प्रस्तावना
प्रस्तुत लेख में मराठा साम्राज्य की प्रसिद्ध महारानी अहिल्या बाई होलकर जीवन तथा उनके द्वारा किए महत्वपूर्ण कार्यों तथा भारतीय तीर्थ स्धानों तथा गरीबों लिए उनके द्वारा किए गए कार्यों पर प्रकाश डाला गया। सम्पूर्ण जीवन अत्यधिक कष्ट सहने बावजूद भी उन्होंने देश के विकास के लिए महत्वपूर्ण कार्य किए। आज भी प्रति वर्ष इन्दोर में उनके स्वर्गवास के दिन तथा भाद्रपद कृष्णा चतुर्दशी के दिन को अहिल्योत्सव के रुप में मनाया जाता है।
परिचय
अहिल्या बाई होल्कर का जन्म 31 मई 1725 को महाराष्ट्र के अहमद नगर जिले में क्षत्रीय धनगर परिवार में चौंडी नामक ग्राम में हुआ था। उनके पिता मनकोजी राव शिंदे गांव के मुखिया थे। जिन्होंने उन्हें पढ़ना लिखना सिखाया। एक छोटी बालिका के रुप में उनकी सादगी और मजबूत व्यक्तित्व से मालवा क्षेत्र के सुबेदार मल्हार राव होल्कर इतने प्रभावित हुए कि 1733 में उनका विवाह अपने बेटे खांडेराव होल्कर से करवा दिया। बारह वर्ष की अल्पायु में उनका विवाह हो गया था।
1766 में उनके ससुर मल्हार राव का निधन हो गया। उनके पति खंडेराव होल्कर स्वभाव से बहुत ही उग्र स्वभाव के थे। जिसे उन्होंने अपने बचपन से ही सहना शुरु कर दिया था। जब वे उन्तीस वर्ष की अवस्था में थी तभी उनके पति का देहांत हो गया। अपने पति की मृत्यु के बाद अहिल्याबाई इतनी दुखी हो गईं कि उन्होंने सती होना चाहा मगर उनके ससुर ने उन्हें ऐसा करने से रोका और उन्हें हिम्मत दी।
इसके साथ ही जब वे 43 साल की उम्र की हुईं तो उनके बेटे मालेराव का देहान्त हो गया। मगर उन्होंने अपने बेटे के दुख को खुद पर हावी होने नहीं दिया। अहिल्याबाई जब 62 वर्ष की हुईं तो उनके लड़की के लड़के जिसे वे अत्यधिक स्नेह करती थीं जिसका नाम नत्थू था उसका देहांत हो गया।
मात्र चार वर्ष बाद उनके दामाद यशवन्त राव फणसे का देहांत हो गया और उनकी पुत्री मुक्ताबाई सती हो गई। इन सभी के जाने के बाद उनका स्नेह अपने दूर के सम्बन्धी तुकोजीराव के पुत्र मल्हार राव बढ़ा। उन्हें लगा बुढ़ापे में वही उनका सहारा बनेगा और शासन व्यवस्था न्याय और प्रजातंत्र की देखरेख करेगा। मगर उसने उनके अंतिम समय तक दुःख ही दिया।
प्रशासन
1766 में अपने ससुर के मरने के बाद तथा अपने बेटे के मरने का बाद भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और राज्य और अपने लोगों के कल्याण के लिए उन्होंने पेशवा से मालवा का शासन चलाने की अनुमति मांगी। कुछ राज्य मंत्रियों को उनके शासन चलाने से आपत्ति थी लेकिन फिर भी उन्हें सेना का समर्थन प्राप्त हुआ। क्योंकि वे उनके युद्ध कौशल से भलीभांति परिचित थे। 1761 में पेशवा ने अहिल्याबाई को मालवा पर राज्य करने की अनुमति दे दी। वे सिंहासन पर 11 दिसंबर 1767 पर मालवा की राजगद्दी पर बैंठी।
अहिल्याबाई ने 1754 में कुम्हेर की लड़ाई में अपने पति को खोने के बाद मालवा पर अधिकार कर लिया। इसके बाद उन्होंने 1792 शक्तिशाली होल्कर सेना का निर्माण किया। महारानी अहिल्याबाई ने मालवा पर न्यायपूर्ण तरीके से शासन किया। उनके शासन काल में मालवा में शांति समृद्धि और स्थिरता का माहौल था। इस प्रकार उनकी राजधानी महेश्वर साहित्यिक संगीत कलात्मक और औद्योगिक गतिविधियों के केंद्र में तब्दील हो गई।
उन्होंने अपने साम्राज्य में कवियों कलाकारों मूर्तिकारों और विद्वानों का स्वागत किया इसके साथ रानी साहिबा उनके कलात्मक प्रतिभा के सम्मान में उन्हें इनाम भी देतीं थीं। आम जन समाज की समस्याओं को सुनने के लिए वे हर रोज़ सार्वजनिक सभाओं का आयोजन करती थी। उन्होंने खुद को न केवल एक योग्य शासक साबित किया बल्कि बेसहारा लोगों संरक्षक और मार्गदर्शक बनी। उनका शासन इंदौर से आगे तक फैला हुआ था।
रानी साहिबा के सेनापति
मल्हार राव के भाई बन्दों तुकोजी राव होल्कर एक विश्वास पात्र व्यक्ति थे। मल्हार राव जी ने भी उन्हें सदी अपने साथ में रखा था और राज्य के कार्यों के लिए तैयार कर लिया था। रानी साहिबा ने भी इन्हें अपना सेनापति नियुक्त किया और राजस्व कर वसूली का कार्य सौंपा जिसे मालवा में चौथ कहा जाता था। इसे सरदेशमुखी के नाम से भी जाना जाता था तथा यह कार्य करने वाले को मुल्कगिरी कहा जाता था। तुकोजी राव राज्य का कार्य पूरी लगन और ईमानदारी से करते थे।
इतिहासकार बताते है कि तुकोजीराव महारानी अहिल्याबाई से बड़े थे मगर तुकोजीराव होल्कर जी उन्हें अपनी माता के समान ही मानते थे। रानी साहिबा भी उन्हें अपने बेटे की तरह ही मानती थीं।
देश के विकास में योगदान
धार्मिक कुरीतियों का अंत
रानी साहिबा में उस समय काल में देश में फैली कुरीतियों का अंत करने के अथक प्रयास किए। रानी अहिल्याबाई धार्मिक पांखड सती प्रथा भृगु पतन महिला शिक्षा का शोषण तथा इस प्रकार के अंधविश्वासों का कड़ा विरोध करती थी। उन्होंने अपने समय काल में इन सामाजिक कुरीतियों को रोकने के लिए अहम फैसले लिए। अपने प्रयासों को माध्यम से वे कुछ कुरीतियों को जड़ से समाप्त करने में सफल भी रहीं।
सती प्रथा
रानी साहिबा ने सती प्रथा का कड़ा विरोध किया स्वयं के सती होने को दौरान अपने ससुर के रोके जाने पर उन्हें समझ आया की पति के जाने पर स्वयं को दण्ड देना उचित नहीं है ऐसा करने पर हम अपनी और अपने चाहने वालों की जिम्मेदारियों से पीछे हट रहे है जो कि बुज़दिल होने की पहचान है। इस परम्परा के चलते स्वयं इच्छा से सती न होने वाली महिलाओं के साथ समाज द्वारा अत्याचार किया जात था। अंत उपरोक्त कारणों के चलते रानी साहिबा ने इस प्रथा का विरोध किया।
भृगु पतन
इस प्रथा में मोक्ष पाने य स्वर्ग जाने के प्रति अंधविश्वास प्रचलित था कि पहाड़ी से कूदकर आत्महत्या करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस प्रथा के चलते हजारों लोग सदियों से अपनी जान देते आ रहे थे। इस प्रथा के पूर्ण करने के लिए प्रचलित स्थल नर्मदा नदी के किनारे और ओंकारेश्वर के निकट ऊंची खड़ी पहाड़ी थी। जहां से लोग कूदकर अपने जान दिया करते थे। पहले तो रानी साहिबा ने लोगों को समझाने का प्रयास किया लेकिन लोगों के नाम न मानने पर उनके प्रशासन द्वारा कड़े नियम बनाए गए। इसके चलते यह प्रथा समाप्त हुई।
नारी शिक्षा को बढ़ावा
अपने साम्राज्य की शिक्षा दीक्षा के लिए रानी साहिबा ने गुरुकुल और विद्यालयों की स्थापना करवाई। उस समय काल को दौरान स्त्री समाज को शिक्षा से दूर रखा जाता था जिसके कारण उनका बड़ा शोषण होता था। अपने स्वयं एक महिला होने के नाते रानी साहिबा इस दर्द को समझ सकती थी। परिणामस्वरूप रानी साहिबा ने महिला शिक्षा को ही नहीं बढ़ावा दिया बल्कि उन्हें अन्य कौशल जैसे घुड़सवारी तीरअंदाज़ी युद्ध कौशल के लिए भी अलग से शिक्षा शिविर खोले।
अपने इस कार्य को बढ़ावा देने के लिए रानी साहिबा ने महिला सेना का भी गठन किया जिसके कारण रानी साहिबा राज्य की रक्षा कानून व्यवस्था और महिला सशक्तिकरण का प्रतीक बनी। इसके साथ ही रानी अहिल्याबाई ने महेश्वर में कपड़ा उद्योग की स्थापना करवाई जो आज भी अपनी महेश्वरी साड़ियों के लिए प्रसिद्ध है।
धार्मिक कार्य
धर्म और ज्ञान में गहरी रुचि के चलते रानी साहिबा ने कई मंदिरों का निर्माण करवाया जिनमें 12 में से दो ज्योतिर्लिंग उन्ही के द्वारा निर्मित करवाए गए है। इसके साथ ही उन्होंने कई परोपकारी कार्य किए जैसे उत्तर भारत में मंदिरों घाटों तालाबों विश्राम गृहों का निर्माण भी करवाया।
1780 के समय काल में रानी साहिबा ने काशी विश्वनाथ मंदिर का विनिर्माण करवाया था। उनके योगदान का सम्मान देते हुए संस्थापकों द्वारा मंदिर में रानी अहिल्याबाई होल्कर की प्रतिमा भी स्थापित की गई है। इसके अलावा रानी साहिबा ने गुजरात प्राचीन सोमनाथ मंदिर का निर्माण कराया था खास बात यह है कि यह मंदिर रानी साहिबा के नाम से ही लोकप्रिय है। हाल ही के समय में 20 अगस्त 2021 इस मंदिर का पुनः निर्माण करवाया गया है तथा मंदिर का उद्घाटन प्रधान मंत्री जी द्वारा किया गया।
31 मई 2025 को महारानी अहिल्या बाई होल्कर की 300वीं जयंती के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने भोपाल में विकास की कई परियोजनाओं का उद्घाटन किया। इसके अलावा भारत सरकार ने रानी साहिबा के सम्मान में स्मारक के रुप में डाक टिकट और एक विशेष सिक्का भी जारी किया गया है। बताया जा रहा है कि 300 के सिक्के पर रानी अहिल्याबाई होल्कर का चित्र होगा। इसके साथ ही लोक और पारंपरिक कलाओं में योगदान के लिए एक महिला कलाकार को राष्ट्रीय देवी अहिल्याबाई पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
अहिल्याबाई होल्कर कर्च माफी योजना
इस योजना के तहत महाराष्ट्र सरकार द्वार किसानों को वित्तीय सहायता करते हुए कर्ज में राहत दी जा रही है। इस योजना के तहत सरकार किसानों का दो लाख तक का फसव ऋण माफ किया जा रहा है। 26 मार्च 2026 को इस योजना को प्रारम्भ किया गया है।
अंतिम समय और विरासत
रानी साहिबा अहिल्याबाई का निधन 13 अगस्त 1795 को सत्तर वर्ष की आयु में हुआ। उनकी विरासत आज भी जीवित है उनके द्वार बनाये गए मंदिर सर्वजनीक स्थल इस बात का गवाह हैं। अहिल्याबाई की विरासत उनके द्वारा बनाए गए किले में झलकती है वे एक रानी ही नहीं एक महान योद्धा भी थीं। उनका सम्पूर्ण जीवन पूरे भारतीय समाज के सदैव के लिए एक मार्गदर्शक के रुप में कार्य करता रहेगा। हलांकि अहिल्याबाई का जन्मस्थान महाराष्ट्र में था लेकिन उनकी झलक इंदौर महेश्वर और कई अन्य क्षेत्रों में देखने को मिलती है।
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