाम सुजान सिंह और जोरावर सिंह था।

उन्हें मुख्य रुप से राजा जसवंत सिंह के उत्तराधिकारी के रुप में जाना जाता है दरअसल एक युद्ध के दौरान राजा की हत्या कर दी गयी थी अतः षड्यंत्रकारियों से राजा के उत्तराधिकारी की रक्षा करने के लिए उन्होंने उनके पुत्र का संरक्षण किया तथा उन्हें पुनः राजगद्दी पर स्थापित करने अहम भूमिका निभाई। 

बचपन की घटना

अपने बचपन में दुर्गा दास राठौर लुनावे गांव में मकई की खेती किया करते थे। एक दिन राईका  यानी ऊंट चराने वाले ने उनके खेतों में अपने ऊंटों के चरने के लिए छोड़ दिया। परिणामस्वरूप पूरी फसल बर्बाद हो गयी जब वे राईका के ऊंटों द्वारा हुए अपने नुकसान का मुआवजा लेने के लिए गए तो राईका ने उन्हें बुरा भला कहा तथा राजा को भी टूंडा कहा है।

दरअसल उस समय राजा जसवंत सिंह मुगल साम्राज्य के अधीन एक सामंत के रुप में प्रशासन चलाया करते थे। मगर ऊंट चरवाहे की बातों को दुर्गा दास राठौर ने बहुत गंभीरता से और क्रोध में आकर उसकी जान ले ली।

मामला राज दरबार में पहुंचा तब दुर्गा दास के पिता भी राज दरबार में उपस्थित थे मगर उन्होंने अपने बेटे की तरफ से राजा से पैरवी नहीं की जबकि वे चाहते तो ऐसा कर सकते थे क्योंकि वे राज दरबार में ही मंत्री पद पर आसित  थे।

हलांकि राजा ने उन्हें बोलने का मौका दिया उन्होंने उनके पिता अस्करण से पुछा गया क्या ये तुम्हारा बेटा है तो उन्होंने जवाब देते हुए कहा महाराज कुपुत्र को पुत्र नहीं कहते। इसके बाद जब राजा ने दुर्गा दास से उनके अपराध के बारे में पुछा तो उन्होंने बड़ी निर्भीकता से अपराध को स्वीकार किया और राजा को बताया कि।

महाराज मैंने उस राईका की हत्या इस लिए की क्योंकि वे मेरे और आपके बारे में गलत बातें कर रहा था जो मुझसे सहन नहीं हुआ और मैंने उसकी हत्या कर दी। बालक की निर्भीकता से राजा बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने दुर्गा दास राठौर की पीठ थपथपाई।

बालक अजीत सिंह का सरंक्षण

28 नवंबर 1678 में जमरुद वर्तमान अफगानिस्तान  में युद्ध के दौरान राजा की मौत हो गयी। राजा  की दो रानियां थी पहली का नाम जादम और दूसरी का नाम नरुकी था जब राजा मरे उस समय काल ये दोनों गर्भवती थी। मगर राजा को अन्य वंशज राजगद्दी संभालने के लिए जीवित नहीं था। अतः मुगल साम्राज्य के सामंत होने नाते सभी फैसले मारवाड़ प्रशासन के लिए औरंगज़ेब द्वारा लिए जाते थे जिसके चलते मुगल शासन ने राजा जसवंत सिंह के भाई अमर सिंह के पौत्र इंद्र सिंह को मारवाड़ की गद्दी का कार्यभार सौंपा।

हलांकि वे नाम मात्र का  राजा था सभी कार्य मुगल प्रशासन द्वारा ही संभाला जाता था इंद्र सिंह की निगरानी के लिए राज दरबार में मुगल सैनिक तैनात किए गए थे। दूसरी तरफ जब 1679 में औरंगज़ेब को जसवंत सिंह की रानियों के गर्भवती होने की सूचना मिली तो उन दोनों को साथ दुर्गा दास राठौर के माध्यम से दिल्ली बुलाया गया। दिल्ली पहुंचने पर दोनों रानियों को नजरबंद कर दिया गया।

हलांकि दुर्गा दास बालकों के संरक्षण के लिए मुगल सम्राट के समक्ष गये थे क्योंकि विद्रोही जसवंत सिंह के वंशज छोटे राजकुमारों की हत्या की साज़िश रच रहे थे। रानियों के नजरबंद करने पर दुर्गा दास को मुगल सम्राट की नीतियों पर शक होने लगा इससे पहले की वे कोई प्रतिक्रिया दे पाते उससे पहले ही छोटे राजकुमार दल भंजन जिन्हें कहीं-कहीं दल चंबन भी कहा गया है कि हत्या कर दी गयी। अब राजा जसवंत सिंह के इकलौते उत्तराधिकारी अजीत सिंह बचे थे। 

प्रलोभन देने का प्रयास

जब दुर्गा दास समेत मारवाड़ के कई प्रमुख सरदार अजीत सिंह को उत्तराधिकारी के रुप में मान्यता दिलाने के लिए दिल्ली गए तब औरंगज़ेब में उनकी विनती को ठुकरा दिया हलांकि उसने राजकुमार अजीत सिंह के  बालिग होने पर उसे उपाधि और जागीर देने का प्रस्ताव रखा। 

मगर औरंगज़ेब ने शर्त यह रख दी की बालक का पालन-पोषण शाही हरम ही होगा और रानियां भी वहीं रहेंगी। समकालीन ग्रंथों में यहां तक मिलता है कि औरंगज़ेब ने अजीत सिंह को जोधपुर की गद्दी देने का प्रस्ताव रखा मगर बच्चे का पालन पोषण मुस्लिम धर्म में होगा। यानी उसे एक मुस्लिम राजा बनाया जायेगा।

औरंगज़ेब ने अपनी इस नीति को अंजाम देने के लिए दुर्गा दास राठौर के अपनी एक रियासत देने का प्रलोभन दिया ताकि वे अन्य सरदारों को उसके इस कृत्य पूर्ण करने के लिए सहमत कर सकें। मगर दुर्गा दास ने उनके इस प्रलोभन को अस्वीकार कर दिया।

इस प्रकार दुर्गा दास जी ने सारी बात अपने सहयोगी सरदारों को बताई जिसके चलते औरंगज़ेब का रवैया राठौर प्रतिनिधिमंडल को स्वीकार्य नहीं था इसलिए उन्होंने अजीत सिंह और रानियों को दिल्ली से छुड़ाने का प्रण लिया। हलांकि वे सभी जानते थे इस कार्य को अंजाम देने में उनमें से कई लोगों की मारे जा सकतें है मगर वे पीछे नहीं हटे।

25 जून 1679 को ही वे शहर से निकलने में सफल रहे मगर मुगल सैनिकों ने उनका पिछा किया राजकुमार अजीत सिंह की रक्षा के लिए दुर्गा दास राठौर ने कई भंयकर और घातक बाचव अभियानों को अंजाम दिया। सैनिकों का पिछा शाम तक जारी रहा जब तक कि वे थक नही गए मगर अंत में वे रानियों और राजकुमार के लेकर भागने में सफल रहे।

अंत में राजकुमार को बलुंडा ले जाया गया जहां प्रतिनिधिमंडल के एक सदस्य की पत्नी ने बालक को एक वर्ष तक अपने पास रखा। उसके बाद बालक को मारवाड़ के दक्षिण छोर पर दूरस्थ कस्बे सिरोही के पास अरावली पहाड़ियों में सुरक्षित स्थान पर ले जाया गया। यहां के वासी जयदेव नामक ब्राह्मण ने राजकुमार की परवरिश की।

कुशल निर्णायक

दुर्गा दास राठौर को पहले से ही पता था कि कभी न कभी मुगल सैनिक राजकुमार को खोजते हुए पहाड़ियों में जरुर आ जायेंगे अतः राजा की सुरक्षा का जिम्मा लेते हुए दुर्गादास ने जोधपुर के राजा राजसिंह से पहले ही मदद मांग ली थी बदले में जोधपुर के राजा ने उन्हें अपनी केलवा की जागीर का पट्टा दिया था।

अतः यह क्षेत्र मारवाड़ प्रशासन से बाहर का क्षेत्र था जहां मुगल सैनिकों को अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर का होने के नाते जाने की मनाही थी सो वे वहां नही जा सकते थे। इस प्रकार राजकुमार यहां सुरक्षित थे।

कुशल कुटनीतिकार

दुर्गा दास एक योद्धा होने के साथ ही एक कुशल कूटनीति कार भी थे। एक तरफ उन्होंने राजकुमार की रक्षा की दुसरी तरफ अपनी मातृभूमि मारवाड़ की भी रक्षा की। जब औरंगज़ेब ने अपने बेट अकबर को मारवाड़ पर आक्रमण करने के लिए भेजा तब दुर्गा दास राठौर और जोधपुर के राजा राजसिंह ने मिलकर कूटनीतिक चाल चलकर कर बाप-बेटे को ही आपस में लड़ा दिया इस प्रकार मारवाड़ की सुरक्षा को सुनिश्चत किया।

अतः राजकुमार के बड़े होने पर राजा अजीत सिंह को गद्दी पर बिठाने में सफल रहे।

अंतिम समय

दुर्गा दास राठौर के अंतिम समय में महाराजा अजीत सिंह के साथ कुछ कारणों से अनबन हो  गयी थी दरअसल दुर्गा दास का कदीमी ठिकाना गांगाणी ठिकाना किसी और राजा द्वारा दे दिया गया था। दरअसल राजा अजीत सिंह दुर्गा दास की ख्याती से जलने लगे थे उन्हें ऐसा लगने लगा था कि राजा होने के नाते जो सम्मान दुर्गादास जी को  मिल रहा था वो उन्हें मिलना चाहिए।

अंत राजा ने अपने ईष्यालु चरित्र तथा सम्मान की लालच में दुर्गादास को मारवाड़ से बाहर निकाल दिया। अपने कर्तव्यों को पुरा करने के बाद और राजा जसवंत सिंह से किए अपने वादे को निभाने के बाद मारवाड़ छोड़ दिया। इसके बाद वे कुछ समय जोधपुर उदय पुर  रामपुरा  भानपुरा क्षेत्रों में घुमें फिर पुजा करने के लिए महाकाल उज्जैन चले गए।

उनका अंतिम समय उज्जैन में बिता जहां उन्होंने 22 नवंबर 1718 को अंतिम सांस ली। जब उनका देहांत हुआ तब उनकी उम्र 81 वर्ष की थी। राजघरानों पर व्यंग्य करते हुए एक बारहठ ने लिखा-
इण घर री आ ही रीत दुरगो सिफरो दागियो। कहने का मतलब है राजा अपनी गद्दी के लिए अपनों की भी जान ले सकता है।

हलांकि इतिहास गवाह है कि हर कोई राजकुमार य राजा अजीत  सिंह की तरह घटिया नही होता।

निष्कर्ष

वीर दुर्गादास राठौड़ भारतीय इतिहास में अदम्य साहस निस्वार्थ स्वामी भक्ति और उच्च नैतिक मूल्यों के अनूपम प्रतीक है। औरंगजेब की साम्राज्यवादी नीतियों के विरुद्ध लगभग तीन दशकों तक चला उनका अनवरल संघर्ष केवल मारवाड़ के सिंहासन की रक्षा का प्रयास नही था, बल्कि अपनी मातृभूमि क स्वाभिमान और संस्कृति की रक्षा का संकल्प था।

सत्ता और पद की लालसा से परे रहकर उन्होंने महाराजा अजीत सिंह को उनका अधिकार दिलाया और मुगलों के समक्ष भी अपने अनुशासित व उच्च चरित्र की छाप छोड़ी। उनका जीवन यह संदेश देता है कि सच्चा नेतृत्व त्याग कूटनीति और नैतिक दृढ़ता में निहित है।

2026-10-04

तारा बाई शिंदे

digital painting of a tarabai shinde
प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम तारा बाई शिंदे द्वारा किए गए महत्वपूर्ण कार्यों पर चर्चा करने जा रहे है वे एक भारतीय महिला समाज सुधारक नारी वादी और लेखिका  थीं जिन्होंने महिलाओं के अधिकारों के लिए आवाज़ उठाई थी। उनका जीवन सम्पूर्ण रुप से महिला अधिकारों के संरक्षण को समर्पित था । यह वह समय था जब महिलाओं को अकसर कार्य स्थल और घरों में भी उत्पीड़न का सामना करना पड़ता था। 

जिससे महिलाओं के खिलाफ हिंसा एक व्यापक और गंभीर समस्या बनी हुई थी जो दुनिया भर में लाखों  लोगों को प्रभावित करती थी। यह आज के भी समय में घरेलू हिंसा यौन उत्पीड़न मानव तस्करी और हानिकारक पारंपरिक प्रथाओं सहित विभिन्न रुपों में प्रकट होती है।

जीवन परिचय

तारा बाई शिंदे का जन्म 1850 में महाराष्ट्र के बरार प्रांत के बुलाढ़ाणा में बापू जी  हरि शिंदे के घर पर हुआ। वे मराठी परिवार से सम्बन्धित थीं। उनके पिता डिप्टी कमिश्नर कार्यालय में वरिष्ठ क्लर्क के पद पर असित थे। सामाजिक कुरीतियों के कारण उनका विवाह कम उम्र में ही हो गया था। उन्होंने अपने पति से आजीवन संतान न होने का वादा लिया।

शिक्षा

यह वह समय था जब बालिकाओं की औपचारिक शिक्षा पर सामाजिक प्रतिबंध था। लेकिन उनके पिता जी ने उन्हें घर पर ही मराठी संस्कृत और अंग्रेज़ी भाषा में शिक्षा दिलाई। शिक्षा पूर्ण होने का बाद उनकी नज़र नारी समाज पर लगे प्रतिबंधों पर गई।1871 के समय काल में उन्होंने शिक्षित आदिवासियों के लिए संकेत नामक पुस्तक का प्रकाशन किया। खास बात यह थी कि उस समय उस क्षेत्र में कोई बालिका विद्यालय नहीं था। 

जिस कारण से महिला और शिक्षित होने के कारण वे चर्चा का विषय बनी। उन्हें भारत के पहले आधुनिक नारी वादी ग्रंथ की रचना का श्रेय दिया जाता है। तारा बाई का विवाह बहुत ही कम उम्र में हो गया था लेकिन उन्हें उस समय की अन्य मराठी पत्नियों की अपेक्षा घर में अधिक स्वतंत्रता प्राप्त थी क्योंकि उनके पति उनके माता-पिता के घर में ही रहने लगे थे।

स्त्री पुरुष की तुलना

1882 में उन्होंने इस किताब को लिखा जिसने भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी यह किताब चर्चा का विषय बन गई। यह किताब महिलाओं के बीच आकर्षण का केंद्र रही क्योंकि पहली बार किसी ने महिलाओं के साथ हो रहे शोषण के बारे में खुल कर आवाज़ उठाई थी। हलांकि भारत जैसे पुरुष प्रधान देश में इस किताब का कड़ा विरोध किया गया। इन सभी कारणों का बावजूद यह किताब महिलाओं को अधिकारों को प्रति जाग्रत  करने में सफल रही।

विरोध पत्र लिखने का कारण

इस पत्र को प्रकाशित करने का कारण तत्कालीन समाचार पत्रों में चर्चा का विषय रही एक विधवा महिला थी जिनका नाम विजय लक्ष्मी था। पुणे वैभव में छपे इस लेख में विजय लक्ष्मी को अपने ही बेटे को जान से मारने पर फांसी की सज़ा सुनाई गई थी। कारण यह था कि महिला विधवा थी इसलिए उसके बेटे को और उसे समाज की हीन भावनाओं का सामना करना पड़ता अतः लोक लाज के कारण महिला ने अपने बेटे को मार डाला था।

जिज्ञासा बस तारा बाई शिंदे ने इस लेख की गहराई से जांच की जिसमें उन्हें हत्या के मुख्य कारण तथा महिला को मजबूर किए जाने वाले कारणों के बारे में पता चला। जिसका खुलासा उन्होंने स्त्री पुरुष की तुलना नामक आलोचना पत्र में किया। दरअसल उस समय काल में उच्च वर्ग के घरों में  काम करने वाली महिलाओं को विधवा होने के बाद पुनर्विवाह करने की अनुमति नहीं थी। जिस कारण से यह महिला विवाह नहीं कर सकती थी।

दूसरी तरफ उच्च वर्ग के उस घर में उनके रिश्तेदार द्वारा महिला का बलात्कार किया गया था जिसका नतीजा वह बालक था। अतः सामाजिक कुरीतियों के कारण वह महिला अपने बच्चे की हत्या का कारण बनी।

लेख में उनके विचार

लेख के माध्यम से उन्होंने सवाल उठाया कि जिस अपराध के लिए महिलाओं को दोषी ठहराया जाता है उसमें पुरुष की भूमिका को समाज पूरी तरह अनदेखा क्यों करता है। इस प्रकार के दोहरे मानदंडों का उन्होंने विरोध किया।

पितृ सत्ता पर प्रहार करते हुए उन्होंने पुरुष सत्तात्मक व्यवस्था धार्मिक अंथविश्वासों और महिलाओं पर थोपी जाने वाली पांबदियों की तीखी आलोचना की।

तारा बाई शिंदे ने अपना तर्क रखते हुए कहा  महिला और पुरुष दोनों में एक ही प्रकार की भावनाएं और त्रुटियां होती है इसलिए नैतिक नियम दोनों के लिए समान होने चाहिए इस प्रकार उन्होंने महिला और पुरुष दोनों के लिए समानता की मांग की।आगे वे लिखती है कि मैं यह इसलिए कर ही हूं ताकि आप पुरुष अपनी आँखें खोलें और अपने देश को नए सिरे से देखें और इस पर गर्व करें बजाय इसके कि हर कोई अपने देश के धर्म रीति-रिवाजों और परंपराओं को त्याग दे।

मैं यह कार्य इस उम्मीद से कर रही हूं कि आप सभी अपने विचारों को बदलेंगे और महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार करना बंद कर देंगे बदले इसके कि मानो उन्होंने कोई अपराध किया हो और इसके लिए उनका जीवन नरक बना दें।

खास बात यह भी कि इस लेख हो तारा बाई शिंदे ने स्वयं के पैसे खर्च करके लेख की 500 प्रतियों को पुणे की श्री शिवाजी प्रेस से छपवाया था। हलांकि की इस लेख की भारी आलोचना हुई उस समय के रूढ़िवादी समाज ने तारा बाई शिंदे के इस लेख की कड़ी आलोचना की। वहीं महात्मा गांधी तथा ज्योति बा फुले में उनका समर्थन किया।

और अपनी पत्रिका सत्य शोधक में इस रचना की सराहना 1885 में की। भारी विरोध के कारण उनका यह रचना लेख 1975 तक अज्ञात रहा यानी दुबारा इसकी चर्चा य इस पर विचार नहीं किया गया। 1975 इस व्यंग लेख को फिर से खोज कर प्रकाशित किया गया।

वीरता का दूष्प्रभाव 

उनके काम ने विवाद खड़ा कर दिया और उस समय विचारकों ने इस लेख को नजरंदाज किया क्योंकि लेख में तीखी भाषा का प्रयोग किया गया था तथा सवाल उठाया गया थी कि महिलाओं को उन्हीं मतलब पुरुषों के कार्यों के लिए ही क्यों तिरस्कृत किया जाता  है। इसके साथ ही उन्होंने यह कहा थी कि यह मूल और संस्कृति तभी क्यों टूटती है य  उन पर सवाल उठते है जब महिलाएं अपने लिए य अपने अधिकारों के लिए खड़ी होती हैं।

मृत्यु

तारा बाई शिंदे  ने 19वीं सदी के कट्टरवादी माहौल में महिलाओं के अधिकारों विधवा पुनर्विवाह और लैंगिक समानता की बेबाक वकालत की। उनका निधन 1910 में हुआ। आज उन्हें भारत में स्त्री मुक्ति आंदोलन की अग्र दूत विचारकों में गिना जता  है।

निष्कर्ष

तारा बाई शिंदे 19वीं सदी की एक निडर प्रगतिशील और दूरदर्शी विचारक थीं। उनकी ऐतिहासिक  कृति स्त्री पुरुष तुलना न पुरुष-प्रधान समाज की विषमताओं धार्मिक अंधविश्वासों और नैतिक दोहरे मानदंडों पर सीधा प्रहार किया। उस दौर में जब महिलाओं का सामाजिक जीवन पाबंदियों से घिरा था तब उन्होंने लैंगिक समानता और स्त्री- अधिकारों की बात बेबाक रुप से उठाई। तारा बाई शिंदे का लेखन केवल उस कालखंड का विरोध-पत्र नहीं था बल्कि आधुनिक भारत के नारी समाज की मजबूत नींव बना।

आज भी उनका जीवन और विचार महिला सशक्तिकरण  और सामाजिक न्याय के लिए एक महान प्रेरणा का स्रोत है। संक्षेप में कहें तो तारा बाई शिंदे स्त्री-मुक्ति आंदोलन की अग्र दूत  थीं। 1882 में लिखी उनकी पुस्तक स्त्री पुरुष की तुलना ने समाज में व्याप्त लैंगिक भेदभाव को चुनौती दी। उनका योगदान भारतीय समाज में महिलाओं की समानता और अधिकारों की लड़ाई में हमेशा स्मरणीय रहेगा। 
 

2026-09-25

नौ-सेना विद्रोह 1946

digital oil painting of a navy mutiny

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम 1946 में हुए नौ सेना विद्रोह के बारे में तथा इस विद्रोह के  पीछे के मुख्य कारणों पर चर्चा  करेंगे इसके  साथ ही इस घटना  के  मुख्य  पात्रों तथा उनके द्वारा किए गए महत्वपूर्ण कार्यों पर चर्चा करेंगे।

विद्रोह के मुख्य पात्र
इस घटना के मुख्य पात्र रायल भारतीय नौ सेना के जवान एवं एयर फोर्स  के जवान तथा पुलिस बल के जवानों के साथ ही जान हेनरी गॅाडफ्रे जो कि आर  आई एल कमान के अधिकारी थे इसके साथ मोहम्मद अली जीन्ना सरदार वल्लभ भाई पटेल बी सी दत्त सर क्लाउट आचिनेलक  जो कमांडर इन चीफ थे इसके  साथ ही जनरल शाह नवजात खान कर्नल प्रेम सहगल एवं कर्नल गुरुब्बकश सिंह ढिल्लों आदि थे।

विद्रोह का मुख्य कारण
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दैनिक इस्तेमाल की जाने वासी वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी किए जाने से सैनिकों को आर्थिक कठिनाई का सामना करना पड़ा था। इसके साथ ही जापान युद्ध के बाद भारतीय सैनिकों की बरखास्त करना और सैनिकों के साथ मनमाना व्यवहार, अपर्याप्त वेतन तथा वरिष्ठ नेतृत्व की उदासीनता था।

विद्रोह के दौरान हुई घटनाएं

1 दिसंबर 1946 
यह विद्रोह की पहली घटना थी जिसमें R.I.N कमांडरों ने HMIS Talwar को पहली बार  जनता के लिए खोला गया था जिसमें सुबह समूह ने परेड ग्रांउड में जले हुए झंडे और बैनर बिखेर  कर परिसर में तोड़फोड़ की इसके साथ ही टावर पर झाड़  और बाल्टियां प्रमुखता से प्रदर्शित की और प्रतिष्ठान की  विभिन्न दीवारों पर भारत छोड़ो ब्रिटिश राज मुर्दा बाद तथा गांधी जी और नेहरु की विजय हो जैसे नारे लिखे हुए थे।

मामले को संभालते हुए वरिष्ठ अधिकारियों ने जनता के आने से पहले परिसर की सफाई कर दी लेकिन उपद्रव कर्ताओं पर कोई कार्यवाही नहीं कि। इस कमजोर प्रतिक्रिया ने षड्यंत्रकारियों को और अधिक साहसी बना दिया, अगले महीनों में इसी प्रकार की गतिविधियों का अंजाम देना जारी रखा।

इस कार्य को अंजाम देने से पहले कार्यरत 20 आपॅरेटरों ने अपने सेवाकाल के दौरान नस्लीय भेदभाव से त्रस्त एक दर्जन हमदर्दों के साथ मिलकर आज़ाद हिंद के नाम से एक गुप्त समूह बनाया और अपने वरिष्ठ अधिकारियों को कमजोर  करने की साजिशें रचने लगे। षड्यंत्रकारियों को पकड़ने में असमर्थ होने के कारण HMIS Talwar कमांड ने संदिग्ध लोगों की छंटाई करना प्रारम्भ करना प्रारम्भ कर दिया ।

उन्हें लगा की इससे उपद्रवी बल बाहर हो जायेगा। मगर ऐसा नहीं हुआ इससे समूह का आकार भले ही छोटा हो गया मगर लेकिन लोग राष्ट्र वादी गतिविधियों के लिए उत्साहित रहे। यह सभी प्रतिक्रिया कमांडर -इन -चीफ क्लाउड आचिनलेक द्वारा जारी पत्रों का परिणाम थी।

2 फरवरी 1946

 क्लाउड आचिनलेक  एक समारोह में शामिल होना था अधिकारियों को तोड़फोड़ की आशंका थी इसलिए उन्होंने पहले से ही बड़े पैमाने पर किसी भी प्रकार की कार्यवाही को रोकने के लिए गार्ड तैनात कर दिए थे। इसके बावजूद समूह ने उस  मंज की दीवारों पर पोस्टर चिपका दिए और रंग भर दिए। जहां से कमांडर इन चीफ को सलामी लेनी थी। इस सभी स्टीकर और पोस्टर पर भारत छोड़ो के नारे तथा जय  हिंद लिखा हुआ था।

सूर्योदय से पहले ही पोस्टर चिपकाने वालों का पता चल गया युद्ध में पांच साल बिता चुके अनुभवी बलाई चंद्र दत्त को पोस्टर और गोंद के साथ रंगे हाथों पकड़ा गया। कार्यवाही के दौरान उनके लॅाकर की तलाशी ली गई जिसमें से राष्ट्र वादी साहित्य बरामद किए गए। इन सभी सामग्री को राजद्रोह माना गया। दत्त के साथ रियल एडमिरल सहित पांच वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा एक के बाद एक पूछताछ की गई।

दत्त ने सभी तोड़फोड़ की घटनाओं की जिम्मेदारी ली जिसके चलते उन्हें 15 दिनों के लिए एकांत कारावास में रखा गया जबकि  उनके कारावास  में रहने का बाद भी तोड़फोड़ की घटनाएं जारी  रहीं।

8 फरवरी 1946

कई नौ सैनिकों का आदेश न मानने के कारण कोर्ट मार्शल किया गया। दूसरी तरफ कमांडिंग आफिसर फ्रेडरिक किंग ने कथित तौर पर भारतीय  जवानों को कुत्तों के बेटे, कुली के बेटे और जंगली जैसे अपशब्दों का इस्तेमाल किया। कुछ नौ सैनिकों ने कमांडिंग आफिसर के खिलाफ प्रयोग की गई भाषा शैली पर शिकायतें दर्ज की।

17 फरवरी 1946

बड़ी संख्या में नौ सैनिकों ने भोजन और सैन्य परेड के आदेशों को मानने से इनकार कर दिया। जिसके चलते कमांडर किंग ने ब्रीफिंग के दौरान नाविकों के एक समूह का वर्णन करने के लिए काले कमीने शब्द का इस्तेमाल किया था।

18 फरवरी 1946

इस दिन HMIS सतलज , HMIS जमुना और  बाम्बे हार्बर में कैसल और फोर्ट बैरक  में रेटिंग्स न HMIS Talwar के अपरेटरों के साथ एक जुटता दिखाई और आदेशों को मानने से इनकार कर दिया। इस बात की खबर उसी दिन 12.30 मिनट पर सभी उच्च अधिकारियों को खबर हो गई की आफिसर ने आदेश मानने से इनकार कर दिया है। तटवर्ती प्रतिष्ठानों पर कब्जा कर लिया गया और अधिकारियों को निष्कासित कर दिया गया।

दिन भर नौसैनिक बाम्बे हार्बर में एक जहाज से दूसरे जहाज पर आते जाते रहे और अन्य सैनिकों को विद्रोह में शामिल होने के लिए मनाते रहे। इसी बीच बी. सी. दत्त को 15 दिन के कारावास से रिहा कर दिया गया। उनकी बरखास्तगी से पहले उन्हें तलवार बैरक में लौटने की अनुमति दी गई। बाद में उन्हें ही विद्रोह को उकसाने वालों में से एक के रुप में जाना जाने लगा।

खास बात यह है कि उनकी रिहाई के बाद एक ही दिन में विद्रोह बंदरगाह के 22 जहाजों तथा बॉम्बे के 12 अन्य तटवर्ती प्रतिष्ठानों में फैल गया। उसी दिन विद्रोह में RIN द्वारा संचालित वायर लेस स्टेशन भी  शामिल हो गए जिनमें बातों के आदान-प्रदान के लिए कुछ दूरस्थ स्टेशन भी शामिल थे। HMIS Talwar के विद्रोहियों ने सिगनल स्कूल में उपलब्ध वार लेस उपकरणों का उपयोग करके उनसे सीधा संचार स्थापित किया।

19 फरवरी 1946

इस दिन दोपहर में सैनिक बाम्बे बंदरगाह पर विद्रोहियों ने HMIS Talwar में नौ सेना केंद्रीय हड़ताल समिति NCSC के प्रतिनिधियों का चुनाव करने के लिए तथा मांगो का चार्टर  तैयार करने के लिए एकत्र हुए। युद्ध पोत और तटीय प्रतिष्ठान समिति चुनाव के लिए निर्वाचन क्षेत्र बन गए, जिनमें व्यक्तिगत प्रतिनिधियों को समिति के लिए चुना गया। समिति के कई सदस्य कथित तौर पर 25 वर्ष से कम आयु के थे। जिन में पीटी अफसर मदन सिंह सिगनल मैन एम एस खान आदि शामिल थे। इन्हें समिति की औपचारिक वार्ता के लिए चुना गया था। मांगो का चार्टर अधिकारियों को भेजा गया जिसमें राजनीतिक और सेवा संबंधी मांगो का मिश्रण था।

मांगे कुछ इस प्रकार थी 

1 सभी राजनीतिक कैदियों की रिहाई
2 भारतीय राष्ट्रीय सेना के सभी कार्मिकों को बिना शर्त के  रिहा किया जाए
3 इंडोनेशिया और मिस्र से सभी भारतीय कार्मिकों की वापसी
4 भारत से ब्रिटिश  नागरिकों का निष्कासन
5 चालक दल के साथ दुर्व्यवहार करने के लिए कमांडिंग अधिकारियों और सिगनल बोसन पर मुकदमा चलना
6 भारतीय नौ सेना के नौसैनिकों और अधिकारियों की शीघ्रता से सेवा मुक्ति
7 वेतन और पारिवारिक भत्ते और अन्य सुविधाओं के संबंध में रायल नेवी के साथ समान दर्जा
8 परोसे जाने वाले भारतीय भोजन की सर्वोत्तम गुणवत्ता सुनिश्चित की जाए
9 सेवामुक्ति के बाद वस्त्र किट लौटाने की आवश्यकता को समाप्त करना
10 अधिकारियों द्वारा अधीनस्थ के प्रति व्यवहार के मानकों में सुधार
11 भारतीय अधिकारियों और पर्यवेक्षकों की नियुक्ति।

इसी दिन ऊपर के अफसरों की प्रतिक्रिया

रायल इंडियन नेवी के फ्लैग आफिसर कमांडिंग एडमिरल जान हेनरी गाडफे  ने आल इंडिया रेडियो के माध्यम से एक संदेश भेजा गया जिसमें कहा गया कि उनके विद्रोह को दबाने के सबसे कड़े उपाय किए जाएंगे जिसमें आवश्यकता पड़ने पर नौ-सेना को नष्ट करना भी शामिल है। रायल इंडियन नवी के द्वितीय-इन कमांड तथा रिय एडमिरल आर्थर रुलियन रौट्रे और बाम्बे हार्बर के कमांडिंग आफिसर ने स्वयं निरीक्षण किया।  जिसमें उन्होंने इस बात की पुष्टि की, कि अशांति व्यापक थी और नियंत्रण से बाहर थी।

रैट्रे ने विद्रोहियों के साथ बातचीत करने पर जोर दिया। लेकिन आचिनलेक और गाडफ्रे दोनों इस विचार के विरोधी थे। खास बात यह की HMIS Talwar की घटनाओं ने बॉम्बे और रायल  इंडियन नेवी के नाविकों को ब्रिटिश राज को उखाड़ फेंकने की क्रांति की संभावनाओं और अपने नौ सैनिक बिरादरी की शिकायतों के साथ एकजुटता  दिखाने के लिए प्रेरित किया था।

 20 फरवरी 1946

सूचना मिली की बॉम्बे बंदरगाह अपने सभी जहाजों और नौसैनिक प्रतिष्ठानों सहित विद्रोहियों के कब्जे में आ गया है जिसमें 45 युद्ध पोत , 10 से 12 तटवर्ती प्रतिष्ठान तथा 11 सहायक पोत और चरा बेड़े शामिल थे। इन सभी पर 10,000 से अधिक सैनिकों ने कब्जा कर लिया था। इसके साथ ही केंद्रीय संचार कार्यालय ,कोलाबा रिसीविंग स्टेशन तथा पास की सिवरी में स्थित रायल इंडियन नेवी के अस्पताल शामिल थे।

इसके अलावा युद्ध पोतों में विध्वंसक HMIS Narbada, HMIS Jamuna , अन्य दो और यु्द्ध पोत HMIS clive और HMIS Lorence एक फ्रिगेट HMIS Dhanush और चार कोरवेट HMIS गोंडवाना K348, HMIS असम K306 ,HMIS मराठा K395 , HMIS सिंध K224 आदि शामिल थे। इसके साथ ही अन्य जहाज गनबोट और नौसैनिक  ट्रालर भी शामिल थे।इस जहाज का कमान अधिकारी लेफ्टिनेंट कृष्णन ने ध्यान भटकाने वाला संकेत बनाया और 18 फरवरी 1946 को रात 8 बजे बंदरगाह से बाहर निकल गए थे।


कृष्णन विद्रोह में न तो शामिल हुए और न ही अपने नाविकों को विद्रोह में शामिल होने दिया । वर्सोवा में था HMI मछलीमार तथा एक पनडुब्बी रोधी प्रशिक्षण विद्यालय जिसमें 300 नौ सैनिक तैनात थे तथा मारवे स्थित HMI हमला जिसमें RIIN लैडिंग क्राफ्ट विंग के आवासीय क्वार्टर थे पर 600 नौ सैनिकों ने कब्जा कर लिया था 

इसी दिन नौ सेना के केंद्रीय हड़ताल समिति के कुछ नौ सैनिकों ने जन-समर्थन जुटाने लिए शहर में जाने कि सिफारिश की थी अतः इस प्रकार वे भारतीयों को एक जुट करने के लिए नारे लगाते हुए बॉम्बे के वाणिज्यिक जिलों में प्रवेश कर गए। इसके बाद शहर में विद्रोहियों और सैन्य कर्मियों सहित युरोपीय लोगों के बीच झड़पों की घटनाएं होना शुरु हुईं। शहर में पुलिस कर्मियों छात्रों तथा श्रमिक संगठनों ने विद्रोहियों का समर्थन करते हुए सामूहिक हड़तालें की।

दूसरी तरफ पायलटों ने शहर में ब्रिटिश सैनिकों की तैनाती के लिए परिवहन कर्तव्यों और बंदरगाह के ऊपर बमवर्षक विमान उड़ाने के आदेश को मानने से इनकार कर दिया। 1200 से अधिक वायु सेना के सैनिकों ने सनसमर्थन के साथ  शहर में एक जुलूस निकाला। 

वासयराय की कार्यकारी परिषद ने के बैठक बुलाई और दृढ़ रुख अपनाते हुए कैवल बिना शर्त के आत्मसमर्पण स्वीकार करने का निर्णय लिया और किसी भी प्रकार की बातचीत की संभावना को अस्वीकार किया। रियर ए़डमिरल रैट्रे ने 4.30 मिनट पर सभी सैनिकों को बैरक में उनके क्वार्टरों में वापस जाने का आदेश दिया। दक्षिण कमान क कमांडिंग आफिसर जनरल राब लाकहार्ट को विद्रोह को दबाने का आदेश दिया गया।

21 फरवरी 1946

सी लार्ड नौसेना प्रमुख से परामर्श लेने के बाद एडमिरल जान हेनरी गाडफ्रे ने आल इंडिया रेडियो पर एक बयान जारी किया जिसमें विद्रोहियों का तुरंत आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया वरना पूर्ण विनाश के लिए तैयार रहें की धमकी दी। इस सूचना के बाद क्रूजर HMS Glasgo तथा तीन फ्रिगेट और पांच विध्वंसक जहाजों को तैनात  किया गया तथा शक्ति प्रदर्शन के लिए रायल एयर फोर्स के बमवर्षक विमानों को बंदरगाह के ऊपर से उड़ाया गया।

इसके साथ ही कैसल बैरक को पुनः कब्जे में लेने का आदेश जारी किया गया। विद्रोहियों ने जमीनी सेना के कुछ ठिकानों पर गोलीबारी की इसके साथ ही उन्होंने शहर में घुसपैठ करने का प्रयास किया। लेकिन सेना ने उन्हें सफलता पूर्वक उन्हें खदेड़ दिया। मामला हाथ से निकलता देख गाडफ्रे ने ब्रिटिश एडमिरल टी को तत्काल सहायता का अनुरोध किया और बताया की विद्रोहियों के पास शहर पर कब्जा करने की क्षमता है।

इसी बीच बंदरगाह पर दुकानों पर तैनात नाविकों ने 5वीं मराठा लाइट इन्फैट्री के आगे बढ़ते ब्रिटिश सैनिकों के साथ गोलीबारी की। बैरक  की और बढ़ रहे ब्रिटिश सैनिकों पर RIN युद्धपोतों की मुख्य तोपों से गोले दागे गए। चार बजे स्ट्राइक कमेटी के निर्देशों के बाद युद्धपोतों से गोलीबारी बंद कर दी गई।  नाविक बैरकों से बाहर निकल गए। शाम को मरीन ने बैरक परिसर पर धावा बोल कर कब्जा कर लिया। बैरकों के सभी प्रवेश और निकास द्वारों को सुरक्षित कर लिया गया।

HMIS तलवार पर कब्जा करने के बाद अत्याधुनिक युद्धपोत HMIS नरबदा में स्थानांतरित करने दिया गया। इसी बीच अंधेरी और कोलाबा शिविरों के रायल इंडियन एयर फोर्स के कर्मियों में विद्रोह कर दिया और नौसेना के जवानों के साथ मिल गए। नकली खून से सने सफेद  झंडे लहराते हुए लगभग 1000 वायु सैनिकों ने बॉम्बे के मरीन ड्राइव पर कब्जा कर लिया। इस दल ने भी मांगों के चार्टर की नकल करते हुए अपनी मांगों का एक सेट जारी किया जिसमें रायल एयर फोर्स के साथ वेतनमानों की मानकीकरण मांग भी शामिल थी।

सायन क्षेत्र में रायल इंडियन एयर फोर्स के कर्मियों ने विद्रोहियों का समर्थन करते हुए हड़ताल शुरु की।

22 फरवरी 1946

एसेक्स रेजिमेंट क्वीन्स रेजिमेंट और बार्डर रेजिमेंट की बटालियन के रुप में ब्रिटिश सुदृढ़ीकरण के साथ रायल आर्मर्ड कोर की 146वीं रेजीमेंट बॉम्बे प्रांत से पूना पहुंची इसी के सात जबलपुर में तैनात रायल आर्टिलरी की फील्ड रेजिमेंट के साथ एंटी-टैंक बैटरी भी पहुंच गई। पूरे शहर में कर्फ्यू लगा दिया गया देश में व्यापक कम्युनिस्ट प्रेरित विद्रोह की आशंका से सरकार ने आंदोलन कार्यों रोक लगाने का प्रयास किया। अशांति को दौरान 236 लोगों की मौतें हुए और हजारों लोग घायल हुए। 

23 फरवरी 1946 को नौ सैना केंद्रीय हड़ताल समिति ने सभी युद्धपोतों से आत्मसमर्पण के काल झंडे फहराने का अनुरोध किया। कराजी में पूर्णतः बंद रहा इसके साथ ही गोदाम और दुकानें भी  बंद रहीं। ट्रामवे कर्मचारी हड़ताल पर चले गए तथा कालेज और स्कूली छात्र सड़कों पर प्रदर्शन के लिए निकल आये। शहर में शांति को बनायें रखने के लिए तीन कम्युनिस्ट नेताओं को गिरफ्तार किया गया और जिला मजिस्ट्रेट ने पूरे कराची  शहर में धारा 144 लागू कर दी। 

मनोरा द्वीप पर दबे हुए नौ सैनिकों ने भी हिरासत में रहते हुए भूख हड़ताल का आयोजन किया। शहर में लगभग 30000 लोगों का जुलूस निकला। हड़ताल कर रहे कई नौसौनिकों के नेताओं को अधिकारियों द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया और थार रेगिस्तान में मलिर स्थित सैन्य कारागार शिविर में भेज दिया गया। दूसरी तरफ शहर में ईदगाह पार्क में हजारों की भीड़ जमा हुई जिसमें कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व वाला जुलूस भी शामिल था। अंत में पार्क में पुलिस बल तैनात किया गया लेकिन वे अपने प्रयासों में असफल रहें। यूरोपीय स्वामित्व वाली इमारतों डाक घरों तथा सरकारी प्रतिष्ठानों में तोड़फोड़ की गई।

24 फरवरी 1946

को शहर में सैन्य बल ने सफलता पूर्वक शांति बहाल की अगले दिनों में अशांति कम हो गई 26 फरवरी के अंत तक सैन्य उपस्थिति हटा ली गई। गोलीबारी का अनुमान अधिकारिक आंकड़ों हिसाब से आत्मरक्षा में 33 लोग मारे गए तथा 53 पुलिस कर्मी घायल हुए जबकि वास्तीकता अलग थी जिनमें मरने वालों की संख्या का अनुमान नहीं लगाया जा सकता।

विद्रोह का अंत


फरवरी 1946 में भारतीय नौ सेना का विद्रोह भारतीय नौ सैनिक पुलिस सिपाहियों तथा नागरिकों द्वारा ब्रिटिश सरकार के खिलाफ किया गया एक असफल विद्रोह था। मुंबई से शुरु हुए इस विद्रोह ने कराची से लेकर कलकत्ता तक पूरे ब्रिटिश भारत में अपना प्रभाव दिखाया जिसमें 56 जहाजों और तटीय प्रतिष्ठानों में कार्यरत 10000 से अधिक नाविक शामिल हुए। मगर यह विद्रोह क्रांति में परिवर्तित न हो सका क्योंकि ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा विद्रोह को दबाने के लिए पर्याप्त बल लगा दिया।

जिसके चलते अंत में नाविकों के आत्मसमर्पण करने के साथ यह विद्रोह समाप्त हो गया। इस आत्मसमर्पण के लिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और मुस्लिम लीग में भारतीय नाविकों को मजबूर किया। उनका मानना था कि स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर इस प्रकार की अशांति से राजनीतिक और  सैन्य जोखिम बढ़ सकता है। इस प्रकार पार्टियों ने विद्रोह कि नींदा की।

क्योंकि उनका मानना था कि ऐसा करने से स्वतंत्रता संग्राम के शांतिपूर्ण समापन और सत्ता के हस्तांतरण का उनका विचार विफल हो सकता है।खास बात यह है कि इस विद्रोह के दौरान कोर्ट मार्शल किए गए सिपाहियों को स्वतंत्रता मिलने के बाद पुनः सेना में वापिस  नहीं लिया गया। इस विद्रोह का समर्थन करने वाली एक मात्र पार्टी कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया थी जो कि राष्ट्रव्यापी संगठन था।

निष्कर्ष

इस विद्रोह ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की चड़ें हिला दी जिसके चलते 1858 के भारत शासन अधिनियम के तहत भारत का शासन सीधे ब्रिटिश ताज के हाथों में चला गया। इस प्रकार कंपनी का शासन भारत से समाप्त हुआ। गवर्नर जनरल के पद को वायसराय में बदल दिया गया। जिसके साथ लार्ड कैंनिक प्रथम वायसराय बनें। इसके साथ ही ब्रिटिश नितियों में भारतीयों के आश्वासन करने के लिए रियासतों के विलय की नीती को त्यागने की घोषणा करी गई।

सेना का पुनर्गठन किया गया तथा भविष्य में ऐसे विद्रोह दुबारा न होने पायें इसके लिए भारतीय और अंग्रेज सैनिकों का अनुपात बदल दिया गया। खास बात यह है कि इसमें यूरोपीय सैनिकों की संख्या बढ़ाई गई तथा संवेदनशील और तोपखाने जैसे मबत्वपूर्ण पद अंग्रेज अधिकारीयों और सिपाहियों को सौंपे गए।

इस विद्रोह से राष्ट्र चेतना का बीजरोपण हुआ यद्यपि अंदोलन विफल रहा मगर इसने भारतीयों में एकता और राजनीतिक जागृति और स्वतंत्रता की ज्योती जगाई। यह विद्रोह केवल सैन्य अंसतोष नहीं बल्कि विदेशी दमनकारी शासन के विरुद्ध भारतीय समाज किसानों और सैनिकों की पहली सामूहिक और संगठित प्रतिक्रिया थी। जिसने भविष्य के भारतीय राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के लिए एक मजबूत वैचारिक और ऐतिहासिक आधार तैयार किया।

2026-09-21

तिरोट सिंह

u tirot singh articale banner image

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम उन्नीसवीं शताब्दी के महान आदिवासी सरदार यू तिरोट सिंह के बारे में तथा उनके द्वारा किए गए महत्वपूर्ण कार्यों पर प्रकाश डालेंगे। इतिहासकारों के अनुसार यह बताया जाता है कि वे ब्रिटिश सरकार का विरोध करने वाले पहले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की सूची में आते है। अपने समय काल में वे मेघालय के नोंघखलाव क्षेत्र के सरदार अथवा सिएम थे। उन्हें हम इस लेख के माध्यम से उनके साहस प्रतिरोध के प्रतीक और नेतृत्व करने की क्षमताओं के रुप में याद करेंगे।

जीवन परिचय

उनका जन्म 1802 में सिएमलिएह नामक गोत्र में हुआ था। हलांकि उनका नाम तिरोट सिंह था मगर वे अपने क्षेत्र में यू तिरोट सिंह सिएम के नाम से जाने जाते थे। वे खांसी पहाड़ियों के एक भाग नोंम्खलाव के राजा था जिन्हें सिएम कहा जाता था। उनका उपनाम सिएमलिएह था। वे एक संवैधानिक थे जो अपने क्षेत्र के मुख्य गोत्रों के सहयोग से बनी अपनी परिषद क साथ सामूहिक अधिकार साझा करते थे। 

1826 में यंदबो की संधि करने के बाद अंग्रेजों ने ब्रह्मपुत्र नदी घाटी पर नियंत्रण कर लिया था। सिलहट में उनके कब्जे वाले क्षेत्र यानी असम वाला क्षेत्र जिसे हाल ही में संधि के चलते जीते अंग्रेजों ने हासिल किया था इन्हीं क्षेत्रों के बीच खासी पहाडींयां स्थित थी। अतः इसे भी वे अपना ही अधि ग्रहीत क्षेत्र मानते थे। अतः अंग्रेज गुवाहाटी को सिलहट से जोड़ने के लिए इस क्षेत्र से होकर एक सड़क का निर्माण करना चाहते थे ताकि हफ्तों की यात्रा को कम किया जा सके।

ब्रिटिश राजनीतिक नेता डेविड स्का्ट ने खासी स्वामित्व वाली पहाड़ीयों से होकर सड़क बनाने की अनुमति लेने के लिए सरोट सिंह से संपर्क किया। यू तिरोट सिंह सड़क परियोजना की अनुमति के बदले में असम के दर्रो में अपने अधिकार फिर से पाना चाहते थे। दो दिवसीय दरबार सत्र के बाद सभा ने अंग्रेजों का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। स्काट ने तिरोट सिंग को असम में प्रवेश करने वाले दर्रों पर नियंत्रण और क्षेत्र में मुक्त व्यापार करने देने का वादा किया।

राजा बलराम सिंह का विरोध

राजा बलराम सिंह ने यू तिरोट सिंह के दर्रे पर दावे का विरोध किया। अतः तिरोट सिंह दिसंबर 1828 में अपने दावे को साबित करने के लिए सशस्त्र लोगों के दल के साथ गए। उन्हें उम्मीद थी की ब्रिटिश सेना उनका सहयोग करेगी लेकिन ब्रिटिश पैदाइशी दोगले थे जो समझौता करने और झूठ बोलने में माहिर थे। अतः रास्ते में उनका सामना ब्रिटिश सिपाहियों के समूह से हुआ जो कि उनका रास्ता रोकने के लिए खड़े थे। इस घटना से तिरोट सिंह को यह अच्छे से समझ आ गया कि ब्रिटिश कंपनी ने उनके साथ धोखा किया है।

नोघखलाव पुलिस चौंकी

जब तिरोट सिंह को पता चला कि ब्रिटिश असम में सैनिकों की संख्या बढ़ा रहे है तब उन्होंने एक और दरबार बुलाया दरबार के योजना के अनुसार ब्रिटिश सेना को नोंघखलाव खाली करने का आदेश जारी किया गया। खास बात यह है कि ब्रिटिश कंपनी ने उनके आदेश को नजरंदाज किया और अपना काम जारी रखा। अतः उनकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया न आने पर 4 अप्रैल 1829 को तिरोट सिंह ने अपने लोगों के साथ नोंघखलाव की ब्रिटिश चौंकी पर हमला कर दिया।

उनके आदेश पर ब्रिटिश अधिकारी रिचर्ड गर्डन बेडिंग फील्ड और फिलिप बाउल्स बर्लटन को मार दिया गया। इस घटना के बाद जवाबी कार्यवाही करते हुए ब्रिटिश सेना ने तिरोट सिंह और बाकी के सभी खासी सरदारों के खिलाफ युद्ध अभियान शुरु किया।

एंग्लो खासी युद्ध

यह युद्ध 1829 से 1833 तक नोंघखलाव की जनजाति समुदाय और अंग्रेजों के बीच लड़ा गया जिसका नेतृत्व तिहोट सिंह जी ने किया था। जब उन्हें  खबर मिली की अंग्रेज गुवहाटी और सिलहट से अपने अतिरिक्त सैनिकों को लाकर इकट्ठा कर रहें हैं तब वे समझ गए कि अंग्रेज ब्रह्म पुत्र और सुरमा घाटियों के बीच स्थित संपूर्ण क्षेत्र पर कब्जा करना चाहते हैं।

अपने राज्य पर मंडरा रहे खतरे को देखते हुए पहले उन्होंने आदेश जारी किया कि वे इन क्षेत्रों से वापिस चलें जाएं मगर आदेश की नजरंदाजी  को देख कर पहले 4 अप्रैल 1829 नोघखलाव की पुलिस चौंकी पर हमला किया और दो ब्रिटिश अधिकारियों का मार डाला गया।

इस प्रकार यह युद्ध चार वर्षों तक लगातार चलता रहा हलांकि तिरोट सिंह की सेना के पास तकनीकी हथियारों की कमी थी इसके बावजूद तिरोट सिंह ने योद्धाओं के विशेष दल चुने और उन्हें गोला बारूद उत्पादन के लिए पहाड़ियों की गुप्त गुफाओं में तैनात किया। क्योंकि वे जानते थे कि खुले मैदान में अंग्रेजों के साथ वे नहीं लड़ पायेंगी इसलिए उन्होंने गोरिल्ला  युद्ध की विभिन्न स्थानीय रुप से विकसित तकनीकों का प्रयोग किया।

उन्हें अपने पहाड़ी भूभाग का  विशेष ज्ञान था जिसका लाभ युद्ध में अपनी रणनीतियों को अंजाम देने के लिए किया। रात्रि के समय अचानक पुलिस चौंकीयों पर हमला करके उन्होंने अंग्रेजों को हैरान कर दिया। गंभीर गोली लगने बावजूद तिरोट सिंह का शौर्य कम नहीं हुआ। वे अपने कुशल जासूसों के संगठन और अपने निपुण कौशल के लिए जाने जाते थे। हलांकि युद्ध में उनकी हार हुई मगर उनके अमर शब्दों को आज भी नहीं भुलाया जा सकता है।

वे कहते थे कि किसी के अधीन शासन करने से बेहतर है कि एक स्वतंत्र राजा के रुप में मौत को गले लगाना। इनके इन शब्दों ने उनकी प्रजा में साहस और शक्ति का संचार किया जिसके तहत वे इतनी बहादुरी से मैदान में लटे रहे।

मृत्यु

तिरोट सिंह ने सम्पूर्ण युद्ध तलवार और भाले जैसे देशी हथियारों से लड़ा जिसके चलते वे अंग्रेजों की गोलियों का शिकार हो गए जिसके चलते उन्हें इलाज के लिए एक गुफा में छिपना पड़ा ताकि अपना इलाज करवा सके। अंत में उन्हीं के समूह के एक सरदार ने उन्हें धोखा दिया और उनके छिपने का पता अंग्रेजों को बता दिया जिसके चलते 1833 में अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। उन्हें धोखा देने वाले सरदार को उनकी मुखबिरी करने लिए अंग्रेजों द्वारा सोने के सिक्कों की रिश्वत दी गई।

संक्षिप्त मुकदमे के बाद उन्हें ढाका की केंद्रीय जेल भेज दिया गया जहां 17 जुलाई 1835 में उनकी मौत हो गई।

सरकार द्वार किए गए महत्वपूर्ण कार्य

तिरोट सिंह दिवस
मेघालय सरकार द्वार हर साल 17 जुलाई को उनके बलिदान दिवस के रुप में यू तिरोट सिंह दिवस के रुप में मनाया जाता है जो उनके ऐतिहासिक संघर्ष कि याद दिलाता है।

स्मारक की स्थापना
मेघालय माईरांग शहर में तिरोट सिंह मेमोरियल का निर्माण कराया गया जिसका शिलान्यास देश की स्वतंत्रता के बाद दिसंबर 1952 में किया गया था और 1954 में इसे जनता को समर्पित किया गया।

बांग्लादेश के ढाका में स्मारक
क्योंकि तिरोट सिंह को अंग्रेजों ने बंदी बनाकर ढाका जेल में रखा था जिसके कारण भारत सरकार के विदेश मंत्रालय तथा मेघालय सरकार के संयुक्त प्रयासों से ढाका के इंदिरा गांधी सांस्कृतिक केंद्र में उनकी प्रतिमा का अनावरण 16 फरवरी 2024 को किया गया है । जो कि दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करता है।

भारतीय डाक टिकट
भारत सरकार ने उन्हें सम्मान और देश के प्रति उनके बलिदान को याद करने तथा उन्हें राष्ट्रीय पहचान देने के लिए  3 फरवरी 1988 को 60 पैसे का विशेष डाक टिकट जारी किए थे।

सांस्कृतिक केंद्र और पार्क
पूर्वोत्तर भारत और मेघालय में कई सार्वजनिक स्थलों तथा सांस्कृतिक केंद्रों एवं मार्गों का नामकरण उनके नाम पर किया गया है ताकि युवा पीढ़ी उनके देश प्रेम से प्रेरणा ले सके। 

 निष्कर्ष

यह कहा जा सकता है कि मेघालय की पहाड़ियों से उठे महान स्वतंत्रता सेनानी यू तिरोट सिंह का जीवन केवल एक क्षेत्रीय संघर्ष की कहानी नहीं है बल्कि यह औपनवेशिक शासन के विरुद्ध भारतीय स्वाभिमान स्वतंत्रता और मातृभूमि की रक्षा का एक अमर प्रतीक है।

ब्रिटिश शासन की आधुनिक सैन्य शक्ति और कूटनीतिक छल के आगे बिना झुके उन्होंने जिस साहस और दृढ़ता के साथ  गौरिल्ला युद्ध का नेतृत्व किया वह इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है।

ढाका जेल में अपनी शहादत देने से पहले उनका यह विचार कि किसी विदेशी के अधीन गुलाम बनकर जीने से बेहतर है अपनी मातृभूमि के लिए लड़ते हुए प्राण देना सम्मान की बात है। उनके यह शब्द आज भी देशवासियों के दिल में देश भक्ति की अलख जगाता है।

उनके बलिदान को नमन करते हुए उनकी स्मृति यों को आज राष्ट्रीय स्तर पर जो सम्मान दिया जा रहा है वे आने वाली पीढ़ियों को हमेशा राष्ट्रसेवा और कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ने के लिए सदैव प्रेरित करता रहेगा।  

2026-09-19

सरायघाट का युद्ध

​​Battle of Saraighat scene

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में सराय घाट के युद्ध के बारे में विस्तार से चर्चा की गई है इसके साथ ही इस युद्ध के परिणाम के बारे में विस्तार से बताया गया है। इस युद्ध के दौरान कमजोर अहोम सेना ने मजबूत मुगल सेना को हराया था जिसके बाद से मुगल सेना पूर्वी भारत अपना आधिपत्य स्थापित करने में असफल रही और दोबारा आक्रमण करने का प्रयास नहीं किया। यह युद्ध मुख्य रुप से राजा जय सिंह के बेटे रामसिंह जो कि मुगल सेना का सेनापति था तथा अहोम साम्राज्य के सेनापति बरफूकन के बीच हुआ था।

जीवन परिचय

लचित बरफूकन का जन्म 24 नवंबर 1622 में अहोम साम्राज्य के एक सैन्य अधिकारी सेंग कालुक-मो-साई के घर हुआ था। उनकी माता का नाम कुंदी मराम था। लचित बरफूकन का पूरा नाम चाउ लाचित फुकनलुंग था। लचित को राजा चक्रध्वज सिंह की शाही घुड़सवार सेना के अध्यक्ष और सिमलूगढ़ किले के प्रमुख के रुप में नियु्क्त में नियुक्त किया गया था। बहादुरी और अपने पराक्रम के चलते लचित जल्द ही अहोम साम्राज्य की सेना के सेनापति बन गए।

बताया जाता है कि उस समय काल में पूर्वोत्तर भारत के हिंदू साम्राज्य की अहोम सेना की संरचना बहुत ही व्यवस्थित हुआ करती था। अकेले बरफुकन 6000 सैनिकों का संचालन करते थे। 

इतिहासकारों द्वारा बताया जाता है कि लचित बरफुकन नाम में बरफुकन इनकी उपाधि थी न कि नाम का हिस्सा। बरफुकन बनने के बाद उनके सामने बहुत-सी चुनौतियां थी। सबसे पहली चुनौती मुगलों की विशाल सेना तथा दूसरी तरफ अहोम साम्राज्य की हताश और विखंडित सेना थी। अपने कार्यकाल के पहले वर्ष लचित ने अपना पूरा ध्यान अहोम सेना के संगठन तथा नव-निर्माण तथा अस्त्रों और शस्त्रों को इकट्ठा करने में लगाया।

इसके  साथ ही नई सेना भर्ती की गई तथा जल सेनाओं के लिए नौकाओं का निर्माण करवाया गया इसके साथ ही हथियारों की आपूर्ति तथा तोपों का निर्माण और किलों के लिए मजबूत रक्षा प्रबंधन का जिम्मा अपने हाथों में लिया। यह सभी कार्य इतनी चतुराई से किए गए की मुगलों को उनके कार्यों की भनक तक न लगी।

ईटा कुली किले पर विजय

लचित की युद्ध कला तथा दूरदर्शिता मात्र सारैघाट के युद्ध तक ही नहीं सीमित थी। इस युद्ध के पहले 19667 में ईटा कुली किले को मुगलों के चुंगल से निकालने में भी उनका मुख्य योगदान रहा। इस युद्ध के दौरान लचित बरफूकन ने अपनी युद्ध कला का बखूबी परिचय दिया। इस घटना का वृतांत इस प्रकार है कि मुगलों ने फिरोज खान को अपना फौजदार नियुक्त किया था 

जो कि बहुत ही भोग और विलास में लिप्त रहने वाला व्यक्ति था। उसने चक्रध्वज सिंह अहोम सम्राट को सीधे-सीधे तौर पर असम की हिंदी कन्याओं को भोग-विलास के लिए अपने पास भेजने का आदेश दिया।

जिसके कारण अहोम साम्राज्य में अशांति का माहौल फैल गया जिसका फायदा उठाते हुए लचित ने लोगों को इस आक्रोश का सही प्रयोग करने के लिए गुवहाटी किले को मुगलों से छिनने के लिए योजना बनाने को कहा। लचित के पास एक शक्तिशाली सेना के साथ-साथ निपुण जासूसी सेना भी जत्था था। लचित की योजना के अनुसार 10 से 12 लोगों का एक संगठन चुपके से किले में रात के समय घुस गया और चुपके से मुगल सेना की तोपों में पानी डालने में सफल रहा।

सराय घाट का युद्ध

अगली सुबह ने लचित ने ईटा कुली पर आक्रमण करके उसे जीत लिया। जब मुगल सम्राट औरंगज़ेब को इस घटना के बारे में पता चला तो वे बहुत नाराज़ हुआ और अहोम साम्राज्य से इस हार का बदला लेने के लिए मिर्जा राजा जय सिंह के बेटे को जिसका नाम राम सिंह था को 70,000 सैन्य टुकड़ी के साथ असम भेजा। दूसरी तरफ लचित ने बिना किसी देरी के किले की सुरक्षा को और मजबूत कर दिया।

लचित ने रात के रात अपनी मौलिक युद्ध नीति के नियमों के तहत अपनी सेना की सुरक्षा के लिए मजबूत मिट्टी के तट बांधों का निर्माण करवाया। इस कार्य का  जिम्मा लचित ने अपने मामा को सौंपा। बांध निर्माण में थोड़ी सी लापरवाही के चलते लचित ने अपने मामा का मरवा दिया। लचित का मानना था कि मरे मामा मेरी मातृभूमि से बढ़कर नहीं हो सकते। इस प्रकार सराय घाट का युद्ध अहोम सेना और मुगल सेना के बीच ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे पर लड़ा गया।

इतिहासकारों द्वारा यह बताया जाता है कि सराय घाट भारत वर्ष के इतिहास में शायद पहला महत्वपूर्ण युद्ध था जो पूर्णतया नदी में लड़ा गया था जिसमें सेनापति लचित ने नौसेना युद्ध में पहली बार नई तकनीक को आजमाते हुए मुगल सेना का पराजित किया था। ब्रह्म पुत्र नदी का सराय घाट इस युद्ध का साक्षी बना। युद्ध के प्रारंभ होने से पहले मुगलों के सेनापति रामसिंह को पता चला कि अन्दुराबली के किनारे रक्षा के इंतजामों को भेदा जा सकता है और गुवा हाटी को फिर से हासिल किया जा सकता है।

राम सिंह ने इस अवसर का फायदा उठाने के लिए इस क्षेत्र में अपनी मुगल नौ सेना खड़ी कर दी जिसमें 40 जहाज थे जो 17 तोपों और छोटी नौकाओं को ले जाने में समर्थ थे। यह युद्ध उस युद्ध यात्रा का अंत था जो आठ वर्ष पहले मीर जुमला के आक्रमण से प्रारंभ हुई थी। अतः बताया जाता है कि इस युद्ध के दौरान ब्रह्मपुत्र नदी में एक प्रकार का त्रिभुज बन गया था जिसमें एक तरफ कामख्या मंदिर था तो दूसरी तरफ अश्वक्लान्ता का विष्णु मंदिर और तीसरी तरफ ईटाकुली का किले की दीवार थी।

दुर्भाग्यवश लचित इस समय इतने अस्वस्थ थे कि उनका चलना-फिरना भी अत्यंत कठिन हो गया था लेकिन उन्होंने बीमार होते हुए भी भीषण युद्ध किया और अपनी असाधारण क्षमताओं और अदम्य साहस के चलते सराय घाट की प्रसिद्ध लड़ाई में लगभग 4000 मुगल सैनिकों को मार गिराया। इस प्रकार लचित बोर फुकन कि सेना ने 1667 के अक्तूबर क महीने में गुवाहाटी किले को वापिस जीत लिया।

19 दिसंबर 1667 को औरंगज़ेब में एक बार फिर सेना इकट्ठा करके राम सिंह को भेजा राम सिंह ने युद्ध अभियान 27 दिसंबर को दुबारा से शुरु किया। वे कुंदाघाट से होते हुए 1669 को सुआल कुची पहुंचे जनरल लाचि बोरफुकन के नेतृत्व में बहादुर असम की सेना ने उनकी योजनाओं में बाधा डाली।

दोनों पक्षों के बीच भयंकर झड़प हुई। कामरुप जिले के वर्तमान दादरा के पास अलाबोई गांव पचारिया में दोनों के बीच झड़प हुई। अपनी मातृभूमि के लिए लड़ते हुए असम की सेना ने मुगल सेना को भारी नुकसान पहुंचाया। इस युद्ध में लगभग 10000 असम के सैनिक मारे गए। इस प्रकार वीर असम सेना का बलिदान खाली नहीं गया और मुगल सेना का आगे बढ़ने क इरादे थम गए।

इस प्रकार दो साल बाद 1671 में सराय घाट के युद्ध में मुगलों को करारी और अपमानजनक हार का सामना करना पड़ा। 

सराय घाट के युद्ध के पहले की घटना

कोच साम्राज्य खास तौर पर मुगल साम्राज्य और अहोम साम्रााज्य के बीच स्थित एक राज्य हुआ करता था अहोम साम्राज्य के लिए मुगल साम्राज्य को विस्तार को रोकने के लिए एक महत्वपूर्ण बफर राज्य का काम करता था। 1587 में कोच साम्राज्य के तत्कालीन शासक नारा नारायण की मृत्यु के बाद परिस्थितियां बदले लगी।

जिसके चलते कोच साम्राज्य दो भागों में विभाजित हो गया पश्चिमी कोच साम्राज्य जो की बिहार का  क्षेत्र था उस पर उनके पुत्र लक्ष्मी नारायण का शासन रहा करता था और पूर्वी कोच हाजो पर उनके भतीजे रघु देव का शासन स्थापित हो गया था।

लक्ष्मी नारायण ने मुगल साम्राज्य के साम्राज्य के साथ गठबंधन किया जिसके बाद बंगाल के गवर्नर ने 1602 में धुबरी में रघु देव के पुत्र परिक्षित नारायण पर आक्रमण कर दिया। कई लड़ाईयों के बाद परिक्षित नारायण पराजित हो गया लेकिन उनके भाई वाली नारायण ने अहोम साम्राज्य में शरण ली।

मुगलों ने इसे अहोम साम्राज्य पर आक्रमण के बहाने के रुप में लिया और उनके बीच पहला युद्ध 1615 में हुआ। जिसके परिणाम के रुप में कई युद्ध हुए और दोनों पक्षों में उतार-चढ़ाव आते रहे। यह सिलसिला लगभग 1639 में असुरार अली की संधि तक योंही चलता रहा।

घिलाझरि घाट की संधि

इस संधि ने बरनादी नदी के उत्तर और असुरार अली दक्षिण को अहोम और मुगलों क बीच सीमा के रुप में निर्धारित किया। इसके साथ ही इस संधि के कारण कामरूप में मुगल प्रशासन स्थापित हो गया।

इसके बाद 31 जुलाई 1658 को औरंगज़ेब के मुगल सिंहासन पर बैठने के बाद उसने 1660 में मीर झुमला द्वितीय को पूरे असम क्षेत्र को जीतने का कार्य सौंपा। 1661 में आगे बढ़ते हुए इसने काई लड़ाइओं में अहोम सेना को हराया और अंत में अहोम साम्राज्य की राजधानी गढ़गांव पर कब्जा कर लिया।

लेकिन गोरिल्ला  युद्ध और मूसलाधार बारिश से नदियों में अफान आने के कारण मीर झुमला अपने शासन को सदृढ़ नहीं कर सका और अपने हालिया विजयों को छोड़न का विचार कर ही रहा था इस बीच इस बाढ़ वाली घटना की जानकारी अहोम साम्राज्य के शासक जय ध्वज सिंह को इसकी जानकारी नहीं थी जिस कारण से उसने मुगल सेना के समक्ष संधि प्रस्ताव रखा।

मीर झुमला ने इस अवसर का लाभ उठाया जिसके चलते 1663 में घिलझरि घाट की संधि हुई। लेकिन संधि की शर्तें इतनी कठोर थीं की अहोम सेना ने इस क्षेत्र में मुगल सेना की उपस्थिति को स्थायी रुप से समाप्त करने का प्रण लिया।

संघर्ष का बढ़ना

घिलाझिरि की संधि के बाद जयध्वज सिंह निराशा से चिंतित हो कर मर गए। लेकिन उन्होंने अपने चचेरे भाई तथा उत्तराधिकारी चक्रध्वज सिंह को हार की बेइज्जती का बदला लेने के लिए प्रेरित किया। राजा बनने के बाद चक्रध्वज सिंह ने अहोम सेना में सुधार का काम शुरु किया क्षेत्र के अन्य राज्यों के साथ संगठन को मजबूत किया तथा मुगलों से अगले युद्ध की तैयारी के लिए राज्य के रणनीतिक कोणों में नए किले बनवाए। उन्होंने अपनी नई सेना का नेतृत्व करने के लिए लचित बोरफुकन को चुना।

दूसरी तरफ मुगलों ने राज्य को अपने आधीन करने के लिए कूटनीतिक प्रस्ताव रखे जिसे अहोम साम्राज्य द्वारा ठुकरा दिया गया। लाचित ने शीघ्र ही पुनः गठित अहोम सेना के साथ गुवाहाटी की ओर कूच कि तथा गुवाहाटी की रक्षा करने वाली पांच चौकियों पर कब्जा करके लाचित ने मुगलों से पूरे क्षेत्र नियंत्रण छिन लिया।

अतिरिक्त सेना के आने के बाद मुगलों ने एक बार फिर से अहोम पर आक्रमण किया। लेकिन मानस नदी स्थित अपने ठिकानों पर अहोम के लगातार  हमलों ने उन्हें आत्मसमर्पण करने पर मजबूर कर दिया। अहोम साम्राज्य ने एक बार फिर मानस नदी पर अपना अधिकार स्थापित किया।

इस पराजय के बाद ही औरंजेब ने राजा राम सिंह को 30000 पैदल सैनिकों तथा 18000 घुड़सवार सैनिकों कि विशाल सेना के साथ अहोम साम्राज्य पर आक्रमण करने के लिए भेजा।

सराय घाट की लड़ाई के बाद के परिणाम

सराय घाट के युद्ध के कुछ साल बाद 1672 में लाचित बोरफुकन का प्राकृतिक रुप से निधन हो गया हालांकि यह लड़ाई निर्णायक थी लेकिन अहोम और मुगल साम्राज्य के बीच युद्ध संघर्ष समाप्त नहीं हुआ था। लाचित के उत्तराधिकारी लालुक सोलह द्वारा 1679 में गुवाहाटी को छोड़ दिए जाने के बाद यहां मुगलों का कब्जा हो गया।

लेकिन 1682 में दिहिंगिया आलम बोरबरुआ के नेतृत्व में अहोम सेना द्वारा इटाखुली की लड़ाई में मुगल को हराने के बाद एक बार फिर अहोम साम्राज्य के हाथों में आ गया। इस लड़ाई ने असम में मुगल उपस्थिति को पुरी तरह से समाप्त कर दिया। इसके बाद मुगलों ने अहोम साम्राज्य के खिलाफ और कोई अभियान नहीं चलाया।

लचित को सम्मान देने के लिए भारतीय सरकार की राष्ट्रीय अकादमी के सर्वश्रेष्ठ कैडेट को लचित बरफूकन स्वर्ण पदक से सम्मानित किया जाता है। बरफूकन की स्मृति को चिरास्थायित्व प्रदान करने के लिए हुलुम्गापार में उनकी समाधि बनाई गई है।

सराय घाट का बांध
ये वही बांध है जिसे लचित बोरफुकन ने मुगल सेना को रोकने के लिए बनाया था भारत सरकार द्वारा इस पुल को 1959 से 1962 पुनः निर्मित करवाया। सितंबर 1962 यह पुल बनकर तैयार हुआ। 23 सिंतबर 1962 में इस पर पहली बार रेलवे इंजन चलाया गया और अक्टूबर 1962 तत्कालीन प्रधानमंत्री पंण्डित जवाहर लाल नेहरु ने मालगाड़ियों के लिए इसका  उद्घाटन किया।

आम जनता के लिए यह पुल 7 जून 1963 को प्रधान मंत्री नेहरु ने औपचारिक रुप से इसे आम जनता और सड़क यातयात के लिए खोल कर राष्ट्र को समर्पत किया। 

2026-09-13

कोलाचेला का युद्ध


digital illustration of battle of colachel

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम त्रावणकोर के राजा तथा डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी के मध्य हुए कोलचल के युद्ध तथा युद्ध के प्रमुख कारणों पर चर्चा की गई। इसके साथ ही डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी के पतन के प्रमुख कारणों पर बात करी गई है। अंत यूद्ध के परिणामों पर विस्तार से बताया गया है।

परिचय

यह युद्ध त्रावणकोर के राजा मार्तनंड वर्मा तथा डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी के संचालक वैल इम्बोफ के बीच हुआ था। युद्ध की शुरुआत कुछ इस प्रकार होती है कि 18वीं शताब्दी के समय काल में वर्तमान केरल का मालाबार तट कई छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित था जिसे 1730 के दशक में त्रावणकोर का राजा मार्तंड वर्मा ने विस्तार वादी नीति अपना कर इन छोटे-छोटे राज्यों पर विजय हासिल करके इन्हें अपने साम्राज्य में मिला लिया। डच ईस्ट इण्डिया कंपनी का मसाला व्यापार इन्हीं छोटे-छोटे राज्यों पर निर्भर था। दरअसल कंपनी इन्हीं राज्यों से मसाला खरीद कर अन्य देशों में बेचा करती थी।

परिणामस्वरूप त्रावणकोर के राजा द्वारा इन क्षेत्रों पर अपना अधिपत्य स्थापित करने के कारण इनका व्यापार रुक गया। हलांकि कंपनी ने वार्ता को दौरान इसे जारी रखने को कहा मगर मार्तड वर्मा तथा उनके सामंतों ने उनके एकाधिकार अनुबंधों को मानने से इनकार कर दिया। बढ़ती समस्याओं को देखते हुए डच गवर्नर मुस्ताफ विलेम वैन इम्होफ जनवरी 1739 में कोच्चि का दौरा किया।

अपनी जुलाई की रिपोर्ट में उन्होंने माला बार के डच उपनिवेश को बचाने के लिए सैन्य कार्यवाही करने की सिफारिश की। कूटनीति का  सहारा लेते हुए वैन इम्होक ने सबसे पहले त्रावणकोर को पड़ोसी राज्यों कोलम कोच्चि और कायमकुलम से सैन्य गठबंधन किए उसके बाद त्रावणकोर के राजा से शांति वार्ता के लिए बातचीत कि। इस बैठक दौरान त्रावणकोर के राजा को शर्तें न मानने पर युद्ध की धमकी दी गई।

बात  का जवाब देते हुए त्रावणकोर के राजा ने कहा की अगर वे इस युद्ध में हार भी गए तब भी एक दिन वे मछली पकड़ने वाली नाव लेकर नीदरलैंड और यूरोप पर हमला करके उन्हें हरा  देंगे। अंत में अपसी बहस के चलते वार्ता को उचित परिणाम नहीं निकल पाया।

युद्ध की घोषणा

1739 में डच ईस्ट इण्डिया कंपनी ने श्री लंका से डचों के कैप्टन जोहान्स हैकर्ट की कमान में सेना भेज कर त्रावणकोर पर हमला कर दिया। अतः अचानक हुए हमले से संभल ना पाने कारण त्रावणकोर की सेना को पीछे हटना पड़ा और कोल्लम में डच सेना का अधिकार स्थापित हो गया। इस प्रकार डच सेना ने कई युद्धों में विजय हासिल की दक्षिण के आर्कोट पर अधिकार करने के बाद डच सेना अटिंगल की तरफ बढ़ी। डच ईस्ट इण्डिया कंपनी त्रावणकोर की दयनीय स्थिति का लाभ उठाना चाहती थी मगर सैन्य बल कम पड़ रहा था।

दूसरी तरफ ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कंपनी भी त्रावणकोर के राजा की बढ़ती शक्तियों के कारण परेशान थी सो इन्होंने भी डच सेना की सहायता के लिए अपने 150 संख्या की सैन्य टुकड़ी को भेजा मगर अभी भी सैनिक कम पड़ रहे थे। डच ईस्ट इण्डिया कंपनी ने इंडोनेशिया से मदद मांगी मगर इस समय काल के दौरान इंडोनेशिया में ग्रह युद्ध चल रहा था जिसके कारण वे सैनिक भेजने में असफल रहे। लेकिन डच कंपनी श्री लंका जिसे पहले सीलोन के नाम से जाना जाता था से सैनिक मंगाने में सफल रहे।

कोलाचेल का युद्ध

सभी सैनिकों को बुलाने के बाद डच सेना ने 26 नवंबर 1740 कोलाचेल पर नौसैनिक बेड़ा भेजा और शहर पर बमबारी करके उसे खाली करने पर मजबूर कर दिया। डचों की योजना कोलाचेला पर अधिकार स्थापित करने की थी जिसके माध्य से पद्मानाभपुरम पर कब्जा कर पाना आसान हो जाता। 29 नवंबर को डच कमांडर वैन गोलिनेसे ने कोलाचेल के आसपास त्रावणकोर तट की पूर्ण नाकाबंदी की घोषणा की और अपनी सेनाओं को तट की और जाने वाले सभी जहाजों को जब्त करने का निर्देश दिया सिवाय उन जहाजों के जो एडवा से माल ले जा रहे थे।

13 जनवरी 1741 को डच जहाज मारसेवीन को दक्षिण की ओर भेज दिया गया जिसे थेनगापट्टनम और कोलाचेल क बीच लंगर डालना था। 10 फरवरी को सात बड़े जहाज़ और कई छोटे पोतों वाले एक अन्य डच अभियान दल ने कोलाचेल के ठीक उत्तर के तट पर कदम रखा।

कोलाचेल बंदरगाह में प्रवेश करने वाली डच ईस्ट इंडिया कंपनी को हराने में मराकायरों ने प्रमुख भूमिका निभाई नीदरलैंड के लीडेन विश्वविद्यालय के डी लैनाय के शोधो से पता चला है कि मराकायार समुदाय और उनके लोगों के लोगों ने डच जहाजों को हराने में और डच सैनिकों को बंधक बनाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और त्रावणकोर के राजा की मदद की थी।

परिणास्वरुप डच सैनिक कौलाचेल पर अपना अधिकार जमाने में सफल रहे और इसके बाद डचों ने अगल बगल के क्षेत्रों पर कब्जा जमाना प्रारंभ किया। जब मार्तंड वर्मा को इसकी सूचना मिली तब पद्मानाभपुरम से मार्तंड वर्मा ने 2000 सैनिकों को कोलाचेल भेजा और कोलाचेल को वापिस पाने के लिए रणनीति बनाई। मार्तंड वर्मा ने समुद्र से किसी भी प्रकार कि आपूर्ति को रोकने के लिए मछली पकडने वाली नौकाओं का इस्तेमाल किया इस प्रकार मार्तंड वर्मा ने डच सैनिकं सहित पूरे कोलाचल को घेर लिया।

संख्या में अधिक होने के बावजूद यूरोपीय लोग तकनीकी रुप से श्रेष्ठ थे जिसके बल पर डच सैनिकों न त्रावणकोर की सेना को भारी नुकसान पहुंचाया। इसी बीच बारिश और बाढ़ जैसी स्थितियों के कारण डच सेना को आपूर्ति प्रवाह पूरी तरह से बाधित हो गया और बारूद के गिला होने का कारण कमजोर पड़ गये।

परिणामस्वरूप 5 अगस्त 1941 में त्रावणकोर की तरफ से दागा गया गोला जा कर डच चौंकी के अंदर बरुद से भरे बैरल से टकराया जिस के चलते गोला बारूद  के भंडार के साथ ही खाद्य भंडार भी उड़ गया। गोला-बारूद और भोजन की कमी के कारण डचों को मजबूर होकर आत्मसमर्पण करना पड़ा। यह तिथि इतिहासकारों के अनुसार 10 अगस्त 1741 की थी।

कोलचेल की लड़ाई का प्रभाव

इस युद्ध के चलते डच ईस्ट इण्डिया कंपनी का केरल से व्यापार समाप्त हो गया। इस युद्ध  का खास यह प्रभाव  निकला की डच कैदियों ने मार्तंड वर्मा का साथ दिया और उन्होंने यूरोपीय तर्ज  पर त्रावणकोर सेना का आधुनिकरण किया। जिसके चलते नव प्रशिक्षित त्रावणकोर की सेना अन्य राज्यों के विरुद्ध मार्तंड वर्मा के लिए अत्यंत प्रभावी साबित हुई। इसके साथ ही डच कैदियों के सहयोग से बने त्रावणकोर के किले को इतना मजबूत बना दिया की इसने 1791 में फ्रांसीसी हथियारों से लैस मैसूर सेना के आक्रमण को रोक दिया। किले के निर्माण का मुख्य श्रेय डी लैनांय नामक व्यक्ति को जाता है।

इस घटना के चलते त्रावणकोर साम्राज्य ने डचों के मिर्च व्यापार पर अपना आधिपत्य स्थापित किया। देश के आजाद होने के बाद भारत सरकार ने डच सेना के विरुद्ध मिली इस जीत में कुलाचेल में विजय स्तंभ की निर्माण करवाया। भारतीय डाक विभाग ने मद्रास रेजिमेंट की 9वीं बटालियन की स्थापना की। इस घटना की 300वीं वर्ष  गांठ पर यानी 1 अप्रैल 2004 को 5 रुपये का डाक टिकट जारी किया गया। इसके साथ ही पांगोडे सैन्य शिविर के परेड ग्रांउड को कुलाचल ग्राउंड का नाम दिया गया।

2026-09-02

गनीमी कावा

guerilla warfare article banner image

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में मराठा साम्राज्य के महान राजा एवं मराठा छत्रपति शिवाजी की महाराज की गौरिल्ला युद्ध रणनीति जिसे हम गनीमी कावा के नाम से भी जानते है के बारे में चर्चा करेंगे। शिवाजी जी महाराज ने सीमित सैन्य बल होने के बावजूद भी 27 सालों तक मुगल सेना को कड़ी टक्कर दी। इसके साथ ही शिवा जी महाराज द्वारा लड़े युद्धों के बारे में चर्चा करेंगे। आगे लेख में यह समझने की कोशिश करेंगे की इस युद्ध रणनीति में किन तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता था जो इसे खास बनाती है।

परिचय

गलीमी कावा की खोज मराठा साम्राज्य के महाराज छत्रपति शिवा जी ने की उनका जन्म 16 फरवरी 1630 में महाराष्ट्र के पुणे जिला में शाह जी भोसले के घर हुआ। जो की उस समय काल में मुगल शासक आदिल शाह के सेनापति थे। अपने समय काल में उनके पास पुणे चाकण पुणे तथा सुपे की बड़ी जागीर को मुगल शासकों के सामन्त के रुप में सम्हालते थे। बाद में उन्हें बंगलूरु जागीर का भी कार्य भार संभाला। शिव जी की माता का नाम जीजाबाई था।

शिवा जी अपने पिता के समान  मुगल शासकों का सामन्त नहीं बनना चाहते थे मगर उनका विरोध करना भी कठिन था क्योंकि मुगलों को पास विशाल सेना थी और शिवा जी महाराज  के पास मात्र मुठ्ठी भर सैनिक। लेकिन फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी। इस प्रकार गनीमी कावा नामक युद्ध रणनीति का उदय हुआ।

यहाँ खास बात यह है कि शाह जी राजे ने ही शिवा जी महाराज को पुणे की जागीर का प्रबंधन सौंपा और उन्हें दादो जी कोंडदेव जैसे कुशल गुरु का संरक्षण प्राप्त हुआ। जिनके चलते ही आगे चलकर शिवा जी महाराज को हिंदवी स्वराज्य की स्थापना करने का आधार मिला।

गनीमी कावा की युद्ध रणनीति

अचानक हमला
इस युद्ध nरणनीति की सबसे खास बात यह थी कि अचानक हमला किया जाता था ताकि जब तक दुश्मन जबतक तैयार हो तब तक हरा दिया जाए। इस योजना के चलते दुश्मन शिविरों पर तथा आपूर्ति लाइनों यानी अनाज रखने या लाने की जगह पर अचानक व अप्रत्याशित हमने किए जाते थे ताकि दुश्मन को हथियारों और अनाज को समाप्त किया जा सके।

गतिशीलता
शिवा जी महाराज युद्ध के दौरान भारी हथियारों व ढाल का इस्तेमाल नहीं करते थे ताकि उनके सैनिक तेजी से हमला करके के पीछे हट जाए। अतः युद्ध के दौरान हल्के हथियारों का इस्तेमाल किया जाता था।

भूभाग का  प्रयोग
शिवा जी महाराज की गनीमी कावा रणनीति को दौरान ऐसे छोटे और संकरे क्षेत्र का इस्तेमाल किया जाता था जहां अधिक मात्रा में मुगल सैनिक न आ सके और समय रहते उन पर हमला किया जा सके। अपनी इस रणनीति को अंजाम देने के लिए युद्ध क्षेत्र के रुप में पश्चिमी घाट के पहाड़ी क्षेत्रों और वन क्षेत्रों का इस्तेमाल किया जाता था।
 
समूह में विभाजन
इस रणनीति की खास विशेषता यह थी कि शिवा जी महाराज अपने सैनिकों को छोटी-छोटी  टूकडीयों में विभाजित कर देते थे। जिनके माध्यम से सैनिकों को युद्ध के दौरान आराम करने का मौका भी मिल जाता था और युद्ध कौशल का परिचय देना का भी। अपनी इस रणनीति के दौरान ही शिवा जी महाराज दुश्मन सेना की मुखबिरी करवाते और उनकी आगामी चाल का पता लगाते थे जिसके अनुसार ही आगामी युद्ध की रणनीति को बनाया जाता था।

मनोवैज्ञानिक युद्ध रणनीति
यह इस युद्ध रणनीति का आखिरी चरण था जिसमें दुश्मन सैनिकों में भ्रम य भय पैदा किया जाता था। जिसमें दुश्मन सेना की आगे कि चाल को समझते हुए, मराठा सैनिक उस स्थान पर पहले से घात लगाए बैठे रहते थे और हमला करने के सही समय का इंतजार करते थे। जिसमें दुश्मन सैनिकों के बगल से फुर्ती से गुजरना व अचानक से हमला करना यानी दुश्मन सैनिक उन्हें देख भी नहीं पाते तो और घायल हो जाते थे। जिसके चलते उनके अंदर भूत प्रेत के होने की शंका होने लगती थी।

इसके अलावा पहाडीयों के संकरे रास्ते से दुश्मन को खायी में गिराना तथा जंगल जाल बिछा कर रखाना भी इस रणनीति का खास हिस्सा था। कुल मिलाकर अगर मराठा सैनिकों गनीमी कावा रणनीति का इस्तेमाल न करते तो, मुगल सैनिकों को आमने-सामने के लड़ाई में हराना नामुमकिन था क्योंकि वे संख्या में ज्यादा थे।

शिवा जी महाराज द्वारा लड़े गए युद्ध

प्रतापगढ़ का युद्ध 1659
यह गनीमी कावा युद्ध शैली का एक अच्छा उदाहरण है जिसमें शिवाजी महाराज ने बीजापूर सल्तनत के सेनापति अफजल खान को  हराने के  लिए गोरिल्ला युद्ध रणनीति का सहारा लिया। शिवा जी ने पहले बड़े युद्ध से परहेज किया इसकी जगह पर पहाड़ी इलाकों में अचानक हमले और घात लगाकर आक्रमण किए गए। उन्होंने स्वयं एक रणनीतिक बैठक के दौरान अफजल खान का सामना किया और एक गुप्त छोटे हथियार से उसे मार डाला। परिणामस्वरूप शत्रु सेना का मनोबल टूट गया। अंत में मुगल सेना पीछे हटने के मजबूर हो गयी। इस प्रकार शिवा जी महाराज की विजय हुई।

अहमद नगर और जुन्नर अभियान 1657
यह मुगलों के साथ पहला सिधा हमला था जिसमें शिवा जी सेना ने मुगल साम्राज्य की सीमाओं से प्रवेश कर छापा मार  युद्ध रणनीति का इस्तेमाल किया और उन्हें हार मानने पर मजबूर किया।

लाल महल हमला 1663
यह हमला पुणे जागीर पर सूबेदार शास्ता खान को हराने के लिए किया गया था। इस हमले के दौरान रात में तीसरे पहर का इस्तेमाल किया गया। इस युद्ध के दौरान शास्ता खान को अपनी अंगुलियां गवानी पड़ी मगर वह भागने में सफल रहा।

सूरत की पहली चढ़ाई 1664
उस समय काल के दौरान सूरत मुगलों की मुख्य व्यापारिक बंदरगाह थी जिस पर मराठा सैनिकों ने हमला करके मुगल सैनिकों हराकर उन्हें भारी वित्तीय हानि पहुंचाने में सफलता हासिल की।

पुरंदर का युद्ध 1665
यह युद्ध मुगल सेनापति मिर्जा राजा जय सिंह की विशाल सेना के साथ लड़ा गया। जिसमें मराठा सैनिकों की हार हुई और उन्हें मुगलों के साथ पुरंदर की संधि करनी पड़ी।

सूरत की चढ़ाई 1670
पुरंदर की संधि टूटने का बाद मुगलों का आर्थिक हानि पहुंचाने के लिए सूरत पर फिर से हमला किया गया। इस युद्ध के दौरान मराठा सैनिकों की जीत हुई।

सिंहगढ़ का युद्ध 1670
इस युद्ध में मुगल किले कोंढाणा के संरक्षक उदयभान राठौड़ को हराया गया और शिवा जी महाराज की जीत हुई।

वाणी-डिंडोरी का युद्ध
नासिक के पास मुगल सेना के सेनापति दाऊद खान को मराठा सेना ने खोले मैदान में युद्ध लड़ के पराजित किया।

साल्हेर का युद्ध 1672
यह मुगल सेना और मराठा सैनिकों के बीच खुले मैदान क्षेत्र लड़ा गया ऐतिहासिक युद्ध था। जिसमें मराठा सेना ने सेनापति इखलास खान को हराकर ऐतिहासिक विजय हासिल की।

इस प्रकार से देखा जाए तो शिवा जी महाराज का युद्ध कौशल केवल गनीमी कावा जैसी युद्ध रणनीति पर ही निर्भर नहीं था वे समय और परिस्थिति के अनुसार ही अपनी युद्ध रणनीति को अंजाम देते थे। श्रोतागणों से अनुरोध है कि इस रणनीति के बारे में य शिवा जी महाराज के युद्ध कौशल के बारे में अगर आपके पास कोई जानकारी है तो हमें जरूर साझा करें।

2026-08-28

नाना साहब

portrait photo of nana saheb

प्रस्तावना

‎प्रस्तुत लेख में हम महान भारतीय क्रांतिकारी नाना साहेब के बारे मे चर्चा करेंगे। जिन्हें हम भारतीय प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के शिल्पकार के नाम से भी जानते हैं। इसके साथ ही हम उनके द्वारा किये गए महत्वपूर्ण कार्यों के बारे में चर्चा करेंगे। तथा उनके जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओ जैसे की पेंशन का निलंबन, कानपुर विद्रोह इसके साथ ही 1857 की क्रांति के दौरान कल्पी दिल्ली और लखनऊ यात्रा की घटना का ज़िक्र किया गया है। इसके अलावा मेरठ क्रांति की पूर्ण घटना का ज़िक्र किया गया है। इसके साथ ही doctrine of lapse कानून के बारे मे ज़िक्र किया गया है।

जीवन परिचय

19 मई 1824 को इनका जन्म वेनगांव के माधवराव नारायण भट्ट के घर हुआ। उनकी माता का नाम मैनावती था। उनके पिता पेशवा के बाजीराव द्वितीय के चचेरे भाई थे।

‎बाजीराव पेशवा ने नाना राव को अपना दत्तक पुत्र स्वीकार किया और उनकी शिक्षा दीक्षा का जिम्मा अपने हाथों में लिया। नाना राव के बचपन का नाम धन्डोपंत था।  बचपन से बाजीराव द्वितीय की छत्र छाया मे ही उन्हें तलवार और बंदूक चलना तथा घुड़सवारी को सिखाया गया। नाना साहेब की तीन पत्नियां थी। जिनके नाम कुछ इस प्रकार थे कृष्णबायी सर्जाबायी काशीबाई था।

‎नाना साहब 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता के प्रमुख नेताओं मे से एक थे, इन्होंने अपना विद्रोह कानपुर में ब्रिटिश शासन के खिलाफ किया था।

‎पेंशन का निलंबन

‎लार्ड डलहोजी की हड़प नीति अंग्रेजों की इसी नीति को Doctrine of Lapse के नाम से भी जाना जाता हैं। इस नियम के तहत अंग्रेजों ने नाना राव को बाजीराव द्वितीया का वैध उत्तराधिकारी मनाने से मना कर दिया था। इस प्रकार उनकी वार्षिक पेंशन बंद कर दी गयी। पेशवा बाजीराव के मरने के बाद नाना साहब ने पेशवा की सभी उपाधियों को धारण कर लिया।
‎इसके साथ ही उन्होंने अपने वकील के सहयोग से ब्रिटिश सरकार को आवेदन किया और पेश वाई पेनशन को चालू करवाने की न्यायोचित मांग कानपुर के कलेक्टर के पास रखी मगर उनकी मांग को खारिज कर दिया गया और उन्हे सूचना दी गयी की ब्रिटिश सरकार उनकी पेश वाई उपाधि को स्वीकार नही करती।

‎लंदन मिशन

‎नाना साहब ने अपनी पेंशन बहाल करने के कई प्रयास किये मगर असफल रहे। इसके बाद क्षेत्रीय वकीलों का सहारा लिया मगर वे भी असफल रहे। अंत मे नाना साहब ने प्रसिध्द राजनेता एवं वकील अजीमुल्ला खान को इंग्लैंड भेजा लेकिन सारे प्रयास असफल रहे। अंत मे नाना साहब को अंग्रेजों की कूटनीति के बारे मे पता चला। दरासल अंग्रेज पेशवा बाजीराव की संपूर्ण सम्पति को जब्द करके अपनी टरेट्री में शामिल करना चाहते थे।
‎इन्ही कारणों से नाना साहब की पेंशन को बंद किया गया था। अजीमूल्ला खां ने बोहत प्रयास किये मगर असफल रहे। लौटते वक्त अजीमूल्ला खां ने रूस इटली फ्रांस की यात्रा की और वापिस आकर अंग्रेजों की वस्तविक साज़िश और यूरोप मे चल रहे स्वधिनता आंदोलन से रूबरू कराया।

‎1857 की क्रांति

‎इस क्रांति के दौरान नाना साहब ने लखनऊ दिल्ली की यात्रा की और कानपुर वापस आकर अपने परम मित्र कुवर सिंह से मुलाकात की जो की बिहार के रहने वाले थे इनसे मिलने के बाद इन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति करने की बात पर विचार विमर्श किया।

‎इसी दौरान मेरठ में अंग्रेजों के प्रति विद्रोह भड़क उठा जिसमें नाना राव ने गुप्त रूप से मदद की। जिसके परिणाम स्वरूप क्रांति कारियों ने ब्रिटिश खजाने से लगभग 9 लाख की नकदी और असलाह बारूद बरामद हुए। कानपुर के एक गढ़ में अंग्रेजों को कैद कर लिया गया और गढ़ पर भारतीय ध्वज फरया गया।

‎दिल्ली प्रस्थान

‎लूट की घटना के बाद सभी क्रांति कारी कानपुर मे दिल्ली जाने के लिए इकट्ठा हुए यांहा नाना साहब ने सभी का सहयोग किया मगर दिल्ली जाने मे बोहत खतरा था अतः सेना और हाथियारों की कमी के कारण दिल्ली प्रस्थान के लिए नाना साहब को न जाने की सलाह दी गयी।

‎जिसके परिणाम स्वरुप नाना साहब ने कानपुर से ही युद्ध का नेतृत्व किया और कानपुर के कल्याणपुर से युद्ध की घोषणा की। उन्होंने अपने सैनिकों को कई टुकड़ों मे बाँटा जिन्होंने अंग्रेजों को कड़ी टक्कर दी। परिणाम स्वरुप अंग्रेज पीछे हटने को मजबूर हुए। सेना के नेता ने अंग्रेज अफसर जनरल टु व्हीलर को पत्र लिखा और उन्हे इलाहाबाद वापिस बुलाने की गुजारिश की। टु व्हीलर ने उन्हे सुरक्षित इलाहाबाद लाने का वायदा किया।

‎सती चौरा घाट पर जब अपने साथी सैनिकों के लिए नाव की व्यवस्था की तब क्रांतिकारियों ने उन पर गोलियां चला दी जिसमें अनेकों अंग्रेज सैनिक मारे गए। ब्रिटिश सरकार इसका दोषी नाना साहब को ही मानती हैं।

‎बदले मे जनरल ने बड़ी सेना कानपुर मे भेजी क्रांति कारियों की पत्नियों को गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें मार डाला गया। इस घटना के बाद एक बार फिर से कानपुर मे ब्रिटिश शासन स्थापित हो गया।

‎लखनऊ प्रस्थान

‎इस घटना के बाद नाना साहब कानपुर से भागने मे सफल रहे। अंग्रेजों की बढ़ती सेना को देख कर नाना साहब गंगा नदी पर कर लखनऊ चले गए। अपने साथ भाईयों के सहयोग से एक बार फिर नाना साहब कानपुर वापस लौट आये। एक बार फिर से विद्रोह करने का प्रयास किया मगर अंग्रेजों ने कानपुर और लखनऊ मार्ग पर अपना अधिपत्य स्थापित कर लिया जिसे कारण नाना साहब को रुहेलखंड की और भगाना पड़ा।

‎रुहेलखंड मे विद्रोह

‎रुहेलखंड पहुंचकर उन्हें खान बहादुर खान का समर्थन मिला जिसके कारण एक बार फिर उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह प्रारंभ किया। अब अंग्रेजों को समझ आगया की जब तक नाना साहब पकड़े नही जाते तब तक विद्रोह को दबाना मुश्किल हैं। परिणाम स्वरूप अपने मुखबिरों को करांतिकारियो के संगठन मे शामिल किया ताकि उनकी हर गतिविधि पर नजर रख कर उन्हें पकड़ा जा सके।

‎मगर इन प्रयासों के बावजूद भी नाना साहब भागने मे सफल रहे और बरेली चले गए। बरेली विद्रोह मे क्रांति कारियों की हार हुई लेकिन नाना साहब महाराणा प्रताप की तरह बहादुरी से लड़े। अंत मे अपने सहयोगियों के कहने पर उन्हे नेपाल जाना पड़ा क्योंकि उनका मानना था अगर वे यानी उनका नेता पकड़ा गया तो विद्रोह समाप्त हो जायेगा।

जिस कारण नाना साहब नेपाल चले गए और यंही से उन्हे प्रधानमंत्री के संरक्षण मे रहना पड़ा। 

‎अंत मे 24 सितम्बर 1859 मे इनका देहांत हो गया। नाना साहब के बलिदान को इतनी आसानी से भूलना देश वासियों के लिए किसी देश द्रोह से का नही हैं।

2026-04-02

मोपला विद्रोह कब हुआ था

mopala vidroh kab hua tha
प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम भारतीय इतिहास के सुप्रसिद्ध विद्रोह मोपला विद्रोह के  बारे में चर्चा करेंगे जिसे हम मालाबार विद्रोह के नाम से भी जानते है। हांलकि यह विद्रोह मात्र एक वर्ष की चला लेकिन यह आज़ादी के इतिहास का एक महत्वपुर्ण पहलु है। इस विद्रोह के पिछे का मुख्य कारण जमीदारी प्रथा से पीडित किसान थे। इसके साथ ही मोपला विद्रोह के मुख्य पात्रों के बारे में भी चर्चा करेंगे।यह लेख आपको मोपला विद्रोह के समय, कारण, प्रमुख नेताओं, घटनाओं और इसके प्रभावों के बारे में विस्तृत जानकारी देगा।

1921 के माला बार विद्रोह का पूरा इतिहास

भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कई ऐसे आंदोलन हुए, जिन्होंने ब्रिटिश शासन की नींव को हिला दि थी। उन्हीं में से एक महत्वपूर्ण घटना थी मोपला विद्रोह, जिसे मालाबार विद्रोह के नाम से भी जाना जाता है। यह विद्रोह वर्ष 1921 में वर्तमान मालाबार (केरल) क्षेत्र में हुआ था।

मोपला विद्रोह कब हुआ था

मोपला विद्रोह अगस्त 1921 में शुरू हुआ और 1922 तक चला। यह विद्रोह मुख्य रूप से मालाबार क्षेत्र के मुस्लिम किसानों (मोपला समुदाय) द्वारा अंग्रेजों और जमींदारों के खिलाफ किया गया था।

मोपला विद्रोह का परिचय

मोपला (या मपिल्ला) समुदाय केरल के माला बार क्षेत्र में रहने वाला एक मुस्लिम समुदाय था। ये लोग अधिकतर किसान थे और लंबे समय से जमींदारों तथा ब्रिटिश शासन के अत्याचारों से परेशान थे।हलांकि यह विद्रोह केवल एक किसान आंदोलन नहीं था, बल्कि इसमें धार्मिक और राजनीतिक तत्व भी शामिल हो गए थे, जिससे यह और जटिल बन गया।

मोपला विद्रोह के मुख्य कारण

1.अंग्रेजों का दमनकारी शासन
ब्रिटिश सरकार ने किसानों पर भारी कर लगाए और उनके अधिकारों को सीमित कर दिया। इससे किसानों में असंतोष बढ़ता गया।

2.जमींदारी प्रथा का शोषण
माला बार में जमींदार (ज्यादातर हिंदू उच्च वर्ग के लोग) किसानों से अधिक लगान वसूलते थे।किसानों को भूमि का अधिकार नहीं था उन्हें कभी भी बेदखल किया जा सकता थाइससे मोपला किसानों में विद्रोह की भावना पैदा हुई।

3.खिलाफत आंदोलन का प्रभाव
खिलाफत आंदोलन ने मुस्लिम समुदाय को एकजुट किया और ब्रिटिश विरोध को बढ़ावा दिया।

4.असहयोग आंदोलन का प्रभाव
असहयोग आंदोलन के कारण देश भर में अंग्रेजों के खिलाफ माहौल बना, जिसका असर मालाबार क्षेत्र में भी पड़ा।

 5.धार्मिक और सामाजिक तनाव
धीरे-धीरे यह आंदोलन धार्मिक रंग लेने लगा, जिससे कई जगहों पर साम्प्रदायिक संघर्ष भी हुए।

मोपला विद्रोह के प्रमुख नेता

1.अली मुसलियार
वे एक धार्मिक नेता थे उन्होंने विद्रोह को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 
2.वरियमकुन्नथ कुन्हम्मद हाजी
वे विद्रोह के प्रमुख सैन्य नेता थे उन्होंने कुछ क्षेत्रों में स्वतंत्र शासन स्थापित करने की कोशिश की। 

विद्रोह की शुरुआत

अगस्त 1921 में ब्रिटिश सरकार ने खिलाफत आंदोलन के नेताओं को गिरफ्तार किया, जिसके बाद लोगों में गुस्सा भड़क उठा और विद्रोह शुरू हो गया। मोपला विद्रोहियों ने पुलिस स्टेशनों और सरकारी इमारतों पर हमला किया।

जमींदारों के खिलाफ संघर्ष
कई जगहों पर जमींदारों की संपत्ति पर कब्जा किया गया और उनके खिलाफ हिंसा हुई। समय के साथ यह आंदोलन हिंसक हो गया और कई क्षेत्रों में धार्मिक संघर्ष भी देखने को मिले, जिससे इसकी छवि विवादास्पद बन गई।

ब्रिटिश सरकार की प्रतिक्रिया

ब्रिटिश सरकार ने इस विद्रोह को दबाने के लिए कठोर कदम उठाए
सेना तैनात की गई।हजारों लोगों को गिरफ्तार किया गया, कई विद्रोहियों को मृत्युदंड दिया गया। इस दौरान एक दुखद घटना भी हुई, जिसे वागन त्रासदी कहा जाता है, जिसमें कई कैदियों की दम घुटने से मृत्यु हो गई।

मोपला विद्रोह के परिणाम

1.दमन और हानि
हजारों लोग मारे गए कई लोग बेघर हो गए समाज में भय और अस्थिरता फैल गई।

2.सामाजिक विभाजन
यह विद्रोह हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच तनाव बढ़ाने का कारण बना।

3.मालाबा विद्रोहका स्वतंत्रता आंदोलन पर प्रभाव
हालांकि यह विद्रोह अंग्रेजों के खिलाफ था, लेकिन इसकी हिंसक प्रकृति के कारण राष्ट्रीय आंदोलन को कुछ नुकसान भी हुआ।

मोपला विद्रोह का ऐतिहासिक महत्व

मोपला विद्रोह भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना है क्योंकि यह किसानों के शोषण के खिलाफ एक बड़ा आंदोलन था इसने ब्रिटिश शासन के खिलाफ असंतोष को उजागर किया यह दिखाता है कि सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक कारण मिलकर कैसे बड़े विद्रोह को जन्म देते हैं

विश्लेषण 
मोपला विद्रोह को अलग-अलग दृष्टिकोण से देखा जाता है
कुछ इतिहासकार इसे किसान विद्रोह मानते हैं
कुछ इसे धार्मिक आंदोलन के रूप में देखते हैं
जबकि अन्य इसे ब्रिटिश विरोधी आंदोलन मानते हैं
वास्तव में, यह इन सभी तत्वों का मिश्रण था।

निष्कर्ष

हालंकि यह आंदोलन पूर्णतः सफल नही रहा मगर ब्रिटीश सरकार के प्रशासन व्यवस्था पर आंकुश लागाने के लिए एक अहम कदम था। जिसे भारतीयों किसानों द्वारा अपने अधिकारों के शोषण के विरुद्ध प्रारम्भ किया गया था। यह आंदोलन सफल न होने के बावजूद भी इतिहास में अपनी एक महत्वपुर्ण छाप छोड़ता है।