Indian History reveal the Past

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2026-09-30

मुज़िरिस बंदरगाह

illustration of port muziris

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम दक्षिण भारत में स्थित मुज़िरिस बंदरगाह के बारे में जानेंगे इसके साथ ही इसके आर्थिक महत्व को समझेंगे। तामिलनाडु में पेरियार नदी पर स्थित यह प्राचीन बंदरगाह शहर का केंद्र है। जिसे प्राचीन समय में मुज़िरिस बंदरगाह के नाम से जाना जाता था। जिसका उल्लेख हमें तमिल भाषा के प्राचीन ग्रंथों में भी मिलता है। इसके साथ ही इस बंदरगाह का उल्लेख हमें ग्रिक और  रोमन के प्राचीन और शास्त्रीय ग्रंथों में भी मिलता है।

परिचय

पुरातत्व विज्ञान के साक्ष्यों के आधार पर इस बंदरगाह की सटीक लोकेशन य स्थान केरल राज्य में कोंडुंगल्लूर यानी त्रिशुर के आसपास के क्षेत्र में स्थित थी। 2007 में केरल के उत्तरी परवूर के पास पट्टनम में इस रिसर्च का आजमा दिया गया था जिसने खोज कर्ताओं को इस स्थान को बंदरगाह के प्राचीन स्थल के रुप में मान्यता प्रदान करने के लिए समर्थन दिया है।

प्राचीन तमिल ग्रंथ जैसे कि संगम साहित्य तथा तमिल कविताओं में इस बंदरगाह का जिक्र मिलता है। इस बंदरगाह को मुख्य रुप से हिंद महासागर के मसाला व्यापार के रुप महत्व दिया जाता था इतिहासकारों अनुसार दक्षिण भारत की यह मुज्रिरस बंदरगाह कई शताब्दियों तक एक महत्वपूर्ण बंदरगाह के रुप में उपयोग होती रही है। 1341 में पेरियार नदी की विनाशकारी बाढ़ के कारण यह बंदरगाह समुद्र में समा गयी थी। खास बात यह है कि  2007 की रिसर्च से पहले इस बंदरगाह के सटीक स्थान को लेकर विवाद होता रहा है। 

नामकरण

मुज़िरिस नाम की उत्पत्ति स्थानीय  नाम मुच्चिरि से  मानी जाती है  जो कि पुराने तमिल शब्द फटे होंठ से लिया गया है दरअसल पेरियार नदी भी इस  स्थान पर कटे होंठों की तरह दो भागों में विभाजित  हो जाती है। मुज़िरिस को अक्सर संगम कविताओं में जैसे अकननुरु रचयिता एरुक्कत्तुर तयनकन्नानार कविता संग्रह के गीत संख्या 149 में तथा कवि पुराणनुरु द्वारा रचित कविता संग्रह के गीत 343 इसके साथ ही कवि पथित्रुपथु आदि ने मुच्चिरि के रुप में संदर्भित  किया है।

 इस के साथ ही इस बंदरगाह का उल्लेख भारत के सुप्रसिद्ध महाकाव्य रामायण में मुरासिपप्पट्टणन के नाम से इसका जिक्र मिलता है।इस बंदरगाह का उल्लेख यहूदी ताम्रपत्र में चेरा शासक के  11वीं शताब्दी के शासन काल को दौरान मिलता है।

जगह का प्रमाण

पहले इस बंदरगाह की पहचान कर्नाटक राज्य के दक्षिण-पश्चिम में मंगलौर के आसपास के क्षेत्र के रुप में की जाती थी। बाद में यह परिकल्पना दी  गयी कि यह बंदरगाह वर्तमान में कोडुंगल्लूर के आसपास स्थित थी जो  कि केरल राज्य के त्रिशूर जिले का एक शहर और तालुक है। खास बात यह है कि  यह क्षेत्र दक्षिण भारतीय इतिहास के द्वितीय चोल काल के चेरा शासकों के केंद्र के रुप  में प्रमुखता दिखाता है।

मगर 2007-08 को समय काल को दौरान हुई कोडुंगल्लूर और उत्तरी परवर के बीच पट्टनम गाँव में खुदाई की गई तब यह पता लगाया गया कि मुजिरिस का खोयी हुई बंदरगाह मिल गयी है जिससे नई परिकल्पना की शुरुआत हुई जिसने पट्टनम को मुज़िरिस के रुप में पहचाने जाने से इतिहासकारों के बीच विवाद पैदा कर दिया।

व्यापार

मुज़िरिस बंदरगाह भारत और फारस मध्य पूर्व उत्तरी अफ्रीका और ग्रीक-रोमन भू-मध्यसागरीय क्षेत्रों क बीच व्यापारिक संबंधों का एक महत्वपूर्ण केंद्र था। इतिहासकार प्लिनी द एल्डर में अपने नेचुरल हिस्ट्री रिसर्च बुक में मुज़िरिस को भारत का पहला व्यापारिक केंद्र बताया है। हालांकि 5वीं से भारत और रोम व्यापार में गिरावट आयी फिर भी मुज़िरिय न अन्य क्षेत्रों जैसे कि फारस और अरबों का ध्यान आकर्षित किया।

इस बंदरगाह से निर्यात की जाने वासी वस्तुओं में मुख्य रुप से मसाले जैसे कि काली मिर्च मालाबैथ्रोन आदि थे इसके बाद कुछ कीमती पत्थर जैसे बैरिल मोती हीरे और नीलम थे। इनके अलावा हाथी दांत चीनी रेशम कछुओं की खोल तथा गंगा में पायी जानी वाली स्पाइकानार्ड का भी व्यापार किया जाता था।

वहीं रोमन नाविक सोने के सिक्के पोरिडाट पतले कपड़े डिज़ाइनर लिनेन और बहुरंगी वस्त्र के साथ-साथ तांबा सीसा टिन मूंगा सल्फाइड तथा कच्चा कांच शराब और रियलगर और आर्पिमेंट लाते थे।

प्रारम्भिक साक्ष्य

रेशम मार्ग प्राचीन व्यापार मार्गों का एक समूह था जो पूर्व और पश्चिम को जोड़ता था तथा रोम की दो महान सभ्यताओं को बीच वस्तुओं और विचारों का आदान-प्रदान करने का माध्य था। मानचित्रों पर स्थलीय मार्ग लाल और समुद्री मार्ग नीले रंग में दर्शाया जाता गए है। 

संगम साहित्य

मुज़िरिस का उल्लेख तमिल के शास्त्रीय संगम साहित्य में मिलता है जो मुख्य रुप से 100 से 250 ईसा पूर्व के समय काल के वर्णन को दर्शाता है। एक शास्त्रीय तमिल कृति पुराणपनुरु में मुजिरिस को एक हलचल भरे बंदरगाह के रुप में वर्णित किया गया है जहां आंतरिक वस्तुओं का आयतित सोने के बदले आदान-प्रदान किया जाता था। ऐसा प्रतीत होता है कि कविता इस रचना के आधार पर प्रमुख रोमन व्यापारियों के साथ अपने संपर्कों को सीधे वाणिज्यिक सौदों का बजाय उपहार विनिमय के रुप में मान्यता देते थे।

एरिथ्रियन सागर का पेरिप्लस

पहली शताब्दी के ग्रीक यात्रा वृत्तांत पेरिप्लस आफ द एरिथ्रियन सी के अज्ञात लेखक जिसका अर्थ है लाला सागर की यात्रा चेरा साम्राज्य का विस्तृत वर्णन देता है जिसमें इस बंदरगाह के महत्व का वर्णन किया गया है। इसके बाद नौरा और टिंडिस का जिक्र मिलता है जो कि लिमरिके के पहले बाज़ार थे और मुज़िरिस और नेल्किंडा जो अब सबसे महत्वपूर्ण थे। टिंडिस सेरोबोथ्रा राज्य का वह हिस्सा है जो समुद्र के किनारे पर स्थित एक गांव है।

इसी क्षेत्र में मुज़िरिस में अरब और यूनानियों द्वारा माल से भरे जहाज़ बड़ी संख्या में आया करते थे। यह एक नदी पर स्थित है जो कि समुद्र से 92.5 किलोमीटर दूर था इसी को यूनान की दूरी मापने की इकाई के अनुसार 500 स्टेडिया कहा जाता है जिसमें एक स्टेडिया 185 मीटर का होता है। यहां से काली मिर्च का निर्यात होता है जिसका उत्पादन उन बाज़ारों के पास के एक क्षेत्र में होता था जिसे काट नारा कहा जाता है।

पेरिप्लस के अनुसार

यह प्राचीन यूनानी यात्रा समुद्री यात्रा विवरण के अनुसार पता चलता है कि मुज़िरिस की बड़ी बस्ती विदेशी व्यापार के माध्यम स चेरा रियासत के लिए एक समृद्ध मुख्य व्यापारिक बंदरगाह का काम करती थी। पास की पहाड़ियों से काली मिर्च स्थानीय उत्पादकों द्वारा मु़्ज़िरिस लाई जाती थी और रोमन व्यापारियों के आगमन की प्रतीक्षा में गोदामों में ढेर लगा कर रखी जाती थी।

क्योंकि मुज़िरिस में उथले पानी के कारण गहरे पतवार वाले जहाज बंदरगाह तक नदी के ऊपर की ओर नहीं जा सकते थे इसलिए रोमन मालवाहक जहाजों को लैगून के किनारे पर शरण लेनी पड़ती थी वही जबकि उनका माल छोटे जहाजों पर नदी के ऊपर की ओर स्थांतरित किया जाता था।

इस यात्रा लेख में यह भी दर्ज है कि मुज़िरिस जैसे स्थानों पर अनाज की विशेष खेप  भेजी गई थी रिसर्च कर्ताओं मानना है कि ये डिलीवरी स्थानीय रोमन निवासियों के लिए थी जिन्हें चावल के स्थानीय आहार के पूरक के रुप में कुछ चाहिए था।

सिलप्पतिकारम का अनुसार

दूसरी शताब्दी ईस्वी में कोडुंगल्लूर के जैन कवि राजकुमार इंलगो अडिगल द्वारा रचित तमिल  महाकाव्य सिलप्पतिकारम जिसका हिंदी में नाम पायल की कहानी है के अनुसार मु़ज़िरिस को एक ऐसे स्थान के रुप में दर्शाया गया है जहां यूनानी व्यापारी जहाज आकर सोने के बदले काली मिर्च खरीदते थे। इसमें यह भी उल्लेख किया गया है कि वस्तु विनिमय व्यापार के समय लगने के कारण व्यापारी एक अनोखी जीवन शैली जीते थे जो स्थानीय आश्चर्य की स्रोत थी।

इसके साथ ही सिलप्पतिकारम यूनानी व्यापारियों के देश वापसी  का वर्णन करते हुए लिखा मिलता है कि दक्षिण के विशाल किरणों वाला सूर्य उदय होता है और शीत ऋतु के आगमन में सफेद बादल बनने लगते है तब गहरे उफनते सागर को पार करने का समय आ जाता है। टिंडिस के शासक चील की लकड़ी रेशम चंदन मसाले और तरह-तरह के कपूर से लदे जहाज़ भेजते है।

बंदरगाह के गायब होने का कारण

इस बंदरगाह के गायब होने का मुख्य कारण 1341 में पेरियार नदी में आई बाढ़ थी जिसके कारण से यह बंदरगाह  सभी प्राचीन काल के ज्ञात मानचित्रों से गायब हो गई। इतिहासकार राजन गुरुक्कल तथा डिक व्हिटैकर द्वारा प्रकाशित एक लेख के माध्यम से बताया की इस बाढ़ की घटना ने कोच्चि के वर्तमान बंदरगाह और वेम्बनाड बैकवाटर प्रणाली को समुद्र से जोड़ दिया तथा इस क्षेत्र में एक नई भूमि का निर्माण किया जो अब कोच्चि के पास स्थित वाइपिन द्वीप के रुप में जाना जाता है। वैसे इनके द्वारा प्रकाशित इस लेख का नाम नीशीर्षक मुज़िरिस की खोज था।

इन दोनों खोजकर्ताओं अध्ययन से पता चल पाया कि इस क्षेत्र के भू-भौतिकी सर्वेक्षण से हमें पता चला कि 200 से 300 वर्ष पूर्व तटरेखा वर्तमान तट स लगभग 3 किलोमीटर पूर्व में स्थित थी इसी क्रम में 2000 साल पहले यही तटरेखा और भी पूर्व में लगभग 6.5 किलोमीटर आगे रही होगी।

उन्होंने अनुमान लगाया कि यदि रोमन काल में मुज़िरिस यहां कहीं स्थित होता तो उस समय तटरेखा अपनी वर्तमान रेखा से लगभग 4 से 5 किलोमीटर पूर्व में फैली होत। नदी मुहाने पर नियमित रुप से गाद  जमा होने के कारण अंततः इस स्थान को बंदरगाह के रुप में इस्तेमाल करना बंद करना पड़ा होगा।

पुरातत्व खुदाई के साक्ष्य

1945 में कोडुंगल्लूर के क्षेत्र में की गई खुदाई में 13वीं शताब्दी से पहले की कोई वस्तु नहीं मिल पाई। वहीं इसी क्षेत्र से 2 किलोमीटर दूर 1969 में की गई खुदाई में 13वी शताब्दी के साथ-साथ 16वीं शताब्दी की भी प्राचीन वस्तुओं की प्राप्ति हुई थी। इसी क्रम 1983 में इस क्षेत्र से लगभग 10 किलोमीटर दूर के क्षेत्र में खुदाई के दौरान रोमन सिक्कों का एक बड़ा भण्डार मिला जो  कि इस बात का संकेत देता है कि मुज़िरिस से पालघाट दर्रे और कावेरी घाटी के रास्ते भारत से पूर्वी तट तक विदेशी व्यापार क्षेत्र था।

इसके बाद 2007 में के सी एच आर ने पुरातात्विक खोजों के आधार पर पट्टनम में मुज़िरिस की संभावित खोजो में बड़ी संख्या में कलाकृतियां मिली हैं। खास बात यह है कि अब तक पट्टनम में उत्खनन के सात सत्र 2007 से 2014 तक पूरे हो चुके हैं। इन्हीं खोज के आधार पर जब के सी एच आर ने पुरातात्विक खोजों के आधार पट्टनम में ही मुज़िरसि बंदरगाह होने की संभावना जाहिर की तब अन्य इतिहासकारों और पुरातत्वविदों ने इसकी आलोचना की।

जिसमें मुख्य रुप से आर नागस्वामी के एन पणिक्कर और एमजीएस नारायण जैसे इतिहासकारों ने आलोचना करते हुए आगे के विश्लेषण की मांग की। हलांकि अन्य लोगों ने इसका समर्थन किया जिनमें इतिहासकार और शिक्षाविद राजन गुरुक्कल भी शामिल थे यद्यपि वे भी इस स्थल को क्षेत्रीय व्यापारियों की बस्ती अलावा और कुछ नहीं मानते थे क्योंकि इसमें विकसित प्रशासन या परिष्कार का अभाव था यदि मुज़िरिस कहीं और स्थित होता तो उन्हें लिखित साक्ष्य की उम्मीद थी।

खोज में मिले साक्ष्य 

इस 2007 की खुदाई के दौरान सफेद रंग के चीनी मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े तथा लाल रंग एवं काले रंग के मिट्टी के बर्तन के टुकड़े इसके साथ ही रत्न में कांच के मोती अर्ध कीमती पत्थरों के मोती जड़े हुए आभूषण और मुहर के छल्ले इसके साथ ही कैमयो ब्लैंक के अधूरे टुकड़े जो कि खास कर कांच य धातु के बने हुए हैं तथा कैमियो छवि व डिज़ाइन के लिए आधार बनाने के लिए डिज़ाइन किए जाते हैं इसके साथ ही सिक्के मसाले और टेराकोटा की वस्तुएं मिली हैं।

इसके साथ ही पक्की ईंटों से बना संरचनात्मक घाट परिसर है जिसमें नावों को खड़ा करने के लिए नौ बोलार्ड थे इसके साथ ही पट्टनम में मिली एक और रोचक चीज तीन तमिल ब्राह्मी लिपियों में से एक थी यह एक बर्तन के किनारे पर खुदी हुई थी और लगभग दूसरी शताब्दी ईस्वी की है जिस पर अ मा ना लिखा हुआ था जो प्रतीत होता है

जिसका मलयालम अर्थ है जैन होगा। यदि खोज कर्ताओं द्वारा अन्य प्रमाणों द्वारा यह व्याख्या और अर्थ प्रमाणित हो जाता है तो यह स्थापित होता है कि जैन धर्म कम से कम दूसरी शताब्दी से मालाबार तट पर प्रचलित था।

यह पहली बार है जब खोजकर्ताओं को प्राचीन केरल में एक धार्मिक प्रणाली से संबंधित साक्ष्य मिले है। इसके साथ ही पट्टनम में मिले कंकाल के नमूनों के डी एन ए विश्लेषण से मुज़िरिस में अतीत में पश्चिमी यूरेशियाई आनुवंशिक छाप वाले लोगों की उपस्थिति की पुष्टि होती है। इसे प्राचीन बंदरगाह शहर के अतीत में रखे गए विशाल अंतरराष्ट्रीय महत्व का संकेत माना जा रहा है।

निष्कर्ष

हम कह सकते है कि मुज़िरिस बंदरगाह केवल एक बंदरगाह ही नहीं था बल्कि वह प्राचीन भारत को वैश्विक व्यापार के शीर्ष पर स्थापित करने वाला एक जीवंत केन्द्र है। काली मिर्च जिसे काला सोना भी कहा जाता था ने व्यापार से समृद्ध यह नगर प्राचीन रोम यूनान और अरब देशों के साथ भारत के आर्थिक व सांस्कृतिक संबंधों की रीढ़ बना।

यद्यपि 1341 में पेरियार नदी की बाढ़ ने इस ऐतिहासिक नगर को इतिहास के पन्नों में समेट दिया और कोच्चि बंदरगाह के उदय का मार्ग प्रशस्त किया लेकिन संगम साहित्य में वर्णित इसकी गाथाएं और आधुनिक पुरातात्विक उत्खनन आज भी भारत की महान समुद्री विरासत का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

इसके साथ ही हमें पता चला की मुज़िरिस प्राचीन व्यापार का केंद्र जहां विशेषकर काली मिर्च और मसालों का व्यापार किया जाता था। यह शहर सांस्कृतिक संगम का केंद्र था जहां ग्रीक  रोमन यहूदी और अरब व्यापारियों की उपस्थिति से विकसित हुई। हाल ही में 2007 से 2014 की खोज में मिले साक्ष्यों का कारण यह चर्चा में है।

2026-09-23

बप्पा रावल

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प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में गुहिलोत वंश के आठवें एवं अंतिम शासक तथा मेवाड़ वंश के संस्थापक बप्पा रावल के बारे में बात करेंगे। तथा उनके द्वारा लड़े गए अरब आक्रमण के बारे में चर्चा करेंगे। बप्पा रावल ने अपने बचपन से ही कई कठिनाइयों का सामना किया था उनका बचपन कैसा बिता तथा उनके बचपन का क्या नाम था वे कैसे एक राजा बने इन सम्पूर्ण घटनाओं की चर्चा इस लेख में करेंगे।

जीवन परिचय

इनके पिता का नाम रावल महेंद्र द्वितीय जिन्हें राजा नागदित्य के नाम से भी जाना जाता था तथा इनकी माता का नाम अज्ञात है बस इतना पता चलता है कि वे परमार वंश के राजा मान मोरी की बहन थीं। यानी राजा मान मोरी बप्पा रावल के मामा थे। बताया जाता है कि राजा महेंद्र मेवा़ड़ के दक्षिण-पश्चिम में स्थित नागदा कस्बे पर शासन किया करते थे।

इतिहासकारों द्वारा बताया जाता है कि राजा रावल महेंद्र के धर्मभ्रष्ट होने के कारण उनकी हत्या कर दी गई थी। उस समय बप्पा रावल की उम्र मात्र तीन वर्ष की थी जो कि शासन चलाने के लिए उपयुक्त नहीं थी।

इस बीच नागदा के शासकों ने गुहिलोत सिंहासन के युवा राजकुमार को मारने का प्रयास किया था लेकिन राजा के करीबी भील मित्रों ने जो की स्थानीय आदिवासी समुदाय से आते थे ने उनके प्रयासों को असल कर दिया। बेटे कि सुरक्षा के लिए रानी साहिबा अपने पति की पुरानी राजधानी नागदा के आसपास के बीहड़ और दुर्गम ग्रामीण इलाके में लौट आयीं। यहीं क्षेत्र ब्राह्मणों का निवास स्थान था। जो भगवान शिव की स्थापित मूर्ति एक लिंग  जी  पूजा किया करते थे।

राजा महेंद्र रावल की विधवा ने अपने छोटे बेटे को एक स्थानीय ब्राह्मण पुजारी की पत्नी जो की कुल की पुरोहित भी थीं को देखभाल के लिए सौंप दिया। चूंकि बप्पा रावल बहुत छोटे थे जिस कारण उनके बालिग होने तक शासन उनके नाम पर  ही चला। खास बात  यह है कि बप्पा रावल को पुजारी को सौंपने का वृतांत बताता है कि उन्हें उनके पिता के हत्यारों से बचाने के लिए यह कार्य किया गया होगा।

बचपन का वृतांत

बप्पा रावल ने अपना बचपन नागदा के नीचे पहाड़ियों में स्थित एक धार्मिक आश्रम में बिताया। वे ब्राह्मणों के पशुओं को चराने के काम किया करते थे। इस प्रकार उनके बचपन का नाम काल भोज पड़ा। काल शब्द का अर्थ भगवान शिव के महाकाल रुप से लिया गया है। ऐसा इस लिए था जहां बप्पा रावल रहते थे सभी ब्राह्मण परिवार एकलिंग जी यानी भगवान शिव पूजा-अर्चना के प्रति गहरी निष्ठा रखते थे। पशुओं को चराना ब्राह्मणों के बच्चों के लिए एक सम्मानजनक एवं गौरवपूर्ण पेशा था।

यहां रहते हुए बप्पा रावल का स्थानीय भील समुदाय के साथ गहरा संबंध बन गया। बचपन में ही बप्पा रावल घुड़सवारी और तलवार बाजी में महारत हासिल कर चुके थे। काल भोज के गुरु हरित राशि नामक एक ऋषि अंतर्मुखी और दूरदर्शी व्यक्तित्व के धनी थे। उन्होंने बालक को नैतिकता का ज्ञान सिखाया। शिव का आराधना करना सिखाया विधान सभाओं के लिए दीक्षित किया। इस प्रकार बप्पा रावल हरित ऋषि के शिष्य बने महर्षि को जल्द ही ज्ञात हो गया कि बालक के पास अद्वितीय बुद्धि और सहानुभूति की क्षमता है।

उनकी प्रतिभा के देखते हुए उनके गुरु ने भविष्यवाणी की कि ठीक 16 वर्ष बाद यह बालक मेवाड पर शासन करेगा। उनके गुरु ने उन्हें विशेष आशीर्वाद दिया और बप्पा रावल को पालन करने के लिए विशिष्ट आचार संहिता प्रदान की।

16 वर्ष के बाद

जब 18 वर्ष के हुए तब वे चितौड़ गए इतिहासकारों द्वारा बताया जाता है कि उस समय किले के नीचे स्थित कस्बे में मेला चल रहा था वहां बप्पा रावल ने एक ऐसी लड़ाई का प्रदर्शन किया जिसने मान मोरी और परमार सरदारों को भयभीत कर दिया। जब मान मोरी को पता चला की वे उनका भांजा है तो उन्होंने उनका स्वागत किया और उन्हें किले के विद्वानों में शामिल किया इसके साथ ही उनके मामा ने एक जागीर भी भेंट में दी।

इतिहासकारों अनुसार बताया जाता है कि उनके पिता की हत्या भील सरदारों द्वारा षड्यंत्र रच कर की गयी थी इनमें किसी राजा या सम्राट का नाम नहीं मिलता बस कुछ क्षेत्रीय मुखियों तथा सरदारों ने मिल कर इस कार्य का अंजाम दिया था बड़े होने के बाद सबसे पहले अपने पिता के हत्यारों तथा षड्यंत्र कर्ताओं को दंडित किया और अपना साम्राज्य फिर से हासिल किया।

इसके वाद अपनी वंशावली को छोड़ते हुए यानी गुहिलात वंश जिसे गुहिला वंश कहते है को समाप्त करके मेवाड़ राजवंश की 734 ईस्वी में स्थापना की। इस प्रकार लगभग 21 वर्ष की आयु में उन्होंने अपने पिता रावल महेंद्र द्वितीय का स्थान लिया। बताया जाता है कि बप्पा रावल नाम उनकी बहादुरी के कारण उपाधि की रुप में उनकी प्रजा ने उन्हें दिया था और उनका वास्तविक नाम जो कि वे स्वयं स्वीकार करते थे कालभोज ही था

अरबों अथवा अम्मयद साम्राज्य का आक्रमण 

सन 712 ईस्वी और आठवीं शताब्दी के समय काल में मुहम्मद बिन कासिम जो कि अरब साम्राज्य का राजा था जिसे हम उम्मयद साम्राज्य umayyad dynasty के नाम से भी जानते है ने सिंध के राजा दाहिर सेन को पराजित कर सिंध पर अपना शासन स्थापित किया इसके बाद के समय काल में अरब सेनापतियों जैसे कि जुनैद और तमीम ने राजस्थान गुजरात तथा मालवा पर हमला के छोटे-छोटे राज्यों पर हमला करना प्रारम्भ किया। जिससे इन क्षेत्रों के आसपास के राजा जैसे की मान मोरी इन लगातार आक्रमणों से कमजोर हो रहे थे।

इसी बीच जब अरब आक्रमणकारी मोहम्मद बिन कासिम ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया तो राजा मान मोरी ने अपनी प्रजा से आक्रमणकारी सेना जुटाने का आदेश दिया लेकिन अरबों की दहशत के चलते सभी जागीरदार अपनी जागीरें छोड़कर भाग खड़े हुए तब अंत में उन्होंने अपने भतीजे बप्पा रावल को बुलावा भेजा। इस प्रकार परमार राजा ने बप्पा रावल को अपनी सेना का सेनापति नियुक्त किया।

जागीरों से बेदखल किए जाने के बावजूद सरदार शर्मिंदगी से कारण उनके साथ चले गए। इतिहासकार कर्नल जेम्स टाड और अन्य पारंपरिक ग्रंथों के अनुसार बप्पा रावल ने अपनी वीरता और सैन्य कौशल का परिचय देते हुए अरब आक्रमणकारियों को करारी शिकस्त दी और उन्हें खदेड़ दिया। उनके समर्थन में प्रतिहार शासक नागभट्ट प्रथम तथा क्षेत्रीय राजाओं ने भी उनका सहयोग किया और अरबों को भारी शिकस्त दी।

चारण और भाट साहित्य की कथाओं अनुसार बप्पा रावल ने केवल अपनी सीमाओं की रक्षा ही नहीं की बल्कि भागती हुई अरब सेना का पीछा करते हुए उन्हें उत्तर-पश्चिम में काफी दूर तक खदेड़ा। बताया जाता है कि बप्पा रावल चौकियां और छावनीयां गजनी वर्तमान अफगानिस्तान तथा पाकिस्तान के रावलपिंडी शहर तक थी कहा यह भी जाता है कि रावलपिंडी नाम भी उनके द्वारा ही दिया गया था।
बताया जाता है कि बप्पा रावल की अरबों की इस ऐतिहासिक जीत ने कई सदियों तक उत्तर-पश्चिम भारत पर इस्लामिक आक्रमणों का रास्ता बंद कर दिया।

अंतिम समय

इतिहासकारों द्वारा बताया जाता है कि बप्पा रावल ने अपने जीवन के अंतिम समय में राजपाट और मोह-माया का त्याग किया और ध्यान और साधना में अपना मन लगाया। जिसके लिए मेवाड़ से उत्तर की ओर यात्रा करते हुए नागदा से आगे बढ़े खुरासान में अपना अंतिम समय बिताया और अपने गुरु हारित ऋषि के मार्ग पर चलते हुए योग साधना के बल पर 753 ईस्वी के आसपास अपना शरीर त्याग दिया।

ऐतिहासिक साक्ष्य

कुछ शिलालेखों में बप्पा रावल का उल्लेख मिलता है जिनमें गुहिला वंश की वंशावली यानी सूची दी गई थी। लेकिन अन्य शिलालेखों में उनका उल्लेख नहीं मिलता है। उदाहरण के तौर पर देखा जाए तो 959 ईस्वी के उनावास शिलालेख तथा 971 ईस्वी के एकलिंग शिलालेख में उनका उल्लेख नहीं मिलता है। इसके साथ ही 977 ईस्वी के अतपुर शिलालेख में इसके साथ ही 1083 ईस्वी के कदमल शिलालेख में भी उनका उल्लेख नहीं मिलता है।

इतिहासकारों का मानना है कि बप्पा रावल का गुहिला शासकों में से किसी एक का उपनाम नाम था इसके साथ ही अलग-अलग विद्वानों ने अलग-अलग गुहिला राजाओं से जोड़ने का प्रयास किया है। अतपुर और कदमल शिलालेखों के अनुसार गुहिला शासक महेंद्र के बाद कालभोज शासक बने। जी एच ओझा जैसे कई इतिहासकारों ने बप्पा रावल को कालभोज के रुप में पहचाना है।
क्योंकि 977 ईस्वी के अतपुर शिलालेख में खुमाना को कालभोज का पुत्र बताया गया है।

1404 ईस्वी के महारावल पाटा के उपरागणवा यानी डूंगरपुर शिलालेख में खुमाना को बप्पा रावल का पुत्र बताया गया है। आर.वी.सोमानी इस पहचान का समर्थन करते है लेकिन चेतावनी देते है क साक्ष्य निर्णायक नहीं है बप्पा रावल गुहिला वंश की किसी अन्य शाखा से संबंधित कोई अन्य शासक हो सकते है।

अतपुर शिलालेख में बप्पा रावल के नाग का उत्तराधिकारी और अपराजित का पूर्वज बताया गया है। 1460 के कुंभलगढ़ शिलालेख में बप्पा रावल को नाग का उत्तराधिकारी और अपराजित का पूर्वज बताया गया है। इससे पता चलता है कि बप्पा रावल कालभोज के परदादा शिलादित्य का दूसरा नाम था।

इस प्रमाण के आधार पर दशरथ शर्मा और डीसी सिरकार ने बप्पा रावल की पहचान शिलादित्य के रुप में की है। वहीं आर.वी. सोमानी इस पहचान का खंडन करते हुए कहते है कि इस शिलालेख में कई त्रुटियां है जिनमें बप्पा रावल को गुहादत्त के पिता के रुप में दर्शाया गया है जबकि कुछ शिलालेखों में उन्हें राजवंश का संस्थापक दर्शाया गया है।

कुछ अन्य इतिहासकारों ने बप्पा रावल को जैसे कि डी.आर. भंडारकर ने गुहिला शासकों के औसत शासनकाल की गणना के आधार पर कालभोज के पुत्र खुमाना के रुप में पहचाना है।
वहीं लखनऊ विश्वविद्यालय के श्याम मनोहर मिश्रा ने यह सिद्धांत दिया कि बप्पा रावल मूल रुप से मोरी शासक मनुरजा यानी मान मौर्य के जागीरदार थे। 

उन्होंने संभवतः अरबों के विरुद्ध मोरी अभियान का नेतृत्व किया था जिससे वे अपने अधिपति से अधिक प्रसिद्ध  हो गए थे। खोज कर्ताओं का मानना है कि य तो उन्होंने मनुराज को पदच्युत कर दिया या फिर मनुराज की निःसंतान मौत के बाद खुद राजा बन गए।

चित्तौड़ शिलालेख के अनुसार उन्होंने कर्नाटक और चोलों के साथ भी संघर्ष किया था अरबों के आक्रमण के बाद बप्पा रावल ने प्रतिहारों और राष्ट्रकूटों के साथ संघर्ष किया था। बताया जाता है कि राष्ट्रकूट राजा दंतिदुर्ग ने उज्जैन पर कब्जा कर लिया। हलांकि थोड़े समय में राष्ट्रकूट वहां से चले गए और नागभट ने अपनी सत्ता पुनः प्राप्त कर ली थी। 

इतिहासकार आर. वी. सोमानी का सिद्धांत है कि इन संघर्षों में बप्पा रावल ने प्रतिहारों की सहायता करके दंतिदुर्ग की सेनाओं का सामना किया और इस प्रकार मेवाड क्षेत्र के पूर्वी हिस्सों पर कब्जा करने में सफल रहें।

सोने के सिक्के

जी.एच.ओझा जैसे प्रख्यात इतिहासकारों ने नागरी लिपि में श्री वोप्पा य श्री वोप्पाराजा अंकित कई सोने के सिक्कों को बप्पा रावल से संबंधित माना है। हलांकि कुछ मुद्रा शास्त्रियों ने इस मान्यता पर विवाद किया है तर्क देते हुए 1960 में भारतीय मुद्रा शास्त्र सोसायटी के एक जर्नल ने तर्क देते हुए कहा उस समय मेवाड उतना बड़ा साम्राज्य नहीं था

कि वें सोने के सिक्के जारी कर सके और इसके साथ ही उन्होंने तर्क दिया कि हो सकता है कि ये सिक्के सुरसेना वंश के राजा वप्पुका के हो सकते है जिनका उल्लेख 955 ईस्वी के एक शिलालेख में मिलता है।

फिर भी सिक्कों पर स्पष्ट रुप से शैव प्रतीक चिन्ह जैसे त्रिशूल लिंग और बैल के चिन्ह मिलते है जो कि बप्पा रावल की भगवान एक लिंगनाथ जी के प्रति निष्ठा और उनकी दृढ़ता से मेल खाता है। इसके साथ ही इन सिक्कों पर शैव प्रतीकों के नीचे एक व्यक्ति की लेटी हुई छवि है। उस व्यक्ति का कान बड़े और छिद्रित हैं और छेद अतिरंजित प्रतीत होते है।

इंडोलाजिस्ट डेविड गार्ड़न व्हाइट के अनुसार यह बप्पा के शैव संप्रदाय में दीक्षा का प्रतीक हो क्योंकि कान छिदवाने की प्रथा शैल संप्रदाय से जुड़ी हुई है । जो सोलहवीं शताब्दी से पहले एक लिंग जी मंदिर के संरक्षक हुआ करते थे।

हलांकि व्हाइट का मानना है कि बप्पा के पशुपात संप्रदाय में दीक्षा लेने की संभावना अधिक है क्योंकि पशु पात नाम आमतौर पर राशि में समाप्त होते थे इस प्रकार हरित ऋषि संभवतः एक पशु पात ऋषि थे। इसके आगे वे कहते है कि रावल संस्कृत शब्द राजकुल शाही-वंश 8वीं शताब्दी में पशुपती के बीच एक कुल का नाम था। जो की 13वीं में कुल नाथ संप्रदाय में समाहित हो गया था।

इसी प्रकार के एक सिक्के पर धनुष-बाण पकड़े हुए श्री राम की आकृति बनी है उनके बाई ओर एक बैल और दाई ओर एक हाथी है। सिक्के के दूसरी तरफ सिंहासन पर बैठे शासक की आकृति है जिनके दोनों और सेवक है और नीचे श्री वोप्पा य बप्पा लिखा हुआ है।
इसी प्रकार के एक सिक्के पर श्री वोप्पाराजा लिखा हुआ है जिसमें एक बैल एक त्रिशूल एक लिंग और एक परिचारक की छवियां है और दूसरी ओर एक गाय अपने बछड़े को दूध पिला रही है।

निष्कर्ष

साहस और पराक्रम का प्रतीक
बप्पा रावल केवल मेवाड़ के संस्थापक ही नहीं बल्कि भारतीय इतिहास के एक अत्यंत साहसी और प्रतापी योद्धा थे। उनके धैर्य के आगे विदेशी आक्रमणकारी विशेष कर अरबों के कदम ठहर न सकें जिससे देश की सीमाएं सुरक्षित हुईं।

धार्मिक और सांस्कृतिक निष्ठा
वे महान शासक होने के साथ-साथ धर्मनिष्ठ और भगवान शिव के परम भक्त थे। उन्होंने राजनीति और आध्यात्मिकता का अनूठा समन्वय प्रस्तुत किया जहां मेवाड़ के शासक खुद को भगवान का दीवान मानकर प्रजा की सेवा करते थे।

दूरगामी प्रभाव
उनके द्वारा स्थापित मेवाड का राजवंश आगे चलकर भारतीय इतिहास में वीरता त्याग और स्वाभिमान का प्रतीक बना।

संक्षेप में कहा जा सकता है कि बप्पा रावल का जीवन साहस कर्तव्यनिष्ठा और राष्ट्र प्रेम का अनूठा संगम था। उन्होंने न केवल विषम परिस्थितियों से निकलकर मेवाड़ में सुदृढ़ साम्राज्य की नींव रखी बल्कि विदेशी आक्रमणों के खिलाफ दीवार बनकर भारतीय संस्कृति और सीमाओं की रक्षा की।

उनकी वीरता जन हितकारी नीतियां और आध्यात्मिक जीवन-शैली सदियों तक आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देती रहेंगी और भारतीय इतिहास में उनका नाम एक अमर शासक के रुप में स्वर्ण अक्षरों में अंकित रहेगा।

2026-09-16

वाकटक वंश

oil painting of vakataka dynasty
प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में वाकटक वंश के उदय होने तथा अंत होने के साथ-साथ वाकटक वंश की चार प्रमुख शाखाओं तथा हाल ही के समय में खुदाई के दौरान वाकटक वंश से संबधित साक्ष्यों पर प्रकाश डाला गया है। माना जाता है कि वाकटक वंश का उदय उत्तर के मालवा से लेकर दक्षिण में तुंगभद्रा नदी तक तथा पश्चिम में अरब सागर से लेकर पूर्व में छत्तीसगढ़ के  छोर तक फैला हुआ था। बताया जाता है कि वे गुप्त वंश के समकालीन थे।

परिचय

इतिहासकारों के अनुसार यह भारत का सबसे प्राचीनतम राजवंश था। जिसकी स्थापना विंध्य शक्ति नामक राजा द्वारा 250  से 270 ईसा पूर्व में की गई। हलांकि इस राजा के बारे में ज्यादा जानकारी इतिहासकारों को नहीं मिल पाई है लेकिन कुछ साक्ष्य मिलते है कि जो साबित करते है कि वाकटक वंश की स्थापना विंध्य शक्ति नामक राजा द्वारा ही की गई। अंजता की गुफाओं से  मिले शिलालेखों से यह अनुमान लगाया गया है। साम्राज्य का विस्तार विंध्य शक्ति के बेटे प्रवरसेन के शासन काल से प्रारम्भ होता है।

इतिहासकारों क मतानुसार  प्रवरसेन के शासन काल के बाद वाकटक वंश चार शाखाओं में विभाजित हो गया। खास बात यह है कि इन चार शाखाओं में से सिर्फ दो शाखाओं के ही उचित प्रमाण मिल पाये है जिसके कारण बाकी की दो शाखाओं को सिर्फ पुराणों के संकेतों के आधार पर समझा गया है यानी कोई पुख्ता सबूत अभी नहीं मिल पाया है। पहली शाखा का नाम प्रवरपुर नंदीवर्धन शाखा तथा दूसरी शाखा का  नाम वत्सगुल्म शाखा था।

प्रवरपुर नंदी वर्धन शाखा

यह मुख्य और सबसे शक्तिशाली शाखा थी जिसमें नंदी वर्धन जिसका मुख्य रुप से शासन काल नागपुर और प्रवरपुर में शासन किया था। इस शाखा के प्रमुख शासकों में पृथ्वीषेण प्रथम तथा रुद्रसेन द्वितीय और प्रवरसेन द्वितीय शामिल थे।

रुद्रसेन प्रथम
इस शासक के इतिहास के बारे में ज्यादा साक्ष्य नहीं मिल पायें है हलांकि इनके पिता का नाम गौतमीपुत्र था। इस शासक ने नागपुर से 30 किलो दूर रामटेक पहाड़ी पास नंदीवर्धन से शासन किया। रुद्रसेन प्रथम के शासन काल का अब तक एक मात्र शिला लेख मिल पाया जो चंद्रपुर के देवटेक में मिला है। कुछ इतिहासकार इसे ही रुद्रदेव को ही रुद्रसेन मानते है लेकिन इस बात पर अभी मतभेद है। इस बात  का सम्बन्ध इलाहाबाद स्तंभ शिलालेख से लगाया जाता है जिसपर आर्यवर्त के अन्य शासकों के नाम के साथ ही रुद्रदेव का भी नाम मिलता है।

कुछ इतिहासकार इस बात का विरोध इसलिए करते है क्योंकि रुद्रसेन प्रथम का वध समुद्रगुप्त द्वारा किया गया था अंत अपने पिता की मृत्यु के हत्यारे की बेटी प्रभावती गुप्त को अपनी बहु कैसे स्वीकार करता। इतिहासकारों के अनूसार रुद्रसेन प्रथम के पुत्र पृथ्वीविशेष प्रथम का विवाह गुप्त राजकुमारी हुआ इलाहाबाद के अभिलेख के अनुसार बताते है।

रुद्रसेन द्वितीय

इसका शासन काल 380 से 385 ईसा पूर्व तक का था इस शासक का विवाह गुप्त राजा चंद्रगुप्त द्वितीय जिसका शासन काल 375 से 413 तक का था कि पुत्री प्रभावती गुप्त से हुआ था। इस बात की पुष्टि रामटेक के शिला लेख से होती है। 385 ईसा पूर्व में रुद्रसेन द्वितीय का आकस्मिक निधन हो जाता है जिससे पता चलता है कि उसका शासन काल बहुत छोटा था। इसके बाद प्रभावती गुप्त दो बेटों ने 385 से 405 तक वाकटक वंश का राज संभाला। गुप्त रानी के दोनों बेटों के नाम दिवाकरसेना और दामोदरसेना था।

दामोदरसेना को ही हम प्रवरसेना द्वितीय के नाम से जानते है । इस प्रकार प्रवरसेना द्वितीय ने लगभग 20 वर्षों तक शासन किया। इस समय काल को ज्यादातर इतिहासकार वाकाटक-गुप्त युग के नाम से जानते है क्योंकि इस समय काल में वाकाटक साम्राज्य पर व्यावहारिक रुप से गुप्त साम्राज्य का ही शासन काल था। इस बात की पुष्टि प्रभावती  गुप्त के शिलालेख में उनके पिता देव गुप्त के उल्लेख से मिलता है। कुछ इतिहास कार देव गुप्त को ही चंद्रगुप्त द्वितीय मानते है। लेकिन इस बात का कोई उचित प्रमाण नहीं मिलता है।

बताया जाता है कि प्रवरसेन द्वितीय ने महाराष्ट्री प्राकृत में सेतुबंध की रचना की थी। गहा सत्तासाई के कुछ श्लोकों में उनका जिक्र मिलता है। इसी राजा ने अपनी राजधानी नंदिवर्धन से स्थानांतरित करके प्रवरपुरा को बनाया जो कि इसी राजा स्थापित किया गया एक नया शहर था। इस नई राजधानी में विष्णु अवतार राम को समर्पित एक भव्य मंदिर का भी निर्माण इस राजा द्वारा करवाया गया था। प्रवरसेन द्वितीय के बारे एक खास बात यह भी है कि अब तक वाकटक वंश के संबन्धित 17 ताम्रपत्र प्रवरसेन द्वितीय से ही संबन्धित है।

नरेंद्रसेन
प्रवरसेन द्वितीय के बाद का शासन काल नरेंद्रसेन द्वितीय का था। इस राजा का शासन काल 440 से 460 ईसा पु्र्व तक का था अपने शासन काल के दौरान वाकाटक वंश का साम्राज्य विस्तार मध्य भारत के कुछ राज्यों तक फैल गया था।

पृथ्वीसेन द्वितीय
यह प्रवरपुर नंदी वर्धन शाखा का अंतिम शासक था जिसने अपने पिता नरेंद्रसेन के बाद राजगद्दी को संभाला और 460 ईसा तक शासन किया। इस राजा को विष्णुकुंडिना राजा माधव वर्मा द्वितीय ने पराजित किया था। 480 में राजा की मृत्यु के बाद संभवतः उनके राज्य को वत्सगुलमा शाखा के हरिषेण ने अपने राज्य में मिला लिया होगा।

वत्सगुलमा शाखा

यह शाखा प्रवरसेन प्रथम के दूसरे बेटे सर्वसेना द्वारा बनाई गई थी। राजा सर्वसेना न महाराष्ट्र के वाशिम जिले में वत्सगुलमा को अपनी राजधानी बनाया। यह शाखा सहिद्री पर्वतमाला और गोदावरी नदी के बीच में स्थित थी। इस शाखा के शासकों ने अजंता की कुछ बौद्ध गुफाओं को संरक्षण दिया। इतिहासकारों के मतानुसार अजंता गुफाओं का सम्पूर्ण निर्माण वाकाटक शासकों की वत्सगुलमा शाखा द्वारा किया गया था जिसके साक्ष्य में अजंता गुफाओं का विहंगम दृश्य तथा गुफा संख्या 9 का प्रवेश द्वार आदि को मानते है।

सर्वसेन
इस राजा का शासन काल 330 से 355 ईसा पूर्व का माना जाता है इस राजा ने धर्म महाराज की उपाधि धारण की थी। इस राजा को ज्यादा प्रसिद्ध प्राकृत भाषा के हरिविजय के लेख से मिली थी। जो कृ्ष्ण द्वारा स्वर्ग से पारिजात वृक्ष लाने की कथा पर आधारित थी। वर्तमान समय में यह रचना विलुप्त हो चुकी है हलांकि सर्वसेन के समय काल के बाद के रचना कारों ने इसे सराहा था।

विंध्यसेन

सर्वसेन के शासन काल के समाप्त  होने के बाद उसके बेटे विंध्यसेन ने शासन किया। इस राजा का शासन काल 355 से 400 ईसा पूर्व का माना जाता है इसका दूसरा नाम विंध्यशक्ति द्वितीय था। इसकी प्रसिद्ध वाशिम शिलालेखों से मिलती है जिसमें राजा के 37वं वर्ष में नंदीकाता जिसे हम वर्तमान समय में नांदेढ़ के नाम से जानते है नामक गांव के अनुदान का उल्लेख मिलता है। खास बात यह है कि यह किसी वाकटक शासक द्वारा किया गया पहला ज्ञात अनुदान था। इस अनुदान की वंशावली संस्कृत और प्राकृत भाषा में लिखी गई है। विंध्यसेना ने अपने दक्षिणी पड़ोसी कुंतल के शासक को परास्त किया।  इतिहासकारों के अनुसार इस राजा के मंत्री का नाम प्रवरा था।

प्रवरसेन
राजा विंध्यसेन की मृत्यु के बाद उसका बेटा प्रवरसेन द्वितीय गद्दी पर बैठा जिसने लगभग 400 से 415 तक शासन किया। जिसके बारे में अजंता की गुफा सोलह के शिलालेख के अलावा बहुत कम जानकारी है जिसमें बताया गया है कि प्रवरसेन ने अपने परोपकारी तथा उदारवादी एवं शक्तिशाली प्रशासन व्यावस्था के चलते उच्च पद प्राप्त किए। हलांकि इस राजा का शासन काल बहुत छोटा था। प्रवरसेन की मृत्यु के बाद उसका  बेटा जो कि मात्र 8 वर्ष का था राजगद्दी पर बैठा जिसे देवसेन का नाम से जाना गया। अंजता गुफाओं से इस शासक के साक्ष्य लुप्त हो चुकें है।

सभ्याता और संस्कृति

वाकटक शासक हिंदू धर्म को मानते थे तथा शैव संप्रदाय का पालन करते थे। वहीं गुप्त वंश वैष्णव धर्म संप्रदाय का अनुपालन करते थे। इसका प्रमाण हमें रामटेक में पाए गए वैष्णव संप्रदाय से जुड़े कई धार्मिक ढ़ाचे पाये गए जो कि रानी प्रभावती के शासन काल में बनवाये गए थे। जबकि रानी प्रभावती का विवाह वाकटक वंश में हुआ था जो कि शैव संप्रदाय को मानता था। इस प्रकार हम कह सकते  है कि रानी को शासीका के रुप में प्राप्त शक्तियों ने उसे अपने आराध्य यानी विष्णु देव की पुजा करने का अधिकार प्रदान किया।

शोधकर्ताओं के अनुसार महाराष्ट्र में नरसिंह की पूजा करने की प्रथा रामटेक से ही निकली थी साध ही महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में वैष्णव प्रथाओं के प्रचार रानी प्रभावती की महत्वपूर्ण भूमिका थी। इस रानी वाकटक  वंश  की राजगद्दी पर लगभग 10 वर्षों तक शासन किया।

खुदाई के दौरान इन क्षेत्रों से एक पूजा स्थल एक लोहे की छेनी हिरण के  चित्रण वाला एक पत्थर और टेराकोटा की चूड़ियों के साथ ही भगवान गणेश की अखंड मूर्ति जिसमें अलंकारों से सजाया नहीं गया था मिली है। जो इस बात को प्रमाणित करते है कि उस समय काल के दौरान भगवान गणेश की भी पूजा की जाती थी।

वर्तमान खोज


हाल ही में वर्ष 2015 से 2018  के बीच समय काल के दौरान नागपुर के करीब रामटेक तालुका में खुदाई की गयी। इस खुदाई के दौरान तीसरी और पाँचवीं शताब्दी के दौरान इस क्षेत्र पर शासन करने वाले वाकटक वंश के जीवन धर्म तथा व्यापार के विषय में जानकारी मिली है। यहां नागपुर  के  गांव नागार्धन का में यह खुदाई की गई थी जो कि रामटेक तालुका से 6 किलोमीटर दूर लगभग एक से डेढ़ किलोमीटर के क्षेत्र में पुरातात्विक अवशेष पाये गए हैं।

खोजकर्ताओं द्वारा बताया गया है कि मौजूदा नागार्धन गांव प्राचीन बस्ती य गांव के स्थान पर ही स्थित है। इसी क्षेत्र में नदी किनारे कोटेश्वर मंदिर स्थित है और नागार्धन किला गांव के दक्षिण में स्थित है । बताया जा रहा है कि इस किले का निर्माण गोंड राजा के समय काल में हुआ था। अठारहवीं शताब्दी में इस किले का नवीनीकरण भोसलों द्वारा करवाया गया। किले के आसपास के क्षेत्र में वर्तमान समय में खेती जी जाती है वहीं पर ये पुरातात्विक अवशेष मिले है।

अभी तक वाकटक वंश के बारे में जो भी जानकारी प्राप्त थी वे महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र से सम्बन्धित थी जो कि कुछ साहित्यिक रचनाओं और ताम्र पत्रों से मिली थी। अभी तक यही माना जाता था कि नागार्धन गांव वाकटक वंश की पूर्वी शाखा नंदीवर्धन की राजधानी थी। मगर उचित प्रमाण नहीं मिल रहे थे। लेकिन इन पुरातत्विक साक्ष्यों के मिलने से इस बात को बल मिला है कि शायद यह सच में पूर्वी शाखा की राजधानी थी।
खुदाई के दौरान वाकटक शासकों के जीवन के विषय अधिक जानकारी मिल पायी है कि वे किस राजवंश से जुड़ाव रखते थे तथा उनके महलों को बनाने का प्रकार  क्या था इसके साथ ही शासकों के शासन काल के दौरान जारी किए गए सिक्कों और मुहरों के बारे में तथा उनके व्यापारिक क्षेत्रों के बारे में जानकारी मिली है।

धर्म 

वाकटक वंश के शासक ब्राह्मण धर्म के पक्षधर थे
इन्होंने ब्राह्मणों को खूब भूमि अनुदान दिये थे। सांस्कृतिक महत्व की बात करें तो ब्राह्मण धर्म को आदर्शों और सामाजिक संस्थाओं की दक्षिण की ओर बढ़ाने में इनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

खोज खास क्यों है

यह पहली बार हुआ है जब नागार्धन में खुदाई के दौरान मिट्टी की मुहरें मिली हैं। बताया जा रहा है कि यह अंडाकार मुहरें प्रभातगुप्त की रानी के समय काल की है। इन मुहरों पर शंख के चित्रण के साथ ब्राह्मी लिपि में रानी का नाम मुद्रित है। मुहर का वज़न लगभग 6.40 ग्राम बताया गया है। इतिहासकारों द्वारा बताया गया है कि यह मुहरें 1500 वर्ष पुरानी है तथा इनकी माप प्रति मुहर 35.71 mm 24.20mm और मोटाई 9.50mm है। मोहर पर मुद्रित शंख के विषय में इतिहासकारों ने इसे वैष्णव सम्प्रदाय से संबन्धित बताया है।

इन मोहरों का प्रयोग राजधानी में जारी शाही अनुमति के रुप में किया गया होगा। इसके अलावा इन संकेतों का उपयोग उन दस्तावेजों पर किया गया होगा जिनके लिए शाही अनुमति अनिवार्य होती होगी। यह सब बाते इस बात कि ओर इशारा करती है की रानी प्रभावती वास्तव में एक शक्तिशाली महिला शासिका रही होगी।.

2026-09-09

भानगढ़ का किला

 
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प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम भान गढ़ किले के निर्माण के समय काल तथा इससे संबन्धित राजा एवं इस किले के भुतिया होने के पीछे के कारण के बारे में जानेंगे। इसके साथ ही भान गढ़ किले में प्रयोग की गई वास्तुकला के इतिहास पर भी प्रकाश डालेंगे। खास बात यह है कि भारत  के प्रमुख पर्यटन स्थलों आने के बावजूद तथा वास्तुकला की आलोकनीय छाया प्रति होने के बावजूद यह यूनेस्को कि विश्व धरोहर की सूची में शामिल नहीं है।

निर्माण कार्य

इस किले को 17वीं शताब्दी में राजा भगवंत दास शासन काल में उनके दूसरे पुत्र राजकुमार माधो सिंह के निवास स्थान के रुप में स्थापित किया गया था। यह किला राजस्थान राज्य जिले जयपुर और अलवर के बीच सरिस्का अभयारण्य से 50 किलोमीटर दूर स्थित है। इस किले के निकटतम गांव गोला का बास है। राजा का महल का खंडहर  पहाड़ियों की निचली ढलान पर स्थित है इसके साथ ही पेड़ तालाब और एक प्राकृतिक जल धारा परिसर के अंदर स्थित तालाब में गिरती है। बताते चलें कि किले के निर्माण कार्य के समय राजकुमार माधो सिंह के बड़े भाई मान सिंह मुगल सेना के एक शक्तिशाली सेनापति थे। राजमहल के अलावा भानगढ़ में 1720 ई. तक नौ हज़ार से अधिक घर थे धिरे-धिरे इनकी आबादी भी समाप्त हो गई।

यह किला अरावली पर्वत श्रृंखला के समीप होने तथा वास्तुकला के चमत्कार के कारण बड़ी संख्या में पर्यटकों को आकर्षित करता है।

किला परिसर

मुख्य द्वारा के अलावा किले में चार द्वार है जिन्हें लाहौरी द्वार  अजमेरी द्वार फुवबाड़ी द्वार और दिल्ली द्वार के नाम से जाना जाता है। खास बात यह है कि खंडहरों में होने के बावजूद भी किला भव्य दिखता है और हरे भरे वातावरण के कारण शांति का अनुभव कराता है। भानगढ़ किले के अंदर मंदिरो महलों और हवेलियों के खंडहरों कि एक श्रृंखला देखने को मिलती है।

किले मुख्य प्रवेश द्वारा से ही मंदिरों को देखा जा सकता है इन श्रृंखला में गोपीनाथ मंदिर केशव राय मंदिर मंगला देवी मंदिर तथा सोमेश्वर मंदिर और श्री गणेश मंदिर प्रमुख हैं। सभी मंदिर में भारत की प्राचीन नागर शैली का इस्तेमाल किया गया है। गोपीनाथ मंदिर का निर्माण चौदह फुट ऊंचे चबूतरे पर किया गया है। मंदिर में मुख्य पुजारी का निवास स्थान भी है जिसे पुरोहित की हवेली के नाम से भी जाना जाता है। किले परिसर में अन्य कई भव्य हवेलियां भी मौजूद थी जो वर्तमान समय में खंडहर में तबदील हो चुकीं है।

मुख्य रुप से नर्तकियों की हवेलीयां है जो कि नर्तकियों का निवास स्थान भी हुआ करती थीं। परिसर में एक बाजार के लगने के साक्ष्य मिलते है परिसर के भीतर के अंतिम छोर पर राजा का राजमहल का खंडहर देखने को मिलता है। बताया जाता है कि एक समय यह राजमहल सात मंज़िला इमारत के रुप में विद्यमान था मगर वर्तमान समय में यह भारी वर्षा और तूफान के प्रकोप के कारण मात्र चार मंज़िल ही रह गया है।

वैसे खास बात यह है कि भानगढ़ का कला भले ही खंडहर हो गया हो मगर पहाड़ी की तलहटी और हरे-भरे शांत वातावरण क बीच होने के कारण बेहद खूबसूरत दिखता है।

लोककथाएँ

इस किले को लेकर बहुत सी लोक कथाएं प्रचलित है जिनमें मुख्य दो के बारे में हम यहां जानकारी देंगे। पहली कथा  राज कुमारी रत्नावती की है-
कहानी के अनुसार भानगढ़ में एक राजकुमारी रहती थी जो कि बेहद खूबसूरत थी अगल-बगल के राज घरानों में उसकी सुन्दरता की चर्चा हुआ करती थी। बताया जाता है कि एक तांत्रिक साधु का दिल उस राजकुमारी पर आ गया मगर राजा के सिपाहियों तथा उसके संरक्षकों के चलते राजकुमारी तक पहुंच पाना मुश्किल था। राजकुमारी से मिलने के कई प्रयासों के बावजूद सफलता न मिलने के कारण साधु ने अपनी तांत्रिक नीति को अपनाने पर विवश हुआ।

एक दिन बाजार में राजकुमारी को इत्र खरीदता देख तांत्रिक ने इत्र की शीशी में अपने द्वारा तांत्रिक सिद्धि से साधित किया हुआ इत्र राजकुमारी पर डालना चाहा। इसके लिए दुकानदारों कि मिली भगत पर राज कुमारी ने शीशी खरीद ली मगर उसे दुकानदार द्वार अत्याधिक दबाव तथा सस्ते में देने के कारण शक हुआ सो उसने शीशी तो ली मगर एक बड़े पत्थर पर फेंक दी।

तांत्रिक के रानी के पीछे आने पर तथा ढलान होने के कारण पत्थर लुढ़कने लगा और तांत्रिक के पीछे होने के कारण वे उसके नीचे दब कर मर गया। जिस कारण से क्षेत्रीय लोगों ने यह कथा बना दी की तांत्रिक ने मरते दम भानगढ़ किले को श्राप दिया कि जैसे वे मर रहा है उसी प्रकार एक दिन पूरा भानगढ़ अचानक से समाप्त हो जायेगा।

दूसरी कहानी

बाबा बालूनाथ

बताया जाता है कि राजमहल के बनने से पहले बाबा बालूनाथ इस क्षेत्र विशेष पर विशेष रुप से रहते थे और तपस्या किया करते थे तथा यहीं अपनी कूटी बना कर रहा करते थे। समय अंतराल के बाद राजा ने इस क्षेत्र पर महल बनाने की चेष्टा की साधु बाबा के आदेश पर ही महल को बनाया गया। महल बनाने से पहले बाबा बालूनाथ ने निर्देश दिया था कि महल मेरी कूटी से ज्यादा ऊंचा नहीं होना चाहिए क्योंकि मेरे यह कूटी मेरे उस ईश्वर का प्रतीक जिसकी साधना के लिए मैं यहां हूं। जिस दिन मेरी इस कूटी पर महल की छाया पड़ी उस दिन तुम्हारा विनाश हो जाएगा।

महल अगर मेरी कूटी से ऊंचा हुआ तो समझो मेरे ईश्वर का अपमान हुआ और जल्द ही तुम्हारा विनाश होना तय है। हलांकि महल के शुरुआती निर्माण के दौरान बाबा की बातों पर अमल किया गया मगर जब माधो सिंह के पोते अजब सिंह का शासन काल आया तो उसने बाबा की बातों को नजरंदाज किया और किले की ऊंचाई बढ़ा दी। अंत में मुगल सेना का राज्य पर आक्रमण हुआ और पूरे राज्य का पतन हो गया।
ये लोक कथाएं है तो इन पर बिना प्रामाणिक साक्ष्य के मिले बिना महल के विनाश का मुख्य कारण जान पाना मुश्किल है।

यात्रा के लिए पर्यटन स्थल

दोस्तों यह किला पर्यटन के लिए एक उत्तम स्थल है जो कि राजस्थान के अलवर जिलें अरावली पर्वत श्रृंखला के समीप स्थित है। सड़क यात्रा की बात करें तो यह दिल्ली से लगभग 200 किलोमीटर दूर है तथा कार या बस से यात्रा करने पर तीन घंटे का समय लगता है। राज्य मार्ग 29 के माध्य से जाया जा सकता है जो की मुख्य रुप से असम नागालैंड और मणिपुर से होकर गुजरता है। इसके साथ ही यह उत्तर प्रदेश के वाराणसी सारनाथ सैदपुर गाजीपुर मऊ दोहरीघाट और गोरखपुर को भी जोड़ता है।

हवाई मार्ग 
भानगढ़ किले के सबसे नज़दीक जयपुर का अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा है जो लगभग 85 किलोमीटर दूर स्थित है यहां से आप कैब य भाड़े पर टैक्सी बूक करके जा सकते है। 

2026-08-30

उक्कु य मूषा इस्पात

ilustration of wootz steel

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में भारत की सबसे प्राचीन धातु जिसके द्वारा बनायी गई तलवार सबसे मजबूत मानी जाती थी और जिसे हम wootz steel के नाम से जानते है के इतिहास के बारे में चर्चा करेंगे। बताते चलें की इस धातु को भारत में मूषा इस्पात के नाम से भी जानते है। इस लेख में इस धातु के इतिहास तथा इसे बनाने के तरीके एवं इसकी निर्माण कला के पतन के बारे में चर्चा करेंगे। इसके साथ ही इस धातु से बनी तलवारों के विदेशी व्यापार पर भी चर्चा करेंगे। इस धातु की खास बात यह थी कि यह अपनी मजबूती के साथ इसकी सतह पर बनी लहर धार आकृतियों के चलते भी बहुत प्रचलित हुईं थी।

परिचय

भारत ने प्राचीन काल में ही मानव इतिहास की सबसे उन्नत इस्पात तकनीक को विकसित कर लिया था जिसे हम उक्कु इस्पात के नाम से जानते है जिसे हम Wootz steel के नाम से भी जानते है। प्रारम्भिक समय में इसका निर्माण कार्य भारत के तमिलनाडु कर्नाटक तथा आंध्र प्रदेश के क्षेत्रों में प्रारम्भ हुआ। धीरे-धीरे पूरे विश्व में अपनी मजबूती का डंका बजाया। ज्यादातर इस स्टील से बनी तलवार का  व्यापार अरब देशों के साथ किया जाता था।

वूट्ज स्टील की निर्माण की कहानी हमें यह बताती है कि भारतीय प्राचीन धातु वैज्ञानिकों के असाधारण शिल्प कौशल और अपनी विद्वता का प्रदर्शन करते हुए ऐसे इस्पात का निर्माण किया जिसने सदियों तक वैश्विक धातु निर्माण की परंपराओं को प्रभावित किया। वूट्स स्टील की विरासत हमें याद दिलाती है कि महान इंजीनियरिंग की शुरुआत सामग्री यों की जानकारी में महारत हासिल करने होती है न की उसके निर्माण में।

इस स्टील की शुरूआत ईसा पूर्व के समय काल में भारतीय राज्य तेलंगाना के गोलाकोंडा क्षेत्र से हुई इसके बाद के अन्य क्षेत्र जैसे कर्नाटक तमिलनाडु और श्रीलंका में हुई। इस स्टील को लोहे के एक ठोस टुकड़े के रुप में निर्यात किया जाता था जिसे मूषा इस्पात कहते थे। श्रीलंका में स्टील बनाने की प्रारंभिक विधि के रुप में मानसूनी हवाओं से चलने वाली एक अनोखी भट्टी के माध्यम से बनाया जाता था।

इसके साक्ष्य हमें अनुराधापुरा तिस्सामहारमा औस समनालावेवा जैसे स्थलों के सर्वे के दौरान मिला। इसके साथ ही इतिहासकारों को कोडुमल से प्राचीन लोहे और इस्पात की कलाकृतियां भी प्राप्त की गईं है। 2018 में मन्नार जिले में स्थित योधावेवा स्थल की खुदाई में एक गोलाकार भट्टी का निचला आधा भाग मिला है। शोधकर्ताओं के अनुसार यह ढ़क्कन क्रूसिबल इस्पात का बना है। 

इसी खोज के दौरान श्रीलंका के दक्षिण-पूर्व के क्षेत्रों में शास्त्रीय कला संबंधित कुछ सबसे पुराने लोहे और इस्पात की कलाकृतियाँ पाईं गईं है। अरब सागर के रास्ते भारत और श्रीलंका के समुद्री व्यापार के चलते अरब देशों को वूट्स स्टील के बारे में पता चला। इस का पता हमें  इस्लामीक ग्रंथों में मुहन्नद और हेन्देय शब्द मिलने से चलता है जो कि भारतीय स्टील से बनी तलवारों की ओर इशारा करते है। अरबी कविताओं में भी इसका उल्लेख मिलता है जिसके तहत वूट्ज स्टील से बनी तलवार अत्यधिक मूल्यवान थी।

आगे चलकर इस प्रकार की स्टील का व्यापार विस्तार अन्य देशों तक हुआ जिसके चलते दमिश्क स्टील का निर्माण हुआ। इसके अलावा 12वी शताब्दी के अरब यात्री एड्रिसी ने भी भारतीय स्टील को दुनिया की सर्वश्रेष्ठ धातु बताया। अरब लेख तेलिंग में स्टील की प्रसिद्धि के लिए तेलंगाना क्षेत्र के संदर्भ में लिखा गया है। जिसमें बताया गया कि तेलंगाना का गोलाकांडा क्षेत्र स्पष्ट रुप से पश्चिम एशिया में उक्कू स्टील के निर्माण का प्रमुख केंद्र है।

वूट्स शब्द का अर्थ

17वीं शताब्दी में यूरोपीय यात्रियों ने दक्षिण भारत के गोलाकोंडा मालाबार और मैसूर क्षेत्र की यात्रा की और इस्पात निर्माण के क्षेत्र का दौरा किया। जिसके तहत उन्हें इस स्टील के नाम के पीछे का अर्थ समझ आया। वूट्ज शब्द तमिल शब्द उरुक्कू से लिया गया है जिसका अर्थ है पिघलाना। इसी प्रकार द्रविड़ भाषा में इसी प्रकार के मिलते जुलते शब्द का प्रयोग किया गया। वहीं तेलुगु में इस स्टील को उक्कू तथा मलयालम में इसे उरुक्कू नाम से जाना जाता था। इसी प्रकार इस स्टील को मैसूर में उक्कू टूंडू के नाम से जाना जाता था।

17वी से 19वीं शताब्दी के समय काल में यूरोपीय वैज्ञानिकों में इस स्टील के बारे में जानने की जिज्ञासा हुई। उस समय काल के दौरान यूरोपीय वैज्ञानिकों को कार्बन मिश्रित धातुओं की जानकारी बहुत कम थी। मगर उनके द्वारा वूट्ज स्टील के शोध ने आधुनिक अंग्रेजी फ्रांसीसी और रुसी धातु विज्ञान के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
 

प्रजनन अनुसंधान

19वीं शताब्दी के समय काल में ही वूट्ज स्टील पर गहन अध्ययन के लिए रॅायल स्कूल आफ साइंस द्वारा इसे पुनः बनाने के लिए प्रयास किया जिसके चलते 1795 में  डॅा. पियर्सन ने वूट्ज स्टील की रासायनिक रुप पर जांच की जो कि इस स्टिल पर रिसर्च करने वाले पहले व्यक्ति थे।

पावेल पेट्रोविच अनोसोव

ये रुस के धातु वैज्ञानिक थे वे वूट्ज स्टील अपने सभी प्राचीन गुणों के साथ पुनः बनाने में सफल रहे। उनके द्वारा निर्मित स्टील पारंपरिक वूटज के लगभग समान ही था। उन्होंने इस प्रकार के स्टील के उत्पादन के चार अलग-अलग तरीकों के बारे में लिखा जो कि एक पारंपरिक पैटर्न प्रदर्शित करते थे। उनका यह कार्य बुलैट स्टील्स नाम से भी जाना जाता है। जिसे माइंनिग जनरल पत्रिका में इसी शीर्षक के नाम से प्रकाशित किया गया था।

रीबोल्ट एट अल के अनुसार

इन्होंने अपने विश्लेषण में सीमेंटटाइट के नैनोवायरों को घेरने वाले कार्बन नैनोट्यूब की उपस्थिति के बारे में बताया। इसके साथ ही उन्हें धातु पर वैनेडियम मोलिब्डेनम और क्रोमियम के कुछ अंश मिले जिसके चलते उन्हें पता चला की धातु की अशुद्धियों को निकालने के लिए और वूट्ज स्टील को मजबूती प्रदान करने के लिए इसे गर्म ठंडा और जमाने जैसे चरणों से गुजारा गया है। जिसके कारण ही यह स्टील लचीला होने के कारण भी अपनी मजबूत पकड़ को नहीं छोड़ता।

वूट्ज स्टील बनाने का तरीका

इस इस्पात का निर्माण एक खास प्रक्रिया द्वारा किया जाता है जिसके दौरान लोहे के कार्बन युक्त पदार्थ के साथ सील बंद भट्टियों में पिघलाया जाता है। जिसके चलते अंत में हमें शुद्ध स्टील प्राप्त होता है जिस पर अद्वितीय सूक्ष्म संरचनाएं होती है।

कच्चे लोहे का चयन
सबसे पहले कच्चे लोहे का चयन सावधानीपूर्वक शुद्धता के आधार पर किया जाता था। धातु की संरचना में एक स्वरुप सुनिश्चित करने के लिए अशुद्धियों को कम से कम किया जाता था।

क्रूसिबल स्टील का उत्पादन
कठोर मिट्टी के बने छोटे-छोटे बर्तन जो की लोहे और कार्बन युक्त पदार्थों जैसे चारकोल आदि से बने होते थे। खास बात यह है कि इस कार्बन निर्माण के लिए बांस की पत्तियों को जला कर तथा अन्य पौधों को जलाकर प्राप्त किया जाता था।

नियंत्रित कार्बन अवशोषण

अब गर्म करने की प्रक्रिया के दौरान कार्बन लोहे में समाहित हो जाता था और एक उच्च कोटि के कार्बन इस्पात में बदल जाता था। इस चरण में धातु की भंगुरता को रोकने के लिए एक निश्चित तापमान की आवश्यकता होती थी जिसके अधिक या कम होने पर स्टील अपनी मजबूती खो देता था।

धीमी शीतलता
धातु के भट्टी में पिघलाने के बाद भट्टियों को धीरे-धीरे ठंडा किया जाता था। जिसके कारण एक नियंत्रित शीतलता के कारण धातु पर आंतरिक संरचनाएं बनी, जिन्होंने आगे चलकर ढलाई को दौरान दमिशक आकृति का धातुरुप धारण कर लिया। अंत में हमें एक ठोस स्टील का पिंड मिलता है।

वूट्ज स्टील के गुण
यह स्टील न केवल अपनी दिखावट के लिए बल्कि अपने यांत्रिक प्रदर्शन के लिए भी जाना जाता है। इस स्टील के माध्यम से बने बेल्ड प्राचीन काल में अन्य स्टील की तुलना में अधिक मजबूत हुआ करते थे। वैज्ञानिकों ने इसकी सूक्ष्म संरचना का अध्ययन करके पता लगाया की इस स्टील की मजबूती का मुख्य राज ये सूक्ष्म संरचनाएं ही है जो इसकी मजबूती के साथ इसके लचीलेपन में भी योगदान देती हैं।

दमिश्क स्टील की उत्पत्ति और वूट्ज स्टील से संबंध

कई लोग पौराणिक तलवारों का सम्बन्ध दमिश्क स्टील से जोड़ते है जो वूट्ज स्टील की तरह ही अन्य आकृति बहते पानी की आकृतियों के लिए प्रसिद्ध है। हलांकि खोज कर्ताओं का यह मानना है कि दमिश्क तलवारों के बनाने में भी इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल भारत में उत्पादित वूट्ड स्टील के क्षेत्र से ही आता था।

भारतीय इस्पात की सिल्लियों को व्यापार मार्गों के माध्यम से मध्य पूर्व में निर्यात किया जाता था। इसके बाद वहां के कुशल कारीगरों द्वारा इन्हें ढालकर ब्लेड़ बनाते थे। विशेष ढलाई तकनीकों के माध्यम से इन सिल्लियों पर विशिष्ट दमिश्क पैटर्न निर्मित होता था।

2026-08-29

कैलाश मँदिर

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प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में एलोरा गुफाओं में से सबसे प्रसिद्ध गुफा एवं मंदिर के बारे में चर्चा की गई है जिसे हम कैलाश मंदिर के रुप में जानते है। बताते चले कि यह मंदिर यूनेस्को की विश्व धरोहर की सूची में आता है जिसे वर्ष 1983 एलोरा की सम्पूर्ण गुफा सूची जो कि लगभग 100 अभी तक खोजी जा चूंकि हैं के साथ सम्मिलित किया गया। एलोरा की गुफाओं की बात करें तो इन 100 गुफाओं में से सिर्फ 34 गुफाओं को ही लोगों के पर्यटन स्थल के रुप में खोला गया है। 

कैलाश मंदिर इन 34 गुफाओं की सूची में 16वें स्थान पर आता है। इस लेख के माध्यम से हम इस मंदिर की वास्तु शिल्प कला तथा इस मंदिर के निर्माण के पीछे की कहानी एवं इतिहास के बारे में जानेंगे। इसके साथ ही हम यह जानने की कोशिश करेंगे की यह मंदिर इस प्रकार से राष्ट्रकूट  पल्लव वंश चालुक्य शासकों से सम्बन्धित है तथा इसके प्रमाणीकरण पर भी बात करेंगे।

परिचय

यह मंदिर भारतीय राज्य महाराष्ट्र के छत्रपती संभाजी नगर जिले में एलोरा में स्थित मंदिरों की सूची में सबसे बड़ा मंदिर है। यह मंदिर एक पूरे पहाड़ को काट कर बनाया गया है। इस मंदिर का निर्माण राष्ट्रकूट वंश के राजा नरेश प्रथम के द्वारा प्रारम्भ करवाया गया जिनका समय काल 757 से 783 ई. का था। यह मंदिर पूरे विश्व में अपने एक अनूठे ढंग का वास्तु और शिल्प कला का अद्भुत नमूना है। यह खास इस लिए भी है क्योंकि 1200 वर्ष से भी प्राचीन सह्वाद्री पहाड़ियों के कठोर चट्टान जिसे हम बेसाल्ट पत्थर के रुप में भी जानते है काटना इतना आसान नहीं था।

यह भारतीय इतिहास के सबसे प्राचीन मंदिरों की सूची में इस लिए भी प्रसिद्ध है क्योंकि इसका निर्माण कार्य नीचे से प्रारम्भ न करके ऊपर यानी इसके शिखर निर्माण कार्य से प्रारम्भ किया गया था। याद रखने योग्य बात यह भी है कि जिस क्षेत्र विशेष पर यह मंदिर निर्मित किया गया है उसे पहले ओरंगाबाद के बाद के नाम से जाना जाता था जिसे वर्ष 2023 के फरवरी महीने में राज्य और केन्द्र सरकार की मंजूरी पर मराठा साम्राज्य के दूसरे शासक छात्रपति सम्भा जी महाराज के सम्मान में परिवर्तित किया गया।

मंदिर निर्माण का कारण

प्राचीन काल में मंदिर निर्माण का कार्य व्यापारिक मार्गों के निकट किया जाता था ताकि व्यापारी और सौदागर यहां रुक कर विश्राम कर सकें इसके साथ ही यहां रहने वले भिक्षुओं साधुओं और तपस्वियों के साथ लंबी यात्रा करने सहायता और सुविधा भी मिलती थी। बदले में इन धनी व्यापारियों और सौदागरों की तरफ से मंदिर परिसर के संरक्षण के लिए आर्थिक मदद की जाती थी। प्राचीन व्यापारिक मार्ग पर स्थित होने के कारण यह दक्कन क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया था। इसके साथ ही क्षेत्रीय शासकों द्वारा भी इस मंदिर को संरक्षण प्राप्त था।

लोक कथा के अनुसार

दसवीं शताब्दी की एक कथा अनुसार जिसे हम कल्प तरु के नाम से भी जानते है में एक वृतांत के अनुसार राष्ट्रकूट शासक एलु की एक रानी का उल्लेख है जो कि इस प्रकार है। लगभग 8वीं शताब्दी के समय काल में राष्ट्रकूट राजा बीमार पड़ गए। जिसके चलते रानी ने भगवान भोले नाथ की आराधना की और राजा के अच्छे स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना की तथा उन्होंने वादा कि राजा स्वास्थ्य हो गए यानी उनकी मनोकामना पूर्ण हुई तो वे भगवान शिव के भव्य मंदिर का निर्माण करवायेंगी। फलस्वरूप  उनकी इच्छा पूर्ण हुई जिस कारण से रानी ने प्रण लिया कि जब तक वे भगवान शिव के मंदिर का शिखर नहीं देख लेतीं तब वे भोजन नहीं ग्रहण करेंगे।

राजा ने अपने देश के सर्वश्रेष्ठ वास्तुकारों मंदिर निर्माण के लिए आमंत्रित किया। वास्तुकारों ने भव्य मंदिर की संरचना प्रस्तुत की राजा उनसे प्रभावित भी हुए। मगर समस्या यह थी की पूरे मंदिर के निर्माण कार्य में लगभग 1 महीने का समय लग जाता जिसके चलते रानी को पूरे एक महीन के लिए भूखा रहना पड़ता।

अतः पेठन के वास्तुकार कोकासा मंदिर निर्माण की एक अनोखी योजना प्रस्तुत की जिसमें उन्होंने मंदिर को ऊपर स नीचे की तरफ निर्माण करने की बात की। इस योजना के तहत वास्तुकार मंदिर  की शुरुआत उसके शिखर के निर्माण कार्य से कर सकते थे  और मंदिर के शीर्ष को देखकर रानी अपना व्रत तोड़ सकती थी।

शिलालेख के अनुसार

दशा अवतार गुफा में मिले शिला लेख के अनुसार इसी प्रकार के एक अन्य मंदिर का निर्माण राष्ट्रकुट वंश के संस्थापक दंतिदुर्ग द्वारा अपने शासन काल यानी 735 से 757 ई. के मध्य के समय काल में करवाया था। इस मंदिर की नक्काशी भी कैलाश मंदिर की नक्काशी के समान शैली द्वारा निर्मित की गयी थी। हलांकि मंदिर परिसर के कुछ हिस्सों के बाद शासकों द्वारा पूर्ण करवाया गया। खास बात यह है कि यह गुफा भी एलोरा की गुफाओं की श्रेणी में 15 स्थान पर आती है और शैव मंदिर निर्माण स्थली के समीप है।

मंदिर की सरंचना

कैलाश मंदिर उन 34 हिंदू जैन और बौद्ध गुफाओं और मठों में सबसे बड़ा है जिन्हें हम सामूहिक रुप से एलोरा की गुफाएं कहते है। जिनमें 17 हिन्दू मंदिर 12 बौद्ध गुफाएं एवं 5 जैन मंदिर को शामिल किया गया है। इस मंदिर का निर्माण कार्य इस लिए भी खास है क्योंकि उस समय काल के दौरान वर्तमान तकनीकी औजार जैसे जैक हैमर उपलब्ध नहीं था जिसके कारण पूर्ण मंदिर का निर्माण हथौड़े व छेनी का इस्तेमाल करने वाले श्रमिकों की सेना के द्वारा तराशा गया।

प्रारम्भ में बेसाल्ट चट्टान के अंदर तीन विशाल खाई खोदी गई और लगभग 20 लाख टन चट्टान को काटकर हटाया गया। अतः इस चरण के बाद ही वास्तविक कार्य प्रारम्भ हुआ। जैसे-जैसे कारीगर नीचे उतरते गए मंदिर परिसर की विभिन्न संरचनाओं को तरशते गए। इनमें मुख्य रुप से गर्भगृह के ऊपर का शिखर स्वतंत्र स्तंभ अलग-अलग मंदिर और विशाल मूर्तियां शामिल थीं। इसके बाद ही मंदिर की बाहरी और आंतरिक सतह पर विस्मयकारी मूर्तिकला को बारीकी से उकेरा गया।

मंदिर का मुख्य मंडप 16 स्तंभों के सहारे पर टिका हुआ है इसके अलावा शिव के वाहन नंदी बैल के लिए अलग मंडप बनाया गया है। चारों तरफ 45 फुट ऊंचे ध्वज स्तंभ का निर्माण किया गया है। इन स्तंभों पर कभी त्रिशूल रखे जाते थे। मंदिर परिसर के अन्दर पांच अलग-अलग मंदिर स्थापित किए गए हैं जिनमें से तीन यमुना सरस्वती और गंगा को समर्पित है। 

नंदी मंदिर के मंडप के अगल-बगल विशालकाय हाथी की मूर्तियों के साथ स्तंभों का निर्माण किया गया है। अगर पूरे मंदिर की लंबाई की बात करें तो यह मंदिर 276 फुट लंबा है और वहीं चौड़ाई की बात करें तो यह 148 फिट चौड़ा है। मंदिर  के आंगन में तीन तरफ कोठरियों को एक सारणी में बनाया गया है। 12 मंजिला इमारत के रुप में निर्मित होने के कारण यह मंदिर सम्पूर्ण एलोरा गुफाओं में विशेष स्थान रखता है। यह एक मात्र गुफा है जो 12 मंजिलों में निर्मित है। मंदिर में मौजूद प्रमुख मुर्तियों की बात करें तो इनमें नटराज यानी भगवान शिव की मूर्ति गजलक्ष्मी अर्धनारीश्वर विष्णु के दशावतार रावणानुग्रह की मु्र्तियां प्रमुख है।

आधुनिक युग की खोज

इस मंदिर पर 1819 में जान स्मिथ नामक ब्रिटिश अधिकारी दुबारा खोजा गया। जान स्मिथ एक दिन शिकार के दौरान औरंगाबाद से 100 किलो मीटर दूर सह्राद्रि की पहाड़ियों की तरफ मौजूद जंगल में चले गए। शिकार के दौरान वे बघौरा नदी के पास पहुंच गए। वहीं उन्हें नदी की ऊपर की पहाड़ियों पर एक मंदिर का मुहाना दिखा। उन्हें लगा की गुफा के अन्दर उन्हें शिकार के लिए जरूर कोई बाघ मिल सकता है जिसके कारण वे अन्दर चले गए। प्रकाश जला के जब उन्होंने अन्दर का द्रश्य देखा तो चकित रह गए। इस प्रकार इन गुफाओं की दुबारा से खोज हो सकी। वे पहला यूरोपीयन शख्स था जो पहली बार इन गुफाओं तक पहुंचा।

लेख से सम्बन्धित अगर आपके पास कोई अन्य जानकारी है तो जरूर हमें बताएं

2026-08-27

सिंधु घाटी सभ्यता की लिपि

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प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम सिंधु घाटी सभ्यता के इतिहास पर प्रकाश  डालेंगे इसके  साथ ही सिंधु घाटी सभ्यता की खोज के दौरान मिली लिपि के इतिहास पर प्रकाश डालेंगे। आगे लेख में हम यह जानने की कोशिश करेंगे की सिंधु वासियों द्वारा अपनी लिपि का प्रयोग मुख्य रुप से किन-किन क्षेत्रों में किया जाता था। इसके साथ ही हम जानेंगे की किसी तरह से इस लिपि के खोज कर्ताओं द्वारा द्रविड़ और संस्कृत से सम्बन्धित बताया गया। इसके अलावा हम यह समझने कि कोशिश करेंगे कि क्यों कुछ विद्वान इसे कोई लिपि न समझकर इस एक गणी तिय प्रणाली मानते थे।

लिपि का परिचय

इस लिपि की खोज वर्ष 1920 के दशक में सर जान मार्शल द्वारा की गई थी जिसे मोहरों टेराकोटा की पट्टियों तथा धातु पर अंकित पशुओं मानवों आकृति तथा लेखों से प्राप्त किया गया है। बताया जाता है कि यह लिपि लगभग 2600-1900 ईसा पूर्व की अनुमानित है। जिसे मुख्य रुप से भारत के उत्तर पश्चिमी हिस्से तथा पाकिस्तान के सिंधु क्षेत्र वाले भाग से प्राप्त किया गया है। इस लिपि  से संभवतः ऐसी भाषा का प्रतिनिधित्व होता जिनके अक्षरों में समानता न होने के कारण इसका अध्ययन कर पाना मुश्किल हो जाता है।

वर्ष 1982 में खोज कर्ता एस आर राव ने इस लिपि के 62 संकेत को प्रस्तावित किया। इसी क्रम में आगे चलकर 1994 में रिसर्च कर्ता असको परपोला ने इस लिपि के 425 संकेतों के बारे बताया। इसी प्रकार वर्ष 2016 में शोधकर्ता ब्रायन के वेल्स ने 676 संकेतों की खोज की। लेकिन सटीक संख्या एवं इनके अर्थ पर अभी भी खोज जारी है।

लिपि को सही से न समझ पाने का मुख्य कारण विशेषज्ञ यह बताते है कि अभी तक हमें हड़्प्पा मोहरों का सीमित संग्रह ही मिल पाया जिनमें मात्र 3500 हड़प्पा मोहरों का ही जिक्र किया जाता है लेकिन अभी भी सटीक संख्या अज्ञात है। इसके साथ ही समय के प्रभाव के कारण कलाकृतियों का क्षरण भी एक मुख्य कारण है। 

लिपि की मुख्य बातें

सिंधु घाटी सभ्यता की लिपि को हड़प्पा सभ्यता की लिपि भी कहा जाता है जो की आज तक पुरी तरह से पढ़ी नहीं जा सकी है। हाल ही में भारतीय राज्य तमिलनाडु के मुख्य मंत्री जिनका नाम एम के स्टालिन है ने सिंधु घाटी सभ्यता की लिपि को सफलतापूर्वक समझाने वाले व्यक्ति के लिए 1 मिलियन अमेरिकन डालर के इनाम की घोषणा की थी। यह घोषणा पिछले वर्ष 9 जनवरी 2025 को की गई थी। जिसमें बहुत से विद्वानों ने प्रयास किया मगर सफलता हासिल न कर पायें।

लेखन शैली

लिपि को दाएं से बाएं की और लिखा जाता था इसके साथ ही लिपि को लिखते वक्त अक्षरों की दिशाओं में परिवर्तन भी किया गया है । जिस कारण कुछ विद्वान इसी लिपि को लोगोसिलेबिक प्रणाली का दर्जा भी देते है जिसका अर्थ है। जिसका अर्थ है कि यह लिपि चित्रलेखों तथा अक्षरों के संयोजन द्वारा लिखी गयी है। अधिकांश लेख इतने छोटे है कि पांच अक्षर में पूर्ण हो जाते है अतः लम्बे लेखों की कमी के कारण व्याकरण तथा वाक्य विन्यास व भाषा की व्याख्या के पैटर्न को समझने की क्षमता सिमीत हो जाती है।

लिपि का मुख्य कार्य

मुख्य रुप से लिपि का प्रयोग व्यापारिक कार्यों कर अभिलेखों एवं पहचान आदि के लिए किया जाता था। लिपि में गुणज स्वास्तिक और जोड़ जैसे चिन्ह भी मिले है जिसके कारण विद्वानों में यह भ्रम भी है शायद इस लिपि का प्रयोग शिक्षा सांस्कृतिक कार्यों में भी किया जाता था। हलांकि इस बात पर अभी रिसर्च होना बाकी है।

द्रविड़ भाषा से सम्बन्ध

कुछ शोधकर्ताओं जैसे इरावत महादेवन एवं असको परपोला ने इस सम्बन्ध द्रविड़ भाषा से स्थापित करने की कोशिश क्योंकि लिपि में मछली का चिन्ह तारों का पर्यायवाची के रुप में किया जाता है ठीक इसी प्रकार तमिल शब्दावली में भी मछली का पर्यायवाची तारा ही होता है । इसी प्रकार संख्या और मछली के चिन्ह द्वारा तारा समूह को परिभाषित किया जाता है।

संस्कृत से सम्बन्ध

एस आर राव जैसे विद्वानों न इस लिपि का सम्बन्ध संस्कृत से जोड़ते हुए इसे वैदिक काल यानी 1500-600 से संबंधित बताया। लेकिन हड़प्पा एवं वैदिक सभ्यता संस्कृति की विसंगतियों के कारण इस पर विवाद है। स्टीव फार्मर एवं पैगी मोहन जैसे विद्वानों ने इस तर्क की आलोचना कि है।
हड़प्पा सभ्यता की लिपि का समझना ज़रुरी क्यों है।

क्योंकि इसी मदद से इतिहासकारों और हमें हड़प्पा की धार्मिक मान्यताओं सामाजिक रीति रिवाजों सामाजिक मानदंडों तथा राजनीतिक संरचनाओं को समझने में सहायता मिलेंगी। इसके साथ ही हमें यह जानने को मिलेगा की इस क्षेत्र विशेष के लोग किन क्षेत्र विशेष के लोगों से अधिक प्रभावित थे तथा नगर निर्माण की आधुनिक शैली तथा नगर के कचरे की निकासी से लिए उच्चतम प्रबंध बिना किसी उच्च तकनीक के कैसे विकसित की।

2026-07-07

मनुस्मृति

मनुस्मृति क्या है

प्रस्तावना 

प्रस्तुत लेख में हम भारतीय इतिहास के विवादित ग्रंथ मनुस्मृती के इतिहास के बारे में चर्चा करेंगे इसके साथ ही हम देखेंगे की इस ग्रंथ के कौन कौन से वो श्लोक है जो विवाद का मुख्य कारण है। इस ग्रंथ पर यह आरोप भी लगता रहा है कि यह किताब कालसुत्रों के आधार पर उनके श्लोकों को निकाल कर बनाई गई है। कुछ लोगों का तो मानना यह भी है कि यह किताब मानवों के अधिकारों का दमन करती है।

इतिहास

भारुचि
मनुस्मृती के सबसे प्राचीन लेखक का खिताब इन्ही को दिया जाता है इतिहासकारों के अनुसार इन्होंने इस ग्रंथ की रचना 10शताब्दी से उत्तरार्ध  तथा 11वीं शताब्दी के आरम्भिक काल में की थी। मगर विदेशी लेखक अलिवेल इस ग्रंथ की रचना का समय काल 600 से 800 शताब्दी के बीच का मानते है।

इसके आलावा मनुस्मृती के कयी संस्करण भी प्रकाशित भी किए गये है जैसे मनुटिका जिसकी रचना 11वी. शताब्दी में की गयी थी इसके अलावा मानवर्थ मुक्तावली जैसे नाम भी आते है। अब तक मनुस्मृती सम्बन्धित पचास से भी ज्यादा पांडुलिपियां मिल चुकी है जो की 18वी. शताब्दी से अब तक खोजी गईं हैं। 

खास बात यह है कि इन सभी पांडुलिपियों का सिधा सम्बन्ध सीधे तौर पर मनुस्मृती से नहीं है । बस इतना पता चलता है कि इन सभी पांडुलिपियों के श्लोकों का प्रयोग  मनुस्मृती में किया गया है।

नामकरण

मनुस्मृती शीर्षक एक आधुनिक शब्द है जो संस्कृत से लिया गया है। लेकिन इसके वर्तमान मूल में ऐसा कोई विभाजन नहीं था। किताब के मुख्य रुप को चार भागों में विभाजित किया गया है। 1 इसमें दुनिया की रचना 2 धर्म का स्रोत 3 चारो सामाजिक वर्गों का धर्म 4 कर्म का नियम पुनर्जन्म और अंतिम मुक्ति के बारे में चर्चा कि गई है।

खास बात यह कि इन प्राप्त पांडुलिपि में इसे ही लिए श्लोको के प्रयोग से ही आचार संहिता के रुप में परिभाषित किया गया है। इसके अलावा हम मनुस्मृती को मानव धर्म शास्त्र के रुप में भी जानते है। वेदों के बाद यह हिन्दू धर्म का महत्वपूर्ण ग्रंथ है।

मुख्य ग्रंथ को श्लोकों में परिभाषित किया गया है। यह ग्रंथ एक संवाद को प्रदर्शित करता है जिसमें एक शिष्य अपने गुरु से सवाल करता है यहां गुरु स्वयं मनु है । शुरुआत के 58 श्लोक मनु को समर्पित किए गये हैं। एवं बाकी के श्लोक उनके शिष्य भृगु को समर्पित किए गये हैं।

खास रचनात्मक श्लोक

यहां हम श्लोक न लिखकर उनका अर्थ लिख रहे है। जैसे 1. धर्म से सभी शूद्र होते है, कर्मों के आधार पर उनका नया वर्ण बनता है। अतः सभी द्विज कहलाते है।

2.धर्म के 10 लक्षण है जैसे धैर्य क्षमा संयम चोरी न करना स्वच्छता इन्द्रियों को वश में रखना बुद्धि विद्या सत्य और क्रोध न करना आदि।
3.किसी को अपना जूठा न खिलाना और न ही किसी का जूठा न खाना, न अधिक भोजन करना और न ही भोजन करने के बाद हाथ मुंह धोये बिना इधर उधर जाना।
4.जो मनुष्य धर्म शास्त्र एवं वेद शास्त्र के अनुकूल तर्क द्वारा अनुसंधान और चिन्तन करता है वही धर्म के वास्तविक स्वरुप को समझ पाता है।

मनुस्मृती के विवादित श्लोक 

1.अध्याय 9 श्लोक 3
महिला को कभी स्वतंत्रता नहीं मिलनी चाहिए, बचपन में पिता , युवावस्था में पति और बुढ़ापे में पुत्रों को उसे नियंत्रण में रखना चाहिए।

2. अध्याय 10 श्लोक 122
शूद्रों को भोजन के लिए दूसरों का जूठा अन्न, पहनने के लिए फटो पुराने कपड़े और बिछाने के लिए टूटी-फूटी चटाई य धान के पौधे या पुआल दिया जाना चाहिए।

3. अध्याय 8 श्लोक 270
यदि कोई नीची जाति का व्यक्ति ऊंची जाति के व्यक्ति को जानबूझकर नुकसान पहुंचाता है य कटु शब्द कहता है तो उसे अत्यंत कठोर शारीरिक दंड देना चाहिए य जीभ काट देनी चाहिए जबकि उच्च वर्ग के लोगों के लिए सज़ा का अनुपात काफी कम है।

4. अध्याय 8 श्लोक 271
यदि कोई शूद्र उच्च वर्ग के व्यक्ति का नाम और जाति लेकर अहंकार से अपमान करता है तो उसके मुंह में 10 अंगुलि के बराबर लोहे की जलती कील डाल देनी चाहिए।

5.अध्याय 8 श्लोक 272
यदि कोई शूद्र गर्व से उन्हें धर्म उपदेश देता है तो राजा को उसके कान और मुंह में खौलता हुआ तेल डलवा देना चाहिए।

6.अध्याय 8 श्लोक 279
यदि कोई निम्न वर्ग का व्यक्ति श्रेष्ठ वर्ण के व्यक्ति को अपने जिस अंग से नुकसान पहुंचाता है तो राजा को उसका वही अंग काट देना चाहिए।

7.अध्याय 8 श्लोक 268
अगर कोई उच्च वर्ग का व्यक्ति अपने से निम्न वर्ग के व्यक्ति का अपमान करता है य उपरोक्त सभी दण्ड निम्न वर्ग के व्यक्ति को देता है तो राजा को उसे सिर्फ मामूली आर्थिक दण्ड देना चाहिए य सर मुण्डवा कर देश से निकाल देना चाहिए।

8. अध्याय 8 श्लोक 379/380
ब्राह्मण चाहे कितना भी बड़ा अपराध क्यों न करें उसे कभी भी मृत्यु दंड नहीं देना चाहिए य अंग भंग जैसी शारीरिक सजा नहीं दी जा सकती है, उसे केवल देश निकाला य मुंडन की सजा दी जा सकती है।

दोस्तों शायद उपरोक्त कारणों एवं भेदभाव के  चलते ही बी आर अम्बेडकर ने मनुस्मृती को जलाया था और संविधान को सर्वोपरि पुस्तक का दर्जा दिया था। इतिहास में बहुत सी ऐसी चीज़े और किताबें मिलती है जो की भेदभाव के बढ़ावा देतीं है। जिनमें बदलते वक्त के साथ परिवर्तन की जरूरत है।

क्योंकि हमारा मानना है कि प्राकृत ने हम सभी को बनाया है और समय के साथ यह हमें मिटायेगी भी। प्राकृति हमारे साथ-साथ सभी जीव- जन्तुओं  का संरक्षण भी करती है। ऐसे में न तो कोई मनुष्य बहुत बड़ा हो सकता है और न ही बहुत छोटा।

तो इस प्रकार इस ग्रंथ की ज्यादातर मान्यताऐं गलत है। क्योंकि धर्म को मानने के लिए मनुष्य का होना आवश्यक है, कुछ चुनिंदा लोग मात्र कुछ भी नियम बनाकर किसी धर्म को नहीं चला सकते यह हम समझते हैं। खास बात यह है कि इस प्रकार के ग्रंथों को मनुष्यों द्वार ही लिखा गया है तो जाहिर सी बात है वे अपने भी विचार इन ग्रंथों में पिरोते होंगे।

2026-06-19

इंडो-ग्रीक आक्रमण

illustration of indo greek kingdom
प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम भारत पर हुए तीसरे विदेशी आक्रमण के बारे में चर्चा करने जा रहे हैं जिसे हम इंडों-ग्रिक आक्रमण के नाम से भी जानते है। इसके साथ ही हम देखेंगे की इनके द्वारा कौन कौन से परिवर्तन भारत में किये गए।

मूल निवास

यह मूल रुप से बैक्टीरिया प्रांत के रहने वाले थे। इन का प्रमुख शासक डेमोट्रियस था जिसकी मदद से इन्होंने उत्तर पश्चिम यानी पंजाब हरियाणा मथुरा तथा पाकिस्तान अफगानिस्तान के क्षेत्रों पर अपना शासन स्थापित किया। यह आक्रमण भारत पर 180 ईसा पूर्व में हुआ था।

प्रमुख शासक

डेमोट्रियस के आलवा इनके प्रमुख शासकों की सूची में मिनांडर menandar का नाम आता है। इसने साकल sakal को अपनी राजधानी बनाकर साकेत यानी अयोध्या और पाटिलपुत्र यानी मगध के क्षेत्रों तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया।

बौद्ध धर्म से प्रभावित 

मिनांडर बौद्ध धर्म से अत्यधिक आकर्षित हुआ इसका साक्ष्य हमें बौद्ध भिक्षु नागसेन और मिनांडर के दार्शनिक संवाद से मिलता है जो कि प्रसिद्ध बौद्ध ग्रंथ मिलिदंपन्ह वर्णित है।

भारतीय संस्कृति पर प्रभाव

1.सिक्के
भारत में सर्वप्रथम सोने के सिक्कों का चलन यवन शासकों द्वारा ही चलाया गया। जिस पर उस समय काल के राजा की तस्वीर एवं नाम अंकित रहता था और दूसरी तरफ बौद्ध की आकृति य उनका उपदेश कुरेदा जाता था। डाई से सिक्के बनाने का चलन यवन शासकों द्वारा ही चलाया गया था। इंडो-ग्रीक से पहले भारत में बने सिक्कों का कोई निश्चित आकार य राजा की पहचान नहीं होती थी। डाई द्वारा सिक्के बनाने के कारण सिक्कों का वजन आकार और शुद्धता निश्चित की गई जिससे व्यापार करना बेहद आसान हो गया। उपरोक्त कारणों के चलते भारत की आर्थिक समृद्धि का विकास हुआ। 

2.गांधार कला Gandhara Art
यूनानी मूर्ति कला और भारतीय मूर्ति कला के संगम से गांधार मूर्ति कला का विकास हुआ। इसी कला के माध्यम से भारत में पहली बार महात्मा बुद्ध क मूर्ति यूनानी देवता अपोलो की तरह बनाई गयी थी। इनके युद्ध से पहले भारत में बौद्ध को प्रतीकों चरण और स्तूपों द्वारा दर्शाया जाता था। उनकी मानव रुप में मूर्ति नहीं बनती थी।इनके द्वारा निर्मित गांधार कला शैली के चलते ही बुद्ध के घुंघराले बाल मूंछे और शारीरिक गठन जैसी मूर्तियां बनाई जाने लगीं।

3.खगोल विज्ञान और ज्योतिष कला
सप्ताह के सात दिनों का नामकरण तथा 12 राशियों की खोज यूनानी प्रभाव से ही विकसित हुई। जिसका प्रमाण भारतीय ग्रंथ गार्गी संहिता से मिलता है। जिसमें लिखा है कि यद्यपि यवन एक बर्बर देश है  फिर भी वे ज्योतिष के विद्वान है इसलिए वे पूजनीय है। इनकी ही वैज्ञानिक कला शैली से ग्रहों की गति ग्रहण की भविष्यवाणी और वर्ष की सटीक गणना करने की यूनानी तकनीकों को भारतीय विद्वानों ने अपनाया और अपने ग्रंथों में शामिल किया।

4.रंगमंच और पर्दा
भारतीय नाटक और रंगमंच में परदे का उपयोग शुरु हुआ जिसे आज भी यवनिका कहा जाता है  जो कि यवन शब्द से बना है।

सांस्कृतिक समन्वय

कई यूनानी शासकों और राजदूतों ने भारतीय धर्म को अपनाया ये ही नहीं तक्षशिला के यवन राजदूत हेलियोडोरस ने मध्य प्रदेश के विदिशा में भगवान विष्णु को समर्पित गरुड़ ध्वज स्तंभ की  स्थापना करवाई।इस प्रकार से देखा जाये तो यवन आक्रमण और उनके शासन का भारतीय संस्कृति शासन और व्यापार पर गहरा और दीर्घकालिक प्रभाव पड़ा।

वैश्विक व्यापार

उत्तर-पश्चिम सीमा सुरक्षित होने और ग्रीक संपर्क से भारत का व्यापार मध्य एशिया भू मध्य सागर और रोमन साम्राज्य तक तेजी से फैला।

2026-06-18

शकों का आक्रमण

shak or shaka dynasty

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम भारत पर हुए चौथा विदेशी आक्रमण तथा इसके प्रभाव के साथ भारत में शकों को किन राजाओं ने कड़ी टक्कर दी इसके बारे में चर्चा करेंगे।

मूल निवास

शकों का मूल निवास स्थान सिर दरिया घाटी और चीनी के तुर्किस्तान में था। हूणों और यूचू कबीले के दबाव के कारण उन्हें अपना स्थान छोड़कर भारत की ओर आना पड़ा था।खास बात यह है कि भारत आने के बाद शक साम्राज्य मु्ख्य रुप से 5 भागों में विभाजीत हो गया। मुख्य रुप से इनकी राजधानी अफगानिस्तान पंजाब मथुरा गुजरात मालवा और दक्कन में थी।

शकों का प्रथम आक्रमण 2वीं सदी ईसा पूर्व में माउज़ के सहयोग से उत्तर-पश्चिम के हिस्से यानि गांधार और तक्षशिला के क्षेत्र को इंडे-ग्रिक शासकों के साथ किया था। इनका सबसे प्रतापी राजा रुद्रदामन था।

प्रमुख शासक
मोगा moues
यह भारत का पहला शक राजा माना जाता है इसने गंधार और पंजाब में अपना शासन स्थापित किया था।

रुद्रदामन प्रथम
यह पश्चिमी भारत की शाखा का सबसे प्रसिद्ध शक राजा था जिसने काठियावाड़ की सुदर्शन झील की मरम्मत करवाई थी।

भारत के राजाओं से सामना

इतिहास को कुरदने पर हमें यह पता चलता है कि इनका सामना किसी एक भारतीय राजा से नही बल्कि अलग- अलग कालखंड़ों के तीन महान भारतीय राजवंशों और उनके प्रतापी राजाओं से हुआ था। इन राजाओं ने शकों के केवस कड़ी टक्कर ही नही दी बल्कि उन्हें कई बार बुरी तरह पराजित भी किया।

राजा विक्रमादित्य
57 ईसा पूर्व में जब शकों ने पश्चिमोत्तर से आगे बढ़कर मालवा और उज्जैन पर कब्जा कर लिया, तब उज्जैन के एक स्थानीय हिंदू राजा जिन्हें इतिहास में विक्रमादित्य के नाम से जाना जाता है ने शकों के खिलाफ मोर्चा खोला। यु्द्ध में राजा विक्रमादित्य की जीत हुई। इस समय काल के दौरान भारत में शक सवंत का चलन हो गया था। मगर राजा विक्रमादित्य ने इस विजय के उपरान्त शक सवंत कैलेंडर की जगह विक्रम सवंत का निर्माण करवाया जो कि आज भी चलन में है।

इस विजय के बाद राजा विक्रमादित्य ने शकाारि की उपाधि धारण की थी जिसका अर्थ है शकों का नाश करने वाला।

2.सातवाहन वंश दक्कन 

शकों की क्षहरात शाखा का सबसे शक्तिशाली राजा नहपान था जिसने गुजरात मालवा और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों पर कब्जा कर लिया था। उनका मुकाबला दक्षिण के शक्तिशाली सातवाहन राजाओं से हुआ।
1.गोतमीपुत्र शातकर्णाी 
यह सातवाहन वंश के सबसे महान राजा थे जिन्होंने 106 से 130 ईस्वी तक शासन किया था। इन्होंने शक राजा नहपान पर हमला किया और उसे युद्ध में हराकर मार डाला। इस जीत का प्रमाण नासिक के गुफा अभिलेखों और जोगलम्बी से मिले सिक्कों से मिलता है, जिन पर शातकर्णी ने नहपान के सिक्कों को दोबारा अपने नाम से ढलवाया था।

2.वशिष्ठीपुत्र पुलुमावी 
नहपान की हार के बाद शकों की दूसरी शाखा कार्दमक वंश के राजा रुद्रदामन प्रथम ने खोए हुए क्षेत्रों को वापस पाने के लिए सातबाहनों पर हमला किया। रुद्रदामन ने गौतमीपुत्र के पुत्र वशिष्ठी पुलुमावी के युद्ध में दो बार पराजित किया। हलांकि वैवाहिक संबंधों को कारण सातवाहन वंश के शासकों के नष्ट नही किया दरअसल रुद्रदामन ने अपनी बेटी का विवाह सातवाहन के राजा से किया था जिसके कारण यह युद्ध रिश्तेदारी में बदल गया।

4.गुप्त राजवंश 
इनका शासन काल 4वां शताब्दी से 5वीं शताब्दी तक का था। इधर शकों का शासन काल भारत में लगभग 400 वर्षों तक खिचता रहा। इनका अंत गुप्त साम्राज्य के राजाओं द्वारा किया गया।
1.समुद्र गुप्त 
इनका शासन काल 335 से 375 ईस्वी. तक का था गुप्त वंश के इस महान विजेता ने अपनी दिग्विजय नीति के तहत पश्चिमी भारत के शक शासकों को अपनी अधीनता स्वीकार करने और टैक्स देने प मजबूर कर दिया।

5.चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य

इनाक शासम काल 375 से 415 ईस्वी तक का था। चंद्रगुप्त द्वितीय का तथा शकों का यह युद्ध इतिहास का सबसो निर्णाय युद्ध था। पश्चिमी भारत यानि गुजरात तथा काठियावाड़ में अभी भी शकों के शासन बचा हुआ था जहां का अंतिम राजा रुद्रसिंह तृतीय था। चंद्रगुप्त द्वितीय ने एक विशाल सैन्य अभियान चलाकर रुद्रसिंह तृतीय को जुद्ध में मार गिराया और शकों के अंतिम साम्राज्य को हमेशा के लिए गुप्त साम्राज्य में मिला लिया। इस महाविजय के बाद ही चंद्रगुप्त द्वितीय ने भी विक्रमादित्य और शकारि की उपाधि धारण की।

इस प्राकर मालवा के स्थानीय राजाओं से शुरु हुआ यह संघर्ष सातवाहनों के शौर्य से गुजरते हुए अंततः गुप्त राजवंश के हाथों शकों के पूर्ण विनाश के साथ समाप्त हुआ।