Indian History reveal the Past

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मंगलवार, 8 सितंबर 2026

भारत विभाजन 1947

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प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में भारत देश के बंटवारे के पीछे के कारण के साथ-साथ उन घटनाओं पर प्रकाश डालेंगे जो इस बटवारे के दौरान हुई। इसके साथ ही हम मोहम्मद अली जिन्ना तथा नेता जवाहर लाल नेहरु़ के मध्य के आपसी मतभेद पर प्रकाश डालेंगे। यह जानना इसलिए भी जरूरी क्योंकि दोनों ही कांग्रेस पार्टी को सदस्य थे जो की आजादी के बाद भारत और पाकिस्तान  के प्रधान मंत्री बने।

प्रत्यक्ष ब्रिटिश शासन

भारत में प्रत्यक्ष ब्रिटिश शासन 1857 की क्रांति के बाद से शुरु हुआ। इससे पहले भारत में ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी का शासन था जो कि भारत में व्यापार करने आयी थी लेकिन धिरे-धिरे इसने भारत पर शासन करना प्रारम्भ कर दिया। हलांकि भारत में प्रत्यक्ष ब्रिटिश शासन का भी विरोध हुआ क्योंकि इनका मुख्य लक्ष्य ब्रिटिश साम्राज्य वादी हितों की रक्षा करना था। ये ठीक उसी प्रकार था जैसे चोर के भाई से चोरी न करने को कहना।

यानी कहने का मतलब यह था है कि भले इस समय ब्रिटिश क्राऊन का शासन था मगर थे तो वे भी ब्रिटिश ही सो ऐसे में भारत में आज़ादी के लिए विद्रोह होना जारी रहा। आगे के कई वर्षों तक लगातार होते अत्याचारों और अन्याय ने स्वतंत्रता आंदोलन को और दृढ़ बनाया। 1920 के दशक तक असहयोग सविनय अवज्ञा आंदोलन के कार्यक्रमों ने अंग्रेजों पर भारत को स्वतंत्र करने के लिए दबाव बनाया। इसी क्रम में 1930 में जवाहर लाल नेहरु के  नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई।

1930 तक कई भारतीय मुसलमानों ने भी अपनी स्वतंत्रता के लिए हिंदु बहुल क्षेत्र से अलग स्वतंत्र राज्य की मांग करना प्रारम्भ कर दिया यह मामला मोहम्मद अली जिन्ना तक पहुंचा। खास बात यह है कि मोहम्मद अली जिन्ना और आगा खान जैसे मुस्लिम के कई महत्वपूर्ण नेता सभी भारतीय प्रांतों के एक संघ की परिकल्पना करते थे। दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी पर आरोप लगता रहा कि की कांग्रेस पार्टी का नेतृत्व हिन्दू समुदाय के प्रति अधिक है। मोहम्मद अली जिन्ना को लगा की कांग्रेस इस विवाद पर ज़रुर सफाई देगी मगर ऐसा हुआ नहीं।

दूसरी तरफ मुस्लिम समुदाय  के नेता होने के नाते मुस्लिम लीग ने 1939 के दौरान प्रकाशित रिपोर्ट के दस्तावेजी करण में यह पाया  कि कांग्रेस सरकार मुस्लिम मांगो व नौकरियों के लिए संवेदनशील नहीं है। इसके साथ ही लीग ने यह भी दावा किया की मुस्लिम मामलों की शिकायत निवारण में हिंदू बहु संख्यकों के प्रति पक्षपात दिखाया जा रहा है।

मुस्लिम लीग की पहली बैठक

वायसराय लार्ड लिनलिथगो जिनका शासन काल 1936 से 1943 तक का था द्वारा यह घोषणा की गई कि द्वितीय विश्व में जर्मनी के विरुध्द वे युद्ध में शामिल हो रहे है। जनता को जर्मनी के साथ युद्ध की सूचना दिए जाने के बाद विभाजन का मांग और बढ़ गई। हिंदू-मुस्लिम समुदाय दो गुटों में बट गये इस बहस को लेकर की युद्ध में शामिल हुआ जाए की नहीं। इसी बीच 1940 में उस समय काल पंजाब की राजधानी लाहौर में मुस्लिम लीग की पहली बैठक हुई जिसे लाहौर प्रस्ताव के नाम से जाना जाता है।

इसी प्रस्ताव को आगे चलकर पाकिस्तान प्रस्ताव के नाम जाना गया। लीग के प्रतिनिधियों द्वारा पारित किया गया की भारत की यह समस्या अंतर-सामुदायिक नहीं बल्कि स्पष्ट रुप से अंतर्राष्ट्रीय प्रवृत्ति की है। इस प्रकार लीग ने संकल्प लिया की अंग्रेजों द्वारा भारत के लिए प्रस्तावित कोई भी संवैधानिक योजना मुसलमानों को स्वीकार्य नहीं होगी जब तक की भारत का बंटवारा नहीं किया जाएगा। मुस्लिम लीग उत्तर-पश्चिम और पूर्वी क्षेत्रों को मुस्लिम बहुसंख्यक क्षेत्र के रुप में स्वतंत्र राज्य बनाना चाहते थे।

1942 में जब कांग्रेस पार्टी ने तत्काल प्रभाव से स्वतंत्रता और अंग्रेजों की वापसी की मांग रखते हुए भारत छोड़ो आंदोलन को शुरु किया तो मुस्लिम लीग तथा कांग्रेस की दरारें और भी गहरी हो गई क्योंकि मुस्लिम लीग का मानना था की तत्काल स्वतंत्रता से मुसलमानों को स्वायत्त-ता नहीं मिल पाएगी।

भारत स्वतंत्रता अधिनियम 1947

मार्च 1947 में लुई माउंटबेटन ब्रिटिश साम्राज्य क अंतिम वायसराय भारत आयें तथा भारत देश क उपनिवेशी का कार्य भार अपने हाथों में लिया। आदर्श रुप से सत्ता का हस्तांतरण एक भारतीय सरकार को करना था। ब्रिटिश राज को पूर्ण रुप से समाप्त करने के लिए उन्हें व्यापक स्वतंत्रता दी गई थी। माउंबेटन को जल्द ही यह बात समझ आ गयी की मुस्लिम लीग तथा कांग्रेस पार्टी के बीच का मतभेद तत्कालीन समय में सुलझाने योग्य नहीं था। अतः भारतीय सैनिकों के बीच बिद्रोह व ग्रहयुद्ध छिड़ने के वास्तविक खतरों को निपटाने के लिए तत्काल की किसी फैसले को लेना जरूरी थी।

इस प्रकार माउंबेटन ने भारत विभाजन योजना की घोषणा 3 जून 1947 को करी। इसके साथ ही ब्रिटेन की संसद ने 18 जुलाई 1947 को भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम को पारित किया गया। जिसमें आदेश दिया गया कि भारत और पाकिस्तान के उपनिलेशों का सीमांकन 15-15 अगस्त 1947 को मध्यरात्रि तक कर लिया जाए तथा संपत्तियों का विभाजन एक महीने के भीतर कर दिया जाए।

समय सीमा से पहले माउंटबेटन द्वारा नियुक्त सीमा और आयोग ने पंजाब और बंगाल को इस तरह विभाजित करने के लिए जी-तोड़ प्रयास किया। इसके तहत यह प्रयास किया गया की अधिक संभावित मुस्लिम आबादी पंजाब के नई सीमा के पश्चिम में और बंगाल की सीमा के पूर्व में रह जाए। बताते चलें कि इस आयोग के चार सदस्य मुस्लिम लीग पार्टी से थे और चार सदस्य कांग्रेस पार्टी से थे जिसकी अध्यक्षता सिरिल रेडक्लिफ द्वारा की गई। जो इससे पहले कभी भारत नहीं आये थे। 

अतः पार्टीयों के बीच मतभेद और समय सीमा के समीप आने के कारण रेडक्लिफ ने ही सीमाओं का निर्धारण किया। जिसे रेडक्लिफ रखा के नाम से जाना जाता है जो किसी भी पक्ष को संतुष्ट नहीं कर पायी और लोगों को आक्रोशित किया। इस आयोग के चलते पंजाब की विशाल सिख आबादी को लगभग दो भागों में विभाजित कर दिया गया।

यद्यपि आयोग ने सिखों के सबसे प्रसिद्ध शहर को भारतीयों को अधीन कर दिया था मगर सिख तीर्थ स्थल और जागीरें को पाकिस्तान के हलालें कर दिया। पश्चिमी पंजाब के कुछ सिखों ने शुरुआत में स्थानीय मुसलमानों को बाहर निकालने के प्रयास किए और जागीरों पर नियंत्रण बनाये रखने की कोशिश की मगर उनके प्रयासों का हिंसक रुप से विरोध किया गया।

अंत में भाग कर सिख समुदाय भारतीय क्षेत्र में आये इस प्रकार से भारत देश का विभाजन 14 और 15 अगस्त को संपन्न हुआ। लार्ड माउंटबेटन 14 अगस्त को पाकिस्तान आजादी समारोह में तथा 15 अगस्त को भारत आजादी को समारोह में शामिल रहे। इस प्रकार से 15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश राज का औपचारिक रुप से अंत हुआ। खास बात यह है कि 17 अगस्त तक दोनों देशों की सीमाएँ प्रकाशित नहीं की गई थीं।

नेहरु और जिन्ना के बीच विवाद का कारण

राष्ट्रीय पहचान
नेहरु चाहते थे कि चाहते थे कि धर्मनिरपेक्ष और एकीकृत भारत का निर्माण हो वहीं जिन्ना चाहते थे कि दो राष्ट्रों का निर्माण हो एक हिंदूस्तान और दुसरा पाकिस्तान।

सत्ता का ढांचा
जवाहर लाल नेंहरु चाहते थे कि मजबूत केंद्र सरकार का निर्माण हो ताकि देश का आधुनिक विकस हर क्षेत्र में एक साथ हो सके नियमों को सब के लिए एक जगह से पारित किया जाएं वही जिन्ना चाहते थे कि केंद्र मजबूत न हो सभी प्रांतों को अधिकतम स्वायत्त निर्णय लेने का अधिकार  मिले।

प्रतिनिधित्व
कांग्रेस पार्टी सभी धर्मों और समुदाय का प्रतिनिधित्व करती थी वहीं मुस्लिम लीग सिर्फ मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करती थी जो भी विवाद का एक मुख्य कारण रहा।

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