9b45ec62875741f6af1713a0dcce3009 Indian History: reveal the Past: चम्पारण आंदोलन

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सोमवार, 16 मार्च 2026

चम्पारण आंदोलन

champaran satyagraha

प्रस्तावना 

प्रस्तुत लेख में हम चम्पा रण आंदोलन के मुख्य नेताओं तथा आंदोलन की सफलता के बारे में चर्चा करेंगे। इसके साथ ही तीन कठिया प्रथा , नील कारखानों के पतन एवं किसानों पर वित्तीय बोझ के बढ़ने के कारणों को जानेंगे।

सत्याग्रह का मुख्य कारण 

1917 में यह आंदोलन बिहार के उत्तर-पश्चिम भाग में स्थित चम्पा रण में तिनकठिया प्रथा से पीड़ित किसानों द्वारा प्रारम्भ किया गया था। तीनकाठिया प्रथा कि बात करें तो यूरोपीय बा गान मालिकों में किसानों को उनकी भूमि के 3/20 वे हिस्से पर नील की खेती करने के लिए मजबूर किया, जिससे गेंहु व अन्य अनाज उत्पादन पर गहरा असर पड़ा। 3/20 के इस नियम के चलते ही इस प्रथा को तीन कठिया प्रथा का नाम दिया गया। इसके साथ ही 1900 ई0 के समय काल में यूरोप कृत्रिम नील बनाने में सफल रहा जिसके चलते भारतीय नील की मांग गिर गई दूसरी तरफ अधिकारियों द्वारा किसानों पर अन्य अनाज उत्पादन पर प्रतिबंध तो था ही इसके साथ ही उन पर जुर्माना भी लगाया गया था। जुर्माने की आड़ में किसानों को रैयत बांड जारी किए गए जिस पर 12 प्रतिशत उच्च वार्षिक ब्याज दर पर हैंड़नोट और बंधक बांड़ जारी किए गये। अतः उपरोक्त कारणों के चलते किसानों की वित्तीय स्थिति और खराब हो गई। इस प्रकार किसानों का विद्रोह प्रारम्भ हुआ।

विद्रोह के अन्य मुख्य कारण

1. नील कारखानों का पतन 
1900 के बाद यूरोप से कृत्रिम नील के उत्पादन कारण ने  भारतीय नील कारखानों के पतन ने बा गान मालिकों की रैयतों के साथ अनुबंध रद्द करने के लिए प्रेरित किया और नील सम्बन्धित दायित्वों से मुक्ति पाने के किसानों पर भारी जुर्माना लगाया ।

2. चम्पा रण की मुख्य फसल नील का होना
चम्पा रण में 18वीं शताब्दी के पहले से ही नील की खेती की जा रही थी और 1850 तक यह क्षेत्र की सबसे महत्वपूर्ण फसल बन गई जिसने चिनी के उत्पादन को भी पीछे छोड़ दिया था। अतः यह भी विद्रोह का प्रमुख कारण बना क्योंकि चम्पा रण के किसानों को नील के अलावा अन्य फसलों के उत्पादन पर प्रतिबंध था। 

3. भूमि क्षेत्र के आधार पर निश्चित मूल्य
किसानों के भुगतान की जाने वाली कीमत फसल की मात्रा की बजाय भूमि क्षेत्रफल के आधार पर तय की जाती थी, जिससे अनुचित मुआवजा मिलता था।

4. आर्थिक और सामाजिक शोषण
किसानों को आर्थिक कठिनाइयों और सामाजिक शोषण दोनों का सामना करना पड़ा जिसके कारण बागान मालिक राज के खिलाफ व्यापक आंदोलन हुआ.

चम्पारण आंदोलन के मुख्य  नेता

चम्पा रण आंदोलन के मुख्य नेताओं के रुप में महात्मा गांधी जी का नाम सबसे पहले आता है। 1916 सें चम्मा रण के स्थानीय नेता ब्रज किशोर और राज कुमार शुक्ला ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में गांधी जी से मुलाकात की मगर गांधी जी ने उन्हें गम्भीर रुप से नहीं लिया। इसके कुछ समय बाद ब्रज किशोर प्रसाद में चम्पा रण के किसानों की दुर्दशा के बारे में कांग्रेस में एक प्रस्ताव पेश किया । जिसे सर्व सम्मति से पारित कर दिया गया। इसके बाद भी गांधी जी ने अपने आकलन के बाद ही कार्यवाही करने का दृढ़ निश्चय किया।

मुजफ्फरपुर की यात्रा 

गांधी जी ने मुजफ्फर पुर पहुंचने के बाद तिरहूत मंडल आयुक्त को पत्र लिखकर सरकार को जानकारी दी की वे सरकारी सहयोग से काम करने की मंशा रखते हैं। मगर गांधी जी के स्पष्टीकरण के बावजूद ब्रिटिश सरकार व उसके अधिकारी गांधी जी के इरादों को लेकर संशय में थे उन्हें डर था कि गांधी जी के चम्पा रण जाने पर वहां की प्रशासन बिगड़ सकती है। अतः ब्रिटिश अधिकारियों ने दंड प्रक्रिया की धारा 144 का हवाला देते हुए गांधी जी के चम्पा रण पहुंचने पर उन्हें जिले को छोड़ने का नोटिस जारी करने का निर्णय लिया।

चम्पारण पहुंचने पर गांधी जी

15 अप्रैल 1917 में गांधी जी चम्पा रण पहुंचने पर सर्वप्रथम मजिस्ट्रेट को पत्र लिखकर वहां रहने के अपने दृढ़ संकल्प और अवज्ञा के लिए किसी भी दंड का सामना करने की अपनी तत्परता व्यक्त की । तीन दिन बाद यानी 18 अप्रैल 1917 को गांधी जी को मुकदमे के लिए बुलाया गया। उन्होंने अपना बचाव पेश नहीं किया , बल्कि जेल जाने की इच्छा जताई। अतः उनकी सजा को स्थगित कर दिया गया। सजा के स्थगित होने का मुख्य कारण उप राज्यपाल का आदेश था। दरअसल गांधी जी के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य न होने के कारण उप राज्यपाल ने प्रशासन को मामला वापिस लेने का आदेश दिया। जिसके चलते गांधी जी की सजा स्थगित ही नहीं हुई बल्कि उन्हें चम्पा रण मामले की जांच करने कि अनुमति भी मिल गयी। राज्यपाल की अनुमति मिलने के बाद गांधी जी के सहयोग में राजेंद्र प्रसाद , ब्रज किशोर प्रसाद, मजहरुल हक , जो बी कृपालनी, राम नवमी प्रसाद और अन्य नेताओं  का सहयोग मिला। विभिन्न गांवों के हजारों किसान नील की खेती प्रणाली के प्रति अपनी असंतुष्टि व्यक्त करने आए। 

आंदोलन का विद्रोह करने वाले विद्रोही दल

1.बिहार प्लोटर्स एसोसिएशन
इस कमेटी ने गांधी जी की जांच का कड़ा विरोध किया क्योंकि उन्हें डर था कि इस प्रकार की जांच किसानों के बीच आक्रामकता को बढ़ा सकती है।
2. यूरोपीय अधिकारियों की चिंता
कुछ यूरोपीय अधिकारियों ने चिंतन व्यक्त किया कि गांधी जी की जांच एक यूरोपीय आंदोलन का रुप ले सकती है।
3.सरकारी हस्तक्षेप
बढ़ते विरोध के चलते सरकार ने गांधी जी को अपनी जांच के निष्कर्षों पर एक प्रारम्भिक रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया जिसके चलते गांधी  जी ने 13 मई 1917 को अपनी प्रारम्भिक रिपोर्ट प्रस्तुत की ,जिसमें उन्होंने अपनी जांच के निष्कर्षों का विवरण दिया।
चम्पा रण सत्याग्रह पर सरकार की प्रतिक्रिया
 नील किसानों शोषण को लेकर बढ़ते असंतोष को दूर करने के लिए सरकार को मजबूरी में अधिकारिक जांच समिति का गठन करना पड़ा जिसमें गांधी जी भी सदस्य थे।

समिति का निष्कर्ष ओर सिफारिशें

1. तिनकठिया प्रणाली का समापन हुआ
2.कारखानों को तावान का भुगतान करने वाले किसानों को भुगतान का एक चौथाई हिस्सा वापिस मिलने लगा।
3.अवैध करो की वसूली बंद की गई।
4.नील खोती को किसान स्वयं इच्छा से सहमत होने चाहिए, जबरन नील खेती पर प्रतिबंध लगाया गया।
5.ब्रिटीस सरकार ने समिति की सभी सिफारिशों को स्वीकार किया जिसके परिणामस्वरूप 1918 में चम्पा रण कृषि अधिनियम पारित किया गया। 
इस प्रकार यह आंदोलन पूर्णतः सफल रहा।
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