प्रस्तावना
प्रस्तुत लेख में हम अहोम राजवंश के इतिहास इनकी विरासत तथा इनके पतन के मुख्य कारणों पर प्रकाश डाला गया है। इसके साथ इस राजवंश में विद्यमान कुरीतियों पर विचार किया गया है। इसके साथ ही मेआमोरिया विद्रोह के पीछे के मुख्य कारण तथा इस विद्रोह में अहोम राजवंश के राजकुमार के संयोग के कारण पर प्रकाश डाला गया है। खास बात यह है कि मेमोरिया विद्रोह अहोम साम्राज्य के खिलाफ ही हुआ था।
परिचय
अहोम साम्राज्य का प्रारंभिक शासन ब्रह्म पुत्र नदी घाटी के क्षेत्र में था धिरे-धिरे इन्होंने अपना विस्तार पश्चिम और पूर्व की तरफ किया। 1228 ई. में अहोम राजवंश कि स्थापना सुकाफा द्वारा की गई। जिसने असम के इतिहास को स्वरूप य आकार प्रदान करने में अहम भूमिका निभाई। इस राजवंश ने मुगलों को 17 बार युद्ध में पराजित करके असम के इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अहोम राजवंश के प्रथम राजा सुकाफा ने अपनी राजनीतिक कूटनीति और मोरान तथा बोराही जनजाति से गठबंधन करके इन क्षेत्रों में एक मजबूत साम्राज्य की स्थापना की। इस प्रकार अहोम साम्राज्य ने 1228 से लेकर 1826 तक लगभग 600 वर्षों तक शासन किया।
यह साम्राज्य अपनी अनूठी प्रशासनिक और सैन्य रणनीतियों के लिए उल्लेखनीय है जिसने इसे विदेशी आक्रमणों जिसमें विशेष रुप से मुगलों के आक्रमणों का प्रतिरोध करने में सक्षम बनाया। मुगलों का साथ इनका युद्ध 1671 में राजा लाचित बोरफुकन के नेतृत्व में ब्रह्मपुत्र नदी के सारईघाट के क्षेत्र में लड़ा गया था। इतिहासकारों के अनुसार यह युद्ध मुगलों पर अंतिम विजय का प्राप्त करने के लिए लड़ा गया जिसमें इन्होंने किसी भी पड़ोसी साम्राज्य से किसी भी प्रकार की कोई मदद नहीं मांगी और स्वयं ही सम्पूर्ण मोर्चे को सम्भाला।
कहा जाता है कि भारतीय इतिहास में यह युद्ध नौसैनिक युद्धों में सर्वश्रेष्ठ उदाहरणों में से एक है।
साम्राज्य के पतन का कारण
पाईक प्रणाली
दरअसल यह प्रणाली अहोम साम्राज्य की रीढ़ थी इस प्रणाली के अंतर्गत प्रत्येक वयस्क पुरुष जिसकी उम्र 17 से 55 वर्ष के अंतर्गत होती थी उसे पाइक के रुप में पंजीकृत किया जाता था। इन्हें गोट्स नामक इकाई में संगठित किया जाता था जिनमें मुख्य रुप से चार सदस्य हुआ करते थे। इनमें एक सदस्य राज्य सेवा करता था तथा बाकी के तीन कृषि संबंधी जिम्मेदारियों का प्रबंधन करते थे। यह कार्य क्रमवार तरीके से बारी-बारी से किया जाता था।
अहोम साम्राज्य में इसी प्रणाली से ही सैन्य तैयारी श्रम संगठन तथा कुशल राजस्व प्रबंधन होता था। पाइक कहने को तो राजस्व कर्मी थे लेकिन इनका जीवन किसी दास से कम नहीं था। अगर कार्य की अवहेलना की जाती थी तो उस पाइक को मृत्यु दण्ड दिया जाता था। जिस कारण से इनकी दशा दिन-ब-दिन दयनीय होती चली गई।
मोआमरिया विद्रोह
1769 से लेकर 1805 ई. दौरान यह विद्रोह अहोम साम्राज्य के खिलाफ हुआ जो कि एक सामाजिक धार्मिक तथा राजनीतिक आंदोलन था। मोआमरिया मुख्य रुप से असम के मोआमरा सत्र वैष्णव मठ के अनुयायी थे। इस विद्रोह में मटक कचरी मोरन तथा अन्य स्थानीय कृषक जन जातियां शामिल थीं। ये सभी श्रीमंत शंकरदेव द्वारा शुरु किए गए वैष्णव भक्ति आंदोलन यानी एक शरण नामक धर्म का पालन करते थे। यह धर्म समानता और भ्रातृत्व पर जोर देता था।
विद्रोह का मुख्य कारण
धार्मिक उत्पीड़न
अहोम शासक शाक्त देवी पूजा संप्रदाय को मानते थे। राजा शिव सिंह की रानी फुलेश्वरी ने मोआमरिया संघठन के गुरुओं का अपमान किया और उन पर जबरन बलि प्रथा व शाक्त रीति-रिवाजों को थोपने की कोशिश की। जिसमें उनके समुदाय में राजा के प्रति विरोध भड़क उठा।
पाईक प्रणाली
वही कुछ पाईक प्रणाली से न खुश थे जिसके तहत आम जनता द्वारा राजा के लिए मुफ्त का शारीरिक श्रम और सैन्य सेना ली जाती थी। जिस कारण से जनजाति लोगों को विद्रोह संगठित किया।
सामाजिक असमानता
अहोम राजवंश का ढांचा राजा और अभिजात्य वर्ग के वर्चस्व पर टिका था जबकि मोआमोरिया विद्रोह सामाजिक बराबरी की बात कर रहा था।
विद्रोह का परिणाम
1769 में विद्रोहियों ने राजधानी पर कब्जा कर लिया और राजा लक्ष्मी सिंह को गद्दी से हटा कर अपनी सरकार बनाई। हलांकि फिर से अहोम राजाओं ने सत्ता अपने हाथ में ली मगर यह विद्रोह रुक-रुक 1805 तक चलता रहा जिसने साम्राज्य की कमर तोड़ दी। इस प्रकार अहोम साम्राज्य धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगा।
अंत में विद्रोह के चलते सत्ता संभालना मुश्किल हो गया अंत इस अराजकता का फायदा उठा कर बर्मा यानी म्यांमार ने अहोम साम्राज्य पर हमला कर दिया। सेना के विभाजित होने तथा ग्रह युद्ध के कारण राजा ने अहोम साम्राज्य को बचाने तथा बर्मी सेना को भगाने के लिए अंग्रेजों से हाथ मिला लिया। परिणामस्वरूप 1826 की यांडबू की संधि को दौरान पूरा असम अंग्रेजों के अधीन हो गया और इस प्रकार से अहोम साम्राज्य का अंत हो गया।
अहोम साम्रज्य के प्रमुख शासक
सुकाफा
इसका शासन काल 1228 से 1268 ई. तक का था इसने ब्रह्मपुत्र नदी घाटी से असम में प्रवेश करके 1228 में अहोम साम्राज्य की स्थापना की। इसने कूटनीति राजनीति के माध्यम से मोरान बोराही तथा अन्य स्थानीय जनजातियों को अपने साथ मिलाया और अपनी राजनीतिक सत्ता को स्थापित किया। इसे अहोम साम्राज्य के संस्थापक के रुप में देखा जाता है।
सुहुंगमुंग
इसका शासन काल 1497 से 1539 तक के समय काल तक रहा। इसे स्वर्ग नारायण तथा दिहिंगिया राजा के नाम से भी जाना जाता है। इसने अपने शासन काल में अहोम साम्राज्य को एक विशाल क्षेत्र के रुप में विस्तारित किया। इस राजा का शासन काल सांस्कृतिक एकीकरण के रुप में महत्वपूर्ण रहा। इस राजा ने अपने शासन काल में अपनी राजधानी बकाता में स्थानांतरित की जिसके चलते प्रशासनिक नियंत्रण और मजबूत हुआ। इस राजा ने अपने साम्राज्य का विस्तार पश्चिमी क्षेत्रों में अधिक किया।
प्रताप सिंघा
इस राजा का शासन काल 1603 से 1641 तक का था जिसमें इसने अहोम साम्राज्य के केंद्रीकृत प्रशासनिक ढांचे को सुदृढ़ किया। इसी राजा ने पाइक प्रणाली का पुनर्गठन किया और इसे अधिक संरचित और कुशल बनाने का प्रयास किया। इसके साथ ही इसने बाहरी खतरों का मुकाबला करने के लिए सैन्य संगठन को मजबूत बनाया। इस राजा के शासन काल में बोरफुकन जैसे प्रमुख प्रशासनिक कार्यालयों को ओर मजबूत बनाया गया जिसके चलते सिमा वर्ती शासन और राज्य नियंत्रण में विस्तार हुआ।
जयध्वज सिंह
इस राजा का शासन काल 1648 से 1663 तक का था ये वही दौर था जब भारत के अधिक तम क्षेत्रों पर मुगलों का शासन था। इस समय काल मुगलों ने अपना वर्चस्व भारत में स्थापित कर लिया था जिसके कारण इस राजा को भारी दबाव में शासन चलाना पड़ा। मुगलों के साथ 1663 में जयध्वज सिंह ने घिलाझरिघाट की संधि पर हस्ताक्षर किए। जिसके कारण अहोम साम्राज्य के कुछ क्षेत्रों पर मुगलों का शासन स्थापित हुआ।
गदाधर सिंह
इस राजा का शासन काल में जयध्वज सिंह के शासन काल की राजनीतिक उथल-पुथल समाप्त हुई। गदाधर सिंह ने केंद्रित सत्ता को पुनः स्थापित किया तथा सैन्य संरचना को और मजबूत किया और राज्य के आंतरिक संघर्षों पर रोक लगाई। इस राजा के शासन काल में वैष्णव संस्थाओं को समर्थन मिला। जिसके कारण सांस्कृतिक सुदृढ़ीकरण में मजबूती आयी।
रुद्र सिंह
इस राजा का शासन काल 1696 से 1714 तक का था रुद्र सिंह के शासन काल में प्रशासनिक दक्षता और सांस्कृतिक विकास का एक महत्वपूर्ण दौर चला। इस राजा ने रंगपुर को अपनी नई राजधानी बनाया तथा महल परिसरों तथा सार्वजनिक निर्माण कार्यों सहित महत्वपूर्ण स्थापित्व परियोजनाओं को बढ़ावा दिया। उनके शासन काल में पड़ोसी क्षेत्रों के साथ राजनीतिक संबंध स्थापित किए गए और अहोम साम्राज्य के राजनीतिक प्रभावों को बढ़ाने का प्रयास किया।
पुरंदर सिंह
इस राजा का शासन काल 1818 से लेकर 1838 ई. तक का था। उनका शासन काल राजनीतिक अस्थिरता और विदेशी हस्तक्षेप का दौर रहा। 1826 में बर्मा के आक्रमणों और यंदबो की संधि के बाद असम में ब्रिटिश सत्ता स्थापित हो गई।
.webp)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें