9b45ec62875741f6af1713a0dcce3009 Indian History: reveal the Past: Cultural History

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शुक्रवार, 29 मई 2026

कुल धारा

kuldhara village

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम कुल धारा जिसे एक शापित गांव भी कहते है इसके पीछे की कहानी को जानेंगे इसके साथ ही इतिहास में इस स्थान पर घटी उस घटना पर प्रकाश डालेंगे जिसके कारण 84 हजार ग्राम वासियों को इस गांव को छोड़ना पड़ा। तथा इस राज़ से भी पर्दा उठायेंगे की यह कोई शापित गांव नहीं था। लेकिन लोगों का रहस्यमय तरीके से गायब होना वर्तमान समय में लोगों को जरूर सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर उस गांव में क्या हुआ था। वर्तमान समय में यह गांव पुरातत्व विभाग के अधीन है जहां सूरज ढलने के बाद रुकने पर सख्त मनाही है। तो आइये तथ्यों के आधार पर इस गांव के उत्थान विनाश और आधुनिक वैज्ञानिक खोजो को समझते है। 

इतिहास

13वीं सदी के समय काल में  राजस्थान के जोधपुर की पाली रियासत के राजा के अत्याचारों और भारी कर से तंग आकर ये लोग जैसलमेर रियासत में आ कर बसना इनकी मजबूरी थी। किताब  तवारीख-ए-जैसलमेर के अनुसार कधान नाम  के इस पालीवाल ब्राह्मण ने कुल धारा की नींव रखी तथा इसका निर्माण किया था । पुरा तात्विक साक्ष्यों में मिले शिलालेखों से यह पता चला है कि यह गांव 800 साल पुराना है। ये पालीवाल ब्राह्माण महान वैज्ञानिक और बेहतरीन सिविल इंजीनियर थे। जिसका प्रमाण हमें जल जमा करने की खादीन प्रणाली से मिलता है। यह तकनीक राजस्थान जैसे इलाके जहां 50 डिग्री से भी अधिक तापमान चला जाता है और बारिश भी कम होती है जगह पर किसी खजाने से कम नहीं थी।

खादीन तकनीक

वे पथरीली ढलान वाले इलाके के नीचे मिट्टी का मजबूत बांध बनाते थे, जिससे बारिश का पानी खेतों में जमा हो जाता था। यह पानी जमीन के नीचे रिसकर कूओं को रिचार्ज करता था। इस रिसाव प्रक्रिया से गुजरने के कारण पानी में से नमक निकल जाता था और पानी खेती और पिने योग्य हो जाता था। जिस कारण से यहां गेहूं और चने की बंपर पैदावार होती थी।

वास्तुकला का अच्छा ज्ञान

कुलाधारा वासियों को वास्तुशास्त्र का अच्छा ज्ञान था जिसके कारण इनके गांव आधुनिक तरीकों से प्लांड सिटी की तरह ग्रिड पैटर्न पर बसा हुआ था। गांव के घर 50 डिग्री की गर्मी में भी प्राकृतिक रुप से ठंडे रहते थे। इसके लिए वे मिट्टी की 1.5 फिट की दीवारें बनाते थे तथा घरों में वेंटिलेशन के लिए आंगन में पत्थरों की खूबसूरत नक्काशीदार जालियां बनाते थे जो हवा को तेजी से ठंडा करती थीं।

पलायान का मुख्य कारण

19 सदी में जैसलमेर में महाराजा मूलराज द्वितीय का शासन था जो कि एक प्रभावशाली राजा नहीं थे उनकी अपेक्षा उनका दीवान ही शासन चलाता था जो कि एक क्रूर दीवान था। दीवान सालिम सिंह मेहता बहुत की अय्याश किस्म का व्यक्ति था। एक दिन उसकी नजर कुलधारा के मुखिया की खूबसूरत बेटी पर पड़ी। उसने जबरन कुलधारा के मुखिया को उसकी बेटी से शादी करने का पैगाम भेज दिया और इनकार करने पर पूरे गांव को प्रताडि़त करने की धमकी दी। अपनी बेटी के सम्मान और समुदाय के सम्मान की रक्षा के लिए रात में गांव में एक गुप्त पंचायत बुलाई गयी जिसमें कुलधारा के 84 गांव के मुखिया शामिल हुए । उन्होंने गुलामी स्वीकार करने की बजाय अपनी 500 साल पुरानी पुरखों की जमीन को हमेशा के लिए छोड़ने का फैसला लिया और एक ही रात में पूरा इलाका वीराने में बदल गया।

कहानी का दुसरा पहलू

बताया जाता है की सालिम सिंह के पिता स्वरुप सिंह जो की पहले के दीवान थे ने जब पालीवालों पर जबरन टैक्स लगाना चाहा , तो दरबार में हुए विवाद के कारण राजकुमार राय सिंह ने स्वरुप सिंह की हत्या कर दी थी। उस समय सालिम सिंह सिर्फ 11 वर्ष का था। बड़े होकर जब सालिम सिंह दीवान बना तो पालीवालों पर अत्याचार करना सिर्फ उसका लालच नहीं बल्कि दशकों पुराना उसका प्रतिशोध था। खास बात यह है कि यह की यह वृतांत कर्नल जेम्स टाड की किताब Annals and Antiquites of Rajasthan में भी दर्ज है की सालिम सिंह ने कुलधारा वासीयों पर  भारी टैक्स लाद दिए थे जिससे वे पहले ही परेशान थे। बेटी का विवाद इस उत्पीड़न की आखिरी कड़ी थी।

श्राप के पीछे का कारण य कूटनीति

पालीवाल ब्राह्माण अत्यधिक बुद्धिमान थे वे जानते थे कि सालिम सिंह उनकी उपजाऊ भूमि आलीशान गांव पर कब्जा करना चाहता है। चूंकि वे सेना से लड़ नहीं सकते थे इसलिए उन्होंने श्राप की अपवाह को एक सामाजिक आर्थिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया। उस समय काल के लोग कुछ ज्यादा ही अंध विश्वासी थे जिसके कारण कुलधारा की जमीन को शापित घोषित करने में उन्हें कोई समस्या नहीं हुई। परिणामस्वरूप कोई भी किसान इन ज़मीनों पर दुबारा बसने नहीं आया। अंत में सालिम सिंह के हाथ सिर्फ खण्डहर लगे।

आधुनिक रिसर्च के प्रमाण

ऐतिहासिक जनसंख्या आंकड़ों के अनुसार 18 वीं सदी में यहाँ की आबादी करीब 800 थी जो कि 1890 तक धीरे-धीरे घटकर 37 रह गई । यह प्रमाण बताता है कि पलायन एक रात में नहीं बल्कि कई दशकों में हुआ था। पलायन का मुख्य कारण काकनी नदी का सुखना था क्योंकि कुल धारा इसी नदी के तट पर बसा हुआ था जिसके कारण यहीं उनके जीवन यापन का मुख्य स्रोत थी।

2017 की भूकंप थ्योरी

2017 में जर्नल वैज्ञानिक और उनकी टीम का एक रिसर्च पेपर प्रकाशित हुआ। इस पेपर ने उनकी टीम ने खुलासा किया की कुल धारा और खाबा गांव के घरों की छतें, बीम और खंभे एक ही दिशा में गिरे हुए हैं , की एक विनाशकारी भूकंप का स्पष्ट प्रमाण है। संभव है कि अकाल और टैक्स से परेशान लोगों के घर जब भूकंप में ढह गए , तो बची आबादी ने उसी रात हमेशा के लिए इस जगह को छोड़ दिया।2018 में आई आई टी बाम्बे और कई शीर्ष विश्वविद्यालयों के वैज्ञानिकों ने रेडियो कार्बन डेटिंग और आधुनिक तकनीकों के जरिए इस गांव के मिट्टी के बर्तनों, अनाज और जली लकड़ियों के नमूनों की जांच शुरु की , ताकि तथ्यों को कहानियों से अलग किया जा सके।

डार्क टुरिज्म और भुतिया दांवों का सच

आज कूलधरा भारत के सबसे बड़े डार्क टूरिज्म स्थलों में से एक है। लोग यहां इतिहास से ज्यादा भूतों की कहानियों और पैरानार्मल गतिविधियों जैसे परछाई दिखना, कदमों की आवाजें, अचानक तापमान गिरना का अनुभव करने आते है। लेकिन मनोवैज्ञानिक सच की बात करें तो वैज्ञानिक और शोधकर्ताओं के अनुसार जब आप किसी वीरान सुनसान जगह पर यह सोचकर जाते है कि वह भुतिया है तो आपका दिमाग हवा की सरसराहट या किसी जानवर की परछाई को भी डरावना रुप दे देता है।

हमारे विचार से भी कुल धारा गांव सच में श्रापित  है किसी प्रेत आत्मा से नहीं बल्कि शापित था दीवान सालिम सिंह की क्रूरता से, प्राकृती के सुखे मिजाज से और एक विनाशकारी भूकंप से। आज यह गांव उस भूतिया टैग से शापित जो कि इसके निवासियों के महान विज्ञान अद्भुत जल इंजीनियरिंग, और आत्मसम्मान के लिए सब कुछ न्योछावर करने देने वाले गौरवशाली इतिहास को दबा रहा है। 

मंगलवार, 26 मई 2026

अष्टांग हृदय

ashtanga hridaya

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम आयुर्वेद विज्ञान के सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ अष्टांग ह्रदय के बारे में चर्चा करने जा रहे है आयुर्वेद विज्ञान के इस ग्रंथ के साथ ही हम अन्य महत्वपूर्ण ग्रंथों के बारे में भी जानेंगे। इसके साथ ही हम जानेंगे इस ग्रंथ का इतिहास तथा इसे किन ग्रंथों की छाया प्रति के रुप में सरलीकरण करके प्रस्तुत किया गया है। 

दोस्तों यह विषय इसलिए भी महत्वपूर्ण क्योंकि हाल ही में हमने और आपने कफ़ सिरप कांड के बारे से सुना होगा जिसमें लगभग 150 से अधिक नवजात बच्चों कि जाने चली गयीं। हमारे कहने का मतलब यह है कि हम एक ऐसे देश में रहते है जहां मौतें होने के बाद पता चलता है कि हमें यह दवा नहीं खानी है। सोच कर देखें तो जिन छोटे बच्चों का हम जान से भी ज्यादा ख्याल करते है उनकी जान एक दवा खाने से जा रही है और ऐसा भारत जैसे देश में ही नहीं अमेरिका जैसे विकसित देशों में भी हो रहा कोविड 19 की दवा के दौरान भी ऐसा हो चुका है कम्पनी पर अमेरिकन कोर्ट द्वारा भारी जुर्माना भी लगाया गया था।

मगर सोचकर देखीए इन दवाओं से जिन लोगों की जानें गयी क्या वो लोट कर सकते है नहीं तो ऐसे में हमें खुद से अपने ओर अपने चाहने वालों ख्याल रखना होगा सरकार के भरोसे पड़े रहने से कुछ नहीं होने वाला। हम सलाह देते है आयुर्वेद को अपनाईये हम ऐसा नहीं कहते है आयुर्वेद के नुकसान नहीं है मगर इसका शरीर पर धीरे धीरे असर पड़ता है जिसके कारण जान का खतरा कम रहता है समय से इलाज हो सकता है। रासायनिक सब्जीयों का इस्तेमाल कम करें तथा आर्गेनिक फलों तथा सब्जियों को खाना प्रारम्भ करें और स्वास्थ्य रहें।

इतिहास

यह ग्रंथ आयुर्वेद विज्ञान का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और कालजयी ग्रंथ है । इसकी रचना महर्षि वाग्भट्ठ द्वारा छठवीं तथा सातवीं शताब्दी के मध्य कालीन समय में की गई थी। आयुर्वेद के इतिहास में इसे वृहतत्रयी यानी तीन महान ग्रंथ संहिता सुश्रुत संहिता चरक संहिता तथा एक अज्ञात तीसरे ग्रंथ को समा योजित कर एक मुख्य ग्रंथ का रुप दिया गया है । जिसके कारण इस ग्रंथ को वृहतत्रयी भी कहा जाता है। आयुर्वेद के इतिहास में अष्टांग हृदय का आना एक क्रांतिकारी मोड़ था। सबसे पहले इसे आयुर्वेद के दो मुख्य रुपों में बांटा गया। प्रथम आत्रेय सम्प्रदाय तथा धन्वन्तरि सम्प्रदाय।

आत्रेय सम्प्रदाय
यह काया चिकित्सा विज्ञान पर आधारित है जिसे हम जनरल मेडीसिन के नाम से भी जानते है। इसे चिकित्सा के प्रमुख ग्रंथ चरक संहिता से लिया गया है।

धन्वन्तरि सम्प्रदाय
यह शल्य तन्त्र  पर आधारित है जिसे हम सर्जरी पर आधारित भी मानते है इसे सुश्रुत संहिता से लिया गया है।

यह दोनों ग्रंथ बहुत विशाल थे जिसके कारण आम चिकित्सकों के लिए दोनों का संपूर्ण अध्ययन करना और इन्हें याद रखना काफी कठिन था। ऋषि वाग्भट ने इस समस्या को समझते हुए चरक संहिता की चिकित्सा और सुश्रुत संहिता की शल्यक्रिया के सर्वोत्तम ज्ञान को समेटकर , इसे सरल और काव्यात्मक रुप में पिरोया। उन्होंने आयुर्वेद के आठ अंगों का सार निकालकर इस ग्रंथ की रचना की जिसके कारण इसका नाम आष्टांग हृदय पड़ा।


एक महत्वपूर्ण ग्रंथ क्यों है

इस ग्रंथ में आयुर्वेद के सभी आठ विभागों का ज्ञान एक ही जगह मिल जाता है जिन्हें हम क्रमबद्ध तरीके से नीचे प्रस्तुत कर रहे है
1.काय चिकित्सा जिसे हम जनरल मेडिसिन के नाम भी जानते है
2.बाल चिकित्सा जिसे हम कौमारभृत्य या paediatrics के नाम से भी जानते है।
3.ग्रह चिकित्सा इसे हम भूत विद्या यानी psychiatry or Spiritual healing के नाम से भी जानते है ।
4.ऊध्वाग चिकित्सा यानी शालाक्य तन्त्र य ENT and Ophthalmology को नाम से भी जानते है।
5.दृंष्ट्राचिकित्सा य अगदतन्त्र अथवा Toxicology के नाम से भी जानते है।
6.जरा चिकित्सा य रसायन या Geriatics Rejuvenation के नाम से भी जानते है।
7.वृष्यचिकित्सा य वाजीकरण Aphrodisiac therapy नाम से भी जानते है।
8.शल्य चिकित्सा जिसे हम surgery के रुप में भी जानते हैं।


ग्रंथ की संरचना

इस ग्रंथ में कुल 6 भाग तथा 120 अध्याय है इसमें आयुर्वेद के मूल सिद्धांतों दिनचर्या ऋतुचर्या आहार विहार और रोगों के कारण बताए गए है।
1.सूत्र स्थान 
इसके अन्तर गत सिद्धांत दिनचर्या ऋतुचर्या आहार विहार और रोगों के बारे में अध्याय 30  में बताया गया है।
2.सूत्र स्थान
अध्याय 6 के अन्तर गत मानव शरीर की रचना ,गर्भधारण और भ्रूण के विकास के बारे में जानकारी दी गई है।
3.निदान स्थान
अध्याय 16 को अंतर्गत रोगों के लक्षण उनके कारण और बीमारियों की पहचान के तरीके बताए गए हैं।
4. चिकित्सा स्थान
अध्याय 22 के अंतर्गत विभिन्न बीमारियों के नुस्खे दिए गए हैं।
5.कल्प सिद्धि स्थान
अध्याय 66 के अंतर्गत पंचकर्म वमन विरेचन और औषधियों कको बनाने की विधि बताई गई है।
6.अत्तर स्थान
इसमें बाल रोग, आंख कान नाक के रोग मानसिक रोग और विष विज्ञान के बारे में तथा इनकी शाखाओं का विस्तृत वर्णन किया गया है।

ग्रंथ की भाषा सरल और काव्यात्मक होना

चरक और सुश्रुत संहिता गद्य prose यानी जटिल भाषा में थी लेकिन वाग्भट ने अष्टांग हृदयम् के श्लोकों में लिखा। अतः छंद में होने के कारण इसके सिद्धांतों और जड़ी-बूटियों के फार्मूला को याद रखना चिकित्सकों के लिए बेहद आसान हो गया।

सूत्र स्थान

शुरुआती अध्याय में आयुर्वेद जगत में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इसमें दिनचर्या यानी डेली रुटीन ऋतुचर्या यानी सिज़नल रुटीन  आहार विहार और रोगों के मूल कारणों को इतनी सटीकता से समझाया गया है कि यदि कोई सामान्य व्यक्ति भी इसका पालन करे तो वे जल्दी बीमार न पड़े।
व्यावहारिक और संक्षिप्त
वाग्भट जी वे पुराने ग्रंथों की अति विस्तृत और दार्शनिक बातों को हटाकर सीधे उपचार और चिकित्सा पर ध्यान केंद्रित किया है इस ग्रंथ में । इस ग्रंथ में दी गई दवाओं योग आज भी सबसे ज्यादा प्रभावी और आसानी से तैयार होने वाले माने जाते है।

वैश्विक स्वीकारता

अष्टांग हृदयम् का महत्व केवल भारत तक सीमित नहीं रहा है इसका प्राचीन काल में ही अनुवाद तिब्बती अरबी फारसी और जर्मन जैसी भाषाओं में हो चुका है। तिब्बती चिकित्सा पद्धति पर तो इस ग्रंथ का बहुत गहरा असर है।

मंगलवार, 19 मई 2026

भोज शाला

bhojshala
प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम मध्य प्रदेश धार ज़िले में विद्दमान भोजशाला के बारे में बात करेंगे। इसके साथ ही राजा भोज तथा मंदिर के निर्माण के पीछे के रहस्य तथा वर्तमान समय में यह चर्चा का विषय क्यों बना हुआ है इस विषय पर बात करेंगे। हाल ही में समय में इंदौर हाई कोर्ट ने इस भोज शाला पर एक ऐतिहासिक फैसला दिया है इस फैसले के वर्तमान परिणामों के बारे में चर्चा करेंगे। यह विषय इस लिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह ए एस आई यानी आरकोलोजिकल सर्वे आप इण्डिया द्वारा संरक्षित किया गया है इसके साथ ही यह ऐतिहासिक पुरातत्व स्थल भी है।

भोज शाला

हिंदू समुदाय के लोगों का मानना था कि इस भोज शाला को परमार वंश के राजा भोज ने 11वीं शताब्दी में बनवाया था जिसे शारदा सदन के नाम से भी जाना जाता है। राजा भोज के समय काल में इस भोज शाला में संस्कृत भाषा का पठन पाठन किया जाता है इसे संस्कृत विश्वविद्यालय माना गया था। इसी भोज शाला में वाग्देवी का एक मंदिर भी था जिन्हें हम मां सरस्वती के नाम से भी जानते है। अतः इस मंदिर के कारण ही इस परिसर के शारदा सदन भी कहा जाता था। 

कालांतर में मुस्लिम शासक महमुद शाह खिलजी ने 1457 में शारदा सदन के तुड़वाकर वहां  मस्जिद का निर्माण करा दिया गया। समय अन्तराल के बाद इस मस्जिद में मौलाना कमालुद्दीन नामक मुस्लिम व्यक्ति आ कर रहने लग गये । जब कमालुद्दीन का निधन हो गया तब मुस्लिम मान्यताओं के अनुसार इस परिसर को मौलाना कमालुद्दीन की मस्जिद एवं उसके परिसर के नाम से जाना जाने लगा था। जिसके कारण यह विवाद कई वर्षों से उच्च न्यायालय में विचाराधीन था। उपरोक्त कारणों से यह हिन्दू- मुस्लिम विवाद का मुख्य कारण बना हुआ था।

हाई कोर्ट का फैसला

15 मई 2026 को यह ऐतिहासिक फैसला मध्य प्रदेश के उच्च न्यायालय की इंदौर खण्ड पीठ द्वारा सुनाया गया जिसमें न्यायालय ने कहा की यह वास्तव में राजा भोज द्वारा निर्मित भोज शाला ही है न की कोई मस्जिद। इस फैसले को सुनाने से पहले हाई कोर्ट की बैंच ने ए एस आई द्वारा क्षेत्र विशेष पर किए गए अध्ययन कि रिपोर्ट सौंपी थी जिसमें प्राचीन मंदिर के होने के साक्ष्य मिले थे। अतः कोर्ट का फैसला हिन्दू समाज के पक्ष में आया। अब वे इस परिसर में बिना रोक टोक के पुजा अर्चना कर सकते है। वर्तमान समय में देखा जाये तो ऐसे बहुत से स्थल विवाद पूर्ण हैं जिनमें से बहुत से स्थलों पर मुकदमा कोर्ट में विचाराधीन है।

सोर्स

15 मई 2026 को टाईम्स आफ इण्डिया ने इस फैसले का प्रकाशन अपनी रिपोर्ट में शीर्षक Bhojhsala complex is temple of goddess vag devi, Hindus have right to woship Madhya Pradesh high court के साथ प्रकाशित किया। इसके साथ ही इसका विडियों संस्करण जिसे 18 मई 2026 को प्रकाशित किया जिसमें परिसर में मां सरस्वती की नवीनतम मूर्ति स्थापना तथा पुजा अर्चना करते हुए दिखाया गया है।

17 मई 2026 को द हिन्दू पत्रिका ने भी शीर्षक Madhya Pradesh bhojshala case and the crack in the places of worship Act के नाम से प्रकाशित किया गया है। 
 

मंगलवार, 12 मई 2026

कुतुबमीनार

 
qutb minar
प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम कुतुबमीनार के इतिहास के बारे में चर्चा करेंगे यह विषय इस लिए भी महत्वपूर्ण क्योंकि आज तक हम यही जानते थे कि कुतुबमीनार का निर्माण कुतुबूद्दीन ऐबक ने कराया था मगर यह पूर्ण सच नहीं है क्योंकि इस मुस्लिम शासक ने सिर्फ इसकी मरम्मत करवाई थी। आज के इस लेख में हम कुतुबमीनार के इतिहास , विक्रमादित्य से इसके सम्बन्ध तथा इसके वास्तविक नाम के बारे में चर्चा करेंगे इसके साथ हम इसको बनाने के पीछे छुपे उद्देश्य को समझने की कोशिश करेंगे।

फिरोजशाह तुगलक

अपने प्रारम्भिक समय में कुतुबमीनार एक  चार मंज़िला इमारत थी जिसकी चौथी मंज़िल पर मंदिर का निर्माण कराया गया था अतः एक कट्टर मुस्लिम होने के नाते फिरोजशाह तुगलक ने इसकी चौथी मंज़िल को तुड़वा कर पुनः इसका निर्माण करवाया इनके साथ ही इसने पांचवीं मंज़िल का भी निर्माण करवा दिया। बताते चले कि फिरोजशाह तुगलक ने दिल्ली पर 1325 से लेकर 1351 तक शासन किया। इनके शासन काल के पहले दिल्ली पर इनरे चचेरे भाई मुहम्मद बिन तुगलक का शासन था। यह दिल्ली सल्तनत के तीसरे वंश से सम्बन्धित था। बताते चले कि दिल्ली सल्तनत पर पांच वंशों ने शासन किया जिनके नाम और समय कुछ इस प्रकार है। गुलाम वंश शासन काल 1206 से 1320 ई. तक 2 खिलजी वंश शासन काल 1290 से 1320 ई. तक 3 तुगलक वंश शासन काल 1320 से 1414 तक 4 सैयद वंश शासन काल 1414 से 1451 तक 5लोदी वंश शासन काल 1451 से 1526 तक। बताते चले दिल्ली पर सबसे लंबा शासन काल तुगलक वंश का ही रहा।
 

चन्द्रगुप्त द्वितीय

इनका शासन काल 380 ई से 415 ई तक का माना जाता है । इनके राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र थी मगर उज्जैन भी इनका मुख्य केन्द्र था। कुतुबमीनार की बात करें तो इसे चन्द्रगुप्त द्वतीय ने अपने दरबार के नौ रत्नों में से एक एवं महान खगोल शास्त्री वराह मीहिर के लिए बनवाया था। यह एक सुर्य वेधशाला थी। मगर चौथी मंज़िल पर विष्णु मंदिर होने के कारण कुछ विद्दवान इसे विष्णु स्तंभ भी कहते थे। 

प्रारम्भ में इस मिनार का प्रयोग खगोल विज्ञान के अध्ययन के लिए किया जाता था। इस बात का उल्लेख हमें हरिहार निवास द्विवेदी द्वारा रचित दो प्रसिद्ध पुस्तकों में मिलता है जिनका नाम दिल्ली के तोमर तथा ग्वालियर के तोमर है। बताते चले कि भारत में प्रचलित विक्रम संवत का निर्माण में भी इन्हीं के शासन काल में हुआ था।

तरीखे फिरोज़ शाही

इस किताब के लेखक का नाम सिराज अफिन है जो कि फिरोज़शाह तुगलक के राज दरबार का एक विद्वान था इसने अपनी किताब में लिखा की कुतुबमिनार की चौथी मंज़िल पर बिजली गिर जाने के कारण यह नष्ट हो गयी थी।
इबनेबतुता
यह एक विदेशी यात्री था जो कि मोहम्मद बीन तुगलक के शासन काल में भारत आया था। इसने अपनी किताब उलरहला में लिखा की कुतुबमीनार की चौथी मंज़िल पर सोने की घण्टीयां लगी हुई थी। जिसे ज़ाहिर है मुस्लिम शासन काल के दौरान इन्हें हटाया गया होगा।

कीर्ति स्तम्भ

यह स्तम्भ चितौड़ के दुर्ग के अन्दर राणा कुम्भा द्वारा निर्मित करवाया गया था। अगर आप वर्तमान समय में कुतुवमीनार के वास्तविक एवं प्राचीन रुप रेखा को देखना चाहते है तो यह स्तम्भ उसकी छाया प्रति है साथ में चौथी मंदिर पर विष्णु मंदिर का निर्माण हूबहू कुतुबमीनार के समान ही कराया गया था। 
लेख से सम्बन्धित कोई उल्लेख यदि आपको कहीं मिलता है तो ज़रुर साझा करें।
सोर्स विकीपिडीया,टेस्टबुक,क्योरा,दृष्टि आई ए एस,ईआर रिब्लिकेशन 

शनिवार, 4 अप्रैल 2026

हीनयान और महायान

hinayana and mahayana
 

 प्रस्तावना

बौद्ध धर्म विश्व के प्रमुख धर्मों में से एक है, जिसकी स्थापना गौतम बुद्ध ने 6वीं शताब्दी ईसा पूर्व में की थी उनके उपदेशों ने मानव जीवन के दुखों से मुक्ति पाने का मार्ग दिखाया समय के साथ बौद्ध धर्म में विभिन्न विचारधाराओं और परंपराओं का विकास हुआ, जिनमें से हीनयान Theravada और महायान Mahayana दो प्रमुख शाखाएँ हैं इन दोनों धाराओं में बुद्ध के उपदेशों की व्याख्या, साधना पद्धति और लक्ष्य में कुछ महत्वपूर्ण अंतर देखने को मिलते हैं इस लेख में हम इन दोनों धाराओं का विस्तृत अध्ययन करेंगे।

हीनयान Theravada क्या है

हीनयान का अर्थ होता है "छोटा वाहन" या "संकीर्ण मार्ग" हालांकि यह नाम महायान अनुयायियों द्वारा दिया गया था, इसलिए इसे कुछ हद तक आलोचनात्मक भी माना जाता है हीनयान को आज अधिकतर थेरवाद बौद्ध धर्म के नाम से जाना जाता हैयह बौद्ध धर्म की सबसे प्राचीन शाखा मानी जाती है, जो बुद्ध के मूल उपदेशों के अधिक निकट मानी जाती है यह परंपरा मुख्य रूप से श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड, लाओस और कंबोडिया में प्रचलित है।


 हीनयान की मुख्य विशेषताएँ


1. व्यक्तिगत मोक्ष पर जोर
   हीनयान परंपरा में व्यक्ति अपने प्रयासों से निर्वाण प्राप्त करता है इसमें आत्मसाधना और अनुशासन को अत्यधिक महत्व दिया जाता है।

2. अर्हत आदर्श
   इस परंपरा का मुख्य लक्ष्य अर्हत बनना है, यानी ऐसा व्यक्ति जिसने सभी इच्छाओं और बंधनों से मुक्ति पा ली हो।

3. पालि भाषा का उपयोग
   हीनयान के ग्रंथ पालि भाषा में लिखे गए हैं, जैसे त्रिपिटक।

4. संन्यास जीवन का महत्व
   इसमें भिक्षु जीवन को अत्यधिक महत्व दिया जाता है और आम जन की भूमिका अपेक्षाकृत सीमित होती है।

5. बुद्ध को मानव के रूप में देखना
   हीनयान में बुद्ध को एक महान शिक्षक और मानव के रूप में माना जाता है, न कि किसी देवता के रूप में।

महायान Mahayana क्या है

महायान का अर्थ होता है "महान वाहन" या "विस्तृत मार्ग" यह परंपरा हीनयान की तुलना में अधिक उदार और व्यापक मानी जाती है इसका विकास लगभग पहली शताब्दी ईस्वी में हुआ महायान परंपरा चीन, जापान, कोरिया, तिब्बत और वियतनाम में अधिक प्रचलित है।


 महायान की मुख्य विशेषताएँ


1. सर्वजन मोक्ष का सिद्धांत
   महायान में केवल व्यक्तिगत मोक्ष नहीं, बल्कि सभी प्राणियों की मुक्ति पर जोर दिया जाता है।

2. बोधिसत्त्व आदर्श
   महायान का मुख्य आदर्श बोधिसत्त्व है, जो स्वयं निर्वाण प्राप्त करने के बाद भी दूसरों की सहायता के लिए संसार में रहता है।

3. संस्कृत भाषा का प्रयोग
   महायान ग्रंथ मुख्यत  संस्कृत में लिखे गए हैं, जैसे प्रज्ञापारमिता सूत्र आदि।

4. भक्ति और पूजा का महत्व
   इसमें बुद्ध और बोधिसत्त्वों की पूजा, मूर्तिपूजा और भक्ति का महत्व बढ़ गया है।

5. बुद्ध को दिव्य रूप में देखना
   महायान में बुद्ध को एक दिव्य और अलौकिक शक्ति के रूप में भी माना जाता है।

हीनयान और महायान में अंतर


 आधार             हीनयान            महायान 
 अर्थ            छोटा वाहन            महान वाहन         
 उद्देश्य        व्यक्तिगत निर्वाण   सभी का उद्धार     
 आदर्श          अर्हत                  बोधिसत्त्व        
 भाषा             पालि                   संस्कृत           
 बुद्ध का
 स्वरूप         मानव शिक्षक       दिव्य रूप         
 पूजापद्धति   कम भक्ति           अधिक भक्ति        
 अनुयायी क्षेत्र  दक्षिणपूर्व एशिया  पूर्वी एशिया 

 ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

बौद्ध संगीति के दौरान बौद्ध धर्म में मतभेद उत्पन्न हुए विशेष रूप से चौथी बौद्ध संगीति के बाद बौद्ध धर्म दो प्रमुख धाराओं में विभाजित हो गया। हीनयान और महायान- महायान का उदय उन लोगों के बीच हुआ जो बौद्ध धर्म को अधिक सरल और जनसुलभ बनाना चाहते थे । उन्होंने पूजा, भक्ति और नए ग्रंथों को शामिल किया, जिससे आम जनता के लिए धर्म अधिक सुलभ हो गया।

दर्शन और सिद्धांत

हीनयान दर्शन
चार आर्य सत्य दुःख, दुःख का कारण, दुःख का निवारण, मार्ग अष्टांगिक मार्ग का पालन आत्मशुद्धि और ध्यान पर जोर।

महायान दर्शन
शून्यवाद सब कुछ शून्य है करुणा और दया का महत्व बोधिसत्त्व मार्ग समाज पर गहरा प्रभाव डाला।

हीनयान और महायान दोनों ने समाज पर गहरा प्रभाव डाला है।
हीनयान ने अनुशासन, सादगी और व्यक्तिगत साधना को बढ़ावा दिया।
महायान ने कला, मूर्तिकला और वास्तुकला को समृद्ध किया, जैसे बौद्ध स्तूप और मंदिर।
महायान के प्रभाव से बौद्ध धर्म अधिक लोकप्रिय हुआ और चीन तथा जापान में फैल गया।

वर्तमान स्थिति

आज के समय में- थेरवाद हीनयान श्रीलंका, थाईलैंड और म्यांमार में प्रमुख है महायान चीन, जापान और तिब्बत में प्रचलित है दोनों ही परंपराएँ आज भी बौद्ध धर्म के मूल सिद्धांतों-अहिंसा, करुणा और सत्य का पालन करते हैं।

निष्कर्ष

हीनयान और महायान, बौद्ध धर्म की दो महत्वपूर्ण शाखाएँ हैं, जो अलग-अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत करती हैं। जहां हीनयान व्यक्तिगत मोक्ष और अनुशासन पर जोर देता है, वहीं महायान सामूहिक कल्याण और करुणा को प्राथमिकता देता है दोनों ही धाराएँ अपनेअपने तरीके से मानव जीवन को बेहतर बनाने का मार्ग दिखाती हैं अंततः, इन दोनों परंपराओं का लक्ष्य एक ही है दुःखों से मुक्ति और शांति की प्राप्ति इनके बीच के अंतर केवल मार्ग और दृष्टिकोण के हैं, न कि अंतिम उद्देश्य के।

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2026

बौद्ध धर्म का पतन

baudh dharm ka patan

प्रस्तावना

भारत की प्राचीन धार्मिक परंपराओं में बौद्ध धर्म का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रहा है। बौद्ध धर्म की स्थापना गौतम बुद्ध ने 6वीं शताब्दी ईसा पूर्व में की थी। यह धर्म अहिंसा, करुणा,समानता और मध्यम मार्ग का संदेश देता है। मौर्य सम्राट अशोक के समय बौद्ध धर्म अपने चरम पर था और भारत से बाहर भी तेजी से फैल रहा था।

लेकिन समय के साथ भारत में बौद्ध धर्म का प्रभाव कम होता गया और अंततः यह लगभग लुप्त हो गया। आज यह प्रश्न महत्वपूर्ण है कि इतना महान और लोकप्रिय धर्म भारत में क्यों कमजोर पड़ गया। इस लेख में हम बौद्ध धर्म के पतन के कारण विस्तार से समझेंगे। 

लेख को प्रारम्भ करने से पहले हम अपने पाठकों को बताना चाहते है कि हम किसी भी धर्म का विरोध नही करते मगर हम इतना जरुर मान कर चलते है कि किसी धर्म में कोई खामी न हो यह विचार करने का विषय है क्योंकि प्रत्येक धर्म को किसी न किसी मनुष्य द्वारा ही बनाया गया है और मनुष्य गलतीयों को किये बिना कोई कार्य पूर्ण नही करता।
 
उदाहरण के लिए हम हिन्दू धर्म के देवता श्री राम जी को लेते है जिन्हे भगवान विष्णु का अवतार भी कहा जाता है। धर्म की मान्यता अनूसार कहा जाता है कि भगवान सब जानते है और हम सभी उस ईश्वर की संतान है और एक पिता अपनी संतान के साथ किसी भी तरह का भेद भाव नही कर सकता। लेकिन देखा जाये तो ये गलत है क्योंकि श्री राम ने यह भेदभाव किया है। उन्हें एक राजा के रुप में भी देखा जाये तब भी यह बात न्यायपुर्ण राजा के लिए उचित सिद्ध नही होती।

एक धोबी के कहने पर सीता जी को जंगल में भेजना किसी भी तरह से उचित न्याय नही हो सकता है। यह पुरे नारी समाज के लिए कंलक के समान था जीसकी भुक्त भोगी आज के समाज की स्त्रीयां भी हो रही हैं। हमारे विचार से किसी प्रति व्यक्ति द्वारा किये गये गलत क्रत्य के आधार पर पुरे समज को सजा देना किसी भी तरह से उचित न्याय नही है।

1.बौद्ध धर्म की आंतरिक कमजोरियाँ Internal Weaknesses

बौद्ध धर्म के पतन का सबसे बड़ा कारण इसकी अपनी आंतरिक समस्याएँ थीं।

1.संप्रदायों में विभाजन
समय के साथ बौद्ध धर्म दो प्रमुख शाखाओं में बंट गया। 1.हीनयान 2.महायान
इनके बीच विचारों का मतभेद बढ़ता गया। बाद में वज्रयान जैसे और संप्रदाय भी बने। इस विभाजन से धर्म की एकता कमजोर हो गई और आम जनता भ्रमित होने लगी।

2.अनुशासन में गिरावट
प्रारंभ में बौद्ध भिक्षु अत्यंत अनुशासित जीवन जीते थे, लेकिन बाद में मठों में विलासिता और भ्रष्टाचार बढ़ने लगा।इससे लोगों का विश्वास कम होने लगा।

ब्राह्मण धर्म का पुनरुत्थान

बौद्ध धर्म के पतन में ब्राह्मण धर्म हिंदू धर्म के पुनरुत्थान की भी बड़ी भूमिका रही।
1.भक्ति आंदोलन का प्रभाव- भक्ति आंदोलन के कारण लोगों को सरल पूजापद्धति और व्यक्तिगत ईश्वर की भक्ति का मार्ग मिला। इससे बौद्ध धर्म की तुलना में हिंदू धर्म अधिक आकर्षक लगने लगा।

2.बौद्ध विचारों का समावेश- हिंदू धर्म ने बौद्ध धर्म की कई शिक्षाओं को अपना लिया। यहाँ तक कि गौतम बुद्ध को विष्णु का अवतार माना जाने लगा। इससे बौद्ध धर्म की अलग पहचान कमजोर हो गई।

3.राजकीय संरक्षण का अभाव- बौद्ध धर्म के विकास में राजाओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा था।
1.अशोक के बाद बौद्ध धर्म को वैसा मजबूत संरक्षण नहीं मिला। अन्य राजाओं ने हिंदू धर्म को अधिक बढ़ावा दिया।
2.गुप्त काल में हिंदू धर्म का पुनरुत्थान हुआ और बौद्ध धर्म को कम समर्थन मिला। इससे इसका प्रभाव घटने लगा।

संस्कृत भाषा का प्रयोग

प्रारंभ में बौद्ध धर्म की शिक्षाएँ पाली भाषा में थीं,जो आम जनता के लिए सरल थी। लेकिन बाद में महायान संप्रदाय ने संस्कृत भाषा का उपयोग शुरू किया,जो कठिन थी और आम लोगों की समझ से बाहर थी। इससे बौद्ध धर्म जनसाधारण से दूर होता गया।

मठों की आर्थिक स्थिति

बौद्ध मठों की आर्थिक स्थिति भी पतन का एक बड़ा कारण बनी। मठों में धन और संपत्ति का संचय होने लगा, भिक्षु विलासिता में लिप्त हो गए। जनता से दूरी बढ़ने लगी इससे बौद्ध धर्म की सादगी और नैतिकता प्रभावित हुई।

विदेशी आक्रमण

विदेशी आक्रमणों ने बौद्ध धर्म को गहरा नुकसान पहुँचाया।
1.हूण आक्रमण-हूणों ने कई बौद्ध मठों और विश्वविद्यालयों को नष्ट कर दिया।
2.तुर्क और मुस्लिम आक्रमण-मध्यकाल में तुर्क आक्रमणकारियों ने बौद्ध संस्थानों को भारी क्षति पहुँचाई। विशेष रूप से नालंदा विश्वविद्यालय को नष्ट कर दिया गया, जो बौद्ध शिक्षा का प्रमुख केंद्र था। इससे बौद्ध धर्म की जड़ें कमजोर हो गईं।

बौद्ध धर्म का अत्यधिक दार्शनिक होना

समय के साथ बौद्ध धर्म अत्यधिक दार्शनिक और जटिल हो गया। आम जनता के लिए इसकी शिक्षाएँ कठिन हो गईं
साधारण लोग सरल धार्मिक मार्ग की ओर आकर्षित हुए इससे बौद्ध धर्म का जनाधार कम हो गया।

प्रतिस्पर्धा और अन्य धर्मों का प्रभाव

भारत में कई धर्मों और विचारधाराओं का विकास हुआ। हिंदू धर्म का पुनरुत्थान,जैन धर्म का प्रभाव बाद में इस्लाम का आगमन इन सभी ने बौद्ध धर्म को प्रतिस्पर्धा दी, जिससे इसका प्रभाव धीरे-धीरे कम होता गया।

सामाजिक कारण

1.जनता से दूरी-बौद्ध भिक्षु मठों में सीमित हो गए और आम जनता से उनका संपर्क कम हो गया।
2.जीवन शैली में बदलाव- समाज में बदलती जीवनशैली और आवश्यकताओं के कारण लोग नए धार्मिक मार्गों की ओर आकर्षित हुए।

नेतृत्व की कमी

समय के साथ बौद्ध धर्म में प्रभावशाली नेताओं की कमी हो गई। प्रारंभ में बुद्ध जैसे महान नेता थे बाद में वैसा नेतृत्व नहीं मिल पाया। इससे बौद्ध धर्म का प्रभाव कमजोर पड़ गया।

निष्कर्ष

बौद्ध धर्म का पतन एक जटिल प्रक्रिया थी, जिसमें कई आंतरिक और बाहरी कारण शामिल थे। संप्रदायों में विभाजन, अनुशासन में गिरावट, ब्राह्मण धर्म का पुनरुत्थान, राजकीय संरक्षण की कमी, विदेशी आक्रमण और सामाजिक बदलाव इन सभी ने मिलकर बौद्ध धर्म को कमजोर कर दिया।

हालांकि भारत में इसका पतन हुआ, लेकिन बौद्ध धर्म आज भी चीन, जापान, श्रीलंका और थाईलैंड जैसे देशों में अत्यंत प्रभावशाली है।अंततः, बौद्ध धर्म का इतिहास हमें यह सिखाता है कि किसी भी धर्म या विचारधारा की स्थिरता उसके मूल सिद्धांतों, अनुशासन और समय के साथ बदलाव की क्षमता पर निर्भर करती है।

बुधवार, 18 फ़रवरी 2026

व्रत य आटोफेजी

fasting

प्रस्तावना 

भारतीय संस्कृति में व्रत रखने का एक अलग ही धार्मिक महत्व है वैसे तो बहुत से लोग व्रत रखने को एक अंध विश्वास के नजर से देखते है, लेकिन बहुत ही कम लोग जानते होंगे की ऐसा करने से स्वास्थ्य लाभ भी होता है , क्योंकि यह आयुर्वेद विज्ञान से जुड़ा हुआ है । हम इस बात का दावा नहीं करते बल्कि जापानी वैज्ञानिक जोशि नूरी आस्मी का मानना है। इस शोध के लिए उन्हें वर्ष 2016 में मेडिसिन विज्ञान के नोबल पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया है। इस लेख के माध्य से हम यह जानने कि कोशिश करेंगे कि व्रत के दौरान हमारे शरीर में क्या अभिक्रिया होती है और कैसे यह हमारे लिए लाभकारी है । इसके साथ ही हम इस विषय पर भी चर्चा करेंगे के व्रत को दौरान हमें किन-किन सावधानियों पर ध्यान देना चाहिए।.

व्रत 

व्रत क्या है इसका शाब्दिक अर्थ समझें तो हमें पता चलता है कि यह संस्कृत भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है संकल्प य प्रतिज्ञा लेना। जिसमें व्यक्ति किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए भोजन व अन्य सुख-सुविधाओं का त्याग करता है। दुनिया की अलग -अलग भाषाओं में इसे अलग-2 नामों से जाना जाता है। ग्रिक भाषा में इसे आटोफेजी कहते है जिसका अर्थ है खुद को ही खाना। दरअसल व्रत के दौरान हमारा शरीर इसी प्रक्रिया को दुहराता है। व्रत के दौरान हमारा शरीर फैट को कम करने के साथ-साथ नए इम्यून सिस्टम को भी बनाता है जिससे हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास होता है। वर्तमान समय में हम देखते है कि हर प्रकार के भोजन में मिलावट होने लगी है इसके साथ ही अनिद्रा, मधुमेह, तनाव जैसी बीमारियों से प्रत्येक सातवां व्यक्ति ग्रसित है और इन सभी बीमारियों  से भी छुटकारा पाने के लिए हम रासायनिक दवा का इस्तेमाल करते है जिनको अधिक मात्रा में लेने से हम किसी अन्य बीमारी का शिकार हो जाते है ।  तब हमें एक अच्छा डाक्टर भी यही सलाह देता है कि सुबह व्यायाम करिये , हफ्ते में एक बार व्रत रखिये , मिलावटी समान से परहेज करें । दुःख कि बात दोस्तों यहां यह है कि तब तक बहुत देर हो चुकी होती है  क्योंकि हमारा शरीर तब तक बीमारियों कि गिरफ्त में आ चुका होता है। ‌‌

उपाय

अब जबकि हम पहले से ही जानते है कि प्रत्येक समान में मिलावट हो रही है तो क्यों न हम भी अपने शरीर को उसी प्रकार ढाल ले ताकि हमारा शरीर इनसे होने वाले नुकसान य हानि को आसानी से सह सके और हम बड़ी शारीरिक हानि से बच सके।. दोस्तों व्रत रखना एक अच्छी आदत हो सकती है क्योंकि यह प्रण लेने या खुद से वादा करने जैसा ही है । क्योंकि यह हमारे किसी भी  लक्ष्य को हासिल करने के इरादे य आत्मविश्वास को मजबूती प्रदान करता है । कुछ लोगों का दवा तो यह भी है कि व्रत(fasting) कैंसर जैसी घातक बीमारियों को भी ठीक कर सकता है। हलांकि यह मिथक है जिसे हम नहीं मानते। मगर हम इस बात को भी नहीं झुठलाते है कि व्रत रखने से हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है सो इस प्रकार कुछ हद तक लाभ तो होता है, शरीर पहले से ज्यादा स्वस्थ लगने लगता है मगर कैंसर जैसी बीमारी से लड़ने के लिए डाक्टर कि देख रेख में दवा लेना आवश्यक है।.

उपवास के दौरान शरीर में होनी वाली आन्तरीक अभिक्रिया

उपवास य व्रत के दौरान जब हम कुछ नहीं खाते है तो हमारा शरीर को बाहर से ऊर्जा नहीं मिलनी बंद हो जाती है । जिसके कारण शरीर ऊर्जा के लिए  अंदर जमें हुए कचरे य वेस्ट पर निर्भर  रहता है।  अतः शरीर अपने द्वारा जमा किए गये वेस्ट तो ई़धन की तरह इस्तेमाल करता है य उसी को खाने लगता है।. दुसरी भाषा में जब हम खाना बंद करते है तब हमारा शरीर में एक रासायनिक अभीक्रिया होती है दरअसल अमतौर पर जब हम खाना खाते है तो उसमें से ग्लूकोज खतम हो जाता है तब शरीर हमारे शरीर में जमें फैट को बर्न करना शुरु करता है । अतः इस प्रक्रिया के दौरान हमारे शरीर में किटोंस का निर्माण होता है। ये किटोंस हमारे शरीर के लिए सुपर फुड का काम करता है।
उदाहरण के लिए समझें ग्लूकोज को पेट्रोल समझें और किटोंस को हाइड्रोजन समझें। अब अगर अपकों अन्तर पता होना चाहिए कि एक लीटर पेट्रोल 28 किलोमीटर की माइलेज देता है वहीं हाइड्रोजन एक लीटर में 1000 किलो मीटर कि माइलेज देता है । मशहुर वैज्ञानिक जोशी नूरी आस्मी ने फास्टींग को कयी अलग-अलग स्टेज में विभाजित करते हुए 5 दिनों में विभाजित किया है।

1 पहले दिन में शरीर लीवर औऱ मांसपेशीयों में जमें ग्लाइकोजन का इस्तेमाल करता है खास बात यह कि ग्लाइकोजन के हमारे शरीर के हर छोटे कण के साथ स्टोर होता है। जिसके कारण हमें व्रत के दौरान ज्यादा प्यास लगती है। इसी कारण से प्रारम्भ में हमारा वज़न तेजी से घटता है इसके अलावा फास्टींग के दौरान इंसुलिन का स्तर भी बहुत तेजी से नीचे गिरता है। इसके बाद शरीर अपने अंदर जमी वसा का इस्तेमाल ईधन के रुप में करना प्रारम्भ करता है ।

2. दुसरे दिन हमारा शरीर डीप किटोसिस में चली जाती है यानी गहरी सफाई अभियान प्रारम्भ होता है । इस दौरान हमारे मस्तिष्क में ब्रेन डेराईव़़ड न्यूरो्ट्रॅफिक फैक्टर का लेवल भी बढ़ता है। यह एक ऐसा प्रोटीन माना जाता है जो नये न्यूरान्स को बनाने में मदद करता है। इसकी खास बात यह है कि इस समय के दौरान लोग मेटल क्लेरिटी और खुद को फोक्स महसूस कर सकते है। क्योंकि यह हमारी याददाशत को मजबूत बनाता है।

3. तीसरे दिन मांसपेशीयों का सिकुडना प्रारम्भ होता है खास बात यह है कि हमारा शरीर मांसपेशीयों को ऊर्जा के लिए जलाना प्रारम्भ करता है मगर इससे नई तथा मजबूत मांसपेशीयों का विकास भी होता है। यह हार्मोन हमारी मांसपेशीयों के टिशुस व अणुओं को टूटने से भी बचाता है।
4. चौथे दिन के दौरान हमारे शरीर कि पहली प्रथमिकता जमें हुए फैट और सेल्युलर जंक को साफ करने की होती है।
5.पांचवे दिन हमारा शरीर फैट बर्निंग मशीन बन जाता है तब हमें भूख भी कम लगती है क्योंकि शरीर में जमें फैट से ही ऊर्जा बनाने लगता है। इस समय को दौरान हमारे शरीर में लम्बी उम्र से जूड़े जिन्स भी सक्रिय हो जाते है।

व्रत कि समाप्ति य प्रारम्भ से पहले इन बातों का ध्यान रखें

 1.अगर आप हाल ही में किसी बड़ी बिमारी से ठिक हुए है या किसी प्रकार के आपरेशन य सर्जरी से गुजरे हो तो उसके तीन महीनों तक आपको व्रत नहीं रखना चाहिए इसके अलावा व्रत डाक्टर कि सलाह अनुसार ही रखें यह बहुत आवश्यक है।
 2. किसी बात कि चिंता लेकर व्रत न रखे इससे लाभ की अपेक्षा हानि हो सकती है व्रत के दौरान मन शांत रखें।
 3.व्रत के बाद जब हम भोजन लेना से प्रारम्भ करते है तो यह बहुत ही खास समय होता है इस समय विटामिन और कैल्शीयम युक्त पौषटीक भोजन ही लेना चाहिए। क्योंकि अगर हन ऐसा नहीं करते तो व्रत रखने का कोई फायदा नहीं होने वाला । दरअसल शरीर व्रत के दौरान हमारी पुरानी कोशीकाओं को तोड़ देता है और नई मजबूत कोशिकाओं का निर्माण होता है ऐसे में  अगर हम फिर से अपने शरीर में कचरा डालेंगे तो नई कोशिका स्वस्थ होंगी इसकी कोई गरेंटी नहीं है। भोजन में उबले अण्डे ,दुध ,फल ,हरी सब्जियों का सेवन करें चिनी तथा रिफाइन से बनी चिज़ों से परहेज करें ।.
4. व्रत हर कोई नहीं रख सकता जैसे कि गर्भवती महिलाएं ,मधुमेह के रोगी ,किसी भी बीमारी से पि़ड़ित व्यक्ति य जिसे खाने कि समस्या हो या जो पूरा भोजन नहीं लेते य फिर जिनका वजन कम हो, य फिर लम्बाई के हिसाब से बजन सही न हो।.

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बुधवार, 14 जनवरी 2026

लोहड़ी का त्यौहार

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प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम लोहड़ी के त्यौहार और इसे पीछे छिपे संकृतिक महत्व और इस त्यौहार को मनाये जानें के शुरवाती कारणों को जानेंगे। क्योंकि जिस प्रकार से रक्षा बन्धन का त्यौहार हिंदू धर्म में बड़ी धूम धाम से मनाया जाता है ठीक उसी प्रकार से यह त्यौहार सिख धर्म मे बड़ी धूम धाम से मनाया जाता हैं। हालांकि यह त्यौहार भाई बहन के रिश्तें से संबंधित नही हैं। जबकि उससे भी बड़े रिश्ते यानि हमारे संरक्षक कर्ता या हमारे प्रोटेक्टर को समर्पित हैं।.

शुरुआत की कहानी

पंजाब में लोहड़ी का त्यौहार सुंदरी और मुंदरि नाम की दो बहनों और उन्हें बचाने वाले लोक नायक दुल्ला भट्टी की याद में मनाया जाता हैं।ये दोनों बहने पंजाब के एक गरीब किसान सुंदर दास की बेटियां थी। सोलहवीं शताब्दी के समय काल में पंजाब में एक क्रूर मुगल शासक का राज था। उस समय काल में मुस्लिम अपने धर्म को छोड़ कर बाकी के सभी धर्मों को मनाने वाले लोगों को काफिर कहते थे। काफिर को मरना शोषण करना, हत्त्या करना ये आम बात थी। अतः एक मुगल सूबेदार सुन्दर दास की दोनों बेटियों को अपने हरम में ले जाना चाहता था।

सुंदर दास जनता था हरम मे उसकी बेटियों के साथ बहोत ही बुरा बर्ताव होगा। गाँव का मुखिया जिसे नंबरदार उस समय कहा  जाता था उसने भी सुंदर दास की कोई मदद नहीं की।  उल्टा नंबरदार ने खुद गरीब किसान पे दबाव बनाना शुरू कर दिया की वो मुगल सुबेदार का कहा माने। हार कर सुंदर दास अपने गाँव के सहयोगी मित्र दुल्ला भट्टी वाले के पास गया और मदद की गुहार लगाई। हालांकि दुल्ला भट्टी वाला भी एक गरीब किसान हि था। मगर बंदे में हिम्मत बोहत थी गलत होता न वो देख सकता था और न किसी को किसी के साथ गलत करने देता था।. 

अतः दुल्ला भट्टी वाला तुरन्त मदद करने को तैयार हो गया। सुंदर दास की हिम्मत बढ़ा कर उसे घर भेजा और अपने नंबरदार के खेतों की तरफ चला गया और सारे खेतों मे आग लगा दी। देखने वालों ने जब विरोध किया तो दुल्ला भट्टी वाले ने सबको बताया ये नंबरदार खाता हमारी है और गाता मुगलों की हैं। इसके साथ ही दुल्ला भट्टी वाले ने नंबरदार पर किसान सुंदर दास की बेटियों को हरम मे भेजने का दबाव बनाने का आरोप लगाया।. सारे गाँव ने जब ये जाना तो सब  नंबरदार के खिलाफ करवाई की माँग के लिए एक जुट हुए।.

नंबरदार

नंबर दार को जब अपने खेतों और किसानों के एक जुट होने की बात का पता चला तो वो मुगल सूबेदार के पास गया और बातों को बढ़ा चढ़ा के बताया। जिससे सुबेदार गुस्से मे आ गया और उसने तुरन्त सुंदरी और मुंदरि को और किसान सुन्दर दास को पकड़ के लाने का आदेश दिया इसके साथ ही सूबेदार ने ये भी कहा जो कोई भी उनको रोकने की कोशिश करे उसे मार दिया जाए और उनकी भी बहु बेटियों को हरम मे लाया जाये साथ ही साथ उनके घर को आग लगा दी जाये।.

सूबेदार के सिपाही गाँव में आये सुंदरी और मुंदरि को जबरन अपने साथ ले जाने लगे, किसान सुंदर दास के विरोध करने पर उसे जान से मार दिया गया और उसके घर को आग लगा दी गयी। अब सुंदरी, मुंदरि मजबूरी में सिपाहियों के साथ चल दीं क्योंकि न तो अब घर बचा था और न ही पिता। गाँव का कोई भी बन्दा उनकी मदत के लिए आगे न आया क्योंकि उन्हें अपने परिवार की सुरक्षा का डर था और सुन्दर दास को मरा देख लोग और भी डर गये। हालांकि गाँव के बोहत से लोग गुप्त तरीके से दोनों बहनों की मदद करना चाहते थे जिनमें से किसी एक ने दुल्ला भट्टी वाले को इस घटना की खबर दी।

दुल्ला भट्टी वाला अपने सहयोगियों के साथ मिलकर, जंगल के रास्ते जा रहे सिपाहियों पर हमला किया और सुंदरी, मुंदरि की जान बचायी। साथ ही साथ दोनों बहनों की उनकी पसंद के लड़कों से उनकी शादी करा दी। दुल्ला भट्टी वाले के पास अपनी बेटियों को दहेज मे देने को कुछ न था। बेचारे ने अपनी अपनी शाल फाड़ के उसमें शक्कर बाँध के दोनों को दी और उन्हें विदा किया। 

दोस्तों तब से आज तक ये त्यौहार दुल्ला भट्टी की बहादुरी उनके समर्पण को याद रखने के लिए हर साल मनाया जाता हैं। तब ये  लोकगीत पूरे पंजाब मे प्रचलित हैं। 
सुंदर, मुंदरिये होए, 
तेरा कौन विचार होए, 
दुल्ला भट्टी वाला होए, 
दुल्ले दी धी व्याही होए, 
सेर शक्कर पाई होए। 
दुल्ला भट्टी वाले की ये कहानी नारी सम्मान और अन्याय के खिलाफ खड़े होने का प्रतीक बन गई। जिस कारण हर साल लोहड़ी का त्यौहार आग जलाकर आग में मुम्फली , गचक, रेवड़ियों और पॉपकॉर्न चढ़ा कर मनाया जाता हैं। खास कर जिस घर ने नयी- नयी शादी हुई रहती हैं उस घर मे और भी धूम धाम से इस त्यौहार को मनाया जाता हैं। 
सोर्स indiatv.In , timesnewhindi.com, विकिपीडिया

रविवार, 22 जून 2025

भारत में मंदिरों का इतिहास

temple-in-india

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम पूरे भारत वर्ष में पाये जाने वाले मंदिरों के बारे में चर्चा करेंगे तथा इसके साथ ही इससे सम्बधित महत्वपुर्ण तथ्यों के बारे में चर्चा करेंगे।. दोस्तों इस लेख में किसी मंदिर विशेष की चर्चा न करते हुए  सम्पूर्ण भारत में पाये जाने वाले मंदिरों के निर्माण के पिछे के मुख्य कारणों पर चर्चा कि गयी है। भारतीय मंदिरों की विशेषताओं को गहनता से अध्ययन करने के लिए हमने इन्हें दो भागों में विभाजित किया है। जैसे दक्षिण भारतीय मंदिर तथा उत्तर भारतीय मंदिर। भारत में बने मंदिरों के निर्माण में नागर शैली, द्राविड़ शैली, वैसर शैली का प्रयोग किया गया है। उत्तर भारत में पाये जाने वाले मंदिर में नागर शैली का प्रयोग किया गया है वहीं दक्षिण भारत में पाये जाने वाले मंदिर में द्राविड़ शैली का प्रयोग किया गया है।

मंदिरों के बारे में महत्वपूर्ण तथ्य 

1.सबसे प्राचीन मंदिर का निर्माण वैसर शैली में हुआ है।
2.प्राचीन काल में मंदिर पूरे शहर या नगर का ईकोनामिक हब हुआ करते थे. यानी पहले मंदिर का निर्माण किया जाता था फिर उसके बाद उसके अगल- बगल शहर य नगरों को बसाया जाता था।
3.प्राचीन काल में दो पक्षों के बीच न्याय करने के लिए मंदिरों के साक्षी मानकर निर्णय लिया जाता था ताकि दो पक्ष बिना किसी भेद-भाव एवं बैर के एक साथ रह सकें। आपको जानकर हैरानी होगी की आज भी हमारी न्याय व्यवस्था सुलह कराने तथा समझौता कराने कि कोई अवधारणा नहीं है। भारतीय संविधान प्रक्रिया अपराध होने के बाद दण्ड निर्धारण का कार्य  करती है।
4.जिस प्रकार भवन निर्माण के लिए वास्तुशास्त्र के नियमों का पालन करना अनिवार्य है ठीक उसी प्रकार मंदिर निर्माण में चार पुरुषार्थ का होना अति आवश्यक है जिन्हें हम इस प्रकार जानते है 1 धर्म   2 अर्थ  3 काम  4 मोक्ष आदि।

मंदिरों का इतिहास

मंदिर निर्माण के इतिहास के बारे में जानने के लिए समय- समय पर हुयी खुदायी के दौरान मिलो साक्ष्यों का सहारा लिया गया है। वैज्ञानिकों ने वास्तु के आधार पर मंदिर निर्माण कार्य को 1500 - 1600 ईसा0 पूर्व का बताया है। वहीं शिल्पकला के मिले साक्ष्यों के आधार पर इसे लगभग 2100 ईसा पू0 का बताया है। वहीं खुदाई के दौरान मिले सिक्कों के आधार पर मंदिरों के निर्माण का कार्य 2500 ईसा पू0 आरम्भ हो गया था। वहीं महाभारत जैसे खण्ड काव्य के आधार पर मंदिर निर्माण का प्रारम्भिक समय 3500 ईसा पू0 का बताया गया है। महाभारत में मंदिर शब्द के स्थान पर देवालय शब्द का प्रयोग किया गया है ।

D N झां ने अपनी मंदिरों के ऊपर लिखी किताब में मूर्ति प्रभाव को दिखाया। उनके किताब के अनुसार समय -समय के साथ मूर्ति निर्माण में किए गए सुधारों से इसका अनुमान लगाया है कि वे कितनी प्राचीन हो सकती है। इसके अलावा ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर यह पता लगाया गया है कि वैदिक काल में मंदिरों का प्रचलन नहीं था। पहले ग्रंथों का निर्माण हुआ , उसके बाद मंदिरों का प्रचलन प्रारम्भ हुआ ।.

आर्य शास्त्रों के प्राचीन ग्रंथों में हमें देखने को मिलता है कि हर व्यक्ति विशेष को मंदिर जाने का अधिकार प्राप्त था। शूद्र लोगों तथा उनके मंदिर प्रवेश को वर्जित रखने जैसे तथ्य प्राचीन ग्रंथों में नहीं मिलते है।

कुछ समय बाद जब गौतम बुद्ध अथवा बौद्ध धर्म जब भारत आया तो उन्होंने मंदिरों का निर्माण तो नहीं किया ,मगर बुद्ध प्रतिमाओं को पहाड़ों पर उकेरना प्रारम्भ किया। उसके बाद से मंदिरों का निर्माण कार्य तेज़ी से प्रारम्भ हुआ। इसके बाद से सनातन धर्म ने बौद्ध धर्म को बहुत पीछे छोड़ दिया।.

आचार्य चाणाक्य की किताब अर्थ के चौथे संस्करण में हमें भवन निर्माण  के लेकर एक महत्वपूर्ण लाइन पढ़ने को मिलती है कि आंगन भले ही गोपनीय हो मगर अग्नि स्थान (मंदिर) सभी लोगों के लिए हमेशा खुला होना चाहिए । यानी यहां कोई भी आकर पुजा करने में सक्षम हो। हालाँकि साक्ष्यों के आधार पर मूर्ति के बारे में कोई चर्चा नहीं मिलती है, इसके स्थान पर यज्ञ वेदि ,अग्नि आदि की चर्चा मिलती है।

अन्य महत्वपूर्ण साक्ष्य 

चित्तौड़गढ़ का हाथी बाडा मंदिर यहां ब्रह्मि लिपि में लिखा है कि ( पुज्यशीला प्रकारा नारायण ) जो कि A.S.I द्वारा अनुमानित किया गया है कि 22000 वर्ष पुराना है।
सिंधु घाटी सभ्यता में हमें 2200 ईसा0 पू0 का शिवलिंग प्राप्त हुआ है।.

मंदिर शब्द की उत्पत्ति
मंदिर शब्द का उल्लेख सर्वप्रथम दो ग्रंथों में मिलता है। 1. मानस उल्लास 2. समरांगण । इनसे पहले हमें मंदिर के स्थान पर देवालय, चैत्य , चेत्यवृक्ष का उल्लेख मिलता है। मंदिर की संरचना मानव शरीर के प्रस्तुत करती है, यहां जो आत्मा है वो भगवान है।
उत्तर भारत यानी नागर शैली में बने मंदिर खड़े मानव की रुप रेखा प्रस्तुत करते है वहीं दक्षिण भारत यानी द्राविड़ शैली में बने मंदिर सोये हुए मानव को प्रस्तुत करते है। उपरोक्त तथ्यों कि जानकारी का विश्लेषण करने के लिए आप श्री राम-कृष्ण कंगला की लिखी किताब Interpretation of Hindu Temple तथा Temple heritage of India को पढ़ सकते है।.श्री राम-कृष्ण कंगला  IITM Gwalior में सहायक प्राध्यापक रह चुके है , इसके साथ ही वे विशेषज्ञ Hindi Temple Architecture and sonography एवं लेखक है।.

नव मंदिर निर्माण के महत्वपूर्ण तथ्य 

1. हर मंदिर में सप्त सिंधु का स्थान होता है ,किले के सामान ही सप्त लोकसदन को भी माना जाता है अंतिम लोकस में भगवान होते है ,इन्हें विग्रह भी कहा जाता है। उदाहरण उड़ीसा का ओरछा चतुर्भुज मंदिर इसके साथ ही बुदेंला साम्राज्य द्वारा निर्मित लक्ष्मण मंदिर है।

2. मंदिर के शिखर पर एक कलश रहता है जो खोखला होता है जिसमें नैवेद्ययम य नवग्रह के रुप में पदार्थ रहता है। इसे मंदिर का बीज भी कहते है , इस कलश के ऊपर रखे पत्थर को बीज पूर्वक कहते है।
ठीक इसी प्रकार दूसरा कलश मंदिर के नीचे ,प्रधान मूर्ति के नीचे और शिखर कलश के ठीक नीचे रहता है । इसमें भी नवग्रह को रखा जाता है।

3. मंदिरों के अत्यधिक विश्लेषण के लिए हमें द्राविड शैली और नागर शैली को समझना होगा।
नागर शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा के नगर शब्द से हुयी है नगर शब्द का अर्थ होता है शहर यानी नागर शब्द का अर्थ हुआ नगरवासी।. ठीक इसी प्रकार द्राविड शब्द को संस्कृत भाषा के त्रावीत शब्द से लिया गया है जिसका अर्थ है तीन सागरों का मिलन 1 अरब सागर 2 हिन्द महासागर 3.बंगाली की खाडी का सागर।
नागर शैली में बने मंदिरों में शिखर य टॅावर का निर्माण किया जाता है ,वहीं द्राविड शैली में बने मंदिरों का निर्माण पिरामिड की तरह किया जाता है।
नागर शैली में प्राक्रम य कन्पाउन्ड नहीं दिखता है वहीं,द्राविड शैली में प्राक्रम दिखता है।
नागर शैली में मिरु पर्वत की पहचान के लिए शिखरों के समूह बनाये जाते है वहीं, द्राविड शैली में मंदिर का निर्माण मिरु पर्वत पर चढ़ने के समान किया जाता है। मिरु पर्वत को ज्ञान का प्रतीक माना गया है।.

मंगलवार, 25 मार्च 2025

शब्द शक्ति

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प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम शब्द शक्ति के बारे में बात करने जा रहे है। हमारे शास्त्रों एवं ग्रंथों में इनका महत्वपूर्ण स्थान है, आप ये कह सकते  है कि प्रत्येक मंत्र एवं ग्रंथ बिना शब्दों के संयोजन से  पुर्ण हो ही नहीं सकता।. अतः प्रत्येक शब्द में स्वयं की उच्चारण शक्ति होती है,जो हमारे क्षेत्र विशेष को प्रभावित करती है।. इस तथ्य को प्रमाणीकरण के लिए जापानी वैज्ञानिक Dr. Masaru Emoto की 1990 की रिसर्च Massages From Water पर प्रकाश डालेंगे।.

शब्दों का महत्व

दोस्तों अकसर हमने देखा होगा कि, घर में अपशब्द कहने पर या गाली जैसे शब्दों का प्रयोग करने पर रोक लगायी जाती है। प्रारम्भिक समय में हमें यह ही समझ आता था कि ऐसा करने पर परिवार के हमसे छोटे सदस्य भी इन शब्दों का प्रयोग करना सिख जायेंगे, मगर अब जाकर यह समझ आया कि यह हमारे सीखने की प्रक्रिया को ही नहीं , हमारी मानसिक और शारीरिक संरचना को भी प्रभावित करता है। जिसके नतीजे हमें भविष्य में भुगतने पड़ते है।

इस बात को एक उदाहरण से समझते है- अकसर हमारे घर में य समाज में पुजा-पाठ य हवन आदि के लिए पण्डित को आमंत्रित किया जाता है, मुख्य तौर पर नये गृह प्रवेश के लिए य नये रोजगार के उद्घाटन समारोह के लिए। दोस्तों हवन आदि कराने का मु्ख्य उद्देश्य सुख-शांति से होता है। मंत्रों के उच्चारण द्वारा उस क्षेत्र विशेष की आ बो -हवा को पवित्र किया जाता है तथा नकारात्मक ऊर्जा को दूर भगाया जाता है। अतः उपरोक्त आयोजनों में पण्डित द्वारा गलत मंत्रों का उच्चारण किया जाता है तो क्या होगा।. तो इसका सामान्य सा अर्थ है कि जैसे सही उच्चारण से सकारात्मक ऊर्जा का विकास होता है,वहीं गलत उच्चारण पर नकारात्मक ऊर्जा का विकास होगा।.

एक अन्य उदाहरण से देखें तो जिस प्रकार दिन के साथ रात है, सच के साथ झूठ है,सुबह के साथ शाम है उसी प्रकार सकारात्मक के साथ नकारात्मक साथ-साथ चलती है यह प्रकृति का नियम है। अतः नकारात्मक एवं सकारात्मक ऊर्जा के जागृति करने में शब्दों का विशेष महत्व है।.देस्तों शब्द शक्ति को जो लोग अभी भी कुछ नहीं समझते उनके लिए जापानी वैज्ञानिक Masaru Emoto खोज एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इस वैज्ञानिक ने अपनी रिसर्च Massages From water से यह प्रमाणित किया की, शब्द शक्ति हमारे जीवन में क्या प्रभाव डालती है।.

Dr.Masaru Emotu

इनका जन्म 22 जुलाई 1943 में जापान के योकोहामा में हुआ था। इन्होंने दावा किया कि पानी हमारी वास्तविकता का खाका है, इन्होंने कहा कि भावनात्मक ऊर्जा यानी जो हम वर्तमान समय में सोचते है और बोलते है तथा कंपन पानी की भौतिक संरचना को बदल सकती है। इन्होंने जल क्रिस्टल प्रोग्राम में विभिन्न शब्दों,चित्रों व संगितों के लिए गिलास में रखे पानी द्वारा उजागिर करके दिखाना तथा पानी को जमा कर उसकी सूक्ष्म फोटोग्राफी द्वारा बर्फ सौन्दर्य गुणों की जांच करना शामिल था।.

उन्होंने यह भी बताया कि इस प्रकार के पानी को पराबैंगनी प्रकाश तथा कुछ विद्युत चुम्बकीय तरंगों के संपर्क में लाकर इन परिवर्तनों को समाप्त भी किया जा सकता है।.

पानी में चावल का प्रयोग

इस प्रयोग को करने के लिए उन्होंने पानी के तीन गिलास को लिए, जिसमें सामान्य मात्रा में चावल को डाला गया उसके बाद गिलास को पानी से भर दिया गया। उसके पश्चात इन गिलासों के तीन अलग-अलग स्थानों पर रखा गया। मासारु मोटो रोज इन तीनो गिलास के पास जाते, पहले गिलास के पास जाने के बाद उसका  धन्यवाद करते, दूसरे गिलास के पास जाकर उसे अपशब्द अथवा गाली देते इसी प्रकार तीसरे गिलास के पास जाकर उसे देख कर चले आते। इस प्रकार उन्होंने लगातार 30 दिनों तक किया। तीसवें दिन परिणाम यह निकला कि पहले गिलास का चावल अंकुरित होने लगा, वहीं दूसरे गिलास का चावल काला पड़ गया, और अंतिम गिलास के चावल सड़ गयें।.

इस शोध के कई संस्करण 1999 में उनके द्वारा प्रकाशित किये गये । इस सभी शोध प्रक्रिया को Massages From water नामक शीर्षक की पत्रिका में प्रकाशित किया गया जो अपने समय काल में अत्यधिक बेची जाने वाली पत्रिका का खिताब हासिल करती थी।. दोस्तों इस शोध को किए लगभग 26 साल से अधिक का समय बीत चुका है मगर यह आज भी उतना ही महत्व रखती है जितना तब रखती थीं।.

मस्तिष्क हमारे शरीर का एक खास अंग है जो कि हमारी भावना, विचार, स्पर्श, स्मृति, दृष्टि, श्वास, तापमान और एवं हमारे शरीर की प्रत्येक कार्य क्षमता को नियंत्रित करता है। इसकी  संरचना की बात करें तो एक सामान्य मस्तिष्क का वजन 3 पाउंड होता है  यह 60 प्रतिशत वसा , 40 प्रतीशत पानी जिसमें प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट और लवण का मिश्रण होता है से मिलकर बनता है।. अतः पानी की उपलब्धता बताती है कि हमारा दिमाग भी सुने य कहें गये शब्दों द्वारा प्रभावित होता है य प्रतिक्रिया करता है।.

अतः आज का हमारा लेख पाठकों को यह समझाने का प्रयास कर रहा है कि जो भी आप बोलते है वे सोच समझ कर बोलें हर शब्द में एक नकारात्मक और सकारात्मक ऊर्जा निवास करती है। इसके साथ ही अगर आप हिन्दू धर्म से है तो मंत्रों का सही उच्चारण करें। उच्चारण कर्ता को सदैव यह ध्यान देना चाहिए कि गलत मंत्र के उच्चारण से गलत प्रभाव पड़ सकता है।.

सोर्स-wikipedia,hopkinsmedicine,org,drbrookesturat.com,masaru.emoto.net,youtube.com

सोमवार, 6 जनवरी 2025

सिंधु घाटी सभ्यता

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प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम सिंधु घाटी सभ्यता बारे में जानने का प्रयास करेंगे तथा हाल ही में हुये इस सभ्यता पर शोध के बारे में जानकारी साझा करेंगे।.सिंधु घाटी सभ्यता (Sindhu Ghati Sabhyata)जो विश्व की सबसे प्राचीन शहरी सभ्यताओं में से एक थी,का पतन एक जटिल और विवादास्पद विषय है। इतिहासकार और पुरातत्व वैज्ञानिक इस सभ्यता के अंत के कारणों पर अभी भी शोध और चर्चा कर रहे हैं। लगभग 1900 ईसा पूर्व के आसपास इस अद्भुत सभ्यता के पतन को समझाने के लिए कई सिद्धांत प्रस्तुत किए गए हैं। हाल ही में कुछ वैज्ञानिकों ने यह दावा कि है कि इस सभ्यता का अन्त परमाणु विस्फोट के कारण हुआ था। अतः उपरोक्त दावों के कारण यह सभ्यता वर्तमान समय में चर्चा का विषय है।अब देखना यह है कि वैज्ञानिकों का यह दावा कितने प्रतिशत मानकों पर सही सिद्ध होता है।.हांलाकिं इससे पहले भी वैज्ञानिकों ने अपने बहोत से अनुमान प्रस्तुत किये परन्तु अभी तक कोई भी सही नतीजे पर नही पहुंच पाये। उनके द्वारा किये कुछ महत्वपुर्ण दावों को निम्नवत प्रस्तुत किया गया है।

जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय कारण

नदियों का मार्ग बदलना सरस्वती नदी,जिसे इस सभ्यता का मुख्य जल स्रोत माना जाता है, के सूखने से कृषि और प्रवास पर गहरा प्रभाव पड़ा। सूखा साक्ष्यों से पता चलता है कि लंबे समय तक सूखे और मानसून की कमी ने खेती और जल की उपलब्धता को बाधित किया। बाढ़ कुछ विद्वानों का मानना है कि अचानक और भीषण बाढ़ ने शहरों को नष्ट कर दिया और क्षेत्रों को रहने योग्य नहीं छोडा।सिंधु घाटी सभ्यता आंतरिक व्यापार और मेसोपोटामिया जैसे क्षेत्रों के साथ व्यापार पर निर्भर थी। 

व्यापार मार्गों या संसाधनों में व्यवधान ने अर्थव्यवस्था को कमजोर किया और शहरी पतन को तेज किया।युद्ध या आक्रमण के प्रमाण बहुत कम हैं,लेकिन आंतरिक सामाजिक या राजनीतिक संघर्षों ने शहरी केंद्रों और प्रशासन को कमजोर कर दिया होगा।शुरुआती सिद्धांतों में यह कहा गया कि इंडो-आर्यन जातियों ने इस क्षेत्र में आकर या आक्रमण कर इस सभ्यता का पतन किया। हालांकि, यह विचार अब कम मान्य है,क्योंकि बड़े पैमाने पर आक्रमण या हिंसक संघर्ष के पर्याप्त पुरातात्विक प्रमाण नहीं मिले हैं।

5. शहरी क्षय और प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक उपयोग

प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक उपयोग,वनों की कटाई,और मिट्टी के क्षरण ने क्षेत्र को बड़ी आबादी के लिए अनुपयुक्त बना दिया होगा।1.मोहनजो-दड़ो और हड़प्पा जैसे शहरों का परित्याग। 2.मानकीकृत वजन,मुद्राएँ,और शहरी नियोजन का पतन। 3.शहरी क्षेत्रों से छोटे,ग्रामीण समुदायों में बदलाव।यह संभावना है कि सिंधु घाटी सभ्यता का पतन किसी एक कारण के बजाय इन सभी कारणों के संयोजन से हुआ।

 इसका अंत सभ्यता के शहरी चरण से लेकर भारतीय उपमहाद्वीप में वैदिक संस्कृति के उदय की ओर संक्रमण को दर्शाता है।सिंधु घाटी सभ्यता पर हाल के समय में हुए विभिन्न शोध और तकनीकी अध्ययनों ने इस प्राचीन सभ्यता के बारे में नई और महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान की है। वैज्ञानिक और पुरातात्विक तरीकों ने इसके उदय,विकास और पतन के कारणों को समझने में मदद की है। नीचे कुछ प्रमुख तकनीकी शोधों और उनके निष्कर्षों का विवरण दिया गया है

1.जैव-तकनीकी विश्लेषण (Bio-archaeology)डीएनए अध्ययन- हाल के डीएनए विश्लेषणों ने सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों के आनुवंशिक इतिहास पर प्रकाश डाला है। यह पाया गया है कि इन लोगों का आर्यों के आगमन से पहले के स्थानीय निवासियों के साथ गहरा संबंध था।कृषि और खाद्य आदतें-अनाजों और बीजों के अवशेषों का अध्ययन करके पता चला है कि सिंधु घाटी के लोग जौ, गेहूं और चावल की खेती करते थे।2.पानी और पर्यावरण पर शोधनदी का प्रवाह- सैटेलाइट इमेजरी और भूवैज्ञानिक अध्ययन ने सरस्वती और घग्गर-हकरा नदी के सूखने की प्रक्रिया का अध्ययन किया। 

इसने पुष्टि की कि जल स्रोतों के सूखने ने इस सभ्यता को गंभीर रूप से प्रभावित किया।जलवायु परिवर्तन- वैज्ञानिक अनुसंधानों ने संकेत दिया है कि मानसून की कमी और लंबे समय तक सूखा सिंधु घाटी सभ्यता के पतन में एक प्रमुख कारण हो सकता है।3.शहरी संरचना का विश्लेषण सिंधु घाटी के शहरों की योजनाओं का अध्ययन आधुनिक तकनीकों जैसे 3D मैपिंग और लेजर स्कैनिंग से किया गया। इससे पता चला कि जल निकासी और शहरी नियोजन में ये लोग बहुत उन्नत थे।यह भी पाया गया कि इनके घरों और सड़कों का निर्माण प्राकृतिक आपदाओं (जैसे बाढ़) से बचाव के लिए किया गया था।

4.मुद्राओं और लेखन पर शोध सिंधु लिपि को डिकोड करने के लिए AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) और मशीन लर्निंग का उपयोग किया जा रहा है। हालांकि अभी तक इसे पूरी तरह से समझा नहीं जा सका है,लेकिन इसमें व्यापार और धार्मिक गतिविधियों का विवरण होने की संभावना जताई गई है।5.रेडियोकार्बन डेटिंग और भूवैज्ञानिक साक्ष्य-सिंधु घाटी के स्थलों पर मिली वस्तुओं की रेडियोकार्बन डेटिंग से पता चला कि यह सभ्यता लगभग 3300 ईसा पूर्व में शुरू हुई और 1900 ईसा पूर्व तक अपने शिखर पर थी।नए शोधों ने यह भी दिखाया कि इस सभ्यता का प्रभाव आसपास के क्षेत्रों जैसे गुजरात,राजस्थान और महाराष्ट्र तक फैला हुआ था।

6.व्यापार और अंतरराष्ट्रीय संपर्क-हाल की खुदाइयों और समुद्री मार्गों के अध्ययन से यह पता चला है कि सिंधु घाटी सभ्यता के लोग मेसोपोटामिया,फारस,और मध्य एशिया के साथ व्यापार करते थे। उनके द्वारा उपयोग की जाने वाली मुद्राएँ और वस्तुएं इन क्षेत्रों में भी पाई गई हैं।तकनीकी शोध ने यह स्पष्ट किया है कि सिंधु घाटी सभ्यता एक अत्यधिक उन्नत और जटिल समाज थी। इसका पतन एक ही कारण से नहीं बल्कि जलवायु परिवर्तन,आर्थिक संकट,और सामाजिक परिवर्तन जैसे कई कारकों के संयोजन से हुआ। इस पर शोध अभी भी जारी है,और नई तकनीकों के माध्यम से हमें और भी गहरी जानकारी मिलने की संभावना है।सिंधु घाटी सभ्यता और हड़प्पा सभ्यता एक ही सभ्यता के दो नाम हैं। इन दोनों में कोई अंतर नहीं है,बल्कि ये एक ही सांस्कृतिक और ऐतिहासिक परंपरा का वर्णन करते हैं। इनके बीच का संबंध निम्नलिखित है।


1.नामकरण का अंतर

सिंधु घाटी सभ्यता- यह नाम इस सभ्यता के प्रमुख स्थान, सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियों (जैसे रावी,झेलम,सतलुज,चिनाब) के आस-पास विकसित होने के कारण दिया गया है।हड़प्पा सभ्यता-इसका नामकरण इस सभ्यता के पहले खोजे गए प्रमुख स्थल हड़प्पा (जो अब पाकिस्तान में है) के आधार पर हुआ है। 1921 में दयाराम साहनी ने हड़प्पा की खुदाई के दौरान इस सभ्यता के अवशे ष खोजे थे।2. स्थान और विस्तारयह सभ्यता केवल हड़प्पा तक सीमित नहीं थी, बल्कि सिंधु नदी के पूरे क्षेत्र और उसकी सहायक नदियों के आसपास फैली हुई थी।इसके प्रमुख स्थल हड़प्पा,मोहनजो-दड़ो,कालीबंगन,लोथल,धोलावीरा,राखीगढ़ी और चन्हुदड़ो थे।

3.संस्कृति और विशेषताएँ

शहरी नियोजन-दोनों नामों के तहत,इस सभ्यता की सबसे प्रमुख विशेषता उन्नत शहरी नियोजन, पक्की ईंटों के घर,जल निकासी प्रणाली और सुव्यवस्थित सड़कें हैं।लेखन प्रणाली-हड़प्पा और सिंधु घाटी सभ्यता की लिपि को आज तक पूरी तरह से समझा नहीं गया है,लेकिन इनकी मुद्राओं पर यह लिपि देखी जाती है।कृषि और व्यापार-दोनों नामों के तहत इस सभ्यता में कृषि (गेहूं, जौ) और व्यापार (मेसोपोटामिया के साथ) को महत्वपूर्ण माना गया है।4.समय अवधिदोनों नाम एक ही समय अवधि को संदर्भित करते हैं,जो लगभग 3300 ईसा पूर्व से 1900 ईसा पूर्व तक फैली थी।इसे तीन चरणों में बांटा गया है- प्रारंभिक हड़प्पा काल,परिपक्व हड़प्पा काल और उत्तर हड़प्पा काल।.

ताज़ा खबर के मुताबिक

5 जून 2024 में प्रकाशित एक लेख रचयिता माइकल मोराह द्वारा इस खबर को प्रकाशित किया जाता है कि पाकिस्तान के दक्षिणी क्षेत्र में जब मोहनजोदड़ों सभ्यता के एक कंंकाल को निकाल कर,उसकी जांच कि गयी तो पता चला कि उस कंकाल में सामान्य मात्रा से भी अधिक रोडियो अक्टीविटी पायी गयी जीसने लोगो को चौंका दिया। जिसके चलते खुदाई में मिले अन्य कंकालों की भी जांच कि गई जिससे पता चला कि इन मानवो की मौत कुछ सेंकड में ही हुयी होगी इसके अलावा मिट्टी के कुछ ऐसे बिघले हुये बर्तन मिले है जो 4000 फरनहाइट तापमान के बिना संभव ही नही हो सकता।

 अतः वैज्ञानिक इस निष्कर्श पर पहुंचे है कि सिंधु घाटी सभ्यता पर परमाणु हमला हुआ था।.हालांकि उस समय तक परमाणु बम कि खोज नही हुयी थी जिसके कारण इसे एक परिग्रह जिवीयो के हमले के रुप में देखा जा रहा है।हलांकि भारत में इस घटना को पौराणिक रुप भी दिया गया है जिसमें विशेषयज्ञोंं द्वारा यह दावा किया गया है कि यह उस समय काल के बहुप्रचलित अस्त्र ब्रह्मास्त्र के प्रभाव से हुआ विनाश हो।.

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