Indian History reveal the Past

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लेबल

2026-10-15

नालन्दा विश्वविद्यालय

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प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम नालन्दा विश्वविद्यालय के इतिहास के बारे में बात करने जा रहें है एक समय ऐसा था जब देश विदेश के लोग यहां शिक्षा ग्रहण करने के लिए आते थे। यहां खगोल शास्त्र गणित तथा दर्शनशास्त्र आदि जैसे वैज्ञानिक विषयों को पढ़ाया जाता था। खास बात यह है कि इसी भारतीय विश्वविद्यालय में शून्य की खोज की गई थी।

इसके साथ ही यहां पाई का मान तथा चिकित्सा विज्ञान की ऐसी तकनीकों की खोज उस समय के काल में ही कर ली गयी थी जो आज के वैज्ञानिक खोजने में ही वर्षों का समय लगा देते है। यहां के प्रसिद्ध शिक्षक नागार्जुन जी ने माध्यमिक सूत्र नाम का एक ग्रंथ लिखा था जिसमें उन्होंने थ्योरी आप रिलेचीविटी का सिद्धांत दिया था।

जिसे हम वर्तमान समय में आईंस्टीन की थ्योरी आफ रिलेटीविटी के नाम से जानते है। हलांकि प्राचीन काल में इसका नाम कुछ ओर ही था मगर वर्तमान समय में हम इस आईंस्टीन की थ्योरी के नाम से ही जानते है।

इतिहास

इस विश्वविद्यालय की स्थापना गुप्त राजवंश के राजा कुमार गुप्त द्वारा की गई थी। हलांकि एक तरह से देखा जाये तो इसकी स्थापना का मुख्य श्रेय उनके पिता चंद्रगुप्त को जाता है जिन्हें हम विक्रमादित्य के नाम से भी जानते है।

क्योंकि उन्होंने ही अपने साम्राज्य को इतना समृद्ध बनाया की राजा कुमार गुप्त को उस समय काल की प्रसिद्ध आक्रमण नीति से दूर हटके तथा किसी बाहरी शासक के आक्रमण के भय को दूर करने में अहम भूमिका निभाई।

महाराज विक्रमादित्य के दरबार में नौ रत्न थे जो कि अपने अलग-अलग विषयों में महारत हासिल किए हुए थे। प्रथम कालिदास जो कि संस्कृत के महाकवि और नाटककार थे। द्वितीय धनवंतरि जो कि आयुर्वेद के महान आचार्य और चिकित्सक थे। इन्हें शल्य चिकित्सा और औषधीय विज्ञान का ज्ञाता माना जाता था।

तृतीया क्षपणक थे ज्योतिष शास्त्र और बौद्ध दर्शन के ज्ञाता थे। चौथे शंकु थे जिन्हें एक महान वास्तुकार और शिल्पकार गणितज्ञ माना जाता था। पांचवें अमर सिंह थे इन्हें महान संस्कृत का ज्ञाता और व्याकरण शास्त्री माना जाता थ। इन्होंने ही संस्कृत शब्दकोश अमरकोश की रचना की थी।

छठवें बेताल भट्ट वे जादू तंत्र-मंत्र और नीति शास्त्र के प्रकांड विद्वान थे सातवें घटकर्पर वे संस्कृत व्याकरण के ज्ञाता और शिल्प और कविता के ज्ञाता थे। आठवें वराहमिहिर थे वे प्राचीन भारत के महान खगोल शास्त्री और गणितज्ञ थे। इनकी प्रमुख रचना पन्चसिद्धान्तिका तथा बृहत्संहिता आदी थीं।

अंतिम वररुचि जी थे जिन्हें हम व्याकरण और प्राकृत भाषाओं के आचार्य के रुप में जानते हैं। इन्होंने पाणिनि की व्याकरण पर की टीकाएं लिखी थी।

महाराज कुमार गुप्त

415 ईस्वी में जब महाराज कुमार गुप्त ने मगध की गद्दी को सम्भाला तो उन्हें एक ऐसा साम्राज्य मिला जहां न तो पैसों की कमी थी और न ही दुश्मनों का डर चारों तरफ सुख और शांति का माहौल था। ऐसे में राजा कुमारगुप्त के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि साम्राज्य को इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए अमर कैसे किया जाए।

उनकी इसी सोच ने दुनिया के सबसे बड़े विश्व विद्यालय के निर्माण की योजना को जन्म दिया। इस प्रकार 427 ईस्वी के लगभग इसका निर्माण प्रारम्भ करवाया।

आचार्य नागार्जुन

भले ही महाराज कुमार गुप्त ने इसका निर्माण प्रारम्भ करवाया मगर इस मिट्टी में ज्ञान का बीच सदियों पहले आचार्य नागार्जुन द्वारा ही बोया गया था। वे बौद्ध धर्म के महान दार्शनिक और चिकित्सक थे जो कि कुमार गुप्त के शासन काल से 200 वर्ष पहले के थे। उन्होंने रस चिकित्सा की खोज की तथा धातुओं की भस्म बनाने की विधि से चिकित्सा करने की खोज की।

इसके साथ ही उन्होंने माध्यमिक सूत्र नाम एक ग्रंथ की रचना की जिसमें उन्होंने शून्य का सिद्धांत दिया। जो की वर्तमान समय में आइंस्टीन की थ्योरी आफ रिलेटिविटी से मिलता जुलता है। नागार्जुन और उनके शिष्यों ने राजगृह के जंगलों में छोटे-छोटे आश्रम बना रखे थे जहां देश-विदेश के छात्र शिक्षा ग्रहण करने के लिए आते थे।

जब कुमारगुप्त राजा बने तो उन्होंने देखा कि ज्ञान का यह समंदर छोटे-छोटे और अलग-अलग आश्रमों में बिखरा हुआ है। उन्होंने सोचा की तलवार के दम पर बनाए गए साम्राज्य की एक समय सीमा होती है मगर भारत को हमेशा के लिए विश्व गुरु बनाने के लिए हमें जमीन के बदले इंसनी दिमाग को जीतना होगा और ज्ञान की शक्ति पर भरोसा करना होगा।

कुमार गुप्त की रणनीति

राजा कुमार गुप्त स्वयं के पक्के सनातनी थे और भगवान कार्तिकेय के उपासक थे लेकिन वे ज्ञान का सम्मान करते थे। उनका उद्देश्य एक ऐसा महाविहार य विद्यालय खड़ा करने का था जहां विदेशी छात्र तथा जनता सेना देखकर नहीं बल्कि भारतीय आचार्यों का दिमाग देख कर दंग रह जाएं।

इसके लिए उन्होंने राजगीर के पास एक पवित्र जमीन को चुना जहां पहले आमों का बगीचा हुआ करता था यह वही स्थान है जहां पर आचार्य नागार्जून के शिष्यों के आश्रम थे। इस स्थान के इतिहास के बारे में बताया जाता है की प्राचीन व्यापारियों ने यह स्थान खरीद कर भगवान बुद्ध को अर्पित किया था।

विश्वविद्यालय को हमेशा के लिए आत्मनिर्भर बनाने के लिए कुमार गुप्त ने एक योजना बनाई अतः इसके परिणामस्वरूप नालन्दा विश्वविद्यालय के आसपास के 100 सबसे अमीर गांवों की एक सूची तैयार करवाई और इन गांवों के लिए एक कानून पास किया की इन गांवों से मिलने वाला सारा कर अनाज दूध घी और कपड़ा आदि सीधे नालन्दा विश्वविद्यालय के कोश में जाएगा।

इसका सिधा मतलब यह था कि विश्वविद्यालय को अपने खर्च के वहन के लिए सरकार पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।

निर्माण कार्य की रणनीति

इस प्रकार 427 ई.में नालन्दा विश्वविद्यालय का निर्माण कार्य शुरु हुआ। चारों तरफ पत्थरों की 40 फुट के लगभग की पत्थरों की दीवारों का निर्माण करवाया गया। जिससे एक सुरक्षित किले का निर्माण हो सके इसके साथ ही अंदर आने जाने के लिए सिर्फ मुख्य द्वारा को ही रखा गया। नालन्दा में कुल 8 बड़े हाल परिसर और 300 से ज्यादा  कमरों का निर्माण करवाया गया।

उस समय काल में बिजली की व्यवस्था नहीं थी जिसका ख्याल रखते हुए प्राकृतिक रोशनी को परिसर में पहुंचाने की उचित व्यवस्था की गई इसके साथ ही हवा के आवागमन का भी इमारत के निर्माण में उचित ख्याल रखा गया। छात्रों के कमरों में पत्थर की खाट का निर्माण किया गया ताकि वे ज्यादा दिन चलें और उन्हें सुरक्षा प्रदान करें।

किताबों के शेल्फ

किताबों को रखने के लिए दुर्लभ शेल्फ का निर्माण किया गया था ताकि हाथ से लिखी पोथियां नमी और दीमक लगने से खराब न हो सकें। परिसर में समय देखने के लिए तांबे के कटोरे का इस्तेमाल किया जाता था जिसकी सतह में एक छेद होता था जो की धीरे-धीरे कटोरे के बर्तन को पानी भरता रहता था।

अतः जब कटोरा डूब जाता था तो एक घण्टा पूरा होता था। इस प्रक्रिया को पूरे दिन में 12 बार दोहराया जाता था। कटोरे के भरने पर भिक्षु एक बड़ा नगाड़ा बजाते थे जिससे विषय के बदलने तथा भोजन के समय का पता चलता था।

द्वारपाल की भूमिका

नालन्दा विश्वविद्यालय के द्वारपाल एक ज्ञानी आचार्य होते थे जिन्हें सभी विषयों का अच्छा ज्ञान होता था। वे ही सुनिश्चित करते थे कि किन छात्रों के विश्वविद्यालय में प्रवेश दिया जायेगा और किन को नहीं। वे विश्वविद्यालय पर आये सभी छात्रों का स्वागत करते थे और उनकी बुद्धि की परख करने के लिए उनसे प्रश्न पुछते थे। 

जो उनके सवालों का सही जवाब देता था उसे ही विश्वविद्यालय में प्रवेश की अनुमति मिलती थी। इस प्रकार से लिए प्रवेश के बाद छात्रों का सम्पूर्ण खर्च विश्वविद्यालय वहन करता था छात्रों का एक पैसा भी नहीं लगता था।

परिसर में सिर्फ 10000 छात्रों को ही प्रवेश की अनुमति थी जिन्हें 1500 आचार्यों द्वारा प्रशिक्षित किया जाता था।

आर्यभट्ट का सिद्धांत

476 ईसा  पूर्व के  समय में जब लोग मानते  थे कि पृथ्वी चपटी है और राहु-केतु के प्रकोप से ग्रहण लगता है। तब इसी विद्यालय के गणितज्ञ आर्यभट्ट ने नालन्दा के  वेधशाला में बैठकर तारों की गणना पहले स्वयं सिखा तथा इससे पर शोध किया। शोध के बाद उन्होंने दुनिया को बताया की पृथ्वी गोल है और अपनी धुरी पर घुमती है और ग्रहण किसी राक्षस के कारण नहीं बल्कि पृथ्वी और चंद्रमा की परछाई के कारण लगता है।

उन्होंने पाई का मान जो कि 3.146 को निकाला तथा शून्य की खोज की। परिणामस्वरूप उनकी इन्हीं सब खोजो ने नालन्दा को दुनिया का सबसे बड़ा साइंटिफिक रिसर्च हब बना दिया था।

ह्वेनसांग का आगमन 

630 ईसा पूर्व ह्वेनसांग जो कि एक चीनी यात्री था भारत आया तो वे नालन्दा परिसर प्रसिद्धि से बहुत हैरान हुआ परिणामस्वरूप उसने विश्वविद्यालय का परीक्षण करना चाहा। वे नालन्दा में कुलपति शीलभद्र का शिष्य बना। लगभग 5 सालों तक उसने योगशास्त्र तथ संस्कृत भाषा को यहां रहकर सिखा। उसने अपनी किताब में नालन्दा की विशाल लाइब्रेरी धर्मगंज का वर्णन किया।

जिसमें वह बताता है कि इसके तीन मुख्य हिस्से थे पहला रत्नासागर जो कि एक तीन मंज़िला इमारत थी जिसमें गणित और  विज्ञान कि किताबें थी। दूसरा रन्तोदधि जहां वेद और पवित्र ग्रंथ आदि रखे जाते थे। तीसरा रत्न रंजक जहां कला और आयुर्वेद के नुस्खों की किताबों का संग्रह रखा जाता था।

नालन्दा के पतन की कहानी

1193 ई.में क्रूर तुर्क शासक एवं कमांडर इख्तियारउद्दीन मोहम्मद बिन बख्तियार खिलजी भारत को लूटने के लिए भारत आया। जब उसने नालन्दा के क्षेत्र बिहार में लूट की घटनाओं को अंजाम देना प्रारम्भ किया तब उसकी तबीयत खराब हो गई जिसके चलते वह एक भयंकर लाइलाज बीमारी से पीड़ित हो गया। उसके हकीमों द्वारा किए गए सारे इलाज असफल होने पर वह मौत के कगार  पर पहुंच गया।

तब उसके एक दरबारी ने सलाह दी कि वह नालन्दा के आयुर्वेद विभाग के मुख्य आचार्य राहुल श्री भद्र से ठीक हो सकता है। उसके अन्दर इस बात को लेकर हीन भावना ने जन्म लिया कि ऐसा क्या है जिससे उसके खुद के वैद्य अंजान हैं और भारतीय वैद्य उनसे निपुण है। दरअसल वह भारतीयों को नीची नजर से देखता था। अतः परीक्षण के लिए उसने आचार्य राहुल श्री भद्र को बुलाया और उनके आगे शर्त रखी की उसे बिना किसी दवा के ठीक करके के दिखायें।

ऐसा करने न कर पाने उन्हें मौत की सज़ा दी जायेगी श्री भद्र जी ने चुनौती को स्वीकार किया बख्तियार खिलजी का ठीक करने का भरोसा देकर वे अपनी वैद्य शाला में वापिस आ गये। आचार्य ने एक दवा बनाई और उसे कुरान जैसी पाख किताबों के पन्नों पर लगा दिया और दो दिन बाद खिलजी को इस्लाम की पवित्र किताब कुरान देते हुए कहा कि उसे रोज इसके कुछ पन्ने पढ़ने होंगे।

धीरे-धीरे खिलजी ठीक होने लगा क्योंकि कुरान के पन्नों पर लगी औषधि ने अपना काम करना प्रारम्भ कर दिया था। ठीक होने के बाद खिलजी के मन में हीन भावना ने घर कर लिया जिसके चलते आचार्य को इनाम देने की बजाय उसने पूरे नालन्दा को नष्ट करने का निर्णय लिया। क्योंकि भारत को गुलाम बनाने के लिए उनकी रीढ़ की हड्डी नालन्दा विश्वविद्यालय को नष्ट करना आवश्यक था।

खिलजी की आक्रमण

जब खिलजी अपनी सेना लेकर नालन्दा पहुंचा तब उसने देखा कि वहां कोई सैनिक नहीं था सिर्फ निहत्थे बौद्ध भिक्षु और बूढ़े आचार्य थे। खिलजी की सेना ने निहत्थे छात्रों और विद्वानों का बेरहमी से कत्लेआम प्रारम्भ किया। सदियों के शोध को नष्ट करने के लिए उसने नालन्दा की विशाल लाईब्रेरी धर्मगंज में आग लगवा दी। इस पुस्तकालय में 9 लाख से ज्यादा दुर्लभ किताबों का ढेर था जिसके कारण यह पुस्तकालय पूरे तीन महीनों तक जलता रहा।

इस प्रकार भारत का उज्वल भविष्य और हमारा गौरव आग की लपटों में जलकर राख हो गया।


सरकार द्वारा किए गए कार्य

वर्तमान समय में नालन्दा विश्वविद्यालय भारत के बिहार राज्य के प्राचीन शहर राजगीर में स्थित एक केंद्रीय अनुसंधान विश्वविद्यालय है। सरकार द्वारा राष्ट्रीय महत्व और उत्कृष्टता के संस्थान के रुप में नांलन्दा भारत के विदेश मंत्रालय का एक प्रमुख अंग है। इसकी पुनः स्थापना 2010 में की गई। 

वर्तमान समय में यह स्नातकोत्तर अनुसंधान संस्थान के रुप में कार्य करता है और केवल मास्टर और पीएचडी डिग्री प्रदान करता है। परंपरागत रुप से भारत की ऐतिहासिक विरासत के प्रतीक के रुप में माना जाने वाला नया नालन्दा विश्वविद्यालय राष्ट्र में एक प्रतिष्ठित संस्थान रुप में काम करता है।

इसका पुनः निर्माण1993.32 करोड़ कि लागत से बना यह विश्वविद्यालय वर्तमान समय में 485 एकड़ की जमीन पर फैला हुआ है। यह भारत के सभी विद्यालयों के परिसरों में से सबसे बड़ा परिसर है। 

वर्तमान समय में यह विश्वविद्यालय 
1.School of Historical Studies यानी SHS
2.School of Ecology and Environment Studies यानी SEES
3.School of Buddhist Studies यानी SBS
4.School of Philosophy and Comparative Religions यानी SPCR
5.School of Languages and Literature and Humanities यानी SLLH
6.School of Management Studies यानी SMS

जैसे विषयों में डिग्री प्रदान करता है इसके साथ ही यहां संस्कृत पाली तिब्बती जापानी और कोरियाई जैसी भाषाओं में डिप्लोमा प्रदान किया जाता है। नालन्दा के नए परिसर का उद्घाटन भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने 19 जून 2024 को किया है।

इसके साथ ही विश्वविद्यालय में तीन विशिष्ट संस्थान है जो धार्मिक समुदाय के विभिन्न संप्रदायों को एक साथ लेकर चलने के दृष्टिकोण का हिस्सा है। इनमें बंगाल की खाड़ी का केंद्र संघर्ष समाधान और शांति निर्माण केंद्र और सामान्य अभिलेखीय संसाधन केंद्र शामिल है।

वर्तमान समय में नालन्दा विश्वविद्यालय विश्व भर के कई विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों के साथ-साथ ICWA, IIPHG, ISI, ICCR, ISAS, IIAS और CSIR के साथ मिलकर काम करता है।

निष्कर्ष

नालन्दा विश्वविद्यालय केवल प्राचीन भारत का एक शिक्षा केंद्र नहीं था बल्कि यह भारत के विश्व-गुरु होने का जीवंत प्रमाण था। जहां की समृद्ध ज्ञान परंपरा बहु सांस्कृतिक अध्ययन और उत्कृष्ट अध्ययन-अध्यापन प्रणाली ने दुनिया भर के विद्वानों को आकर्षित किया। यद्यपि आक्रमणकारियों द्वारा इसके विनाश ने इतिहास के एक स्वर्णिम युग का अंत कर दिया।

लेकिन नालन्दा की आत्मा और विचार आज भी अमर है। हाल ही में नालन्दा का पुनरुद्धार इस बात का प्रतीक है कि भारत अपनी महान ज्ञान की विरासत को सहेजकर पुनः वैश्विक शिक्षा के क्षेत्र में नई ऊँचाइयों को छूने के लिए तैयार है।

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