Indian History reveal the Past

हमारे इस ब्लॉग में भारतीय इतिहास, सांस्कृतिक इतिहास, राजवंशों आंदोलन स्टार्टअप टेक्नोलॉजी कला और वास्तुकला तथा आर्थिक इतिहास से संबंधित विषयों पर जानकारी दी जाती है। हम कम से कम शब्दों में ज़्यादा से ज़्यादा जानकारी देने की कोशिश कर रहे हैं।

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2026-10-01

अल्लूरी सीताराम राजू

illustration of alluri sitarama raju

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में अदिवासी समुह से आने वाले महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अल्लूरी सीता राम राजू के जीवन तथा उनके द्वारा किए गए महत्वपुर्ण कार्यों पर प्रकाश डाला गया है। इसके साथ रम्पा विद्रोह की घटना के पिछे के मुख्य कारण तथा अल्लूरी सीताराम राजू के जीवन की महत्वपूर्ण घटना पर प्रकाश डालेंगे।

जीवन परिचय

यह एक भारतीय क्रांतिकारी थे जिन्होंने भारत में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह किया था। उन्होंने वर्तमान समय में आंध्रा तथा उडिशा राज्य के सीमावर्ती इलाकों में ब्रिटिश सेना के खिलाफ गौरिल्ला युद्ध अभियान चलाए तथा 1922 के समय काल में रम्पा विद्रोह का नेतृत्व किया। इनके क्षेत्र के लोग इन्हें मन्यम वीरुडु के नाम से पुकारते थे व अभी भी जानते है। मन्य वीरुडु का हिन्दी में अर्थ है जंगल का नायक य राजा।

इनका जन्म वर्तमान आंध्रा प्रदेश जो कि अतीत में मद्रास प्रेसीजेंसी का हिस्सा था के एक तेलुगु आदिवासी परिवार में हुआ। बताया जाता है कि अपनी युवावस्था में उनकी की एक प्रेमीका थी जिससे वे बेहद प्रेम करते थे जिनका नाम सीता था। उनके जन्म के समय को लेकर विवाद है कुछ लोग उनके जन्म का समय 4 जुलाई 1897 मानते है तो कुछ लोग 1898 मानते है।

अपातकालीन स्थिती में उनकी प्रेमीका की मृत्यु हो गयी जिससें रामाराजू को गहरा दूःख हुआ और 18 वर्ष की आयु में ही इन्होंने सन्यास धारण किया। अपनी प्रेमीका की हमेशा याद रखने के य यादगार के रुप में इन्होंने अपने नाम के आगे सीता नाम जोड़ दिया। इस घटना के बाद इनका पुरा नाम अल्लूरी सीता रामा राजू हो गया।

शिक्षा

रामा राजू ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा अपने क्षेत्रीय विद्यालय से पूर्ण की इसके बाद काकीनाडा में हाई स्कूल में दाखिला लिया। स्कूल में उनकी मुलाकात मद्दूरी अन्नपूर्णैया से हुई जो भी आगे चलकर भारतीय क्रांतिकारी बने। 15 वर्ष की आयु में आगे की पढ़ाई करने के लिए वे अपनी मां अथवा अपनी नानी के घर विशाखापत्तनम चले गए। विशाखापत्तनम आने के बाद श्रीमती HVN कालेज में दाखिला लिया।

विशाखापत्तनम में ही रहते हुए उन्होंने दूरदराज पहाड़ी क्षेत्रों का दौरा किया और ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के तहत आदिवासियों द्वारा सामना की जाने वाली समस्याओं से परिचित हुए।

प्रेम प्रसंग

रामा राजू को अपने दोस्त की बहन सीता से प्रेम हो गया जिसकी कम उम्र में असमय मृत्यु ने उन्हें बहुत दुःखी किया। इस घटना के बाद रामा राजू ने अपना स्कूल छोड़ दिया अपने चाचा रामा कृष्णन राजू जो नरसपुर के तहसीलदार थे जिनके आग्रह पर उनका दाखिला नरसपुर के टेलर हाई स्कूल में दाखिला दिलाया गया।

बताया यह भी जाता है कि उनकी समकालीन रिपोर्ट के अनुसार उनकी रुचि ज्योतिष शास्त्र जड़ी बूटी चिकित्सा तथा हस्तरेखा शास्त्र साथ-साथ घुड़सवारी में विशेष रुचि थी। बताया जाता है कि 18 वर्ष की आयु में वे सन्यासी बन गए शायद सीता जी प्रेम में।

सन्यासी जीवन

सन्यासी बनने का बाद के जीवन में उन्होंने विभिन्न आध्यात्मिक साधनाओं का अभ्यास किया और जड़ी-बूटियों से उपचार कनरे में निपुण बन गए। 1921 के समय काल में उन्होंने गंगा और गोदावरी नदियों के उद्गम स्थलों यानी गंगोत्री और नासिक की यात्रा की। अपनी यात्रा के दौरान ही उनकी उनकी मुलाकात चटगांव में कई भारतीय क्रांतिकारियों से हुई।

इसके बाद आदिवासीयों की समस्याओं को करीब से जानने के लिए आदिवासियों के बीच एक संयमी जीवन व्यतीत किया। फल और शहद जैसे खाद्य पदार्थों का असली अनुभव पाकर उन्होंने उन्ही का जीवन अपनाने का निर्णय लिया। इस प्रकार व राजा मंडी के पास पापी पहाड़ियों में बस गए खास बात यह है कि इस क्षेत्र में आदिवासी आबादी का वर्चस्व था। आगे चलकर वे 20 शताब्दी के समय काल में आदिवासी समुदाय के नेता बन गए।

रम्पा विद्रोह 1922-24

इस विद्रोह का मुख्य कारण मद्रास वन अधिनियम था जिसने आदिवासीयों की अपनी पारंपरिक कृषी पद्धति को अपनाने से रोका। इसके साथ ही इस अधिनियम ने आदिवासीयों को अपने वन आवासों में स्वतंत्र आवागमन को प्रतिबंधित किया और वनों के आर्थिक मूल्य का दोहन किया। इन सभी कारणों को चलते आदिवासी समुदाय का जीवन खतरे में पड़ गया। जिसके चलते पुरे समुदाय में अक्रोश फैल गया।

अल्लूरी रामा राजू ने इन शिकायतों के मद्देनजर सभी आदिवासी समुदाय को एक जूट किया तथा अपने कुछ अन्य बाहरी सहयोगियों के साथ मिलकर एक सेना का निर्माण किया तथा आंध्रा प्रदेश तथा उडिसा राज्य के सिमावर्ती क्षेत्रों में गौरिल्ला अभियान चलाया। रामा राजू की सेना ब्रिटिश सेना को मद्रास प्रेसीडेंसी के पूर्वी घाट क्षेत्र से खदेड़ने में सफल रहें।

इसके बाद सेना को और मजबूती प्रदान करने के लिए पुलिस थानों पर छापे मारे गए तथा सभी हथियार लूट लिए गए।

उपरोक्त प्रकार के विद्रोहों को दबाने के लिए ब्रिटिश सेना ने दो साल तक अभियान चलाए। अंत में सफलता न मिलने पर रामा राजू पर 40 लाख रुपये का इनाम रखा गया जो कि वर्तमान 2026 के समय काल में 500 करोड़ से लेकर 1800 करोड़ के लगभग होती है। 

उस समय काल में सोना एक तोला मान के चलिए 12 ग्राम सोने की कीमत 20 रुपये थी और वर्तमान समय यानी 2026 में 1 तोला सोने की कीमत 85000 से लेकर 90000 के लगभग है। इस प्रकार भारी कीमत के लालच में आकर उन्हीं के सहयोगीयों ने उन्हें धोखा दिया और अंत में 6 जून 1924 में उन्हें चिंतपल्ली के जंगलों में गिफ्तार कर लिया गया। इसके बाद एक पेड़ में बांध कर गोली मार कर उनकी हत्या कर दि गयी जिसके बाद से रम्पा विद्रोह भी समाप्त हो गया।

सम्मान और समारक

जवाहर लाल नेहरु
इन्होंने कहा की रामा राजू उन गिने- चुने नायकों में से एक थे जिन्हें उंगलियों पर गिना जा सकता है।

नेता सुबाष चंद्र बोस
उनके याद में उन्होंने यह कहा कि रामा राजूू अपने दृढ़ संकल्प पे अडिग रहे तथा उनक अद्वितीय साहस और बलिदान ने उन्हें  इतिहास में एक उच्च स्थान दिलाया है।

इतिहासकार डेविड अर्नोल्ड अपनी किताब द रिबेलियस हिलमैन के शिर्षक द गुडमैन रम्पा राइजिंग 1939-1924 में एक वृतांत में उ्ल्लेख करते है कि आदिवासी लोग अल्लूरी सिता रामा राजू को हिंदू देवता राम के रुप में देखते थे। जो कि एक ऐसा सम्मान था जो कि उन्होंने एक धार्मिक व्यक्ति होने के बावजूद कभी नही मांगा था। और वर्तमान में साधुओं की स्थिती तो आप देख ही सकते है ज्यादातर लोग काला धन छुपाने के लिए साधू बनते है और प्रचार प्रसार में खुब पैसा खर्च करते हैं।

भारतीय डाक विभाग द्वारा 1986 में उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया गया। इसका साथ ही 4 जूलाई जो कि उनका जन्म दिवस है को पुरे आंध्रा प्रदेश में प्रतिवर्ष राजकीय उत्सव के रुप में मनाया जाता है।

उनके नाम पर जिला खेल प्राधिकरण और आंध्रा क्रिकेट एसोसिएशन के सहयोग से एलुरु में क्रिकेट स्टेडियम का नाम रखा गया 1974 में जिसका पुरा नाम है अल्लूरी सीताराम राजू स्टेडियम।

9 अक्टूबर 2017 में उनकी प्रतिमा को भारत सरकार ने उनके कार्यों को याद रखते हुए भारतीय संसद परिसर में स्थापित करवाया।

2022विशाखापत्तनम में उनके नाम पर अल्लूरी सीताराम राजू जिले का नामकरण किया गया जिसका मुख्यालय पडेरु में स्थित है।

इसके साथ ही 2024 आंध्र प्रदेश सरकार ने भोगापुरम में अल्लूरी सीताराम राजू अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे का नाम रामा राजू के नाम पर रखा गया है जिसे हमें alluri sitarama raju international airport के नाम से जानते है।

निष्कर्ष
अल्लूरी सीताराम राजू केवल ब्रिटिश सरकार के खिलाफ लड़ने वाले स्वतंत्रता सेनानी ही नही थे ब्लकि आदिवासी समाज के अधिकारों और स्वाभिमान के रक्षक भी थे। मान्य वीरुडु यानी जंगल का नायक के रुप में उनका जीवन सिखाता है कि अन्याय के विरुद्ध खड़े होने के लिए दृढ़ इच्छा शक्ति ही सबसे बड़ा हथियार है। मात्र 26 वर्ष की आयु में दिया गया उनका सर्वोच्च बलिदान भारत के इतिहास में सदैव स्वर्ण अक्षरों में अंकित रहेगा और आने वाली पीढ़ीयों को देशभक्ति की प्रेरणा देता रहेगा। 

2026-09-16

वाकटक वंश

oil painting of vakataka dynasty
प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में वाकटक वंश के उदय होने तथा अंत होने के साथ-साथ वाकटक वंश की चार प्रमुख शाखाओं तथा हाल ही के समय में खुदाई के दौरान वाकटक वंश से संबधित साक्ष्यों पर प्रकाश डाला गया है। माना जाता है कि वाकटक वंश का उदय उत्तर के मालवा से लेकर दक्षिण में तुंगभद्रा नदी तक तथा पश्चिम में अरब सागर से लेकर पूर्व में छत्तीसगढ़ के  छोर तक फैला हुआ था। बताया जाता है कि वे गुप्त वंश के समकालीन थे।

परिचय

इतिहासकारों के अनुसार यह भारत का सबसे प्राचीनतम राजवंश था। जिसकी स्थापना विंध्य शक्ति नामक राजा द्वारा 250  से 270 ईसा पूर्व में की गई। हलांकि इस राजा के बारे में ज्यादा जानकारी इतिहासकारों को नहीं मिल पाई है लेकिन कुछ साक्ष्य मिलते है कि जो साबित करते है कि वाकटक वंश की स्थापना विंध्य शक्ति नामक राजा द्वारा ही की गई। अंजता की गुफाओं से  मिले शिलालेखों से यह अनुमान लगाया गया है। साम्राज्य का विस्तार विंध्य शक्ति के बेटे प्रवरसेन के शासन काल से प्रारम्भ होता है।

इतिहासकारों क मतानुसार  प्रवरसेन के शासन काल के बाद वाकटक वंश चार शाखाओं में विभाजित हो गया। खास बात यह है कि इन चार शाखाओं में से सिर्फ दो शाखाओं के ही उचित प्रमाण मिल पाये है जिसके कारण बाकी की दो शाखाओं को सिर्फ पुराणों के संकेतों के आधार पर समझा गया है यानी कोई पुख्ता सबूत अभी नहीं मिल पाया है। पहली शाखा का नाम प्रवरपुर नंदीवर्धन शाखा तथा दूसरी शाखा का  नाम वत्सगुल्म शाखा था।

प्रवरपुर नंदी वर्धन शाखा

यह मुख्य और सबसे शक्तिशाली शाखा थी जिसमें नंदी वर्धन जिसका मुख्य रुप से शासन काल नागपुर और प्रवरपुर में शासन किया था। इस शाखा के प्रमुख शासकों में पृथ्वीषेण प्रथम तथा रुद्रसेन द्वितीय और प्रवरसेन द्वितीय शामिल थे।

रुद्रसेन प्रथम
इस शासक के इतिहास के बारे में ज्यादा साक्ष्य नहीं मिल पायें है हलांकि इनके पिता का नाम गौतमीपुत्र था। इस शासक ने नागपुर से 30 किलो दूर रामटेक पहाड़ी पास नंदीवर्धन से शासन किया। रुद्रसेन प्रथम के शासन काल का अब तक एक मात्र शिला लेख मिल पाया जो चंद्रपुर के देवटेक में मिला है। कुछ इतिहासकार इसे ही रुद्रदेव को ही रुद्रसेन मानते है लेकिन इस बात पर अभी मतभेद है। इस बात  का सम्बन्ध इलाहाबाद स्तंभ शिलालेख से लगाया जाता है जिसपर आर्यवर्त के अन्य शासकों के नाम के साथ ही रुद्रदेव का भी नाम मिलता है।

कुछ इतिहासकार इस बात का विरोध इसलिए करते है क्योंकि रुद्रसेन प्रथम का वध समुद्रगुप्त द्वारा किया गया था अंत अपने पिता की मृत्यु के हत्यारे की बेटी प्रभावती गुप्त को अपनी बहु कैसे स्वीकार करता। इतिहासकारों के अनूसार रुद्रसेन प्रथम के पुत्र पृथ्वीविशेष प्रथम का विवाह गुप्त राजकुमारी हुआ इलाहाबाद के अभिलेख के अनुसार बताते है।

रुद्रसेन द्वितीय

इसका शासन काल 380 से 385 ईसा पूर्व तक का था इस शासक का विवाह गुप्त राजा चंद्रगुप्त द्वितीय जिसका शासन काल 375 से 413 तक का था कि पुत्री प्रभावती गुप्त से हुआ था। इस बात की पुष्टि रामटेक के शिला लेख से होती है। 385 ईसा पूर्व में रुद्रसेन द्वितीय का आकस्मिक निधन हो जाता है जिससे पता चलता है कि उसका शासन काल बहुत छोटा था। इसके बाद प्रभावती गुप्त दो बेटों ने 385 से 405 तक वाकटक वंश का राज संभाला। गुप्त रानी के दोनों बेटों के नाम दिवाकरसेना और दामोदरसेना था।

दामोदरसेना को ही हम प्रवरसेना द्वितीय के नाम से जानते है । इस प्रकार प्रवरसेना द्वितीय ने लगभग 20 वर्षों तक शासन किया। इस समय काल को ज्यादातर इतिहासकार वाकाटक-गुप्त युग के नाम से जानते है क्योंकि इस समय काल में वाकाटक साम्राज्य पर व्यावहारिक रुप से गुप्त साम्राज्य का ही शासन काल था। इस बात की पुष्टि प्रभावती  गुप्त के शिलालेख में उनके पिता देव गुप्त के उल्लेख से मिलता है। कुछ इतिहास कार देव गुप्त को ही चंद्रगुप्त द्वितीय मानते है। लेकिन इस बात का कोई उचित प्रमाण नहीं मिलता है।

बताया जाता है कि प्रवरसेन द्वितीय ने महाराष्ट्री प्राकृत में सेतुबंध की रचना की थी। गहा सत्तासाई के कुछ श्लोकों में उनका जिक्र मिलता है। इसी राजा ने अपनी राजधानी नंदिवर्धन से स्थानांतरित करके प्रवरपुरा को बनाया जो कि इसी राजा स्थापित किया गया एक नया शहर था। इस नई राजधानी में विष्णु अवतार राम को समर्पित एक भव्य मंदिर का भी निर्माण इस राजा द्वारा करवाया गया था। प्रवरसेन द्वितीय के बारे एक खास बात यह भी है कि अब तक वाकटक वंश के संबन्धित 17 ताम्रपत्र प्रवरसेन द्वितीय से ही संबन्धित है।

नरेंद्रसेन
प्रवरसेन द्वितीय के बाद का शासन काल नरेंद्रसेन द्वितीय का था। इस राजा का शासन काल 440 से 460 ईसा पु्र्व तक का था अपने शासन काल के दौरान वाकाटक वंश का साम्राज्य विस्तार मध्य भारत के कुछ राज्यों तक फैल गया था।

पृथ्वीसेन द्वितीय
यह प्रवरपुर नंदी वर्धन शाखा का अंतिम शासक था जिसने अपने पिता नरेंद्रसेन के बाद राजगद्दी को संभाला और 460 ईसा तक शासन किया। इस राजा को विष्णुकुंडिना राजा माधव वर्मा द्वितीय ने पराजित किया था। 480 में राजा की मृत्यु के बाद संभवतः उनके राज्य को वत्सगुलमा शाखा के हरिषेण ने अपने राज्य में मिला लिया होगा।

वत्सगुलमा शाखा

यह शाखा प्रवरसेन प्रथम के दूसरे बेटे सर्वसेना द्वारा बनाई गई थी। राजा सर्वसेना न महाराष्ट्र के वाशिम जिले में वत्सगुलमा को अपनी राजधानी बनाया। यह शाखा सहिद्री पर्वतमाला और गोदावरी नदी के बीच में स्थित थी। इस शाखा के शासकों ने अजंता की कुछ बौद्ध गुफाओं को संरक्षण दिया। इतिहासकारों के मतानुसार अजंता गुफाओं का सम्पूर्ण निर्माण वाकाटक शासकों की वत्सगुलमा शाखा द्वारा किया गया था जिसके साक्ष्य में अजंता गुफाओं का विहंगम दृश्य तथा गुफा संख्या 9 का प्रवेश द्वार आदि को मानते है।

सर्वसेन
इस राजा का शासन काल 330 से 355 ईसा पूर्व का माना जाता है इस राजा ने धर्म महाराज की उपाधि धारण की थी। इस राजा को ज्यादा प्रसिद्ध प्राकृत भाषा के हरिविजय के लेख से मिली थी। जो कृ्ष्ण द्वारा स्वर्ग से पारिजात वृक्ष लाने की कथा पर आधारित थी। वर्तमान समय में यह रचना विलुप्त हो चुकी है हलांकि सर्वसेन के समय काल के बाद के रचना कारों ने इसे सराहा था।

विंध्यसेन

सर्वसेन के शासन काल के समाप्त  होने के बाद उसके बेटे विंध्यसेन ने शासन किया। इस राजा का शासन काल 355 से 400 ईसा पूर्व का माना जाता है इसका दूसरा नाम विंध्यशक्ति द्वितीय था। इसकी प्रसिद्ध वाशिम शिलालेखों से मिलती है जिसमें राजा के 37वं वर्ष में नंदीकाता जिसे हम वर्तमान समय में नांदेढ़ के नाम से जानते है नामक गांव के अनुदान का उल्लेख मिलता है। खास बात यह है कि यह किसी वाकटक शासक द्वारा किया गया पहला ज्ञात अनुदान था। इस अनुदान की वंशावली संस्कृत और प्राकृत भाषा में लिखी गई है। विंध्यसेना ने अपने दक्षिणी पड़ोसी कुंतल के शासक को परास्त किया।  इतिहासकारों के अनुसार इस राजा के मंत्री का नाम प्रवरा था।

प्रवरसेन
राजा विंध्यसेन की मृत्यु के बाद उसका बेटा प्रवरसेन द्वितीय गद्दी पर बैठा जिसने लगभग 400 से 415 तक शासन किया। जिसके बारे में अजंता की गुफा सोलह के शिलालेख के अलावा बहुत कम जानकारी है जिसमें बताया गया है कि प्रवरसेन ने अपने परोपकारी तथा उदारवादी एवं शक्तिशाली प्रशासन व्यावस्था के चलते उच्च पद प्राप्त किए। हलांकि इस राजा का शासन काल बहुत छोटा था। प्रवरसेन की मृत्यु के बाद उसका  बेटा जो कि मात्र 8 वर्ष का था राजगद्दी पर बैठा जिसे देवसेन का नाम से जाना गया। अंजता गुफाओं से इस शासक के साक्ष्य लुप्त हो चुकें है।

सभ्याता और संस्कृति

वाकटक शासक हिंदू धर्म को मानते थे तथा शैव संप्रदाय का पालन करते थे। वहीं गुप्त वंश वैष्णव धर्म संप्रदाय का अनुपालन करते थे। इसका प्रमाण हमें रामटेक में पाए गए वैष्णव संप्रदाय से जुड़े कई धार्मिक ढ़ाचे पाये गए जो कि रानी प्रभावती के शासन काल में बनवाये गए थे। जबकि रानी प्रभावती का विवाह वाकटक वंश में हुआ था जो कि शैव संप्रदाय को मानता था। इस प्रकार हम कह सकते  है कि रानी को शासीका के रुप में प्राप्त शक्तियों ने उसे अपने आराध्य यानी विष्णु देव की पुजा करने का अधिकार प्रदान किया।

शोधकर्ताओं के अनुसार महाराष्ट्र में नरसिंह की पूजा करने की प्रथा रामटेक से ही निकली थी साध ही महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में वैष्णव प्रथाओं के प्रचार रानी प्रभावती की महत्वपूर्ण भूमिका थी। इस रानी वाकटक  वंश  की राजगद्दी पर लगभग 10 वर्षों तक शासन किया।

खुदाई के दौरान इन क्षेत्रों से एक पूजा स्थल एक लोहे की छेनी हिरण के  चित्रण वाला एक पत्थर और टेराकोटा की चूड़ियों के साथ ही भगवान गणेश की अखंड मूर्ति जिसमें अलंकारों से सजाया नहीं गया था मिली है। जो इस बात को प्रमाणित करते है कि उस समय काल के दौरान भगवान गणेश की भी पूजा की जाती थी।

वर्तमान खोज


हाल ही में वर्ष 2015 से 2018  के बीच समय काल के दौरान नागपुर के करीब रामटेक तालुका में खुदाई की गयी। इस खुदाई के दौरान तीसरी और पाँचवीं शताब्दी के दौरान इस क्षेत्र पर शासन करने वाले वाकटक वंश के जीवन धर्म तथा व्यापार के विषय में जानकारी मिली है। यहां नागपुर  के  गांव नागार्धन का में यह खुदाई की गई थी जो कि रामटेक तालुका से 6 किलोमीटर दूर लगभग एक से डेढ़ किलोमीटर के क्षेत्र में पुरातात्विक अवशेष पाये गए हैं।

खोजकर्ताओं द्वारा बताया गया है कि मौजूदा नागार्धन गांव प्राचीन बस्ती य गांव के स्थान पर ही स्थित है। इसी क्षेत्र में नदी किनारे कोटेश्वर मंदिर स्थित है और नागार्धन किला गांव के दक्षिण में स्थित है । बताया जा रहा है कि इस किले का निर्माण गोंड राजा के समय काल में हुआ था। अठारहवीं शताब्दी में इस किले का नवीनीकरण भोसलों द्वारा करवाया गया। किले के आसपास के क्षेत्र में वर्तमान समय में खेती जी जाती है वहीं पर ये पुरातात्विक अवशेष मिले है।

अभी तक वाकटक वंश के बारे में जो भी जानकारी प्राप्त थी वे महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र से सम्बन्धित थी जो कि कुछ साहित्यिक रचनाओं और ताम्र पत्रों से मिली थी। अभी तक यही माना जाता था कि नागार्धन गांव वाकटक वंश की पूर्वी शाखा नंदीवर्धन की राजधानी थी। मगर उचित प्रमाण नहीं मिल रहे थे। लेकिन इन पुरातत्विक साक्ष्यों के मिलने से इस बात को बल मिला है कि शायद यह सच में पूर्वी शाखा की राजधानी थी।
खुदाई के दौरान वाकटक शासकों के जीवन के विषय अधिक जानकारी मिल पायी है कि वे किस राजवंश से जुड़ाव रखते थे तथा उनके महलों को बनाने का प्रकार  क्या था इसके साथ ही शासकों के शासन काल के दौरान जारी किए गए सिक्कों और मुहरों के बारे में तथा उनके व्यापारिक क्षेत्रों के बारे में जानकारी मिली है।

धर्म 

वाकटक वंश के शासक ब्राह्मण धर्म के पक्षधर थे
इन्होंने ब्राह्मणों को खूब भूमि अनुदान दिये थे। सांस्कृतिक महत्व की बात करें तो ब्राह्मण धर्म को आदर्शों और सामाजिक संस्थाओं की दक्षिण की ओर बढ़ाने में इनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

खोज खास क्यों है

यह पहली बार हुआ है जब नागार्धन में खुदाई के दौरान मिट्टी की मुहरें मिली हैं। बताया जा रहा है कि यह अंडाकार मुहरें प्रभातगुप्त की रानी के समय काल की है। इन मुहरों पर शंख के चित्रण के साथ ब्राह्मी लिपि में रानी का नाम मुद्रित है। मुहर का वज़न लगभग 6.40 ग्राम बताया गया है। इतिहासकारों द्वारा बताया गया है कि यह मुहरें 1500 वर्ष पुरानी है तथा इनकी माप प्रति मुहर 35.71 mm 24.20mm और मोटाई 9.50mm है। मोहर पर मुद्रित शंख के विषय में इतिहासकारों ने इसे वैष्णव सम्प्रदाय से संबन्धित बताया है।

इन मोहरों का प्रयोग राजधानी में जारी शाही अनुमति के रुप में किया गया होगा। इसके अलावा इन संकेतों का उपयोग उन दस्तावेजों पर किया गया होगा जिनके लिए शाही अनुमति अनिवार्य होती होगी। यह सब बाते इस बात कि ओर इशारा करती है की रानी प्रभावती वास्तव में एक शक्तिशाली महिला शासिका रही होगी।.

2026-09-10

करा कोटा साम्राज्य

illustration of karkota dynasty

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम कश्मीर के कार कोटा साम्राज्य के इतिहास तथा इसके शासकों द्वारा किए गए महत्वपूर्ण कार्यों पर चर्चा की गई है। इसके साथ ही भारत का अलेक्जेंडर कहे जाने वाले कश्मीरी राजा के द्वारा किए गए कार्यों पर प्रकाश डालेंगे तथा ये जानने की कोशिश करेंगे की अखीर क्यों उसे अलेक्डेंडर कहा गया। इसके साथ ही हम कारा कोटा साम्राज्य की शासन व्यवस्था प्रशासनिक व्यवस्था तथा व्यापारिक क्षेत्रों के बारे में चर्चा करेंगे।

परिचय

कार कोटा वंश के संस्थापना  दुर्लभ वर्धन ने 625 ई. में की थी। करा कोटा राजवंश का शासन कश्मीर में लगभग 625 ई.से 855 ई.तक रहा। अपने प्रारंभिक मध्य कालीन समय काल में यह राजवंश कश्मीर के सबसे प्रभावशाली राजवंशों में से एक था। इस राजवंश के प्रमुख शासकों में अगर देखा जाए तो दुर्लभ वर्धन तथा ललितादित्य ने अपने शासन काल में मध्य एशिया चीन उत्तरी भारत के साथ मजबूत राजनीतिक संबंध विकसित किए। 

करा कोटा राजवंश भारतीय उप महाद्वीप में कश्मीरी पहचान बौद्धिक परंपराओं वास्तुकला और क्षेत्रीय शक्ति के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इतिहास कारों के अनुसार करा कोटा राजवंश ने 7वीं से 9वीं शताब्दी के समय काल तक कश्मीर घाटी और इसके आसपास के उत्तरी क्षेत्रों पर शासन किया जो कि कश्मीरी राजनीतिक शक्ति और  सांस्कृतिक उपलब्धियों का स्वर्ण युग कहा जाता है।

पूर्व के राजवंशों के कमजोर पड़ने के बाद कार कोटा राजवंश ने अपने क्षेत्र विस्तार का कार्य प्रारम्भ किया धीरे-धीरे उत्तरी भारत और मध्य एशिया में अपना विस्तार किया। प्रशासकों ने प्रशासन व्यापार और कृषि को मजबूत किया जिससे इनके क्षेत्र में समृद्धि आनी प्रारम्भ हुई। राजवंश के प्रमुख शासकों में ललितादित्य मु्क्तापीड़ा मुख्य रुप से लिया जाता है क्योंकि इसी राजा ने एक विशाल साम्राज्य का  निर्माण करने में मुख्य भूमिका निभाई।
 

प्रमुख शासक

दुर्लभ वर्धन इनका शासन काल 625 से 665 ई. तक था इन्हें करा कोटा वंश के संस्थापक के रुप में जाना जाता है। अपने शासन काल में इन्होंने प्रशासन को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाई और साम्राज्य के विस्तार और समृद्धि में अहम भूमिका निभाई।

दुर्लभक
इन्हें दुर्लभ वर्धन द्वितीय के तथा प्रताप दित्य के नाम से जाना जाता है इनकी पत्नी का नाम रानी प्रकाश देवी था जिन्हें नरेंद्र प्रभा के नाम से भी जाना जाता है। अपने शासन काल में इन्होंने व्यापार कृषि और कलात्मक विकास पर जोर दिया। इनके तीन पुत्र हुए जिनके नाम चन्द्र पीड़ा तारा पीड़ा और ललिता दित्य था। अपने पिता के बाद चन्द्र पीड़ा जो की सबसे बड़े भाई थे गद्दी पर बैठे।

चन्द्र पीड़ा
इनका शासन काल 712 ई. से 720 तक ही रहा वे चीन के तांग राजवंश के साथ कूटनीति के लिए जाने जाते है। राज्य पर अरब आक्रमणों के दौरान चीन से सहायता मांगी और मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित किए।

तारा पीड़ा
यह चन्द्र पीड़ा का छोटा तथा मझला भाई था इस राजा के समय काल में राज्य में ग्रह युद्ध छिड़ गया जिसके कारण इनका शासन काल ज्यादा समय तक नहीं चल पाया। साहित्यिक अभिलेखों के अनुसार वह एक क्रूर शासक था इसने अपने शासन काल में कुछ ऐसी नीतियां को अपनाया जिसके चलते समाज के कुछ वर्ग आक्रोशित हो उठे और उनसे अलग हो उठे।

भारत का अलेक्जेंडर किसे कहा जाता है।

ललिता दित्य
इस शासक का शासन काल 724 से 760 ई. तक का था। इसे राज्य के महानतम शासकों में से एक माना जाता था जिसने महत्वकांक्षी सैन्य अभियानों के माध्यम से उत्तरी भारत अफगानिस्तान और मध्य एशिया में कश्मीर के प्रभाव का विस्तार किया। अपने साम्राज्य विस्तार के महत्वपूर्ण कार्यों के चलते ही इसे भारत का सिकंदर कहा जाता है।

कन्नौज पर अधिकार
ललिता दित्य ने कन्नौज के राजा यशो वर्मन को हराया और उत्तर भारत में अपना वर्चस्व स्थापित किया। इसके साथ ही इसने विदेशी आक्रमणकारियों को खदेड़ा राजा ने तिब्बत सेना को लद्दाख तथा सिंधु क्षेत्र से पीछे तक खदेड़ा तथा अरब आक्रमणकारी मुहम्मद बिन कासिम को भारत में प्रवेश करने से रोका। इस राजा का प्रभाव  पूर्व में बंगाल दक्षिण में कोंकण तथा उत्तर में मध्य एशिया यानी तुर्किस्तान तक देखने को मिलता है इसके साथ ही इनका प्रशासन उत्तर-पश्चिम में पंजाब तथा काबुल तक फैला हुआ था।

निर्माण कार्य 

मार्तंड सूर्य मंदिर का निर्माण
ललिता दित्य द्वारा निर्मित कराया गया यह मंदिर अनंत नाग में स्थित है जो कि कश्मीरी वास्तुकला की उत्कृष्ट कृति माना जाता है। इस मंदिर में ग्रीक रोमन और भारतीय वास्तुकला शैलियों का अनूठा संगम देखने को मिलता है।

पारी हास पुरी
ललिता दित्य ने श्री नगर के पास पारीहास पुरी को अपनी नई भव्य राजधानी बनाया। यहां पर राजा ने बौद्ध विहार और हिंदू मंदिरों का निर्माण करवाया।

ऐतिहासिक साक्ष्य
12वीं सदी के विद्वान कल्हण की प्रसिद्ध रचना राजतंरगिणी ललिता दित्य के जीवन तथा विजयों और कश्मीर के स्वर्ण काल का विस्तृत ऐतिहासिक वर्णन मिलता है। लगभग 36 वर्षों तक शासन करने के बाद उत्तर-पश्चिम पर्वतीय क्षेत्रों जो कि मध्य एशिया का हिस्सा था के एक सैन्य अभियान के दौरान इनका निधन हो गया।

कुवल यापिड़ा
राजा ललिता दित्य के बाद यह राजगद्दी पर बैठा मगर आंतरिक संघर्षों के कारण इस राजा ने अपना सिंहासन त्याग दिया और कथित तोर पर धार्मिक जीवन बिताया। इसके बाद वज्रादित्य ने गद्दी संभाली इस राजा का शासन काल 760 से 770 ई. तक रहा। इस राजा के शासन काल में राजनीतिक अस्थिरता तथा पड़ोसी देशों के आक्रमण देखने को मिले। कश्मीरी शासकों के ऐतिहासिक साक्ष्यों में यह विवादास्पद शासकों की सूची में आता है।

राजा वज्रादित्य के निधन के बाद गद्दी पर जय पीड़ा का शासन प्रारम्भ होता है जिसने आठवीं शताब्दी के आगे तक के समय काल तक शासन किया। इसने अपने सैन्य अभियानों के साथ ही साहित्य संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। राजा जय पीड़ा के दरबार में विभिन्न क्षेत्रों के विद्वान कवि और दार्शनिक आते थे। साम्राज्य के अंतिम चरण में ललित पीड़ा संग्राम पीड़ा द्वितीय और चिप्पत जयपीड़ा जैसे शासकों ने शासन किया। जिनका शासन काल कुछ खास नहीं था इन राजाओं के समय काल में राजनीतिक विखंडन होना प्रारम्भ हो गया था और प्रशासन कमजोर पड़ने लगा था।

धार्मिक विविधता

करा कोटा साम्राज्य के शासक मुख्य रुप से हिंदू धर्म को मानते थे जिनमें वे शैव तथा वैष्णव धर्म को मुख्य रुप से मानते थे इसके अलावा उन्होंने बौद्ध धर्म को भी संरक्षण प्रदान किया। परिणामस्वरूप उन्होंने हिंदू मंदिरों के साथ-साथ बौद्ध मठों स्तूप और विहारों का भी निर्माण करवाया। जो कि उनके विभिन्न धार्मिक परंपराओं क अस्तित्व को दर्शाता है। इसके साथ ही उन्होंने मध्य एशिया और पूर्वी एशिया में बौद्ध शिक्षाओं के प्रसार में भी मदद की जिसके चलते अंतर क्षेत्रीय बौद्धिक आदान-प्रदान सरल हुआ।

संस्कृत विद्वत्ता एवं सांस्कृतिक प्रथाएं
कश्मीर के इन शासकों के माध्यम से कश्मीर संस्कृत अध्ययन के एक महत्वपूर्ण केंद्र के रुप में उभरा इसके अलावा वे दर्शनशास्त्र व्याकरण काव्य शास्त्र और धर्म शास्त्र का अध्ययन किया करते थे। इसके साथ ही सांस्कृतिक प्रथाओं में नाटक प्रदर्शन नाटकीय कलाओं का कुलीन वर्गों में लोकप्रिय थीं। कश्मीर के साहित्यिक ग्रंथों में संगठित नाट्यशाला और सांस्कृतिक समारोह का उल्लेख मिलता है।

खास बात यह है कि इस काल में देवदासी प्रथा तथा सती प्रथा जैसी कुरीतियां भी इनके शासन में विद्यमान थी जो कि दर्शाती है कि मध्यकालीन भारत में प्रचलित प्रथाओं का प्रभाव उन पर भी था।

साम्राज्य के पतन होने के मुख्य कारण

आतंरिक संघर्ष
साम्राज्य में गद्दी को लेकर आंतरिक संघर्ष होने अधिक हो गए थे जिनका मुख्य कारण वंश अनुगत प्रथा थी। जिसके चलते काबिल शासकों को नजर अंदाज किया जाता था। वहीं गद्दी के लालच में भी अन्य राजा गण राजनीतिक षड्यंत्र रचने लग पड़ें थे जिसके कारण साम्राज्य के लोग एक दूसरे के ही खून के प्यासे हो गए। अंत उपरोक्त कारणों का लाभ उठाते हुए बाहरी सीमा के राज्यों ने साम्राज्य पर हमला किया और इन्हें हरा कर अपने साम्राज्य में मिला लिया।

आव्यावस्था
कुछ ऐसे शासकों का भी शासन आया जिन्होंने जनता के हितों को नजर अंदाज किया जिसके चलते साम्राज्य में राज द्रोह करने वाले लोगों की संख्या में विस्तार हुआ और जिन्होंने आंतरिक खबरों को पड़ोसी साम्राज्य य दुश्मन शासकों तक पहुंचाया जिसके कारण यह भी साम्राज्य के पतन का मुख्य कारण रहा। इन शासकों की सूची में वज्रादित्य तथा तारा पीदा का नाम मुख्य रुप से लिया जा सकता है।

शाही नियंत्रण में गिरावट
राजा के गलत फैसले लेने के कारण दरबार में दरबारी गुटों तथा प्रभावशाली मंत्रियों का राजनीतिक निर्णयों पर नियन्त्रण बढ़ता गया जिसके चलते राजा का प्रभाव प्रजा पर कम होता गया। अतः केंद्रीय सरकार द्वारा राजनीतिक नियंत्रण खो देने के कारण बाहरी क्षेत्रों ने स्वतंत्रता का दावा कर दिया।

राजनीतिक विखंडन
अपने बात के पहले रखने तथा राजा की गलत नीतियों के द्वारा जन्म राजनीतिक विखंडन के गुटों ने कठपुतली शासकों को गद्दी पर बिठाया जिसके चलते नेतृत्व में तेजी से बदलाव होने प्रारम्भ हुए और शासन में अस्थिरता ने जन्म लिया। जो कि साम्राज्य के पतन का मुख्य कारक के रुप में उभरा।

2026-09-08

भारत विभाजन 1947

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प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में भारत देश के बंटवारे के पीछे के कारण के साथ-साथ उन घटनाओं पर प्रकाश डालेंगे जो इस बटवारे के दौरान हुई। इसके साथ ही हम मोहम्मद अली जिन्ना तथा नेता जवाहर लाल नेहरु़ के मध्य के आपसी मतभेद पर प्रकाश डालेंगे। यह जानना इसलिए भी जरूरी क्योंकि दोनों ही कांग्रेस पार्टी को सदस्य थे जो की आजादी के बाद भारत और पाकिस्तान  के प्रधान मंत्री बने।

प्रत्यक्ष ब्रिटिश शासन

भारत में प्रत्यक्ष ब्रिटिश शासन 1857 की क्रांति के बाद से शुरु हुआ। इससे पहले भारत में ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी का शासन था जो कि भारत में व्यापार करने आयी थी लेकिन धिरे-धिरे इसने भारत पर शासन करना प्रारम्भ कर दिया। हलांकि भारत में प्रत्यक्ष ब्रिटिश शासन का भी विरोध हुआ क्योंकि इनका मुख्य लक्ष्य ब्रिटिश साम्राज्य वादी हितों की रक्षा करना था। ये ठीक उसी प्रकार था जैसे चोर के भाई से चोरी न करने को कहना।

यानी कहने का मतलब यह था है कि भले इस समय ब्रिटिश क्राऊन का शासन था मगर थे तो वे भी ब्रिटिश ही सो ऐसे में भारत में आज़ादी के लिए विद्रोह होना जारी रहा। आगे के कई वर्षों तक लगातार होते अत्याचारों और अन्याय ने स्वतंत्रता आंदोलन को और दृढ़ बनाया। 1920 के दशक तक असहयोग सविनय अवज्ञा आंदोलन के कार्यक्रमों ने अंग्रेजों पर भारत को स्वतंत्र करने के लिए दबाव बनाया। इसी क्रम में 1930 में जवाहर लाल नेहरु के  नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई।

1930 तक कई भारतीय मुसलमानों ने भी अपनी स्वतंत्रता के लिए हिंदु बहुल क्षेत्र से अलग स्वतंत्र राज्य की मांग करना प्रारम्भ कर दिया यह मामला मोहम्मद अली जिन्ना तक पहुंचा। खास बात यह है कि मोहम्मद अली जिन्ना और आगा खान जैसे मुस्लिम के कई महत्वपूर्ण नेता सभी भारतीय प्रांतों के एक संघ की परिकल्पना करते थे। दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी पर आरोप लगता रहा कि की कांग्रेस पार्टी का नेतृत्व हिन्दू समुदाय के प्रति अधिक है। मोहम्मद अली जिन्ना को लगा की कांग्रेस इस विवाद पर ज़रुर सफाई देगी मगर ऐसा हुआ नहीं।

दूसरी तरफ मुस्लिम समुदाय  के नेता होने के नाते मुस्लिम लीग ने 1939 के दौरान प्रकाशित रिपोर्ट के दस्तावेजी करण में यह पाया  कि कांग्रेस सरकार मुस्लिम मांगो व नौकरियों के लिए संवेदनशील नहीं है। इसके साथ ही लीग ने यह भी दावा किया की मुस्लिम मामलों की शिकायत निवारण में हिंदू बहु संख्यकों के प्रति पक्षपात दिखाया जा रहा है।

मुस्लिम लीग की पहली बैठक

वायसराय लार्ड लिनलिथगो जिनका शासन काल 1936 से 1943 तक का था द्वारा यह घोषणा की गई कि द्वितीय विश्व में जर्मनी के विरुध्द वे युद्ध में शामिल हो रहे है। जनता को जर्मनी के साथ युद्ध की सूचना दिए जाने के बाद विभाजन का मांग और बढ़ गई। हिंदू-मुस्लिम समुदाय दो गुटों में बट गये इस बहस को लेकर की युद्ध में शामिल हुआ जाए की नहीं। इसी बीच 1940 में उस समय काल पंजाब की राजधानी लाहौर में मुस्लिम लीग की पहली बैठक हुई जिसे लाहौर प्रस्ताव के नाम से जाना जाता है।

इसी प्रस्ताव को आगे चलकर पाकिस्तान प्रस्ताव के नाम जाना गया। लीग के प्रतिनिधियों द्वारा पारित किया गया की भारत की यह समस्या अंतर-सामुदायिक नहीं बल्कि स्पष्ट रुप से अंतर्राष्ट्रीय प्रवृत्ति की है। इस प्रकार लीग ने संकल्प लिया की अंग्रेजों द्वारा भारत के लिए प्रस्तावित कोई भी संवैधानिक योजना मुसलमानों को स्वीकार्य नहीं होगी जब तक की भारत का बंटवारा नहीं किया जाएगा। मुस्लिम लीग उत्तर-पश्चिम और पूर्वी क्षेत्रों को मुस्लिम बहुसंख्यक क्षेत्र के रुप में स्वतंत्र राज्य बनाना चाहते थे।

1942 में जब कांग्रेस पार्टी ने तत्काल प्रभाव से स्वतंत्रता और अंग्रेजों की वापसी की मांग रखते हुए भारत छोड़ो आंदोलन को शुरु किया तो मुस्लिम लीग तथा कांग्रेस की दरारें और भी गहरी हो गई क्योंकि मुस्लिम लीग का मानना था की तत्काल स्वतंत्रता से मुसलमानों को स्वायत्त-ता नहीं मिल पाएगी।

भारत स्वतंत्रता अधिनियम 1947

मार्च 1947 में लुई माउंटबेटन ब्रिटिश साम्राज्य क अंतिम वायसराय भारत आयें तथा भारत देश क उपनिवेशी का कार्य भार अपने हाथों में लिया। आदर्श रुप से सत्ता का हस्तांतरण एक भारतीय सरकार को करना था। ब्रिटिश राज को पूर्ण रुप से समाप्त करने के लिए उन्हें व्यापक स्वतंत्रता दी गई थी। माउंबेटन को जल्द ही यह बात समझ आ गयी की मुस्लिम लीग तथा कांग्रेस पार्टी के बीच का मतभेद तत्कालीन समय में सुलझाने योग्य नहीं था। अतः भारतीय सैनिकों के बीच बिद्रोह व ग्रहयुद्ध छिड़ने के वास्तविक खतरों को निपटाने के लिए तत्काल की किसी फैसले को लेना जरूरी थी।

इस प्रकार माउंबेटन ने भारत विभाजन योजना की घोषणा 3 जून 1947 को करी। इसके साथ ही ब्रिटेन की संसद ने 18 जुलाई 1947 को भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम को पारित किया गया। जिसमें आदेश दिया गया कि भारत और पाकिस्तान के उपनिलेशों का सीमांकन 15-15 अगस्त 1947 को मध्यरात्रि तक कर लिया जाए तथा संपत्तियों का विभाजन एक महीने के भीतर कर दिया जाए।

समय सीमा से पहले माउंटबेटन द्वारा नियुक्त सीमा और आयोग ने पंजाब और बंगाल को इस तरह विभाजित करने के लिए जी-तोड़ प्रयास किया। इसके तहत यह प्रयास किया गया की अधिक संभावित मुस्लिम आबादी पंजाब के नई सीमा के पश्चिम में और बंगाल की सीमा के पूर्व में रह जाए। बताते चलें कि इस आयोग के चार सदस्य मुस्लिम लीग पार्टी से थे और चार सदस्य कांग्रेस पार्टी से थे जिसकी अध्यक्षता सिरिल रेडक्लिफ द्वारा की गई। जो इससे पहले कभी भारत नहीं आये थे। 

अतः पार्टीयों के बीच मतभेद और समय सीमा के समीप आने के कारण रेडक्लिफ ने ही सीमाओं का निर्धारण किया। जिसे रेडक्लिफ रखा के नाम से जाना जाता है जो किसी भी पक्ष को संतुष्ट नहीं कर पायी और लोगों को आक्रोशित किया। इस आयोग के चलते पंजाब की विशाल सिख आबादी को लगभग दो भागों में विभाजित कर दिया गया।

यद्यपि आयोग ने सिखों के सबसे प्रसिद्ध शहर को भारतीयों को अधीन कर दिया था मगर सिख तीर्थ स्थल और जागीरें को पाकिस्तान के हलालें कर दिया। पश्चिमी पंजाब के कुछ सिखों ने शुरुआत में स्थानीय मुसलमानों को बाहर निकालने के प्रयास किए और जागीरों पर नियंत्रण बनाये रखने की कोशिश की मगर उनके प्रयासों का हिंसक रुप से विरोध किया गया।

अंत में भाग कर सिख समुदाय भारतीय क्षेत्र में आये इस प्रकार से भारत देश का विभाजन 14 और 15 अगस्त को संपन्न हुआ। लार्ड माउंटबेटन 14 अगस्त को पाकिस्तान आजादी समारोह में तथा 15 अगस्त को भारत आजादी को समारोह में शामिल रहे। इस प्रकार से 15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश राज का औपचारिक रुप से अंत हुआ। खास बात यह है कि 17 अगस्त तक दोनों देशों की सीमाएँ प्रकाशित नहीं की गई थीं।

नेहरु और जिन्ना के बीच विवाद का कारण

राष्ट्रीय पहचान
नेहरु चाहते थे कि चाहते थे कि धर्मनिरपेक्ष और एकीकृत भारत का निर्माण हो वहीं जिन्ना चाहते थे कि दो राष्ट्रों का निर्माण हो एक हिंदूस्तान और दुसरा पाकिस्तान।

सत्ता का ढांचा
जवाहर लाल नेंहरु चाहते थे कि मजबूत केंद्र सरकार का निर्माण हो ताकि देश का आधुनिक विकस हर क्षेत्र में एक साथ हो सके नियमों को सब के लिए एक जगह से पारित किया जाएं वही जिन्ना चाहते थे कि केंद्र मजबूत न हो सभी प्रांतों को अधिकतम स्वायत्त निर्णय लेने का अधिकार  मिले।

प्रतिनिधित्व
कांग्रेस पार्टी सभी धर्मों और समुदाय का प्रतिनिधित्व करती थी वहीं मुस्लिम लीग सिर्फ मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करती थी जो भी विवाद का एक मुख्य कारण रहा।

2026-09-07

सुभास चंद्र बोस

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प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में देश के महान नेता तथा आज़ाद हिंद फौज के संस्थापक एवं तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा का नारा देने वाले महान क्रांतिकारी नेता सुभाष चंद्र बोस के बारे में चर्चा करेंगे। इसके साथ उनके द्वारा किए गए महत्वपूर्ण कार्य तथा उनके पूरे जीवन पर प्रकाश डालेंगे।

परिचय

उनका जन्म 23 जनवरी 1897 में कटक में बंगाली परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम प्रभाबती बोस दत्त और मां का नाम जानकीनाथ बोस था। वे कुल 13 भाई बहन थे में 9 सुभाष जी थे। कटक वर्तमान समय में उड़ीसा राज्य का हिस्सा है मगर 1897 के समय काल में यह ब्रिटिश भारत के बंगाल प्रेसीडेंसी का हिस्सा था। अपनी माता को प्यार से सुभाष चंद्र बोस मां जननी कहते थे। उनके पिता जानकीनाथ जी एक सफल सरकारी वकील थे जो कि ब्रिटिश भारत सरकार के प्रति वफादार और भाषा और कानून के अच्छे जानकार थे।

अपने दम पर सब कुछ हासिल करने की क्षमता रखने वाले उनके पिता ग्रामीण क्षेत्र से आते थे मगर शहर में अपने दम पर उन्होंने अपना घर बनाया था। अंत ग्रामीण क्षेत्र से आने के कारण जानकीनाथ जी अपनी जड़ों से जुड़े रहते थे। समय-समय पर छुट्टियां मिलने पर अपने गांव जाया करते थे।

शिक्षा

अपने 5 बड़े भाइयों के साथ सुभाष जी को जनवरी 1902 में कटक के बैपटिस्ट मिशन के प्रोटेस्टेंट यूरोपीय स्कूल में पढ़ने के लिए भेजा गया। स्कूल इंग्लिश माध्यम का था जहां हिन्दी को छोड़ सभी भाषाओं को पढ़ाया जाता था। खास बात यह थी कि स्कूल का चुनाव उनके पिता जी ने किया था वे चाहते थे कि उनके बेटे त्रुटि हीन क्रमबद्ध तरीके से अंग्रेज़ी बोलना सीखें। क्योंकि स्कूल में कोई भी भारतीय भाषा नहीं पढ़ाई जाती थी जिसके कारण भारत में अंग्रेज़ों तक पहुंचने के लिए अंग्रेजी बोलना सीखना जरूरी था।

इसके बाद 1909 में जब सुभाष 12 वर्ष के थे तब उनका दाखिला कटक के रेवेनशां कालेजिएट में हुआ। इस स्कूल में बंगाली और संस्कृत के साथ वेदों और उपनिषदों जैसे हिंदू धार्मिक ग्रंथों के ऐसे विचार भी पढ़ाए जाते थे जो कि खास तौर पर घर नहीं सिखाए जाते थे। पढ़ाई के दौरान वे अपनी मां को लंबे-लंबे पत्र लिखा करते थे जिसमें वे बंगाली रहस्यवादी रामकृष्ण परमहंस और उनके शिष्य स्वामी विवेकानंद के विचारों और बंकिम चंद्र चटर्जी के उपन्यास आनंद मठ से अपनी मां का परिचय कराते थे।

1912 में कलकत्ता विश्वविद्यालय के तत्वाधान में आयोजित मैट्रिक परीक्षा में दूसरा स्थान प्राप्त किया। 1913 में सुभाष अपने पांच भाइयों के साथ प्रेसिडंसी कालेज कलकत्ता गए जो बंगाल के सम्मानित कालेजों में से एक था। यहां उन्होंने दर्शन शास्त्र का अध्ययन किया जिसमें कांट हेगेल बर्गसन और अन्य पश्चिमी दार्शिन ग्रंथ को पढ़ा। 1914  में अपने धार्मिक गुरु की तलाश में घर से भाग गए थे जिसमें उन्होंने उत्तर कि यात्रा की मगर उन्हें अपने गुरु नहीं मिल पाये। हाल फिलहाल थक हार कर वे घर वापिस लौट आयें।

प्रोफेसर ई एफ ओटेन की घटना

फरवरी 1916 में उनका दाखिला प्रेसिडेंसी कालेज में हुआ जहां से उन्हें प्रोफेसर ई एफ ओटेन के पिटने के कारण निकाल दिया गया । इस घटना के दौरान छात्रों ने दावा किया कि घटना से पहले ओटेन ने भारतीय संस्कृति के बारे में अभद्र टिप्पणीयां करी थी जिसके दौरान उन्होंने कुछ छात्रों का धक्का दिया था। इस घटना के कुछ दिन बाद छात्रों ने प्रोफेसर को सीढ़ियों पर घेर लिया और उन्हें चप्पलों से पिटा और भाग गए। हलांकि घटना के दौरान प्रोफेसर ने उन्हें नहीं देखा था मगर कुछ छात्रों के बयान देने पर उन्हें कालेज से निकाल दिया गया।

परिवार के गुजारिश करने पर कलकत्ता विश्वविद्यालय क सिंडिकेट ने उन्हें वापिस लौटने दिया मगर दूसरे कालेज में इस प्रकार सुभाष जी का दाखिला स्काटिश चर्च कालेज में हुआ और इस प्रकार 1918 में दर्शनशास्त्र में प्रथम श्रेणी से बी.ए. की परीक्षा पास की और उपाधि धारण की। अपने पिता के आग्रह पर बोस साहब लंदन गए ICS की परीक्षा की तैयारी के लिए जिसे वर्तमान समय में IAS के नाम से जाना जाता है। इससे पहले बोस कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय क किसी कलेज में प्रवेश पाना चाहते थे।

मगर प्रवेश का समय समाप्त हो गया था जिसके चलते बोस ने कुछ भारतीय छात्रों और गैर कालेजिएट छात्रों की मदद से बोर्ड से सहायता करने को कहा। इस प्रकार बोर्ड में बिना औपचारिक प्रवेश के बोस को किफायती लागत पर शिक्षा देना प्रारम्भ कर दिया। बोस साहब ने 19 नवंबर 1919 तो विश्वविद्यालय में औपचारिक रुप से अपना नाम दर्ज करवाया। 1920 में आई सी एस की पहली प्रतियोगी परीक्षा को पास किया चौथे स्थान पर आकर मगर ऐतिहासिक फैसला लेते हुए अपनी आगे की परीक्षा नहीं दी।

राजनीतिक कार्य

अपनी शिक्षा पूर्ण करने के बाद सुभाष 16 जुलाई 1921 को सुबह और मुंबई पहुंचे और महात्मा गांधी से मिलने के प्रयासों में जूट गए इस समय 51 वर्षीय गांधी जी असहयोग आंदोलन में जुटे हुए थे और संयोग से गांधी जी मुंबई में ही थे और दोपहर के समय गांधी जी बोस से मिलने के लिए सहमत हो गये। ये मुलाकात कुछ नहीं रही क्योंकि बोस का मानना था कि गांधी जी के जवाब स्पष्ट थे उनके तथा गांधी जी के बीच साधनों को लेकर मतभेद था।

इसके बाद बंगाल में गांधी जी  ने बोस को राष्ट्रवाद  के नेता सी आर दास से मुलाकात करवाई। जो कि गांधी जी की तुलना में अधिक लचीले थे। दास ने ही बोस को राष्ट्रवादी राजनीति में उतारा। इसके बाद बोस ने 1922 में स्वराज अखबार की स्थापना की। 1923 में बोस को बोस भारतीय युवा कांग्रस के अध्यक्ष और बंगाल राज्य कांग्रेस के सचिव चुने गए। इसके चित्तरंजन दास ने उन्हें अपने अखबार फारवर्ड का संपादक बनाया था। इस प्रकार सुभाष चंद्र बोस भारतीय राजनीति का जाना माना चेहरा बन गए।

उनके द्वारा किए गए कार्य

आज़ाद हिंद फौज की स्थापना
1943 में सिंगापुर पहुंचकर नेता जी ने रास बिहारी बोस की मदद से आज़ादी हिंद फौज की स्थापना की उन्होंने भारतीय युद्धबंदियों और प्रवासी भारतीयों को एकजूट करके उन्हें एक अनुशासित सैन्य  बल में बदल दिया।

फारवर्ड ब्लाक की स्थापना
त्रिपुरी कांग्रेस के  बाद गांधी जी से वैचारिक मतभेदों के कारण कांग्रस के अध्यक्ष पद से इस्तिफा देकर उन्होंने काग्रेंस के भितर ही आल इंडिया फारवर्ड ब्लाक की गठन किया ताकि क्रांतिकारी और वामपंथी ताकतों को एकजुट किया जा सके।

रानी झांसी रेजिनेंट की स्थापना
यह एशिया की पहली महिला सैन्य टुकड़ी थी जिसकी स्थापना नेता जी ने कैप्टन लक्ष्मी सहगल के सहयोग से महिला सैन्य बटालियन बनाई।

अंडमान निकोबार की मुक्ति
जापानी सेना से अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का नियंत्रण प्राप्त करने के बाद नेता जी ने 30 दिसंबर 1943 को पोर्ट ब्लेयर में पहली बार तिरंगा फहराया और दोनों द्विप समूहों को शहीद और स्वराज्य नया नाम दिया।

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति
1941 में अंग्रेजों की नज़रबंदी से बच कर भागकर अफगानिस्तान जर्मनी और जापान की यात्रा करके विश्व नेताओं से भारत की आज़ादी के लिए सैन्य समर्थन हासिल किया।

उनका विचार और नारा

उन्होंने राष्ट्रीय नारे दिये जय हिंद, दिल्ली चलो और तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा इस प्रकार देशवासियों में स्वतंत्रता की नई ज्वाला जलायी।
योजना आयोग का विचार
1938 में कांग्रेस अध्यक्ष पद पर रहते हुए उन्होंने पण्डित जवाहर लाल नेहरु की अध्यक्षता में राष्ट्रीय नियोजन समिति की स्थापना की।

आज़ाद हिंद सरकार का गठन
21 अक्तूबर 1943 को सिंगापुर में भारत की पहली अनंतिम सरकार की स्थापना की। इस सरकार का अपना बैंक मुद्रा डाक टिकट और गुप्तचर तंत्र था जिसे जापान और जर्मनी समेत 9 देशों ने मान्यता दी।

मृत्यु

नेता जी सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु आज भी भारतीय इतिहास के सबसे बड़े रहस्यों में से एक मानी जाती है। अधिकारिक विवरण के अनुसार 18 अगस्त 1945 में सुभाष जी बैंकाक से कोक्यो जा रहे थे। ताइवान के ताइहोकू वर्तमान नाम ताइपे हवाई अड्डे से उड़ान भरने के कुछ ही देर बाद उनका विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया। अत्यधिक आग में झुलसने के कारण नेता जी गंभीर रुप से घायल हो गए जिसके कारण उनकी जान चली गई। उनके साथ आज़ाद हिन्द फौज के कर्नल हबीबुर रहमान ने इस हादसे की पुष्टि की थी।
मगर यह पूर्ण सच नहीं माना गया।

 खोसला आयोग 1970
1956 की शाहनाज समिति की रिपोर्ट तथा 1970 की खोसला आयोग की रिपोर्ट के अनुसार नेता जी की मौत ताइपे में हुई विमान दुर्घटना में हुई।

मुखर्जी आयोग
वर्ष 2005 में इस आयोग के द्वारा सौंपी गई रिपोर्ट के अनुसार नेता जी की मौत 18 अगस्त 1945 को ताइपे में विमान दुर्घटना में नहीं हुईं थी। खास बात यह है कि भारत स्वीकार ने इस रिपोर्ट को नहीं स्वीकार किया। भारत में व्यापक धारणा यह भी रही है कि वे साधु का भेष धारण कर उत्तर  प्रदेश के फैजाबाद में गुमनामी बाबा के रुप में जीवन बिता रहे थे।

वहीं कुछ लोगों का यह भी दावा है कि नेता जी विमान दुर्घटना से बच निकले और शरण के लिए सोवियत संघ चले गए थे।
वैसे आप को क्या लगता है कि वे कैसे मरे अगर कोई जानकारी हो तो जरुर साझा करें।

2026-09-05

भगत सिंह


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प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में भारत देश के महान क्रांतिकारी तथा शहीदे-ए-हिंद के तथा बलवंत सिंह रणजीत सिंह भानु कही-कही  विद्रोही नाम से जाने वाले मशहूर क्रांतिकारी एवं गरम दल के मुख्य नेता शहीद भगत सिंह के बारे में जानेंगे। इसके साथ ही आज़ादी की लड़ाई के दौरान उनके द्वारा किए गए महत्वपूर्ण कार्यों पर प्रकाश भी डालेंगे। बताते चलें कि शहीद भगत सिंह एक क्रांतिकारी होने के साथ-साथ एक अच्छे लेखक और कलाकार भी थे।

इस लेख के माध्यम से हम उनकी फांसी के मुख्य कारण को समझने की कोशिश करेंगे। इसके साथ ही उन्हें धोखा देने वाले क्रांतिकारी यों के नाम उजागर करेंगे और अंत में हम भगत सिंह के नास्तिक होने के पीछे के कारण को भी जानेंगे।

परिचय

भगत सिंह का जन्म 27 सितंबर 1907 में को पंजाब के लायलपुर जिले के बंगा गांव में एक पंजाबी जट सिख परिवार में हुआ था। जो वर्तमान समय में पाकिस्तान का हिस्सा है। उनकी माता का नाम विद्यावती और उनके पिता का नाम किशन सिंह सांधू था। इस प्रकार भगत सिंह का पूरा नाम भगत सिंह सांधू था। 

वे अपने सात भाई बहनों में दूसरे स्थान पर आते थे। कुल मिलाकर उनके परिवार में माता पिता को छोड़कर वे सब चार भाई और तीन बहनों का समूह था। भगत सिंह के पिता एवं उनके चाचा अजीत सिंह उस समय प्रगतिशील राजनीति में सक्रिय रहते थे जिस कारण से भगत सिंह को बचपन से ही समझ आने लग गया था कि ब्रिटिश सरकार देश के हित में काम नहीं कर रही है।

अपने प्रारम्भिक दिनों में भगत सिंह सांधू अपने बंगा गांव के स्कूल जाया करते थे। इसके बाद की शिक्षा के लिए उन्हें लाहौर के दयानंद एंग्लो वैदिक स्कूल में दाखिला दिलाया गया। 1923 में उन्होंने लाहौर के नेशनल कालेज में दाखिला लिया। खास बात यह है कि इस स्कूल की स्थापना लाला लाजपत राय ने महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के जवाब में की थी। दरअसल महात्मा गांधी ने भारतीयों से असहयोग आंदोलन के माध्यम से विदेशी समान का बहिष्कार करने का आग्रह किया था। जिसमें ब्रिटिश भारतीय सरकार द्वारा सब्सिडी प्राप्त स्कूलों को भी शामिल किया गया था। 

भगत सिंह जी ने अपनी पढ़ाई की दौरान ही क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लेना प्रारम्भ कर दिया था। अपने मित्रों और सहयोगियों की मदद से भगत सिंह हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के सदस्य बन गए जिसके कुछ समय बाद ही उन्होंने स्वयं की पहचान एक मुख्य सदस्य के रुप में बनाई। ये वही एसोसिएशन था जिसका नाम 1928 में बदलकर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन कर दिया गया था।

साइमन कमिशन आयोग

1928 ने ब्रिटिश सरकार ने साइमन कमीशन आयोग का गठन किया जिसका मुख्य कार्य भारत की राजनीतिक स्थिति पर रिपोर्ट बनाना था। जिसमें किसी भी भारतीय राजनेता का नाम शामिल नहीं था। इस बात का सिधा मतलब यह था कि भारतीय किसानों तथा लोगों की समस्याओं तथा उनके ब्रिटिश सरकार द्वार किए जा रहे शोषण को छुपाया जाना था। खास बात यह थी कि इस रिपोर्ट को ईस्ट इण्डिया कम्पनी इस गठन द्वारा बनवाकर ब्रिटिश क्राउन प्रीन्स को सौपीं जाती। जिसमें यह दिखाया जाता की भारत में सब कुछ अच्छा चल रहा है।

मगर भारतीय किसान इतने भी नादान नहीं थे कि इतनी सी बात न समझ पायें परिणामस्वरूप विरोध होना प्रारम्भ हुआ। देश भर में विरोध हुए 30 अक्तूबर 1928 को जब आयोग लाहौर पहुंचा तब लाला लाजपत राय ने इसके विरोध में एक मार्च का नेतृत्व किया। पुलिस द्वारा भारी भीड़ को हटाने के प्रयास किए गए मगर किसान पीछे हटने को तैयार न थे। अंत में पुलिस अधीक्षक  जेम्स ए स्काट ने पुलिस बल को प्रदर्शनकारियों पर लाठी चार्ज करने का आदेश दिया।

लाला लाजपत राय पर व्यक्तिगत रुप से हमला किया गया जिसके कारण वे घायल हो गए। उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया चोटों के प्रभाव के चलते 17 नवंबर 1928 को ह्दयघात से राय साहब की मौत हो गई। डाक्टरों का मानना था कि उनका ह्रदयघात धरने में लगी चोटों के कारण आया था। जब यह मामला ब्रिटिश क्राउन के समक्ष रखा गया तो कंपनी ने राय साहब की मौत में अपनी किसी भी भूमिका से इन्कार कर दिया।

हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन ने राय साहब की मृत्यु का बदला लेने की कसम खाई। योजना बनाई गई जेम्स ए स्काट को मारने की जिसके चलते भगत सिंह सांधू शिवराम राजगुरु सुखदेव थापर और चंद्रशेखर आज़ाद ने योजना को अंजाम देने का प्लान बनाया। योजना के दौरान 17 दिसंबर 1928 को लाहौर में जिला पुलिस मुख्यालय से निकलते समय सहायक पुलिस अधीक्षक जान पी सान्डर्स को गोली मार दी गयी जो उसे न पहचानने पाने की गलती से हूआ। इसी बीच ब्रिटिश सिपाही चनन को चंद्रशेखर आज़ाद ने पीछा करने से रोकने के लिए गोली मार दी गयी।

इस घटना की मिली जुली प्रतिक्रिया सामने आयी कुछ लोग खुश थे तो कुछ भारतीय भी न खुश थे। इस घटना के बाद नौजवान भारत सभा के सदस्य जिन्होंने हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का साथ लाहौर विरोध में दिया था उनकी गतिविधियाँ पार्टी में कम हो गई। पार्टी ने पाया की सार्वजनिक सभाओं में उनके सदस्यों की उपस्थिति में भारी गिरावट आई। राजनेताओ कार्यकर्ताओं और समाचार पत्रों में इस बात पर जोर दिया कि हिंसा की तुलना में असहयोग करना बेहतर है। 

इसके साथ ही कांग्रेस नेता महात्मा गांधी ने इस हत्या की निंदी करते हुए इसे प्रतिगामी कार्यवाही बताया लेकिन वहीं जवाहर लाल नेहरु ने कहा कि भगत सिंह अपने आतंकी कृत्य के कारण लोकप्रिय नहीं हुए बल्कि इसलिए लोकप्रिय हुए क्योंकि उन्होंने क्षण भर के लिए लाला लाजपत राय और उनके माध्यम से राष्ट्र सम्मान को बहाल किया है।

दूसरी तरफ ब्रिटिश सरकार ने भगत सिंह और उनके साथियों को पकड़ने के लिए व्यापक तलाशी अभियान चलाया जिससे बचने में उनकी मदद दुर्गावती देवी जिन्हें हम दुर्गा भाभी के नाम से जानते है ने कि जिनके बारे में हम पिछले लेख में विस्तार से चर्चा कर चुके है। उनकी मदद से सभी क्रांतिकारी लाहौर से भागने में सफल रहे और भगत सिंह बंगाल पहुंच गए।

दिल्ली विधान सभा बम विस्फोट

कुछ समय तक भगत सिंह ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह को प्रेरित करने के लिए नाटक की शक्ति का प्रयोग करते रहे। उन्होंने एक मैजिक लैंटर्न खरीदा था जिस पर वे स्लाइड दिखाते थे। जो राम प्रसाद बिस्मिल जैसे क्रांतिकारियों के बारे में उनके भाषणों की जीवंत बनाती थी। जिनकी मृत्यु काकोरी षडयंत्र को दौरान हुई थी। 1929 में भगत सिंह ने हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के समक्ष एक नाटकीय कृत्य का प्रस्ताव रखा जिसका उद्देश्य उनके उद्देश्यों के लिए व्यापक प्रचार प्राप्त करना था।

पेरिस चेंबर आफ डेय्युटीज पर बम विस्फोट करने वाले फ्रासीसी अराजकतावादी आगस्टे वैलियंट से प्रभावित होकर भगत सिंह ने भी योजना काउंसिल हाउस में केंद्रीय विधान सभा के अंदर बम विस्फोट करने की थी। प्रवेश के लिए उन्होंने सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक और व्यापार विवाद अधिनियम पर बात करना था। 

जिसे बनाया तो गया था लोक हित के लिए मगर इसकी आड़ में प्लान यह था कि अपराधी स्वयं को गिरफ्तार होने दें ताकि वे अदालत में पेशी का उपयोग करके उन्हें व उनके शासन को ब्रिटीश क्राउन की तरफ से स्वीकार कराया जा सके। इस प्रकार विधान सभा में बम बारी की घटना को अंजाम दिया गया। इस घटना के बाद भगत सिंह और उनके साथियों को गिरफ्तार कर लिया गया।

विधान सभा की सुनवाई

मई में प्रारंभिक सुनवाई के बाद जून के पहले सप्ताह में मुकदमा शुरु हुआ। 12 जून को भगत सिंह और उनके साथी को गैरकानूनी विस्फोटक का इस्तेमाल करने का कारण आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। दत्त का बचाव आसफ अली ने किया वहीं भगत सिंह ने खुद का बचाव स्वयं से किया।

इस मुकदमे के दौरान भगत सिंह के क्रांतिकारी कुछ साथियों ने उन्हें धोखा दिया और उनके द्वारा मुकदमे को दौरान दी गई गवाही की सटीकता पर संदेह व्यक्त किया गया। गवाहों ने बताया कि भगत सिंह ने गिरफ्तारी से पहले तीन गोलीयां चलाई थी मगर जब गिरफ्तार करने वाले पुलिस सार्जेंट ने गवाही दी की जब उसने भगत सिंह को गिरफ्तार किया तो जब उसने भगत सिंह की पिस्तौल ली तो वह नीचे की तरफ थी भगत  सिंह उससे खेल रहा था।

इसी बीच 15 अप्रैल 1929 में लाहौर बम कारखाने पर पुलिस द्वारा छापा मारा गया जिसके चलते सुखदेव किशोरी लाल जय गोपाल सहित HSRA के अन्य सदस्यों को गिरफ्तार कर लिया गया। कुछ समय बाद सहारनपुर बम कारखाने पर भी छापा मारा गया। भगत सिंह के सहयोगी हंस राज वोहरा एवं  जय गोपाल ने भगत सिंह को धोखा दिया जिसके चलते उन्होंने भगत सिंह के खिलाफ बयान दिया। जिसके चलते सान्डर्स और सिपाही चनन सिंह के हत्या कांड का मामला कारखाने एवं बम विस्फोट के मामले की कड़ियों को जोड़ने में ब्रिटिश सरकार को आसानी हुई।

भूख हड़ताल

आरोप साबित होने पर भगत सिंह को एक बार फिर से गिरफ्तार कर लिया गया। जेल में भगत सिंह ने यूरोपीय कैदियों तथा भारतीयत कैदीयों को साथ नस्लिय भेद भाव होते हुए देखा इसके साथ ही कारागार में बेहतर आहार नहीं मिलता था। जिसके बदले में भगत सिंह ने अपने भारतीय कैदीयों का समर्थन करते हुए भूख हड़ताल की घोषणा की जिसमें उनकी मांगे थी कि भोजन के मानकों कपड़ों शौचालय और अन्य स्वच्छता संबंधी आवश्यकताओं में समानता के साथ-साथ पुस्तकों और दैनिक समाचार पत्र तर उनकी पहुंच तक की मांग की। 

इस हड़ताल के चलते 13 सितंबर 1929 भगत सिंह के सहयोगी कैदी दास 63 दिनों की हड़ताल के बाद चल बसे। अंत कांग्रेस पार्टी के प्रस्ताव पर तथा अपने पिता के अनुरोध पर 116 दिनों के बाद 5 अक्तूबर 1929 रो अपनी भूख हड़ताल समाप्त कर दी। भगत सिंह की प्रसिद्धि देख कर ईस्ट इण्डिया कम्पनी जल्द से जल्द भगत सिंह को रास्ते से हटाना चाहती थीष।

उनकी फांसी

जिसके चलते भगत सिंह सुखदेव और राजगुरु को लाहौर षड़यंत्र मामले में दोषी करार देते हुए 24 मार्च 1931 को फांसी देने का आदेश दिया गया। और अंत में फांसी के एक दिन पहले ही यानी 23 मार्च 1931 को ही शाम 7 बजकर 30 मिनट पर उन्हें लाहौर जेल में उन्हें फांसी दे दी गई। उनके पार्थव शरीर को चुपके से जेल के बाहर भिजवाया गया ताकि लोगों में दंगा न भड़के। दरअसल ब्रिटिश सरकार को डर था कि भारतीय फांसी वाले दिन कोई मोर्चा न खोल दें। अंत में इस प्रकार इन तीन महान क्रांतिकारियों का अंत हुआ।

नास्तिक बनने का कारण

भगत सिंह ने जेल में रहते हुए अपने प्रसिद्ध निबंध मैं नास्तिक क्यों हूं की रचना की जिसमें उन्होंने खुद नास्तिक बनने का कारण बताया। उनका नास्तिक बनना किसी एक घटना का अचानक परिणाम नहीं था। ये उनके गहन अध्ययन तार्किक चिंतन और सामाजिक परिस्थितियों के निरंतर विश्लेषण का नतीजा था।

अहंकार का जवाब
उनके मित्र भाई रणधीर सिंह जो की गदर पार्टी के क्रांतिकारी भी थे ने उन्हें कहा था कि -भगत प्रसिद्ध के कारण तू अहंकार से भर गया है इसलिए तुम ईश्वर को भूल गये हो, इस बात को खारिज करते हुए भगत सिंह ने इस निबंध मैं नास्तिक क्यों हूं की रचना की थी।

---भगत सिंह ने निबंध के माध्य से अपना तर्क देते हुए कहा कि यदि कोई दयालु और सर्वशक्तिमान ईश्वर है, तो वह दुनिया में गरीबी भुखमरी छुआछूत और अंग्रेजों के अत्याचारों को क्यों होने देता है।---

जेल के दिनों में भगत सिंह ने कार्ल मार्क्स लेनिन मिखाइल बाकुनिन चार्ल्स डार्विन और एंगल्स जैसे विचारकों को गहराई से पढ़ा। इस अध्ययन ने उन्हें सिखाया कि दुनिया प्राकृतिक और वैज्ञानिक नियमों से चलती है किसी अलौकिक शक्ति से नहीं। ये तो उनके विचार थे और अब वास्तविक कारण को समझते है।

जलियांवाला बाग हत्याकांड
1919 में भगत सिंह 12 वर्ष के थे इस घटना ने उनके भीतर देश की आजादी और ब्रिटिश शासन के खिलाफ क्रांति का बीज बोया। बचपन की कोई घटना जिससे हमें आघात लगा हो उसे हम कभी नहीं भूल पाते ये विज्ञान कहता है जो सच भी है।

असहयोग आंदोलन का समापन
चौरी- चौरा कांड के बाद 1922 में गांधी जी के असहयोग आंदोलन को वापिस लेने बाद भगत सिंह बहुत निराश हुए। क्योंकि अगर देखा जाये तो जलियांवाले बाग में मरने वालों की संख्या के मुकाबले इस कांड में मरने वाले की संखया मात्र 25 से 30 पुलिस कर्मचारियों की थी। जिस कारण से इसे कांड कहना कांड का अपमान होगा।

1920 के सांप्रदायिक दंगे
भारत में धर्म के नाम पर हुए दंगों को देखकर वे समझ गए कि अंधविश्वास और धार्मिक कट्टरता देश को बांट रही है और आजादी की लड़ाई में सबसे बड़ी बाधा है। ये पूरे भारत वर्ष पर एक कलंक के समान है जो आज तक नहीं मिट पाया हाँ बस अंतर इतना है कि पहले अंग्रेजों ने इसकी शुरूआत की और आज राजनेता करवाते है।

2026-09-03

प्रथम विश्व युद्ध

illustration of world war i

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम प्रथम विश्व की घटना के बारे में चर्चा करेंगे तथा ये समझने कि कोशिश करेंगे की मुख्य रुप से युद्ध के प्रारम्भ होने का कारण क्या था। इसके साथ ही युद्ध के दौरान यानी 1914 से लेकर 1918 तक कौन-कौन सी मुख्य घटनाएं हुईं। इसके साथ ही हम मित्र राष्ट्र संगठन तथा केंद्रीय  शक्ति के रुप में जाने वाले देशों के बारे में समझने की कोशिश करेंगे। इतिहास के पन्नों में इसे दुनिया का सबसे बड़ा नरसंहार बताया गया है।

परिचय

प्रथम विश्व युद्ध 28 जुलाई को प्रारम्भ होकर 11 नवंबर 1918 यानी लगभग पांच सालों तक चला। इस युद्ध के दौरान लगभग 1.5 से लेकर 2.2 करोड़ लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। इस आंकड़े में युद्ध के दौरान नरसंहार की घटनाओं में मरे लोगों की संख्या भी शामिल है। मरने वालों लोगों में उस समय काल के दौरान फैली स्पेनिश प्लू की महामारी का आंकड़ा भी शामिल है। प्रथम विश्व युद्ध के मुख्य कारणों में जर्मन साम्राज्य का उदय शामिल है। जिसने लंबे समय से चल रहे यूरोप में शक्ति संतुलन को बिगाड़ा दिया था। इसके साथ ही बल्कान का तनाव 20 जून 1914 को युद्ध को चरम पर ले गया।

इस घटना को दौरान आस्ट्रो हंगरी की राजगद्दी के उत्तराधिकारी फ्रांस फर्डिनंड की हत्या की गई। इस घटना का जिम्मेदार सर्बिया को ठहराया गया। अंत इस प्रकार युद्ध की घोषणा कर दी गई। दूसरी तरफ रुस ने सर्बीया की रक्षा के लिए सेना को एकत्रित किया। हंगरी की तरफ से जर्मनी ने अगस्त की शुरुआत में फ्रांस और रुस पर युद्ध की घोषणा कर दी। इसी क्रम में जर्मनी द्वारा बेल्जियम पर हमला करने के कारण यूनाइटेड किंगडम ने बेल्जियम की तरफ से और जर्मनी के खिलाफ युद्ध में शामिल हुआ।

भारतीय सैनिको का योगदान

1914 में जर्मनी की रणनीति थी कि फ्रांस को शीघ्रता से युद्ध में हराया जाए लेकिन सितंबर तक उनकी प्रगति धीमी पड़ गयी। दरअसल फ्रांस की सुरक्षा के लिए ब्रिटिश भारतीय सैनिकों ने इंग्लिश चैनल से लेकर स्विजरलैंड तक किलेबंद खाइयों को खोदकर निरंतर रेखा में बदलने में सफल रहे। 

दूसरी तरफ पूर्वी मोर्चे पर अधिक हलचल होना प्रारम्भ हुई लेकिन भारी नुकसान के बावजूद कोई पक्ष निर्णायक बढ़त बनाने में असफल रहा। नवंबर आते-आते ओटोमन साम्राज्य केंद्रीय शक्तियों में शामिल हो गया। इधर जापान तथा इटली मित्र देशों के साथ युद्ध में शामिल हुए। इस गठबंधन की घटना से पहले की  बात करें तो मित्र देशों को गैलीपोली की घटना में हार का सामना करना पड़ा था।

1917 जर्मनी अटलांटिक पनडुब्बी युद्ध 

1917 में अप्रैल महीने में जर्मनी द्वारा अटलांटिक जहाजों के खिलाफ असीमित पनडु्ब्बी युद्ध फिर से शुरु हुआ। इस घटना के बाद अमेरिका देश मित्र देशों के साथ युद्ध में शामिल हुआ। कुछ समय बाद बोल्शेविकों ने अक्तूबर क्रांति को दौरान रुस की सत्ता पर अपना कब्जा कर लिया। इस घटना के परिणामों के चलते सोवियत रुस ने दिसंबर को महीने में केंद्रीय शक्तियों के साथ एक युद्ध विराम समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते बाद मार्च 1918 में एक अलग शांति समझौता रुस द्वार केंद्रीय शक्तियों के साथ किया गया।

मार्च के ही महीने में जर्मनी ने एक स्प्रिंग आक्रमण प्रारम्भ किया जिसने प्रारंभिक सफलताओं के बावजूद जर्मन सेना को थका दिया। इस प्रकार अगस्त 1918 से मित्र देशों के साथ सौ दिवसीय आक्रमण में जर्मन सेना की हार सर्वप्रथम हुई। 

मित्र देशों ने ओटोमन साम्राज्य और आस्ट्रिया और हंगरी के साथ युद्ध विराम संधि पर हस्ताक्षर कर दिए। जिससे जर्मन कमजोर पड़ गया जिसके बाद जर्मनी में ग्रह युद्ध प्रारम्भ हुआ जिसके चलते कैसर विल्हेम द्वितीय को 9 नवंबर 1918 को अपने पद  से त्याग पत्र देना पड़ा। इसके आगामी कारणों के चलते 11 नवंबर 1918 को युद्ध  समाप्त हो गया।

युद्ध को दौरान गुटों का विभाजन

प्रथम विश्व के दौरान सभी देश दो गुटों में विभाजित हुए पहला गुट मित्र देशों का था। जिसमें बिर्टेन फ्रांस रुस जापान इटली यूरोप अमेरिका और अन्य देश शामिल थे। दूसरा गुट केंद्रीय शक्तियों का था जिसमें मुख्य रुप से जर्मनी अस्ट्रीय हंगरी ओटोमन साम्राज्य जिसे हम तुर्की साम्राज्य के नाम से भी जानते है शामिल था। युद्ध  की शुरुआत जर्मनी देश ने अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए प्रारम्भ की थी।

सैन्य शक्ति को बढ़ावा
युरोप देश में अपनी सेना और हथियारों को पढ़ाने की होड़ लगी हुई थी वही दूसरी तरफ जर्मनी तथा ब्रिटेन का बीच नौ सेना को लेकर मुकाबला बढ़ता गया।

युद्ध का मुख्य कारण

गुप्त संधिया
मित्र देशों ने एक दुसरे देश को सुरक्षा पहुंचाने के लिए एक-दूसरे से संधि कर रखी थी जो युद्ध का एक मुख्य कारण बनी। इसके अलावा युरोप देश दो बड़े गुटों में बट गया था। जिन्हें हम ट्रिपल एलांस तथा ट्रिपल इंटीनेट के नाम से जानते है। ट्रिपल एलांस में मुख्य रुप से अस्ट्रिया हंगरी और इटली शामिल थे। वहीं दूसरे ग्रुप में यानी ट्रिपल इंटीनेट में ब्रिटेन फ्रांस और रुस शामिल थे। इस कारण से जब दो छोटे-छोटे देश युद्ध में उतरे तो बाकी के देश अपने आप युद्ध में खिंचते चले गए।

साम्राज्य वाद
यूरोप देशों के बीच एशिया और अफ्रीका देशाों के नयें इलाकों पर कब्जा करने तथा संसाधनों पर  कब्जा करने की होड़ लगी पड़ी थी। इस आर्थिक प्रतियोगिता ने इन देशों के बीच विरोध को ओर गहरा किया जो आगे चलकर युद्ध का एक कारण बना।

राष्ट्रवाद की भावना
अपने देश के प्रति ईमानदारी तथा दूसरे देशों के प्रति आक्रोश की भावना ने भी इस युद्ध को हवा दी। बलकान क्षेत्र में अलग-अलग जाति समूह में लोग अपनी आजादी चाहते थे जिसके कारण ये पूरा क्षेत्र बारूद का ढेर बन चुका था।

मौजूदा कारण
अस्ट्रीय हंगरी के राजकुमार फ्रांज फ्रे़डीनान्द की एक सर्बियन राष्ट्रवादी ने हत्या कर दी। जिसके कारण अस्ट्रीया ने सर्बीया को दोषी ठहराया और उसके खिलाफ युद्ध का ऐलान कर दिया परिणामस्वरूप आपसी संधियों के कारण एक-एक देश युद्ध में शामिल होता गया। 

2026-09-02

गनीमी कावा

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प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में मराठा साम्राज्य के महान राजा एवं मराठा छत्रपति शिवाजी की महाराज की गौरिल्ला युद्ध रणनीति जिसे हम गनीमी कावा के नाम से भी जानते है के बारे में चर्चा करेंगे। शिवाजी जी महाराज ने सीमित सैन्य बल होने के बावजूद भी 27 सालों तक मुगल सेना को कड़ी टक्कर दी। इसके साथ ही शिवा जी महाराज द्वारा लड़े युद्धों के बारे में चर्चा करेंगे। आगे लेख में यह समझने की कोशिश करेंगे की इस युद्ध रणनीति में किन तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता था जो इसे खास बनाती है।

परिचय

गलीमी कावा की खोज मराठा साम्राज्य के महाराज छत्रपति शिवा जी ने की उनका जन्म 16 फरवरी 1630 में महाराष्ट्र के पुणे जिला में शाह जी भोसले के घर हुआ। जो की उस समय काल में मुगल शासक आदिल शाह के सेनापति थे। अपने समय काल में उनके पास पुणे चाकण पुणे तथा सुपे की बड़ी जागीर को मुगल शासकों के सामन्त के रुप में सम्हालते थे। बाद में उन्हें बंगलूरु जागीर का भी कार्य भार संभाला। शिव जी की माता का नाम जीजाबाई था।

शिवा जी अपने पिता के समान  मुगल शासकों का सामन्त नहीं बनना चाहते थे मगर उनका विरोध करना भी कठिन था क्योंकि मुगलों को पास विशाल सेना थी और शिवा जी महाराज  के पास मात्र मुठ्ठी भर सैनिक। लेकिन फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी। इस प्रकार गनीमी कावा नामक युद्ध रणनीति का उदय हुआ।

यहाँ खास बात यह है कि शाह जी राजे ने ही शिवा जी महाराज को पुणे की जागीर का प्रबंधन सौंपा और उन्हें दादो जी कोंडदेव जैसे कुशल गुरु का संरक्षण प्राप्त हुआ। जिनके चलते ही आगे चलकर शिवा जी महाराज को हिंदवी स्वराज्य की स्थापना करने का आधार मिला।

गनीमी कावा की युद्ध रणनीति

अचानक हमला
इस युद्ध nरणनीति की सबसे खास बात यह थी कि अचानक हमला किया जाता था ताकि जब तक दुश्मन जबतक तैयार हो तब तक हरा दिया जाए। इस योजना के चलते दुश्मन शिविरों पर तथा आपूर्ति लाइनों यानी अनाज रखने या लाने की जगह पर अचानक व अप्रत्याशित हमने किए जाते थे ताकि दुश्मन को हथियारों और अनाज को समाप्त किया जा सके।

गतिशीलता
शिवा जी महाराज युद्ध के दौरान भारी हथियारों व ढाल का इस्तेमाल नहीं करते थे ताकि उनके सैनिक तेजी से हमला करके के पीछे हट जाए। अतः युद्ध के दौरान हल्के हथियारों का इस्तेमाल किया जाता था।

भूभाग का  प्रयोग
शिवा जी महाराज की गनीमी कावा रणनीति को दौरान ऐसे छोटे और संकरे क्षेत्र का इस्तेमाल किया जाता था जहां अधिक मात्रा में मुगल सैनिक न आ सके और समय रहते उन पर हमला किया जा सके। अपनी इस रणनीति को अंजाम देने के लिए युद्ध क्षेत्र के रुप में पश्चिमी घाट के पहाड़ी क्षेत्रों और वन क्षेत्रों का इस्तेमाल किया जाता था।
 
समूह में विभाजन
इस रणनीति की खास विशेषता यह थी कि शिवा जी महाराज अपने सैनिकों को छोटी-छोटी  टूकडीयों में विभाजित कर देते थे। जिनके माध्यम से सैनिकों को युद्ध के दौरान आराम करने का मौका भी मिल जाता था और युद्ध कौशल का परिचय देना का भी। अपनी इस रणनीति के दौरान ही शिवा जी महाराज दुश्मन सेना की मुखबिरी करवाते और उनकी आगामी चाल का पता लगाते थे जिसके अनुसार ही आगामी युद्ध की रणनीति को बनाया जाता था।

मनोवैज्ञानिक युद्ध रणनीति
यह इस युद्ध रणनीति का आखिरी चरण था जिसमें दुश्मन सैनिकों में भ्रम य भय पैदा किया जाता था। जिसमें दुश्मन सेना की आगे कि चाल को समझते हुए, मराठा सैनिक उस स्थान पर पहले से घात लगाए बैठे रहते थे और हमला करने के सही समय का इंतजार करते थे। जिसमें दुश्मन सैनिकों के बगल से फुर्ती से गुजरना व अचानक से हमला करना यानी दुश्मन सैनिक उन्हें देख भी नहीं पाते तो और घायल हो जाते थे। जिसके चलते उनके अंदर भूत प्रेत के होने की शंका होने लगती थी।

इसके अलावा पहाडीयों के संकरे रास्ते से दुश्मन को खायी में गिराना तथा जंगल जाल बिछा कर रखाना भी इस रणनीति का खास हिस्सा था। कुल मिलाकर अगर मराठा सैनिकों गनीमी कावा रणनीति का इस्तेमाल न करते तो, मुगल सैनिकों को आमने-सामने के लड़ाई में हराना नामुमकिन था क्योंकि वे संख्या में ज्यादा थे।

शिवा जी महाराज द्वारा लड़े गए युद्ध

प्रतापगढ़ का युद्ध 1659
यह गनीमी कावा युद्ध शैली का एक अच्छा उदाहरण है जिसमें शिवाजी महाराज ने बीजापूर सल्तनत के सेनापति अफजल खान को  हराने के  लिए गोरिल्ला युद्ध रणनीति का सहारा लिया। शिवा जी ने पहले बड़े युद्ध से परहेज किया इसकी जगह पर पहाड़ी इलाकों में अचानक हमले और घात लगाकर आक्रमण किए गए। उन्होंने स्वयं एक रणनीतिक बैठक के दौरान अफजल खान का सामना किया और एक गुप्त छोटे हथियार से उसे मार डाला। परिणामस्वरूप शत्रु सेना का मनोबल टूट गया। अंत में मुगल सेना पीछे हटने के मजबूर हो गयी। इस प्रकार शिवा जी महाराज की विजय हुई।

अहमद नगर और जुन्नर अभियान 1657
यह मुगलों के साथ पहला सिधा हमला था जिसमें शिवा जी सेना ने मुगल साम्राज्य की सीमाओं से प्रवेश कर छापा मार  युद्ध रणनीति का इस्तेमाल किया और उन्हें हार मानने पर मजबूर किया।

लाल महल हमला 1663
यह हमला पुणे जागीर पर सूबेदार शास्ता खान को हराने के लिए किया गया था। इस हमले के दौरान रात में तीसरे पहर का इस्तेमाल किया गया। इस युद्ध के दौरान शास्ता खान को अपनी अंगुलियां गवानी पड़ी मगर वह भागने में सफल रहा।

सूरत की पहली चढ़ाई 1664
उस समय काल के दौरान सूरत मुगलों की मुख्य व्यापारिक बंदरगाह थी जिस पर मराठा सैनिकों ने हमला करके मुगल सैनिकों हराकर उन्हें भारी वित्तीय हानि पहुंचाने में सफलता हासिल की।

पुरंदर का युद्ध 1665
यह युद्ध मुगल सेनापति मिर्जा राजा जय सिंह की विशाल सेना के साथ लड़ा गया। जिसमें मराठा सैनिकों की हार हुई और उन्हें मुगलों के साथ पुरंदर की संधि करनी पड़ी।

सूरत की चढ़ाई 1670
पुरंदर की संधि टूटने का बाद मुगलों का आर्थिक हानि पहुंचाने के लिए सूरत पर फिर से हमला किया गया। इस युद्ध के दौरान मराठा सैनिकों की जीत हुई।

सिंहगढ़ का युद्ध 1670
इस युद्ध में मुगल किले कोंढाणा के संरक्षक उदयभान राठौड़ को हराया गया और शिवा जी महाराज की जीत हुई।

वाणी-डिंडोरी का युद्ध
नासिक के पास मुगल सेना के सेनापति दाऊद खान को मराठा सेना ने खोले मैदान में युद्ध लड़ के पराजित किया।

साल्हेर का युद्ध 1672
यह मुगल सेना और मराठा सैनिकों के बीच खुले मैदान क्षेत्र लड़ा गया ऐतिहासिक युद्ध था। जिसमें मराठा सेना ने सेनापति इखलास खान को हराकर ऐतिहासिक विजय हासिल की।

इस प्रकार से देखा जाए तो शिवा जी महाराज का युद्ध कौशल केवल गनीमी कावा जैसी युद्ध रणनीति पर ही निर्भर नहीं था वे समय और परिस्थिति के अनुसार ही अपनी युद्ध रणनीति को अंजाम देते थे। श्रोतागणों से अनुरोध है कि इस रणनीति के बारे में य शिवा जी महाराज के युद्ध कौशल के बारे में अगर आपके पास कोई जानकारी है तो हमें जरूर साझा करें।

2026-09-01

अहिल्याबाई होल्कर

digital painting of a ahilyabai holkar

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में मराठा साम्राज्य की प्रसिद्ध महारानी अहिल्या बाई होलकर जीवन तथा उनके द्वारा किए महत्वपूर्ण कार्यों तथा भारतीय तीर्थ स्धानों तथा गरीबों लिए उनके द्वारा किए गए कार्यों पर प्रकाश डाला गया। सम्पूर्ण जीवन अत्यधिक कष्ट सहने बावजूद भी उन्होंने देश के विकास के लिए महत्वपूर्ण कार्य किए। आज भी प्रति वर्ष इन्दोर में उनके स्वर्गवास के दिन तथा भाद्रपद कृष्णा चतुर्दशी के दिन को अहिल्योत्सव के रुप में मनाया जाता है।

परिचय

अहिल्या बाई होल्कर का जन्म 31 मई 1725 को महाराष्ट्र के अहमद नगर जिले में क्षत्रीय  धनगर परिवार में चौंडी नामक ग्राम में हुआ था। उनके पिता मनकोजी राव शिंदे गांव के मुखिया थे। जिन्होंने उन्हें पढ़ना लिखना सिखाया। एक छोटी बालिका के रुप में उनकी सादगी और मजबूत व्यक्तित्व से मालवा क्षेत्र के सुबेदार मल्हार राव होल्कर इतने प्रभावित  हुए कि 1733 में उनका विवाह अपने बेटे खांडेराव होल्कर से करवा दिया। बारह वर्ष की अल्पायु में उनका विवाह हो गया था।

1766 में उनके ससुर मल्हार राव का निधन हो गया। उनके पति खंडेराव होल्कर स्वभाव से बहुत ही उग्र स्वभाव के थे। जिसे उन्होंने अपने बचपन से ही सहना शुरु कर दिया था। जब वे उन्तीस वर्ष की अवस्था में थी तभी उनके पति का देहांत हो गया। अपने पति की मृत्यु के बाद अहिल्याबाई इतनी दुखी हो गईं कि उन्होंने सती होना चाहा मगर उनके ससुर ने उन्हें ऐसा करने से रोका और उन्हें हिम्मत दी।

इसके साथ ही जब वे 43 साल की उम्र की हुईं तो उनके बेटे मालेराव का देहान्त हो गया। मगर उन्होंने अपने बेटे के दुख को खुद पर हावी होने नहीं दिया। अहिल्याबाई जब 62 वर्ष की हुईं तो उनके लड़की के लड़के जिसे वे अत्यधिक स्नेह करती थीं जिसका नाम नत्थू था उसका देहांत हो गया। 

मात्र चार वर्ष बाद उनके दामाद यशवन्त राव फणसे का देहांत हो गया और उनकी पुत्री मुक्ताबाई सती हो गई। इन सभी के जाने के बाद उनका स्नेह अपने दूर के सम्बन्धी तुकोजीराव के पुत्र मल्हार राव बढ़ा। उन्हें लगा बुढ़ापे में वही उनका सहारा बनेगा और शासन व्यवस्था न्याय और प्रजातंत्र की देखरेख  करेगा। मगर उसने उनके अंतिम समय तक दुःख ही दिया।

प्रशासन

1766 में अपने ससुर के मरने के बाद  तथा अपने बेटे के मरने का बाद भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और राज्य और अपने लोगों के कल्याण के लिए उन्होंने पेशवा से मालवा का शासन चलाने की अनुमति मांगी। कुछ राज्य मंत्रियों को उनके शासन चलाने से आपत्ति थी लेकिन फिर भी उन्हें सेना का समर्थन प्राप्त हुआ। क्योंकि वे उनके युद्ध कौशल से भलीभांति परिचित थे। 1761 में पेशवा ने अहिल्याबाई को मालवा पर राज्य करने की अनुमति दे दी। वे सिंहासन पर 11 दिसंबर 1767 पर मालवा की राजगद्दी पर बैंठी।

अहिल्याबाई ने 1754 में कुम्हेर की लड़ाई में अपने पति को खोने के बाद मालवा पर अधिकार कर  लिया। इसके बाद उन्होंने 1792 शक्तिशाली होल्कर सेना का निर्माण किया। महारानी अहिल्याबाई ने मालवा पर न्यायपूर्ण तरीके से शासन किया। उनके शासन काल में मालवा में शांति समृद्धि और  स्थिरता का माहौल था। इस प्रकार उनकी राजधानी महेश्वर साहित्यिक संगीत  कलात्मक और औद्योगिक गतिविधियों के केंद्र में तब्दील हो गई।

उन्होंने अपने साम्राज्य में कवियों कलाकारों मूर्तिकारों और विद्वानों का स्वागत किया इसके साथ रानी साहिबा उनके कलात्मक प्रतिभा के सम्मान में उन्हें इनाम भी देतीं थीं। आम जन समाज की समस्याओं को सुनने के लिए वे हर रोज़ सार्वजनिक सभाओं का आयोजन करती थी। उन्होंने खुद को न केवल एक योग्य शासक साबित किया बल्कि बेसहारा लोगों संरक्षक और मार्गदर्शक बनी। उनका शासन इंदौर से आगे तक फैला हुआ था।

रानी साहिबा के सेनापति

मल्हार राव के भाई बन्दों तुकोजी राव होल्कर एक विश्वास पात्र व्यक्ति थे। मल्हार राव जी ने भी उन्हें सदी अपने साथ में रखा था और राज्य के कार्यों के लिए तैयार कर लिया था। रानी साहिबा ने भी इन्हें अपना सेनापति नियुक्त किया और राजस्व कर वसूली का कार्य सौंपा जिसे मालवा में चौथ कहा जाता था। इसे सरदेशमुखी के नाम से भी जाना जाता था तथा यह कार्य करने वाले को मुल्कगिरी कहा जाता था। तुकोजी राव राज्य का कार्य पूरी लगन और ईमानदारी से करते थे।

इतिहासकार बताते है कि तुकोजीराव महारानी अहिल्याबाई  से बड़े थे मगर तुकोजीराव होल्कर जी उन्हें अपनी माता के समान ही मानते थे। रानी साहिबा भी उन्हें अपने बेटे की तरह ही मानती थीं।

देश के विकास में योगदान


धार्मिक कुरीतियों का अंत
रानी साहिबा में उस समय काल में देश में फैली कुरीतियों का अंत करने के अथक प्रयास किए। रानी अहिल्याबाई धार्मिक पांखड सती प्रथा भृगु पतन महिला शिक्षा का शोषण तथा इस प्रकार के अंधविश्वासों का कड़ा विरोध करती थी। उन्होंने अपने समय काल में इन सामाजिक कुरीतियों को रोकने के लिए अहम फैसले लिए। अपने प्रयासों को माध्यम से वे कुछ कुरीतियों को जड़ से समाप्त करने में सफल भी रहीं।

सती प्रथा
रानी साहिबा ने सती प्रथा का कड़ा विरोध किया स्वयं के सती होने को दौरान अपने ससुर के रोके जाने पर उन्हें समझ आया की पति के जाने पर स्वयं को दण्ड देना उचित नहीं है ऐसा करने पर हम अपनी और अपने चाहने वालों की जिम्मेदारियों से पीछे हट रहे है जो कि बुज़दिल होने की पहचान है। इस परम्परा के चलते स्वयं इच्छा से सती न होने वाली महिलाओं के साथ समाज द्वारा अत्याचार किया जात था। अंत उपरोक्त कारणों के चलते रानी साहिबा ने इस प्रथा का विरोध किया।

भृगु पतन
इस प्रथा में मोक्ष पाने य स्वर्ग जाने के प्रति अंधविश्वास प्रचलित था कि पहाड़ी से कूदकर आत्महत्या करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस प्रथा के चलते हजारों लोग सदियों से अपनी जान देते आ रहे थे। इस प्रथा के पूर्ण करने के लिए प्रचलित स्थल नर्मदा नदी के किनारे और ओंकारेश्वर के निकट ऊंची खड़ी पहाड़ी थी। जहां से लोग कूदकर अपने जान दिया करते थे। पहले तो रानी साहिबा ने लोगों को समझाने का प्रयास किया लेकिन लोगों के नाम न मानने पर उनके प्रशासन द्वारा कड़े नियम बनाए गए। इसके चलते यह प्रथा समाप्त हुई।

नारी शिक्षा को बढ़ावा
अपने साम्राज्य की शिक्षा दीक्षा के लिए रानी साहिबा ने गुरुकुल और विद्यालयों की स्थापना करवाई। उस समय काल को दौरान स्त्री समाज को शिक्षा से दूर रखा जाता था जिसके कारण उनका बड़ा शोषण होता था। अपने स्वयं एक महिला होने के नाते रानी साहिबा इस दर्द को समझ सकती थी। परिणामस्वरूप रानी साहिबा ने महिला शिक्षा को ही नहीं बढ़ावा दिया बल्कि उन्हें अन्य कौशल जैसे घुड़सवारी तीरअंदाज़ी युद्ध कौशल के लिए भी अलग से शिक्षा शिविर खोले।

अपने इस कार्य को बढ़ावा देने के लिए रानी साहिबा ने महिला सेना का भी गठन किया जिसके कारण रानी साहिबा राज्य की रक्षा कानून व्यवस्था और महिला सशक्तिकरण का प्रतीक बनी। इसके साथ ही रानी अहिल्याबाई ने महेश्वर में कपड़ा उद्योग की स्थापना करवाई जो आज भी अपनी महेश्वरी साड़ियों के लिए प्रसिद्ध है।

धार्मिक कार्य

धर्म और ज्ञान में गहरी रुचि के चलते रानी साहिबा ने कई मंदिरों का निर्माण करवाया जिनमें 12 में से दो ज्योतिर्लिंग उन्ही के द्वारा  निर्मित करवाए गए है। इसके साथ ही उन्होंने कई परोपकारी कार्य किए जैसे उत्तर भारत में मंदिरों घाटों तालाबों विश्राम गृहों का निर्माण भी करवाया।

1780 के समय काल में रानी साहिबा ने काशी विश्वनाथ मंदिर का विनिर्माण करवाया था। उनके योगदान का सम्मान देते हुए संस्थापकों द्वारा मंदिर में रानी अहिल्याबाई होल्कर की प्रतिमा भी स्थापित की गई है। इसके अलावा रानी साहिबा ने गुजरात  प्राचीन  सोमनाथ मंदिर का निर्माण कराया था खास बात  यह है कि यह मंदिर रानी साहिबा के नाम से ही लोकप्रिय है। हाल ही के समय में 20 अगस्त 2021 इस मंदिर का पुनः निर्माण करवाया गया है तथा मंदिर का उद्घाटन प्रधान मंत्री जी द्वारा किया गया।

31 मई 2025 को महारानी अहिल्या बाई होल्कर की 300वीं जयंती के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने भोपाल में विकास की कई परियोजनाओं का उद्घाटन किया। इसके अलावा भारत सरकार ने रानी साहिबा के सम्मान में स्मारक के रुप में डाक टिकट और एक विशेष सिक्का भी जारी किया गया है। बताया जा रहा है कि 300 के सिक्के पर रानी अहिल्याबाई होल्कर का चित्र होगा। इसके साथ ही लोक और पारंपरिक कलाओं में योगदान के लिए एक महिला कलाकार को राष्ट्रीय देवी अहिल्याबाई पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

अहिल्याबाई होल्कर कर्च माफी योजना
इस योजना के तहत महाराष्ट्र सरकार द्वार किसानों को वित्तीय सहायता करते हुए कर्ज में राहत दी जा रही है। इस योजना के तहत सरकार किसानों का दो लाख तक का फसव ऋण माफ किया जा रहा है। 26 मार्च 2026 को इस योजना को प्रारम्भ किया गया है।

अंतिम समय और विरासत

रानी साहिबा अहिल्याबाई का निधन 13 अगस्त 1795 को सत्तर वर्ष की आयु में हुआ। उनकी विरासत आज भी जीवित है उनके द्वार बनाये गए मंदिर सर्वजनीक स्थल इस बात का गवाह हैं। अहिल्याबाई की विरासत उनके द्वारा बनाए गए किले में झलकती है वे एक रानी ही नहीं एक महान योद्धा भी थीं। उनका सम्पूर्ण जीवन पूरे भारतीय समाज के सदैव के लिए एक मार्गदर्शक के रुप में कार्य करता रहेगा। हलांकि अहिल्याबाई का जन्मस्थान महाराष्ट्र में था लेकिन उनकी झलक इंदौर महेश्वर और कई अन्य क्षेत्रों में देखने को मिलती है।
 


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