Indian History reveal the Past

हमारे इस ब्लॉग में भारतीय इतिहास, सांस्कृतिक इतिहास, राजवंशों आंदोलन स्टार्टअप टेक्नोलॉजी कला और वास्तुकला तथा आर्थिक इतिहास से संबंधित विषयों पर जानकारी दी जाती है। हम कम से कम शब्दों में ज़्यादा से ज़्यादा जानकारी देने की कोशिश कर रहे हैं।

लेबल

2026-10-06

मार्तंड सुर्य मंदिर

portrait photo of martand sun temple

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में मार्तंड सूर्य मंदिर के इतिहास के बारे में चर्चा की गई है। मंदिर की खास बात यह है कि इस मंदिर के निर्माण में गांधार  गुप्त ग्रीक रोमन सीरियाई-बीजान्टिन तथा चीन की स्थापित्व कला शैलियों के उत्कृष्ट मिश्रण से बनाया गया है।

मगर वर्तमान समय काल में यह मंदिर वीरान पड़ा हुआ मगर फिर भी अतीत की यादों को हमेशा ताज़ा रखता है यात्रियों को अपने आकर्षित कला के कारण आकर्षित करता है। यह मंदिर जम्मू-कश्मीर के अनंत नाग ज़िले के मत्तन नामक स्थान पर स्थित है। यह स्थान जम्मू-कश्मीर से लगभग 8 किलोमीटर दूर स्थित है।

परिचय

मार्तंड मंदिर जम्मू कश्मीर राज्य कश्मीर घाटी के अनंत नाग जिले के मट्टन नामक स्थान पर स्थापित किया गया था। जिसका निर्माण आठवीं शताब्दी के समय काल में हुआ था जो कि हिंदू धर्म के भगवान सूर्य को समर्पित है। सूर्य देवता का ही दूसरा नाम मार्तंड है जिस नाम पर ही इस मंदिर का निर्माण करवाया गया था।

इस मंदिर का निर्माण कार कोटा वंश के शासक ललिता दित्य द्वारा करवाया गया था। मंदिर का निर्माण नक्काशीदार काले पत्थरों से किया गया था यह मंदिर एक अद्वितीय भव्यता का अनुभव कराता है। जो कि प्रारंभिक मध्य युगीन भारतीय वास्तुकला की चमक को दर्शाती है। काले पत्थरों का चुनाव संरचना की मजबूती और स्थायित्व प्रदान करती है और आस पास का शांत परिदृश्य के बीच इस मंदिर की भव्यता को और बढ़ता है।

यद्यपि वर्तमान समय में यह खंडहर हो चुका है मगर मंदिर के अवशेष क्षितिज के समक्ष एक गौरवशाली आकृति के रुप में खड़े है जो आगंतुकों यानी यात्रियों को इसके अतीत की भव्यता की झलक प्रदान करते है। इस मंदिर की विशाल संरचना और इसकी विस्तृत सजावट इसके रचनाकारों की कलात्मक निपुणता और आध्यात्मिक गहराई की झलक प्रदान करती है। यह स्थापित्व प्राचीन शिल्प कला का प्राचीन शिल्प कौशल और अध्यात्मिक विरासत का प्रमाण है।

मार्तंड मंदिर को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी ए एस आई द्वारा राष्ट्रीय महत्व का स्थल घोषित किया गया है। यह मंदिर दुनिया भर से आगंतुकों को इसकी शाश्वत सुंदरता और ऐतिहासिक महत्व को देखकर आश्चर्यचकित होने के लिए आकर्षित करता है।

वास्तुकला

मंदिर का मुख्य आकर्षण केन्द्र इसका विशाल प्रांगण है जिसमें एक केंद्रीय गर्भगृह है जो स्तंभों की एक श्रृंखला और 84 छोटे मंदिर के बीच में स्थित है। यह प्रांगण 220 फुट लंबा और 142 फुट चौड़ा है। इसमें पहले निर्मित एक छोटा मंदिर भी आता है। इस प्रकार यह मंदिर एक अविस्मरणीय स्थापित्व संयोजन का निर्माण करता है जो कभी तीर्थ यात्रियों के पद चिन्हों और प्राचीन अनुष्ठानों के मंत्रों से गूंजता रहता था।

मार्तंड मंदिर एक पठार की चोटी पर बनाया गया था जहां स पूरी कश्मीर घाटी का नजारा देखा जा सकता था। खंडहरों तथा इससे सम्बन्धित पुरातात्विक खोजों से कहा जा सकता है कि यह कश्मीरी वास्तुकला का एक उत्कृष्ट उदाहरण था। यह मंदिर कश्मीर में पेरिस्टाइल का सबसे बड़ा उदाहरण है जो कि अपने विभिन्न कक्षों के कारण जटिल है।

यह निर्माण माप आकार में आनुपातिक और मंदिर की समग्र परिधि के साथ संरेखित है। मंदिर का मुख्य प्रवेश द्वारा प्रांगण के पश्चिमी भाग में स्थित है जिसकी चौड़ाई मंदिर के बराबर ही है जो की इस मंदिर की भव्यता को प्रदर्शित करती है।

मंदिर की केंद्रीय संरचना मंदिर के मुख्य भाग में स्थित है जो कि इसका शीर्ष है जिसकी संरचना पिरामिडनूमा की गयी थी। यह कश्मीर में बने मंदिरों की एक सामान्य विशेषता है। मंदिर के प्रवेश कक्ष में विभिन्न नक्काशियां की गई है जिनमें सूर्य देवता के अलावा विष्णु तथा नदी देवियों जैसे की गंगा और यमुना को दर्शाया गया है।

मंदिर के विनाश का कारण

इतिहासकार हसन अली के अनुसार इस मंदिर को 1430 के आसपास के समय काल में सूफी उपदेशक मीर मुहम्मद की सलाह पर समाज का इस्लामी करण करने के उत्साह के चलते सिकंदर शाह मिरी द्वारा 1389 से 1413 के समय में नष्ट कराया गया। खास बात यह है कि हिंदूओं में फूट डालने के लिए इस मंदिर को नष्ट करने का सारा इल्जाम सिकंदर शाह मिरी ने अपने मुख्य सलाहकार सुहभट्टा पर मढ़ दिया। 

यह वृतांत इतिहासकार जोनराजा द्वारा अपनी किताब राजतरंगिणी द्वितीय में दिया गया है। पहली राजतंरगिणी 12वीं शताब्दी में कल्हण द्वारा लिखी  गई थी।

जो कि हिंदू धर्म के  ब्राह्मण परिवार से था मगर अपना धर्म परिवर्तन कर के इस्लाम कबूल किया था  इसे स्थानीय  हिंदूओं पर भीषण अत्याचार करने का दोषी माना जाता  था। जिसका परिवर्तित नाम अली था जिसने विशेष रुप से सिकंदर शाह मिरी के आदेशों की पुष्टि की। यानी उसने स्वयं से ऐसा कुछ नहीं किया था। दरअसल मुस्लिम हिंदू धर्म में फूट डालना चाहते थे। 

दरअसल मुस्लिम पूर्व हिंदू शासकों की तरह ब्राह्मणों पर राज्य शक्ति का दावा करके और ब्राह्मण वादी संस्थानों द्वारा नियंत्रित धन तक अपनी पहुंच बनाना चाहते थे और राजनीतिक वैधता हासिल करने का प्रयास कर रहे थे। 

वहीं कुछ इतिहासकार इस बात का खंडन करते है जोनराजा के अनुसार मुस्लिम ब्राह्मण वादी अभिजात वर्ग को राजपरिवार में वापस लाना चाहते थे जबकि बाद के मुस्लिम इतिहासकारों के अपने उद्देश्य थे जिसके चलते उन्होंने अतीत की रूढ़ि वादी इस्लामी नैतिकता को एक आदर्शवादी कहानी में ढालने का प्रयास किया।

निष्कर्ष

मार्त़़ंड सूर्य मंदिर 8वीं शताब्दी की कश्मीरी वास्तुकला और पत्थर की नक्काशी का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है। यह सम्राट ललितादित्य मुक्तापीड़ की विशाल दृष्टि और सूर्य उपासना की प्राचीन परंपरा का प्रमाण है। वर्तमान में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा संरक्षित यह ऐतिहासिक मंदिर स्थल हमारी सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखने और नई पीढ़ी को इतिहास से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम है।

अपनी विशाल ज्यामितीय संरचना स्तंभों की नक्काशी और सूर्य देव के प्रति समर्पण के कारण यह मंदिर भारतीय इतिहास में एक विशेष स्थान रखता है। मार्तंड सूर्य मंदिर  केवल पत्थरों ढांचा नहीं है बल्कि प्राचीन भारत की वास्तुकला समृद्ध संस्कृति और उत्कृष्ट अभियांत्रीकी का एक अद्वितीय प्रतीक है।

यद्यपि समय के थपेड़ों ने इसकी भौतिक भव्यता को क्षति पहुंचाई है किंतु इसके अवशेष आज भी भारतीय सभ्यता की सांस्कृतिक  ऊंचाइयों और शिल्पकला की अमर गाथा गाते है। इस धरोहर को भावी पीढ़ियों के लिए संरक्षित और संवर्धित करना हमारी साझी जिम्मेदारी है।

कोई टिप्पणी नहीं: