9b45ec62875741f6af1713a0dcce3009 Indian History: reveal the Past: History

यह ब्लॉग खोजें

लेबल

in

History लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
History लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 29 मई 2026

कुल धारा

kuldhara village

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम कुल धारा जिसे एक शापित गांव भी कहते है इसके पीछे की कहानी को जानेंगे इसके साथ ही इतिहास में इस स्थान पर घटी उस घटना पर प्रकाश डालेंगे जिसके कारण 84 हजार ग्राम वासियों को इस गांव को छोड़ना पड़ा। तथा इस राज़ से भी पर्दा उठायेंगे की यह कोई शापित गांव नहीं था। लेकिन लोगों का रहस्यमय तरीके से गायब होना वर्तमान समय में लोगों को जरूर सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर उस गांव में क्या हुआ था। वर्तमान समय में यह गांव पुरातत्व विभाग के अधीन है जहां सूरज ढलने के बाद रुकने पर सख्त मनाही है। तो आइये तथ्यों के आधार पर इस गांव के उत्थान विनाश और आधुनिक वैज्ञानिक खोजो को समझते है। 

इतिहास

13वीं सदी के समय काल में  राजस्थान के जोधपुर की पाली रियासत के राजा के अत्याचारों और भारी कर से तंग आकर ये लोग जैसलमेर रियासत में आ कर बसना इनकी मजबूरी थी। किताब  तवारीख-ए-जैसलमेर के अनुसार कधान नाम  के इस पालीवाल ब्राह्मण ने कुल धारा की नींव रखी तथा इसका निर्माण किया था । पुरा तात्विक साक्ष्यों में मिले शिलालेखों से यह पता चला है कि यह गांव 800 साल पुराना है। ये पालीवाल ब्राह्माण महान वैज्ञानिक और बेहतरीन सिविल इंजीनियर थे। जिसका प्रमाण हमें जल जमा करने की खादीन प्रणाली से मिलता है। यह तकनीक राजस्थान जैसे इलाके जहां 50 डिग्री से भी अधिक तापमान चला जाता है और बारिश भी कम होती है जगह पर किसी खजाने से कम नहीं थी।

खादीन तकनीक

वे पथरीली ढलान वाले इलाके के नीचे मिट्टी का मजबूत बांध बनाते थे, जिससे बारिश का पानी खेतों में जमा हो जाता था। यह पानी जमीन के नीचे रिसकर कूओं को रिचार्ज करता था। इस रिसाव प्रक्रिया से गुजरने के कारण पानी में से नमक निकल जाता था और पानी खेती और पिने योग्य हो जाता था। जिस कारण से यहां गेहूं और चने की बंपर पैदावार होती थी।

वास्तुकला का अच्छा ज्ञान

कुलाधारा वासियों को वास्तुशास्त्र का अच्छा ज्ञान था जिसके कारण इनके गांव आधुनिक तरीकों से प्लांड सिटी की तरह ग्रिड पैटर्न पर बसा हुआ था। गांव के घर 50 डिग्री की गर्मी में भी प्राकृतिक रुप से ठंडे रहते थे। इसके लिए वे मिट्टी की 1.5 फिट की दीवारें बनाते थे तथा घरों में वेंटिलेशन के लिए आंगन में पत्थरों की खूबसूरत नक्काशीदार जालियां बनाते थे जो हवा को तेजी से ठंडा करती थीं।

पलायान का मुख्य कारण

19 सदी में जैसलमेर में महाराजा मूलराज द्वितीय का शासन था जो कि एक प्रभावशाली राजा नहीं थे उनकी अपेक्षा उनका दीवान ही शासन चलाता था जो कि एक क्रूर दीवान था। दीवान सालिम सिंह मेहता बहुत की अय्याश किस्म का व्यक्ति था। एक दिन उसकी नजर कुलधारा के मुखिया की खूबसूरत बेटी पर पड़ी। उसने जबरन कुलधारा के मुखिया को उसकी बेटी से शादी करने का पैगाम भेज दिया और इनकार करने पर पूरे गांव को प्रताडि़त करने की धमकी दी। अपनी बेटी के सम्मान और समुदाय के सम्मान की रक्षा के लिए रात में गांव में एक गुप्त पंचायत बुलाई गयी जिसमें कुलधारा के 84 गांव के मुखिया शामिल हुए । उन्होंने गुलामी स्वीकार करने की बजाय अपनी 500 साल पुरानी पुरखों की जमीन को हमेशा के लिए छोड़ने का फैसला लिया और एक ही रात में पूरा इलाका वीराने में बदल गया।

कहानी का दुसरा पहलू

बताया जाता है की सालिम सिंह के पिता स्वरुप सिंह जो की पहले के दीवान थे ने जब पालीवालों पर जबरन टैक्स लगाना चाहा , तो दरबार में हुए विवाद के कारण राजकुमार राय सिंह ने स्वरुप सिंह की हत्या कर दी थी। उस समय सालिम सिंह सिर्फ 11 वर्ष का था। बड़े होकर जब सालिम सिंह दीवान बना तो पालीवालों पर अत्याचार करना सिर्फ उसका लालच नहीं बल्कि दशकों पुराना उसका प्रतिशोध था। खास बात यह है कि यह की यह वृतांत कर्नल जेम्स टाड की किताब Annals and Antiquites of Rajasthan में भी दर्ज है की सालिम सिंह ने कुलधारा वासीयों पर  भारी टैक्स लाद दिए थे जिससे वे पहले ही परेशान थे। बेटी का विवाद इस उत्पीड़न की आखिरी कड़ी थी।

श्राप के पीछे का कारण य कूटनीति

पालीवाल ब्राह्माण अत्यधिक बुद्धिमान थे वे जानते थे कि सालिम सिंह उनकी उपजाऊ भूमि आलीशान गांव पर कब्जा करना चाहता है। चूंकि वे सेना से लड़ नहीं सकते थे इसलिए उन्होंने श्राप की अपवाह को एक सामाजिक आर्थिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया। उस समय काल के लोग कुछ ज्यादा ही अंध विश्वासी थे जिसके कारण कुलधारा की जमीन को शापित घोषित करने में उन्हें कोई समस्या नहीं हुई। परिणामस्वरूप कोई भी किसान इन ज़मीनों पर दुबारा बसने नहीं आया। अंत में सालिम सिंह के हाथ सिर्फ खण्डहर लगे।

आधुनिक रिसर्च के प्रमाण

ऐतिहासिक जनसंख्या आंकड़ों के अनुसार 18 वीं सदी में यहाँ की आबादी करीब 800 थी जो कि 1890 तक धीरे-धीरे घटकर 37 रह गई । यह प्रमाण बताता है कि पलायन एक रात में नहीं बल्कि कई दशकों में हुआ था। पलायन का मुख्य कारण काकनी नदी का सुखना था क्योंकि कुल धारा इसी नदी के तट पर बसा हुआ था जिसके कारण यहीं उनके जीवन यापन का मुख्य स्रोत थी।

2017 की भूकंप थ्योरी

2017 में जर्नल वैज्ञानिक और उनकी टीम का एक रिसर्च पेपर प्रकाशित हुआ। इस पेपर ने उनकी टीम ने खुलासा किया की कुल धारा और खाबा गांव के घरों की छतें, बीम और खंभे एक ही दिशा में गिरे हुए हैं , की एक विनाशकारी भूकंप का स्पष्ट प्रमाण है। संभव है कि अकाल और टैक्स से परेशान लोगों के घर जब भूकंप में ढह गए , तो बची आबादी ने उसी रात हमेशा के लिए इस जगह को छोड़ दिया।2018 में आई आई टी बाम्बे और कई शीर्ष विश्वविद्यालयों के वैज्ञानिकों ने रेडियो कार्बन डेटिंग और आधुनिक तकनीकों के जरिए इस गांव के मिट्टी के बर्तनों, अनाज और जली लकड़ियों के नमूनों की जांच शुरु की , ताकि तथ्यों को कहानियों से अलग किया जा सके।

डार्क टुरिज्म और भुतिया दांवों का सच

आज कूलधरा भारत के सबसे बड़े डार्क टूरिज्म स्थलों में से एक है। लोग यहां इतिहास से ज्यादा भूतों की कहानियों और पैरानार्मल गतिविधियों जैसे परछाई दिखना, कदमों की आवाजें, अचानक तापमान गिरना का अनुभव करने आते है। लेकिन मनोवैज्ञानिक सच की बात करें तो वैज्ञानिक और शोधकर्ताओं के अनुसार जब आप किसी वीरान सुनसान जगह पर यह सोचकर जाते है कि वह भुतिया है तो आपका दिमाग हवा की सरसराहट या किसी जानवर की परछाई को भी डरावना रुप दे देता है।

हमारे विचार से भी कुल धारा गांव सच में श्रापित  है किसी प्रेत आत्मा से नहीं बल्कि शापित था दीवान सालिम सिंह की क्रूरता से, प्राकृती के सुखे मिजाज से और एक विनाशकारी भूकंप से। आज यह गांव उस भूतिया टैग से शापित जो कि इसके निवासियों के महान विज्ञान अद्भुत जल इंजीनियरिंग, और आत्मसम्मान के लिए सब कुछ न्योछावर करने देने वाले गौरवशाली इतिहास को दबा रहा है। 

मंगलवार, 26 मई 2026

अष्टांग हृदय

ashtanga hridaya

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम आयुर्वेद विज्ञान के सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ अष्टांग ह्रदय के बारे में चर्चा करने जा रहे है आयुर्वेद विज्ञान के इस ग्रंथ के साथ ही हम अन्य महत्वपूर्ण ग्रंथों के बारे में भी जानेंगे। इसके साथ ही हम जानेंगे इस ग्रंथ का इतिहास तथा इसे किन ग्रंथों की छाया प्रति के रुप में सरलीकरण करके प्रस्तुत किया गया है। 

दोस्तों यह विषय इसलिए भी महत्वपूर्ण क्योंकि हाल ही में हमने और आपने कफ़ सिरप कांड के बारे से सुना होगा जिसमें लगभग 150 से अधिक नवजात बच्चों कि जाने चली गयीं। हमारे कहने का मतलब यह है कि हम एक ऐसे देश में रहते है जहां मौतें होने के बाद पता चलता है कि हमें यह दवा नहीं खानी है। सोच कर देखें तो जिन छोटे बच्चों का हम जान से भी ज्यादा ख्याल करते है उनकी जान एक दवा खाने से जा रही है और ऐसा भारत जैसे देश में ही नहीं अमेरिका जैसे विकसित देशों में भी हो रहा कोविड 19 की दवा के दौरान भी ऐसा हो चुका है कम्पनी पर अमेरिकन कोर्ट द्वारा भारी जुर्माना भी लगाया गया था।

मगर सोचकर देखीए इन दवाओं से जिन लोगों की जानें गयी क्या वो लोट कर सकते है नहीं तो ऐसे में हमें खुद से अपने ओर अपने चाहने वालों ख्याल रखना होगा सरकार के भरोसे पड़े रहने से कुछ नहीं होने वाला। हम सलाह देते है आयुर्वेद को अपनाईये हम ऐसा नहीं कहते है आयुर्वेद के नुकसान नहीं है मगर इसका शरीर पर धीरे धीरे असर पड़ता है जिसके कारण जान का खतरा कम रहता है समय से इलाज हो सकता है। रासायनिक सब्जीयों का इस्तेमाल कम करें तथा आर्गेनिक फलों तथा सब्जियों को खाना प्रारम्भ करें और स्वास्थ्य रहें।

इतिहास

यह ग्रंथ आयुर्वेद विज्ञान का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और कालजयी ग्रंथ है । इसकी रचना महर्षि वाग्भट्ठ द्वारा छठवीं तथा सातवीं शताब्दी के मध्य कालीन समय में की गई थी। आयुर्वेद के इतिहास में इसे वृहतत्रयी यानी तीन महान ग्रंथ संहिता सुश्रुत संहिता चरक संहिता तथा एक अज्ञात तीसरे ग्रंथ को समा योजित कर एक मुख्य ग्रंथ का रुप दिया गया है । जिसके कारण इस ग्रंथ को वृहतत्रयी भी कहा जाता है। आयुर्वेद के इतिहास में अष्टांग हृदय का आना एक क्रांतिकारी मोड़ था। सबसे पहले इसे आयुर्वेद के दो मुख्य रुपों में बांटा गया। प्रथम आत्रेय सम्प्रदाय तथा धन्वन्तरि सम्प्रदाय।

आत्रेय सम्प्रदाय
यह काया चिकित्सा विज्ञान पर आधारित है जिसे हम जनरल मेडीसिन के नाम से भी जानते है। इसे चिकित्सा के प्रमुख ग्रंथ चरक संहिता से लिया गया है।

धन्वन्तरि सम्प्रदाय
यह शल्य तन्त्र  पर आधारित है जिसे हम सर्जरी पर आधारित भी मानते है इसे सुश्रुत संहिता से लिया गया है।

यह दोनों ग्रंथ बहुत विशाल थे जिसके कारण आम चिकित्सकों के लिए दोनों का संपूर्ण अध्ययन करना और इन्हें याद रखना काफी कठिन था। ऋषि वाग्भट ने इस समस्या को समझते हुए चरक संहिता की चिकित्सा और सुश्रुत संहिता की शल्यक्रिया के सर्वोत्तम ज्ञान को समेटकर , इसे सरल और काव्यात्मक रुप में पिरोया। उन्होंने आयुर्वेद के आठ अंगों का सार निकालकर इस ग्रंथ की रचना की जिसके कारण इसका नाम आष्टांग हृदय पड़ा।


एक महत्वपूर्ण ग्रंथ क्यों है

इस ग्रंथ में आयुर्वेद के सभी आठ विभागों का ज्ञान एक ही जगह मिल जाता है जिन्हें हम क्रमबद्ध तरीके से नीचे प्रस्तुत कर रहे है
1.काय चिकित्सा जिसे हम जनरल मेडिसिन के नाम भी जानते है
2.बाल चिकित्सा जिसे हम कौमारभृत्य या paediatrics के नाम से भी जानते है।
3.ग्रह चिकित्सा इसे हम भूत विद्या यानी psychiatry or Spiritual healing के नाम से भी जानते है ।
4.ऊध्वाग चिकित्सा यानी शालाक्य तन्त्र य ENT and Ophthalmology को नाम से भी जानते है।
5.दृंष्ट्राचिकित्सा य अगदतन्त्र अथवा Toxicology के नाम से भी जानते है।
6.जरा चिकित्सा य रसायन या Geriatics Rejuvenation के नाम से भी जानते है।
7.वृष्यचिकित्सा य वाजीकरण Aphrodisiac therapy नाम से भी जानते है।
8.शल्य चिकित्सा जिसे हम surgery के रुप में भी जानते हैं।


ग्रंथ की संरचना

इस ग्रंथ में कुल 6 भाग तथा 120 अध्याय है इसमें आयुर्वेद के मूल सिद्धांतों दिनचर्या ऋतुचर्या आहार विहार और रोगों के कारण बताए गए है।
1.सूत्र स्थान 
इसके अन्तर गत सिद्धांत दिनचर्या ऋतुचर्या आहार विहार और रोगों के बारे में अध्याय 30  में बताया गया है।
2.सूत्र स्थान
अध्याय 6 के अन्तर गत मानव शरीर की रचना ,गर्भधारण और भ्रूण के विकास के बारे में जानकारी दी गई है।
3.निदान स्थान
अध्याय 16 को अंतर्गत रोगों के लक्षण उनके कारण और बीमारियों की पहचान के तरीके बताए गए हैं।
4. चिकित्सा स्थान
अध्याय 22 के अंतर्गत विभिन्न बीमारियों के नुस्खे दिए गए हैं।
5.कल्प सिद्धि स्थान
अध्याय 66 के अंतर्गत पंचकर्म वमन विरेचन और औषधियों कको बनाने की विधि बताई गई है।
6.अत्तर स्थान
इसमें बाल रोग, आंख कान नाक के रोग मानसिक रोग और विष विज्ञान के बारे में तथा इनकी शाखाओं का विस्तृत वर्णन किया गया है।

ग्रंथ की भाषा सरल और काव्यात्मक होना

चरक और सुश्रुत संहिता गद्य prose यानी जटिल भाषा में थी लेकिन वाग्भट ने अष्टांग हृदयम् के श्लोकों में लिखा। अतः छंद में होने के कारण इसके सिद्धांतों और जड़ी-बूटियों के फार्मूला को याद रखना चिकित्सकों के लिए बेहद आसान हो गया।

सूत्र स्थान

शुरुआती अध्याय में आयुर्वेद जगत में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इसमें दिनचर्या यानी डेली रुटीन ऋतुचर्या यानी सिज़नल रुटीन  आहार विहार और रोगों के मूल कारणों को इतनी सटीकता से समझाया गया है कि यदि कोई सामान्य व्यक्ति भी इसका पालन करे तो वे जल्दी बीमार न पड़े।
व्यावहारिक और संक्षिप्त
वाग्भट जी वे पुराने ग्रंथों की अति विस्तृत और दार्शनिक बातों को हटाकर सीधे उपचार और चिकित्सा पर ध्यान केंद्रित किया है इस ग्रंथ में । इस ग्रंथ में दी गई दवाओं योग आज भी सबसे ज्यादा प्रभावी और आसानी से तैयार होने वाले माने जाते है।

वैश्विक स्वीकारता

अष्टांग हृदयम् का महत्व केवल भारत तक सीमित नहीं रहा है इसका प्राचीन काल में ही अनुवाद तिब्बती अरबी फारसी और जर्मन जैसी भाषाओं में हो चुका है। तिब्बती चिकित्सा पद्धति पर तो इस ग्रंथ का बहुत गहरा असर है।

रविवार, 24 मई 2026

मेघनाथ साहा

meghnad saha

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में देश के महान वैज्ञानिक एवं क्रांतिकारी नेता मेंघनाथ साहा तथा उनके द्वारा की गई महत्वपूर्ण खोज के बारे में बताया गया है। ये वही वैज्ञानिक है जिनका नाम 6 नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया था मगर नोबेल पुरस्कार नहीं मिल पाया। कुछ लोग इस के पीछे के कारण उनका छोटी जात का होना मानते है। मगर कुछ विचारकों का मानना है कि इसके पीछे का कारण उनकी खोज के प्रमाणीकरण को सही न मानना था। इसके साथ ही हम इस लेख में उनके नाम पर बनी महत्वपूर्ण स्मारक स्थल के बारे में चर्चा करेंगे।

प्रारम्भिक जीवन 

उनका जन्म 6 अक्तूबर 1893 को शाओराटोली वर्तमान बंगला देश में हुआ था। अपने परिवार के निर्धन होने के बावजूद भी अपनी प्रतिभा के दम पर छात्र वृत्ति हासिल कर अपनी पढ़ाई जारी रखी। इसके साथ ही उन्होंने कलकत्ता प्रेसडेंसी कालेज से शिक्षा हासिल की और पढ़ाई। इनके मित्रों कि सूची में सत्येन्द्र नाथ बोस का नाम आता है। इनके प्रिय शिक्षक की सूची में जगदीश चन्द्र बोस तथ  प्रफुल्ल चन्द्र राय का नाम आता है।

इनके द्वारा किए गए कार्य

1.साहा समीकरण
1920 में इन्होंने साहा आयनीकरण समीकरण का प्रतिपाद किया। यह समीकरण खगोल भौतिकी के बुनियादी स्तंभों में से एक है। इसका महत्व समझें इस समीकरण की मदद से हमें पता चलता है कि किस तरह से किसी तारे जैसे सूर्य के अत्यधिक तापमान के कारण उसके तत्व किस तरह से आयनित यानि lonize होते हैं। इसके साथ ही इस समीकरण की मदद से वैज्ञानिक दूर स्थित तारों के तापमान, दबाव और वहां मौजूद तत्वों जैसे हाई़़ड्रोजन हीलियम की मात्रा का सटीक पता लगाने में सक्षम हुए। प्रसिद्ध खगोल शास्त्री नोरिस रसेल ने इसे गैलीलियो के बाद खगोल विज्ञान की सबसे बड़ी खोज बताया था।

2.साहा इंस्टीट्यूट आफ न्यूक्लियर फिजिक्स की स्थापना इनके द्वारा कलकत्ता में की गई जो कि परमाणु भौतिकी के रिसर्च का एक प्रमुख केंद्र बना। मेघनाद साहा केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रहे ,उन्होंने भारत में विज्ञान के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य किये।
3.इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अन्तर गत भौतिकी विभाग को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
4.विज्ञान के प्रचार एवं प्रसार तथा लोगों को विज्ञान के प्रति जागरूक करने के लिए इन्होंने साइंस एंड कल्चर पत्रिका की शुरुआत की।
5.वैज्ञानिक कार्य के साथ ही इन्होंने भारतीय सामाजिक कार्य तथा राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण कार्य किया। भारत में बाढ़ की समस्या के निपटने के लिए दामोदर घाटी परियोजना तथा भाखड़ा नांगल बांध परियोजना की रुप रेखा तैयार करने में अहम भूमिका निभाई।

6.राष्ट्रीय योजना सनिति की स्थापना
नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के आग्रह पर भारत के योजनाबद्ध विकास के लिए इस समिति का गठन में अहम भूमिका निभाई जिसके अध्यक्ष बाद में जवाहर लाल नेहरु जी बने।

7.कैलेंडर सुधार में अहम भूमिका निभाई इन्होंने शाक कैलंडर त्रुटि सुधार में महत्वपूर्ण कार्य किया।
8.वे एक ऐसे वैज्ञानिक थे जिनका मानना था कि वैज्ञानिकों की आवाज उठाने के लिए सांसद में एक सीट होने चाहिए जिसके चलते 1952 में उत्तर पश्चिम कलकत्ता सीट से एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रुप में भारी बहुमत से लोकसभा सांसद चुने गए।

निधन

16 फरवरी 1956 तो नई दिल्ली में योजना आयोग के दफ्तर जाते समय दिल का दौरा पड़ने के कारण उनका निधन हो गया। मेघनाथ साहा का जीवन इस बात का प्रतीक है कि कैसे एक व्यक्ति अभावों से उठकर न केवल वैश्विक विज्ञान को नई दिशा दे सकता है, बल्कि अपने देश के विकास में भी अद्वितीय योगदान दे सकता है। 

नोबेल पुरस्कार न का कारण

यह विज्ञान के इतिहास का सबसे बड़ा विवाद और अन्यायों में से एक माना जाता है। नोबेल पुरस्कार पाने के लिए किसी वैज्ञानिक का नाम आधिकारिक रुप से नामांकित किया जाना जरूरी होता है। मेघनाद साहा का नाम 1930 1937 1939 1940 1951 1955 में भौतिकी के नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया। लेकिन कुछ प्रमुख कारणों के चलते हुन्हें नोबेल पुरस्कार नहीं मिल पाया।

मूल्यांकन कर्ताओं की राय

नोबेल समिति के मुख्य मूल्यांकन कर्ता स्वीडिश भौतिक विज्ञानी कार्ल सीगबान थे। उनका मानना था कि साह कि खोज खगोलीय अनुप्रयोग है न कि शुद्ध भौतिकी मानने में थोड़ा संकीर्ण सोच रखती है। इसके साथ ही यह भी कहा गया कि उनकी खोज सैद्धांतिक है। उन्होंने गणित और भौतिकी के नियमों का उपयोग करके समीकरण दिया था। नोबेल समिति अक्सर उन खोजों को प्राथमिकता देती थी जिनका प्रयोगशाला में व्यावहारिक प्रदर्शन तुरंत हो चुका हो।

राजनीति और वैश्विक समीकरण

1920 से 1950 के बीच का समय काल विज्ञान की दूनिया पर यूरोपीय और अमेरिकी वैज्ञानिकों का वर्चस्व था। औपनिवेशिक भारत से आने वाले वैज्ञानिकों को वैश्विक मंच पर वह समर्थन नहीं मिल पाता था।

अन्य वैज्ञानिकों की प्राथमिकता

1930 के समय काल में जब साहा का नाम चर्चा में था तब क्वांटम मैकेनिक्स और न्यूक्लियर फिजिक्स में कई अन्य बड़ी खोजें जैसे न्यूट्रान की खोज और पाजिट्रान की खोज पर काम करने वाले वैज्ञानिकों की तरफ ज्यादा चला गया।

प्रसिद्ध वैज्ञानिकों की राय

नोबेल पुरस्कार न मिलने के बावजूद दुनिया के सर्वोत्तम वैज्ञानिकों ने उनके काम की सरहना की उनके काम को सर्वोच्च माना। ब्रिटीश खगोल शास्त्री सर आर्थर एडिंगटन और नोरेस रसेल जैसे दिग्गजों ने स्पष्ट कहा था कि खगोल भौतिकी में साहा का योगदान किसी भी नोबेल पुरस्कार से कही बढ़कर है। भारतीय विज्ञान जगत में उन्हें हमेशा एक ऐसे नायक के रुप में देखा जाता है जिसने सीमित संसाधनों में ब्राम्हांड के सबसे बड़े रहस्यों को सुलझाया।

शनिवार, 23 मई 2026

शैलेंद्र राजवंश

sailendra dynasty

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम शैलेंद्र राजवंश के इतिहास पर प्रकाश डालेंगे। बताते चलें कि इस राजवंश को कुछ विद्वान भारतीय राजवंश नहीं मानते वहीं कुछ विद्वान हिंदू धर्म से सम्बन्धित होने के कारण भारतीय ही मानते है। शैलेंद्र राजवंश के लोग कट्टर बौध धर्म के अनुयायी थे। इस लेख में हम इस वंश के भारतीय सम्बन्ध तथा इनके साम्राज्य जो कि इंडोनेशिया मलेशिया एवं जावा जैसे देशों फैला हुआ था के बारे चर्चा करेंगे। इतिहास के पन्ने को पलटा जाए तो हमें पता चलता है कि यह राजवंश अपने समय काल में बहुत प्रभावशाली एवं शक्ति शाली हिंदू बौद्ध राजवंश था।

नाम की उत्पत्ति

शैलेंद्र शब्द का अर्थ है पर्वतों का राज हिन्दी में विच्छेदन करें तो हमें पता चलता है कि शैल यानी पर्वत इंद्र देवताओं का राजा इंद्र। आमतौर पर देखा जाए तो इस शब्द का प्रयोग भगवान शिव प्रयोग किया जाता है। इस वंश की उत्पत्ति की बात करें तो इतिहासकारों में इस बात पर मतभेद है कुछ इतिहासकार इन्हें दक्षिण भारत के राजवंश एवं शैल वंश से सम्बन्धित मानते है वही कुछ इतिहासकार इन्हें इंडोनेशिया के मूल निवासी मानते है जिन्होंने भारतीय संस्कृति एवं धर्म को अपनाया था। इनका समय काल 8वीं शताब्दी से 11वीं शताब्दी के बीच का माना जाता है।

धर्म और भाषा

शैलेंद्र वंश के लोग बौद्ध धर्म के कट्टर अनुयायी थे इन्होंने दक्षिण पूर्व एशिया में बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार में अहम भूमिका निभाई। हलांकि इन्होंने कभी हिन्दू धर्म का विरोध नहीं किया। इनके राज्य में शिव के भी उपासक तथा अन्य हिंदू देवताओं के उपासक थे जिसके चलते इन्होंने सप्रंग मन्दिर का निर्माण करवाया था। इन्होंने अपने ग्रंथ संस्कृत भाषा भारतीय पल्लव ग्रंथ लिपि को भी अपनाया। इस वंश के लोग कला प्रेमी भी थे।

बोरोबुदुर स्तूप

इंडोनेशिया के जावा में स्थित यह स्तूप शैलेंद्र राजाओं के संरक्षण में लगभग 780 से 825 ईस्वी के बीच बनाया गया था। जो कि बारीक नक्काशी के साथ-साथ मूर्तिकला एवं वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है। इस स्तूप को यूनेस्को की विश्व धरोहर की सूची में संरक्षित किया गया है। यह दुनिया का सबसे बड़ा बौद्ध स्तूप है जिसमें नौ प्लेट फार्म तथा बुद्ध की 504 मूर्तियां स्थापित की गईं हैं। इस मंदिर कि दीवारों पर बौद्ध दर्शन को तथा उनके जीवन के महत्वपूर्ण पल को दर्शाया गया है।

चांडी सेवूा candi sewu
यह इंडोवेशिया का दूसरा सबसे बड़ा बौद्ध मंदिर है जो प्रमबानान मंदिर के पास स्थित है।

चांडी कलसन candi kalasan
यह भी जावा का सबसे पुराना मंदिर है जिसे शैलेंद्र राजा ने अपने गुरु और देवी तारा के सम्मान में बनवाया था।

भारत के साथ सम्बन्ध

चोल एवं पाल राजवंश के राजाओं के साथ इस राजवंश के सांस्कृतिक व्यापारिक एवं कूटनीतिक सम्बन्ध थे। बताते चलें कि पाल राजाओं के साथ मिलकर शैलेंद्र वंश के राजा बाल पुत्र देव ने मिलकर मगध यानी बिहार के नालंदा विश्वविद्यालय में बौद्ध भिक्षुओं के रहने के लिए एक मठ मनवाया था। इस योजना को पूर्ण करने के लिए उन्होंने पाल राजा देव पाल से पांच गांवों को दान करने का अनुरोध किया था। इसका उल्लेख नालंदा ताम्र पत्र अभिलेख में मिलता है।

शुरुआती समय में शैलेंद्र राजाओं के भारतीय राजा राजा रज चोल तथा राजेंद्र चोल के साथ अच्छे संबंध थे। मगर राजनीतिक कारणों इनमें विरोध हो गया। विरोध से पहले शैलेंद्र राजा श्री मारविजयोत्तुंगवर्मन ने तमिलनाडु के नागपट्टिनम में चूड़ामणि विहार नामक बौद्ध मठ का निर्माण करवाया था। लेकिन इन राजाओं का समय काल बीतने का बाद चोल राजा राजेंद्र चोल ने शैलेंद्र साम्राज्य के राजा श्रीविजय पर व्यापारिक वर्चस्व चलते नौसैनिक हमला किया था।

नौवीं शताब्दी के समय काल में शैलेंद्र राजवंश का प्रशासन इंडोनेशिया में विस्तृत कम होने लगा जिसके बाद शैलेंद्र राजवंश ने सुमात्रा द्वीप वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित  किए। जिसके चलते सुमात्रा द्वीव के श्री विजय साम्राज्य के भी शासक बन गए और  दोनों साम्राज्य की शक्ति एक हो गई। उपरोक्त कारणों के चलते मलक्का जलडमरुमध्य यानी strait of Malacca के व्यापारिक  मार्ग को अपने नियंत्रण में कर लिया।

वंश के समाप्त होने का कारण

11वीं आते-आते चोल साम्राज्य के लगातार नौसैनिक हमलों तथा जावा के मताराम साम्राज्य के साथ आंतरिक संघर्षों के कारण शैलेंद्र वंश और श्री विजय वंश समाप्त हो गया।
नोट इस लेख सम्बन्धित कोई अन्य जानकारी यदि आपके पास है तो जरूर साझा करें।

गुरुवार, 21 मई 2026

विक्रम संवत

vikram samvat calender

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम विक्रम संवत के इतिहास तथा वर्तमान समय में इसके महत्व के बारे में चर्चा करेंगे। यह भारतीय काल गणना का गौरवशाली प्रतीक है। प्रस्तुत लेख में हम विक्रम संवत के साथ ही शक संवत तथा नवीनतम अंग्रेजी कैलंडर के बारे में चर्चा करेंगे। इसके साथ ही हम देखेंगे की आज भी विक्रम संवत क्यों अंग्रेजी कैलंडर से ज्यादा महत्व रखता है।

इतिहास

भारत की प्राचीन  संस्कृति और सभ्यता विश्व की सबसे समृद्ध और वैज्ञानिक संस्कृतियों में से एक है। हमारी इस समृद्ध विरासत का एक अमूल्य हिस्सा है हमारी काल-गणना यानी कलेक्टर प्रणाली । भारत में प्रचलित विभिन्न कैलंडरों में विक्रम संवत का स्थान सर्वोपरि है। यह केवल तिथियों और  महीनों के बदलने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह हमारी गौरवशाली परंपरा, खगोलीय विज्ञान और सांस्कृतिक अस्मिता का प्रतीक है।

विक्रम संवत की शुरुआत ईसा पूर्व 57 बी सी में हुई थी पौराणिक और ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार उज्जैन के महान सम्राट विक्रमादित्य ने अपनी प्रजा को विदेशी आक्रमणकारियों शकों से मुक्ति दिलाई थी। इस विजय के उपलक्ष्य में और अपनी प्रजा को कर्ज मुक्त करने के उद्देश्य से उन्होंने एक नए संवत की शुरुआत की, जिसे विक्रम संवत कहा जाता है। सम्राट विक्रमादित्य अपने अदम्य साहस और जन कल्याण तथा न्याय प्रियता के लिए जाने जाते थे। 

उनके  द्वारा शुरु किया गया यह विक्रम संवत आज भी भारतीय जन मानस के दिलों में बसा हुआ है।वर्तमान के ग्रेगोरियन कैलंडर से इसकी तुलना करें तो विक्रम संवत उससे 57 वर्ष आगे चलता है। यानी वर्तमान समय में अगर 2026 चल रहा है तो विक्रम संवत में 2026+57 2083 होगा।

वैज्ञानिक एवं खगोलीय आधार

विक्रम संवत पूरी तरह से वैज्ञानिक और खगोलीय गणना  पर आधारित है। जहां अंग्रेजी कैलंडर केवल सूर्य की गति पर आधारित होता है जिसका अनुमान सो वर्षों का होता है। वहीं विक्रम संवत लूनि सोलर यानी चंद्र सौर प्रणाली पर आधारित होता है। यानी इसमें चन्द्र और सूर्य दोनों की गतियों का सटीक समन्वय होता है।

वर्ष और महीने 

अंग्रेजी महीने के समान ही इसमें भी 12 महीने होते है बस नाम अलग होता है। जैसे चैत्र वैशाख ज्येष्ठ आषाढ़ श्रावण भाद्रपद जिसे भादों भी कहते है इसी के साथ अश्विन कार्तिक मार्गशीर्ष पौष माघ और अन्त में भादों आता है। यहां हम अंग्रेजी महीने का विक्रम संवत में क्या नाम उसके बारे में बताते चलते है। विक्रम संवत में महीने अंग्रेजी महीने के कैलंडर के मध्य से शुरु होता और अगले महीने के मध्य के मध्य के दिनों में समाप्त होता है। बताते चले कि विक्रम संवत कि शुरुआत चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष की तारीख से होती है।

पक्ष

प्रत्येक महीने को दो पक्षों में बांटा गया है कृष्ण पक्ष यानी अंधेरी रातें तथा शुक्ल पक्ष यानी चांदनी रातें होती है।

अधि मास

इसे हम मलमास के नाम से भी जानते है इसका महत्व देखे तो हमें मालूम है कि हर तीसरा वर्ष एक लीप वर्ष होता है जिसके कारण अग्रेंज़ी महीने में फरवरी 28 की जगह 29 दिनों की हो जाती है मगर विक्रम संवत में एक अलग से महीना जी जोड़ दिया जाता है। जिसे हम पुरुषोत्तम मास के नाम से भी जानते है। प्रक्रिया दर्शाती है की हमारे प्राचीन खगोल शास्त्री कितने उन्नत थे। इससे ऋतुओं का चक्र कभी बिगड़ता ही नहीं है।

सांस्कृतिक और अध्यात्मिक महत्व

 पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इसी दिन ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना शुरु की थी। इसी दिन से चैत्र नव रात्रि का प्रारम्भ होता है जिसमें मां शक्ति की उपासना की जाती है। वसंत ऋतु- यह वह समय होता है जब प्रकृति पुरानी पत्तियों छोड़कर नए पत्तों और फूलों से सजती है। खेतों में फसलें लहलहातीं हैं जो किसानों कि मेहनत ओर खुशहाली का प्रतीक होती है। इसके साथ ही भारत के लगभग सभी त्यौहार जैसे दशहरा दीवाली होली रक्षाबंधन और करवा चौथ विक्रम संवत की तिथियों के अनुसार ही तय किए जाते है।

वर्तमान समय में इस कैलंडर को द्वितीय कैलंडर के रुप में लिया जाता है क्योंकि सरकारी कार्यों में अंग्रेजी कैलंडर का ही प्रयोग किया जाता है। लेकिन एक देश ऐसा भी है जो इस कैलंडर को अधिकारिक राष्ट्रीय कैलंडर के रुप में इस्तेमाल करता है। हम नेपाल देश का सम्मान करते है जिन्होंने हमारी परम्परा का जीवित रखा है। बताते चले कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना में भी विक्रम संवत का उल्लेख किया गया है।

दर्शकों से अनुरोध है कि आप इस लेख को भले ही ज्यादा लोगों में साझा न करें मगर इस लेख से सम्बन्धित अन्य कोई जानकारी आपको अगर है तो जरूर से साझा करें। क्योंकि मैं भी अभी सिख ही रहा हूं।

शक संवत

यह एक भारतीय राष्ट्रीय कैलंडर है जिसे भारत ने 22 मार्च 1957 में यानि 1 चैत्र 1879 को आधिकारिक रुप से अपनायता गया था। यह कैलेंडर भी विक्रम संवत कि तरह ही चैत्र महीने से प्रारम्भ होता है। इस कैलंडर में भी महीनों के नाम विक्रम संवत के समान ही होते है बस अन्तर इतना है कि इस कैलेंडर में सभी महीने अंग्रेजी कैलंडर के साथ मेल खाते है बस लीप वर्ष में जाकर एक  दिन का अतंर आता है।

बुधवार, 20 मई 2026

ग्रेट वाल आफ इण्डिया

 
great wall of india

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में भारतीय इतिहास के एक ऐसे सच से पर्दा उठाने जा रहे है जिसके बारे में आप सुनकर चौंक जायेंगे। इस विषय को जानना इस लिए भी जरुरी क्योंकि इसी के कारण भारत देश में शोषण का एक बड़ा सिलसिला जारी हुआ जो कि देश की आज़ादी के बाद ही समाप्त हुआ। आज हम भारत की विकराल दीवार जिसे हम ग्रेट वाल आफ इण्डिया के नाम से भी जानते के बारे में चर्चा करेंगे। वैसे आपने ग्रेट वाल आफ चीन के बारे में सुना होगा, इसके साथ ही राजस्थान के राजा महाराणा कुंभा द्वारा निर्माण कराई गयी दीवार के बारे में भी सुना होगा। जिसकी तुलना ग्रेट वाल आफ चाइना के साथ की जाती है। लेकिन यहां मामला थोड़ा अलग है। ये दीवार तो सुरक्षा के लिए बनाई गयी थी जो कि लगभग 26 किलोमिटर तक फैली थी। मगर आज हम जिस दीवार के बारे में बात करने जा रहे है वो लगभग 4000 किलो मीटर तक फैली थी।

इसके साथ ही इस दीवार का निर्माण किसी ईट या पत्थर से नहीं किया गया था बल्कि कटीली झड़ीयों से किया गया था। इसके साथ ही यह दीवार अंग्रेज़ों की शोषण कारी नीति का एक परिणाम थी। आज के इस लेख में हम इस दीवार के बनाने के पीछे के इतिहास तथा उन कंटीली झाड़ीयों के बारे में चर्चा करेंगे जो आज भी किसानों कि समस्या का मुख्य कारण है।

इतिहास

यह बात उस समय की है जब ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी का राज था। कम्पनी का ज्यादातर कमाई के मुख्य स्रोतों में नमक का नाम भी आता था। इस समय काल के दौरान नमक सोने से भी ज्यादा महँगा था।
कहानी की शुरुआत होती है रेम्बलैस एण्ड रिकलैक्शन आफ इण्डिया नामक किताब से जिसमें एक चौप्टर है ट्रांज़िस्ट ड्युटि इन इण्डिया जिसमें बताया गया कि हजारों मिल लम्बी एक दीवार भारत के नक्शे से गायब हो गई। यहीं से दीवार के बारे में चर्चा जोरों से शुरु हूई। इस किताब के लेखक का नाम मेजर जनरल एच डब्लू सुलेमन था जो 1869 के समय काल के दौरान ब्रिटिश सेना के एक अफसर थे।

इन्होंने अपनी इस किताब में बताया की 1757 प्लासी के लड़ाई के बाद से ईस्ट इण्डिया कम्पनी का शासन भारत में शुरु हो गया जो कि 1764 में बक्सर के युद्ध के बाद पुर्णतः स्थापित हो गया । 12 अगस्त 1765  को मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय और राबर्ट क्लाइव के बीच इलाहाबाद की संधि हुई जिसके तहत अंग्रजों को शाही मोहर प्रदान की गई। इस मोहर के चलते ईस्ट इण्डिया कम्पनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा में कर वसूलने का सरकारी अधिकार मिल गया। कम्पनी पहले से ही नमक के क्षेत्र में व्यापार कर ही रही थी मगर सरकारी मोहर के मिलते ही कम्पनी ने नमक के  मनमाने दाम लेने प्रारम्भ कर दिये।

जिसके परिणाम स्वरूप कम्पनी ने 1784 से लेकर 1785 के समय काल में केवल नमक से 62 लाख रुपये का मुनाफा कमाया। बंगाल में टैक्स बहुत ज्यादा था वहीं राजस्थान में टैक्स बहुत कम था क्योंकि समुंदर राजस्थान के करीब था अतः नमक आसानी से उपलब्ध हो जाता था। इस दीवार को बनाने का मुख्य कारण यही था कि अगर सस्ता नमक आसानी से बंगाल पहुंच गया था तो ब्रिटीश अधिकारियों का करोड़ों का नुकसान हो जाता। बताते चलें कि इस दीवार का दुसरा नाम लैण्ड कस्टम लाईन था। शुरुआत में यह दीवार  कुछ चुने हुए नाकों तथा चौंकी यों तक सिमीत थी

1834 जी एच स्मीथ ने इस दीवार को उत्तर पश्चिम तक फैलाया। 1869 तक यह लाइन हिमालय के तराई इलाकों से लेकर मद्रास प्रेसीडेंसी तक फैल चुकी थी। इतनी बड़ी दीवार की सुरक्षा करना अंग्रेजों के लिए एक समस्या का कारण बन गया। क्योंकि ईंट पत्थर की दीवार को बनाना और बार-बार मरम्मत करवाना महँगा पड़ रहा था और कांटेदार दीवारों को आसानी से काटा जा सकता था। जिसके चलते टैक्स की सुरक्षा के लिए कम्पनी को सेना को लगाना पड़ा लगभग 24000 सैनिकों तैनात किया गया। सेना के जवान 5 से 12 रुपये में 12 से 14 घण्टे दीवार की सुरक्षा करते । जो समय के साथ साथ कम्पनी को महँगा लगने लगा।

ऐलन एक्टिवियन हुमन allan octavian hume

यह वहीं व्यक्ति है जिन्होने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की थी 1867 में यह फिनलैण्ड में कस्टन कम्शिनर थे इसके साथ ही ये व्यक्ति वनस्पति विज्ञान के अच्छे ज्ञाता भी था। इसी व्यक्ति ने कम्पनी के सामने पत्थर और ईंट की जगह कंटीली झाड़ियों से दीवार बनाने का प्रस्ताव रखा ताकि लागत को भी कम किया जा सके और काम भी पूरा हो जायें। इनके सुझाव पर विदेशी बबूल, करोंदा और छुई-मुई की बड़ी प्रजाती के पौधों को बाहरी देश से भारत लाया गया।

इन पौधों के काटें इतने तेज़ थे कि कोई भी सुरक्षा कवच भी इनसे ज्यादा बढ़ीयां सुरक्षा नहीं बना सकता था। परिणामस्वरूप इस व्यक्ति के आदेश पर हजारों मिल लम्बी खाईंया खोदी गई और उपजाऊ मिट्टी डाली गयी तथा लाखों बीजों को बोया गया। 1874 को समय तक यह झाड़ीयां 8 से 12 फिट तक लम्बी हो गयीं। हियुंम ने अपने उच्च अधिकारी का सूचना देते हुए लिखा कि यह झाड़ीयां इतनी अभेदय है कि इन्हें इंसान तो क्या चूहा भी पार नहीं कर सकता।

इसके साथ ही सैनिकों की संख्या को भी घटा दिया गया बताते चले कि यहां ब्रिटीश सेना ने फुट डालों और राज करों कि नीति अपनाई थी क्योंकि दीवार कि देख रेख में जो सैनिक लगाये गये थे वे लगभग सभी मुसलमान थे तथा उन्हें अपने मूल निवास से 100 किलो मीटर की दूरी पर तैनात किया गया था। ताकि क्षेत्रीय लोगों के प्रति उनके मन में हमदर्दी की भावना न आ सके। इस दीवार और नमक व्यापार पे ही आधारित एक उपन्यास लिखा गया है जिसे महान लेखक मुंशी प्रेमचन्द द्वारा लिखा गया है। जिसका शीर्षक नमक का दरोगा है आपको यह उपन्यास एक बार जरुर पढ़ना चाहिए।

कटीली झाड़ीयों का इतिहास

बताते चले कि उस समय काल में लाई गई यह कटीली झाड़ीयां भारत में आज भी मौजूद है जो कि भारतीय उपजाऊ भूमि की उपजाऊ क्षमता को नुकसान पहुंचा रही है। ऐसे में हमें इन कटीली झाडीयों की पहचान करके इन्हें जड़ से समाप्त करने के प्रयास करने होंगे। हमारे श्रोताओं से निवेदन है कि अगर आप इन्हें अपने खेतों के अगल बगल देखें तो जड़ से निकाल कर जला दें।

विदेशी बबूल
इसे आमतौर पर विलायती किकर के नाम से भी जाना जाता है इस पौधे का वैज्ञानिक नाम Prosopis juliflora है। इसे भारत में दक्षिणी अमेरिका और मैक्सीको से भारत लाया गया है।

हानी
1.इस पौधे की जड़े जमीन के अंदर 50 से 60 मीटर अंदर तक चली जाती है जिसके कारण इन्हें जड़ से मिटाना मुश्किल हो जाता है।
2.यह पौधा एक दिन में 7 लीटर से अधिक पानी सोख जाता है यह अपने से 36 फिट दूर तक के क्षेत्र का पानी सोख जाता है। इसके साथ ही यह पौधा पानी की तलाश में जमीन के नीचे 160 फिट तक जाने में सक्षम है।
3.इसकी पत्तियां और जड़े एक खास प्रकार का कैमीकल छोड़ती है जिसके कारण इसके अगल बगल कोई अन्य पौधा या जंगली घास नहीं उग पाती। बताते चले कि अगर कोई जानवर इसे अगर अधिक मात्रा में खा ले तो उसके पेट में सुजन आ जाती है, इसके साथ ही जानवर के दांत झड़ सकते है गम्भीर परिणामों कि बात करें तो इससे जानवर की मौत भी हो सकती है।

mimosa pigra
यह पौधा मूल रुप से दक्षिणी और मध्य अमेरिका से लाया गया है यह दरअसल छुई -मुई पौधे का विक्राल रुप है इसके साथ ही यह छुई मुई के पौधे से थो़ड़ा अलग है। छोटी छुई मुई जमीन पर फैलने वाला एक छोटा पौधा है। मगर यह विशाल ,कांटेदार और बेहद आक्रामक पौधा होता है। इसकी लम्बाई 6 मीटर से 20 फीट की उंचाई तक हो सकती है। छुने पर इसकी भी पत्तीयां सिकुड़ जाती है।

हानी
1.यह दुनिया की 100 सबसे बड़ी आक्रामक झाडियों में से एक है। यह ज्यादातर नदी के किनारे , नहर के किनारे उगता है और तेज़ी से फैलता है जिसके कारण नदी स्रोत तथा दलदली इलाका इससे ढक जाता है। जानवर आदि पानी की तलाश में इसके फंदे में फस कर मर जाते है।
2.यह झाड़ी जहां उगती है उस जगह पर धूप सिधी जमीन पर नहीं आ पाती जिसके कारण स्थानीय वनस्पति समाप्त हो जाती है। नदियों और नहरों के किनारे अत्याधिक मात्रा फैलने के कारण ये पानी के बहाव के रोक देती है। इसके साथ ही इसके बीज पानी में गिरकर दूर दूर तक फैल जाते है।
3.यह पौधा 23 सालों तक  जीवित रहता है। धान की खेती को यह अत्यधिक नुकसान पहुंचाता है।

मंगलवार, 19 मई 2026

भोज शाला

bhojshala
प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम मध्य प्रदेश धार ज़िले में विद्दमान भोजशाला के बारे में बात करेंगे। इसके साथ ही राजा भोज तथा मंदिर के निर्माण के पीछे के रहस्य तथा वर्तमान समय में यह चर्चा का विषय क्यों बना हुआ है इस विषय पर बात करेंगे। हाल ही में समय में इंदौर हाई कोर्ट ने इस भोज शाला पर एक ऐतिहासिक फैसला दिया है इस फैसले के वर्तमान परिणामों के बारे में चर्चा करेंगे। यह विषय इस लिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह ए एस आई यानी आरकोलोजिकल सर्वे आप इण्डिया द्वारा संरक्षित किया गया है इसके साथ ही यह ऐतिहासिक पुरातत्व स्थल भी है।

भोज शाला

हिंदू समुदाय के लोगों का मानना था कि इस भोज शाला को परमार वंश के राजा भोज ने 11वीं शताब्दी में बनवाया था जिसे शारदा सदन के नाम से भी जाना जाता है। राजा भोज के समय काल में इस भोज शाला में संस्कृत भाषा का पठन पाठन किया जाता है इसे संस्कृत विश्वविद्यालय माना गया था। इसी भोज शाला में वाग्देवी का एक मंदिर भी था जिन्हें हम मां सरस्वती के नाम से भी जानते है। अतः इस मंदिर के कारण ही इस परिसर के शारदा सदन भी कहा जाता था। 

कालांतर में मुस्लिम शासक महमुद शाह खिलजी ने 1457 में शारदा सदन के तुड़वाकर वहां  मस्जिद का निर्माण करा दिया गया। समय अन्तराल के बाद इस मस्जिद में मौलाना कमालुद्दीन नामक मुस्लिम व्यक्ति आ कर रहने लग गये । जब कमालुद्दीन का निधन हो गया तब मुस्लिम मान्यताओं के अनुसार इस परिसर को मौलाना कमालुद्दीन की मस्जिद एवं उसके परिसर के नाम से जाना जाने लगा था। जिसके कारण यह विवाद कई वर्षों से उच्च न्यायालय में विचाराधीन था। उपरोक्त कारणों से यह हिन्दू- मुस्लिम विवाद का मुख्य कारण बना हुआ था।

हाई कोर्ट का फैसला

15 मई 2026 को यह ऐतिहासिक फैसला मध्य प्रदेश के उच्च न्यायालय की इंदौर खण्ड पीठ द्वारा सुनाया गया जिसमें न्यायालय ने कहा की यह वास्तव में राजा भोज द्वारा निर्मित भोज शाला ही है न की कोई मस्जिद। इस फैसले को सुनाने से पहले हाई कोर्ट की बैंच ने ए एस आई द्वारा क्षेत्र विशेष पर किए गए अध्ययन कि रिपोर्ट सौंपी थी जिसमें प्राचीन मंदिर के होने के साक्ष्य मिले थे। अतः कोर्ट का फैसला हिन्दू समाज के पक्ष में आया। अब वे इस परिसर में बिना रोक टोक के पुजा अर्चना कर सकते है। वर्तमान समय में देखा जाये तो ऐसे बहुत से स्थल विवाद पूर्ण हैं जिनमें से बहुत से स्थलों पर मुकदमा कोर्ट में विचाराधीन है।

सोर्स

15 मई 2026 को टाईम्स आफ इण्डिया ने इस फैसले का प्रकाशन अपनी रिपोर्ट में शीर्षक Bhojhsala complex is temple of goddess vag devi, Hindus have right to woship Madhya Pradesh high court के साथ प्रकाशित किया। इसके साथ ही इसका विडियों संस्करण जिसे 18 मई 2026 को प्रकाशित किया जिसमें परिसर में मां सरस्वती की नवीनतम मूर्ति स्थापना तथा पुजा अर्चना करते हुए दिखाया गया है।

17 मई 2026 को द हिन्दू पत्रिका ने भी शीर्षक Madhya Pradesh bhojshala case and the crack in the places of worship Act के नाम से प्रकाशित किया गया है। 
 

मंगलवार, 12 मई 2026

कुतुबमीनार

 
qutb minar
प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम कुतुबमीनार के इतिहास के बारे में चर्चा करेंगे यह विषय इस लिए भी महत्वपूर्ण क्योंकि आज तक हम यही जानते थे कि कुतुबमीनार का निर्माण कुतुबूद्दीन ऐबक ने कराया था मगर यह पूर्ण सच नहीं है क्योंकि इस मुस्लिम शासक ने सिर्फ इसकी मरम्मत करवाई थी। आज के इस लेख में हम कुतुबमीनार के इतिहास , विक्रमादित्य से इसके सम्बन्ध तथा इसके वास्तविक नाम के बारे में चर्चा करेंगे इसके साथ हम इसको बनाने के पीछे छुपे उद्देश्य को समझने की कोशिश करेंगे।

फिरोजशाह तुगलक

अपने प्रारम्भिक समय में कुतुबमीनार एक  चार मंज़िला इमारत थी जिसकी चौथी मंज़िल पर मंदिर का निर्माण कराया गया था अतः एक कट्टर मुस्लिम होने के नाते फिरोजशाह तुगलक ने इसकी चौथी मंज़िल को तुड़वा कर पुनः इसका निर्माण करवाया इनके साथ ही इसने पांचवीं मंज़िल का भी निर्माण करवा दिया। बताते चले कि फिरोजशाह तुगलक ने दिल्ली पर 1325 से लेकर 1351 तक शासन किया। इनके शासन काल के पहले दिल्ली पर इनरे चचेरे भाई मुहम्मद बिन तुगलक का शासन था। यह दिल्ली सल्तनत के तीसरे वंश से सम्बन्धित था। बताते चले कि दिल्ली सल्तनत पर पांच वंशों ने शासन किया जिनके नाम और समय कुछ इस प्रकार है। गुलाम वंश शासन काल 1206 से 1320 ई. तक 2 खिलजी वंश शासन काल 1290 से 1320 ई. तक 3 तुगलक वंश शासन काल 1320 से 1414 तक 4 सैयद वंश शासन काल 1414 से 1451 तक 5लोदी वंश शासन काल 1451 से 1526 तक। बताते चले दिल्ली पर सबसे लंबा शासन काल तुगलक वंश का ही रहा।
 

चन्द्रगुप्त द्वितीय

इनका शासन काल 380 ई से 415 ई तक का माना जाता है । इनके राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र थी मगर उज्जैन भी इनका मुख्य केन्द्र था। कुतुबमीनार की बात करें तो इसे चन्द्रगुप्त द्वतीय ने अपने दरबार के नौ रत्नों में से एक एवं महान खगोल शास्त्री वराह मीहिर के लिए बनवाया था। यह एक सुर्य वेधशाला थी। मगर चौथी मंज़िल पर विष्णु मंदिर होने के कारण कुछ विद्दवान इसे विष्णु स्तंभ भी कहते थे। 

प्रारम्भ में इस मिनार का प्रयोग खगोल विज्ञान के अध्ययन के लिए किया जाता था। इस बात का उल्लेख हमें हरिहार निवास द्विवेदी द्वारा रचित दो प्रसिद्ध पुस्तकों में मिलता है जिनका नाम दिल्ली के तोमर तथा ग्वालियर के तोमर है। बताते चले कि भारत में प्रचलित विक्रम संवत का निर्माण में भी इन्हीं के शासन काल में हुआ था।

तरीखे फिरोज़ शाही

इस किताब के लेखक का नाम सिराज अफिन है जो कि फिरोज़शाह तुगलक के राज दरबार का एक विद्वान था इसने अपनी किताब में लिखा की कुतुबमिनार की चौथी मंज़िल पर बिजली गिर जाने के कारण यह नष्ट हो गयी थी।
इबनेबतुता
यह एक विदेशी यात्री था जो कि मोहम्मद बीन तुगलक के शासन काल में भारत आया था। इसने अपनी किताब उलरहला में लिखा की कुतुबमीनार की चौथी मंज़िल पर सोने की घण्टीयां लगी हुई थी। जिसे ज़ाहिर है मुस्लिम शासन काल के दौरान इन्हें हटाया गया होगा।

कीर्ति स्तम्भ

यह स्तम्भ चितौड़ के दुर्ग के अन्दर राणा कुम्भा द्वारा निर्मित करवाया गया था। अगर आप वर्तमान समय में कुतुवमीनार के वास्तविक एवं प्राचीन रुप रेखा को देखना चाहते है तो यह स्तम्भ उसकी छाया प्रति है साथ में चौथी मंदिर पर विष्णु मंदिर का निर्माण हूबहू कुतुबमीनार के समान ही कराया गया था। 
लेख से सम्बन्धित कोई उल्लेख यदि आपको कहीं मिलता है तो ज़रुर साझा करें।
सोर्स विकीपिडीया,टेस्टबुक,क्योरा,दृष्टि आई ए एस,ईआर रिब्लिकेशन 

मंगलवार, 31 मार्च 2026

pushpak viman kisne banaya



pushpak viman kisne banaya

 प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम प्राचीन मान्यताओं के अनुसार प्राप्त पुष्पक विमान के इतिहास के बारे में चर्चा करेंगे तथा इस बात पर भी विचार करेंगे कि क्या वर्तमान समय में इससे सम्बन्धित कोई साक्ष्य मिले है य नहीं। इसके साथ ही हम देखेंगे कि रावण के पुष्पक विमान के किसने बनाया था इसके साथ ही हम देखेंगे कि क्या सच में प्राचीन काल में विज्ञान के वर्तमान समय के अनुसार  इतनी तरक्की न होने के बावजूद भी यह सम्भव कैसे हुआ।

भारतीय पौराणिक ग्रंथों में वर्णित “पुष्पक विमान” एक अद्भुत और रहस्यमय उड़ने वाला वाहन माना जाता है, जिसका उल्लेख विशेष रूप से रामायण में मिलता है। यह विमान न केवल आकाश में उड़ने की क्षमता रखता था, बल्कि अपनी गति, आकार और सुविधाओं के कारण भी अत्यंत विलक्षण बताया गया है। आज भी पुष्पक विमान को लेकर लोगों में जिज्ञासा बनी हुई है कि आखिर इसे किसने बनाया था और इसकी वास्तविकता क्या है। इस लेख में हम इसी विषय पर विस्तार से चर्चा करेंगे।


पुष्पक विमान का परिचय

पुष्पक विमान का उल्लेख वाल्मीकि रामायण में विस्तार से मिलता है। यह एक ऐसा दिव्य रथ था जो आकाश में उड़ सकता था और मनचाही दिशा में जा सकता था। इसकी सबसे खास बात यह थी कि इसमें बैठने वालों की संख्या के अनुसार इसका आकार अपने आप बढ़ जाता था। इसके अंदर सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी, और यह अत्यंत तेज गति से यात्रा कर सकता था।

पुष्पक विमान का निर्माता कौन था?

पौराणिक कथाओं के अनुसार, पुष्पक विमान का निर्माण देवताओं के दिव्य शिल्पकार विश्वकर्मा ने किया था। विश्वकर्मा को देवताओं का इंजीनियर और वास्तुकार माना जाता है, जिन्होंने अनेक दिव्य अस्त्र-शस्त्र, महल और वाहन बनाए थे। कथा के अनुसार, विश्वकर्मा ने यह विमान धन के देवता कुबेर के लिए बनाया था। कुबेर इस विमान का उपयोग अपनी यात्राओं के लिए करते थे। यह विमान उनके वैभव और शक्ति का प्रतीक था।

रावण और पुष्पक विमान

बाद में, लंका के राजा रावण ने कुबेर को पराजित कर पुष्पक विमान को अपने अधिकार में ले लिया। रावण ने इस विमान का उपयोग कई महत्वपूर्ण कार्यों में किया, जैसे कि माता सीता का हरण।
पुष्पक विमान की विशेषता यह थी कि यह स्वयं संचालित होता था और चालक की आवश्यकता नहीं होती थी। यह अपने स्वामी के आदेशों का पालन करता था और आकाश में बिना किसी बाधा के यात्रा कर सकता था।

भगवान राम और पुष्पक विमान

जब राम ने रावण का वध किया और लंका पर विजय प्राप्त की, तब उन्होंने पुष्पक विमान को अपने अधिकार में ले लिया। इसी विमान के माध्यम से भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण अयोध्या वापस लौटे थे।
यह यात्रा दीपावली के रूप में मनाई जाती है, क्योंकि उसी दिन भगवान राम का अयोध्या आगमन हुआ था। बाद में भगवान राम ने इस विमान को उसके मूल स्वामी कुबेर को लौटा दिया।

पुष्पक विमान की विशेषताएँ

पुष्पक विमान को लेकर कई अद्भुत विशेषताओं का वर्णन मिलता है
1.स्वचालित संचालन – यह विमान बिना किसी चालक के स्वयं चल सकता था।
2आकार परिवर्तन – यात्रियों की संख्या के अनुसार इसका आकार छोटा-बड़ा हो सकता था।
3.तेज गति – यह बहुत तेज गति से एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँच सकता था।
4.आरामदायक यात्रा – इसमें बैठने वालों के लिए सभी प्रकार की सुविधाएँ उपलब्ध थीं।
5.मनचाही दिशा – यह विमान केवल आदेश के अनुसार ही नहीं, बल्कि सोच के अनुसार भी दिशा बदल सकता था।

क्या पुष्पक विमान वास्तव में था?

यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। आधुनिक विज्ञान के दृष्टिकोण से पुष्पक विमान को एक पौराणिक कथा माना जाता है। आज तक इसके अस्तित्व के कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिले हैं। हालांकि, कुछ लोग इसे प्राचीन भारत की उन्नत तकनीक का प्रतीक मानते हैं। कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि प्राचीन ग्रंथों में वर्णित यह विमान संभवतः किसी कल्पना या रूपक का हिस्सा हो सकता है, जो उस समय के लोगों की वैज्ञानिक सोच और कल्पना शक्ति को दर्शाता है।

आधुनिक विज्ञान और पुष्पक विमान

आज के समय में हम हवाई जहाज, हेलीकॉप्टर और अंतरिक्ष यान जैसी तकनीकों का उपयोग करते हैं। यदि पुष्पक विमान की विशेषताओं को देखें, तो यह आधुनिक विमानों से भी अधिक उन्नत प्रतीत होता है। उदाहरण के लिए
 स्वचालित उड़ान आज के ऑटोपायलट सिस्टम जैसा
 आकार बदलने की क्षमता जो अभी संभव नहीं है
 बिना ईंधन के संचालन जिसका कोई प्रमाण नहीं
इससे यह स्पष्ट होता है कि पुष्पक विमान एक कल्पनात्मक या दिव्य अवधारणा हो सकती है।

धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

पुष्पक विमान का भारतीय संस्कृति और धर्म में विशेष स्थान है। यह न केवल एक वाहन के रूप में, बल्कि शक्ति, वैभव और दिव्यता के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है। रामायण में इसका उल्लेख भगवान राम की विजय और उनके अयोध्या लौटने की कहानी को और भी भव्य बनाता है।

रावण का पुष्पक विमान किसने बनाया था

पुष्पक विमान एक अद्भुत पौराणिक कल्पना है, जिसका निर्माण देव शिल्पकार विश्वकर्मा द्वारा किया गया माना जाता है। यह विमान पहले कुबेर के पास था, फिर रावण ने इसे छीन लिया और अंत में भगवान राम ने इसे पुनः कुबेर को लौटा दिया। हालांकि इसके वास्तविक अस्तित्व के कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं हैं, लेकिन यह भारतीय संस्कृति, धर्म और साहित्य का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। पुष्पक विमान हमें यह सिखाता है कि प्राचीन भारतीय ग्रंथों में कितनी समृद्ध कल्पना शक्ति और ज्ञान था, जो आज भी लोगों को प्रेरित करता है।

पुष्पक विमान के वर्तमान साक्ष्य

वर्तमान समय में इससे सम्बन्धित कोई साक्ष्य नहीं मिले है लेकिन इस विमान की चर्चा वाल्मीकि रामायण, सुंदर कांड, युद्ध कांड में मिलती जिसमें बताया गया था कि यह  किसी ईंधन से नहीं बल्कि चालक कि मन की गति से यात्रा करने में सक्षम था। बताया जाता है कि यह विमान सोने का बना था जो अपने ऊपर विराजमान यात्रियों की संख्या अनुसार अपना अकार छोटा बड़ा कर सकता था। देखा जाये तो रावण की लंका त्रिकूट पर्वत श्रृंखला के तीन पर्वत शिखर सुबेल, नील और सुंदर में से सुबेल पर्वत कि चोटी पर बसा हुआ था। जोकि वर्तमान समय में श्री लंका का एक प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है। चोटि पर बने इस महल से उतरने के लिए पहाड़ी को काटा गया है। 

लेकिन यहां से उतरने युद्ध के दौरान इतना आसान नहीं था जो दर्शाता है कि रावण अपने महल से नीचे आने के लिए इस पुष्पक विमान का ही इस्तेमाल करता रहा होगा। जोकी आप इस पर्यटन स्थल की यात्रा से समझ सकते है।
वर्तमान समय में इसरो द्वारा पुष्पक नामक RLV-LEX यानी Reusable Launch vehicle नामक एक विमान का आविष्कार किया है। इसके अलावा वर्तमान समय में इस विमान सम्बन्धित कोई उचित प्रमाण नहीं मिले है जिससे यह प्रमाणित हो सके कि पुष्पक विमान का कोई अस्तित्व था भी य नहि।

बुधवार, 25 मार्च 2026

भीम राव रामजी अम्बेडकर

 
br ambedkar

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम भारतीय संविधान के जनक अथवा निर्माता बी आर अम्बेडकर के बारे में चर्चा करेंगे तथा साथ ही उनके द्वारा किए महत्वपूर्ण कार्य तथा उनके जीवन संघर्ष के बारे में चर्चा करेंगे। इसके साथ ही हम उनके द्वारा जातिवाद पर दी गयी परिभाषा पर चर्चा करेंगे और देखेंगे की कैसे वर्तमान समय में भी जातिवाद भारत जैसे देश के लिए एक बड़ी समस्या है जो कि देश की तरक्की में बहुत बडे़ रोड़े या पत्थर के समान काम करती है। इसके साथ ही हम देश-विदेश में उनके नाम पर बनी यूनिवर्सिटी ,कालेज और प्रतिमाओं के इतिहास के बारे में चर्चा करेंगे।

जन्म और नामकरण

इनका जन्म 14 अप्रैल 1891 में महाराष्ट्र के रत्नागिरी ज़िले के अंबादवे मंदनगढ तालुका में हुआ था। वे अपनी पिता की 14वीं संतान थे। उनके बचपन का नाम सकपाल था। उनके पिता जी ब्रिटिश सेना में सुबेदार के पद पर असित थे। भीम राव रामजी अम्बेडकर के पिता का नाम रामजी मालोजी सकपाल था और माता का नाम भीमाबाई था। इनके नाना का नाम लक्ष्मण मुरबडकर था। अम्बेडकर साहब का जन्म महार जाति में हुआ था जो कि उस समय दलित जाति के रुप में चर्चित थी यह वह समय था जब जातिवाद अपने चरम पर था। परिणामस्वरूप वे अच्छे परिवार से होने के नाते वे स्कूल जाते थे मगर उनके कक्षा में बैठने पर प्रतिबंध था।



इसके साथ ही उन्हें शिक्षक सहायता बहुत ही कम प्रदान की जाती थी। इसके साथ ही उनके पीने के पानी को छूने पर प्रतिबंध था अगर उन्हें प्यास लगती थी तो चपरासी द्वारा ऊपर से उन्हें पानी पिलाया जाता था अगर चपरासी ने आये तो उस दिन उन्हें पीने के पानी से वंचित रखा जाता था। उनके 14 भाई-बहनों में केवल बलराम,आनंदराव और सकपाल और दो बहनें मंजुला और तुलसा ही जीवित बचीं थी। 

जिनमें से सिर्फ उन्होंने ही हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण की थी। हलांकि उनका उप नाम सकपाल था लेकिन हाईस्कूल की परीक्षा के  दौरान उनके पिता जी ने उनका नाम अंबदावेकर दर्ज कराया था क्योंकि वे अपने पैतृक गांव अंबदावे से आते थे। वर्तमान समय में भी भारत देश के कुछ क्षेत्रों में यह प्रथा आज भी है जहां अपने नाम के साथ अपने गांव का नाम जोड़ा जाता है उदाहरण के लिए मशहूर पंजाबी गीतकार दिल जीत दोसांज के नाम में दोसांज शब्द उनके गांव का नाम है।

मराठी ब्राह्मण शिक्षक कृष्ण जी केशव

सकपाल को शिक्षक सहायता सीमित मिलने पर भी वे एक मेधावी छात्र थे जिसके कारण वे जल्द ही कृष्ण जी केशव के प्रिय छात्र बन गये। इन्होंने ही सकपाल का  नाम अंबादावेकर से बदल कर अम्बेडकर किया था वे ही आगे चलकर सकपाल के शिक्षा ग्रहण करने के मार्ग दर्शक और पहले गुरु बनें। हलांकि हिन्दू धर्म कि मान्यताओं के अनुसार माता-पिता को ही पहला गुरु कहा गया है क्योंकि वे ही हमारी प्रारम्भिक एवं सामाजिक शिक्षा को पूर्ण करते है लेकिन ज्ञान देने वाले व्यक्ति का दर्जा उनसे ऊपर ही माना गया है। उनके धार्मिक व आध्यात्मिक गुरुओं में सर्वप्रथम नाम महात्मा गौतम बुद्ध, ज्योति बा फूले, संत कबीर का आता है। इन सभी बातों के आलावा हम उन्हे भीमराव रामजी अम्बेडकर ,भिवा ,भिम ,विश्व रत्न ,महामानव ,बाबा साहेब ,युगपुरुष ,सकपाल आदि नामों से जानते हैं।

इनकी पहली पत्नी का नाम रामाबाई था तथा1935 में उनके निधन के बाद उनकी  दूसरी पत्नी जिनका नाम पहले सविता अम्बेडकर था शादी के बाद उनका नाम सविता अम्बे़डकर हो गया। उनकी पहली पत्नी से उन्हें 5 संतानें हुई जिनमें से सिर्फ यशवंत अंबेडकर ही जीवित बचें तथा दूसरी पत्नी से उन्हें गंगाधर,रमेश बेटी इंदु और राजरत्न थे। 6 दिसंबर 1956 में नई दिल्ली में 65 साल की उम्र में उनका निधन हो गया।

जातिवाद पर उनके विचार

अम्बेडकर साहब का मानना था कि भारत देश में जातिवाद एक रिवार्ड प्रक्रिया की तरह काम करता है जिसके कारण यह प्रत्येक जाति के लोगों को मानने के लिए उत्साहित करता है। उदाहरण के लिए मान लीजिए की सभी जातियां एक लकड़ी की सीढ़ी है जिसमें सबसे ऊपर का डंडा सबसे उच्च जाति वर्ग का है और सबसे नीचे का डंडा सबसे निम्न जाति वर्ग का है। अब हर एक जातिवर्ग के ऊपर एक उच्च जातिवर्ग बैठा हुआ जो अपने से नीचे बैठे जातिवर्ग के लोगों को दबाता है य उनका शोषण करता है यह प्रक्रिया क्रमवार तरीके से चलती रहती है। यहां प्रत्येक डंडे या जाति के ऊपर का डंडा अपने को सम्मानित समझता जो कि रिवार्ड प्रक्रिया की तरह काम करती है।

यहां दिलचस्प बात यह है कि प्रत्येक जातिवर्ग का एक समझदार व्यक्ति यह जानता है कि यह एक झुठा सम्मान है जो कि समाज के लिए बिना किसी महत्वपूर्ण कार्य को किए बिना दिया गया है। 

अंत में वह समझता है कि यह सम्मान  जातिगत भेदभाव के बढ़ावा देने के लिए दिया गया है मगर वह इस जातिवाद का विरोध इस लिए नहीं कर पाता क्योंकि उसे डर होता है कि कहीं उसके जातिवर्ग और सम्मान को न छिन लिया जाये क्योंकि ऐसा करने पर सबसे पहले उसी के जातिवर्ग के लोग उसकी आलोचना करना प्रारम्भ कर देंगे।इस प्रक्रिया का सबसे बुरा असर उस व्यक्ति पर पड़ता है जो सच में किसी प्रतिभा का धनी होता है मगर उच्च जाति वर्ग द्वारा उसे दबा दिया जाता है और उसके विचारों को स्वयं के विचार बना कर प्रस्तुत किया जाता है।.
 

शिक्षा एवं उपाधि

  • 1.1897 में उनके पिता की  नौकरी जाने के बाद उनका परिवार मुंबई चला गया जहां उन्होंने एल्फिंस्टन हाई स्कूल से हाईस्कूल की परीक्षा 1907 में उत्तीर्ण की। 1906 में 15 साल की उम्र में उनकी 15 अप्रैल 1848 में शादी 9 वर्ष की रामाबाई की गई।
  • 2.1912 में उन्होंने बॅाम्बे विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान में डिग्री प्राप्त कर ली थी। इसी बीच अपने बीमार पिता के देखने के लिए मुंबई लौटना पड़ा जिनकी 2 फरवरी 1913 में मृत्यु हो गई।
  • 3.1913 में 22 साल की उम्र में बड़ौदा राज्य की छात्रवृत्ति योजना के तहत तीन वर्षों के लिए 11.50 पाउंड प्रति माह की राशि प्राप्त होने लगी। इस छात्रवृत्ती का संचालन बड़ौदा के गायवाड़ सायजीराव गायवाड़ तृतीय द्वारा किया गया था। जिसके माध्यम से सकपाल को न्यूयार्क की कोलंबिया विश्वविद्यालय से शिक्षा ग्रहण करने का अवसर मिला, जहां उनकी मुलाकात अपने आजीवन परम मित्र रहे नवेल भाथेना से हुई। 1915 में सकपाल ने अर्थशास्त्र में स्नातक की डिग्री प्राप्त की  इसके साथ ही समाजशास्त्र, इतिहास,दर्शन शास्त्र और मानव शास्त्र जैसे अन्य विषयों का अध्ययन किया।
  • 4.1915 के समय काल के दौरान ही उन्होंने प्राचीन वाणिज्य विषय शोध प्रबंध जिससे थीसिस भी पूर्ण की।
  • 5.1916 में सकपाल ने अपनी दूसरी थीसिस भारतीय राष्ट्रीय लाभांश एक ऐतिहासिक और विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया तथा इसके साथ ही एम.ए की शिक्षा पूर्ण की। इसी समय काल के दौरान अम्बेडकर साहब ने ग्रेज़ इन में बार कोर्स  के लिए दाखिला लिया। इसके साथ ही उन्होंने लंदन स्कूल आप इकोनामीक्स में भी दाखिला लिया।
  • 6. 9 मई 1916 को उन्होंने मानव विज्ञानी अलेक्जेंडर गोल्डन वाइज़र द्वारा आयोजित सेमिनार के समक्ष भारत में जातियां, उनकी क्रिया विधि ,उत्पत्ति और विकास नामक अपना रिसर्च पत्र प्रस्तुत किया।
  • 7. 1921में मास्टर डिग्री पूर्ण की और रुपये की समस्या इसकी उत्पत्ति और इसके समाधान पर अपनी तीसरी थीसिस लिखी।
  • 8. 1927 में कोलंबिया में अर्थशास्त्र में पी एच डी की डिग्री प्राप्त की।
  • 9. बताते चले की 1952 के समय काल तक उनके पास 32 डिग्री और 64 विषयों तथा 9 भाषाओं का ज्ञान हासिल कर विश्व रिकार्ड बनाया था। उनके बाद विश्व के सबसे पढ़े लिखे व्यक्ति का रिकार्ड डॅा0 श्री कांत जिचकर द्वारा बनाया गया 1973-1990 के समय काल तक इन्होंने 42 विश्वविद्यालयों से 20 अधिक से डिग्रियां हासिल की वे महाराष्ट्र के रहने वाले थे। 

उपाधि

1.बाबा साहब की उपाधि- 1927 इस उपाधि के सी.बी.खैरमोड़े साहब ने दी।
2. उन्होंने आई पी एस एवं आई ए एस की परीक्षा भी दी लेकिन दोनों पदों से इस्तीफा दे दिया। 25 साल की उम्र में वे महाराष्ट्र के एस एल ए और एक बार महाराष्ट्र के मंत्री भी रह चुकें है।
3.1952 एवं 1953 में कोलंबिया विश्वविद्यालय एवं उस्मानिया विश्वविद्यालय से मानद डाक्टरेट की उपाधि दी गई।
4. 1954 में नेपाल में आयोजित विश्व बौद्ध परिषद द्वारा बौद्ध भिक्षुओं द्वारा उन्हें बोधिसत्व की उपाधि दी गयी।
5.1990 में उनके मरणोंपरांत भारत सरकार द्वारा सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
सोर्स विकीपिडीया 

बुधवार, 18 फ़रवरी 2026

व्रत य आटोफेजी

fasting

प्रस्तावना 

भारतीय संस्कृति में व्रत रखने का एक अलग ही धार्मिक महत्व है वैसे तो बहुत से लोग व्रत रखने को एक अंध विश्वास के नजर से देखते है, लेकिन बहुत ही कम लोग जानते होंगे की ऐसा करने से स्वास्थ्य लाभ भी होता है , क्योंकि यह आयुर्वेद विज्ञान से जुड़ा हुआ है । हम इस बात का दावा नहीं करते बल्कि जापानी वैज्ञानिक जोशि नूरी आस्मी का मानना है। इस शोध के लिए उन्हें वर्ष 2016 में मेडिसिन विज्ञान के नोबल पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया है। इस लेख के माध्य से हम यह जानने कि कोशिश करेंगे कि व्रत के दौरान हमारे शरीर में क्या अभिक्रिया होती है और कैसे यह हमारे लिए लाभकारी है । इसके साथ ही हम इस विषय पर भी चर्चा करेंगे के व्रत को दौरान हमें किन-किन सावधानियों पर ध्यान देना चाहिए।.

व्रत 

व्रत क्या है इसका शाब्दिक अर्थ समझें तो हमें पता चलता है कि यह संस्कृत भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है संकल्प य प्रतिज्ञा लेना। जिसमें व्यक्ति किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए भोजन व अन्य सुख-सुविधाओं का त्याग करता है। दुनिया की अलग -अलग भाषाओं में इसे अलग-2 नामों से जाना जाता है। ग्रिक भाषा में इसे आटोफेजी कहते है जिसका अर्थ है खुद को ही खाना। दरअसल व्रत के दौरान हमारा शरीर इसी प्रक्रिया को दुहराता है। व्रत के दौरान हमारा शरीर फैट को कम करने के साथ-साथ नए इम्यून सिस्टम को भी बनाता है जिससे हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास होता है। वर्तमान समय में हम देखते है कि हर प्रकार के भोजन में मिलावट होने लगी है इसके साथ ही अनिद्रा, मधुमेह, तनाव जैसी बीमारियों से प्रत्येक सातवां व्यक्ति ग्रसित है और इन सभी बीमारियों  से भी छुटकारा पाने के लिए हम रासायनिक दवा का इस्तेमाल करते है जिनको अधिक मात्रा में लेने से हम किसी अन्य बीमारी का शिकार हो जाते है ।  तब हमें एक अच्छा डाक्टर भी यही सलाह देता है कि सुबह व्यायाम करिये , हफ्ते में एक बार व्रत रखिये , मिलावटी समान से परहेज करें । दुःख कि बात दोस्तों यहां यह है कि तब तक बहुत देर हो चुकी होती है  क्योंकि हमारा शरीर तब तक बीमारियों कि गिरफ्त में आ चुका होता है। ‌‌

उपाय

अब जबकि हम पहले से ही जानते है कि प्रत्येक समान में मिलावट हो रही है तो क्यों न हम भी अपने शरीर को उसी प्रकार ढाल ले ताकि हमारा शरीर इनसे होने वाले नुकसान य हानि को आसानी से सह सके और हम बड़ी शारीरिक हानि से बच सके।. दोस्तों व्रत रखना एक अच्छी आदत हो सकती है क्योंकि यह प्रण लेने या खुद से वादा करने जैसा ही है । क्योंकि यह हमारे किसी भी  लक्ष्य को हासिल करने के इरादे य आत्मविश्वास को मजबूती प्रदान करता है । कुछ लोगों का दवा तो यह भी है कि व्रत(fasting) कैंसर जैसी घातक बीमारियों को भी ठीक कर सकता है। हलांकि यह मिथक है जिसे हम नहीं मानते। मगर हम इस बात को भी नहीं झुठलाते है कि व्रत रखने से हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है सो इस प्रकार कुछ हद तक लाभ तो होता है, शरीर पहले से ज्यादा स्वस्थ लगने लगता है मगर कैंसर जैसी बीमारी से लड़ने के लिए डाक्टर कि देख रेख में दवा लेना आवश्यक है।.

उपवास के दौरान शरीर में होनी वाली आन्तरीक अभिक्रिया

उपवास य व्रत के दौरान जब हम कुछ नहीं खाते है तो हमारा शरीर को बाहर से ऊर्जा नहीं मिलनी बंद हो जाती है । जिसके कारण शरीर ऊर्जा के लिए  अंदर जमें हुए कचरे य वेस्ट पर निर्भर  रहता है।  अतः शरीर अपने द्वारा जमा किए गये वेस्ट तो ई़धन की तरह इस्तेमाल करता है य उसी को खाने लगता है।. दुसरी भाषा में जब हम खाना बंद करते है तब हमारा शरीर में एक रासायनिक अभीक्रिया होती है दरअसल अमतौर पर जब हम खाना खाते है तो उसमें से ग्लूकोज खतम हो जाता है तब शरीर हमारे शरीर में जमें फैट को बर्न करना शुरु करता है । अतः इस प्रक्रिया के दौरान हमारे शरीर में किटोंस का निर्माण होता है। ये किटोंस हमारे शरीर के लिए सुपर फुड का काम करता है।
उदाहरण के लिए समझें ग्लूकोज को पेट्रोल समझें और किटोंस को हाइड्रोजन समझें। अब अगर अपकों अन्तर पता होना चाहिए कि एक लीटर पेट्रोल 28 किलोमीटर की माइलेज देता है वहीं हाइड्रोजन एक लीटर में 1000 किलो मीटर कि माइलेज देता है । मशहुर वैज्ञानिक जोशी नूरी आस्मी ने फास्टींग को कयी अलग-अलग स्टेज में विभाजित करते हुए 5 दिनों में विभाजित किया है।

1 पहले दिन में शरीर लीवर औऱ मांसपेशीयों में जमें ग्लाइकोजन का इस्तेमाल करता है खास बात यह कि ग्लाइकोजन के हमारे शरीर के हर छोटे कण के साथ स्टोर होता है। जिसके कारण हमें व्रत के दौरान ज्यादा प्यास लगती है। इसी कारण से प्रारम्भ में हमारा वज़न तेजी से घटता है इसके अलावा फास्टींग के दौरान इंसुलिन का स्तर भी बहुत तेजी से नीचे गिरता है। इसके बाद शरीर अपने अंदर जमी वसा का इस्तेमाल ईधन के रुप में करना प्रारम्भ करता है ।

2. दुसरे दिन हमारा शरीर डीप किटोसिस में चली जाती है यानी गहरी सफाई अभियान प्रारम्भ होता है । इस दौरान हमारे मस्तिष्क में ब्रेन डेराईव़़ड न्यूरो्ट्रॅफिक फैक्टर का लेवल भी बढ़ता है। यह एक ऐसा प्रोटीन माना जाता है जो नये न्यूरान्स को बनाने में मदद करता है। इसकी खास बात यह है कि इस समय के दौरान लोग मेटल क्लेरिटी और खुद को फोक्स महसूस कर सकते है। क्योंकि यह हमारी याददाशत को मजबूत बनाता है।

3. तीसरे दिन मांसपेशीयों का सिकुडना प्रारम्भ होता है खास बात यह है कि हमारा शरीर मांसपेशीयों को ऊर्जा के लिए जलाना प्रारम्भ करता है मगर इससे नई तथा मजबूत मांसपेशीयों का विकास भी होता है। यह हार्मोन हमारी मांसपेशीयों के टिशुस व अणुओं को टूटने से भी बचाता है।
4. चौथे दिन के दौरान हमारे शरीर कि पहली प्रथमिकता जमें हुए फैट और सेल्युलर जंक को साफ करने की होती है।
5.पांचवे दिन हमारा शरीर फैट बर्निंग मशीन बन जाता है तब हमें भूख भी कम लगती है क्योंकि शरीर में जमें फैट से ही ऊर्जा बनाने लगता है। इस समय को दौरान हमारे शरीर में लम्बी उम्र से जूड़े जिन्स भी सक्रिय हो जाते है।

व्रत कि समाप्ति य प्रारम्भ से पहले इन बातों का ध्यान रखें

 1.अगर आप हाल ही में किसी बड़ी बिमारी से ठिक हुए है या किसी प्रकार के आपरेशन य सर्जरी से गुजरे हो तो उसके तीन महीनों तक आपको व्रत नहीं रखना चाहिए इसके अलावा व्रत डाक्टर कि सलाह अनुसार ही रखें यह बहुत आवश्यक है।
 2. किसी बात कि चिंता लेकर व्रत न रखे इससे लाभ की अपेक्षा हानि हो सकती है व्रत के दौरान मन शांत रखें।
 3.व्रत के बाद जब हम भोजन लेना से प्रारम्भ करते है तो यह बहुत ही खास समय होता है इस समय विटामिन और कैल्शीयम युक्त पौषटीक भोजन ही लेना चाहिए। क्योंकि अगर हन ऐसा नहीं करते तो व्रत रखने का कोई फायदा नहीं होने वाला । दरअसल शरीर व्रत के दौरान हमारी पुरानी कोशीकाओं को तोड़ देता है और नई मजबूत कोशिकाओं का निर्माण होता है ऐसे में  अगर हम फिर से अपने शरीर में कचरा डालेंगे तो नई कोशिका स्वस्थ होंगी इसकी कोई गरेंटी नहीं है। भोजन में उबले अण्डे ,दुध ,फल ,हरी सब्जियों का सेवन करें चिनी तथा रिफाइन से बनी चिज़ों से परहेज करें ।.
4. व्रत हर कोई नहीं रख सकता जैसे कि गर्भवती महिलाएं ,मधुमेह के रोगी ,किसी भी बीमारी से पि़ड़ित व्यक्ति य जिसे खाने कि समस्या हो या जो पूरा भोजन नहीं लेते य फिर जिनका वजन कम हो, य फिर लम्बाई के हिसाब से बजन सही न हो।.

सोर्स विकीपिडीया,हेल्थलाईन डाटकाम,सांइस डारेक्ट डाटकाम,नेचरडाटकाम,केंसरडाटजीओवी

बुधवार, 14 जनवरी 2026

लोहड़ी का त्यौहार

lohri

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम लोहड़ी के त्यौहार और इसे पीछे छिपे संकृतिक महत्व और इस त्यौहार को मनाये जानें के शुरवाती कारणों को जानेंगे। क्योंकि जिस प्रकार से रक्षा बन्धन का त्यौहार हिंदू धर्म में बड़ी धूम धाम से मनाया जाता है ठीक उसी प्रकार से यह त्यौहार सिख धर्म मे बड़ी धूम धाम से मनाया जाता हैं। हालांकि यह त्यौहार भाई बहन के रिश्तें से संबंधित नही हैं। जबकि उससे भी बड़े रिश्ते यानि हमारे संरक्षक कर्ता या हमारे प्रोटेक्टर को समर्पित हैं।.

शुरुआत की कहानी

पंजाब में लोहड़ी का त्यौहार सुंदरी और मुंदरि नाम की दो बहनों और उन्हें बचाने वाले लोक नायक दुल्ला भट्टी की याद में मनाया जाता हैं।ये दोनों बहने पंजाब के एक गरीब किसान सुंदर दास की बेटियां थी। सोलहवीं शताब्दी के समय काल में पंजाब में एक क्रूर मुगल शासक का राज था। उस समय काल में मुस्लिम अपने धर्म को छोड़ कर बाकी के सभी धर्मों को मनाने वाले लोगों को काफिर कहते थे। काफिर को मरना शोषण करना, हत्त्या करना ये आम बात थी। अतः एक मुगल सूबेदार सुन्दर दास की दोनों बेटियों को अपने हरम में ले जाना चाहता था।

सुंदर दास जनता था हरम मे उसकी बेटियों के साथ बहोत ही बुरा बर्ताव होगा। गाँव का मुखिया जिसे नंबरदार उस समय कहा  जाता था उसने भी सुंदर दास की कोई मदद नहीं की।  उल्टा नंबरदार ने खुद गरीब किसान पे दबाव बनाना शुरू कर दिया की वो मुगल सुबेदार का कहा माने। हार कर सुंदर दास अपने गाँव के सहयोगी मित्र दुल्ला भट्टी वाले के पास गया और मदद की गुहार लगाई। हालांकि दुल्ला भट्टी वाला भी एक गरीब किसान हि था। मगर बंदे में हिम्मत बोहत थी गलत होता न वो देख सकता था और न किसी को किसी के साथ गलत करने देता था।. 

अतः दुल्ला भट्टी वाला तुरन्त मदद करने को तैयार हो गया। सुंदर दास की हिम्मत बढ़ा कर उसे घर भेजा और अपने नंबरदार के खेतों की तरफ चला गया और सारे खेतों मे आग लगा दी। देखने वालों ने जब विरोध किया तो दुल्ला भट्टी वाले ने सबको बताया ये नंबरदार खाता हमारी है और गाता मुगलों की हैं। इसके साथ ही दुल्ला भट्टी वाले ने नंबरदार पर किसान सुंदर दास की बेटियों को हरम मे भेजने का दबाव बनाने का आरोप लगाया।. सारे गाँव ने जब ये जाना तो सब  नंबरदार के खिलाफ करवाई की माँग के लिए एक जुट हुए।.

नंबरदार

नंबर दार को जब अपने खेतों और किसानों के एक जुट होने की बात का पता चला तो वो मुगल सूबेदार के पास गया और बातों को बढ़ा चढ़ा के बताया। जिससे सुबेदार गुस्से मे आ गया और उसने तुरन्त सुंदरी और मुंदरि को और किसान सुन्दर दास को पकड़ के लाने का आदेश दिया इसके साथ ही सूबेदार ने ये भी कहा जो कोई भी उनको रोकने की कोशिश करे उसे मार दिया जाए और उनकी भी बहु बेटियों को हरम मे लाया जाये साथ ही साथ उनके घर को आग लगा दी जाये।.

सूबेदार के सिपाही गाँव में आये सुंदरी और मुंदरि को जबरन अपने साथ ले जाने लगे, किसान सुंदर दास के विरोध करने पर उसे जान से मार दिया गया और उसके घर को आग लगा दी गयी। अब सुंदरी, मुंदरि मजबूरी में सिपाहियों के साथ चल दीं क्योंकि न तो अब घर बचा था और न ही पिता। गाँव का कोई भी बन्दा उनकी मदत के लिए आगे न आया क्योंकि उन्हें अपने परिवार की सुरक्षा का डर था और सुन्दर दास को मरा देख लोग और भी डर गये। हालांकि गाँव के बोहत से लोग गुप्त तरीके से दोनों बहनों की मदद करना चाहते थे जिनमें से किसी एक ने दुल्ला भट्टी वाले को इस घटना की खबर दी।

दुल्ला भट्टी वाला अपने सहयोगियों के साथ मिलकर, जंगल के रास्ते जा रहे सिपाहियों पर हमला किया और सुंदरी, मुंदरि की जान बचायी। साथ ही साथ दोनों बहनों की उनकी पसंद के लड़कों से उनकी शादी करा दी। दुल्ला भट्टी वाले के पास अपनी बेटियों को दहेज मे देने को कुछ न था। बेचारे ने अपनी अपनी शाल फाड़ के उसमें शक्कर बाँध के दोनों को दी और उन्हें विदा किया। 

दोस्तों तब से आज तक ये त्यौहार दुल्ला भट्टी की बहादुरी उनके समर्पण को याद रखने के लिए हर साल मनाया जाता हैं। तब ये  लोकगीत पूरे पंजाब मे प्रचलित हैं। 
सुंदर, मुंदरिये होए, 
तेरा कौन विचार होए, 
दुल्ला भट्टी वाला होए, 
दुल्ले दी धी व्याही होए, 
सेर शक्कर पाई होए। 
दुल्ला भट्टी वाले की ये कहानी नारी सम्मान और अन्याय के खिलाफ खड़े होने का प्रतीक बन गई। जिस कारण हर साल लोहड़ी का त्यौहार आग जलाकर आग में मुम्फली , गचक, रेवड़ियों और पॉपकॉर्न चढ़ा कर मनाया जाता हैं। खास कर जिस घर ने नयी- नयी शादी हुई रहती हैं उस घर मे और भी धूम धाम से इस त्यौहार को मनाया जाता हैं। 
सोर्स indiatv.In , timesnewhindi.com, विकिपीडिया

गुरुवार, 25 सितंबर 2025

अरुणा आसफ अली

aruna-asaf-ali

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम भारतीय क्रांतिकारी एवं समाज सुधारक अरुणा असफ अली  के बारे में चर्चा करेंगे तथा साथ उनके द्वारा किये गए महत्वपुर्ण कार्यों के बारे में चर्चा करेंगे।. अपने महत्वपूर्ण कार्यो के चलते इन्हें 1964 में अंतर्राष्ट्रीय लेनीन शांति पुरस्कार तथा 1992 सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार एवं मरणोपरांत 1997 भारत रत्न से सम्मानित किया गया।. 

महत्वपुर्ण पद एवं सम्मान

  1. 9 अगस्त 1942 में हुए मुम्बई अधिवेशन का कार्य भार सम्भालते हुए अधीवेशन में अपनी एक अहम भूमिका अदा कि ,आरुणा आसफ अली ने  मुम्बई के ग्वलिया टैंक मैदान तिरंगा झण्ड़ा फहराकर भारत छोड़ो अंदोलन की शुभ आरम्भ किया।. 
  2. इसके साथ ही राम मनोहर लोहिया के साथ मिलकर कांग्रेस पार्टी की मासिक पत्रिका इंकलाब का संपादन किया।.
  3. 1958 में इन्हें दिल्ली नगर निगम में इनका चयन मेयर के रुप में हुआ, जहां पर इन्होंने नगर निकाय के विकास में महत्वपूर्ण कार्य किये।.
  4. 1964 में इन्हें अंतर्राष्ट्रिय लेनिन शांति पुरस्कार के सम्मानित किया गया।.
  5. 29 जूलाई 1996 को इनके निधन के बाद 1997में इन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया।.

जीवन परिचय

इनका जन्म एक बंगाली परिवार में 16 जूलाई 1909 हरियाणा में हुआ।. शादी से पहले इनका नाम अरुणा गांगुली था जोकि एक ब्राह्मण परिवार में पैदा होने के कारण पड़ा था।. इनके पिता का नाम उपेन्द्रनाथ गांगुली था।. वे अपने पिता की चार संतानों में से एक थीं।.इनकी बहन का नाम पूर्णिमा बनर्जी  तथा भाई का नाम धीरेन्द्रनाथ गांगुली तथा दुसरे भाई का नाम नागेन्द्रनाथ गांगुली था।.1928 में 21 साल की उम्र में इनकी शादी आसफ अली खां से हुई।. वे पेशे से वकील एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे।.अरुणा असफ अली  की कोई संतान नही हुई।.

शिक्षा

नैनिताल में इनके पिता का रोजगार के रुप में एक होटल था जिसके परिणामस्वरुप इनकी स्कूली  शिक्षा नैनीताल में हुई।. वे पढ़ाई लिखाई में सदैव अवल आती थीं।. नैनीताल और लहौर की शिक्षा ग्रहण करने के बाद अरुणा असफ अली खान ने कोलकत्ता के गोखले मेमोरियल कालेज आध्यापन का कार्य प्रारम्भ कर दिया।.

आज़ादी की लड़ाई में योगदान

अपने शिक्षण कार्यकाल के दौरान ही देश में चल रही अंतरिक गतिविधियों ने उन्हें बहुत प्रभावित किया।. अंग्रेज़ी प्रशासन के अत्याचारों तथा अच्यूत पटवर्धन एवं जय प्रकाश नारायण साथ ही राम मनोहर लोहिया जैसे समाज सेवीयों के विचारों ने उन पर गहरा प्रभाव ड़ाला।. अतः वे भी उनके साथ आज़ादी की लड़ाई में शामिल हुईं।.अपने क्रांतिकारी जीवन काल में 1930 से लेकर 1942 तक का समय जेल में बिताना पड़ा ।. 1942 में उन्हें रिहा किया गया परन्तु गांधी जी एवं अन्य नेताओं कि गिरफ्तारी के तत्काल बाद इन्होंने विरोधी सभा का आयोजन मुम्बई में  किया तथा अंग्रेज़ सरकार के कड़ी चुनौति दी।. 

जिसके परिणामस्वरुप अंग्रेज सरकार ने इनके नाम का वारेंट जारी कर दिया , इसके बाद से वे अपनी योजनाओं के गुप्त रुप से आन्जाम देने लगीं।. इन्होंने गुप्त रुप से कांग्रेस पार्टी का समर्धन किया, ताकि वे जेल से बाहर रहकर इनका कार्य कर सकें।. 1942 से 1946 तक के समय काल में देशभर में घूमकर जन समाज के उनके अधिकारों के प्रति जागरुक किया पुलिस हमेशा उन्हें पकड़ने में नाकाम रही।. 1946 में कांग्रेस पार्टी की मदत तथा अन्य सहयोगियों की सहायता से उनके नाम का वारेंट रद्द करवा दिया गया।. 

इसके बाद वे खुलकर जनता के समक्ष प्रस्तुत हुय़ी।.1947 में उन्हें कांग्रेस कमेटी की सदस्य के रुप ने चुना गया ।. 1948 में  वें कांग्रेस से अलग होकर सोशलिस्ट पार्टी में शामिल हो गयीं , दो साल के कार्य काल के बाद उन्होंने 1950 में लेफ्ट सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना करी और मजदूर अंदोलन में अपनी जान लगा दी।. अतः 1955 में इस पार्टी का विलय भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी में विलय हो गया।. जोकि भाजपा से सम्बन्धित थी इसके बाद भाजपा की केन्द्रिय समिति का सदस्य चुना गया।. 1958 में उन्होंने कम्यनिष्ट पार्टी से इस्तिफा दे दिया।. 1958 में उन्होंने दिल्ली नगर निगम में मेयर का कार्य भार सम्भाला ।. 1964 पं0 जवाहर लाल कि मृत्यु के पश्चचात उनका कांग्रेस पार्टी में पुनः अगमन हुआ मगर वे इस समय काल में ज्यादा सक्रिय नहीं रहीं।.

इसके अलावा वें कयी महत्वपुर्ण संस्थानो से जुड़ीं

अरुणा असफ अली  दिल्ली के दैनिक समाचार पत्र पेट्रियट से अपने स्मपुर्ण जीवन काल तक जुड़ी रहीं।. इसके अलावा वे इंडोसोवियत कल्चरल सोसाइटी, आल इंड़िया पीस काउंसिल ,नेशनल फैड़रेशन आफ इंडियन वूमैन आदि से जूड़ी।. उनके द्वारा किये गये उपरोक्त महत्वपुर्ण कार्यों से आप अनूमान लगा सकते है कि लिए कितनी महत्वपुर्ण थीं।.

लेख से सम्बन्धित महत्वपुर्ण प्रशन

अरुणा असफ अली की जिन्दगी कैसी रही थी।
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अरुणा असफ अली किस भूमिगत क्रिया कलाप की प्रमुख महिला संगठन की अध्यक्ष थीं।
अरुणा असफ अली को कहां भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ध्वज फहराने के लिए याद किया जाता है।