प्रस्तावना
प्रस्तुत लेख में मारवाड़ की सेना में राजपूत सेनापति एवं राजनेता दुर्गा दास राठौर के कार्यों तथा उनके जीवन पर प्रकाश डाला गया है। दुर्गा दास जी एक सच्चे देश भक्त के साथ-साथ एक बहादुर सेनापति भी थे। मुगल सत्ता ने उन्हें कई बार प्रलोभन देकर अपने साथ मिलाने का प्रयास किया मगर दुर्गा दास उनके प्रलोभन में नहीं फंसे वे चाहते तो जन समर्थन से मारवाड़ की गद्दी भी ले सकते थे मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया।
वे अपनी स्वामी भक्ति से वचन बद्ध रहे जिसका खामियाजा भी उन्हें ही भुगतना पड़ा। उनके शौर्य और राजनीतिक सूझबूझ के चलते राजा से ज्यादा लोग उनकी प्रशंसा करते थे जिसके कारण मारवाड़ के राजा को उनसे ईर्ष्या होने लगी जिसके चलते राजा ने उन्हें अपने साम्राज्य से बाहर निकाल दिया य यूं कहे तो देश निकाला कर दिया।
जबकि मारवाड़ के राजा दुर्गा दास के प्रयासों से ही मारवाड़ के राजा बन पाये थे मगर दोस्तों ईर्ष्या इतनी खराब चीज़ होती है कि यह आपको अपने खास य प्रिय लोगों से भी दूर ले जाती है। जिसका एक अच्छा खासा उदाहरण हमें दुर्गा दास जी की इस कहानी में देखने को मिलेगा।
जीवन परिचय
उनका जन्म राजस्थान की मारवाड़ रियासत में 13 अगस्त 1968 में हुआ था। उनके पिता आस्करण राठौर तात्कालिक राजा जसवंत सिंह के राज मंत्री थे। तथा उनके दादा राव रणमल राजपूत वंश कराना से संबंध रखते थे। हलांकि कुछ ग्रंथों में दुर्गा दास राठौर को मारवाड़ राजा के दूर के चाचा के बेटे के रुप में भी दर्शाया गया है। उनकी माता का नाम बाई जी नेत कंवर जी था जो कि सलवासा गांव से थीं।
राठौर साहब की दो पत्नियां थी पहली का नाम लक्ष्मण कंवर तथा दूसरी का नाम केसर कंवर था। इनके चार पुत्र हुए जिनका नाम इस प्रकार है पहले का नाम अभय सिंह दूसरे का नाम तेज सिंह तीसरे का नाम अनोप सिंह तथा चौथे पुत्र का नाम दिलीप सिंह था। दुर्गा दास राठौर तीन भाई थे उनके भाइयों का नाम सुजान सिंह और जोरावर सिंह था।
उन्हें मुख्य रुप से राजा जसवंत सिंह के उत्तराधिकारी के रुप में जाना जाता है दरअसल एक युद्ध के दौरान राजा की हत्या कर दी गयी थी अतः षड्यंत्रकारियों से राजा के उत्तराधिकारी की रक्षा करने के लिए उन्होंने उनके पुत्र का संरक्षण किया तथा उन्हें पुनः राजगद्दी पर स्थापित करने अहम भूमिका निभाई।
बचपन की घटना
अपने बचपन में दुर्गा दास राठौर लुनावे गांव में मकई की खेती किया करते थे। एक दिन राईका यानी ऊंट चराने वाले ने उनके खेतों में अपने ऊंटों के चरने के लिए छोड़ दिया। परिणामस्वरूप पूरी फसल बर्बाद हो गयी जब वे राईका के ऊंटों द्वारा हुए अपने नुकसान का मुआवजा लेने के लिए गए तो राईका ने उन्हें बुरा भला कहा तथा राजा को भी टूंडा कहा है।
दरअसल उस समय राजा जसवंत सिंह मुगल साम्राज्य के अधीन एक सामंत के रुप में प्रशासन चलाया करते थे। मगर ऊंट चरवाहे की बातों को दुर्गा दास राठौर ने बहुत गंभीरता से और क्रोध में आकर उसकी जान ले ली।
मामला राज दरबार में पहुंचा तब दुर्गा दास के पिता भी राज दरबार में उपस्थित थे मगर उन्होंने अपने बेटे की तरफ से राजा से पैरवी नहीं की जबकि वे चाहते तो ऐसा कर सकते थे क्योंकि वे राज दरबार में ही मंत्री पद पर आसित थे।
हलांकि राजा ने उन्हें बोलने का मौका दिया उन्होंने उनके पिता अस्करण से पुछा गया क्या ये तुम्हारा बेटा है तो उन्होंने जवाब देते हुए कहा महाराज कुपुत्र को पुत्र नहीं कहते। इसके बाद जब राजा ने दुर्गा दास से उनके अपराध के बारे में पुछा तो उन्होंने बड़ी निर्भीकता से अपराध को स्वीकार किया और राजा को बताया कि।
महाराज मैंने उस राईका की हत्या इस लिए की क्योंकि वे मेरे और आपके बारे में गलत बातें कर रहा था जो मुझसे सहन नहीं हुआ और मैंने उसकी हत्या कर दी। बालक की निर्भीकता से राजा बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने दुर्गा दास राठौर की पीठ थपथपाई।
बालक अजीत सिंह का सरंक्षण
28 नवंबर 1678 में जमरुद वर्तमान अफगानिस्तान में युद्ध के दौरान राजा की मौत हो गयी। राजा की दो रानियां थी पहली का नाम जादम और दूसरी का नाम नरुकी था जब राजा मरे उस समय काल ये दोनों गर्भवती थी। मगर राजा को अन्य वंशज राजगद्दी संभालने के लिए जीवित नहीं था। अतः मुगल साम्राज्य के सामंत होने नाते सभी फैसले मारवाड़ प्रशासन के लिए औरंगज़ेब द्वारा लिए जाते थे जिसके चलते मुगल शासन ने राजा जसवंत सिंह के भाई अमर सिंह के पौत्र इंद्र सिंह को मारवाड़ की गद्दी का कार्यभार सौंपा।
हलांकि वे नाम मात्र का राजा था सभी कार्य मुगल प्रशासन द्वारा ही संभाला जाता था इंद्र सिंह की निगरानी के लिए राज दरबार में मुगल सैनिक तैनात किए गए थे। दूसरी तरफ जब 1679 में औरंगज़ेब को जसवंत सिंह की रानियों के गर्भवती होने की सूचना मिली तो उन दोनों को साथ दुर्गा दास राठौर के माध्यम से दिल्ली बुलाया गया। दिल्ली पहुंचने पर दोनों रानियों को नजरबंद कर दिया गया।
हलांकि दुर्गा दास बालकों के संरक्षण के लिए मुगल सम्राट के समक्ष गये थे क्योंकि विद्रोही जसवंत सिंह के वंशज छोटे राजकुमारों की हत्या की साज़िश रच रहे थे। रानियों के नजरबंद करने पर दुर्गा दास को मुगल सम्राट की नीतियों पर शक होने लगा इससे पहले की वे कोई प्रतिक्रिया दे पाते उससे पहले ही छोटे राजकुमार दल भंजन जिन्हें कहीं-कहीं दल चंबन भी कहा गया है कि हत्या कर दी गयी। अब राजा जसवंत सिंह के इकलौते उत्तराधिकारी अजीत सिंह बचे थे।
प्रलोभन देने का प्रयास
जब दुर्गा दास समेत मारवाड़ के कई प्रमुख सरदार अजीत सिंह को उत्तराधिकारी के रुप में मान्यता दिलाने के लिए दिल्ली गए तब औरंगज़ेब में उनकी विनती को ठुकरा दिया हलांकि उसने राजकुमार अजीत सिंह के बालिग होने पर उसे उपाधि और जागीर देने का प्रस्ताव रखा।
मगर औरंगज़ेब ने शर्त यह रख दी की बालक का पालन-पोषण शाही हरम ही होगा और रानियां भी वहीं रहेंगी। समकालीन ग्रंथों में यहां तक मिलता है कि औरंगज़ेब ने अजीत सिंह को जोधपुर की गद्दी देने का प्रस्ताव रखा मगर बच्चे का पालन पोषण मुस्लिम धर्म में होगा। यानी उसे एक मुस्लिम राजा बनाया जायेगा।
औरंगज़ेब ने अपनी इस नीति को अंजाम देने के लिए दुर्गा दास राठौर के अपनी एक रियासत देने का प्रलोभन दिया ताकि वे अन्य सरदारों को उसके इस कृत्य पूर्ण करने के लिए सहमत कर सकें। मगर दुर्गा दास ने उनके इस प्रलोभन को अस्वीकार कर दिया।
इस प्रकार दुर्गा दास जी ने सारी बात अपने सहयोगी सरदारों को बताई जिसके चलते औरंगज़ेब का रवैया राठौर प्रतिनिधिमंडल को स्वीकार्य नहीं था इसलिए उन्होंने अजीत सिंह और रानियों को दिल्ली से छुड़ाने का प्रण लिया। हलांकि वे सभी जानते थे इस कार्य को अंजाम देने में उनमें से कई लोगों की मारे जा सकतें है मगर वे पीछे नहीं हटे।
25 जून 1679 को ही वे शहर से निकलने में सफल रहे मगर मुगल सैनिकों ने उनका पिछा किया राजकुमार अजीत सिंह की रक्षा के लिए दुर्गा दास राठौर ने कई भंयकर और घातक बाचव अभियानों को अंजाम दिया। सैनिकों का पिछा शाम तक जारी रहा जब तक कि वे थक नही गए मगर अंत में वे रानियों और राजकुमार के लेकर भागने में सफल रहे।
अंत में राजकुमार को बलुंडा ले जाया गया जहां प्रतिनिधिमंडल के एक सदस्य की पत्नी ने बालक को एक वर्ष तक अपने पास रखा। उसके बाद बालक को मारवाड़ के दक्षिण छोर पर दूरस्थ कस्बे सिरोही के पास अरावली पहाड़ियों में सुरक्षित स्थान पर ले जाया गया। यहां के वासी जयदेव नामक ब्राह्मण ने राजकुमार की परवरिश की।
कुशल निर्णायक
दुर्गा दास राठौर को पहले से ही पता था कि कभी न कभी मुगल सैनिक राजकुमार को खोजते हुए पहाड़ियों में जरुर आ जायेंगे अतः राजा की सुरक्षा का जिम्मा लेते हुए दुर्गादास ने जोधपुर के राजा राजसिंह से पहले ही मदद मांग ली थी बदले में जोधपुर के राजा ने उन्हें अपनी केलवा की जागीर का पट्टा दिया था।
अतः यह क्षेत्र मारवाड़ प्रशासन से बाहर का क्षेत्र था जहां मुगल सैनिकों को अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर का होने के नाते जाने की मनाही थी सो वे वहां नही जा सकते थे। इस प्रकार राजकुमार यहां सुरक्षित थे।
कुशल कुटनीतिकार
दुर्गा दास एक योद्धा होने के साथ ही एक कुशल कूटनीति कार भी थे। एक तरफ उन्होंने राजकुमार की रक्षा की दुसरी तरफ अपनी मातृभूमि मारवाड़ की भी रक्षा की। जब औरंगज़ेब ने अपने बेट अकबर को मारवाड़ पर आक्रमण करने के लिए भेजा तब दुर्गा दास राठौर और जोधपुर के राजा राजसिंह ने मिलकर कूटनीतिक चाल चलकर कर बाप-बेटे को ही आपस में लड़ा दिया इस प्रकार मारवाड़ की सुरक्षा को सुनिश्चत किया।
अतः राजकुमार के बड़े होने पर राजा अजीत सिंह को गद्दी पर बिठाने में सफल रहे।
अंतिम समय
दुर्गा दास राठौर के अंतिम समय में महाराजा अजीत सिंह के साथ कुछ कारणों से अनबन हो गयी थी दरअसल दुर्गा दास का कदीमी ठिकाना गांगाणी ठिकाना किसी और राजा द्वारा दे दिया गया था। दरअसल राजा अजीत सिंह दुर्गा दास की ख्याती से जलने लगे थे उन्हें ऐसा लगने लगा था कि राजा होने के नाते जो सम्मान दुर्गादास जी को मिल रहा था वो उन्हें मिलना चाहिए।
अंत राजा ने अपने ईष्यालु चरित्र तथा सम्मान की लालच में दुर्गादास को मारवाड़ से बाहर निकाल दिया। अपने कर्तव्यों को पुरा करने के बाद और राजा जसवंत सिंह से किए अपने वादे को निभाने के बाद मारवाड़ छोड़ दिया। इसके बाद वे कुछ समय जोधपुर उदय पुर रामपुरा भानपुरा क्षेत्रों में घुमें फिर पुजा करने के लिए महाकाल उज्जैन चले गए।
उनका अंतिम समय उज्जैन में बिता जहां उन्होंने 22 नवंबर 1718 को अंतिम सांस ली। जब उनका देहांत हुआ तब उनकी उम्र 81 वर्ष की थी। राजघरानों पर व्यंग्य करते हुए एक बारहठ ने लिखा-
इण घर री आ ही रीत दुरगो सिफरो दागियो। कहने का मतलब है राजा अपनी गद्दी के लिए अपनों की भी जान ले सकता है।
हलांकि इतिहास गवाह है कि हर कोई राजकुमार य राजा अजीत सिंह की तरह घटिया नही होता।
निष्कर्ष
वीर दुर्गादास राठौड़ भारतीय इतिहास में अदम्य साहस निस्वार्थ स्वामी भक्ति और उच्च नैतिक मूल्यों के अनूपम प्रतीक है। औरंगजेब की साम्राज्यवादी नीतियों के विरुद्ध लगभग तीन दशकों तक चला उनका अनवरल संघर्ष केवल मारवाड़ के सिंहासन की रक्षा का प्रयास नही था, बल्कि अपनी मातृभूमि क स्वाभिमान और संस्कृति की रक्षा का संकल्प था।
सत्ता और पद की लालसा से परे रहकर उन्होंने महाराजा अजीत सिंह को उनका अधिकार दिलाया और मुगलों के समक्ष भी अपने अनुशासित व उच्च चरित्र की छाप छोड़ी। उनका जीवन यह संदेश देता है कि सच्चा नेतृत्व त्याग कूटनीति और नैतिक दृढ़ता में निहित है।

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