प्रस्तावना
प्रस्तुत लेख में हम राष्ट्रव्यापी जन आंदोलन जिसे हम असहयोग आंदोलन के नाम से जानते है के बारे में चर्चा करेंगे। इसके साथ ही हम आंदोलन की मुख्य घटना एवं मुख्य पात्रों के बारे में चर्चा करेंगे। इसके अलावा हम इस बात पर भी विशेष चर्चा करेंगे की आंदोलन के असफल होते हुए भी सफल कैसे रहा। साथ ही हम इस लेख में जलियांवाला बाग हत्याकांड और 1920 के नागपुर अधिवेशन एवं चौरा-चौरी हत्याकांड के होने के पीछे के कारण को समझेंगे।
आंदोलन का मुख्य लक्ष्य
आंदोलन का मुख्य लक्ष्य स्व-शासन को स्थापित करना था। जिसके लिए गांधी जी एवं अन्य आंदोलन कर्ताओं ने रौलेट एक्ट और जलियां वाला बाग में निर्मम हत्याकांड को मुख्य कारण बताया। इसके अलावा हर एक क्षेत्र विशेष की अपनी अन्य समस्याएं थी जैसे कर में बढ़ोतरी,जबरन खेती करने के लिए प्रतिबद्ध करना,अकाल के दौरान अथवा फसल के न होने पर सरकार द्वारा किसानों को राहत न प्रदान करना आदि। इसके साथ ही सरकार द्वारा शोषण कारी भूमि कानून भी एक मुख्य कारण था।
आंदोलन के मुख्य पात्र
आंदोलन के मुख्य पात्रों में सर्वप्रथम महात्मा गांधी जी का नाम आता है उनके साथ ही बाल गंगाधर तिलक,बिपिन चन्द्र पाल,मोहम्मद अली जिन्ना और ऐनी बेसेंट का सहयोग मिला। इन सभी के अलावा मौलाना आजाद,मुख्तार अहमद अंसारी,हकीम अजमल खान,मगफूर अहमद अजीज़,अब्बास त्याबजी,मौलाना मुहम्मद अली जौहर,मौलाना शौकत अली एवं मुस्लिम नेताओं समर्थन प्राप्त था।
नागपुर अधिवेशन
इस अधिवेशन की अध्यक्षता सी विजयराघवचारियार द्वारा की गयी थी। इस अधिवेशन द्वारा लिए गये महत्वपूर्ण फैसले।
1.असहयोग आंदोलन के मंजूरी नागपुर अधिवेशन के दौरान ही दी गयी थी हलांकि इसका प्रस्ताव गांधी जी द्वारा कलकत्ता अधिवेशन में रखा गया था।
2.संवैधानिक साधनों के स्थान पर अहिंसक और उचित तरीकों से स्वशासन की प्राप्ति का लक्ष्य रखा गया।
3.कांग्रेस कार्य समिति का गठन किया गया। भाषाई आधार पर प्रांतीय कार्य समितियों का गठन किया गया।
4.बहिष्कार की नीति-विदेशी वस्तुओं,सरकारी स्कूलों,कालेजों,अदालतों ओर उपाधियों का पूर्ण बहिष्कार करने का संकल्प लिया गया।
5.सी आर दास जैसे आलोचकों ने भी गांधी जी का असहयोग आंदोलन में समर्थन किया।
आंदोलन की मुख्य घटना
इस आंदोलन की शुरुआत 3 सितंबर 1920 होती है। यह गांधी जी द्वारा चलाया गया एक राजनीतिक अभियान था। इस आंदोलन के दौरान सरकारी कार्यकर्ता,सरकारी कारखानों में काम करने वाले मजदूर संघ को काम करने रोका गया,लोक अदालत के कार्यकर्ताओं,वकीलों ने हड़ताल की ताकी सरकार तक अपनी आवाज़ पहुंचा सके। भारतीय आंदोलन कर्ता ब्रिटिश समान खरीदने मना करते है,स्थानीय घरेलू उद्योग को बढ़ावा दिया जाता है,लोग अचानक से खादी वस्त्र धारण करने लगते है विदेशी कपड़ों का त्याग करते है। शराब की दुकानों के आगे धरना दिया जाने लगा। देश में सार्वजनिक सभाएँ एवं हड़तालें सिलसिले वार होने लगी। बताते चले कि भारतीय जनता का ब्रिटिश सरकार के पुरी तरह से भरोसा उठ चुका था मुख्य कारण रोलेट एक्ट तथा जलियांवाला बाग हत्याकांड था।
रोलेट एक्ट
इस एक्ट का अध्यक्ष सर सिडनी रालेट था जिसने 18 मार्च 1919 त्वरित प्रभाव से इस एक्ट को पारित किया गया। असहयोग आंदोलन के चलते ही सरकार को इस कानून को वापिस लेना पड़ा।
1 इस कानून के चलते सरकार किसी भी भारतीय को सिर्फ संदेह मात्र होने पर ही हिरासत में ले सकती थी।
2 इस कानून के चलते बिना मुकदमे के कारावास का प्रावधान था।
3 रोलेट एक्ट के कानून के अनुसार सरकार संदेह से उठाये गये व्यक्ति को अनिश्चित काल के लिए हिरासत में रख सकती थी।
4 इस कानून में बिना वारेंट गिरफ्तारी का प्रावधान था।
5 आतंकवाद के संदिग्ध में पाये गये व्यक्ति को बिना किसी उचित कार्यवाही य मुकदमे के 2 साल के कठोर कारावास का प्रावधान था।
6 दोषी ठहराये गए व्यक्ति को किसी भी राजनीतिक,शैक्षिक एवं धार्मिक गतिविधियों में भाग लेने पर प्रतिबंध लगाया गया था।
जलियांवाला बाग हत्याकांड
रोलेट एक्ट को पारित होते ही सरकार को जैसे खुली छूट मिल गयी भारतीयों को मारने की। इस कानून के चलते ही ब्रिगेडियर-जनरल रेजिनाल्ड डायर द्वारा 13 अप्रैल 1919 को इस घटना को अंजाम दिया गया। इस घटना के दौरान भिड़ में खड़े बच्चों और महिलाओं को भी पुलीस द्वारा आतंकवादी बताया गया। इस घटना के पीछे का मुख्य कारण क्रांतिकारी नेता सैफुद्दीन किचलू और डाक्टर सत्यपाल की गिरफ्तारी के विरोध में भीड़ जमा हुई थी हलांकि सारी भीड़ विरोध प्रदर्शन की ही नहीं थी।
क्योंकि उस दिन बैसाखी का त्योहार था तो ज्यादातर लोग उत्सव में शामिल होने के लिए आये थे जिनमें बच्चे, बूढ़े और महिलाएं भी शामिल थी। इस नरसंहार से उपजे आक्रोश ने हजारों विरोध प्रदर्शनों को जन्म दिया जिसने सरकार की मुश्किलें और बढ़ा दी। अहिंसा का प्रचार करने वाले गांधी जी ने इस घटना का कड़ा विरोध किया। उनका मानना था कि ब्रिटिश सरकार उतनी भी बुरी नहीं है मगर इस हत्याकांड के चलते गांधी जी ने ब्रिटिश सरकार की अच्छाई पर से अपना विश्वास खो दिया और कहा कि इस शैतानी सरकार के साथ सहयोग करना पाप होगा। इस प्रकार सत्याग्रह के विचारों आगे चलकर जवाहर लाल नेहरु ने अपनाया।
जवाहर लाल नेहरू की गिरफ्तारी
असहयोग आंदोलन के चलते 6 दिसंबर 1921 पंडित जवाहर लाल नेहरु और उनके पिता मोती लाल नेहरु के पहली बार गिरफ्तार किया गया। वोचिदंबरम पिल्लई को 40 वर्ष की कैद की सजा सुनाई गयी। दूसरी तरफ गांधी जी द्वारा असहयोग आंदोलन के दौरान महत्वपूर्ण कार्यों को अंजाम दिया गया।
1.सभी कार्यालय और कारखानों पूर्णतः बंद करने का आदेश दिया।
2.भारतीयों को सरकार द्वारा प्रायोजित स्कूलों,पुलिस सेवाओं,सेना और सिविल सेवा से हटने के लिए प्रेरित किया और वकीलों को सरकारी अदालतों से चले जाने के लिए कहा।
3.सर्वजनिक परिवहन और इग्लैंड द्वारा निर्मित वस्तुओं का बहिष्कार किया गया।
4.भारतीयों द्वारा ब्रिटिश सरकार द्वारा दी गयी उपाधि और सम्मान वापिस किए गये जैसे गांधी जी को सरकार द्वारा केसरी हिंद की उपाधि दी गयी थी जिसे उन्होंने वापिस कर दिया।
चौरी-चौरा हत्याकांड
इस आंदोलन का सरकारी अधिकारियों पर गहरा असर पड़ा। भारतीयों की एकता को मजबूती मिली भारतीय उत्पादों को बढ़ावा दिया गया। कई भारतीय स्कूल एवं कालेज की स्थापना की गईं। मगर इसी बीच उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के चौरी चौरा में 4 फरवरी 1922 को एक घटना हुई। जिसके चलते जनता के आक्रोश को देखकर गांधी जी ने असहयोग आंदोलन को समाप्त कर दिया। इस घटना के अनुसार गोरखपुर के चौरी चौरा नामक स्थान पर शराब की दुकान के सामने कुछ स्वयं सेवकों पुलिस अधिकारियों ने हमला कर दिया। वहां जमा हुई किसानों की भिड़ ने पुलिस चौंकी को घेर कर उसमें आग लगा दी जिसके चलते चौंकी में मौजूद 22 एवं किसानों द्वारा 8 लोगों को मार डाला गया।
गांधी जी की गिरफ्तारी
हलांकि गांधी जी के अहिंसा वादी होने के कारण चौरी-चौरा हत्याकांड के बाद उन्होंने आंदोलन के समाप्त करने की घोषणा कर दी मगर 12 फरवरी 1922 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया तथा 18 मार्च 1922 को राजद्रोह आरोप में 6 साल की सजा सुनाई गई।.
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