Indian History reveal the Past

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शनिवार, 22 अगस्त 2026

शकों का आक्रमण

shakas dynasty

प्रस्तावना

इस लेख में शकों के भारत पर आक्रमण के साथ ही इनके वंश के संस्थापक एवं डूडो सिथियन राज वंश की स्थापना तथा बैक्ट्रिया पर इनके अधिकार के साथ ही भारत में प्रवेश तथा भारत में शकों की पांच शाखाओं इनके प्रमुख शासकों तथा शकों के अंत का मुख्य कारण जानेंगे। इसके साथ ही हम शक शासक द्वारा संस्कृत भाषा में लिखे सबसे लम्बे अभिलेख के बारे में चर्चा करेंगे और अंत में शक शासकों द्वारा जारी किए गए सिक्कों के इतिहास के बारे में चर्चा करेंगे।

इंडो सिथियन राज वंश की स्थापना

मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद शकों का आक्रमण भारत के पश्चिमोत्तर भाग पर हुआ। यह मूल रुप से मध्य एशिया के सिर दरिया क्षेत्र के रहने वाली खाना बदोश जनजाति से थे। जिन्होंने भारत में इंडो सिथियन राज वंश की स्थापना की थी। यूची कबीले के लोगों ने जो कि चीनी सीमाओं के पास रहते थे ने शकों को उनकी मातृभूमि से खदेड़ दिया था। परिणामस्वरूप अपनी जान बचाने के लिए इन्होंने दक्षिण की और जाना उचित समझा। इस प्रकार वे प्राचीन बैक्ट्रीया में पहुंचे जिसे वर्तमान समय में आफगानिस्तान के यवन नाम से जानते है। यवन को तबाह करने का बाद वे भारत की तरफ आये।

भारत में प्रवेश

शकों ने हिंदूकुश पर्वत को पार करके लगभग प्रथम शताब्दी के समय काल में भारत पर आक्रमण किया। कई क्षेत्रों को जीतने के बाद शकों ने भारत में अपनी पांच शाखाओं की स्थापना की। क्रमवार इन्होंने अफगानिस्तान पंजाब मथुरा पश्चिमी भारत तथा दक्षिण के क्षेत्रों पर अपना राज्य स्थापित किया।

भारत में शकों की पांच शाखाएं

पहली शाखा
यह भारत की मुख्य भूमि से बाहर अफगानिस्तान में स्थापित की गई मगर उस समय काल के अनुसार अफ्गानिस्तान पर भी भारतीय का ही शासन स्थापित था। दूसरी शाखा
शकों ने अपनी दूसरी शाखा को पंजाब राज्य के क्षेत्र में स्थापित किया जिसकी राजधानी तक्षशिला थी। इस शाखा का पहला प्रसिद्ध राजा माउस था। जिसने सिंधु घाटी के क्षेत्र में शकों को स्थापित  किया।

तीसरी शाखा
यह शाखा भारत के उत्तर प्रदेश के जिले मथुरा में स्थापित की गई जिसकी राजधानी मथुरा ही थी। इस शाखा का प्रमुख  शासक  राजुवुल था। चौथी शाखा- यह पश्चिमी भारत पर शासन करने वाली शाखा थी जिसने मालवा गुजरात कोंकण पर अपना शासन स्थापित किया।

पाँचवीं शाखा
इन्होंने दक्षिणी भारत के ऊपरी हिस्से पर अपना शासन स्थापित किया।

शकों के प्रमुख शासक

शक अपने भारतीय राजाओं को सत्रप कहते थे जो कि दो मुख्य वंशों में विभाजित थे। पहला क्षहरात वंश था वहीं दूसरा कार्दमक वंश था।

1.क्षहरात वंश 
इस वंश ने नासिक क्षेत्र में अपना शासन स्थापित किया। इस वंश का सबसे प्रतापी राजा नहपान था। इसने सातवाहन साम्राज्य के कई क्षेत्र विशेष के जीता था। लेकिन कुछ समय के बाद सातवाहन वंश के शासक गौतमी पुत्र शातकर्णी ने नाहपान को युद्ध में पराजित कर मार डाल। इस बात का प्रमाण हमें जोगलथम्बी से प्राप्त हुए सिक्कों से मिलता है।

2.कार्दमक वंश
इस वंश ने उज्जयिनी के क्षेत्र में अपना शासन स्थापित किया। इन्हें उज्जयिनी के सत्रप के नाम से भी जाना जाता है। इस वंश के संस्थापक ने उज्जयिनी को अपनी राजधानी बनाया।

संस्कृत भाषा का अभिलेख

रुद्र दामन प्रथम इसने गुजरात के जूनागढ़ में प्रसिद्ध गिरनार अभिलेख का निर्माण करवाया जो की पूरी संस्कृत भाषा में लिखा गया सबसे बड़ा अभिलेख था। इसके साथ ही रुद्र दामन ने मौर्य काल की प्रसिद्ध सुदर्शन झील को भी अपने नीजी खर्च पर जीर्णोद्धार करवाया था। बताते चलें कि रुद्र दामन अपने समय काल का तथा शक इतिहास का सबसे प्रसिद्ध एवं शक्तिशाली राजा था। इसने सातवाहन वंश के राजा वशिष्ठीपुत्र पुलुमावी को युद्ध में दो बार पराजित किया था। लेकिन वैवाहिक संबंध होने के कारण उसे छोड़ दिया।

विक्रम संवत

57 ईसा पूर्व के समय काल में मालवा यानी उज्जैन के स्थानीय राजा ने शकों को युद्ध में बुरी तरह से पराजित करके भारत से खदेड़ दिया। इस ऐतिहासिक जीत के उपलक्ष्य में उन्होंने विक्रमादित्य की उपाधि धारण की और 57 ईसा पूर्व के समय काल में ही विक्रम संवत की शुरुआत की। इसके बाद से ही विक्रमादित्य एक प्रसिद्ध शाही उपाधि बन गई

शकों का अन्त
चौथी शताब्दी के समय काल में गुजरात में शक शासन को जड़ से उखाड़ फेंकने कार्य गुप्त वंश के महान सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय द्वारा किया गया। इनके द्वारा अंतिम शक शासक रुद्र सिंह तृतीय को युद्ध में पराजित कर मारा दिया गया इस प्रकार भारत से पुरी तरह से शक साम्राज्य का अंत हुआ। इस जीत के बाद चंद्र गुप्त द्वितीय ने शाकरि की उपाधि धारण की जिसका अर्थ है शकों का विनाश करने वाला। इसी समय काल में उनके द्वारा व्याघ्र शैली में लिखे चांदी के सिक्के जारी किए गए

धातुओं का प्रयोग

1 चांदी के सिक्के
पश्चिमी क्षत्रप यानी रुद्रदामन ने सबसे पहले व्यवस्थित रुप से चांदी के सिक्के जारी किए। इन सिक्कों का द्रुम कहा जाता था

2 तांबा और सीसा 
आम जनता रोजमर्रा के व्यापार के लिए तांबे और सीसे के सिक्के प्रयोग करती थी जिन्हें भारी मात्रा में शक शासकों द्वारा बनाया गया था

3 सोने के सिक्के 
शकों द्वारा कोई भी सोने का सिक्का नहीं जारी किया गया। सोने के सिक्कों का श्रेय मुख्य रुप से कुषाणों और गुप्त वंश को जाता है

खास बात यह है कि भारतीय इतिहास में पश्चिमी क्षत्रप पहले ऐसे शासक थे जिन्होंने अपने सिक्कों पर टंकण का वर्ष लिखना शुरु किया था जिसके चलते इतिहासकारों के लिए शकों का सटीक कालक्रम और राजाओं के शासन काल का पता लगाना बेहद आसान हो गया। इन सिक्कों पर लिखी तिथियों की खास बात यह भी थी कि इन्हें शक संवत के आधार पर लिखा जाता था

सिक्कों में द्विभाषी लिपि का प्रयोग किया जाता था। सिक्के के सामने वाले भाग पर ग्रीक भाषा में राजा का नाम लिखा जाता था तथा सिक्के के पिछले भाग पर स्थानीय भाषा प्राकृत या ब्राह्मी  य खरोष्ठी लिपि का प्रयोग किया जाता था

इसके अलावा सिक्कों पर राजा का चित्र बनाया जाता था जिसमें राजा मध्य एशियाई शैली में टोपी पहने हुए होता था इस प्रकार के सिक्के की  दूसरी तरफ तीन चोटियों वाले पहाड़ की आकृति कुरेदी जाती थी। इसके साथ ही कुछ सिक्कों पर सूर्य चंद्रमा वज्र और कभी कभी देवी देवताओं के चित्र भी कुरेदे जाते थे

कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न

1 भारत में शक मूल रुप से किस क्षेत्र से आये थे। उत्तर शक मूल रुप से मध्य एशिया के स्टेपी क्षेत्र से आए थे जिन्हें बाद में इंडो सिथियन के नाम से जाना गया।

2 क्षहरात वंश के प्रमुख शासक नहपान को किस सात वाहन वंश के  राजा ने पराजित किया था
उत्तर गौतमी पुत्र सातकर्णि ने नहपान को बुरी तरह से पराजित किया था और उनके द्वारा जारी किए गए सिक्कों पर अपने नाम की मुहर लगवाई।

3 किस शक शासक ने संस्कृत भाषा में सबसे पहला और लम्बा अभिलेख जिसे हम जूनागढ़ अभिलेख के रुप में भी जानते हैं को जारी किया।उत्तर इसका नाम रुद्र दामन था यह कर्दमक वंश से सम्बन्धित था यह भारत का सबसे लंबा पहला शिला लेख था।

4 पश्चिमी क्षत्रपों की मुख्य राजधानी कहां थी।उत्तर उज्जैन य उज्जयिनी थी।

5 भारत में शक सत्ता का अंतिम रुप से उन्मूलन किस गुप्त शासक ने किया।
उत्तर चंद्र गुप्त द्वितीय ने रुद्र सिंह तृतीया को पराजित करके।

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