9b45ec62875741f6af1713a0dcce3009 Indian History: reveal the Past: Movements

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गुरुवार, 2 अप्रैल 2026

मोपला विद्रोह कब हुआ था

mopala vidroh kab hua tha
प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम भारतीय इतिहास के सुप्रसिद्ध विद्रोह मोपला विद्रोह के  बारे में चर्चा करेंगे जिसे हम मालाबार विद्रोह के नाम से भी जानते है। हांलकि यह विद्रोह मात्र एक वर्ष की चला लेकिन यह आज़ादी के इतिहास का एक महत्वपुर्ण पहलु है। इस विद्रोह के पिछे का मुख्य कारण जमीदारी प्रथा से पीडित किसान थे। इसके साथ ही मोपला विद्रोह के मुख्य पात्रों के बारे में भी चर्चा करेंगे।यह लेख आपको मोपला विद्रोह के समय, कारण, प्रमुख नेताओं, घटनाओं और इसके प्रभावों के बारे में विस्तृत जानकारी देगा।

1921 के माला बार विद्रोह का पूरा इतिहास

भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कई ऐसे आंदोलन हुए, जिन्होंने ब्रिटिश शासन की नींव को हिला दि थी। उन्हीं में से एक महत्वपूर्ण घटना थी मोपला विद्रोह, जिसे मालाबार विद्रोह के नाम से भी जाना जाता है। यह विद्रोह वर्ष 1921 में वर्तमान मालाबार (केरल) क्षेत्र में हुआ था।

मोपला विद्रोह कब हुआ था

मोपला विद्रोह अगस्त 1921 में शुरू हुआ और 1922 तक चला। यह विद्रोह मुख्य रूप से मालाबार क्षेत्र के मुस्लिम किसानों (मोपला समुदाय) द्वारा अंग्रेजों और जमींदारों के खिलाफ किया गया था।

मोपला विद्रोह का परिचय

मोपला (या मपिल्ला) समुदाय केरल के माला बार क्षेत्र में रहने वाला एक मुस्लिम समुदाय था। ये लोग अधिकतर किसान थे और लंबे समय से जमींदारों तथा ब्रिटिश शासन के अत्याचारों से परेशान थे।हलांकि यह विद्रोह केवल एक किसान आंदोलन नहीं था, बल्कि इसमें धार्मिक और राजनीतिक तत्व भी शामिल हो गए थे, जिससे यह और जटिल बन गया।

मोपला विद्रोह के मुख्य कारण

1.अंग्रेजों का दमनकारी शासन
ब्रिटिश सरकार ने किसानों पर भारी कर लगाए और उनके अधिकारों को सीमित कर दिया। इससे किसानों में असंतोष बढ़ता गया।

2.जमींदारी प्रथा का शोषण
माला बार में जमींदार (ज्यादातर हिंदू उच्च वर्ग के लोग) किसानों से अधिक लगान वसूलते थे।किसानों को भूमि का अधिकार नहीं था उन्हें कभी भी बेदखल किया जा सकता थाइससे मोपला किसानों में विद्रोह की भावना पैदा हुई।

3.खिलाफत आंदोलन का प्रभाव
खिलाफत आंदोलन ने मुस्लिम समुदाय को एकजुट किया और ब्रिटिश विरोध को बढ़ावा दिया।

4.असहयोग आंदोलन का प्रभाव
असहयोग आंदोलन के कारण देश भर में अंग्रेजों के खिलाफ माहौल बना, जिसका असर मालाबार क्षेत्र में भी पड़ा।

 5.धार्मिक और सामाजिक तनाव
धीरे-धीरे यह आंदोलन धार्मिक रंग लेने लगा, जिससे कई जगहों पर साम्प्रदायिक संघर्ष भी हुए।

मोपला विद्रोह के प्रमुख नेता

1.अली मुसलियार
वे एक धार्मिक नेता थे उन्होंने विद्रोह को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 
2.वरियमकुन्नथ कुन्हम्मद हाजी
वे विद्रोह के प्रमुख सैन्य नेता थे उन्होंने कुछ क्षेत्रों में स्वतंत्र शासन स्थापित करने की कोशिश की। 

विद्रोह की शुरुआत

अगस्त 1921 में ब्रिटिश सरकार ने खिलाफत आंदोलन के नेताओं को गिरफ्तार किया, जिसके बाद लोगों में गुस्सा भड़क उठा और विद्रोह शुरू हो गया। मोपला विद्रोहियों ने पुलिस स्टेशनों और सरकारी इमारतों पर हमला किया।

जमींदारों के खिलाफ संघर्ष
कई जगहों पर जमींदारों की संपत्ति पर कब्जा किया गया और उनके खिलाफ हिंसा हुई। समय के साथ यह आंदोलन हिंसक हो गया और कई क्षेत्रों में धार्मिक संघर्ष भी देखने को मिले, जिससे इसकी छवि विवादास्पद बन गई।

ब्रिटिश सरकार की प्रतिक्रिया

ब्रिटिश सरकार ने इस विद्रोह को दबाने के लिए कठोर कदम उठाए
सेना तैनात की गई।हजारों लोगों को गिरफ्तार किया गया, कई विद्रोहियों को मृत्युदंड दिया गया। इस दौरान एक दुखद घटना भी हुई, जिसे वागन त्रासदी कहा जाता है, जिसमें कई कैदियों की दम घुटने से मृत्यु हो गई।

मोपला विद्रोह के परिणाम

1.दमन और हानि
हजारों लोग मारे गए कई लोग बेघर हो गए समाज में भय और अस्थिरता फैल गई।

2.सामाजिक विभाजन
यह विद्रोह हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच तनाव बढ़ाने का कारण बना।

3.मालाबा विद्रोहका स्वतंत्रता आंदोलन पर प्रभाव
हालांकि यह विद्रोह अंग्रेजों के खिलाफ था, लेकिन इसकी हिंसक प्रकृति के कारण राष्ट्रीय आंदोलन को कुछ नुकसान भी हुआ।

मोपला विद्रोह का ऐतिहासिक महत्व

मोपला विद्रोह भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना है क्योंकि यह किसानों के शोषण के खिलाफ एक बड़ा आंदोलन था इसने ब्रिटिश शासन के खिलाफ असंतोष को उजागर किया यह दिखाता है कि सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक कारण मिलकर कैसे बड़े विद्रोह को जन्म देते हैं

विश्लेषण 
मोपला विद्रोह को अलग-अलग दृष्टिकोण से देखा जाता है
कुछ इतिहासकार इसे किसान विद्रोह मानते हैं
कुछ इसे धार्मिक आंदोलन के रूप में देखते हैं
जबकि अन्य इसे ब्रिटिश विरोधी आंदोलन मानते हैं
वास्तव में, यह इन सभी तत्वों का मिश्रण था।

निष्कर्ष

हालंकि यह आंदोलन पूर्णतः सफल नही रहा मगर ब्रिटीश सरकार के प्रशासन व्यवस्था पर आंकुश लागाने के लिए एक अहम कदम था। जिसे भारतीयों किसानों द्वारा अपने अधिकारों के शोषण के विरुद्ध प्रारम्भ किया गया था। यह आंदोलन सफल न होने के बावजूद भी इतिहास में अपनी एक महत्वपुर्ण छाप छोड़ता है।

रविवार, 29 मार्च 2026

भारत छोड़ो आन्दोलन

quit india movement
प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में भारत छोड़ों आन्दोलन के बारे में बात करेंगे जिसे हम अगस्त क्रांति के नाम से भी जानते है। यह पहला ऐसा आन्दोंलन था जिसे सम्पूर्ण भारत का समर्थन था क्योंकि सभी क्षेत्र विशेष के लोग भारत में ब्रिटीश शासन के अत्याचारों से दूःखी थे। खास कर द्वितीय विश्व युद्ध में भारतीयों के चाहते हुए भी शामिल करके, जिसमें लगभग हज़ार से अधिक भारतीयों के मौत हुई थी। इसके साथ ही हम आंदोलन के मुख्य पात्रों के बारे में भी चर्चा करेंगे।

भारत छोड़ो आंदोलन (1942) पर विस्तृत लेख

भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में भारत छोड़ो आंदोलन एक अत्यंत महत्वपूर्ण और निर्णायक चरण था। यह आंदोलन 8 अगस्त 1942 को मुंबई में आयोजित अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के अधिवेशन में शुरू किया गया। इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश शासन को भारत से तुरंत समाप्त करना था।

आंदोलन की पृष्ठभूमि

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार ने भारत को बिना परामर्श के युद्ध में शामिल कर लिया। इससे भारतीय नेताओं में असंतोष बढ़ा। इसके साथ ही क्रिप्स मिशन की असफलता ने यह स्पष्ट कर दिया कि अंग्रेज भारत को स्वतंत्रता देने के लिए तैयार नहीं थे। इस स्थिति में कांग्रेस ने कठोर कदम उठाने का निर्णय लिया।

आंदोलन की शुरुआत और मुख्य घटनाएँ

8 अगस्त 1942 को महात्मा गांधी ने ग्वालिया टैंक मैदान में “करो या मरो” का ऐतिहासिक नारा दिया। इस नारे ने पूरे देश में स्वतंत्रता के लिए नई ऊर्जा भर दी। अगले ही दिन अंग्रेजी सरकार ने गांधीजी सहित लगभग सभी प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया।नेताओं की गिरफ्तारी के बाद आंदोलन स्वतःस्फूर्त रूप से पूरे देश में फैल गया। जगह-जगह हड़तालें, जुलूस, और सरकारी संस्थानों पर विरोध प्रदर्शन होने लगे। कई स्थानों पर जनता ने टेलीग्राफ लाइनों को काटा और रेलवे सेवाओं को बाधित किया। उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और बंगाल जैसे क्षेत्रों में आंदोलन ने विशेष रूप से उग्र रूप लिया।

प्रमुख घटनाएँ

  • बिहार के आरा और पटना में व्यापक प्रदर्शन हुए।
  • बलिया में चित्तू पांडेय के नेतृत्व में अस्थायी सरकार स्थापित की गई।
  • महाराष्ट्र के सतारा में “प्रति सरकार” (Parallel Government) का गठन हुआ।
  • बंगाल के मिदनापुर में भी क्रांतिकारी गतिविधियाँ तेज रहीं।

इन घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया कि यह आंदोलन केवल नेताओं तक सीमित नहीं था, बल्कि यह जन-जन का आंदोलन बन चुका था।

प्रमुख कार्यकर्ता और उनका योगदान

1.महात्मा गांधी
गांधीजी इस आंदोलन के मुख्य प्रेरणा स्रोत थे। उन्होंने अहिंसा के माध्यम से अंग्रेजों को भारत छोड़ने का आह्वान किया। उनका “करो या मरो” नारा आंदोलन का मूल मंत्र बना।

2.जवाहरलाल नेहरू
नेहरूजी ने आंदोलन के संगठन और नेतृत्व में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी गिरफ्तारी के बावजूद उनका प्रभाव जनता में बना रहा।

3.सरदार वल्लभभाई पटेल
पटेलजी ने आंदोलन को मजबूती प्रदान की और जनता को संगठित किया।

4.अरुणा आसफ अली
उन्होंने मुंबई के गोवालिया टैंक मैदान में तिरंगा फहराकर आंदोलन को नई दिशा दी। उन्हें इस आंदोलन की “वीरांगना” कहा जाता है।

5.जय प्रकाश नारायण
उन्होंने भूमिगत रहकर आंदोलन को आगे बढ़ाया और युवाओं को प्रेरित किया।

6.राम मनोहर लोहिया
उन्होंने गुप्त रूप से रेडियो प्रसारण और प्रचार के माध्यम से आंदोलन को जीवित रखा।

आंदोलन की विशेषताएँ

  • यह एक जन-आंदोलन था जिसमें किसान, मजदूर, छात्र, महिलाएँ सभी शामिल हुए।
  • आंदोलन में अहिंसा और हिंसा दोनों रूप देखने को मिले।
  • यह आंदोलन बिना केंद्रीय नेतृत्व के भी लंबे समय तक चलता रहा।

परिणाम और महत्व

हालांकि अंग्रेजों ने इस आंदोलन को कठोर दमन के द्वारा दबा दिया, लेकिन इसके दूरगामी परिणाम हुए। इस आंदोलन ने यह स्पष्ट कर दिया कि अब भारत पर अंग्रेजों का शासन अधिक समय तक नहीं टिक सकता। इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने यह समझ लिया कि भारत को स्वतंत्रता देनी ही होगी।अंततः भारत की स्वतंत्रता का मार्ग इसी आंदोलन से प्रशस्त हुआ।
निष्कर्ष
भारत छोड़ो आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक निर्णायक मोड़ था। इसने भारतीय जनता में आत्मविश्वास और एकता की भावना को मजबूत किया। यह आंदोलन यह दर्शाता है कि जब पूरा देश एकजुट हो जाए, तो कोई भी शक्ति उसे स्वतंत्र होने से नहीं रोक सकती।
इस प्रकार, भारत छोड़ो आंदोलन न केवल एक राजनीतिक संघर्ष था, बल्कि यह भारतीय जनता की अटूट इच्छाशक्ति और स्वतंत्रता के प्रति उनके समर्पण का प्रतीक भी था।
सोर्स jagran.com,wikipedia,testbook.com,vajiramandravi,britannica.com,

शुक्रवार, 27 मार्च 2026

दांडी मार्च

dandi march
प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम नमक सत्याग्रह के बारे मे चर्चा करेंगे जिसे हैं दांडी मार्च के नाम से भी जानते हैं। यह आंदोलन इस लिए भी महत्वपूर्ण क्योंकि इसी आंदोलन के बाद देश में अलग अलग जागहों ब्रिटिश सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन होना प्रारंभा हुआ था। नामक आंदोलन बिना अंग्रेजों की सहमति से पूर्णतः सफल रहा। जिस कारण इस आंदोलन को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का मिल का पत्थर भी कहा जाता हैं।

नमक सत्याग्रह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक ऐसा अध्याय है, जो न केवल इतिहास में दर्ज है बल्कि आज भी प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है। यह केवल एक आंदोलन नहीं  था, बल्कि एक विचारधारा थी अहिंसा और सत्य की शक्ति का प्रतीक। 1930 में शुरू हुआ यह आंदोलन ब्रिटिश सरकार के अन्यायपूर्ण नमक कानून के खिलाफ एक शांतिपूर्ण विरोध था, जिसने  पूरे देश को एकजुट कर दिया।

अब सोचिए, नमक जैसी साधारण चीज़ को लेकर इतना बड़ा आंदोलन क्यों यही इसकी खासियत थी। नमक हर व्यक्ति की जरूरत है गरीब हो या अमीर। जब अंग्रेजों ने इस पर कर लगाया और लोगों को खुद नमक बनाने से रोक दिया, तो यह सीधे  सीधे  आम जनता के जीवन पर हमला था। यही कारण था कि इस आंदोलन ने हर वर्ग को जोड़ दिया।

सत्याग्रह की मूल अवधारणा


सत्याग्रह का अर्थ है सत्य के लिए आग्रह। महात्मा गांधी ने इसे एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया, लेकिन यह हथियार हिंसा का नहीं बल्कि अहिंसा और नैतिक बल का था। उन्होंने यह दिखाया कि बिना हथियार उठाए भी एक साम्राज्य को चुनौती दी जा सकती है। नमक हर भारतीय के भोजन का अभिन्न हिस्सा था। गांधीजी ने इसे  इसलिए चुना क्योंकि यह गरीब से गरीब व्यक्ति को भी प्रभावित करता था। यह एक ऐसा मुद्दा था जो हर घर में चर्चा का विषय बन सकता था और यही हुआ।

ब्रिटिश नमक कानून और कर व्यवस्था


ब्रिटिश शासन के दौरान नमक का उत्पादन और बिक्री पूरी तरह से सरकार के नियंत्रण में था। भारतीयों को अपना नमक बनाने की अनुमति नहीं  थी और उन्हें महंगे दामों पर नमक खरीदना पड़ता था।यह कानून केवल आर्थिक शोषण नही था, बल्कि एक तरह से लोगों की स्वतंत्रता पर भी अंकुश था। नमक जैसे प्राकृतिक संसाधन पर भी जनता का अधिकार नहीं था यह बात लोगों के दिल में  चुभने  लगी।इस कानून का सबसे  ज्यादा असर गरीब लोगों पर पड़ा। जिनके लिए रोज़मर्रा का खर्च चलाना मुश्किल था. उनके लिए महंगा नमक खरीदना एक बड़ी समस्या बन गया। इससे  लोगों में असंतोष बढ़ता गया और आंदोलन की जमीन तैयार हुईं। 

दांडी मार्च की शुरुआत


12 मार्च 1930 को गांधीजी ने साबरमती आश्रम से दांडी की ओर यात्रा शुरू की। उनके साथ केवल 78 स्वयं सेवक संगठन के सदस्य थे, लेकिन यह संख्या धीरे-धीरे हजारों मे  बदल गई।यह सिर्फ एक यात्रा नहीं  थी, बल्कि एक संदेश था अन्याय के खिलाफखड़े  होने का। बी बी सी न्यूज़ के एक पत्रकार ने गांधी जी को व्यंग भरे स्वर में अपने न्यूज  प्रकाशन के दौरान एक सुखा केकड़ा कहा क्योंकि उस समय गांधी जी बहुत दुबले और बुजुर्ग थे तो उन्हें विश्वास था इतनी गर्मी में वे ज्यादा समय तक नहीं चल पायेंगे और 10-12 किलोमीटर चलने के बाद हार मान लेंगे। लेकिन उन्होंने  साबरमती आश्रम से दांडी तक 387 किलोमीटर का सफर तय करके यह साबित कर दिया की वे भले हीबूढ़े  हो गये  थे मगर उनके हौसला चट्टान की तरफ मजबूत था।

दोस्तों यह वही समय काल था जब पूरा भारत वर्ष अंग्रेजों के आगे  घुटने  टेक चुका था भारतीयों  की हालत ऐसी हो चुकी थी जैसे  सर्कस के हाथी की होती है जो ये भूल गया है कि रस्सी इतनी भी मजबूत नहीं  है जिसे वह न तोड़ पाये। लोगों को ज्यादा वर्षों से अंग्रेजों की गुलामी करते-करते इसकी आदत हो गयी थी। साबरमती से दांडी तक की यात्रा करीब 385 किलोमीटर की है यह यात्रा 24 दिनों में  पूरी हुई। रास्ते में  गांधीजी गांव-गांव जाकर लोगों को जागरूक करते थे।

हर दिन लोगों की भीड़  बढ़ती गई और यह एक जन आंदोलन बन गया। इस यात्रा में हर वर्ग के लोग शामिल हुए किसान, मजदूर, महिलाएं, युवा। यह पहली बार था जब आंदोलन इतना व्यापक हो गया था कि हर कोई खुद को इसका हिस्सा महसूस कर रहा था। गांधीजी अपने भाषणों में लोगों को अहिंसा का मार्ग अपनाने के लिए प्रेरित करते थे। उनका संदेश साफ था "हम लड़ेंगे, लेकिन बिना हिंसा के।"

आंदोलन का विस्तार

इसके बाद पूरे भारत में लोगों ने नमक कानून तोड़ना शुरू कर दिया। साठ हजारों लोग गिरफ्तार हुए, लेकिन आंदोलन रुकने का नाम नहीं ले रहा था।

ब्रिटिश सरकार की प्रतिक्रिया

ब्रिटिश सरकार ने इस आंदोलन को दबाने के लिए हजारों लोगों को गिरफ्तार किया। यहां तक कि गांधीजी को भी जेल में डाल दिया गया। लेकिन इससे  आंदोलन बिल्कुल नहीं रुका बल्कि यह और तेज हो गया।

अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया

नमक सत्याग्रह ने पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित किया। विदेशी अखबारों और मीडिया ने इसे  प्रमुखता से दिखाया, जिससेे  भारत की आजादी की लड़ाई को वैश्विक समर्थन मिला।

नमक सत्याग्रह का प्रभाव


यह आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। इससे लोगों में आत्मविश्वास आया कि वे अंग्रेजों का सामना कर सकते हैं। गांधीजी की अहिंसा की नीति ने दुनिया भर में कई आंदोलनों को प्रेरित किया, जैसे  अमेरिका का सिविल राइट्स मूवमेंट।

नमक कानून का उल्लंघन

6 अप्रैल 1930 को गांधीजी दांडी पहुंचे और समुद्र के किनारे से नमक उठाकर कानून तोड़ा। कंग्रेस पार्टी नें दांडी से 25 मिल दक्षिण धरसाना नामक कारखाने में सत्याग्रह करने की योजना बनायी थी इसलिए गांधी जी भी नमक बनाने के बाद दक्षिण की ओर चल दिये और कारखाने में सबके एक जूट होने की योजना थी। यह एक छोटा सा कार्य था, लेकिन इसका प्रभाव बहत बड़ा था। यह घटना पूरे देश में एक चिंगारी की तरह फैल गई।

धरसाना सत्याग्रह

धरसाना पहुंचने से पहले ही गांधी जी को 5 मई को गिरफ्तार कर लिया गया। जिसके बाद नमक आंदोलन का मोर्चा धरसाना सत्याग्रह ने सम्भाला जिसके मुख्य नेता सरोजनी नायडू और अब्बास तैयबजी थे।

गांधी इरविन समझौता

1931 में गांधीजी और वायसराय इरविन के बीच समझौता हुआ, जिसके तहत कई कैदियों को रिहा किया गया और भारतीयों को नमक बनाने  की अनुमति मिली। इस समझौते ने यह साबित किया कि अहिंसक आंदोलन भी बड़े बदलाव ला सकते हैं।

नमक सत्याग्रह की विशेषताएं

1. यह आंदोलन पूरी तरह अहिंसक था, फिर भी इतना प्रभावी रहा कि उसने  ब्रिटिश साम्राज्य को हिला दिया। 2. यह आंदोलन केवल नेताओं का नहीं  था, बल्कि आम जनता का आंदोलन था और यही इसकी सबसे  बड़ी ताकत थी। आज के समय में  नमक सत्याग्रह का महत्व

आज भी नमक सत्याग्रह हमें  सिखाता है कि अगर हम एकजुट होकर शांतिपूर्ण तरीके से संघर्ष करें, तो किसी भी अन्याय के खिलाफ जीत हासिल कर सकते हैं। यह केवल इतिहास नहीं है, बल्कि एक सीख है सत्य और अहिंसा की ताकत कभी कमजोर नहीं  पड़ती। नमक सत्याग्रह केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि एक क्रांति थी जिसने  भारत की आजादी की नींव को मजबूत किया। गांधीजी का यह आंदोलन हमें यह सिखाता है कि बड़े  बदलाव के लिए हमेशा बड़े  हथियारों की जरूरत नहीं  होती कभी-कभी एक मुट्ठी नमक भी इतिहास बदल सकता है। 
सोर्स
-Encyclopedia Britannica Britannica Kids Wikipedia

मंगलवार, 24 मार्च 2026

asahyog andolan


asahyog andolan

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम राष्ट्रव्यापी जन आंदोलन जिसे हम असहयोग आंदोलन के नाम से जानते है के बारे में चर्चा करेंगे। इसके साथ ही हम आंदोलन की मुख्य घटना एवं मुख्य पात्रों के बारे में चर्चा करेंगे। इसके अलावा हम इस बात पर भी विशेष चर्चा करेंगे की आंदोलन के असफल होते हुए भी सफल कैसे रहा। साथ ही हम इस लेख में जलियांवाला बाग हत्याकांड और 1920 के नागपुर अधिवेशन एवं चौरा-चौरी हत्याकांड के होने के पीछे के कारण को समझेंगे।

आंदोलन का मुख्य लक्ष्य

आंदोलन का मुख्य लक्ष्य स्व-शासन को स्थापित करना था। जिसके लिए गांधी जी एवं अन्य आंदोलन कर्ताओं ने रौलेट एक्ट और जलियां वाला बाग में निर्मम हत्याकांड को मुख्य कारण बताया। इसके अलावा हर एक क्षेत्र विशेष की अपनी अन्य समस्याएं थी जैसे कर में बढ़ोतरी,जबरन खेती करने के लिए प्रतिबद्ध करना,अकाल के दौरान अथवा फसल के न होने पर सरकार द्वारा किसानों को राहत न प्रदान करना आदि। इसके साथ ही सरकार द्वारा शोषण कारी भूमि कानून भी एक मुख्य कारण था।

आंदोलन के मुख्य पात्र

आंदोलन के मुख्य पात्रों में सर्वप्रथम महात्मा गांधी जी का नाम आता है उनके साथ ही बाल गंगाधर तिलक,बिपिन चन्द्र पाल,मोहम्मद अली जिन्ना और ऐनी बेसेंट का सहयोग मिला। इन सभी के अलावा मौलाना आजाद,मुख्तार अहमद अंसारी,हकीम अजमल खान,मगफूर अहमद अजीज़,अब्बास त्याबजी,मौलाना मुहम्मद अली जौहर,मौलाना शौकत अली एवं मुस्लिम नेताओं समर्थन प्राप्त था। 

नागपुर अधिवेशन

इस अधिवेशन की अध्यक्षता सी विजयराघवचारियार द्वारा की गयी थी। इस अधिवेशन द्वारा लिए गये महत्वपूर्ण फैसले।
1.असहयोग आंदोलन के मंजूरी नागपुर अधिवेशन के दौरान ही दी गयी थी हलांकि इसका प्रस्ताव गांधी जी द्वारा कलकत्ता अधिवेशन में रखा गया था।
2.संवैधानिक साधनों के स्थान पर अहिंसक और उचित तरीकों से स्वशासन की प्राप्ति का लक्ष्य रखा गया।
3.कांग्रेस कार्य समिति का गठन किया गया। भाषाई आधार पर प्रांतीय कार्य समितियों का गठन किया गया।
4.बहिष्कार की नीति-विदेशी वस्तुओं,सरकारी स्कूलों,कालेजों,अदालतों ओर उपाधियों का पूर्ण बहिष्कार करने का संकल्प लिया गया।
5.सी आर दास जैसे आलोचकों ने भी गांधी जी का असहयोग आंदोलन में समर्थन किया।
 

आंदोलन की मुख्य घटना 

इस आंदोलन की शुरुआत 3 सितंबर 1920 होती है। यह गांधी जी द्वारा चलाया गया एक राजनीतिक अभियान था। इस आंदोलन के दौरान सरकारी कार्यकर्ता,सरकारी कारखानों में काम करने वाले मजदूर संघ को काम करने रोका गया,लोक अदालत के कार्यकर्ताओं,वकीलों ने हड़ताल की ताकी सरकार तक अपनी आवाज़ पहुंचा सके। भारतीय आंदोलन कर्ता ब्रिटिश समान खरीदने मना करते है,स्थानीय घरेलू उद्योग को बढ़ावा दिया जाता है,लोग अचानक से खादी वस्त्र धारण करने लगते है विदेशी कपड़ों का त्याग करते है। शराब की दुकानों के आगे धरना दिया जाने लगा। देश में सार्वजनिक सभाएँ एवं हड़तालें सिलसिले वार होने लगी। बताते चले कि भारतीय जनता का ब्रिटिश सरकार के पुरी तरह से भरोसा उठ चुका था मुख्य कारण  रोलेट एक्ट तथा  जलियांवाला बाग हत्याकांड था।

रोलेट एक्ट

इस एक्ट का अध्यक्ष सर सिडनी रालेट था जिसने 18 मार्च 1919 त्वरित प्रभाव से इस एक्ट को पारित किया गया। असहयोग आंदोलन के चलते ही सरकार को इस कानून को वापिस लेना पड़ा।
1 इस कानून के चलते सरकार किसी भी भारतीय को सिर्फ संदेह मात्र होने पर ही हिरासत में ले सकती थी।
2 इस कानून के चलते बिना मुकदमे के कारावास का प्रावधान था।
3 रोलेट एक्ट के कानून के अनुसार सरकार संदेह से उठाये गये व्यक्ति को अनिश्चित काल के लिए हिरासत में रख सकती थी।
4 इस कानून में बिना वारेंट गिरफ्तारी का प्रावधान था।
5 आतंकवाद के संदिग्ध में पाये गये व्यक्ति को बिना किसी उचित कार्यवाही य मुकदमे के 2 साल के कठोर कारावास का प्रावधान था।
6 दोषी ठहराये गए व्यक्ति को किसी भी राजनीतिक,शैक्षिक एवं धार्मिक गतिविधियों में भाग लेने पर प्रतिबंध लगाया गया था।

जलियांवाला बाग हत्याकांड

रोलेट एक्ट को पारित होते ही सरकार को जैसे खुली छूट मिल गयी भारतीयों को मारने की। इस कानून के चलते ही ब्रिगेडियर-जनरल रेजिनाल्ड डायर द्वारा 13 अप्रैल 1919 को इस घटना को अंजाम दिया गया। इस घटना के दौरान भिड़ में खड़े बच्चों और महिलाओं को भी पुलीस द्वारा आतंकवादी बताया गया। इस घटना के पीछे का मुख्य कारण क्रांतिकारी नेता सैफुद्दीन किचलू और डाक्टर सत्यपाल की गिरफ्तारी के विरोध में भीड़ जमा हुई थी हलांकि सारी भीड़ विरोध प्रदर्शन की ही नहीं थी। 

क्योंकि उस दिन बैसाखी का त्योहार था तो ज्यादातर लोग उत्सव में शामिल होने के लिए आये थे जिनमें बच्चे, बूढ़े और महिलाएं भी शामिल थी। इस नरसंहार से उपजे आक्रोश ने हजारों विरोध प्रदर्शनों को जन्म दिया जिसने सरकार की मुश्किलें और बढ़ा दी। अहिंसा का प्रचार करने वाले गांधी जी ने इस घटना का कड़ा विरोध किया। उनका मानना था कि ब्रिटिश सरकार उतनी भी बुरी नहीं है मगर इस हत्याकांड के चलते गांधी जी ने ब्रिटिश सरकार की अच्छाई पर से अपना विश्वास खो दिया और कहा कि इस शैतानी सरकार के साथ सहयोग करना पाप होगा। इस प्रकार सत्याग्रह के विचारों आगे चलकर जवाहर लाल नेहरु ने अपनाया।

जवाहर लाल नेहरू की गिरफ्तारी

असहयोग आंदोलन के चलते 6 दिसंबर 1921 पंडित जवाहर लाल नेहरु और उनके पिता मोती लाल नेहरु के पहली बार गिरफ्तार किया गया। वोचिदंबरम पिल्लई को 40 वर्ष की कैद की सजा सुनाई गयी। दूसरी तरफ गांधी जी द्वारा असहयोग आंदोलन के दौरान महत्वपूर्ण कार्यों को अंजाम दिया गया।

1.सभी कार्यालय और कारखानों पूर्णतः बंद करने का आदेश दिया।
2.भारतीयों को सरकार द्वारा प्रायोजित स्कूलों,पुलिस सेवाओं,सेना और सिविल सेवा से हटने के लिए प्रेरित किया और वकीलों को सरकारी अदालतों से चले जाने के लिए कहा।
3.सर्वजनिक परिवहन और इग्लैंड द्वारा निर्मित वस्तुओं का बहिष्कार किया गया।
4.भारतीयों द्वारा ब्रिटिश सरकार द्वारा दी गयी उपाधि और सम्मान वापिस किए गये जैसे गांधी जी को सरकार द्वारा केसरी हिंद की उपाधि दी गयी थी जिसे उन्होंने वापिस कर दिया।

चौरी-चौरा हत्याकांड

इस आंदोलन का सरकारी अधिकारियों पर गहरा असर पड़ा। भारतीयों की एकता को मजबूती मिली भारतीय उत्पादों को बढ़ावा दिया गया। कई भारतीय स्कूल एवं कालेज की स्थापना की गईं। मगर इसी बीच उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के चौरी चौरा में 4 फरवरी 1922 को एक घटना हुई। जिसके चलते जनता के आक्रोश को देखकर गांधी जी ने असहयोग आंदोलन को समाप्त कर दिया। इस घटना के अनुसार गोरखपुर के चौरी चौरा नामक स्थान पर शराब की दुकान के सामने कुछ स्वयं सेवकों पुलिस अधिकारियों ने हमला कर दिया। वहां जमा हुई किसानों की भिड़ ने पुलिस चौंकी को घेर कर उसमें आग लगा दी जिसके चलते चौंकी में मौजूद 22 एवं किसानों द्वारा 8 लोगों को मार डाला गया। 

गांधी जी की गिरफ्तारी

हलांकि गांधी जी के अहिंसा वादी होने के कारण चौरी-चौरा हत्याकांड के बाद उन्होंने आंदोलन के समाप्त करने की घोषणा कर दी मगर 12 फरवरी 1922 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया तथा 18 मार्च 1922 को राजद्रोह आरोप में 6 साल की सजा सुनाई गई।.
सोर्स विकीपिडीया testbook drishti ias byjus.com jagran.com bharatdiscovery.org askfilo.com

शुक्रवार, 20 मार्च 2026

kheda satyagraha

kheda satyagraha

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम खेड़ा सत्याग्रह के बारे में चर्चा करेंगे इसके साथ ही उस समय काल कि मुख्य घटना तथा सरकार की गतिविधियों तथा आंदोलन के असफल होने के मुख्य कारणों पर चर्चा  करेंगे।

खेड़ा सत्याग्रह के मुख्य पात्र

खेड़ा सत्या ग्रह के मुख्य पात्रों की सूची में महात्मा गांधी जी का नाम सर्वप्रथम पहले आता है क्योंकि चम्पा रण सत्याग्रह के बाद गांधी जी भारतीय जनता का एक महत्वपूर्ण चेहरा बन गये थे। क्षेत्रीय नेताओं की सूची में मोहन लाल पांडेय ,शंकर लाल पारिख , नर हरि पारिख ,रवि शंकर व्यास , सरदार बल्लभाई पटेल तथा समस्त किसान वर्ग और क्षेत्रीय नेताओं नाम आता है।

सत्याग्रह के मुख्य कारण

1.देश में अकाल का पड़ना
1918 के समय देश में अकाल पड़ा जिसमें सरकार द्वारा किसी भी प्रकार की सहायता नहीं प्रदान की गयी । जबकि अकाल कानून के तहत किसानों के पूर्ण छूट प्रदान करने का प्रावधान था। बताते चलें कि इस प्रावधान के चलते यदि किसी क्षेत्र में औसतन पैदावार 25 प्रति शत से कम होती है तो किसानों को पूर्ण छूट का प्रावधान था।
2.भीषण प्लेग बीमारी
देश में भीषण  प्लेग बीमारी के चलते देश के गुजरात राज्य में ही लगभग 16,740 लोगों की मौतें हुई और बचे लोग अकाल के कारण मरने लगे क्योंकि सरकार की तरफ से न तो कोई राहत शिविर लगाया गया और न ही किसी अन्य प्रकार की सहायता प्रदान की।
3.करों में 23 प्रति शत की वृद्धि
देश में अकाल के चलते किसान दाने-दाने को तरस रहे थे दूसरी तरफ सरकार ने किसानों की मदद पहुंचाने की अपेक्षा किसान कर 23 प्रति शत की वृद्धि कर दी। इस प्रकार कर भी विरोध का मुख्य कारण बना।
4.बुनियादी वस्तुओं की मूल्य दर को बढ़ाना
1918 के समय काल प्रथम विश्व युद्ध के चलते वस्तुओं का आयात- निर्यात कम हो रहा था जिसके चलते सरकार को बुनियादी वस्तुओं कि कीमत बढ़ा दी जो कि आक्रोश एक ओर कारण बना।.
5.किसानों की सिफारिशों के नजरंदाज करना
ब्रिटिश सरकार चाहती तो किसानों को कुछ हद तक राहत तो प्रदान कर ही सकती थी मगर किसानों कि गुहार को नजरंदाज किया गया और उन्हें पूर्ण कर चुकाने के लिए  मजबूर करने के प्रयासों ने किसानों में आक्रोश भर दिया।

आंदोलन के द्वारा किए गये कार्य

1918 में कर में रियायत की याचिका अस्वीकार किए जाने पर स्थानीय नेता मोहन लाल पांड़या और शंकर लाल पारिख ने मिलकर राजस्व निषेध अभियान की पहल की तथा अहमदाबाद में गुजरात सभा के सदस्यों से सहयोग की मांग की । गांधी जी को टेलीग्राम भेजा गया क्योंकि उस समय गांधी जी ही गुजरात सभा के अध्यक्ष थे। मगर चंपा रण आंदोलन के चलते गुजरात से बाहर थे।

राजस्व निषेध अभियान

इस अभियान के चलते गुजरात सभा के सहयोग से किसानों ने राजस्व कर में रियायत न मिलने पर पूर्ण रुप से कर न चुकाने की शपथ किसानों ने ली । सरकार द्वारा कर जमा करने के लिए दबाव बनाया जाने लगा। इस बीच गांधी जी चंपा रण से गुजरात पहुंचे खेड़ा क्षेत्र के ग्राम समाज के लोगों से मिले ,गांधी जी को भी किसानों के राजस्व कर को निलंबित करने की मांग सही लगी। मगर सरकार द्वारा किसानों की मांग  पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी। अतः 22 मार्च 1918 को नाड़ियाड में हुई एक बैठक में गांधी जी ने स्वयं सेवकों से एक प्रतिज्ञा लेने के लिए आग्रह किया कि चाहे पूरा हो य आंशिक वे इस वर्ष का कर नहीं देंगे।

सत्याग्रह का परिणाम

किसानों के बढ़ते आक्रोश को देखकर सरकार द्वारा जांच बिठाई गई और किसानों को सही पाया । अतः उनकी मांगो को मान लिया गया। क्योंकि सरकार को  भारतीयों से अन्य लाभ भी लेना था। चूंकि प्रथम विश्व युद्ध के प्रयासों में भारतीय का समर्थन आवश्यक था इसी को लेकर ब्रिटिश सरकार चिंतित भी थी।  सरकार  ने स्थानीय राजस्व अधिकारियों को संयम बरतने के लिए कहा और भूमि पर जबरन कब्जा रोकने के आदेश  दिये। भूमिकर केवल उन्हीं लोगों पर लगाया गया जो इसे चुकाने में सक्षम थे।

खेड़ा सत्याग्रह का समापन

सरकार द्वारा कोई विशिष्ट आश्वासन न मिलने के कारण तथा प्रथम विश्व युद्ध के चलते सरकार द्वारा दबाव बनाये जाने के कारण  गांधी जी ने खेड़ा सत्याग्रह हो समाप्त करने का आदेश दिया। हलांकि यह सत्याग्रह पूर्ण सफल नहीं हो पाया लेकिन इस सत्याग्रह ने भारत में कुछ महत्वपूर्ण कार्य किए।

1.गांधी जी मुख्य नेता के रुप में 
1918 का खेड़ा सत्याग्रह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का एक महत्वपूर्ण मोड़ था । इसने गांधी जी को किसानों के  एक मुख्य नेता के रुप में तथा सरकार को अपनी तरफ ध्यान आकर्षित करने में सफल रहा।
2.स्वतंत्ररता आंदोलन की मुख्य घटना
हलांकि खेड़ा सत्याग्रह असफल रहा लेकिन इसने स्वतंत्रता आंदोलन की एक महत्वपूर्ण घटना के रुप में अपनी जगह बनाई।
3.जन सहयोग का पहला आंदोलन
खेड़ा सत्याग्रह  ने जन सहयोग का पहला असहयोग आंदोलन के रुप में अपनी जगह बनाई।
4.खेड़ा सत्याग्रह और गुजरात सत्याग्रह
आंदोलन के असफल होने के बावजूद भी इसने गुजरात सत्याग्रह को मजबूती प्रदान की।
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सोमवार, 16 मार्च 2026

चम्पारण आंदोलन

champaran satyagraha

प्रस्तावना 

प्रस्तुत लेख में हम चम्पा रण आंदोलन के मुख्य नेताओं तथा आंदोलन की सफलता के बारे में चर्चा करेंगे। इसके साथ ही तीन कठिया प्रथा , नील कारखानों के पतन एवं किसानों पर वित्तीय बोझ के बढ़ने के कारणों को जानेंगे।

सत्याग्रह का मुख्य कारण 

1917 में यह आंदोलन बिहार के उत्तर-पश्चिम भाग में स्थित चम्पा रण में तिनकठिया प्रथा से पीड़ित किसानों द्वारा प्रारम्भ किया गया था। तीनकाठिया प्रथा कि बात करें तो यूरोपीय बा गान मालिकों में किसानों को उनकी भूमि के 3/20 वे हिस्से पर नील की खेती करने के लिए मजबूर किया, जिससे गेंहु व अन्य अनाज उत्पादन पर गहरा असर पड़ा। 3/20 के इस नियम के चलते ही इस प्रथा को तीन कठिया प्रथा का नाम दिया गया। इसके साथ ही 1900 ई0 के समय काल में यूरोप कृत्रिम नील बनाने में सफल रहा जिसके चलते भारतीय नील की मांग गिर गई दूसरी तरफ अधिकारियों द्वारा किसानों पर अन्य अनाज उत्पादन पर प्रतिबंध तो था ही इसके साथ ही उन पर जुर्माना भी लगाया गया था। जुर्माने की आड़ में किसानों को रैयत बांड जारी किए गए जिस पर 12 प्रतिशत उच्च वार्षिक ब्याज दर पर हैंड़नोट और बंधक बांड़ जारी किए गये। अतः उपरोक्त कारणों के चलते किसानों की वित्तीय स्थिति और खराब हो गई। इस प्रकार किसानों का विद्रोह प्रारम्भ हुआ।

विद्रोह के अन्य मुख्य कारण

1. नील कारखानों का पतन 
1900 के बाद यूरोप से कृत्रिम नील के उत्पादन कारण ने  भारतीय नील कारखानों के पतन ने बा गान मालिकों की रैयतों के साथ अनुबंध रद्द करने के लिए प्रेरित किया और नील सम्बन्धित दायित्वों से मुक्ति पाने के किसानों पर भारी जुर्माना लगाया ।

2. चम्पा रण की मुख्य फसल नील का होना
चम्पा रण में 18वीं शताब्दी के पहले से ही नील की खेती की जा रही थी और 1850 तक यह क्षेत्र की सबसे महत्वपूर्ण फसल बन गई जिसने चिनी के उत्पादन को भी पीछे छोड़ दिया था। अतः यह भी विद्रोह का प्रमुख कारण बना क्योंकि चम्पा रण के किसानों को नील के अलावा अन्य फसलों के उत्पादन पर प्रतिबंध था। 

3. भूमि क्षेत्र के आधार पर निश्चित मूल्य
किसानों के भुगतान की जाने वाली कीमत फसल की मात्रा की बजाय भूमि क्षेत्रफल के आधार पर तय की जाती थी, जिससे अनुचित मुआवजा मिलता था।

4. आर्थिक और सामाजिक शोषण
किसानों को आर्थिक कठिनाइयों और सामाजिक शोषण दोनों का सामना करना पड़ा जिसके कारण बागान मालिक राज के खिलाफ व्यापक आंदोलन हुआ.

चम्पारण आंदोलन के मुख्य  नेता

चम्पा रण आंदोलन के मुख्य नेताओं के रुप में महात्मा गांधी जी का नाम सबसे पहले आता है। 1916 सें चम्मा रण के स्थानीय नेता ब्रज किशोर और राज कुमार शुक्ला ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में गांधी जी से मुलाकात की मगर गांधी जी ने उन्हें गम्भीर रुप से नहीं लिया। इसके कुछ समय बाद ब्रज किशोर प्रसाद में चम्पा रण के किसानों की दुर्दशा के बारे में कांग्रेस में एक प्रस्ताव पेश किया । जिसे सर्व सम्मति से पारित कर दिया गया। इसके बाद भी गांधी जी ने अपने आकलन के बाद ही कार्यवाही करने का दृढ़ निश्चय किया।

मुजफ्फरपुर की यात्रा 

गांधी जी ने मुजफ्फर पुर पहुंचने के बाद तिरहूत मंडल आयुक्त को पत्र लिखकर सरकार को जानकारी दी की वे सरकारी सहयोग से काम करने की मंशा रखते हैं। मगर गांधी जी के स्पष्टीकरण के बावजूद ब्रिटिश सरकार व उसके अधिकारी गांधी जी के इरादों को लेकर संशय में थे उन्हें डर था कि गांधी जी के चम्पा रण जाने पर वहां की प्रशासन बिगड़ सकती है। अतः ब्रिटिश अधिकारियों ने दंड प्रक्रिया की धारा 144 का हवाला देते हुए गांधी जी के चम्पा रण पहुंचने पर उन्हें जिले को छोड़ने का नोटिस जारी करने का निर्णय लिया।

चम्पारण पहुंचने पर गांधी जी

15 अप्रैल 1917 में गांधी जी चम्पा रण पहुंचने पर सर्वप्रथम मजिस्ट्रेट को पत्र लिखकर वहां रहने के अपने दृढ़ संकल्प और अवज्ञा के लिए किसी भी दंड का सामना करने की अपनी तत्परता व्यक्त की । तीन दिन बाद यानी 18 अप्रैल 1917 को गांधी जी को मुकदमे के लिए बुलाया गया। उन्होंने अपना बचाव पेश नहीं किया , बल्कि जेल जाने की इच्छा जताई। अतः उनकी सजा को स्थगित कर दिया गया। सजा के स्थगित होने का मुख्य कारण उप राज्यपाल का आदेश था। दरअसल गांधी जी के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य न होने के कारण उप राज्यपाल ने प्रशासन को मामला वापिस लेने का आदेश दिया। जिसके चलते गांधी जी की सजा स्थगित ही नहीं हुई बल्कि उन्हें चम्पा रण मामले की जांच करने कि अनुमति भी मिल गयी। राज्यपाल की अनुमति मिलने के बाद गांधी जी के सहयोग में राजेंद्र प्रसाद , ब्रज किशोर प्रसाद, मजहरुल हक , जो बी कृपालनी, राम नवमी प्रसाद और अन्य नेताओं  का सहयोग मिला। विभिन्न गांवों के हजारों किसान नील की खेती प्रणाली के प्रति अपनी असंतुष्टि व्यक्त करने आए। 

आंदोलन का विद्रोह करने वाले विद्रोही दल

1.बिहार प्लोटर्स एसोसिएशन
इस कमेटी ने गांधी जी की जांच का कड़ा विरोध किया क्योंकि उन्हें डर था कि इस प्रकार की जांच किसानों के बीच आक्रामकता को बढ़ा सकती है।
2. यूरोपीय अधिकारियों की चिंता
कुछ यूरोपीय अधिकारियों ने चिंतन व्यक्त किया कि गांधी जी की जांच एक यूरोपीय आंदोलन का रुप ले सकती है।
3.सरकारी हस्तक्षेप
बढ़ते विरोध के चलते सरकार ने गांधी जी को अपनी जांच के निष्कर्षों पर एक प्रारम्भिक रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया जिसके चलते गांधी  जी ने 13 मई 1917 को अपनी प्रारम्भिक रिपोर्ट प्रस्तुत की ,जिसमें उन्होंने अपनी जांच के निष्कर्षों का विवरण दिया।
चम्पा रण सत्याग्रह पर सरकार की प्रतिक्रिया
 नील किसानों शोषण को लेकर बढ़ते असंतोष को दूर करने के लिए सरकार को मजबूरी में अधिकारिक जांच समिति का गठन करना पड़ा जिसमें गांधी जी भी सदस्य थे।

समिति का निष्कर्ष ओर सिफारिशें

1. तिनकठिया प्रणाली का समापन हुआ
2.कारखानों को तावान का भुगतान करने वाले किसानों को भुगतान का एक चौथाई हिस्सा वापिस मिलने लगा।
3.अवैध करो की वसूली बंद की गई।
4.नील खोती को किसान स्वयं इच्छा से सहमत होने चाहिए, जबरन नील खेती पर प्रतिबंध लगाया गया।
5.ब्रिटीस सरकार ने समिति की सभी सिफारिशों को स्वीकार किया जिसके परिणामस्वरूप 1918 में चम्पा रण कृषि अधिनियम पारित किया गया। 
इस प्रकार यह आंदोलन पूर्णतः सफल रहा।
सोर्स WIKIPEDIA TESTBOOK BYJUS VAJIRAMADRAVI MKGANDHI PREPP PW.LIVE  

शुक्रवार, 13 मार्च 2026

होम रुल आंदोलन


home rule movement

प्रस्तावना


प्रस्तुत लेख में हम होम रुल आंदोलन के बारे में चर्चा करेंगे जिसे हम स्वदेशी आंदोलन के नाम से भी जानते है। मुख्य रुप से यह आंदोलन मात्र दो वर्ष ही चल पाया मगर आज़ादी की लड़ाई में इसकी अहम भूमिका निभाई । इसके साथ ही आंदोलन के मुख्य पात्रों एवं प्रमुख घटनाओं के बारे में चर्चा करेंगे।

स्वदेशी आंदोलन की घटना

इस आंदोलन का मुख्य लक्ष्य भारतीय शासन व्यवस्था को स्थापित करना था। यह वह समय था जब प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति हुई थी। इस आंदोलन को देश के पढ़े लिखे लोगों द्वारा चलाया गया था जिस कारण से उस समय काल का युवा वर्ग इसमें बढ़ चढ़कर भाग ले रहा था। बताते चले कि इस आंदोलन के संचालन कर्ता के रुप में मुख्य भूमिका ऐनी बेसेंट और बाल गंगाधर तिलक की थी। स्वदेशी आंदोलन के प्रभाव में आकर कुछ समय के लिए उदार वादी,चरमपंथी और मुस्लिम लीग के नेता एकजुट हो गये थे।

1917 में यह घोषणा की गई की सरकार में अधिक से अधिक भारतीयों के होने की संभावना सुनिश्चित की जा सके ताकि स्वशासी संस्थाओं का विकास हो सके और भारत में एक जिम्मेदार सरकार का निर्माण हो सके। अगस्त घोषणा के नाम से देश में यह घोषणा की गई कि अब से स्वदेशी शासन की मांग को राजद्रोह नहीं माना जायेगा। इस आंदोलन के मुख्य लक्ष्य ही यही था कि ब्रिटिश सरकार में भारतीयों की उपलब्धि स्थापित की जा सके।

लेकिन इस आंदोलन में पिछड़ा वर्ग एवं छोटी जाती वर्ग के लोगों की भागीदारी बहुत कम थी क्योंकि उन्हें लग रहा था कि अंग्रेजों का शासन समाप्त होने के बाद वे एक बार फिर से ब्राह्मण एवं उच्च जाति वर्ग के गुलाम हो जायेंगे।.

आंदोलन के मुख्य उद्देश्य

1.भारत में सुशासन लागू करना।
2.राजनीतिक शिक्षा और चर्चा को बढ़ावा देना।
3.सरकार की दमनकारी नीतियों के खिलाफ बोलने के लिए भारतीयों में आत्मविश्वास की भावना को जाग्रत करना।
4.ब्रिटीश सरकार में भारतीयों की उपलब्धि स्थापित करना।
5.कांग्रेस पार्टी के सिद्धांतों के बनाएं रखते हुए भारत में राजनीतिक गतिविधियों को पुनर्जीवित करना आदि।

आंदोलन के समाप्त होने के मुख्य कारण

  • 1.सुशासन आंदोलन की बढ़ती हुई मांग और आक्रोश को देखते हुए जून 1917 में ऐनी बेसेंट को गिरफ्तार कर लिया गया। जिसके चलते देश भर में विरोध प्रदर्शन किए गये । नरम दल और गरम दल के नेता एकजुट हो कर सड़कों पर उतरे  आंदोलन कर्ताओं की संख्या बढ़ कर लगभग 40000  हो गयी। इसी बीच बाल गंगाधर को भी प्रतिबंधित किया गया। जिसके चलते आंदोलन अपने मुख्य नेताओं के अभाव में कमजोर होता चला गया।
  • 2. सरकार ने आंदोलन कर्ताओं पर भी अंकुश लगाने के लिए भारत रक्षा अधिनियम 1915 का इस्तेमाल किया।
  • 3. छात्रों को ग्रह शासन की बैठकों में भाग लेने से प्रतिबंधित कर दिया गया।
  • 4.बाल गंगाधर तिलक पर मुकदमा चलाया गया और इसके साथ ही पंजाब और दिल्ली प्रवेश आने पर उन्हें प्रतिबंधित किया गया। इस बीच बाल गंगाधर तिलक ब्रिटिश पत्रकार इग्नेशियस वैलेंटाइन चिरौल पर मान हानि का मुकदमा दर्ज करने के लिए इग्लैंड गये थे। दरअसल इस पत्रकार ने इंडियन अनरेस्ट नामक एक किताब लिखी थी जिसमें इसने बाल गंगाधर तिलक को अपमानजनक बातें लिखी थी साथ ही उन्हें भारतीय अशांति का जनक कहा गया था।
  • 5.1910 में भारतीय प्रेस अधिनियम लाया गया था जिसके तहत सरकार विरोधी लेख, पत्रिका एवं खबर पर रोक  थी जिसके कारण जनता तक आंदोलन की गतिविधियों में शामिल होने में समय लगता था अतः आंदोलन पर इस अधिनियम का भी गहरा असर हुआ।
  • 6. बाल गंगाधर तिलक कि अनुपस्थिति और ऐनी बेसेंट के गिरफ्तार होने के कारण आंदोलन नेतृत्व विहीन हो गया  में आंदोलन और भी कमजोर होता गया। आगे चलकर होरुल आंदोलन का विलय कांग्रेस पार्टी में हो गया। कांग्रेस पार्टी भी आगे चलकर दो भागों में विभाजित हो गयी।
  • यद्यपि यह आंदोलन असफल रहा मगर स्वतंत्रता आंदोलन में इसने अपनी एक अहम भूमिका निभाई जिसका प्रमाण हमें 1916 में हुए लखनऊ समझौते में देखने को मिलता है। इस प्रकार यह आंदोलन 1916 से लेकर 1918 तक ही चल पाया।.
सोर्स
विकीपिडीया, insightsonindia.com byjus.com vajiramandravi.com brirannica.org unacademy.com

सोमवार, 9 मार्च 2026

‎स्वदेशी आंदोलन 1905

swadeshi movement

प्रस्तावना 

प्रस्तुत लेख में 1905 में हुए स्वदेशी आंदोलन के बारे में चर्चा करेंगे। इसके अलावा प्रथम स्वदेशी आंदोलन 1850-1918 तक हुए आंदोलन इसके कुछ अहम बिंदुओं, इसके साथ ही द्वितीय स्वदेशी आंदोलन 1918 -1947 एवं तीसरा स्वदेशी आंदोलन 1947-1991 बारे में, इसके साथ ही अंतिम स्वदेशी आंदोलन जो कि 1991 में हुआ उसके बारे में भी चर्चा करेंगे। इन आंदोलनों में एक अहम बिंदु सिर्फ यही था कि विदेशी वस्तुओं और नियमों का  बहिष्कार किया जाये। हमारे इस लेख का मुख्य बिंदु 1905 में  हुआ स्वदेशी आंदोलन और इसके मुख्य पात्र ही रहेंगे।

आंदोलन की शुरुआत 

दिसम्बर 1905 में बंगाल विभाजन की घोषणा की गई। सरकार द्वारा आधिकारिक कारण यह बताया 7 करोड़ 80 लाख आबादी वाला बंगाल प्रशासन के लिए बहुत बड़ा है हलांकि मुख्य कारण यह नहीं था कि आबादी ज्यादा थी बल्कि यह था कि इतनी बड़ी  आबादी वाले क्षेत्र की भीड़ को नियंत्रित करना  उनके लिए मुश्किल हो रहा था। क्योंकि अगर वे बंगाल में विद्रोह को नियंत्रित नहीं कर पाते तो यह  पूरे देश में यह आंदोलन फैल जाता। अतः अंग्रेजों ने फुट डालो और राज करो कि नीति अपनाना सही समझा। इन्होंने बंगाल को पूर्व और पश्चिम भाग में विभाजित किया। आपको बताते चलें  की उस समय काल में पूर्वी भाग में मुख्य  रूप से मुस्लिम रहते थे तथा पश्चिमी भाग में हिंदू  रहा करते थे। दरअसल अंग्रेज अपने दंगा करने का कार्य भार हिन्दू-मुस्लिम को आपस में लड़ा कर पूरा करते और  शासन तो कर ही रही थे।
अतः भारतीयों को अंग्रेजों की  इस मंशा का पता  चला और उन्होंने विरोध किया। जिसके कारण 1911 में बंगाल को फिर से एकजुट करना पड़ा और अपनी राजधानी को नई दिल्ली स्थानांतरित कर दी।. इस जीत के बाद यह आंदोलन कुछ समय के  लिए  शांत रहा।‎

‎आंदोलन के मुख्य पात्र

1.प्रथम माक्वेर्स  कर्ज़न  ऑफ केडलस्टन भारत का वायसराय बनाया गया था। इसने बंगाल विभाजन में अध्यक्षता की थी।
2.इस ‎आंदोलन के चलते ही दिल्ली को पहली बार राजधानी बनाया गया क्योंकि बंगाल में रहकर शासन कर पाना संभव नहीं था ये ब्रिटिश सरकार से जानती थी।
‎3. वि. ओ. चिंदबरन पिलाई -‎इस आंदोलन से प्रभावित हो कर इन्होंने 1905 में ब्रिटिश इंडिया  स्टीम नेविगेशन  कंपनी को अपने कब्जे में लिया और 1906 में भारतीय स्वानित्व की शिपिंग कम्पनी बनाते हुए इसका नाम स्वदेशी शिपिंग कम्पनी कर दिया। 
4.बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और विपिन चन्द्र पाल स्वदेशी आंदोलन के दौरान ही 1906 निजी समितियों को सक्रिय किया था मगर उनकी गिरफ्तारी होने के बाद सभी ने अपना कार्य रोक दिया। 
5.इसके साथ अरविंद घोष सुरेन्द्र नाथ बनर्जी, रविन्द्रनाथ टैगोर ने भी अहम भूमिका निभाई।.
6. स्वदेशी  आंदोलन को राष्ट्रीय कांग्रेस ने अपने स्वतंत्रता संग्राम के लिए हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। पहली बार तिरंगा जो हाथों से बनाया गया था जवाहर लाल नेहरु द्वारा, नई दिल्ली के इंडिया गेट के पास प्रिंसेस पार्क में फहराया गया था जिस पर अशोक चिन्ह ही  बनाया गया था न कि चरखा।

‎स्वदेशी आंदोलन के चार चरण

1.पहला चरण 1850-1918 तक
 इस आंदोलन का मुख्य पात्र गोपाल कृष्ण गोखले, महादेव गोविंद रानडे, बाल गंगाधर तिलक गणेश व्यंकटेश जोशी भास्वत के, निगोनी, वी ओ चिदंबरम सुब्रमण्यम भारती, शिवा और राम सिंह कुका ने सहयोग किया। 
मुख्य लक्ष्य
इस आंदोलन का मुख्य लक्ष्य सम्पूर्ण रुप से विदेशी सामग्री का बहिष्कार करने के लिए गणेश उत्सव का आयोजन किया गया। इसके साथ ही शिक्षा ,खाप पंचायतों के भी विकसित करने का प्रयास किया गया ताकि ब्रिटिश सरकार के खिलाफ रणनीति बनाई जा सके इसी आंदोलन के अंतर्गत 1905 का आंदोलन भी आता है। 
2.दूसरा चरण 1918-1947 तक
 इस चरण  की शुरुआत 1918 में महात्मा गांधी जी द्वारा पट्टी चरखा को सब के सामने प्रस्तुत करके की। यही चरण आगे चलकर  स्वदेशी आंदोलन का प्रतीक बना। इसके अलावा 31 जुलाई 1921 मुंबई के परेल में  स्थित (एल्पिनस्टोन मिल परिसर में लगभग 1,50000 अंग्रेजी कपडों की होली जलाई गई और प्रतिज्ञा ली गयी कि अब से वे विदेशी कपड़े नहीं पहनेंगे।.इस आंदोलन के चलते ही गांधी जी ने देश के  कोने-कोने में चरखा उद्योग की स्थापना की। भारतीय खादी कपड़ा महंगा होने के बावजूद भी इसे धारण  करने लगें, जिस कारण विदेशी कपड़ा उद्योग 20 प्रतिशत की दर से नीचे गिरने लगा
‎3.तीसरा चरण -  1991 नेहरूवादी समाजवाद के तहत भारतीय सरकार और उसके बाद के प्रधान मंत्रियों ने (आयात प्रति स्थापन) यानी की विदेशी वस्तु न खरीद  कर घरेलू वस्तुओं के उत्पादन को बढ़ावा दिया। जिसके तहत भारी उद्योगों,वैज्ञानिक संस्थानों और आर्थिक सम प्रभुता के उद्देश्य से एक नियोजित अर्थव्यवस्था की स्थापना हुई। नए-नए स्वयं सेवक संगठनों की स्थापना हुई।.
4.चौथा चरण- 1991 से आगे का समय
इस चरण को पी. वि. नर सिम्हा राव द्वारा वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के साथ शुरु किया गया था यह चरण भी उदारी करण , निजीकरण और वैश्वीकरण की ओर अग्रसर हुआ जिसने भारतीय व्यवसायों में वैश्वीकरण स्तर पर प्रतिस्पर्धा बनाने के लिए प्रोत्साहित किया। इससे स्वदेशी युग का नया दौर शुरु हुआ। जिससे प्रभावित होकर इंफोसिस, विप्रो और टाटा जैसी भारतीय उद्यमी कम्पनीयों का विकास हुआ।.
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गुरुवार, 26 जून 2025

जलीयांवाला बाग

Jallianwala-bagh
 Jallianwala bagh

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम जलीयांवाला बाग में हुए हत्याकांड के पिछे के मुख्य कारण के बारे में चर्चा करेंगे।. इसके साथ ही घटना को अंजान दिये जाने के लिए चली गयी कूटनीति के बारे में भी चर्चा करेंगे। घटना के मुख्य पात्रों तथा मरने वालों कि संख्या पर भी विचार करेंगे क्योंकि सरकारी रिकार्ड में मरने वाले कि संख्या कम दिखाई गयी थी जबकि अस्पताल के रिकार्ड को हिसाब से संख्या अलग थी जो कि इस घटना का महत्वपूर्ण पहलू है। इसके साथ ही क्रांतिकारी नेता कृपाल सिंह तथा ब्रिटिश पार्लीयामेन्ट की वायसराय काउन्सिल के इकलौते भारतीय मेम्बर C. Sankaran Nair बारे में चर्चा करेंगे।.

घटना की मुख्य जड़े

1857 की क्रांति के बाद 1914 में पहला विश्व युद्ध हुआ जिसमें ब्रिटिश भारतीय मूल के सैनिकों कि कमी थी जिसके चलते ब्रिटिश सरकार ने वादा किया की अगर आप हमारी तरफ से युद्ध में भाग लेते है तो युद्ध समाप्ति के बाद हम भारत को आज़ादी देंगे। जिसके चलते लगभग 5 लाख भारतीय मूल के सैनिक सेना में भर्ती हुए और युद्ध में झौंक दिये गए। जबकि उनका युद्ध से कोई लेना देना नहीं था। युद्ध समाप्त हुआ समझौते के मुताबिक भारतीयों को आज़ादी मिलनी चाहिए थी, मगर सरकार अपने वादों से मुकर गयी। परिणास्वरुप देश में एक बार फिर विरोध प्रदर्शन होना प्रारम्भ हुआ मगर अब की बार विरोध प्रदर्शन भारतीय मूल के सैनिकों द्वारा किया गया, जिनके मुख्य नेता कृपाल सिंह थे जो कि स्वयं युद्ध में शामिल हुए थै उनके अलावा भी कयी अन्य क्रांतिकारी नेता जैसे कन्हैया लाल , खुदिराम सिंह, बरीन्दर कुमार के नाम समाने आते है।.

कृपाल सिंह

वह ब्रिटिश भारतीय सैनिक तथा बाद में स्वतंत्रता सेनानी और शिक्षक बने। उन्हीं को चलते 1915 की गदर साजिश विफल रही क्योंकि उन्होंने ही पंजाब सीआईडी को गदर साजिश के  बारे में जानकारी दी थी। मगर प्रथम विश्व युद्ध बाद अंग्रेज़ों के प्रति उनकी निष्ठा बदल गयी क्योंकि वे अपने वादों के पक्के नहीं थे। उनका जन्म 1925 में हुआ था वे पेशे से अपने शुरूआती समय में कश्मीर के बारामूला के सिक्ख स्वतंत्रता सेनानी और शिक्षक थे। कश्मीर में आज भी पंजाबी भाषा में श्रेष्ठ आने वाले छात्र को उनके नाम पर एक वार्षिक पुरस्कार दिया जाता है।. अतः फौज से इस्तीफा देना के बाद उन्होंने अपना स्कूल कार्य फिर से प्रारम्भ किया और जगह जगह विरोध प्रदर्शन किया।

रौलेट एक्ट

इसी बीच रौलेट एक्ट पास किया जाता है जिसकी नितीयां भारतीय जनता द्वारा मान्य नहीं थी। इसके कुछ नियम इस प्रकार थे ।.1 सरकार किसी को भी बिना कारण बताये हिरासत में ले सकती थी 2. किसी भी भारतीय को बिना मुकदमा चलाये गिरफ्तार करने तथा दो साल तक जेल में रखने का अधिकार पुलिस को मिल गया।.2.बिना जूरी के मुकदमे चलाये जा सकते थे। 4. पुलिस को बिना वारंट के तलाशी और गिरफ्तारी के असीमित अधिकार थे। इसी एक्ट के खिलाफ जलियांवाले बाग में लोगों कि भीड़ जमा हुयी थी मगर जनरल डायर में उन्हें आतंकवादी घोषित कर गोली मारने का आदेश दे दिया।

डायर ने ऐसा क्यों किया

1. 6 अप्रैल 1919 को पुरे भारत में हड़ताल की गई जिसमें आम जन के साथ ही सरकारी कार्य कर्ताओं ने भी भाग लिया आन्दोलन का संचालन गांधी जी ने किया था।
2.ब्रिटीश सरकार को डर था कि अगर सरकार द्वारा कोई कार्य नहीं किया गया तो ये देश विरोधी नारे और तेज हो जायेंगे अतः सरकार द्वारा वाहवाही लूटने के चक्कर में  डायर ने प्लान बनाया। 9 अप्रैल 1919 को रामनवमी का त्यौहार हिन्दू और मुस्लमान वर्ग के लोगों ने मिल  जूलकर मनाया जिससे यह कदन उठाया गया था
3.क्योंकि डायर जानता था कि भारतीय सैनिक अपने लोगों पर गोली नहीं चलायेंगे।10 अप्रैल 1919 को गौरखा और बलूच रेजीमेन्ट को एमरजेंसी नोटिस भेज बुलाया गया।. 
4.जलियांवाले बाग में ज्यादा से ज्यादा लोग इकट्ठा करने के लिए 13 अप्रैल 1919 को पंजाब के क्षेत्र में सुबह के समय  की अनाउंसमेन्ट  गयी जिसमे बताया गया कि महशुर क्रांतिकारी नेता कन्हया लाल  आज शाम चार बचे जलियांवाले बाग में रोलेट एक्ट के खिलाफ भाषण देंगे।  ।

डायर नोट गिल्टी कैसे साबित हुआ

जलियांवाले हत्या कांड के बाद लोगों को आतंकवादी घोषित किया गया, घटना के मुख्य पहलुओं को छुपाया गया जैसे मरने वालों कि संख्या कितनी थी , घटना को दौरान कितने गैर कानूनी हथियार बरमाद किये गये, मुआवजे के रुप में 25 -25 रुपये दिये गये अतः केस के दौरान डायर का जुर्म साबित नहीं हो पाया और उसे बरी कर दिया गया।

सी शंकरन नायर

इन्होंने इस केस को दोबारा लड़ा और जनरल डायर को उसके पद से बर्खास्त कराने तथा भारतीयों को न्याय दिलाने में अहम भूमिका निभाई। इस घटना के दौरान वे ब्रिटिश वायसराय काउन्सिल के एक इकलौते भारतीय मेम्बर थे नारायण ने अपने पद से इस्तिफा दिया और इस केस को पढ़ने के बाद डायर के खिलाफ के खिलाफ केस लड़ने कि  याचिका डाली। इनका जन्म 11 जूलाई 1857 को केरल के मालाबार क्षेत्र में हुआ था 1897 में वे कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष बने । इन्होंने अपनी लॅा की डिग्री मद्रास लॅा कालेज से ली थी तथा 1880 में मद्रास हाईकोर्ट में वकील के रुप में अपना करियर प्रारम्भ किया। इनके बारे में एक बात बहुत प्रसिद्ध थी कि ये कभी कोई केस नहीं हारे।
 

जांच के दौरान इन्हे क्या मिला 

1. जांच में देखा कि 13 अप्रैस 1919 में हुई फायरिंग में 2332 बुलेट का नुकसान हुआ जिसमें कुल 1650 आतंकवादी मारे गये मगर अस्पताल रिकार्ड में मरने वालों कि संख्या 10312 थी।
2. इतने बड़े हत्याकांड में एक भी ब्रिटीश सैनिक नहीं मारा गया था।
3. 13 अप्रैल को सरकार के अनुसार पजांब में कर्फ्यू  लगा था मगर जलियांवाले बाग के निकट हरमेन्दर साहब के इलाके में पुलिस चौंकि के सामने से जब हजारों कि संख्या में लोग बाग की तरफ चले तो उन्हें किसी भी प्रकार से न तो रोका गया न चेतावनी दी गयी। तथ्यों कि बारिकी जानकारी निकालने पर पता चला कि यह घटना एक प्रि प्लान मर्डर था निहत्थे भारतीय नागरिकों की जिनमें 5 वर्ष के बच्चों से लेकर, महिलाओं और पुरुष जन संगठन शामिल था जिन्हें ब्रिटिश सेना द्वारा अतकंवादी बना दिया गया किया गया ।.

शुक्रवार, 28 मार्च 2025

मैनपुरी शड़यंत्र

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प्रस्तवना

मैनपुरी षड्यन्त्र भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण घटना है, जो 1918 में उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले में हुई थी। यह षड्यन्त्र उस समय के क्रांतिकारियों द्वारा ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक सशस्त्र विद्रोह की योजना बनाने का प्रयास था। 

पृष्ठभूमि

इस घटना का मुख्य कारण ब्रिटिश राज के प्रति बढ़ता असंतोष और स्वतंत्रता की आकांक्षा थी। मैनपुरी में क्रांतिकारी संगठन मातृवेदी की स्थापना की गई, जिसमें प्रमुख नेता जैसे मुकुन्दी लाल, दम्मीलाल, और राम प्रसाद 'बिस्मिल' शामिल थे। इन लोगों ने अंग्रेजों को देश से बाहर निकालने के लिए एक योजना बनाई थी, लेकिन इस योजना की सूचना अंग्रेज अधिकारियों को मिल गई, जिसके परिणामस्वरूप कई प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार किया गया।.

शड़यन्त्र के मुख्य पात्र

राम प्रसाद 'बिस्मिल'- वे इस षड्यन्त्र के प्रमुख नेता थे और बाद में काकोरी काण्ड में भी शामिल हुए। बिस्मिल ने 'मातृवेदी' नामक एक क्रांतिकारी संगठन की स्थापना की और अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष में सक्रिय भूमिका निभाई। उन्हें 1927 में फांसी दी गई।.

मातृवेदी संघठन

मातृवेदी एक गुप्त क्रांतिकारी संगठन था, जिसकी स्थापना 1916 में राम प्रसाद बिस्मिल और गेंदालाल दीक्षित द्वारा की गई थी। यह संगठन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान सक्रिय रहा और इसका मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष करना था।

मुख्य विशेषताएँ

स्थापना- मातृवेदी की स्थापना 1916 में हुई, और यह संगठन चंबल क्षेत्र में सक्रिय था।
उद्देश्य- इसका मूल उद्देश्य भारत को स्वतंत्रता दिलाने के लिए क्रांतिकारी गतिविधियों को बढ़ावा देना था। संगठन ने अपने सदस्यों को संगठित करने और सरकारी खजाने को लूटने जैसे कार्यों के लिए प्रेरित किया।
प्रचार- राम प्रसाद बिस्मिल ने 28 जनवरी 1918 को मातृवेदी का एक इस्तहार प्रकाशित किया, जिसमें देशवासियों से अपील की गई थी कि वे अंग्रेजों का विरोध करें और देश को आजाद करें.

क्रांतिकारी गतिविधियाँ- मातृवेदी ने कई महत्वपूर्ण योजनाएँ बनाई, जिनमें से एक मैनपुरी षड्यन्त्र था, जिसमें बिस्मिल और दीक्षित को गिरफ्तार किया गया था। इस संगठन के सदस्य सशस्त्र संघर्ष में विश्वास रखते थे और उन्होंने कई बार सरकारी खजाने को लूटने का प्रयास किया.मातृवेदी ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और इसके सदस्यों ने अपने जीवन का बलिदान देकर देश की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया।

पंडित गेंदालाल दीक्षित- वे मैनपुरी के एक प्रमुख क्रांतिकारी थे और 'शिवाजी समिति' के संस्थापक सदस्य रहे। उन्होंने बिस्मिल के साथ मिलकर कई योजनाएँ बनाई और क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लिया.

मुकुन्दी लाल- वे भी इस षड्यन्त्र में शामिल थे और बाद में काकोरी काण्ड में भाग लिया। उन्हें आजीवन कारावास की सजा मिली.

दम्मीलाल, कढ़ोरीलाल गुप्ता, सिद्ध गोपाल चतुर्वेदी, गोपीनाथ, प्रभाकर पाण्डे, चन्द्रधर जौहरी, और शिवकृष्ण- ये सभी अन्य प्रमुख क्रांतिकारी थे जिन्होंने मैनपुरी षड्यन्त्र में भाग लिया और विभिन्न सजा भुगती.

मुख्य घटनाएँ

क्रांतिकारी गतिविधियाँ- मैनपुरी षड्यन्त्र के तहत क्रांतिकारियों ने प्रतिबंधित साहित्य का वितरण किया और सरकारी खजाने को लूटने की योजना बनाई। राम प्रसाद 'बिस्मिल' ने इस दौरान "देशवासियों के नाम" शीर्षक से एक पैम्फलेट भी प्रकाशित किया.

गिरफ्तारी और मुकदमा- इस षड्यन्त्र के खुलासे के बाद कई क्रांतिकारियों को गिरफ्तार किया गया और उनके खिलाफ मुकदमा चलाया गया। बिस्मिल सहित कुछ नेताओं को विभिन्न सजाएँ दी गईं, मुकुन्दी लाल को आजीवन कारावास, बिस्मिल को अंततः फाँसी की सजा सुनाई गई.

मातृवेदी संगठन की स्थापना- पंडित गेंदालाल दीक्षित के नेतृत्व में "मातृवेदी" नामक क्रांतिकारी संगठन की स्थापना की गई, जिसका उद्देश्य ब्रिटिश शासन को समाप्त करना था। इस संगठन में मुकुन्दी लाल, दम्मीलाल, और राम प्रसाद 'बिस्मिल' जैसे प्रमुख क्रांतिकारी शामिल थे।

प्रतिबंधित साहित्य का वितरण- क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबंधित किताबें और साहित्य वितरित किया। राम प्रसाद 'बिस्मिल' ने "देशवासियों के नाम" शीर्षक से एक पैम्फलेट प्रकाशित किया, जिसमें उनकी कविता "मैनपुरी की प्रतिज्ञा" भी शामिल थी।

धन जुटाने के प्रयास- संगठन के लिए धन जुटाने हेतु सरकारी खजाने को लूटने की योजना बनाई गई। इसके तहत कुछ डकैतियाँ भी डाली गईं, जिससे पुलिस सतर्क हो गई और क्रांतिकारियों की खोज शुरू हुई।

दलपत सिंह की मुखबिरी- मैनपुरी के दलपत सिंह नामक व्यक्ति ने अंग्रेजों को षड्यंत्र की सूचना दी, जिसके कारण संगठन समय से पहले टूट गया।

महत्व

मैनपुरी षड्यन्त्र ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक महत्वपूर्ण मोड़ प्रदान किया। यह घटना न केवल उत्तर प्रदेश में बल्कि पूरे देश में युवा क्रांतिकारियों को प्रेरित करने में सहायक सिद्ध हुई। यदि यह षड्यन्त्र सफल होता, तो शायद कई अन्य प्रमुख क्रांतिकारी घटनाएँ जैसे काकोरी कांड भी प्रभावित होती। इस प्रकार, मैनपुरी षड्यन्त्र भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की एक महत्वपूर्ण कड़ी है, जिसने भारतीय युवाओं में स्वतंत्रता की भावना को जागृत किया और उन्हें ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ संगठित होने के लिए प्रेरित किया।

सोर्स- wikipedia,drishti ias.jansatta.com,testbook,patrika.com

रविवार, 21 जुलाई 2024

चौसा का युद्ध 1539

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प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में चौसा के युद्ध के बारे में एवं इस घटना से सम्बन्धित महत्वपुर्ण तत्थ्यों के बारे में चर्चा करेंगे।.इसके साथ ही हम जीटी रोड़ तथा इसके इतिहास के बारे में एवं इस घटना के मुख्य पात्र हुमायूं और शेरशाह सूरी और इनकी याद नें बाने हुमायूं के मकबरे एवं शेरशाह सूरी के मकबरे के निर्माण कर्ता के बारे में चर्चा करेंगे।.

घटना से संबन्धित महत्वपुर्ण तथ्य

  1. 2011 में जब पुरात्व विभाग ने बिहार के बक्सर जिले खोदाई कि,खुदाई के दौरान 5000 वर्ष से भी पुरानी सभ्यता के अवशेष मिले है।.खोदाई में मिले मृदभाण्ड,मुर्तीयों के अवशेषों का शोध करने पर पता चला कि यह जैल धर्म से सम्बधित है जोकि पालवंश से लेकर गुप्तवंश के समयकाल के हैं। इसके साथ ही गुप्तकाल के समय कि टेराकोटा की छोटी-बड़ी मूर्तियां प्राप्त हुई।
  2. इस युद्ध के बाद जलाल खाँ को शेरशाह ने बंगाल भेजकर बंगाल पर अधिकार कर लिया।
  3. चौंसा के युद्ध में शेरशाह कि मदत उज्जैनिया राजपुत भोजपुर,गौतम राजपुतों ने कि थी।
  4. चौंसा के युद्ध के पहले शेरशाह का नाम फरीद अलद्दीन था ताज पहने का बाद उसने शेरशाह कि उपाधि धारण की।
  5. चौंसा के युद्ध के बाद शेरशाह ने दिल्ली पर 1555 तक शासन किया। बताते चले कि शेर खाँ के बेटे शेरशाह एक अफगानी शासक था।
  6. वर्तमान समय चौंसा कि युद्ध स्थली पर शेरशाह मिनी म्युजियम गैलरी का निर्माण कराया गया है।.शेरशाह से बचने के लिए हुमांयू गंगा नदी ने कुद गया मगर पानी का बहाव तेज होने के कारण जब वह नदी में डूबने लगा था तब क्षेत्र के मूल निवासी भिस्ती निजामुद्दीन ने एक चमड़े के थैले कि सहायता से उसकी जान बचाई।.जिसके बदले में हुमांयू ने उसे एक दिन का नवाब बनाया था।.अजमेर में भिस्ती निजामुद्दीन सक्का की मजार है।.जिस पर आज भी भिस्ती अब्बासी समाज के लोग चदार पोशी करते है।.

चौसा का युद्ध

यह युद्ध सुर साम्राज्य के शासक शेरशाह सूरी और मुगल साम्राज्य के शासक हुमायूं के माध्य 26 जून 1539 को बिहार के बक्सर जिले के चौसा नामक स्थान पर हुआ था।.यह स्थान बक्सर से 10 मील दक्षिण-पश्चिम में स्थित है।.बताते चले कि हुमायूं,मुगल बादशाह बाबर का एकलौता बेटा था।.वहीं शेरशाह सूरी एक अफगानी शासक था जिसे भौजपुर के उज्जैनीयां राजपुत और गौतम राजपुतों ने भारत बुलाया था इन्होंने ही चौंसा के युद्ध में शेरशाह सूरी की साहयता कि थी।.बताया जााता है कि हुमायूं विलासिता पुर्ण जीवन जीने का आदि था। जिसके लिए उसने बंगाल प्रांत को अपने उच्च अधिकारियों के बीच जागीरों के रुप ने विभाजित किया और स्वयं अपने ऐशों आराम में लिप्त हो गया।.

अतः जल्द ही शेरशाह भारत आया और भारत की देशी रियासतों पर अपना अधिकार स्थापित करना प्रारम्भ किया।.परिणामस्वरुप शेरशाह ने आगरा पर अपना शासन स्थापित किया और आगरा पर हुमायूं के अधिकारों को समाप्त कर दिया।.अतः हुमायूं को जब इस घटना के बारे में पता चला तो उसने जी.टी. रोड़ के माध्यम से आगरा को घेरने का प्रयास किया।.

जी.टी. रोड़

इस रोड़ का पुरा नाम Grand Trunk Road हैं।.यह एशिया महाद्विप कि सबसे प्रचीन और लम्बी रोड़ है। इस सड़क को शेरशाह सूरी मार्ग भी कहते है।.यह म्यांमार की सीमा पर टेकनाफ से पश्चिम में अफगानिस्तान के काबुल तक 3,655 किलोमीटर तक फैला हुआ है।.यह रोड़ मुख्यतः बांग्लादेश के चटगाँव से लेकर ढाका,भारत के कोलकत्ता,कानपुर,अलीगढ़,दिल्ली,आमृतसर और पाकिस्तान और पेशावर से होकर गुजरता है।.इस प्राचीन राजमार्ग का निर्माण तीसरी शताब्दी इसा पुर्व उत्तरापथ नामक प्राचीन राजमार्ग के रुप में किया गया था।.इस सड़क के निर्माण में सम्राट अशोक,शेरशाह सुरी और महमूद शाह दुर्रानी का महत्वपुर्ण हाथ रहा है।.अशोक द्वारा इसका पुनः निर्माण कराया गया। शेरशाह ने सड़क का विस्तार करते हुए सोनारगाँव और रोहतांस तक विस्तरित किया। यही से रोहतांग दर्रा प्रारम्भ होता है।.इसके बाद ब्रिटीश सरकार ने इसका पुनः निर्माण कराया था।.यह रोड़ आज भी भारतीयों के विदेशी व्यापार का महत्वपुर्ण अंग है।.

अतः हुमायूं के आगरा हमले के दौरान शेरखान,'हुमायुं'को गंगा नदी के उस पार दक्षिणी तट पर ले जाने में सफल रहा।.दोनों सेनाएं पुरे तीन महीने तक आमने-सामने डेरा डाल कर पड़ी रही।. इसी बीच बरसात का मौसम आ गया और गंगा नदी में बाढ़ आ गयी।.मौके का फायदा उठा कर शेरशाह की सेना ने मुगलों पर आक्रमण कर दिया।.गौरिल्ला युद्ध प्रणाली के माध्य से आक्रमण किया गया।.बाढ़ के कारण लगभग 5000 सैनिक बाढ़ में बह गये और बाकी को शेरशाह की सेना ने मौत के घाट उतार दिया।.परिणामस्वरुप हुमायूं कि युद्ध में हार हुयीं।.अपनी जान बचाने के लिए हुमायूं गंगा नें कुद गया परन्तु अपनी जान बचाने के प्रयास में गंगा में बाढ़ आने के कारण नदी में डूबने लगा।.अतः चौसा निवासी निजामुद्दीन भिस्ती ने नाव कि सहायता से हुमायुं कि जान बचाई।.

इसके बाद हुमायूं हिन्दुस्तान की सरहदों को छोड़कर ईरान भाग गया।.दुसरी तरफ शेरशाह सूरी ने दिल्ली शासन पर आसित होते ही अपने वफादार जलाल खाँ को बंगाल भेजकर,बंगाल पर अपना शासन स्थापित किया।.हुमायूं ने शेरशाह कि मौत तक हिन्दुस्तान की तरफ आने कि हिम्मत न कि मगर शेरशाह कि बिमारी से मौत होने के कारण हिमायूं भारत आया और अपना शासन स्थापित किया।.शेरखान का प्राचीन नाम शेरखान फरीद अलद्दीन था मगर शासन पर अपना अधिपत्य स्थापित करने के बाद उसने शेरशाह सूरी की उपाधि धारण कि।.हिमायूं ने अपनी जान बचाने के बदले में निजामुद्दीन भिस्ती को एक दिन का नवाब घोषित किया था। अपने शासन काल के दौरान निजामुद्दीन भिस्ती ने अपने नाम के चमड़े के सिक्के जारी करवाये।.अजमेर में आज भी निजामुद्दीन कि सक्का कि मजार है जिस पर आज भी भिस्ती अब्बासी समाज के लोग चादरपोशी करते है।.

हुमांयू का मकबरा

भारतीय मुुगल वास्तुकला सर्वप्रथम उदाहरण है जिसके कारण यह यूनेस्को कि विश्व धरोहर की सूची में शामिल है जोकि दिल्ली के दीनपाह यानि पुराने किले के निकट निज़ामुद्दीन के पूर्व क्षेत्र में मथुरा के निकट स्थित है।. इस मकबरे में हमांयू की कब्र के अलावां अन्य राजसी परिवार के लोगों कि कब्रें भी है।.मकबरे के निर्माण में चारबाग शैली का प्रयोग किया गया है यह वहीं शैली है जिसका प्रयोग ताजमहल निर्माण कार्य में भी किया गया था।.1562 में इस मकबरे का निर्माण हमीदा बानों बेगम के आदेश पर करवाया गया था। हमीदा बानों हुमांयू कि विधवा थी।.इतिहासकार अब्द-अल-कादिर बदांयुनी के अनुसार मकबरे के निर्माण के लिए अफगानिस्तान के हैरात शहर के मशहुर कारिगर को बुलाया गया था।. कारिगर का नाम मिराक मिर्जा घुइयाथुद्दीन था इन्होंने तथा इनके बेटे मिराक घुइयाथुद्दीन ने अपने कौशल का परिचय देते हुए,इस मकबरे का निर्माण किया।.

भारत में पहली बार किसी इमारत के निर्मण में अधिक पैमाने पर लाल बलुआ पत्थर का प्रयोग किया गया था।.1993 में इसे यूनेस्कों की विश्व धरोहर कि सूचि में शामिल किया गया।.बेगम हमिदा बानों कि मौंत के बाद उनकी भी कब्र इसी मकबरे में बनाई गयी।.इन दो कबरों के अलावा इस मकबरे में शाहजहां के बड़े बेटे दारा शिकोह,सम्राट जहांदर शाह,फर्रुखशीयर रफी,उल-दर्जत,रफी उद-दौलत एवं आलमगीर द्वितीय आदि की कब्रे यहां स्थित है।.इतिहास को खंगालने पर हमें यह पता चला कि हुमांयू के मकबरे का निर्माण हुमांयू के मकबरे का निर्माण हुमांयू कि मौत के 9 वर्ष बाद बेगन 1565 में  हमीदा बानों के आदेश पर करवाया गया था उस समय काल में इसकी लागत 15 लाख रुपये आयी थी।.20 जनवरी 1556 में हुमांयू कि मौत के बाद सर्वप्रथम उसे दिल्ली में दफनाया गया था। फिर 1557 में खजंरबेग द्वारा उसे पंजाब के सरहिंद में ले जाया गया।.1571 में सम्राट अकबर ने अपने पिता कि समाधि को देखा।.

मकबरे में कब्र बनाने कि परम्परा

मकबरे में कब्र बनाने कि परम्परा हुमांयू के पिता बाबर के समय काल से अपनाई गयी।.इसी समय काल में ही बाग में कब्र बनाने कि परम्परा को भी चलन में लाया गया।.इसका चलन तैमुरलंग की कब्र से प्रारंभ हुआ जोकि उज्बेकिस्तान समरकंद में बनी है।.इस प्रकार यह परम्परा ताजमहल के निर्माण कार्य तक जारी रही।.बताते चले कि ताजमहल में शाहजहां कि प्रिय बेगम मूमताज बानो की कब्र है।.ताजमहल का निर्माण सफेद संगमरमर के पत्थर से किया गया है ताजमहल के वास्तुकार का नाम उस्ताद अहमद लाहौरी था।.

शेरशाह सूरी का मकबरा

इसे भारत का दुसरा ताजमहल भी कहा जाता है यह बिहार के सासाराम जिले में अवस्थित है।.सासाराम में अवस्थीत यह मकबरा पर्यटकों के लिए आर्कषण का मुख्य केन्द्र है।.बताते चले कि शेरशाह ने भारत में मुगल साम्राज्य को हराया था तथा उत्तर भारत में सूरी साम्राज्य की स्थापना कि थी। 1998 में इसे यूनेस्कों कि विश्व धरोहर कि सूची में शामिल किया गया।.मकबरे का निर्माण 13 मई 1545 0 को प्रारम्भ हुआ इसी बिच कालिंजर के किले में एक आकस्मिक बारुद विस्फोट के कारण शेरशाह सूरी कि मौत हो गई।.अतः 16्अगस्त 1545 में मकबरे का निर्माण कार्य पुर्ण होने के बाद इसमें शेरशाह कि कब्र बनाई गयी। यह मकबरा इंडों-इस्लामिक वास्तुकला का एक उदाहरण है।.इस मकबरे का निर्माण वास्तुकार मीर मुहम्मद अलीवाल खान द्वारा किया गया।.यह मकबरा शेरशाह के बेटे इस्लाम शाह के शासनकाल में बनाया गया था।.अतः कभी- कभी इतिहासकारों को भ्रम होता है कि मकबरे का निर्माण इस्लाम शाह ने किया था।.

मकबरे कि रुप रेखा

मकबरा एक वर्गाकार पत्थर के किनारे और चबूतरे के चारों ओर सीढ़ीदार है।.यह पत्थर के पुल के माध्यम से मुख्य भूमि से जुड़ा हुआ है। मुख्य मकबरे का निर्माण अष्टकोणिय परियोजना के आधार पर किया गया है। इस के बिच 22 मिटर ऊंचा एक गुंबद है चारों ओर सजावटी रुप में गुंबरदार टाईल है जौ कभी रंगीन चमकदार टाइल के रुप में शामिल थे।.यह लाल बलुआ पत्थर जो लगभग 122 फुट ऊंचा है जोकि कृत्रिम झील के बीचो-बिच एक वर्गाकार पत्थर के चबुतरे पर झील के केन्द्र में खड़ा है।.

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