Indian History reveal the Past

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बुधवार, 2 सितंबर 2026

गोरिल्ला युद्ध गनीमी कावा

guerilla warfare

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में मराठा साम्राज्य के महान राजा एवं मराठा छत्रपति शिवाजी की महाराज की गौरिल्ला युद्ध रणनीति जिसे हम गनीमी कावा के नाम से भी जानते है के बारे में चर्चा करेंगे। शिवाजी जी महाराज ने सीमित सैन्य बल होने के बावजूद भी 27 सालों तक मुगल सेना को कड़ी टक्कर दी। इसके साथ ही शिवा जी महाराज द्वारा लड़े युद्धों के बारे में चर्चा करेंगे। आगे लेख में यह समझने की कोशिश करेंगे की इस युद्ध रणनीति में किन तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता था जो इसे खास बनाती है।

परिचय

गलीमी कावा की खोज मराठा साम्राज्य के महाराज छत्रपति शिवा जी ने की उनका जन्म 16 फरवरी 1630 में महाराष्ट्र के पुणे जिला में शाह जी भोसले के घर हुआ। जो की उस समय काल में मुगल शासक आदिल शाह के सेनापति थे। अपने समय काल में उनके पास पुणे चाकण पुणे तथा सुपे की बड़ी जागीर को मुगल शासकों के सामन्त के रुप में सम्हालते थे। बाद में उन्हें बंगलूरु जागीर का भी कार्य भार संभाला। शिव जी की माता का नाम जीजाबाई था।

शिवा जी अपने पिता के समान  मुगल शासकों का सामन्त नहीं बनना चाहते थे मगर उनका विरोध करना भी कठिन था क्योंकि मुगलों को पास विशाल सेना थी और शिवा जी महाराज  के पास मात्र मुठ्ठी भर सैनिक। लेकिन फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी। इस प्रकार गनीमी कावा नामक युद्ध रणनीति का उदय हुआ।

यहाँ खास बात यह है कि शाह जी राजे ने ही शिवा जी महाराज को पुणे की जागीर का प्रबंधन सौंपा और उन्हें दादो जी कोंडदेव जैसे कुशल गुरु का संरक्षण प्राप्त हुआ। जिनके चलते ही आगे चलकर शिवा जी महाराज को हिंदवी स्वराज्य की स्थापना करने का आधार मिला।

गनीमी कावा की युद्ध रणनीति

अचानक हमला
इस युद्ध nरणनीति की सबसे खास बात यह थी कि अचानक हमला किया जाता था ताकि जब तक दुश्मन जबतक तैयार हो तब तक हरा दिया जाए। इस योजना के चलते दुश्मन शिविरों पर तथा आपूर्ति लाइनों यानी अनाज रखने या लाने की जगह पर अचानक व अप्रत्याशित हमने किए जाते थे ताकि दुश्मन को हथियारों और अनाज को समाप्त किया जा सके।

गतिशीलता
शिवा जी महाराज युद्ध के दौरान भारी हथियारों व ढाल का इस्तेमाल नहीं करते थे ताकि उनके सैनिक तेजी से हमला करके के पीछे हट जाए। अतः युद्ध के दौरान हल्के हथियारों का इस्तेमाल किया जाता था।

भूभाग का  प्रयोग
शिवा जी महाराज की गनीमी कावा रणनीति को दौरान ऐसे छोटे और संकरे क्षेत्र का इस्तेमाल किया जाता था जहां अधिक मात्रा में मुगल सैनिक न आ सके और समय रहते उन पर हमला किया जा सके। अपनी इस रणनीति को अंजाम देने के लिए युद्ध क्षेत्र के रुप में पश्चिमी घाट के पहाड़ी क्षेत्रों और वन क्षेत्रों का इस्तेमाल किया जाता था।
 
समूह में विभाजन
इस रणनीति की खास विशेषता यह थी कि शिवा जी महाराज अपने सैनिकों को छोटी-छोटी  टूकडीयों में विभाजित कर देते थे। जिनके माध्यम से सैनिकों को युद्ध के दौरान आराम करने का मौका भी मिल जाता था और युद्ध कौशल का परिचय देना का भी। अपनी इस रणनीति के दौरान ही शिवा जी महाराज दुश्मन सेना की मुखबिरी करवाते और उनकी आगामी चाल का पता लगाते थे जिसके अनुसार ही आगामी युद्ध की रणनीति को बनाया जाता था।

मनोवैज्ञानिक युद्ध रणनीति
यह इस युद्ध रणनीति का आखिरी चरण था जिसमें दुश्मन सैनिकों में भ्रम य भय पैदा किया जाता था। जिसमें दुश्मन सेना की आगे कि चाल को समझते हुए, मराठा सैनिक उस स्थान पर पहले से घात लगाए बैठे रहते थे और हमला करने के सही समय का इंतजार करते थे। जिसमें दुश्मन सैनिकों के बगल से फुर्ती से गुजरना व अचानक से हमला करना यानी दुश्मन सैनिक उन्हें देख भी नहीं पाते तो और घायल हो जाते थे। जिसके चलते उनके अंदर भूत प्रेत के होने की शंका होने लगती थी।

इसके अलावा पहाडीयों के संकरे रास्ते से दुश्मन को खायी में गिराना तथा जंगल जाल बिछा कर रखाना भी इस रणनीति का खास हिस्सा था। कुल मिलाकर अगर मराठा सैनिकों गनीमी कावा रणनीति का इस्तेमाल न करते तो, मुगल सैनिकों को आमने-सामने के लड़ाई में हराना नामुमकिन था क्योंकि वे संख्या में ज्यादा थे।

शिवा जी महाराज द्वारा लड़े गए युद्ध

प्रतापगढ़ का युद्ध 1659
यह गनीमी कावा युद्ध शैली का एक अच्छा उदाहरण है जिसमें शिवाजी महाराज ने बीजापूर सल्तनत के सेनापति अफजल खान को  हराने के  लिए गोरिल्ला युद्ध रणनीति का सहारा लिया। शिवा जी ने पहले बड़े युद्ध से परहेज किया इसकी जगह पर पहाड़ी इलाकों में अचानक हमले और घात लगाकर आक्रमण किए गए। उन्होंने स्वयं एक रणनीतिक बैठक के दौरान अफजल खान का सामना किया और एक गुप्त छोटे हथियार से उसे मार डाला। परिणामस्वरूप शत्रु सेना का मनोबल टूट गया। अंत में मुगल सेना पीछे हटने के मजबूर हो गयी। इस प्रकार शिवा जी महाराज की विजय हुई।

अहमद नगर और जुन्नर अभियान 1657
यह मुगलों के साथ पहला सिधा हमला था जिसमें शिवा जी सेना ने मुगल साम्राज्य की सीमाओं से प्रवेश कर छापा मार  युद्ध रणनीति का इस्तेमाल किया और उन्हें हार मानने पर मजबूर किया।

लाल महल हमला 1663
यह हमला पुणे जागीर पर सूबेदार शास्ता खान को हराने के लिए किया गया था। इस हमले के दौरान रात में तीसरे पहर का इस्तेमाल किया गया। इस युद्ध के दौरान शास्ता खान को अपनी अंगुलियां गवानी पड़ी मगर वह भागने में सफल रहा।

सूरत की पहली चढ़ाई 1664
उस समय काल के दौरान सूरत मुगलों की मुख्य व्यापारिक बंदरगाह थी जिस पर मराठा सैनिकों ने हमला करके मुगल सैनिकों हराकर उन्हें भारी वित्तीय हानि पहुंचाने में सफलता हासिल की।

पुरंदर का युद्ध 1665
यह युद्ध मुगल सेनापति मिर्जा राजा जय सिंह की विशाल सेना के साथ लड़ा गया। जिसमें मराठा सैनिकों की हार हुई और उन्हें मुगलों के साथ पुरंदर की संधि करनी पड़ी।

सूरत की चढ़ाई 1670
पुरंदर की संधि टूटने का बाद मुगलों का आर्थिक हानि पहुंचाने के लिए सूरत पर फिर से हमला किया गया। इस युद्ध के दौरान मराठा सैनिकों की जीत हुई।

सिंहगढ़ का युद्ध 1670
इस युद्ध में मुगल किले कोंढाणा के संरक्षक उदयभान राठौड़ को हराया गया और शिवा जी महाराज की जीत हुई।

वाणी-डिंडोरी का युद्ध
नासिक के पास मुगल सेना के सेनापति दाऊद खान को मराठा सेना ने खोले मैदान में युद्ध लड़ के पराजित किया।

साल्हेर का युद्ध 1672
यह मुगल सेना और मराठा सैनिकों के बीच खुले मैदान क्षेत्र लड़ा गया ऐतिहासिक युद्ध था। जिसमें मराठा सेना ने सेनापति इखलास खान को हराकर ऐतिहासिक विजय हासिल की।

इस प्रकार से देखा जाए तो शिवा जी महाराज का युद्ध कौशल केवल गनीमी कावा जैसी युद्ध रणनीति पर ही निर्भर नहीं था वे समय और परिस्थिति के अनुसार ही अपनी युद्ध रणनीति को अंजाम देते थे। श्रोतागणों से अनुरोध है कि इस रणनीति के बारे में य शिवा जी महाराज के युद्ध कौशल के बारे में अगर आपके पास कोई जानकारी है तो हमें जरूर साझा करें।

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