Indian History reveal the Past

हमारे इस ब्लॉग में भारतीय इतिहास, सांस्कृतिक इतिहास, राजवंशों आंदोलन स्टार्टअप टेक्नोलॉजी कला और वास्तुकला तथा आर्थिक इतिहास से संबंधित विषयों पर जानकारी दी जाती है। हम कम से कम शब्दों में ज़्यादा से ज़्यादा जानकारी देने की कोशिश कर रहे हैं।

लेबल

2026-10-26

कुंभलगढ़ का किला

 
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प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम कुंभलगढ़ किले के इतिहास के बारे में बात करने जा रहे है जो कि राजस्थान के राजसमंद जिले में अरावली पहाड़ियों की पश्चिमी श्रृंखला पर स्थित एक किला है। राजसमंद से लगभग 48 किलोमीटर और उदयपुर से 84 किलो मीटर दूर स्थित। खास बात यह है कि इस किले का निर्माण 15 शताब्दी में राणा कुंभा द्वारा करवाया गया था। यह किला अपने अपनी लम्बी दीवारों के कारण पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है।

इसके साथ ही 2013 में कंबोड़िया के नोम पेन्ह में आयोजित विश्व धरोहर समिति के 37वें सत्र में राजस्थान के अन्य किलों के साथ ही इस किले को यूनेस्को की विश्व धरोहर की सूची में शामिल किया गया है।

इतिहास

कुंभलगढ़ किले का निर्माण राणा कुंभा ने अपने शासन काल में करवाया था। राणा कुंभा का शासन काल 1443 से 1468 तक का था। राजा ने किले के निर्माण के लिए मेवाड़ के प्रसिद्ध वास्तुकार मंडन को चयनित किया था। कुंभलगढ़ शिलालेख के अनुसार किले का निर्माण 1448 में राणा कुंभा आदेश के उपरान्त प्रारम्भ हुआ। बताते चले के कि कुंभलगढ़ राणा कुंभा की दूसरी पसंदीदा राजधानी थी। कुंभलगढ़ किले के शाब्दिक अर्थ की बात करें तो इसका अर्थ है कुंभ का किला।

बताते चले कि राणा कुंभा का शासन काल मेवाड़ के रणधंबोर से ग्वालियर तक फैला हुआ था जिसमें वर्तमान मध्य प्रदेश और राजस्थान के बड़े भू-भाग शामिल थे। राणा कुंभा ने अपने मेवाड राज्य के 84 किलों में 32 किलों का निर्माण स्वयं करवाया था। इन सभी किलों में कुंभलगढ़ का किला सबसे बड़ा और भव्य है।

आक्रमण

किले पर पहला आक्रमण गुजरात के शासक अहमद शाह द्वितीय ने 1457 में किया था हलांकि वे अपने प्रयास में असफल रहा। उस समय स्थानीय लोगों में यह मान्यता थी कि किले में विराजमान देवी बन माता किले की रक्षा करती है। इस मंदिर को आगे चलकर विद्रोहियों द्वारा नष्ट करवा दिया गया।

दूसरा आक्रमण सुल्तान महमूद खिलजी ने 1458 में किया हलांकि वह असफल रहा। खिलजी ने सिलसिले वार रुप से 1458 , 1459, 1467 में आक्रमण किए मगर हर बार उसे असफलता ही मिली।

इसके बाद अकबर के सेनापति शाहबाज खान ने अक्तूबर 1577 में इस किले पर आक्रमण किया और छह महीने की घेराबंदी के बाद अप्रैल 1578 में किले पर कब्जा कर लिया। लेकिन 1583 में महाराणा प्रताप ने इस किले को पुनः प्राप्त कर लिया। 1818 में संन्यासियों के एक सशस्त्र दल ने किले की रक्षा के लिए एक चौकी बनवाई।

इसके बाद जेम्स टाड द्वारा उन्हें संन्यासियों को मना लिया गया जिसके बाद किले पर अंग्रेजों का कब्जा हो गया। कुछ समय बाद अंग्रेजों द्वारा किले को उदयपुर रियासत को वापिस कर दिया गया। मेवाड़ के अन्य शासकों द्वार किले में आगे के समय काल में अन्य महत्वपूर्ण कार्य करवाये गए।

महाराणा कुंभा द्वारा निर्माण करवायी गयी कुछ महत्वपूर्ण रचनाएं  जिनमें आवासीय भवन और मंदिर मुख्य थे। कुंभलगढ़ का किला महाराणा प्रताप का जन्म स्थल होने के कारण हो भी अधिक महत्वपूर्ण स्थल के रुप धारण कर लेता है।

वास्तुकला

जैसा की हमने पहले ही बताया कि किले के वास्तुकार उस समय के जाने माने वास्तुकार मंडन थे। श्री मंडन ने काम और कला शैली को संग्रह अपने ग्रंथ राजवल्लभ में किया है। यह किला अरावली पर्वतमाला पर समुद्र तल से 1100 मीटर ऊपर एक पहाड़ी की चोटी पर निर्मित है। किले की परिधि दीवारें 36 किलो मीटर तक फैली हुई है। जो इसे दुनिया की सबसे लंबी दीवारों में से एक बनाती हैं सामने की दीवारें 15 फुट ऊंची है।

किले के निर्माण में राजपूत कला शैली इसके साथ ही इंडो आर्यन तथा पारंपरिक भारतीय कला शैली का प्रयोग किया गया है। कुंभलगढ़ में सात प्रवेश द्वारा है किले के भीतर जैन और हिंदू दोनों मंदिर हैं। महल की चोटी से अरावली पर्वतमाला में कई किलोमीटर दूर तक देखा जा सकता है। किले के द्वार को क्षेत्रीय भाषा के रुप में पोल कहा जाता है।

7 पोल
किले के सभी सभी द्वारों का क्रम वार तरीके से वर्णन करें तो इसमें सबसे पहले आरठ पोल का नाम आता है उसके बाद हल्ला पोल फिर हनुमान पोल, रामपोल, विजय पोल, भैरव पोल, चौगान पोल का नाम आता है। 

आरठ पोल किले का पहला प्रवेश द्वार था। हल्ला पोल प्रवेश द्वार से नीचे की ओर ढलान पर स्थित है। हल्ला पोल के ठीक बाद बादशाही बावड़ी है जो एक सीढ़ी दार तालाब है जिसे मुगल सम्राट अकबर के सेनापति शाहबाज खान के 1578 में आक्रमण के बाद सैनिकों को पानी उपलब्ध कराने के लिए बनाया गया था। 

हल्ला पोल से अगला द्वार आधा किलोमीटर दूर हनुमान पोल है। हनुमान पोल दो मंजिला द्वार है जिसमें अष्टकोणीय बुर्ज हैं। इस द्वार का नाम इसके सामने स्थित हनुमान जी की पत्थर की प्रतिमा के नाम पर पड़ा है जिसे महाराणा कुंभा द्वारा निर्मित करवाया गया था।
राम पोल किले का मुख्य प्रवेश द्वार है पूर्व की ओर एक और प्रवेश द्वार है जिसे विजय पोल कहा जाता है। 

राम पोल से बादल महल तक पाँच और द्वार हैं, बादल महल किले के सबसे ऊँचे स्थान पर बना हुआ है। इन द्वारों के नाम भैरव पोल, नींबू पोल, चौगान पोल, पगड़ा पोल और गणेश पोल हैं।

हिन्दू मंदिर

गणेश मंदिर राम पोल के बाईं ओर स्थित इस मंदिर का निर्माण महाराणा कुंभा ने करवाया था और इसके गर्भगृह में गणेश जी की प्रतिमा स्थापित है। यह मंदिर एक ऊंचे चबूतरे पर स्थित है और दक्षिण दिशा से सीढ़ियों के माध्यम से इसमें प्रवेश किया जाता है। गर्भगृह में घुमावदार ईंटों से बना सजावटी शिखर है जबकि मंडप और मुखमंडप में गुंबदनुमा छत है।

चारभुजा मंदिर 
चार भुजाओं वाली देवी को समर्पित यह मंदिर गणेश मंदिर के ठीक दाहिनी ओर पहाड़ी ढलान पर स्थित है। यह एक ऊंचे चबूतरे पर बना है और पूर्व दिशा से प्रवेश द्वार वाली दीवार से घिरा हुआ है। 

नील कंठ महादेव मंदिर

1458 ई.में निर्मित किले के पूर्वी भाग में स्थित है। शिव के केंद्रीय गर्भगृह तक एक आयताकार घेरे और 24 विशाल स्तंभों द्वारा समर्थित संरचना से होकर पहुँचा जाता है। शिव की मूर्ति काले पत्थर से बनी है और इसमें 12 हाथ दिखाए गए हैं। शिलालेखों से संकेत मिलता है कि मंदिर का जीर्णोद्धार राणा सांगा द्वारा किया गया था। 

माताजी मंदिर
इसे खेड़ा देवी मंदिर भी कहा जाता है नीला कंठ मंदिर के दक्षिणी भाग में स्थित है। गोलेरा मंदिर समूह में 5 हिंदू मंदिर हैं। 
मामादेव मंदिर। राणा सांगा के बड़े भाई कुंवर पृथ्वीराज का स्मारक इस मंदिर के पास है।

श्वेतांबर जैन मंदिर
पार्श्वनाथ मंदिर 1513 के दौरान निर्मित करवाया गया था पूर्वी तरफ जैन मंदिर और बावन जैन मंदिर बनवाया गया है।
गोलेरा मंदिर समूह में 4 जैन मंदिर हैं। इसके साथ ही विजय पोल के पास 2 जैन मंदिर जूना भीलवारा मंदिर तथा पितृ शाह जैन मंदिर है। इसके बाद वेदी मंदिर का नाम आता है जो भी एक जैन मंदिर है जिसका निर्माण राणा कुंभा 1457 ईस्वी द्वारा किया गया था।

सभ्यता एवं संस्कृति


राजस्थान पर्यटन विभाग, महाराणा कुंभा की कला और वास्तुकला के प्रति प्रेम की स्मृति में किले में तीन दिवसीय वार्षिक उत्सव का आयोजन करता है। किले की पृष्ठभूमि में ध्वनि और प्रकाश शो आयोजित किए जाते हैं। समारोह के उपलक्ष्य में विभिन्न संगीत कार्यक्रम और नृत्य कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। उत्सव के दौरान आयोजित अन्य कार्यक्रमों में हेरिटेज फोर्ट वॉक पगड़ी बांधना, रस्साकशी और मेहंदी मंडना आदि शामिल हैं। 

जून 2013 में नोम पेन्ह में विश्व धरोहर समिति की 37वीं बैठक के दौरान राजस्थान के छह किले जिसे हम आमेर किला , चित्तौड़ किला , गागरोन किला , जैसलमेर किला , कुंभलगढ़ और रणथंबोर किला, यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल सूची में शामिल किए गए थे। इन्हें एक क्रमबद्ध सांस्कृतिक संपत्ति और राजपूत सैन्य पहाड़ी वास्तुकला के उदाहरण के रूप में मान्यता दी गई थी। 

सरकार द्वारा किए गए कार्य

1.यूनेस्को की विश्व धरोहर की सूची
केंद्र और राज्य सरकार के संयुक्त प्रयासों के परिणामस्वरूप वर्ष 2013 में कुंभलगढ़ किलो को राजस्थान के पहाड़ी किलों के समूह के अंतर्गत यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया है। इस अंन्तरराष्ट्रीय मान्यता के बाद किले के संरक्षण और वैश्विक स्तर पर प्रचार -प्रसार के लिए विशेष प्राथमिकता और फंड सुनिश्चित किया गए है।

2.संरक्षण और जीर्णोद्धार
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण तथा राज्य के पुरातत्व एवं सग्राहलय विभाग द्वारा किले की विशाल प्राचीन दीवारों बुर्जों ऐतिहासिक द्वारों कुंभ महल बादल महल और परिसर के भीतर स्थित प्राचीन जैन व हिंदू मंदिरों के जीर्णोद्धार और मजबूती का कार्य लगातार  किया जा रहा है।

3.पर्यटन सुविधाओं का विकास 
पर्यटकों को मेवाड़ के गौरवशाली इतिहास राणा कुंभा की उपलब्धियों और  महाराणा प्रताप के  जन्म स्थान के इतिहास से रुबरु कराने के  लिए ध्वनि एवं प्रकाश की व्यवस्था की गई है।

 इसके साथ ही उदयपुर राजसमंद और अन्य प्रमुख शहरों से कुंभलगढ तक पहुँचने वाली सड़कों का विस्तार और चौड़ा किया गया है ताकि पर्यटकों को सुगम यात्रा मिल सके। इसके  साथ ही बुनियादी सुविधाओं की बात करें तो पर्यटकों की सुविधा के लिए टिकट काउंटर पार्किंग स्थल साइन बोर्ड पेय जल और प्रकाश की व्यवस्था जैसे महत्वपूर्ण कार्य करवाये गए है।

4.राजस्थान पर्यटन विभाग द्वारा प्रतिवर्ष कुंभलगढ़ महोत्सव का आयोजन किया जाता है। इस तीन दिवसीय सांस्कृतिक उत्सव में देश-विदेश के कलाकार अपनी प्रस्तुतियाँ देते है तथा स्थानीय संस्कृति लोक कला और पर्यटन को बड़ा बढ़ावा देते है।

5.किले के चारों ओर के पर्वतीय और वन क्षेत्र को  कुंभलगढ़ वन्यजीव अभयारण्य के रुप में संरक्षित किया गया है। वन विभाग द्वारा यहां के पर्यावरण वनस्पतियों और वन्यजीवों तेंदुए भेड़िए और पक्षी प्रजा तियों की सुरक्षा के लिए कड़े उपाय किए गए है जिनमें किले के प्राकृतिक परिद़श्य की भी संरक्षण शामिल है।

निष्कर्ष

संक्षेप में कुंभलगढ़ फोर्ट भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत वास्तुकला और गौरवशाली इतिहास का अनूठा प्रतीक है। केंद्र और राजस्थान सरकार द्वारा किए गए निरंतर कार्यों तथा यूनेस्को की विश्व धरोहर की मान्यता तथा उन्नत पर्यटन सुविधाओं और वन्यजीव व पर्यावरण संरक्षण प्रयासों ने इस ऐतिहासिक धरोहर के स्वरूप को न केवल सुरक्षित रखा है बल्कि वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर इसकी स्थिति को और अधिक मजबूत किया है।

यह सभी प्रयास देश की ऐतिहासिक ख्याति को भावी पीढ़ियों के लिए संरक्षित करने और सांस्कृतिक पर्यटन को बढ़ावा देने की दिशा में अत्यंत सराहनीय और मील का पत्थर साबित हो रहें हैं। 

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