प्रस्तावना
प्रस्तुत लेख में हम लोहड़ी के त्यौहार और इसे पीछे छिपे संकृतिक महत्व और इस त्यौहार को मनाये जानें के शुरवाती कारणों को जानेंगे। क्योंकि जिस प्रकार से रक्षा बन्धन का त्यौहार हिंदू धर्म में बड़ी धूम धाम से मनाया जाता है ठीक उसी प्रकार से यह त्यौहार सिख धर्म मे बड़ी धूम धाम से मनाया जाता हैं। हालांकि यह त्यौहार भाई बहन के रिश्तें से संबंधित नही हैं। जबकि उससे भी बड़े रिश्ते यानि हमारे संरक्षक कर्ता या हमारे प्रोटेक्टर को समर्पित हैं।.
शुरुआत की कहानी
पंजाब में लोहड़ी का त्यौहार सुंदरी और मुंदरि नाम की दो बहनों और उन्हें बचाने वाले लोक नायक दुल्ला भट्टी की याद में मनाया जाता हैं।ये दोनों बहने पंजाब के एक गरीब किसान सुंदर दास की बेटियां थी। सोलहवीं शताब्दी के समय काल में पंजाब में एक क्रूर मुगल शासक का राज था। उस समय काल में मुस्लिम अपने धर्म को छोड़ कर बाकी के सभी धर्मों को मनाने वाले लोगों को काफिर कहते थे। काफिर को मरना शोषण करना, हत्त्या करना ये आम बात थी। अतः एक मुगल सूबेदार सुन्दर दास की दोनों बेटियों को अपने हरम में ले जाना चाहता था।
सुंदर दास जनता था हरम मे उसकी बेटियों के साथ बहोत ही बुरा बर्ताव होगा। गाँव का मुखिया जिसे नंबरदार उस समय कहा जाता था उसने भी सुंदर दास की कोई मदद नहीं की। उल्टा नंबरदार ने खुद गरीब किसान पे दबाव बनाना शुरू कर दिया की वो मुगल सुबेदार का कहा माने। हार कर सुंदर दास अपने गाँव के सहयोगी मित्र दुल्ला भट्टी वाले के पास गया और मदद की गुहार लगाई। हालांकि दुल्ला भट्टी वाला भी एक गरीब किसान हि था। मगर बंदे में हिम्मत बोहत थी गलत होता न वो देख सकता था और न किसी को किसी के साथ गलत करने देता था।.
अतः दुल्ला भट्टी वाला तुरन्त मदद करने को तैयार हो गया। सुंदर दास की हिम्मत बढ़ा कर उसे घर भेजा और अपने नंबरदार के खेतों की तरफ चला गया और सारे खेतों मे आग लगा दी। देखने वालों ने जब विरोध किया तो दुल्ला भट्टी वाले ने सबको बताया ये नंबरदार खाता हमारी है और गाता मुगलों की हैं। इसके साथ ही दुल्ला भट्टी वाले ने नंबरदार पर किसान सुंदर दास की बेटियों को हरम मे भेजने का दबाव बनाने का आरोप लगाया।. सारे गाँव ने जब ये जाना तो सब नंबरदार के खिलाफ करवाई की माँग के लिए एक जुट हुए।.
नंबरदार
नंबर दार को जब अपने खेतों और किसानों के एक जुट होने की बात का पता चला तो वो मुगल सूबेदार के पास गया और बातों को बढ़ा चढ़ा के बताया। जिससे सुबेदार गुस्से मे आ गया और उसने तुरन्त सुंदरी और मुंदरि को और किसान सुन्दर दास को पकड़ के लाने का आदेश दिया इसके साथ ही सूबेदार ने ये भी कहा जो कोई भी उनको रोकने की कोशिश करे उसे मार दिया जाए और उनकी भी बहु बेटियों को हरम मे लाया जाये साथ ही साथ उनके घर को आग लगा दी जाये।.
सूबेदार के सिपाही गाँव में आये सुंदरी और मुंदरि को जबरन अपने साथ ले जाने लगे, किसान सुंदर दास के विरोध करने पर उसे जान से मार दिया गया और उसके घर को आग लगा दी गयी। अब सुंदरी, मुंदरि मजबूरी में सिपाहियों के साथ चल दीं क्योंकि न तो अब घर बचा था और न ही पिता। गाँव का कोई भी बन्दा उनकी मदत के लिए आगे न आया क्योंकि उन्हें अपने परिवार की सुरक्षा का डर था और सुन्दर दास को मरा देख लोग और भी डर गये। हालांकि गाँव के बोहत से लोग गुप्त तरीके से दोनों बहनों की मदद करना चाहते थे जिनमें से किसी एक ने दुल्ला भट्टी वाले को इस घटना की खबर दी।
दुल्ला भट्टी वाला अपने सहयोगियों के साथ मिलकर, जंगल के रास्ते जा रहे सिपाहियों पर हमला किया और सुंदरी, मुंदरि की जान बचायी। साथ ही साथ दोनों बहनों की उनकी पसंद के लड़कों से उनकी शादी करा दी। दुल्ला भट्टी वाले के पास अपनी बेटियों को दहेज मे देने को कुछ न था। बेचारे ने अपनी अपनी शाल फाड़ के उसमें शक्कर बाँध के दोनों को दी और उन्हें विदा किया।
दोस्तों तब से आज तक ये त्यौहार दुल्ला भट्टी की बहादुरी उनके समर्पण को याद रखने के लिए हर साल मनाया जाता हैं। तब ये लोकगीत पूरे पंजाब मे प्रचलित हैं।
सुंदर, मुंदरिये होए,
तेरा कौन विचार होए,
दुल्ला भट्टी वाला होए,
दुल्ले दी धी व्याही होए,
सेर शक्कर पाई होए।
दुल्ला भट्टी वाले की ये कहानी नारी सम्मान और अन्याय के खिलाफ खड़े होने का प्रतीक बन गई। जिस कारण हर साल लोहड़ी का त्यौहार आग जलाकर आग में मुम्फली , गचक, रेवड़ियों और पॉपकॉर्न चढ़ा कर मनाया जाता हैं। खास कर जिस घर ने नयी- नयी शादी हुई रहती हैं उस घर मे और भी धूम धाम से इस त्यौहार को मनाया जाता हैं।
सोर्स indiatv.In , timesnewhindi.com, विकिपीडिया

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