9b45ec62875741f6af1713a0dcce3009 Indian History: reveal the Past: देवदासी प्रथा

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मंगलवार, 23 दिसंबर 2025

देवदासी प्रथा

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यह एक ऐसी प्रथा थी जिसमें लड़कीयों और महिलाओं को मंदिरों को समर्पित कर दिया जाता था। वे अपना सम्पुर्ण जीवन ईश्वर की भक्ति और सेवा में समर्पित कर देती थीं। देवदासी शब्द का अर्थ है(भगवान की नौकरानी य दासी।

कार्य

इस प्रथा के अन्तर गत कम य छोटी उम्र की लड़कीयों को मंदिरों में समर्पित कर दिया जाता था। वे मंदिरों की देखभाल ,पूजा अर्चना के लिए नृत्य एवं संगीत प्रस्तुत करने का कार्य किया करती थीं। हालांकि शुरुआती समय में देशवासियों को समाज में सम्मानजनक स्थान प्राप्त था वे कला और संस्कृति की संरक्षक हुआ करती थीं। मगर बाद में इस प्रथा का दुरुपयोग होना प्रारम्भ हुआ। समय परिवर्तन के साथ यह प्रथा एक शोषणकारी प्रथा का रुप ले लेती है ,इस प्रथा को चलते कई महिलाओ के साथ यौन शोषण हुआ और उन्हें वैश्यावृत्ती के लिए मजबूर किया गया।. 

अतः उपरोक्त कारणों के चलते समाज में स्थापित उनकी गरिमा समाप्त हो गयी।.
देश की आज़ादी के बाद भारत सरकार ने इस प्रथा को अवैध घोषित किया।  इस प्रथा को समाप्त करने के लिए भारत सरकार  द्वारा देवदासी प्रथा निषेध अधिनियम 1982 की स्थापना की । वर्तमान समय में यह प्रथा कुछ हद तक समाप्त हो चुकी है । मगर अभी भी भारत के कुछ क्षेत्रों  जैसे कि दूर दराज एवं पिछड़े राज्यों के कुछ क्षेत्रों में इस प्रथा का चलन अभी भी है।. कयी गैर सरकारी संगठन एवं सरकारी योजनाएं पूर्व देवदासियों के पुनर्वास और अधिकारों की रक्षा के लिए काम कर रही है।

इतिहास 

अपने शुरुआती समय में इस प्रथा की नाम देवदासी प्रथा नहीं था ,प्राचीनकाल में इस प्रथा को पोट् टुकट्टू कहा जाता था। ईसा पूर्व के समय काल में इस घटना का जिक्र मिलता है। गुप्तकाल के समय लगभग 320 से 550 ईस्वी के समय काल तक यह प्रथा भारतीय समाज और धार्मिक संरचना का एक अभिन्न अंग बन गयी।.

‎दक्षिणी भारत एवम् पश्चिमी भारत में इसका चलन

अपने प्रारम्भिक समय में यह प्रथा दक्षिणी भारत एवं पश्चिमी भारत के क्षेत्रों में प्रचलित थी। लड़कियों का विवाह एक राज्य अभिषेक समारोह के समान किया जाता था। जिन्हें पिटुकट्टू कहा जता था यह प्रथा अपनी छठवी शताब्दी तक से चली आ रही है परंपरागत रूप में देवदासियों को समाज के उच्च स्थान प्राप्त था उन्हें शुभ मना जता था क्योंकि वे देवताओं के प्रति समर्पित थीं। 
लेकिन बाद में मुगल और अंग्रेजों के देश में आने के बाद कई मंदिर तोड़ दिये गए और समाज में उनकी स्थिति खराबी हो गई तथा उनका शोषण और अपमान किया जाने लगा देवदासियों को संगीत सिखाया जता था तथा नृत्य भी। 

दैवदासी प्रथा की व्यापक प्रसार की कारण

‎उस समय काल के समाज की यह धार्मिक मान्यता थी की अगर कोई सामाजिक परिवार अपने पुत्री को मंदिरों को समर्पित करता है तो उस उसके परिवार को ईश्वर का आशीर्वाद मिलेगा यह मिलता है ज्यादातर रूप से कमजोर वर्ग के परिवार अपनी बेटियों को मंदिरों को समर्पित करते थे क्योंकि वे उसका भरण पोषण नहीं कर पाते थे अंधविश्वास एवं वंश परंपरा को निरंतर चलाते रहना भी इस प्रथा का  एक मुख्य करण था।

‎प्रथा पर बने महत्वपूर्ण कानून एवं कार्य

‎एस एस एल फाउंडएशन यह एक गैर सरकारी संगठन है जिसने केरल स्थित ऐसी प्रथाओं की विवेचना की तथा 2016 में इसे सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया इस प्रथा को लेकर 1934 बाद  कई अधिनियम जरी किए गए जिसके बरे में हम निम्नलिखित बता रहे हैं।
  •  बॉम्बे देव और दासी संरक्षण अधिनियम 1934 
  • मद्रास देवदासी रोकथाम 1947 कर्नाटक देव दासी निषेध अधिनियम 
  • 1982 अंधरा प्रदेश देवदासी निषेध कानून 
  • 1988 महाराष्ट्र देवदासी अनमूलन अधिनियम 2006
  •  किशोरी न्याय अधिनियम 2015 इज जेजे अधिनियम भी कहा जता है 
  • अनैतिक व्यापार रोकथम अधिनियम 1956 मानव तस्कारी रोकथम विद्ऐयक 2018 आदि। 

वर्तमान स्थिति

‎आज भी यह है प्रथा कर्नाटक के 10एवं आन्ध्रा प्रदेश के 14 जिलों में परंपरागत रूप से मनायी जाति है देव दासी प्रथा को लेकर आज भी कई गैर सरकारी संगठन अपना विरोध दर्ज करते रहे है इसका प्रचालन दक्षीणी भारत में विशेष रूप से है अंग्रेजों का शासन काल आने पर ब्रिटिश सरकर ने आने पर इस प्रथा को समाप्त करने की कोशिश की मगर भारतीय समाज ने उनका विरोध किया उसके अलावा भारतीय विद्वान,समाज सुधारक एवं सामाजिक बुद्धि जीवों ने भी इस प्रथा को समाप्त करने का प्रयास किया जिनमें मुख्य रूप से स्वामी विवेकआनंद,बी.आर अंबेडकर,राजा राम मोहन राय का नाम मुख्य रूप से लिया जता है आपका इस प्रथा के बरे में क्या विचार है क्या यह प्रथा  वास्तव में सही थी हमें लिखें अवश्य अपनी प्रतिक्रिया दें।.

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