प्रस्तावना
प्रस्तुत लेख में अदिवासी समुह से आने वाले महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अल्लूरी सीता राम राजू के जीवन तथा उनके द्वारा किए गए महत्वपुर्ण कार्यों पर प्रकाश डाला गया है। इसके साथ रम्पा विद्रोह की घटना के पिछे के मुख्य कारण तथा अल्लूरी सीताराम राजू के जीवन की महत्वपूर्ण घटना पर प्रकाश डालेंगे।
जीवन परिचय
यह एक भारतीय क्रांतिकारी थे जिन्होंने भारत में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह किया था। उन्होंने वर्तमान समय में आंध्रा तथा उडिशा राज्य के सीमावर्ती इलाकों में ब्रिटिश सेना के खिलाफ गौरिल्ला युद्ध अभियान चलाए तथा 1922 के समय काल में रम्पा विद्रोह का नेतृत्व किया। इनके क्षेत्र के लोग इन्हें मन्यम वीरुडु के नाम से पुकारते थे व अभी भी जानते है। मन्य वीरुडु का हिन्दी में अर्थ है जंगल का नायक य राजा।
इनका जन्म वर्तमान आंध्रा प्रदेश जो कि अतीत में मद्रास प्रेसीजेंसी का हिस्सा था के एक तेलुगु आदिवासी परिवार में हुआ। बताया जाता है कि अपनी युवावस्था में उनकी की एक प्रेमीका थी जिससे वे बेहद प्रेम करते थे जिनका नाम सीता था। उनके जन्म के समय को लेकर विवाद है कुछ लोग उनके जन्म का समय 4 जुलाई 1897 मानते है तो कुछ लोग 1898 मानते है।
अपातकालीन स्थिती में उनकी प्रेमीका की मृत्यु हो गयी जिससें रामाराजू को गहरा दूःख हुआ और 18 वर्ष की आयु में ही इन्होंने सन्यास धारण किया। अपनी प्रेमीका की हमेशा याद रखने के य यादगार के रुप में इन्होंने अपने नाम के आगे सीता नाम जोड़ दिया। इस घटना के बाद इनका पुरा नाम अल्लूरी सीता रामा राजू हो गया।
शिक्षा
रामा राजू ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा अपने क्षेत्रीय विद्यालय से पूर्ण की इसके बाद काकीनाडा में हाई स्कूल में दाखिला लिया। स्कूल में उनकी मुलाकात मद्दूरी अन्नपूर्णैया से हुई जो भी आगे चलकर भारतीय क्रांतिकारी बने। 15 वर्ष की आयु में आगे की पढ़ाई करने के लिए वे अपनी मां अथवा अपनी नानी के घर विशाखापत्तनम चले गए। विशाखापत्तनम आने के बाद श्रीमती HVN कालेज में दाखिला लिया।
विशाखापत्तनम में ही रहते हुए उन्होंने दूरदराज पहाड़ी क्षेत्रों का दौरा किया और ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के तहत आदिवासियों द्वारा सामना की जाने वाली समस्याओं से परिचित हुए।
प्रेम प्रसंग
रामा राजू को अपने दोस्त की बहन सीता से प्रेम हो गया जिसकी कम उम्र में असमय मृत्यु ने उन्हें बहुत दुःखी किया। इस घटना के बाद रामा राजू ने अपना स्कूल छोड़ दिया अपने चाचा रामा कृष्णन राजू जो नरसपुर के तहसीलदार थे जिनके आग्रह पर उनका दाखिला नरसपुर के टेलर हाई स्कूल में दाखिला दिलाया गया।
बताया यह भी जाता है कि उनकी समकालीन रिपोर्ट के अनुसार उनकी रुचि ज्योतिष शास्त्र जड़ी बूटी चिकित्सा तथा हस्तरेखा शास्त्र साथ-साथ घुड़सवारी में विशेष रुचि थी। बताया जाता है कि 18 वर्ष की आयु में वे सन्यासी बन गए शायद सीता जी प्रेम में।
सन्यासी जीवन
सन्यासी बनने का बाद के जीवन में उन्होंने विभिन्न आध्यात्मिक साधनाओं का अभ्यास किया और जड़ी-बूटियों से उपचार कनरे में निपुण बन गए। 1921 के समय काल में उन्होंने गंगा और गोदावरी नदियों के उद्गम स्थलों यानी गंगोत्री और नासिक की यात्रा की। अपनी यात्रा के दौरान ही उनकी उनकी मुलाकात चटगांव में कई भारतीय क्रांतिकारियों से हुई।
इसके बाद आदिवासीयों की समस्याओं को करीब से जानने के लिए आदिवासियों के बीच एक संयमी जीवन व्यतीत किया। फल और शहद जैसे खाद्य पदार्थों का असली अनुभव पाकर उन्होंने उन्ही का जीवन अपनाने का निर्णय लिया। इस प्रकार व राजा मंडी के पास पापी पहाड़ियों में बस गए खास बात यह है कि इस क्षेत्र में आदिवासी आबादी का वर्चस्व था। आगे चलकर वे 20 शताब्दी के समय काल में आदिवासी समुदाय के नेता बन गए।
रम्पा विद्रोह 1922-24
इस विद्रोह का मुख्य कारण मद्रास वन अधिनियम था जिसने आदिवासीयों की अपनी पारंपरिक कृषी पद्धति को अपनाने से रोका। इसके साथ ही इस अधिनियम ने आदिवासीयों को अपने वन आवासों में स्वतंत्र आवागमन को प्रतिबंधित किया और वनों के आर्थिक मूल्य का दोहन किया। इन सभी कारणों को चलते आदिवासी समुदाय का जीवन खतरे में पड़ गया। जिसके चलते पुरे समुदाय में अक्रोश फैल गया।
अल्लूरी रामा राजू ने इन शिकायतों के मद्देनजर सभी आदिवासी समुदाय को एक जूट किया तथा अपने कुछ अन्य बाहरी सहयोगियों के साथ मिलकर एक सेना का निर्माण किया तथा आंध्रा प्रदेश तथा उडिसा राज्य के सिमावर्ती क्षेत्रों में गौरिल्ला अभियान चलाया। रामा राजू की सेना ब्रिटिश सेना को मद्रास प्रेसीडेंसी के पूर्वी घाट क्षेत्र से खदेड़ने में सफल रहें।
इसके बाद सेना को और मजबूती प्रदान करने के लिए पुलिस थानों पर छापे मारे गए तथा सभी हथियार लूट लिए गए।
उपरोक्त प्रकार के विद्रोहों को दबाने के लिए ब्रिटिश सेना ने दो साल तक अभियान चलाए। अंत में सफलता न मिलने पर रामा राजू पर 40 लाख रुपये का इनाम रखा गया जो कि वर्तमान 2026 के समय काल में 500 करोड़ से लेकर 1800 करोड़ के लगभग होती है।
उस समय काल में सोना एक तोला मान के चलिए 12 ग्राम सोने की कीमत 20 रुपये थी और वर्तमान समय यानी 2026 में 1 तोला सोने की कीमत 85000 से लेकर 90000 के लगभग है। इस प्रकार भारी कीमत के लालच में आकर उन्हीं के सहयोगीयों ने उन्हें धोखा दिया और अंत में 6 जून 1924 में उन्हें चिंतपल्ली के जंगलों में गिफ्तार कर लिया गया। इसके बाद एक पेड़ में बांध कर गोली मार कर उनकी हत्या कर दि गयी जिसके बाद से रम्पा विद्रोह भी समाप्त हो गया।
सम्मान और समारक
जवाहर लाल नेहरु
इन्होंने कहा की रामा राजू उन गिने- चुने नायकों में से एक थे जिन्हें उंगलियों पर गिना जा सकता है।
नेता सुबाष चंद्र बोस
उनके याद में उन्होंने यह कहा कि रामा राजूू अपने दृढ़ संकल्प पे अडिग रहे तथा उनक अद्वितीय साहस और बलिदान ने उन्हें इतिहास में एक उच्च स्थान दिलाया है।
इतिहासकार डेविड अर्नोल्ड अपनी किताब द रिबेलियस हिलमैन के शिर्षक द गुडमैन रम्पा राइजिंग 1939-1924 में एक वृतांत में उ्ल्लेख करते है कि आदिवासी लोग अल्लूरी सिता रामा राजू को हिंदू देवता राम के रुप में देखते थे। जो कि एक ऐसा सम्मान था जो कि उन्होंने एक धार्मिक व्यक्ति होने के बावजूद कभी नही मांगा था। और वर्तमान में साधुओं की स्थिती तो आप देख ही सकते है ज्यादातर लोग काला धन छुपाने के लिए साधू बनते है और प्रचार प्रसार में खुब पैसा खर्च करते हैं।
भारतीय डाक विभाग द्वारा 1986 में उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया गया। इसका साथ ही 4 जूलाई जो कि उनका जन्म दिवस है को पुरे आंध्रा प्रदेश में प्रतिवर्ष राजकीय उत्सव के रुप में मनाया जाता है।
उनके नाम पर जिला खेल प्राधिकरण और आंध्रा क्रिकेट एसोसिएशन के सहयोग से एलुरु में क्रिकेट स्टेडियम का नाम रखा गया 1974 में जिसका पुरा नाम है अल्लूरी सीताराम राजू स्टेडियम।
9 अक्टूबर 2017 में उनकी प्रतिमा को भारत सरकार ने उनके कार्यों को याद रखते हुए भारतीय संसद परिसर में स्थापित करवाया।
2022विशाखापत्तनम में उनके नाम पर अल्लूरी सीताराम राजू जिले का नामकरण किया गया जिसका मुख्यालय पडेरु में स्थित है।
इसके साथ ही 2024 आंध्र प्रदेश सरकार ने भोगापुरम में अल्लूरी सीताराम राजू अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे का नाम रामा राजू के नाम पर रखा गया है जिसे हमें alluri sitarama raju international airport के नाम से जानते है।
निष्कर्ष
अल्लूरी सीताराम राजू केवल ब्रिटिश सरकार के खिलाफ लड़ने वाले स्वतंत्रता सेनानी ही नही थे ब्लकि आदिवासी समाज के अधिकारों और स्वाभिमान के रक्षक भी थे। मान्य वीरुडु यानी जंगल का नायक के रुप में उनका जीवन सिखाता है कि अन्याय के विरुद्ध खड़े होने के लिए दृढ़ इच्छा शक्ति ही सबसे बड़ा हथियार है। मात्र 26 वर्ष की आयु में दिया गया उनका सर्वोच्च बलिदान भारत के इतिहास में सदैव स्वर्ण अक्षरों में अंकित रहेगा और आने वाली पीढ़ीयों को देशभक्ति की प्रेरणा देता रहेगा।
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