Indian History reveal the Past

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2026-09-23

बप्पा रावल

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प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में गुहिलोत वंश के आठवें एवं अंतिम शासक तथा मेवाड़ वंश के संस्थापक बप्पा रावल के बारे में बात करेंगे। तथा उनके द्वारा लड़े गए अरब आक्रमण के बारे में चर्चा करेंगे। बप्पा रावल ने अपने बचपन से ही कई कठिनाइयों का सामना किया था उनका बचपन कैसा बिता तथा उनके बचपन का क्या नाम था वे कैसे एक राजा बने इन सम्पूर्ण घटनाओं की चर्चा इस लेख में करेंगे।

जीवन परिचय

इनके पिता का नाम रावल महेंद्र द्वितीय जिन्हें राजा नागदित्य के नाम से भी जाना जाता था तथा इनकी माता का नाम अज्ञात है बस इतना पता चलता है कि वे परमार वंश के राजा मान मोरी की बहन थीं। यानी राजा मान मोरी बप्पा रावल के मामा थे। बताया जाता है कि राजा महेंद्र मेवा़ड़ के दक्षिण-पश्चिम में स्थित नागदा कस्बे पर शासन किया करते थे।

इतिहासकारों द्वारा बताया जाता है कि राजा रावल महेंद्र के धर्मभ्रष्ट होने के कारण उनकी हत्या कर दी गई थी। उस समय बप्पा रावल की उम्र मात्र तीन वर्ष की थी जो कि शासन चलाने के लिए उपयुक्त नहीं थी।

इस बीच नागदा के शासकों ने गुहिलोत सिंहासन के युवा राजकुमार को मारने का प्रयास किया था लेकिन राजा के करीबी भील मित्रों ने जो की स्थानीय आदिवासी समुदाय से आते थे ने उनके प्रयासों को असल कर दिया। बेटे कि सुरक्षा के लिए रानी साहिबा अपने पति की पुरानी राजधानी नागदा के आसपास के बीहड़ और दुर्गम ग्रामीण इलाके में लौट आयीं। यहीं क्षेत्र ब्राह्मणों का निवास स्थान था। जो भगवान शिव की स्थापित मूर्ति एक लिंग  जी  पूजा किया करते थे।

राजा महेंद्र रावल की विधवा ने अपने छोटे बेटे को एक स्थानीय ब्राह्मण पुजारी की पत्नी जो की कुल की पुरोहित भी थीं को देखभाल के लिए सौंप दिया। चूंकि बप्पा रावल बहुत छोटे थे जिस कारण उनके बालिग होने तक शासन उनके नाम पर  ही चला। खास बात  यह है कि बप्पा रावल को पुजारी को सौंपने का वृतांत बताता है कि उन्हें उनके पिता के हत्यारों से बचाने के लिए यह कार्य किया गया होगा।

बचपन का वृतांत

बप्पा रावल ने अपना बचपन नागदा के नीचे पहाड़ियों में स्थित एक धार्मिक आश्रम में बिताया। वे ब्राह्मणों के पशुओं को चराने के काम किया करते थे। इस प्रकार उनके बचपन का नाम काल भोज पड़ा। काल शब्द का अर्थ भगवान शिव के महाकाल रुप से लिया गया है। ऐसा इस लिए था जहां बप्पा रावल रहते थे सभी ब्राह्मण परिवार एकलिंग जी यानी भगवान शिव पूजा-अर्चना के प्रति गहरी निष्ठा रखते थे। पशुओं को चराना ब्राह्मणों के बच्चों के लिए एक सम्मानजनक एवं गौरवपूर्ण पेशा था।

यहां रहते हुए बप्पा रावल का स्थानीय भील समुदाय के साथ गहरा संबंध बन गया। बचपन में ही बप्पा रावल घुड़सवारी और तलवार बाजी में महारत हासिल कर चुके थे। काल भोज के गुरु हरित राशि नामक एक ऋषि अंतर्मुखी और दूरदर्शी व्यक्तित्व के धनी थे। उन्होंने बालक को नैतिकता का ज्ञान सिखाया। शिव का आराधना करना सिखाया विधान सभाओं के लिए दीक्षित किया। इस प्रकार बप्पा रावल हरित ऋषि के शिष्य बने महर्षि को जल्द ही ज्ञात हो गया कि बालक के पास अद्वितीय बुद्धि और सहानुभूति की क्षमता है।

उनकी प्रतिभा के देखते हुए उनके गुरु ने भविष्यवाणी की कि ठीक 16 वर्ष बाद यह बालक मेवाड पर शासन करेगा। उनके गुरु ने उन्हें विशेष आशीर्वाद दिया और बप्पा रावल को पालन करने के लिए विशिष्ट आचार संहिता प्रदान की।

16 वर्ष के बाद

जब 18 वर्ष के हुए तब वे चितौड़ गए इतिहासकारों द्वारा बताया जाता है कि उस समय किले के नीचे स्थित कस्बे में मेला चल रहा था वहां बप्पा रावल ने एक ऐसी लड़ाई का प्रदर्शन किया जिसने मान मोरी और परमार सरदारों को भयभीत कर दिया। जब मान मोरी को पता चला की वे उनका भांजा है तो उन्होंने उनका स्वागत किया और उन्हें किले के विद्वानों में शामिल किया इसके साथ ही उनके मामा ने एक जागीर भी भेंट में दी।

इतिहासकारों अनुसार बताया जाता है कि उनके पिता की हत्या भील सरदारों द्वारा षड्यंत्र रच कर की गयी थी इनमें किसी राजा या सम्राट का नाम नहीं मिलता बस कुछ क्षेत्रीय मुखियों तथा सरदारों ने मिल कर इस कार्य का अंजाम दिया था बड़े होने के बाद सबसे पहले अपने पिता के हत्यारों तथा षड्यंत्र कर्ताओं को दंडित किया और अपना साम्राज्य फिर से हासिल किया।

इसके वाद अपनी वंशावली को छोड़ते हुए यानी गुहिलात वंश जिसे गुहिला वंश कहते है को समाप्त करके मेवाड़ राजवंश की 734 ईस्वी में स्थापना की। इस प्रकार लगभग 21 वर्ष की आयु में उन्होंने अपने पिता रावल महेंद्र द्वितीय का स्थान लिया। बताया जाता है कि बप्पा रावल नाम उनकी बहादुरी के कारण उपाधि की रुप में उनकी प्रजा ने उन्हें दिया था और उनका वास्तविक नाम जो कि वे स्वयं स्वीकार करते थे कालभोज ही था

अरबों अथवा अम्मयद साम्राज्य का आक्रमण 

सन 712 ईस्वी और आठवीं शताब्दी के समय काल में मुहम्मद बिन कासिम जो कि अरब साम्राज्य का राजा था जिसे हम उम्मयद साम्राज्य umayyad dynasty के नाम से भी जानते है ने सिंध के राजा दाहिर सेन को पराजित कर सिंध पर अपना शासन स्थापित किया इसके बाद के समय काल में अरब सेनापतियों जैसे कि जुनैद और तमीम ने राजस्थान गुजरात तथा मालवा पर हमला के छोटे-छोटे राज्यों पर हमला करना प्रारम्भ किया। जिससे इन क्षेत्रों के आसपास के राजा जैसे की मान मोरी इन लगातार आक्रमणों से कमजोर हो रहे थे।

इसी बीच जब अरब आक्रमणकारी मोहम्मद बिन कासिम ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया तो राजा मान मोरी ने अपनी प्रजा से आक्रमणकारी सेना जुटाने का आदेश दिया लेकिन अरबों की दहशत के चलते सभी जागीरदार अपनी जागीरें छोड़कर भाग खड़े हुए तब अंत में उन्होंने अपने भतीजे बप्पा रावल को बुलावा भेजा। इस प्रकार परमार राजा ने बप्पा रावल को अपनी सेना का सेनापति नियुक्त किया।

जागीरों से बेदखल किए जाने के बावजूद सरदार शर्मिंदगी से कारण उनके साथ चले गए। इतिहासकार कर्नल जेम्स टाड और अन्य पारंपरिक ग्रंथों के अनुसार बप्पा रावल ने अपनी वीरता और सैन्य कौशल का परिचय देते हुए अरब आक्रमणकारियों को करारी शिकस्त दी और उन्हें खदेड़ दिया। उनके समर्थन में प्रतिहार शासक नागभट्ट प्रथम तथा क्षेत्रीय राजाओं ने भी उनका सहयोग किया और अरबों को भारी शिकस्त दी।

चारण और भाट साहित्य की कथाओं अनुसार बप्पा रावल ने केवल अपनी सीमाओं की रक्षा ही नहीं की बल्कि भागती हुई अरब सेना का पीछा करते हुए उन्हें उत्तर-पश्चिम में काफी दूर तक खदेड़ा। बताया जाता है कि बप्पा रावल चौकियां और छावनीयां गजनी वर्तमान अफगानिस्तान तथा पाकिस्तान के रावलपिंडी शहर तक थी कहा यह भी जाता है कि रावलपिंडी नाम भी उनके द्वारा ही दिया गया था।
बताया जाता है कि बप्पा रावल की अरबों की इस ऐतिहासिक जीत ने कई सदियों तक उत्तर-पश्चिम भारत पर इस्लामिक आक्रमणों का रास्ता बंद कर दिया।

अंतिम समय

इतिहासकारों द्वारा बताया जाता है कि बप्पा रावल ने अपने जीवन के अंतिम समय में राजपाट और मोह-माया का त्याग किया और ध्यान और साधना में अपना मन लगाया। जिसके लिए मेवाड़ से उत्तर की ओर यात्रा करते हुए नागदा से आगे बढ़े खुरासान में अपना अंतिम समय बिताया और अपने गुरु हारित ऋषि के मार्ग पर चलते हुए योग साधना के बल पर 753 ईस्वी के आसपास अपना शरीर त्याग दिया।

ऐतिहासिक साक्ष्य

कुछ शिलालेखों में बप्पा रावल का उल्लेख मिलता है जिनमें गुहिला वंश की वंशावली यानी सूची दी गई थी। लेकिन अन्य शिलालेखों में उनका उल्लेख नहीं मिलता है। उदाहरण के तौर पर देखा जाए तो 959 ईस्वी के उनावास शिलालेख तथा 971 ईस्वी के एकलिंग शिलालेख में उनका उल्लेख नहीं मिलता है। इसके साथ ही 977 ईस्वी के अतपुर शिलालेख में इसके साथ ही 1083 ईस्वी के कदमल शिलालेख में भी उनका उल्लेख नहीं मिलता है।

इतिहासकारों का मानना है कि बप्पा रावल का गुहिला शासकों में से किसी एक का उपनाम नाम था इसके साथ ही अलग-अलग विद्वानों ने अलग-अलग गुहिला राजाओं से जोड़ने का प्रयास किया है। अतपुर और कदमल शिलालेखों के अनुसार गुहिला शासक महेंद्र के बाद कालभोज शासक बने। जी एच ओझा जैसे कई इतिहासकारों ने बप्पा रावल को कालभोज के रुप में पहचाना है।
क्योंकि 977 ईस्वी के अतपुर शिलालेख में खुमाना को कालभोज का पुत्र बताया गया है।

1404 ईस्वी के महारावल पाटा के उपरागणवा यानी डूंगरपुर शिलालेख में खुमाना को बप्पा रावल का पुत्र बताया गया है। आर.वी.सोमानी इस पहचान का समर्थन करते है लेकिन चेतावनी देते है क साक्ष्य निर्णायक नहीं है बप्पा रावल गुहिला वंश की किसी अन्य शाखा से संबंधित कोई अन्य शासक हो सकते है।

अतपुर शिलालेख में बप्पा रावल के नाग का उत्तराधिकारी और अपराजित का पूर्वज बताया गया है। 1460 के कुंभलगढ़ शिलालेख में बप्पा रावल को नाग का उत्तराधिकारी और अपराजित का पूर्वज बताया गया है। इससे पता चलता है कि बप्पा रावल कालभोज के परदादा शिलादित्य का दूसरा नाम था।

इस प्रमाण के आधार पर दशरथ शर्मा और डीसी सिरकार ने बप्पा रावल की पहचान शिलादित्य के रुप में की है। वहीं आर.वी. सोमानी इस पहचान का खंडन करते हुए कहते है कि इस शिलालेख में कई त्रुटियां है जिनमें बप्पा रावल को गुहादत्त के पिता के रुप में दर्शाया गया है जबकि कुछ शिलालेखों में उन्हें राजवंश का संस्थापक दर्शाया गया है।

कुछ अन्य इतिहासकारों ने बप्पा रावल को जैसे कि डी.आर. भंडारकर ने गुहिला शासकों के औसत शासनकाल की गणना के आधार पर कालभोज के पुत्र खुमाना के रुप में पहचाना है।
वहीं लखनऊ विश्वविद्यालय के श्याम मनोहर मिश्रा ने यह सिद्धांत दिया कि बप्पा रावल मूल रुप से मोरी शासक मनुरजा यानी मान मौर्य के जागीरदार थे। 

उन्होंने संभवतः अरबों के विरुद्ध मोरी अभियान का नेतृत्व किया था जिससे वे अपने अधिपति से अधिक प्रसिद्ध  हो गए थे। खोज कर्ताओं का मानना है कि य तो उन्होंने मनुराज को पदच्युत कर दिया या फिर मनुराज की निःसंतान मौत के बाद खुद राजा बन गए।

चित्तौड़ शिलालेख के अनुसार उन्होंने कर्नाटक और चोलों के साथ भी संघर्ष किया था अरबों के आक्रमण के बाद बप्पा रावल ने प्रतिहारों और राष्ट्रकूटों के साथ संघर्ष किया था। बताया जाता है कि राष्ट्रकूट राजा दंतिदुर्ग ने उज्जैन पर कब्जा कर लिया। हलांकि थोड़े समय में राष्ट्रकूट वहां से चले गए और नागभट ने अपनी सत्ता पुनः प्राप्त कर ली थी। 

इतिहासकार आर. वी. सोमानी का सिद्धांत है कि इन संघर्षों में बप्पा रावल ने प्रतिहारों की सहायता करके दंतिदुर्ग की सेनाओं का सामना किया और इस प्रकार मेवाड क्षेत्र के पूर्वी हिस्सों पर कब्जा करने में सफल रहें।

सोने के सिक्के

जी.एच.ओझा जैसे प्रख्यात इतिहासकारों ने नागरी लिपि में श्री वोप्पा य श्री वोप्पाराजा अंकित कई सोने के सिक्कों को बप्पा रावल से संबंधित माना है। हलांकि कुछ मुद्रा शास्त्रियों ने इस मान्यता पर विवाद किया है तर्क देते हुए 1960 में भारतीय मुद्रा शास्त्र सोसायटी के एक जर्नल ने तर्क देते हुए कहा उस समय मेवाड उतना बड़ा साम्राज्य नहीं था

कि वें सोने के सिक्के जारी कर सके और इसके साथ ही उन्होंने तर्क दिया कि हो सकता है कि ये सिक्के सुरसेना वंश के राजा वप्पुका के हो सकते है जिनका उल्लेख 955 ईस्वी के एक शिलालेख में मिलता है।

फिर भी सिक्कों पर स्पष्ट रुप से शैव प्रतीक चिन्ह जैसे त्रिशूल लिंग और बैल के चिन्ह मिलते है जो कि बप्पा रावल की भगवान एक लिंगनाथ जी के प्रति निष्ठा और उनकी दृढ़ता से मेल खाता है। इसके साथ ही इन सिक्कों पर शैव प्रतीकों के नीचे एक व्यक्ति की लेटी हुई छवि है। उस व्यक्ति का कान बड़े और छिद्रित हैं और छेद अतिरंजित प्रतीत होते है।

इंडोलाजिस्ट डेविड गार्ड़न व्हाइट के अनुसार यह बप्पा के शैव संप्रदाय में दीक्षा का प्रतीक हो क्योंकि कान छिदवाने की प्रथा शैल संप्रदाय से जुड़ी हुई है । जो सोलहवीं शताब्दी से पहले एक लिंग जी मंदिर के संरक्षक हुआ करते थे।

हलांकि व्हाइट का मानना है कि बप्पा के पशुपात संप्रदाय में दीक्षा लेने की संभावना अधिक है क्योंकि पशु पात नाम आमतौर पर राशि में समाप्त होते थे इस प्रकार हरित ऋषि संभवतः एक पशु पात ऋषि थे। इसके आगे वे कहते है कि रावल संस्कृत शब्द राजकुल शाही-वंश 8वीं शताब्दी में पशुपती के बीच एक कुल का नाम था। जो की 13वीं में कुल नाथ संप्रदाय में समाहित हो गया था।

इसी प्रकार के एक सिक्के पर धनुष-बाण पकड़े हुए श्री राम की आकृति बनी है उनके बाई ओर एक बैल और दाई ओर एक हाथी है। सिक्के के दूसरी तरफ सिंहासन पर बैठे शासक की आकृति है जिनके दोनों और सेवक है और नीचे श्री वोप्पा य बप्पा लिखा हुआ है।
इसी प्रकार के एक सिक्के पर श्री वोप्पाराजा लिखा हुआ है जिसमें एक बैल एक त्रिशूल एक लिंग और एक परिचारक की छवियां है और दूसरी ओर एक गाय अपने बछड़े को दूध पिला रही है।

निष्कर्ष

साहस और पराक्रम का प्रतीक
बप्पा रावल केवल मेवाड़ के संस्थापक ही नहीं बल्कि भारतीय इतिहास के एक अत्यंत साहसी और प्रतापी योद्धा थे। उनके धैर्य के आगे विदेशी आक्रमणकारी विशेष कर अरबों के कदम ठहर न सकें जिससे देश की सीमाएं सुरक्षित हुईं।

धार्मिक और सांस्कृतिक निष्ठा
वे महान शासक होने के साथ-साथ धर्मनिष्ठ और भगवान शिव के परम भक्त थे। उन्होंने राजनीति और आध्यात्मिकता का अनूठा समन्वय प्रस्तुत किया जहां मेवाड़ के शासक खुद को भगवान का दीवान मानकर प्रजा की सेवा करते थे।

दूरगामी प्रभाव
उनके द्वारा स्थापित मेवाड का राजवंश आगे चलकर भारतीय इतिहास में वीरता त्याग और स्वाभिमान का प्रतीक बना।

संक्षेप में कहा जा सकता है कि बप्पा रावल का जीवन साहस कर्तव्यनिष्ठा और राष्ट्र प्रेम का अनूठा संगम था। उन्होंने न केवल विषम परिस्थितियों से निकलकर मेवाड़ में सुदृढ़ साम्राज्य की नींव रखी बल्कि विदेशी आक्रमणों के खिलाफ दीवार बनकर भारतीय संस्कृति और सीमाओं की रक्षा की।

उनकी वीरता जन हितकारी नीतियां और आध्यात्मिक जीवन-शैली सदियों तक आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देती रहेंगी और भारतीय इतिहास में उनका नाम एक अमर शासक के रुप में स्वर्ण अक्षरों में अंकित रहेगा।

2026-09-20

रानी वेलू नाचियार

digital painting of rani velu nachiyar

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में भारत की महान रानी वेलू नाचियार की वीरगाथा के इतिहास पर प्रकाश डाला गया है। रानी वेली नाचियार शिव गंगा रियासत की रानी थी वे भारत में ईस्ट इंडिया के साथ युद्ध छेड़न वाली पहली भारतीय महिला रानी थीं। उन्हें वीर मंगई की उपाधि से भी जाना जाता है जिसका मतलब है बहादुर महिला की उपाधि से भी जाना जाता है।

जीवन परिचय

रानी का जन्म 3 जनवरी क1730 में रामा नाथ पुरम की राजकुमारी और राम नाथ राज्य के राजा चेन्नमुथु विजय रागनाथ सेतुपति और रानी सकंधि मुथल की इकलौती संतान थी। राजकुमारी नाचियार को युद्ध कला की कई विधियों में प्रशिक्षित किया गया था। इनमें युद्ध के हथियारों का उपयोग वलारी सिसंबन कलरिपट्टू जैसी मार्शल आर्ट और घुड़सवारी और तीरंदाजी में बचपन से ही निपुण बनाया गया था।

इसके साथ ही वे कई भाषाओं की अच्छी जानकार थी जैसे फ्रेंच अंग्रेजी और उर्दू जैसी भाषाओं में निपुण थीं। 1746 में उनका विवाह मुथु वदुगनाथ पेरयावुदया थेवर से विवाह कराया गया। विवाह के बाद राजकुमारी ने राजकुमार के करीबी सलाहकार मार्गदर्शक और विश्वासपात्र के रुप में कार्य किया। 1772 ई. को उनके पति मुथु वादुगनाथ पेरियावदुया थेवर की मौत कलैयार कोविल से 12 किलोमीटर दूर मरावर मंगलम में हुए युद्ध के दौरान हो गई। इस युद्ध के दौरान ईस्ट इंडिया कंपनी के सैनिकों के अचानक हमले के कारण उनकी मृत्यु हुई।

परिणास्वरुप रानी को अपनी इकलौती बेटी के साथ भागना  हैदर अली के यहां शरण लेनी पड़ी। दिंडी गुल एक सीमावर्ती राज्य था जिसका शासक हैदर अली था। हैदर अली के यहां शरण लेने पर उनके लिए  विरुपाची किले रहने की व्यवस्था की गई। 8 वर्षों के समय काल के बाद नट्टू अंबलरों कमांडरों मरुधु बंधुओं और थंडावरयन पिल्लई के समर्थन से इसके साथ ही उन्हें टीपू सुल्तान का समर्थन भी प्राप्त था अतः इस सभी का समर्थन मिलने के बाद रानी साहिबा ने ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी।

1780 में रानी वेलू नाचियार ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़े युद्ध में सफलता हासिल की अपने राज्य को पुनः हासिल किया। इसके साथ ही उन्होंने दस वर्षों तक शासन किया तथा 1796 में उनकी मृत्यु हो गई। इसके बाद उनकी बेटी वेल्लाची ने उनके शासन का कार्य भार संभाला। रानी साहिबा ने राज्य के प्रशासन में सहायता के लिए मरुदु भाइयों तथा अपनी बेटी की शक्तियां प्रदान की।

जीवन संघर्ष

रानी साहिबा का जीवन संघर्ष 16 वर्ष की उम्र से प्रारम्भ हो गया था जब उनकी शादी राजा मुथु वदुगनाथ पेरियाउदैया थेवर के साथ हुई थी। रानी बनने के बाद से ही रानी साहिबा में ने राजा के राजनीतिक कार्यों में उनका हाथ बढ़ना प्रारम्भ कर दिया था। 1717 से 1795 तक के समय काल में ही कर्नाटक के क्षेत्रीय शासक अरकोट के नवाब ने कई अन्य दक्षिणी राजवंशो पर अपना अधिपत्य स्थापित कर लिया और अंग्रेजों के साथ हाथ मिला लिया था।

जिसके चलते इन लोगों ने मिलकर शिव गंगा पर कर लगाना प्रारम्भ किया साथ  ही कर वसूली के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों को शिव गंगा भेजा गया। हालांकि राजा ने कर देने से मना कर दिया। जिसके चलते शिव गंगा पर अंग्रेजों को आक्रमण करने का बहाना मिल गया। अचानक हुए हमले में राजा की जान चली गई। तब रानी ने दुःख में डूबने की बजाय अपनी बेटी की रक्षा के लिए हिम्मत से काम लिया।

हैदर अली को पत्र

अरकोट का नवाब रामनाथ पुरम और  शिवगंगा दोनों राज्यों पर लुटपाट कर रहा था और लोगों पर अत्याचार कर रहा था। अपने राजा के मरने के बाद रानी साहिबा ने जंगलों में कल्लर नेताओं के साथ शरण ली और विद्रोह जारी रखा। दिंडी गुल के शासक हैदर अली को पत्र लिख कर मदद  मांगी बिना इस बात की प्रवाह करें कही वे उन्हें धोखा न दे। रानी साहिबा में अपने संदेश में लिखा जो कोई भी मेरी मदद कर  सकता है अवश्य करें बदले में उसे बेहतर उपलब्धियां हासिल हो सकती है। 

हम द्वारा भेजी गई सेना से हम मदुरै में भी सेना भेजकर पूरे देश में जवाबी कार्यवाही कर सकेंगे। हमें पालीगार का समर्थन पहले ही  मिल गया है। संदेश के जवाब में हैदर अली ने कहा आपके पास अगर पांच हजार घुड़सवार है तो मैं पांच हजार सैनिक भेजने को तैयार हूं जिनका भत्ता वहन मैं कर सकूँगा और दोनों रियासतों को पुनः हासिल करने में आपकी मदद करूंगा।

महिला सेना उदैयाल

दूसरी तरफ रानी साहिबा ने अपनी युद्ध की रणनीतियों को अंजाम देते हुए उदैयाल महिला सेना का गठन किया। दूसरी तरफ 1780 में हैदर अली ने 80,000 सैनिकों के साथ अरकोट के नवाब पर पूर्वी तटीय क्षेत्रों की तरफ से हमला कर दिया। नवाब के ब्रिटिश सेना तथा अरकोट के नवाब से युद्ध दौरान रानी वेसू नाचियार ने भी हमले का सही अवसर पा कर रानी की सेना शिवगंगा की और अग्रसर हुई। 

शिव गंगा की सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होने के कारण रानी साहिबा ने एक चतुर योजना बनाई। योजना के अनुसार उनकी उदैयाल महिला सेना विजय दशमी के ठीक पहले वहां पहुंच गई। विजय दशमी वाले दिन शिव गंगा की महिलाएं महल के पास स्थित राजा राजेश्वरी के मंदिर में इकट्ठा होती है। इस प्रकार रानी साहिबा की सेना महल में घुसने में सफल रही और अंदर घुसकर पहला हमला उदैयाल सेना ने ही किया था।

महल में युद्ध के  दौरान उदैयास सेना के हथियार अंग्रेजों के आधुनिक हथियारों का मुकाबला नहीं कर पा रहे थे तब सेना की कमांडर इन चीफ कुयिली ने लड़ते हुए गोला बारुद कक्ष के पास पहुंचकर खुद को तेल से भिगोकर पूरा गोला बारुद भंडार उड़ा डाला। कमांडर कुयिली के  बलिदान ने रानी वेलू नाचियार को शिव गंगा को जितने तथा अंग्रेज़ों को हराने में मदद की। इस प्रकार महिला कमांडर ने अपने प्राणों की आहुति दे कर अपनी मातृभूमि की रक्षा की।

जब आर्कोट के नवाब को रानी साहिबा और हैदर अली के गठबंधन का पता चला तो उसने भी रानी साहिबा के साथ समझौता कर लिया। इस प्रकार 1780 में उन्हें शिव गंगा की रानी का ताज पहनाया गया।

भारत सरकार द्वारा सम्मान

31 दिसंबर 2008 को उनके नाम पर डाक टिकट जारी किया गया। 
इसके साथ ही तमिल तथा अमेरिकी हिप-हाप गायक ने 2016 में अपने तमिलमैटिक एल्बम के  एक हिस्से के रुप में वेलू नाचियार को समर्पित हमारी रानी नामक एक गीत जारी किया।
21 अगस्त 2017 को चेन्नई के नारधा गान सभा में रानी वेलू नाचियार के जीवन इतिहास को दर्शाने वाले एक भव्य नृत्य प्रदर्शन का आयोजन किया गया। खास बात यह है कि इस नाटक का निर्देशन श्री राम शर्मा जी ने किया जिन्होंने रानी साहिबा के जीवन इतिहास पर लगभग एक दशक तक रिसर्च की थी।

निष्कर्ष

  1. संक्षिप्त में हम कहे तो रानी वेलू नाचियार सिर्फ सिर्फ तमिलनाडु की ही नहीं बल्कि पूरे भारत की पहली महिला शासीका थीं जिन्होंने सदियों पहले ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष किया था।
  2. वे साहस और कूटनीति की प्रतीक थीं उनका जीवन यह दर्शाता है कि उन्होंने रानी होने के धर्म के साथ-साथ एक योद्धा,कूटनीति और जन नायिका का किरदार भी बखूबी निभाया।
  3. उनका इतिहास आज की पीढि विशेष कर महिलाओं के लिए साहस आत्मविश्वास और देश प्रेम की अनमोल विरासत है।

2026-09-17

इक्ष्वाकु वंश

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प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम भारत के इक्ष्वाकु वंश के बारे में चर्चा करेंगे यह वंश इसलिए भी खास है क्योंकि इसी वंश में श्री रामचन्द्र का जन्म हुआ था। जिन्हें हिन्दू धर्म कि मान्यताओं के अनुसार श्री विष्णु का अवतार माना गया है और आज भी लोग उनकी पुजा करते है। खास बात यह है कि इस वंश के महत्वपूर्ण साक्ष्य अभी तक नहीं मिल पाए है खाली वंशावली ही मिली है। अभी तक न तो उनके प्रशासन द्वारा जारी मोहरे मिल पायी है और न ही उनके व्यापारिक क्षेत्रों के बारे में महत्वपूर्ण साक्ष्य मिलें है।

परिचय

हिंदू धर्म के ग्रंथ के अनुसार राजा इक्ष्वाकु ही इक्ष्वाकु वंश के पहले राजा और संस्थापक थे इन्होंने कोसल राज्य की स्थापना की और अयोध्या को उसकी राजधानी बनाया जहां श्री राम चन्द्र का जन्म हुआ था। राजा इक्ष्वाकु मनु के पुत्र थे। पौराणिक साक्ष्यों के आधार पर इक्ष्वाकु शब्द इक्षु से उत्पन्न हुआ है। जिसका अर्थ ईख होता है माना जाता है कि ईख पैदा करने वाली धरती पर इस वंश की शुरुआत हुई। अतः ईख पैदा होने के कारण व करने के कारण इस वंश का नाम ईक्ष्वाकु पड़ा था।

इक्ष्वाकु राजा को महात्मा और तपस्वी महाराज कहा जाता था। इक्ष्वाकु के  बाद उनके राजवंश  के सम्राटो को सूर्यवंशी भी कहा जाता है। क्योंकि मनु सुर्य पुत्र थे इस कारण से इस वंश के राजा को सुर्यवंशी कहा जाता था। बताया जाता है की ईक्ष्वाकु राजा के 100 पुत्र थे जो की मध्य प्रदेश राजस्थान तथा उत्तर प्रदेश में राज किया करते थे।

प्राचीन महान ग्रंथ महाभारत के पर्व के नौवें अध्याय में महाराज इक्ष्वाकु का नाम आता है। ऋग्वेद में भी उनका नाम आता है क्योंकि इस राजवंश से निकलने राजा देश भर में फैले हुए थे जिनका रिश्ता देश के कई राजवंशों से लिया जाता है। दक्षिण भारत का आंध्र इक्ष्वाकु राजवंश 300 से 400 ई.भी अपने राजवंश को महाराज इक्ष्वाकु से संयोजित करता  था।

खास बात यह है कि इक्ष्वाकु वंश को रघुवंश भी कहा जाता है जिसके वंशज रघुवंशी हैं जो उत्तर प्रदेश मध्य प्रदेश और राजस्थान में मुख्य तौर पर शासन किया करते थे। इक्ष्वाकु राजा पृथु मांधाता दिलीप सागर भगीरथ रघु हरिश्चंद्र जैसे प्रतापी राजा हुए। विष्णु पुराण के अनुसार जब मनु को छींक आई तो इक्ष्वाकु उनकी नासिका से निकले बताया यह भी जाता है कि 100 पुत्रों में से तीन सबसे प्रतिष्ठित थे विकुक्षि निमि और दण्ड तथा उनके पचास बेटे उत्तरी देशों के राजा थे। जबकि उनमें से 48 दक्षिण के राजकुमार थे।

जैन धर्म से संबन्ध

खास बात यह है कि चौबीस जैन तीर्थ कारों में से बाईस इसी वंश से संबंधित थे। ऋषभ हिंदू और जैन दोनों पौराणिक कथाओं में मौजूद है और दोनों ही एक ही व्यक्ति को संदर्भित करते हैं। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार  गौतम बुद्ध  इसी वंश से संबंधित थे। इस राज वंश से सम्बन्धित महत्वपूर्ण व्यक्ति राजा दूष्यंत के बेटे भरत थे जिनके नाम पर भारत का नाम भारत वर्ष पड़ा था। इसके साथ ही हरिश्चंद्र दिलीप सागर रघु ये वहीं राजा है जिनके नाम पर इक्ष्वाकु वंश का नाम रघुवंश पड़ा। उसके बाद राम और पसेन आदि का नाम आता है।

वहीं हिंदू पुराण और बौद्ध ग्रंथों में इक्ष्वाकु वंश के वर्णन में राजा शुद्धोधन बेटे गौतम बुद्ध जिनका एक राजकुमार के रुप में नाम सिद्धार्थ था और वे ही आगे चलकर बौद्ध धर्म के संस्थापक बने एवं राहुल आदि का नाम आता है। लेकिन बौद्ध ग्रंथों के अनुसार इक्ष्वाकु वंश के पूर्वज महासम्मत इस वंश के संस्थापक थे। जिन्हें जनता ने वर्तमान युग के प्रथम राजा के रुप में चुना था।

श्री राम चन्द्र

पुराणों के अनुसार इक्ष्वाकु वंश के गुरु वशिष्ठ ऋषि थे तथा राम इक्ष्वाकु वंश के 81वें वशंज थे जिन्होंने उत्तर भारत के मुख्य रुप से कोशल कपिलवस्तु वैशाली और मिथिला आदि क्षेत्रों पर अयोध्या को राजधानी बना कर शासन किया। इन राजा कि तुलना विष्णु के सातवें अवतार के रुप में की गई है। इस बात का उल्लेख हमें बाल्मीकि रामायण के युद्ध कांड के सर्ग 117 में मिलता है कि भगवान राम विष्णु के अवतार रुप में धरती पर जन्म लेते है।

यह पूरा महाकाव्य भगवान राम के सम्पूर्ण जीवन की घटनाओं को दर्शाता है। इसके अलावा गोस्वामी तुलसी दास द्वारा रचित श्री रामचरित मानस में बालकाण्ड और अन्य प्रसंगों में राम जी को भगवान विष्णु का स्वरुप बताया गया है। इसके साथ ही महाभारत के वन पर्व सहित अन्य कई पर्वों में भगवान राम की कथा तथा उनके विष्णु अवतार होने का प्रसंग मिलता है। इसके अलावा श्री मदभागवत पुराण तथा महापुराण के प्रथम स्कंध और तृतीया अध्याय में एवं विष्णु पुराण तथा अध्यात्म रामायण जैसे प्रमुख सनातन ग्रंथों में भगवान विष्णु के सातवें अवतार होने का वर्णन मिलता है।

कहानी का सार

वैसे दोस्तों श्री रामचंद्र सच में अवतरित पुरुष थे य नहीं ये हमें नहीं पता लेकिन इतना अवश्य समझ में आता है कि श्री राम चन्द्र के शासन काल में प्रजा उनसे बहुत खुश थी इतना ही नहीं उनके द्वारा किए गए कार्यों में मर्यादा और अपने से बड़ों का सम्मान विशेष रुप से झलकता है। उनका सम्पूर्ण जीवन भारतीय समाज के लिए प्रेरणा स्रोत है। जो बताता है कि मनुष्य को अपनी कुल मर्यादा और परंपरा और सम्मान का ख्याल रखना और उनका संरक्षण करना चाहिए।

वर्तमान स्थिति अनुसार अगर भगवान श्री राम के जीवन की तुलना करें सोचिए आपने किसी हाई क्लास संस्थान से एक बड़ी डिग्री य डिप्लोमा लिया जिसमें अपने चार से पांच वर्ष अपने बरबाद किए मगर परिणाम आने पर आपके घर वाले कहते है कि आप नौकरी नहीं करेंगे घर का रोजगार संभालेंगे। बहुत से लोग तो सीधे तौर पर घर वालों को मना कर देंगे मगर कुछ अगर मान भी जाते है तो वे खुद को ठगा हुआ महसूस करेंगे।

इसी तरह श्री राम के जीवन को देखा जाए तो उन्हें बचपन से ही एक राजा बनने की शिक्षा दी गई मगर जब राजा बनने का समय आया तो उन्हें 14 वर्षों के लिए वन को भेज दिया गया। सोचिए जो व्यक्ति राजा बनने वाला था वो अचानक से वन को जा रहा है जिसके जीवन के बारे में उन्हें कुछ नहीं पता मगर वे फिर भी तैयार हो जाते हैं।

ये कहानी य कथा में पढ़ना जितना आसान लगता है उतना ही वास्तविक जीवन में कठिन है। उनकी सकारात्मक विचार धारा बताती है कि वे जीवन की हर परिस्थिति से लड़ने के लिए वे तैयार थे। यहां एक बात साफ होती है कि जीवन में आप चाहे जिस भी परिस्थिति में हों सुख दुख तो आना जाना है। खास बात यह है कि हम उसके लिए तैयार है कि नहीं।

एक सकारात्मक सोच उनके चरित्र से झलकती है तभी तो उनकी गैर मौजूदगी में अयोध्या की राजगद्दी पर उनकी चरण पादुका को रखकर 14 वर्ष तक प्रशासन कार्य उनके भाइयों ने चलाया और सःकुशल चला भी।

इक्ष्वाकु वंश के राजा

इक्ष्वाकु वंश के अंतिम राजा राजा सुमित्र थे जो कि एक क्रूर राजा था जिन्हें 362 ईसा पूर्व में मगध के शक्तिशाली सम्राट महापद्य नंद ने हराया था। इतिहासकारों के अनुसार बताया जाता है कि महापद्यनंद ने राजपुतों का नर संहार किया था जिसके कारण उन्हें द्वितीय परशुराम भी कहा जाता था। परशुराम द्वितीय से पराजित होने के बाद राजा सुमित्रा बिहार के रोहतास क्षेत्र में चले गए थे और आगे चलकर राजा सुमित्र ने कुशवाहा वंश की स्थापना की कालांतर में वे कुशवाहा कहलाए।

2026-09-16

वाकटक वंश

oil painting of vakataka dynasty
प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में वाकटक वंश के उदय होने तथा अंत होने के साथ-साथ वाकटक वंश की चार प्रमुख शाखाओं तथा हाल ही के समय में खुदाई के दौरान वाकटक वंश से संबधित साक्ष्यों पर प्रकाश डाला गया है। माना जाता है कि वाकटक वंश का उदय उत्तर के मालवा से लेकर दक्षिण में तुंगभद्रा नदी तक तथा पश्चिम में अरब सागर से लेकर पूर्व में छत्तीसगढ़ के  छोर तक फैला हुआ था। बताया जाता है कि वे गुप्त वंश के समकालीन थे।

परिचय

इतिहासकारों के अनुसार यह भारत का सबसे प्राचीनतम राजवंश था। जिसकी स्थापना विंध्य शक्ति नामक राजा द्वारा 250  से 270 ईसा पूर्व में की गई। हलांकि इस राजा के बारे में ज्यादा जानकारी इतिहासकारों को नहीं मिल पाई है लेकिन कुछ साक्ष्य मिलते है कि जो साबित करते है कि वाकटक वंश की स्थापना विंध्य शक्ति नामक राजा द्वारा ही की गई। अंजता की गुफाओं से  मिले शिलालेखों से यह अनुमान लगाया गया है। साम्राज्य का विस्तार विंध्य शक्ति के बेटे प्रवरसेन के शासन काल से प्रारम्भ होता है।

इतिहासकारों क मतानुसार  प्रवरसेन के शासन काल के बाद वाकटक वंश चार शाखाओं में विभाजित हो गया। खास बात यह है कि इन चार शाखाओं में से सिर्फ दो शाखाओं के ही उचित प्रमाण मिल पाये है जिसके कारण बाकी की दो शाखाओं को सिर्फ पुराणों के संकेतों के आधार पर समझा गया है यानी कोई पुख्ता सबूत अभी नहीं मिल पाया है। पहली शाखा का नाम प्रवरपुर नंदीवर्धन शाखा तथा दूसरी शाखा का  नाम वत्सगुल्म शाखा था।

प्रवरपुर नंदी वर्धन शाखा

यह मुख्य और सबसे शक्तिशाली शाखा थी जिसमें नंदी वर्धन जिसका मुख्य रुप से शासन काल नागपुर और प्रवरपुर में शासन किया था। इस शाखा के प्रमुख शासकों में पृथ्वीषेण प्रथम तथा रुद्रसेन द्वितीय और प्रवरसेन द्वितीय शामिल थे।

रुद्रसेन प्रथम
इस शासक के इतिहास के बारे में ज्यादा साक्ष्य नहीं मिल पायें है हलांकि इनके पिता का नाम गौतमीपुत्र था। इस शासक ने नागपुर से 30 किलो दूर रामटेक पहाड़ी पास नंदीवर्धन से शासन किया। रुद्रसेन प्रथम के शासन काल का अब तक एक मात्र शिला लेख मिल पाया जो चंद्रपुर के देवटेक में मिला है। कुछ इतिहासकार इसे ही रुद्रदेव को ही रुद्रसेन मानते है लेकिन इस बात पर अभी मतभेद है। इस बात  का सम्बन्ध इलाहाबाद स्तंभ शिलालेख से लगाया जाता है जिसपर आर्यवर्त के अन्य शासकों के नाम के साथ ही रुद्रदेव का भी नाम मिलता है।

कुछ इतिहासकार इस बात का विरोध इसलिए करते है क्योंकि रुद्रसेन प्रथम का वध समुद्रगुप्त द्वारा किया गया था अंत अपने पिता की मृत्यु के हत्यारे की बेटी प्रभावती गुप्त को अपनी बहु कैसे स्वीकार करता। इतिहासकारों के अनूसार रुद्रसेन प्रथम के पुत्र पृथ्वीविशेष प्रथम का विवाह गुप्त राजकुमारी हुआ इलाहाबाद के अभिलेख के अनुसार बताते है।

रुद्रसेन द्वितीय

इसका शासन काल 380 से 385 ईसा पूर्व तक का था इस शासक का विवाह गुप्त राजा चंद्रगुप्त द्वितीय जिसका शासन काल 375 से 413 तक का था कि पुत्री प्रभावती गुप्त से हुआ था। इस बात की पुष्टि रामटेक के शिला लेख से होती है। 385 ईसा पूर्व में रुद्रसेन द्वितीय का आकस्मिक निधन हो जाता है जिससे पता चलता है कि उसका शासन काल बहुत छोटा था। इसके बाद प्रभावती गुप्त दो बेटों ने 385 से 405 तक वाकटक वंश का राज संभाला। गुप्त रानी के दोनों बेटों के नाम दिवाकरसेना और दामोदरसेना था।

दामोदरसेना को ही हम प्रवरसेना द्वितीय के नाम से जानते है । इस प्रकार प्रवरसेना द्वितीय ने लगभग 20 वर्षों तक शासन किया। इस समय काल को ज्यादातर इतिहासकार वाकाटक-गुप्त युग के नाम से जानते है क्योंकि इस समय काल में वाकाटक साम्राज्य पर व्यावहारिक रुप से गुप्त साम्राज्य का ही शासन काल था। इस बात की पुष्टि प्रभावती  गुप्त के शिलालेख में उनके पिता देव गुप्त के उल्लेख से मिलता है। कुछ इतिहास कार देव गुप्त को ही चंद्रगुप्त द्वितीय मानते है। लेकिन इस बात का कोई उचित प्रमाण नहीं मिलता है।

बताया जाता है कि प्रवरसेन द्वितीय ने महाराष्ट्री प्राकृत में सेतुबंध की रचना की थी। गहा सत्तासाई के कुछ श्लोकों में उनका जिक्र मिलता है। इसी राजा ने अपनी राजधानी नंदिवर्धन से स्थानांतरित करके प्रवरपुरा को बनाया जो कि इसी राजा स्थापित किया गया एक नया शहर था। इस नई राजधानी में विष्णु अवतार राम को समर्पित एक भव्य मंदिर का भी निर्माण इस राजा द्वारा करवाया गया था। प्रवरसेन द्वितीय के बारे एक खास बात यह भी है कि अब तक वाकटक वंश के संबन्धित 17 ताम्रपत्र प्रवरसेन द्वितीय से ही संबन्धित है।

नरेंद्रसेन
प्रवरसेन द्वितीय के बाद का शासन काल नरेंद्रसेन द्वितीय का था। इस राजा का शासन काल 440 से 460 ईसा पु्र्व तक का था अपने शासन काल के दौरान वाकाटक वंश का साम्राज्य विस्तार मध्य भारत के कुछ राज्यों तक फैल गया था।

पृथ्वीसेन द्वितीय
यह प्रवरपुर नंदी वर्धन शाखा का अंतिम शासक था जिसने अपने पिता नरेंद्रसेन के बाद राजगद्दी को संभाला और 460 ईसा तक शासन किया। इस राजा को विष्णुकुंडिना राजा माधव वर्मा द्वितीय ने पराजित किया था। 480 में राजा की मृत्यु के बाद संभवतः उनके राज्य को वत्सगुलमा शाखा के हरिषेण ने अपने राज्य में मिला लिया होगा।

वत्सगुलमा शाखा

यह शाखा प्रवरसेन प्रथम के दूसरे बेटे सर्वसेना द्वारा बनाई गई थी। राजा सर्वसेना न महाराष्ट्र के वाशिम जिले में वत्सगुलमा को अपनी राजधानी बनाया। यह शाखा सहिद्री पर्वतमाला और गोदावरी नदी के बीच में स्थित थी। इस शाखा के शासकों ने अजंता की कुछ बौद्ध गुफाओं को संरक्षण दिया। इतिहासकारों के मतानुसार अजंता गुफाओं का सम्पूर्ण निर्माण वाकाटक शासकों की वत्सगुलमा शाखा द्वारा किया गया था जिसके साक्ष्य में अजंता गुफाओं का विहंगम दृश्य तथा गुफा संख्या 9 का प्रवेश द्वार आदि को मानते है।

सर्वसेन
इस राजा का शासन काल 330 से 355 ईसा पूर्व का माना जाता है इस राजा ने धर्म महाराज की उपाधि धारण की थी। इस राजा को ज्यादा प्रसिद्ध प्राकृत भाषा के हरिविजय के लेख से मिली थी। जो कृ्ष्ण द्वारा स्वर्ग से पारिजात वृक्ष लाने की कथा पर आधारित थी। वर्तमान समय में यह रचना विलुप्त हो चुकी है हलांकि सर्वसेन के समय काल के बाद के रचना कारों ने इसे सराहा था।

विंध्यसेन

सर्वसेन के शासन काल के समाप्त  होने के बाद उसके बेटे विंध्यसेन ने शासन किया। इस राजा का शासन काल 355 से 400 ईसा पूर्व का माना जाता है इसका दूसरा नाम विंध्यशक्ति द्वितीय था। इसकी प्रसिद्ध वाशिम शिलालेखों से मिलती है जिसमें राजा के 37वं वर्ष में नंदीकाता जिसे हम वर्तमान समय में नांदेढ़ के नाम से जानते है नामक गांव के अनुदान का उल्लेख मिलता है। खास बात यह है कि यह किसी वाकटक शासक द्वारा किया गया पहला ज्ञात अनुदान था। इस अनुदान की वंशावली संस्कृत और प्राकृत भाषा में लिखी गई है। विंध्यसेना ने अपने दक्षिणी पड़ोसी कुंतल के शासक को परास्त किया।  इतिहासकारों के अनुसार इस राजा के मंत्री का नाम प्रवरा था।

प्रवरसेन
राजा विंध्यसेन की मृत्यु के बाद उसका बेटा प्रवरसेन द्वितीय गद्दी पर बैठा जिसने लगभग 400 से 415 तक शासन किया। जिसके बारे में अजंता की गुफा सोलह के शिलालेख के अलावा बहुत कम जानकारी है जिसमें बताया गया है कि प्रवरसेन ने अपने परोपकारी तथा उदारवादी एवं शक्तिशाली प्रशासन व्यावस्था के चलते उच्च पद प्राप्त किए। हलांकि इस राजा का शासन काल बहुत छोटा था। प्रवरसेन की मृत्यु के बाद उसका  बेटा जो कि मात्र 8 वर्ष का था राजगद्दी पर बैठा जिसे देवसेन का नाम से जाना गया। अंजता गुफाओं से इस शासक के साक्ष्य लुप्त हो चुकें है।

सभ्याता और संस्कृति

वाकटक शासक हिंदू धर्म को मानते थे तथा शैव संप्रदाय का पालन करते थे। वहीं गुप्त वंश वैष्णव धर्म संप्रदाय का अनुपालन करते थे। इसका प्रमाण हमें रामटेक में पाए गए वैष्णव संप्रदाय से जुड़े कई धार्मिक ढ़ाचे पाये गए जो कि रानी प्रभावती के शासन काल में बनवाये गए थे। जबकि रानी प्रभावती का विवाह वाकटक वंश में हुआ था जो कि शैव संप्रदाय को मानता था। इस प्रकार हम कह सकते  है कि रानी को शासीका के रुप में प्राप्त शक्तियों ने उसे अपने आराध्य यानी विष्णु देव की पुजा करने का अधिकार प्रदान किया।

शोधकर्ताओं के अनुसार महाराष्ट्र में नरसिंह की पूजा करने की प्रथा रामटेक से ही निकली थी साध ही महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में वैष्णव प्रथाओं के प्रचार रानी प्रभावती की महत्वपूर्ण भूमिका थी। इस रानी वाकटक  वंश  की राजगद्दी पर लगभग 10 वर्षों तक शासन किया।

खुदाई के दौरान इन क्षेत्रों से एक पूजा स्थल एक लोहे की छेनी हिरण के  चित्रण वाला एक पत्थर और टेराकोटा की चूड़ियों के साथ ही भगवान गणेश की अखंड मूर्ति जिसमें अलंकारों से सजाया नहीं गया था मिली है। जो इस बात को प्रमाणित करते है कि उस समय काल के दौरान भगवान गणेश की भी पूजा की जाती थी।

वर्तमान खोज


हाल ही में वर्ष 2015 से 2018  के बीच समय काल के दौरान नागपुर के करीब रामटेक तालुका में खुदाई की गयी। इस खुदाई के दौरान तीसरी और पाँचवीं शताब्दी के दौरान इस क्षेत्र पर शासन करने वाले वाकटक वंश के जीवन धर्म तथा व्यापार के विषय में जानकारी मिली है। यहां नागपुर  के  गांव नागार्धन का में यह खुदाई की गई थी जो कि रामटेक तालुका से 6 किलोमीटर दूर लगभग एक से डेढ़ किलोमीटर के क्षेत्र में पुरातात्विक अवशेष पाये गए हैं।

खोजकर्ताओं द्वारा बताया गया है कि मौजूदा नागार्धन गांव प्राचीन बस्ती य गांव के स्थान पर ही स्थित है। इसी क्षेत्र में नदी किनारे कोटेश्वर मंदिर स्थित है और नागार्धन किला गांव के दक्षिण में स्थित है । बताया जा रहा है कि इस किले का निर्माण गोंड राजा के समय काल में हुआ था। अठारहवीं शताब्दी में इस किले का नवीनीकरण भोसलों द्वारा करवाया गया। किले के आसपास के क्षेत्र में वर्तमान समय में खेती जी जाती है वहीं पर ये पुरातात्विक अवशेष मिले है।

अभी तक वाकटक वंश के बारे में जो भी जानकारी प्राप्त थी वे महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र से सम्बन्धित थी जो कि कुछ साहित्यिक रचनाओं और ताम्र पत्रों से मिली थी। अभी तक यही माना जाता था कि नागार्धन गांव वाकटक वंश की पूर्वी शाखा नंदीवर्धन की राजधानी थी। मगर उचित प्रमाण नहीं मिल रहे थे। लेकिन इन पुरातत्विक साक्ष्यों के मिलने से इस बात को बल मिला है कि शायद यह सच में पूर्वी शाखा की राजधानी थी।
खुदाई के दौरान वाकटक शासकों के जीवन के विषय अधिक जानकारी मिल पायी है कि वे किस राजवंश से जुड़ाव रखते थे तथा उनके महलों को बनाने का प्रकार  क्या था इसके साथ ही शासकों के शासन काल के दौरान जारी किए गए सिक्कों और मुहरों के बारे में तथा उनके व्यापारिक क्षेत्रों के बारे में जानकारी मिली है।

धर्म 

वाकटक वंश के शासक ब्राह्मण धर्म के पक्षधर थे
इन्होंने ब्राह्मणों को खूब भूमि अनुदान दिये थे। सांस्कृतिक महत्व की बात करें तो ब्राह्मण धर्म को आदर्शों और सामाजिक संस्थाओं की दक्षिण की ओर बढ़ाने में इनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

खोज खास क्यों है

यह पहली बार हुआ है जब नागार्धन में खुदाई के दौरान मिट्टी की मुहरें मिली हैं। बताया जा रहा है कि यह अंडाकार मुहरें प्रभातगुप्त की रानी के समय काल की है। इन मुहरों पर शंख के चित्रण के साथ ब्राह्मी लिपि में रानी का नाम मुद्रित है। मुहर का वज़न लगभग 6.40 ग्राम बताया गया है। इतिहासकारों द्वारा बताया गया है कि यह मुहरें 1500 वर्ष पुरानी है तथा इनकी माप प्रति मुहर 35.71 mm 24.20mm और मोटाई 9.50mm है। मोहर पर मुद्रित शंख के विषय में इतिहासकारों ने इसे वैष्णव सम्प्रदाय से संबन्धित बताया है।

इन मोहरों का प्रयोग राजधानी में जारी शाही अनुमति के रुप में किया गया होगा। इसके अलावा इन संकेतों का उपयोग उन दस्तावेजों पर किया गया होगा जिनके लिए शाही अनुमति अनिवार्य होती होगी। यह सब बाते इस बात कि ओर इशारा करती है की रानी प्रभावती वास्तव में एक शक्तिशाली महिला शासिका रही होगी।.

2026-09-11

अहोम राजवंश


illustration of ahom dynasty

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम अहोम राजवंश के इतिहास इनकी विरासत तथा इनके पतन के मुख्य कारणों पर प्रकाश डाला गया है। इसके साथ इस राजवंश में विद्यमान कुरीतियों पर विचार किया गया है। इसके साथ ही मेआमोरिया विद्रोह के पीछे के मुख्य कारण तथा इस विद्रोह में अहोम राजवंश के राजकुमार के संयोग के कारण पर प्रकाश डाला गया है। खास बात यह है कि मेमोरिया विद्रोह अहोम साम्राज्य के खिलाफ ही हुआ था।

परिचय

अहोम साम्राज्य का प्रारंभिक शासन ब्रह्म पुत्र नदी घाटी के क्षेत्र में था धिरे-धिरे इन्होंने अपना विस्तार पश्चिम और पूर्व की तरफ किया। 1228 ई. में अहोम राजवंश कि स्थापना सुकाफा द्वारा की गई। जिसने असम के इतिहास को स्वरूप य आकार प्रदान करने में अहम भूमिका निभाई। इस राजवंश ने मुगलों को 17 बार युद्ध में पराजित करके असम के इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अहोम राजवंश के प्रथम राजा सुकाफा ने अपनी राजनीतिक कूटनीति और मोरान तथा बोराही जनजाति से गठबंधन करके इन क्षेत्रों में एक मजबूत साम्राज्य की स्थापना की। इस प्रकार अहोम साम्राज्य ने 1228 से लेकर 1826 तक लगभग 600 वर्षों तक शासन किया।

यह साम्राज्य अपनी अनूठी प्रशासनिक और सैन्य रणनीतियों के लिए उल्लेखनीय है जिसने इसे विदेशी आक्रमणों जिसमें विशेष रुप से मुगलों के आक्रमणों का प्रतिरोध करने में सक्षम बनाया। मुगलों का साथ इनका युद्ध 1671 में राजा लाचित बोरफुकन के नेतृत्व में ब्रह्मपुत्र नदी के सारईघाट के क्षेत्र में लड़ा गया था। इतिहासकारों के अनुसार यह युद्ध मुगलों पर अंतिम विजय का प्राप्त करने के लिए लड़ा गया जिसमें इन्होंने किसी भी पड़ोसी साम्राज्य से किसी भी प्रकार की कोई मदद नहीं मांगी और स्वयं ही सम्पूर्ण मोर्चे को सम्भाला। 

कहा जाता है कि भारतीय इतिहास में यह युद्ध नौसैनिक युद्धों में सर्वश्रेष्ठ उदाहरणों में से एक है।

साम्राज्य के पतन का कारण


पाईक प्रणाली
दरअसल यह प्रणाली अहोम साम्राज्य की रीढ़ थी इस प्रणाली के अंतर्गत प्रत्येक वयस्क पुरुष जिसकी उम्र 17 से 55 वर्ष के अंतर्गत होती थी उसे पाइक के रुप में पंजीकृत किया जाता था। इन्हें गोट्स नामक इकाई में संगठित किया जाता था जिनमें मुख्य रुप से चार सदस्य हुआ करते थे। इनमें एक सदस्य राज्य सेवा करता था तथा बाकी के तीन कृषि संबंधी जिम्मेदारियों का प्रबंधन करते थे। यह कार्य क्रमवार तरीके से बारी-बारी से किया जाता था।

अहोम साम्राज्य में इसी प्रणाली से ही सैन्य तैयारी श्रम संगठन तथा कुशल राजस्व प्रबंधन होता था। पाइक कहने को तो राजस्व कर्मी थे लेकिन इनका जीवन किसी दास से कम नहीं था। अगर कार्य की अवहेलना की जाती थी तो उस पाइक को मृत्यु दण्ड दिया जाता था। जिस कारण से इनकी दशा दिन-ब-दिन दयनीय होती चली गई।

मोआमरिया विद्रोह

1769 से लेकर 1805 ई.दौरान यह विद्रोह अहोम साम्राज्य के खिलाफ हुआ जो कि एक सामाजिक धार्मिक तथा राजनीतिक आंदोलन था। मोआमरिया मुख्य रुप से असम के मोआमरा सत्र वैष्णव मठ के अनुयायी थे। इस विद्रोह में मटक कचरी मोरन तथा अन्य स्थानीय कृषक जन जातियां शामिल थीं। ये सभी श्रीमंत शंकरदेव द्वारा शुरु किए गए वैष्णव भक्ति आंदोलन यानी एक शरण नामक धर्म का पालन करते थे। यह धर्म समानता और भ्रातृत्व पर जोर देता था।

विद्रोह का मुख्य कारण

धार्मिक उत्पीड़न
अहोम शासक शाक्त देवी पूजा संप्रदाय को मानते थे। राजा शिव सिंह की रानी फुलेश्वरी ने मोआमरिया संघठन के गुरुओं का अपमान किया और उन पर जबरन बलि प्रथा व शाक्त रीति-रिवाजों को थोपने की कोशिश की। जिसमें उनके समुदाय में राजा के प्रति विरोध भड़क उठा।

पाईक प्रणाली
वही कुछ पाईक प्रणाली से न खुश थे जिसके तहत आम जनता द्वारा राजा के  लिए मुफ्त का शारीरिक श्रम और सैन्य सेना ली जाती थी। जिस कारण से जनजाति लोगों को विद्रोह संगठित किया।

सामाजिक असमानता
अहोम राजवंश का ढांचा राजा और अभिजात्य वर्ग के वर्चस्व पर टिका था जबकि मोआमोरिया विद्रोह सामाजिक बराबरी की बात कर रहा था।

विद्रोह का परिणाम

1769 में विद्रोहियों ने राजधानी पर कब्जा कर लिया और राजा लक्ष्मी सिंह को गद्दी से हटा कर अपनी सरकार बनाई। हलांकि फिर से अहोम राजाओं ने सत्ता अपने हाथ में ली मगर यह विद्रोह रुक-रुक 1805 तक चलता रहा जिसने साम्राज्य की कमर तोड़ दी। इस प्रकार अहोम साम्राज्य धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगा।

अंत में विद्रोह के चलते सत्ता संभालना मुश्किल हो गया अंत इस अराजकता का फायदा उठा कर बर्मा यानी म्यांमार ने अहोम साम्राज्य पर हमला कर दिया। सेना के विभाजित होने तथा ग्रह युद्ध के कारण राजा ने अहोम साम्राज्य को बचाने तथा बर्मी सेना को भगाने के लिए अंग्रेजों से हाथ मिला लिया। परिणामस्वरूप 1826 की यांडबू की संधि को दौरान पूरा असम अंग्रेजों के अधीन हो गया और इस प्रकार से अहोम साम्राज्य का अंत हो गया। इस 

अहोम साम्रज्य के प्रमुख शासक

सुकाफा
इसका शासन काल 1228 से 1268 ई. तक का था इसने ब्रह्मपुत्र नदी घाटी से असम में प्रवेश करके 1228 में अहोम साम्राज्य की स्थापना की। इसने कूटनीति राजनीति के माध्यम से मोरान बोराही तथा अन्य स्थानीय जनजातियों को अपने साथ मिलाया और अपनी राजनीतिक सत्ता को स्थापित किया। इसे अहोम साम्राज्य के संस्थापक के रुप में देखा जाता है।

सुहुंगमुंग
इसका शासन काल 1497 से 1539 तक के समय काल तक रहा। इसे स्वर्ग नारायण तथा दिहिंगिया राजा के नाम से भी जाना जाता है। इसने अपने शासन काल में अहोम साम्राज्य को एक विशाल क्षेत्र के रुप में विस्तारित किया। इस राजा का शासन काल सांस्कृतिक एकीकरण के रुप में महत्वपूर्ण रहा। इस राजा ने अपने शासन काल में अपनी राजधानी बकाता में स्थानांतरित की जिसके चलते प्रशासनिक नियंत्रण और मजबूत हुआ। इस राजा ने अपने साम्राज्य का विस्तार पश्चिमी क्षेत्रों में अधिक किया।

प्रताप सिंघा
इस राजा का शासन काल 1603 से 1641 तक का था जिसमें इसने अहोम साम्राज्य के केंद्रीकृत प्रशासनिक ढांचे को सुदृढ़ किया। इसी राजा ने पाइक प्रणाली का पुनर्गठन किया और इसे अधिक संरचित और कुशल बनाने का प्रयास किया। इसके साथ ही इसने बाहरी खतरों का मुकाबला करने के लिए सैन्य संगठन को मजबूत बनाया। इस राजा के शासन काल में बोरफुकन जैसे प्रमुख प्रशासनिक कार्यालयों  को ओर मजबूत बनाया गया जिसके चलते सिमा वर्ती शासन और राज्य नियंत्रण में विस्तार हुआ।

जयध्वज सिंह
इस राजा का शासन काल 1648 से 1663 तक का था ये वही दौर था जब भारत के अधिक तम क्षेत्रों पर मुगलों का शासन था। इस समय काल मुगलों ने अपना वर्चस्व भारत में स्थापित कर लिया था जिसके कारण इस राजा को भारी दबाव में शासन चलाना पड़ा। मुगलों के साथ 1663 में जयध्वज सिंह ने घिलाझरिघाट की संधि पर हस्ताक्षर किए। जिसके कारण अहोम साम्राज्य के कुछ क्षेत्रों पर मुगलों का शासन स्थापित हुआ।

गदाधर सिंह
इस राजा का शासन काल में जयध्वज सिंह के शासन काल की राजनीतिक उथल-पुथल समाप्त हुई। गदाधर सिंह ने केंद्रित सत्ता को पुनः स्थापित किया तथा सैन्य संरचना को और मजबूत किया और राज्य के आंतरिक संघर्षों पर रोक लगाई। इस राजा के शासन काल में वैष्णव संस्थाओं को समर्थन मिला। जिसके कारण सांस्कृतिक सुदृढ़ीकरण में मजबूती आयी।

रुद्र सिंह
इस राजा का शासन काल 1696 से 1714 तक का था रुद्र सिंह के शासन काल में प्रशासनिक दक्षता और सांस्कृतिक विकास का एक महत्वपूर्ण दौर चला। इस राजा ने रंगपुर को अपनी नई राजधानी बनाया तथा महल परिसरों तथा सार्वजनिक निर्माण कार्यों सहित महत्वपूर्ण स्थापित्व परियोजनाओं को बढ़ावा दिया। उनके शासन काल में पड़ोसी क्षेत्रों के साथ राजनीतिक संबंध स्थापित किए गए और अहोम साम्राज्य के राजनीतिक प्रभावों को बढ़ाने का प्रयास किया।

पुरंदर सिंह
इस राजा का शासन काल 1818 से लेकर 1838 ई. तक का था। उनका शासन काल राजनीतिक अस्थिरता और विदेशी हस्तक्षेप का दौर रहा। 1826 में बर्मा के आक्रमणों और यंदबो की संधि के बाद असम में ब्रिटिश सत्ता स्थापित हो गई। 

2026-09-10

करा कोटा साम्राज्य

illustration of karkota dynasty

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम कश्मीर के कार कोटा साम्राज्य के इतिहास तथा इसके शासकों द्वारा किए गए महत्वपूर्ण कार्यों पर चर्चा की गई है। इसके साथ ही भारत का अलेक्जेंडर कहे जाने वाले कश्मीरी राजा के द्वारा किए गए कार्यों पर प्रकाश डालेंगे तथा ये जानने की कोशिश करेंगे की अखीर क्यों उसे अलेक्डेंडर कहा गया। इसके साथ ही हम कारा कोटा साम्राज्य की शासन व्यवस्था प्रशासनिक व्यवस्था तथा व्यापारिक क्षेत्रों के बारे में चर्चा करेंगे।

परिचय

कार कोटा वंश के संस्थापना  दुर्लभ वर्धन ने 625 ई. में की थी। करा कोटा राजवंश का शासन कश्मीर में लगभग 625 ई.से 855 ई.तक रहा। अपने प्रारंभिक मध्य कालीन समय काल में यह राजवंश कश्मीर के सबसे प्रभावशाली राजवंशों में से एक था। इस राजवंश के प्रमुख शासकों में अगर देखा जाए तो दुर्लभ वर्धन तथा ललितादित्य ने अपने शासन काल में मध्य एशिया चीन उत्तरी भारत के साथ मजबूत राजनीतिक संबंध विकसित किए। 

करा कोटा राजवंश भारतीय उप महाद्वीप में कश्मीरी पहचान बौद्धिक परंपराओं वास्तुकला और क्षेत्रीय शक्ति के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इतिहास कारों के अनुसार करा कोटा राजवंश ने 7वीं से 9वीं शताब्दी के समय काल तक कश्मीर घाटी और इसके आसपास के उत्तरी क्षेत्रों पर शासन किया जो कि कश्मीरी राजनीतिक शक्ति और  सांस्कृतिक उपलब्धियों का स्वर्ण युग कहा जाता है।

पूर्व के राजवंशों के कमजोर पड़ने के बाद कार कोटा राजवंश ने अपने क्षेत्र विस्तार का कार्य प्रारम्भ किया धीरे-धीरे उत्तरी भारत और मध्य एशिया में अपना विस्तार किया। प्रशासकों ने प्रशासन व्यापार और कृषि को मजबूत किया जिससे इनके क्षेत्र में समृद्धि आनी प्रारम्भ हुई। राजवंश के प्रमुख शासकों में ललितादित्य मु्क्तापीड़ा मुख्य रुप से लिया जाता है क्योंकि इसी राजा ने एक विशाल साम्राज्य का  निर्माण करने में मुख्य भूमिका निभाई।
 

प्रमुख शासक

दुर्लभ वर्धन इनका शासन काल 625 से 665 ई. तक था इन्हें करा कोटा वंश के संस्थापक के रुप में जाना जाता है। अपने शासन काल में इन्होंने प्रशासन को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाई और साम्राज्य के विस्तार और समृद्धि में अहम भूमिका निभाई।

दुर्लभक
इन्हें दुर्लभ वर्धन द्वितीय के तथा प्रताप दित्य के नाम से जाना जाता है इनकी पत्नी का नाम रानी प्रकाश देवी था जिन्हें नरेंद्र प्रभा के नाम से भी जाना जाता है। अपने शासन काल में इन्होंने व्यापार कृषि और कलात्मक विकास पर जोर दिया। इनके तीन पुत्र हुए जिनके नाम चन्द्र पीड़ा तारा पीड़ा और ललिता दित्य था। अपने पिता के बाद चन्द्र पीड़ा जो की सबसे बड़े भाई थे गद्दी पर बैठे।

चन्द्र पीड़ा
इनका शासन काल 712 ई. से 720 तक ही रहा वे चीन के तांग राजवंश के साथ कूटनीति के लिए जाने जाते है। राज्य पर अरब आक्रमणों के दौरान चीन से सहायता मांगी और मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित किए।

तारा पीड़ा
यह चन्द्र पीड़ा का छोटा तथा मझला भाई था इस राजा के समय काल में राज्य में ग्रह युद्ध छिड़ गया जिसके कारण इनका शासन काल ज्यादा समय तक नहीं चल पाया। साहित्यिक अभिलेखों के अनुसार वह एक क्रूर शासक था इसने अपने शासन काल में कुछ ऐसी नीतियां को अपनाया जिसके चलते समाज के कुछ वर्ग आक्रोशित हो उठे और उनसे अलग हो उठे।

भारत का अलेक्जेंडर किसे कहा जाता है।

ललिता दित्य
इस शासक का शासन काल 724 से 760 ई. तक का था। इसे राज्य के महानतम शासकों में से एक माना जाता था जिसने महत्वकांक्षी सैन्य अभियानों के माध्यम से उत्तरी भारत अफगानिस्तान और मध्य एशिया में कश्मीर के प्रभाव का विस्तार किया। अपने साम्राज्य विस्तार के महत्वपूर्ण कार्यों के चलते ही इसे भारत का सिकंदर कहा जाता है।

कन्नौज पर अधिकार
ललिता दित्य ने कन्नौज के राजा यशो वर्मन को हराया और उत्तर भारत में अपना वर्चस्व स्थापित किया। इसके साथ ही इसने विदेशी आक्रमणकारियों को खदेड़ा राजा ने तिब्बत सेना को लद्दाख तथा सिंधु क्षेत्र से पीछे तक खदेड़ा तथा अरब आक्रमणकारी मुहम्मद बिन कासिम को भारत में प्रवेश करने से रोका। इस राजा का प्रभाव  पूर्व में बंगाल दक्षिण में कोंकण तथा उत्तर में मध्य एशिया यानी तुर्किस्तान तक देखने को मिलता है इसके साथ ही इनका प्रशासन उत्तर-पश्चिम में पंजाब तथा काबुल तक फैला हुआ था।

निर्माण कार्य 

मार्तंड सूर्य मंदिर का निर्माण
ललिता दित्य द्वारा निर्मित कराया गया यह मंदिर अनंत नाग में स्थित है जो कि कश्मीरी वास्तुकला की उत्कृष्ट कृति माना जाता है। इस मंदिर में ग्रीक रोमन और भारतीय वास्तुकला शैलियों का अनूठा संगम देखने को मिलता है।

पारी हास पुरी
ललिता दित्य ने श्री नगर के पास पारीहास पुरी को अपनी नई भव्य राजधानी बनाया। यहां पर राजा ने बौद्ध विहार और हिंदू मंदिरों का निर्माण करवाया।

ऐतिहासिक साक्ष्य
12वीं सदी के विद्वान कल्हण की प्रसिद्ध रचना राजतंरगिणी ललिता दित्य के जीवन तथा विजयों और कश्मीर के स्वर्ण काल का विस्तृत ऐतिहासिक वर्णन मिलता है। लगभग 36 वर्षों तक शासन करने के बाद उत्तर-पश्चिम पर्वतीय क्षेत्रों जो कि मध्य एशिया का हिस्सा था के एक सैन्य अभियान के दौरान इनका निधन हो गया।

कुवल यापिड़ा
राजा ललिता दित्य के बाद यह राजगद्दी पर बैठा मगर आंतरिक संघर्षों के कारण इस राजा ने अपना सिंहासन त्याग दिया और कथित तोर पर धार्मिक जीवन बिताया। इसके बाद वज्रादित्य ने गद्दी संभाली इस राजा का शासन काल 760 से 770 ई. तक रहा। इस राजा के शासन काल में राजनीतिक अस्थिरता तथा पड़ोसी देशों के आक्रमण देखने को मिले। कश्मीरी शासकों के ऐतिहासिक साक्ष्यों में यह विवादास्पद शासकों की सूची में आता है।

राजा वज्रादित्य के निधन के बाद गद्दी पर जय पीड़ा का शासन प्रारम्भ होता है जिसने आठवीं शताब्दी के आगे तक के समय काल तक शासन किया। इसने अपने सैन्य अभियानों के साथ ही साहित्य संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। राजा जय पीड़ा के दरबार में विभिन्न क्षेत्रों के विद्वान कवि और दार्शनिक आते थे। साम्राज्य के अंतिम चरण में ललित पीड़ा संग्राम पीड़ा द्वितीय और चिप्पत जयपीड़ा जैसे शासकों ने शासन किया। जिनका शासन काल कुछ खास नहीं था इन राजाओं के समय काल में राजनीतिक विखंडन होना प्रारम्भ हो गया था और प्रशासन कमजोर पड़ने लगा था।

धार्मिक विविधता

करा कोटा साम्राज्य के शासक मुख्य रुप से हिंदू धर्म को मानते थे जिनमें वे शैव तथा वैष्णव धर्म को मुख्य रुप से मानते थे इसके अलावा उन्होंने बौद्ध धर्म को भी संरक्षण प्रदान किया। परिणामस्वरूप उन्होंने हिंदू मंदिरों के साथ-साथ बौद्ध मठों स्तूप और विहारों का भी निर्माण करवाया। जो कि उनके विभिन्न धार्मिक परंपराओं क अस्तित्व को दर्शाता है। इसके साथ ही उन्होंने मध्य एशिया और पूर्वी एशिया में बौद्ध शिक्षाओं के प्रसार में भी मदद की जिसके चलते अंतर क्षेत्रीय बौद्धिक आदान-प्रदान सरल हुआ।

संस्कृत विद्वत्ता एवं सांस्कृतिक प्रथाएं
कश्मीर के इन शासकों के माध्यम से कश्मीर संस्कृत अध्ययन के एक महत्वपूर्ण केंद्र के रुप में उभरा इसके अलावा वे दर्शनशास्त्र व्याकरण काव्य शास्त्र और धर्म शास्त्र का अध्ययन किया करते थे। इसके साथ ही सांस्कृतिक प्रथाओं में नाटक प्रदर्शन नाटकीय कलाओं का कुलीन वर्गों में लोकप्रिय थीं। कश्मीर के साहित्यिक ग्रंथों में संगठित नाट्यशाला और सांस्कृतिक समारोह का उल्लेख मिलता है।

खास बात यह है कि इस काल में देवदासी प्रथा तथा सती प्रथा जैसी कुरीतियां भी इनके शासन में विद्यमान थी जो कि दर्शाती है कि मध्यकालीन भारत में प्रचलित प्रथाओं का प्रभाव उन पर भी था।

साम्राज्य के पतन होने के मुख्य कारण

आतंरिक संघर्ष
साम्राज्य में गद्दी को लेकर आंतरिक संघर्ष होने अधिक हो गए थे जिनका मुख्य कारण वंश अनुगत प्रथा थी। जिसके चलते काबिल शासकों को नजर अंदाज किया जाता था। वहीं गद्दी के लालच में भी अन्य राजा गण राजनीतिक षड्यंत्र रचने लग पड़ें थे जिसके कारण साम्राज्य के लोग एक दूसरे के ही खून के प्यासे हो गए। अंत उपरोक्त कारणों का लाभ उठाते हुए बाहरी सीमा के राज्यों ने साम्राज्य पर हमला किया और इन्हें हरा कर अपने साम्राज्य में मिला लिया।

आव्यावस्था
कुछ ऐसे शासकों का भी शासन आया जिन्होंने जनता के हितों को नजर अंदाज किया जिसके चलते साम्राज्य में राज द्रोह करने वाले लोगों की संख्या में विस्तार हुआ और जिन्होंने आंतरिक खबरों को पड़ोसी साम्राज्य य दुश्मन शासकों तक पहुंचाया जिसके कारण यह भी साम्राज्य के पतन का मुख्य कारण रहा। इन शासकों की सूची में वज्रादित्य तथा तारा पीदा का नाम मुख्य रुप से लिया जा सकता है।

शाही नियंत्रण में गिरावट
राजा के गलत फैसले लेने के कारण दरबार में दरबारी गुटों तथा प्रभावशाली मंत्रियों का राजनीतिक निर्णयों पर नियन्त्रण बढ़ता गया जिसके चलते राजा का प्रभाव प्रजा पर कम होता गया। अतः केंद्रीय सरकार द्वारा राजनीतिक नियंत्रण खो देने के कारण बाहरी क्षेत्रों ने स्वतंत्रता का दावा कर दिया।

राजनीतिक विखंडन
अपने बात के पहले रखने तथा राजा की गलत नीतियों के द्वारा जन्म राजनीतिक विखंडन के गुटों ने कठपुतली शासकों को गद्दी पर बिठाया जिसके चलते नेतृत्व में तेजी से बदलाव होने प्रारम्भ हुए और शासन में अस्थिरता ने जन्म लिया। जो कि साम्राज्य के पतन का मुख्य कारक के रुप में उभरा।

2026-08-24

राजेंद्र चोल

portrait photo of rajendra chola

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम राजेंद्र चोल द्वारा लड़े युद्धों तथा उनकी कुशल रणनीति के साथ उनके प्रारम्भिक जीवन के बारे में चर्चा करेंगे। इसके साथ ही हम उनके साम्राज्य के विस्तार पर भी चर्चा करेंगे। एक भारतीय राजा होने के नाते उनके द्वारा किए गए महत्वपूर्ण कार्यों पर भी इस लेख में विस्तार से बताया गया है।

जीवन परिचय

पहले हम राजेंद्र चोल प्रथम की बात करते है इनका शासन काल 1014 से 10144 के समय तक का था। इनके पिता का नाम राजराज था और माता का नाम जो की कोडंबलुर की राजकुमारी थिरिपुवना अथवा महादेवी नाम से भी प्रसिद्ध थीं। राजेंद्र प्रथम का राज्याभिषेक 1012 ई. में हुआ। हलांकि राजराज अभी मरे नहीं थे  लेकिन इससे पहले ही उन्होंने अपनी गद्दी का वारिस राजेंद्र को बना दिया। 

बाप बेटे ने मिलकर प्रशासन को चलाया। राजराज के अनुभव और राजेंद्र चोल के प्राक्रम से चोल साम्राज्य ने कई क्षेत्रों पर विजय हासिल की।राजगद्दी पर बैठते ही राजेंद्र प्रथम को मद्रास वर्तमान तमिलनाडु मैसुर वर्तमान कर्नाटक सिंहल एवं आंध्र प्रदेश पर शासन करने का अवसर मिला। राजेंद्र प्रथम ने अपने 33 वर्ष के कार्य काल में श्री लंका मालदीव तथा इंडोनेशिया पर भी अपना शासन स्थापित किया। राजेंद्र चोल ने अपने कार्य काल के सातवे वर्ष यानी 1018 ई. को अपने सबसे काबिल बेटे राजाधिराज को युवराज के पद पर नियुक्त किया।

अपने शासन के प्रारंभिक कार्यों में उन्होंने  इडितुरैनाडु यह कृष्णा तथा दक्षिण के तुंगभद्रा नदी के बीच के क्षेत्र था पर अपना आधिपत्य स्थापित किया। इसके बनवासे फिर कोल्लिप्पक्कै जोकी हैदराबाद के उत्तर पूर्व का एक क्षेत्र था एवं मण्णैक्डक्कम् पर विजय हासिल की। 

खास बात यह है कि इन क्षेत्रों पर चालुक्य नरेश सत्याश्रय का अधिकार था। 1017 ई. में राजेंद्र प्रथम ने ईलमंडलम जिसे हम वर्तमान समय में श्री लंका के नाम से जानते हैं पर विजय हासिल की।  इस समय श्री लंका पर महेन्द्र पंचम का अधिकार था। 1017 ई. के ठीक 12 साल पहले राजराज ने श्री लंका पर आक्रमण किया था मगर वे श्री लंका के कुछ क्षेत्रों पर ही अपना अधिपत्य स्थापित कर सके। लेकिन उनके बेटे ने पूरे श्री लंका पर अपना अधिपत्य स्थापित करके अपने पिता के सपने को पुरा किया।

1018 में केरल पर आक्रमण किया और वहां की सास्कृंतिक सम्पत्ति को लुटा। इसके बाद पांड्य राज पर हमला हुआ इस विजय के बाद राजेंद्र ने अपने बेटे सुंदरचोल राजाधिराज प्रथम को पांड्य प्रदेश का वायसराय बनाया जिसे हम महामंडलेश्वर के रुप में भी जानते है। इस प्रकार सुंदर चोल ने पांड्य प्रदेश पर 1018 से 1044 ई तक के समय काल तक शासन किया।

 वेंगी पर आक्रमण

1019 ई.को वेंगी पर आक्रमण किया यह युद्ध राजेंद्र चोल ने अपनी बहन के बेटे को राजगद्दी दिलाने के लिए लड़ा था। दरअसल इस क्षेत्र पर चालुक्यों का अधिपत्य था। विमलादित्य जो उस समय चालुक्य नरेश की गद्दी पर बैठा था अपनी चोल महारीनी कुंदवै देवी से उत्पन्न पुत्र राजराज नरेंद्र को राजगद्दी पर बिठाना चाहता था। वहीं चालुक्य शासक जयसिंह वेंगी के सिंहासन पर नरेंद्र के सौतेले भाई विष्णु वर्धन  को गद्दी पर बिठाना चाहता था। परिणामस्वरूप जयसिंह ने कलिंग के तथा ओड़्ड के शासकों के साथ मिलकर नरेंद्र को राजगद्दी पर बिठाने का विरोध किया। 

राजनीति षड्यंत्र से दुःखी होकर नरेंद्र ने अपने मामा राजेंद्र चोल से मदद मांगी इस प्रकार वेंगी पर राजेंद्र चोल द्वारा भारी आक्रमण किया गया। जिसमें विजयादित्य और जयसिंह की सेना को हरा कर 1022 ई में राजराज नरेंद्र को वेंगी की राजगद्दी पर बिठाया। इसी वर्ष यानी 1019 ई में  ही राजेंद्र चोल कलिंग को जीतते हुए आगे निकल गए। राजेंद्र प्रथम ने अपने शासन काल में अनेकों युद्ध लडे।

राजेंद्र चोल की युद्ध नीति

राजेंद्र चोल प्रथम Rajendra Chola  की युद्ध नीति मुख्य रूप से अत्यधिक सशक्त नौसेना Navy, दूरदर्शी कूटनीति और तीव्र गति से अचानक आक्रमण करने की कला पर आधारित थी। उन्होंने दक्षिण भारत की सीमाओं से आगे निकलकर दक्षिण-पूर्व एशिया और गंगा घाटी तक अपने सैन्य कौशल का लोहा मनवाया।राजेंद्र चोल के पास एक अजेय बेड़ा था। उन्होंने बंगाल की खाड़ी को पार कर सुमात्रा, जावा और मलय प्रायद्वीप पर विजय प्राप्त की।

अचानक और तीव्र आक्रमण

राजेंद्र चोल सबसे अचूक रणनीति यह थी कि अपने शत्रु राज्य को सोचने का य युद्ध रणनीति बनाने का मौका न देना। ताकि जब तक राजा को खबर लगे तब तक उसे पुरी तरह से घेर लिया जाए। इसका परिणाम यह होता था कि विरोधी राजा को भागने का मौका य सतर्क होने का मौका ही नहीं मिल पाता था। जिसके परिणामस्वरूप य तो उसे हार माननी पड़ती या फिर संधि करनी पड़ती।

मजबूत नौ सेना टुकड़ी का होना
श्री विजया साम्राज्य के खिलाफ उन्होंने सुंदर जलडमरूमध्य से होकर ऐसा अप्रत्याशित नौसैनिक हमला किया कि दुश्मन संभल ही नहीं पाए। राजेंद्र चोल के पास अपने विश्वास पात्र लोगों का एक पूरा जखीरा था जिसे वे युद्ध के दौरान दुश्मन मुल्क को घेरने का कार्य करते थे।

आर्थिक और व्यावसायिक प्रभुत्व
उनकी युद्ध नीति केवल राज्य विस्तार तक सीमित नहीं थी। बल्कि व्यापारिक मार्गों जिनमें समुद्री मार्गों महत्वपूर्ण थे को सुरक्षित रखने और एकाधिकार तोड़ने के लिए अहम भूमिका निभाते थे। अतः व्यापार में बाधा तथा जीवन यापन की आवश्यक वस्तुओं पर रोक लगाकर पर युद्ध में विजय हासिल करने का प्रयास किया जाता था।

स्थानीय सहायता और कूटनीति
वह सीधे शासन करने के बजाय क्षेत्रों को अपने अधीन कर व्यापारिक और राजनीतिक प्रभाव स्थापित करते थे। राजेंद्र चोल अपने अगल बगल की स्थानीय रियासतों को व्यापारिक मार्ग पर कब्जा होने के कारण उन्हें अन्य देशों से व्यापार करने की अनुमति कुछ शर्तों के आधार पर देते थे। 

जिस कारण उस क्षेत्र विशेष में उनका शासन न होने के कारण भी उनका प्रभाव बना रहता था। जिस कारण से उन रियासतों के आंतरिक मामलों और राजनीति गतिविधियों पर उनकी नजर हमेशा बनी रहती थी। य यूं कहे तो उन रियासतों में सेंध लगाना तथा उनके अंतरिक भेद निकालना आसान हो जाता था।

उपरोक्त सभी कारणों के बावजूद राजेंद्र चोल एक बहादुर एवं साहसी राजा थे जिन्होंने अपने दुश्मन को युद्ध में कभी पीठ नहीं दिखाई। अपने कठोर दृढ़ संकल्प के चलते उन्होंने इतना बड़ा साम्राज्य स्थापित किया। इसके साथ ही राजेंद्र चोल एक अच्छे विद्वान होने साथ अपनी प्रजा की भलाई के लिए समय-समय पर महत्वपूर्ण कार्य और समारोह का आयोजन भी कराते थे।

2026-08-23

रानी अब्बक्का

digital painting of a rani abbakka

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम रानी अब्बक्का के बारे में जानेंगे उन्हें प्रथम स्वतंत्रता सेनानी के रुप में भी जाना जाता है। वर्तमान समय में भी दक्षिणी भारत के क्षेत्रों में रानी अब्बक्का को लोकगीतों तथा कहानीयों के माध्यम से याद किया जाता है। इसके साथ ही इन क्षेत्रों में प्रसिद्ध तुलु नाडू नाटक भी उन पर ही बनाया गया है। इन्होंने सर्वप्रथम भारतीय आक्रमणकारी पुर्तगालीयों को कई बार युद्ध में हराया लेकिन अपने पति द्वारा धोखा दिये जाने के कारण बंदी बना ली गयी।

इस लेख के माध्यम से हम उनके प्रारम्भिक जीवन तथा उनके द्वारा किए गए महत्वपूर्ण कार्य एवं उनके  द्वारा लड़े गए महत्वपूर्ण युद्ध के बारे में चर्चा करेंगे। इसके साथ ही हम उनके प्रशासनिक व्यवस्था तथा राजनीतिक गतिविधियों के बारे में चर्चा करेंगे।

प्रारम्भिक जीवन

वे भारतीय तुलुवा वंश से थीं इस राज वंश का प्रशासन भारत के कर्नाटक राज्य तटीय क्षेत्र तुलु नाडु पर था। विजय नगर साम्राज्य के सामंत के रुप में चौटा तुलुवा वंश का राज घराना कार्य करता था। या ऐसा समझें की वे विजय नगर साम्राज्य के एक सहयोगी राजा के रुप में कार्य करते थे।इनकी राज धानी पु्ट्टिगे थी। उनके चाचा तिरुमला राय ने उन्हें चौटस समुदाय की प्राचीन वंश परम्परा अलियासंताना का पालन करते हुए उन्हें  उल्लाल नगर की राजगद्दी पर बिठाने का कार्य किया। रानी अब्बाक्का ने बचपन से ही युद्ध कला और राज कला में प्रशिक्षण प्राप्त किया था। उन्हें बचपन से ही घुड़सवारी निशानेबाजी और तलवार बाजी का शौक था।

बताते चलें कि उल्लाल चौटा के राजा थिरुमाला राय तृतीया की राजधानी थी जो कि रानी अब्बक्का के पिता थे। यहां खास बात यह है कि रानी अब्बक्का किसी भी प्रकार से हिन्दू  धर्म से सम्बन्धित नहीं थीं लेकिन इसके बावजूद उनकी प्रजा में सभी प्रकार  के धर्मों के लोग शामिल थे। 16 शताब्दी में उनके शासन काल के  दौरान शोध से पता चला है कि बेरी समुदाय के लोगों ने उनकी नौसेना में नाविक के रुप में कार्य किया था। इसके साथ ही जब रानी अब्बक्का ने जब मलाली बांध के निर्माण कार्य को जब स्वयं के निरीक्षण में करवाया तभी भी पत्थरों की पहचान और नक्काशी के लिए बेरी समुदाय के लोगों को ही चुना गया था।

उनकी सेना में सभी धर्म और जाति के लोग शामिल थे। इसके साथ ही उन्होंने कालीकट के ज़मोरिन शासक  से गठबंधन किया था। इसके अलावा बिदनूर के प्रभावशाली एवं शक्तिशाली राजा वेंकटप्पनायका का सहयोग भी उन्हें मिला। जिसके कारण उन्होंने पुर्तगाली सेना को कई बार धुल चटाई।

इनके चाचा तिरुमला राय ने इनकी शादी मैंगलोर की बंगा रियासत के राजा लक्ष्मप्पा अरसा बंग राजा द्वितीय से करायी थी। हलांकि यह विवाह ज्यादा समय तक टिक नहीं पाया जिसके कारण रानी वापिस उल्लाल चौटा वापिस आना पड़ा।दरअसल मैंगलोर के राजा ने पुर्तगालीयों के साथ गठबंधन कर लिया था और ये लोग मिलकर तुलुवा वंश कि रियासत के अंतर्गत आने वाली मंगलौर बंदरगाह पर अपना शासन स्थापित करना चाहते थे।

मंगलौर बंदरगाह

उल्लाल नगर की यह बंदरगाह एक समृद्ध बंदरगाह थी जिसके माध्यम से अरब तथा पश्चिम के कई देशों के साथ व्यापार किया जाता था इसके साथ ही भारत देश के मसालों को अन्य देशों तक पहुंचाया जाता था। एक व्यापारिक केन्द्र होने के कारण तथा व्यापार में अधिक लाभ कमाने की मंशा से पुर्तगाली डच एवं ब्रिटिशस आपस में हमेशा लड़ते रहते और राजनीतिक चालें चलते रहते थे। मगर स्थानीय शासक की मजबूती के कारण हमेशा असफल होते रहते थे। हलांकि इस क्षेत्र के लोग अलग- अलग धर्मों से थे मगर इन्होंने जाति धर्म से ऊपर उठ कर एक मजबूत संगठन बना रहा था। जिसके कारण इस क्षेत्र में प्रवेश करने पर भी अन्य प्रशासकों को अनुमति लेनी पड़ती थी।

पुर्तगालीयों  के साथ यू्द्ध


रानी अब्बक्का ने पुर्तगालीयों के हमलों को चार दशकों तक विफल किया मगर अंत में हार का सामना उन्हें करना पड़ा। यहां हम कुछ महत्वपूर्ण युद्धों के बारे में ही चर्चा करेंगे जो की महत्वपूर्ण है।

1525 का युद्ध
इस समय काल में रानी हाल ही में गद्दी पर बैठीं थी पुर्तगालीयों को लगा एक रानी को हराना बहोत ही आसान होगा। इसलिए उन्होंने गोवा क्षेत्र पर विजय प्राप्त करने के बाद उल्लाल चौटा पर आक्रमण किया और उन्हें बुरी हार का सामना करना पड़ा।

1555 का युद्ध
इस युद्ध का नेतृत्व पुर्तगालीयों की तरफ से एडमिरल डोम अव्वारो दा सिल्वेरा ने किया। इस युद्ध की शुरुआत पुर्तगालीयों द्वारा कर देने के लिए मजबूर करने के कारण हुई जिसके विपरीत रानी से सिधा कर देने से इनकार कर दिया। इस बार भी पुर्तगालीयों को हार का सामना करना पड़ा।

1557 का युद्ध
इस पुर्तगालियों ने मंगलौर को लुटा और उसे बरबाद कर दिया लेकिन इस बार भी अंत में जीत रानी अब्बक्का की ही हुई। हलांकि लूटपाट एवं इमारतों के नष्ट होने के कारण रानी अब्बक्का को भी भारी नुकसान का सामना करना पड़ा।

1568 का यु्द्ध
इस बार के युद्ध का नेतृत्व पुर्तगाली वायसराय एंटोनियो नोरोन्हा के द्वारा भेजे गये सेनापति जोआओ पेइक्सोटो द्वारा किया गया। ये अपने साथ एक बड़ी सेना के साथ आया था। अब कि बार पुर्तगाली उल्लाल नगर पर कब्जा करने में सफल रहे। रानी अब्बक्का बच निकली और एक मस्जिद में शरण ली। उसी रात में रात के दूसरे पहर में रानी ने 200 सैनिकों के साथ पुर्तगालियों पर हमला कर दिया और उन्हें बंदी बनी लिया गया। सेनापति जोआओ पेइक्सोटो को मार दिया गया। इस प्रकार एक बार फिर से पुर्तगाली सेना की हार हुई और उन्हें मंगलौर के किले को खाली करना पड़ा।

1570 का युद्ध
इस युद्ध के दौरान पुर्तगालीयों को रानी अब्बक्का के पति का समर्थन मिल गया था। इधर रानी को अहमदनगर के सुल्तान और कालीकट के ज़मेरिन का सहयोग मिला। ज़ंमोरिन के सेनापति कुट्टी मार्कर ने रानी अब्बक्का की ओर से लड़ाई लड़ी और मंगलौर पर अपनी आधिपत्य स्थापित किए पुर्तगालीयों को मार गिराया लेकिन वापिस आते वक्त धोखे से उसकी हत्या कर दी गई। इन हारों के चलते तथा अपने पति के धोखे के कारण युद्ध हार गईं। उन्हें गिरफ्तार करके कारागार में डाल दिया गया। जेल में भी उन्होंने कई बार विद्रोह किया। मगर अंत में वे वीरगति को प्राप्त हुईं।  

2026-05-23

शैलेंद्र राजवंश

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प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम शैलेंद्र राजवंश के इतिहास पर प्रकाश डालेंगे। बताते चलें कि इस राजवंश को कुछ विद्वान भारतीय राजवंश नहीं मानते वहीं कुछ विद्वान हिंदू धर्म से सम्बन्धित होने के कारण भारतीय ही मानते है। शैलेंद्र राजवंश के लोग कट्टर बौध धर्म के अनुयायी थे।

इस लेख में हम इस वंश के भारतीय सम्बन्ध तथा इनके साम्राज्य जो कि इंडोनेशिया मलेशिया एवं जावा जैसे देशों फैला हुआ था के बारे चर्चा करेंगे। इतिहास के पन्ने को पलटा जाए तो हमें पता चलता है कि यह राजवंश अपने समय काल में बहुत प्रभावशाली एवं शक्ति शाली हिंदू बौद्ध राजवंश था।

नाम की उत्पत्ति

शैलेंद्र शब्द का अर्थ है पर्वतों का राज हिन्दी में विच्छेदन करें तो हमें पता चलता है कि शैल यानी पर्वत इंद्र देवताओं का राजा इंद्र। आमतौर पर देखा जाए तो इस शब्द का प्रयोग भगवान शिव प्रयोग किया जाता है।

इस वंश की उत्पत्ति की बात करें तो इतिहासकारों में इस बात पर मतभेद है कुछ इतिहासकार इन्हें दक्षिण भारत के राजवंश एवं शैल वंश से सम्बन्धित मानते है वही कुछ इतिहासकार इन्हें इंडोनेशिया के मूल निवासी मानते है जिन्होंने भारतीय संस्कृति एवं धर्म को अपनाया था। इनका समय काल 8वीं शताब्दी से 11वीं शताब्दी के बीच का माना जाता है।

धर्म और भाषा

शैलेंद्र वंश के लोग बौद्ध धर्म के कट्टर अनुयायी थे इन्होंने दक्षिण पूर्व एशिया में बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार में अहम भूमिका निभाई। हलांकि इन्होंने कभी हिन्दू धर्म का विरोध नहीं किया। इनके राज्य में शिव के भी उपासक तथा अन्य हिंदू देवताओं के उपासक थे जिसके चलते इन्होंने सप्रंग मन्दिर का निर्माण करवाया था। इन्होंने अपने ग्रंथ संस्कृत भाषा भारतीय पल्लव ग्रंथ लिपि को भी अपनाया। इस वंश के लोग कला प्रेमी भी थे।

बोरोबुदुर स्तूप

इंडोनेशिया के जावा में स्थित यह स्तूप शैलेंद्र राजाओं के संरक्षण में लगभग 780 से 825 ईस्वी के बीच बनाया गया था। जो कि बारीक नक्काशी के साथ-साथ मूर्तिकला एवं वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है। इस स्तूप को यूनेस्को की विश्व धरोहर की सूची में संरक्षित किया गया है। यह दुनिया का सबसे बड़ा बौद्ध स्तूप है जिसमें नौ प्लेट फार्म तथा बुद्ध की 504 मूर्तियां स्थापित की गईं हैं। इस मंदिर कि दीवारों पर बौद्ध दर्शन को तथा उनके जीवन के महत्वपूर्ण पल को दर्शाया गया है।

चांडी सेवूा candi sewu
यह इंडोवेशिया का दूसरा सबसे बड़ा बौद्ध मंदिर है जो प्रमबानान मंदिर के पास स्थित है।

चांडी कलसन candi kalasan
यह भी जावा का सबसे पुराना मंदिर है जिसे शैलेंद्र राजा ने अपने गुरु और देवी तारा के सम्मान में बनवाया था।

भारत के साथ सम्बन्ध

चोल एवं पाल राजवंश के राजाओं के साथ इस राजवंश के सांस्कृतिक व्यापारिक एवं कूटनीतिक सम्बन्ध थे। बताते चलें कि पाल राजाओं के साथ मिलकर शैलेंद्र वंश के राजा बाल पुत्र देव ने मिलकर मगध यानी बिहार के नालंदा विश्वविद्यालय में बौद्ध भिक्षुओं के रहने के लिए एक मठ मनवाया था। इस योजना को पूर्ण करने के लिए उन्होंने पाल राजा देव पाल से पांच गांवों को दान करने का अनुरोध किया था। इसका उल्लेख नालंदा ताम्र पत्र अभिलेख में मिलता है।

शुरुआती समय में शैलेंद्र राजाओं के भारतीय राजा राजा रज चोल तथा राजेंद्र चोल के साथ अच्छे संबंध थे। मगर राजनीतिक कारणों इनमें विरोध हो गया। विरोध से पहले शैलेंद्र राजा श्री मारविजयोत्तुंगवर्मन ने तमिलनाडु के नागपट्टिनम में चूड़ामणि विहार नामक बौद्ध मठ का निर्माण करवाया था। लेकिन इन राजाओं का समय काल बीतने का बाद चोल राजा राजेंद्र चोल ने शैलेंद्र साम्राज्य के राजा श्रीविजय पर व्यापारिक वर्चस्व चलते नौसैनिक हमला किया था।

नौवीं शताब्दी के समय काल में शैलेंद्र राजवंश का प्रशासन इंडोनेशिया में विस्तृत कम होने लगा जिसके बाद शैलेंद्र राजवंश ने सुमात्रा द्वीप वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित  किए। जिसके चलते सुमात्रा द्वीव के श्री विजय साम्राज्य के भी शासक बन गए और  दोनों साम्राज्य की शक्ति एक हो गई। उपरोक्त कारणों के चलते मलक्का जलडमरुमध्य यानी strait of Malacca के व्यापारिक  मार्ग को अपने नियंत्रण में कर लिया।

वंश के समाप्त होने का कारण

11वीं आते-आते चोल साम्राज्य के लगातार नौसैनिक हमलों तथा जावा के मताराम साम्राज्य के साथ आंतरिक संघर्षों के कारण शैलेंद्र वंश और श्री विजय वंश समाप्त हो गया।
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2026-05-19

राजा भोज

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प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम भारत सबसे ज्यादा विद्वान राजाओं कि श्रेणी में आने वाले राजा भोज के बारे में चर्चा करेंगे। इसके साथ ही हम उनके द्वारा किए गये महत्वपूर्ण कार्यों तथा उनके द्वारा लड़े गये युद्ध तथा उनके प्रारम्भिक जीवन पर भी प्रकाश डालेंगे। तथा उनके द्वारा निर्माण किए महत्वपूर्ण स्थलों के बारे में विचार करेंगे।

जीवन परिचय

राजा भोज पवर वंश के राजा थे जिसे हम परमार वंश के नाम से भी जानते है राजा भोज के पिता का नाम सिंधु राज था। बचपन में ही इनके माता पिता का देहांत हो गया था जिसके कारण इनका पालन पोषण इनके चाचा भूंजराज ने किया था। बचपन से ही वे एक मेधावी छात्र थे जिसके कारण उन्होंने शस्त्र और शास्त्र में माहारथ हासिल कर रखी थी। अपने पिता सिंधुराज तथा चाचा भुजराज की मृत्यु के बाद राजा भोज गद्दी पर बैठे। इन्होंने 1005 ईस्वी से लेकर 1055 ईस्वी तक शासन किया। राजा भोज ने अपनी साम्राज्य की सुरक्षा के लिए कई युद्ध लड़े जिनमें से कुछ प्रमुख यु्द्धों के बारे में हम नीचे चर्चा करने जा रहे है।
चावुक्यों का आक्रमण
राजा भोज ने कल्याणी चालुक्य के राजा जय सिंह द्वितीय को पराजित किया तथा अपने चाचा भुंज राज का बदला दिया।

चंदेल और कलचूरी वंश का आक्रमण

राजा भोज ने अपनी शक्ति का लोहा मनवाते हुए चंदेल के और कलचुरी वंश के राजाओं को पराजित किया।
विदेशी आक्रमण
राजा भोज में विदेशी आक्रमण कारीयों को पराजित करने के लिए भारतीय राजाओं के एक  संघ की स्थापना की थी। इस संघ ने विदेशी आक्रमण कारियों को रोकने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। खासकर पश्चिमोत्तर सीमा से आने वाले महमूद गजनवी के तुर्क आक्रमण कारियों के खिलाफ। अतः राजा भोज का साम्राज्य पूर्व में विदीशा से लेकर पश्चिम में साबर मती नदी तक एवं उत्तर में चितौड़ से लेकर दक्षिण में कोंकण तक फैला हुआ था।

राजा भोज द्वारा रचित ग्रंथ

राजा भोज स्वयं एक प्रखर विद्वान और लेखक थे उन्होंने विभिन्न विषयों पर 84 से अधिक ग्रंथों कि रचना की थी उनके कुछ प्रसिद्ध ग्रंथों का उल्लेख नीचे किया गया है।
1.समरांगण सूत्र धारा
यह ग्रंथ वास्तुकला एवं नगर नियोजन तथा यंत्रों पर लिखा गया था।
2.सरस्वती कंठा भरण
यह व्याकरण और काव्य शास्त्र पर आधारित उनकी सुप्रसिद्ध रचना है।
3.श्रृंगार प्रकाश
यह साहित्य और रस सिद्धांत पर लिखा गया ग्रंथ है।
4.आयुर्वेद सर्वस्व
चिकित्सा और आयुर्वेद पर आधारित इस ग्रंथ की रचना राजा भोज द्वारा कि गई।
5.भोजशाला
धार में राजा भोज ने भोज शाला का निर्माण करवाया जिसे उस समय काल का संस्कृत विश्वविद्यालय कहा जाता था।

निर्माण कार्य

1.भोपाल शहर
इस शहर का निर्माण राजा भोज ने ही करवाया था जिसका प्राचीन नाम भोज पाल था।
2.भोज पुर मंदिर
भोपाल के पास स्थित इस मंदिर में विश्व का सबसे बड़ा शिवलिंग विराजमान है। जिसे एक ही पत्थर को काटकर बनाया गया है। हालांकि यह मंदिर अधुरा ही रह गया लेकिन आज भी इस मंदिर को उत्तर भारत का सोमनाथ मंदिर की उपाधि दी जाती है।
3.भोज ताल
उन्होंने सिंचाई और जल प्रबंधन के लिए भोपाल में एक विशाल कृत्रिम झील का निर्माण करवाया था। जो की इस क्षेत्र में वर्तमान समय में भी विद्यमान है।

राजा भोज की मृत्यु

उनके मृत्यु काल के समय को विद्या और कला के एक युग का अंत माना जाता है। बताया जाता है कि गुजरात के चालुक्य राजा  भीम प्रथम और त्रिपूरी के कलचूरी राजा लक्ष्मी कर्ण ने मिलकर मालवा पर आक्रमण किया। इस युद्ध के दौरान ही राजा भोज गम्भीर रुप से बीमार हो गए। अतः बीमारी ओर युद्ध के तनाव के बीच ही 1055 ईस्वी को राजा भोज की मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु के बाद दोनों विरोधी राजाओं धार को जम कर लुटा। राजा भोज की जिक्र हमें सिंहासन बत्तीसी और बैताल पच्चीसी जैसी प्रसिद्ध कहानियों में मिलता है। दोस्तों बताते चले कि धार वही जगह है जहां हाल ही में वासुकी नाग के अवशेष मिले थे। जिसे विश्व का सबसे विशाल नाग के रुप में मान्यता दी गयी है।

2026-05-12

कुतुबमीनार

 
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प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम कुतुबमीनार के इतिहास के बारे में चर्चा करेंगे यह विषय इस लिए भी महत्वपूर्ण क्योंकि आज तक हम यही जानते थे कि कुतुबमीनार का निर्माण कुतुबूद्दीन ऐबक ने कराया था मगर यह पूर्ण सच नहीं है क्योंकि इस मुस्लिम शासक ने सिर्फ इसकी मरम्मत करवाई थी। आज के इस लेख में हम कुतुबमीनार के इतिहास , विक्रमादित्य से इसके सम्बन्ध तथा इसके वास्तविक नाम के बारे में चर्चा करेंगे इसके साथ हम इसको बनाने के पीछे छुपे उद्देश्य को समझने की कोशिश करेंगे।

फिरोजशाह तुगलक

अपने प्रारम्भिक समय में कुतुबमीनार एक  चार मंज़िला इमारत थी जिसकी चौथी मंज़िल पर मंदिर का निर्माण कराया गया था अतः एक कट्टर मुस्लिम होने के नाते फिरोजशाह तुगलक ने इसकी चौथी मंज़िल को तुड़वा कर पुनः इसका निर्माण करवाया इनके साथ ही इसने पांचवीं मंज़िल का भी निर्माण करवा दिया। बताते चले कि फिरोजशाह तुगलक ने दिल्ली पर 1325 से लेकर 1351 तक शासन किया। इनके शासन काल के पहले दिल्ली पर इनरे चचेरे भाई मुहम्मद बिन तुगलक का शासन था। यह दिल्ली सल्तनत के तीसरे वंश से सम्बन्धित था। बताते चले कि दिल्ली सल्तनत पर पांच वंशों ने शासन किया जिनके नाम और समय कुछ इस प्रकार है। गुलाम वंश शासन काल 1206 से 1320 ई. तक 2 खिलजी वंश शासन काल 1290 से 1320 ई. तक 3 तुगलक वंश शासन काल 1320 से 1414 तक 4 सैयद वंश शासन काल 1414 से 1451 तक 5लोदी वंश शासन काल 1451 से 1526 तक। बताते चले दिल्ली पर सबसे लंबा शासन काल तुगलक वंश का ही रहा।
 

चन्द्रगुप्त द्वितीय

इनका शासन काल 380 ई से 415 ई तक का माना जाता है । इनके राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र थी मगर उज्जैन भी इनका मुख्य केन्द्र था। कुतुबमीनार की बात करें तो इसे चन्द्रगुप्त द्वतीय ने अपने दरबार के नौ रत्नों में से एक एवं महान खगोल शास्त्री वराह मीहिर के लिए बनवाया था। यह एक सुर्य वेधशाला थी। मगर चौथी मंज़िल पर विष्णु मंदिर होने के कारण कुछ विद्दवान इसे विष्णु स्तंभ भी कहते थे। 

प्रारम्भ में इस मिनार का प्रयोग खगोल विज्ञान के अध्ययन के लिए किया जाता था। इस बात का उल्लेख हमें हरिहार निवास द्विवेदी द्वारा रचित दो प्रसिद्ध पुस्तकों में मिलता है जिनका नाम दिल्ली के तोमर तथा ग्वालियर के तोमर है। बताते चले कि भारत में प्रचलित विक्रम संवत का निर्माण में भी इन्हीं के शासन काल में हुआ था।

तरीखे फिरोज़ शाही

इस किताब के लेखक का नाम सिराज अफिन है जो कि फिरोज़शाह तुगलक के राज दरबार का एक विद्वान था इसने अपनी किताब में लिखा की कुतुबमिनार की चौथी मंज़िल पर बिजली गिर जाने के कारण यह नष्ट हो गयी थी।
इबनेबतुता
यह एक विदेशी यात्री था जो कि मोहम्मद बीन तुगलक के शासन काल में भारत आया था। इसने अपनी किताब उलरहला में लिखा की कुतुबमीनार की चौथी मंज़िल पर सोने की घण्टीयां लगी हुई थी। जिसे ज़ाहिर है मुस्लिम शासन काल के दौरान इन्हें हटाया गया होगा।

कीर्ति स्तम्भ

यह स्तम्भ चितौड़ के दुर्ग के अन्दर राणा कुम्भा द्वारा निर्मित करवाया गया था। अगर आप वर्तमान समय में कुतुवमीनार के वास्तविक एवं प्राचीन रुप रेखा को देखना चाहते है तो यह स्तम्भ उसकी छाया प्रति है साथ में चौथी मंदिर पर विष्णु मंदिर का निर्माण हूबहू कुतुबमीनार के समान ही कराया गया था। 
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