प्रस्तावना
प्रस्तुत लेख में 1905 में हुए स्वदेशी आंदोलन के बारे में चर्चा करेंगे। इसके अलावा प्रथम स्वदेशी आंदोलन 1850-1918 तक हुए आंदोलन इसके कुछ अहम बिंदुओं, इसके साथ ही द्वितीय स्वदेशी आंदोलन 1918 -1947 एवं तीसरा स्वदेशी आंदोलन 1947-1991 बारे में, इसके साथ ही अंतिम स्वदेशी आंदोलन जो कि 1991 में हुआ उसके बारे में भी चर्चा करेंगे। इन आंदोलनों में एक अहम बिंदु सिर्फ यही था कि विदेशी वस्तुओं और नियमों का बहिष्कार किया जाये। हमारे इस लेख का मुख्य बिंदु 1905 में हुआ स्वदेशी आंदोलन और इसके मुख्य पात्र ही रहेंगे।
आंदोलन की शुरुआत
दिसम्बर 1905 में बंगाल विभाजन की घोषणा की गई। सरकार द्वारा आधिकारिक कारण यह बताया 7 करोड़ 80 लाख आबादी वाला बंगाल प्रशासन के लिए बहुत बड़ा है हलांकि मुख्य कारण यह नहीं था कि आबादी ज्यादा थी बल्कि यह था कि इतनी बड़ी आबादी वाले क्षेत्र की भीड़ को नियंत्रित करना उनके लिए मुश्किल हो रहा था। क्योंकि अगर वे बंगाल में विद्रोह को नियंत्रित नहीं कर पाते तो यह पूरे देश में यह आंदोलन फैल जाता। अतः अंग्रेजों ने फुट डालो और राज करो कि नीति अपनाना सही समझा। इन्होंने बंगाल को पूर्व और पश्चिम भाग में विभाजित किया। आपको बताते चलें की उस समय काल में पूर्वी भाग में मुख्य रूप से मुस्लिम रहते थे तथा पश्चिमी भाग में हिंदू रहा करते थे। दरअसल अंग्रेज अपने दंगा करने का कार्य भार हिन्दू-मुस्लिम को आपस में लड़ा कर पूरा करते और शासन तो कर ही रही थे।
अतः भारतीयों को अंग्रेजों की इस मंशा का पता चला और उन्होंने विरोध किया। जिसके कारण 1911 में बंगाल को फिर से एकजुट करना पड़ा और अपनी राजधानी को नई दिल्ली स्थानांतरित कर दी।. इस जीत के बाद यह आंदोलन कुछ समय के लिए शांत रहा।
आंदोलन के मुख्य पात्र
1.प्रथम माक्वेर्स कर्ज़न ऑफ केडलस्टन भारत का वायसराय बनाया गया था। इसने बंगाल विभाजन में अध्यक्षता की थी।
2.इस आंदोलन के चलते ही दिल्ली को पहली बार राजधानी बनाया गया क्योंकि बंगाल में रहकर शासन कर पाना संभव नहीं था ये ब्रिटिश सरकार से जानती थी।
3. वि. ओ. चिंदबरन पिलाई -इस आंदोलन से प्रभावित हो कर इन्होंने 1905 में ब्रिटिश इंडिया स्टीम नेविगेशन कंपनी को अपने कब्जे में लिया और 1906 में भारतीय स्वानित्व की शिपिंग कम्पनी बनाते हुए इसका नाम स्वदेशी शिपिंग कम्पनी कर दिया।
4.बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और विपिन चन्द्र पाल स्वदेशी आंदोलन के दौरान ही 1906 निजी समितियों को सक्रिय किया था मगर उनकी गिरफ्तारी होने के बाद सभी ने अपना कार्य रोक दिया।
5.इसके साथ अरविंद घोष सुरेन्द्र नाथ बनर्जी, रविन्द्रनाथ टैगोर ने भी अहम भूमिका निभाई।.
6. स्वदेशी आंदोलन को राष्ट्रीय कांग्रेस ने अपने स्वतंत्रता संग्राम के लिए हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। पहली बार तिरंगा जो हाथों से बनाया गया था जवाहर लाल नेहरु द्वारा, नई दिल्ली के इंडिया गेट के पास प्रिंसेस पार्क में फहराया गया था जिस पर अशोक चिन्ह ही बनाया गया था न कि चरखा।
स्वदेशी आंदोलन के चार चरण
1.पहला चरण 1850-1918 तक
इस आंदोलन का मुख्य पात्र गोपाल कृष्ण गोखले, महादेव गोविंद रानडे, बाल गंगाधर तिलक गणेश व्यंकटेश जोशी भास्वत के, निगोनी, वी ओ चिदंबरम सुब्रमण्यम भारती, शिवा और राम सिंह कुका ने सहयोग किया।
मुख्य लक्ष्य
इस आंदोलन का मुख्य लक्ष्य सम्पूर्ण रुप से विदेशी सामग्री का बहिष्कार करने के लिए गणेश उत्सव का आयोजन किया गया। इसके साथ ही शिक्षा ,खाप पंचायतों के भी विकसित करने का प्रयास किया गया ताकि ब्रिटिश सरकार के खिलाफ रणनीति बनाई जा सके इसी आंदोलन के अंतर्गत 1905 का आंदोलन भी आता है।
2.दूसरा चरण 1918-1947 तक
इस चरण की शुरुआत 1918 में महात्मा गांधी जी द्वारा पट्टी चरखा को सब के सामने प्रस्तुत करके की। यही चरण आगे चलकर स्वदेशी आंदोलन का प्रतीक बना। इसके अलावा 31 जुलाई 1921 मुंबई के परेल में स्थित (एल्पिनस्टोन मिल परिसर में लगभग 1,50000 अंग्रेजी कपडों की होली जलाई गई और प्रतिज्ञा ली गयी कि अब से वे विदेशी कपड़े नहीं पहनेंगे।.इस आंदोलन के चलते ही गांधी जी ने देश के कोने-कोने में चरखा उद्योग की स्थापना की। भारतीय खादी कपड़ा महंगा होने के बावजूद भी इसे धारण करने लगें, जिस कारण विदेशी कपड़ा उद्योग 20 प्रतिशत की दर से नीचे गिरने लगा
3.तीसरा चरण - 1991 नेहरूवादी समाजवाद के तहत भारतीय सरकार और उसके बाद के प्रधान मंत्रियों ने (आयात प्रति स्थापन) यानी की विदेशी वस्तु न खरीद कर घरेलू वस्तुओं के उत्पादन को बढ़ावा दिया। जिसके तहत भारी उद्योगों,वैज्ञानिक संस्थानों और आर्थिक सम प्रभुता के उद्देश्य से एक नियोजित अर्थव्यवस्था की स्थापना हुई। नए-नए स्वयं सेवक संगठनों की स्थापना हुई।.
4.चौथा चरण- 1991 से आगे का समय
इस चरण को पी. वि. नर सिम्हा राव द्वारा वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के साथ शुरु किया गया था यह चरण भी उदारी करण , निजीकरण और वैश्वीकरण की ओर अग्रसर हुआ जिसने भारतीय व्यवसायों में वैश्वीकरण स्तर पर प्रतिस्पर्धा बनाने के लिए प्रोत्साहित किया। इससे स्वदेशी युग का नया दौर शुरु हुआ। जिससे प्रभावित होकर इंफोसिस, विप्रो और टाटा जैसी भारतीय उद्यमी कम्पनीयों का विकास हुआ।.
सोर्स
vasiramadravi.com wikipedia dirishtiias pritannicca.com euscourses.in textbook.com

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