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प्रस्तावना
प्रस्तुत लेख में हम राजेंद्र चोल द्वारा लड़े युद्धों तथा उनकी कुशल रणनीति के साथ उनके प्रारम्भिक जीवन के बारे में चर्चा करेंगे। इसके साथ ही हम उनके साम्राज्य के विस्तार पर भी चर्चा करेंगे। एक भारतीय राजा होने के नाते उनके द्वारा किए गए महत्वपूर्ण कार्यों पर भी इस लेख में विस्तार से बताया गया है।
जीवन परिचय
पहले हम राजेंद्र चोल प्रथम की बात करते है इनका शासन काल 1014 से 10144 के समय तक का था। इनके पिता का नाम राजराज था और माता का नाम जो की कोडंबलुर की राजकुमारी थिरिपुवना अथवा महादेवी नाम से भी प्रसिद्ध थीं। राजेंद्र प्रथम का राज्याभिषेक 1012 ई. में हुआ। हलांकि राजराज अभी मरे नहीं थे लेकिन इससे पहले ही उन्होंने अपनी गद्दी का वारिस राजेंद्र को बना दिया।
बाप बेटे ने मिलकर प्रशासन को चलाया। राजराज के अनुभव और राजेंद्र चोल के प्राक्रम से चोल साम्राज्य ने कई क्षेत्रों पर विजय हासिल की।राजगद्दी पर बैठते ही राजेंद्र प्रथम को मद्रास वर्तमान तमिलनाडु मैसुर वर्तमान कर्नाटक सिंहल एवं आंध्र प्रदेश पर शासन करने का अवसर मिला। राजेंद्र प्रथम ने अपने 33 वर्ष के कार्य काल में श्री लंका मालदीव तथा इंडोनेशिया पर भी अपना शासन स्थापित किया। राजेंद्र चोल ने अपने कार्य काल के सातवे वर्ष यानी 1018 ई. को अपने सबसे काबिल बेटे राजाधिराज को युवराज के पद पर नियुक्त किया।
अपने शासन के प्रारंभिक कार्यों में उन्होंने इडितुरैनाडु यह कृष्णा तथा दक्षिण के तुंगभद्रा नदी के बीच के क्षेत्र था पर अपना आधिपत्य स्थापित किया। इसके बनवासे फिर कोल्लिप्पक्कै जोकी हैदराबाद के उत्तर पूर्व का एक क्षेत्र था एवं मण्णैक्डक्कम् पर विजय हासिल की।
खास बात यह है कि इन क्षेत्रों पर चालुक्य नरेश सत्याश्रय का अधिकार था। 1017 ई. में राजेंद्र प्रथम ने ईलमंडलम जिसे हम वर्तमान समय में श्री लंका के नाम से जानते हैं पर विजय हासिल की। इस समय श्री लंका पर महेन्द्र पंचम का अधिकार था। 1017 ई. के ठीक 12 साल पहले राजराज ने श्री लंका पर आक्रमण किया था मगर वे श्री लंका के कुछ क्षेत्रों पर ही अपना अधिपत्य स्थापित कर सके। लेकिन उनके बेटे ने पूरे श्री लंका पर अपना अधिपत्य स्थापित करके अपने पिता के सपने को पुरा किया।
1018 में केरल पर आक्रमण किया और वहां की सास्कृंतिक सम्पत्ति को लुटा। इसके बाद पांड्य राज पर हमला हुआ इस विजय के बाद राजेंद्र ने अपने बेटे सुंदरचोल राजाधिराज प्रथम को पांड्य प्रदेश का वायसराय बनाया जिसे हम महामंडलेश्वर के रुप में भी जानते है। इस प्रकार सुंदर चोल ने पांड्य प्रदेश पर 1018 से 1044 ई तक के समय काल तक शासन किया।
वेंगी पर आक्रमण
1019 ई.को वेंगी पर आक्रमण किया यह युद्ध राजेंद्र चोल ने अपनी बहन के बेटे को राजगद्दी दिलाने के लिए लड़ा था। दरअसल इस क्षेत्र पर चालुक्यों का अधिपत्य था। विमलादित्य जो उस समय चालुक्य नरेश की गद्दी पर बैठा था अपनी चोल महारीनी कुंदवै देवी से उत्पन्न पुत्र राजराज नरेंद्र को राजगद्दी पर बिठाना चाहता था। वहीं चालुक्य शासक जयसिंह वेंगी के सिंहासन पर नरेंद्र के सौतेले भाई विष्णु वर्धन को गद्दी पर बिठाना चाहता था। परिणामस्वरूप जयसिंह ने कलिंग के तथा ओड़्ड के शासकों के साथ मिलकर नरेंद्र को राजगद्दी पर बिठाने का विरोध किया।
राजनीति षड्यंत्र से दुःखी होकर नरेंद्र ने अपने मामा राजेंद्र चोल से मदद मांगी इस प्रकार वेंगी पर राजेंद्र चोल द्वारा भारी आक्रमण किया गया। जिसमें विजयादित्य और जयसिंह की सेना को हरा कर 1022 ई में राजराज नरेंद्र को वेंगी की राजगद्दी पर बिठाया। इसी वर्ष यानी 1019 ई में ही राजेंद्र चोल कलिंग को जीतते हुए आगे निकल गए। राजेंद्र प्रथम ने अपने शासन काल में अनेकों युद्ध लडे।
राजेंद्र चोल की युद्ध नीति
राजेंद्र चोल प्रथम Rajendra Chola की युद्ध नीति मुख्य रूप से अत्यधिक सशक्त नौसेना Navy, दूरदर्शी कूटनीति और तीव्र गति से अचानक आक्रमण करने की कला पर आधारित थी। उन्होंने दक्षिण भारत की सीमाओं से आगे निकलकर दक्षिण-पूर्व एशिया और गंगा घाटी तक अपने सैन्य कौशल का लोहा मनवाया।राजेंद्र चोल के पास एक अजेय बेड़ा था। उन्होंने बंगाल की खाड़ी को पार कर सुमात्रा, जावा और मलय प्रायद्वीप पर विजय प्राप्त की।
अचानक और तीव्र आक्रमण
राजेंद्र चोल सबसे अचूक रणनीति यह थी कि अपने शत्रु राज्य को सोचने का य युद्ध रणनीति बनाने का मौका न देना। ताकि जब तक राजा को खबर लगे तब तक उसे पुरी तरह से घेर लिया जाए। इसका परिणाम यह होता था कि विरोधी राजा को भागने का मौका य सतर्क होने का मौका ही नहीं मिल पाता था। जिसके परिणामस्वरूप य तो उसे हार माननी पड़ती या फिर संधि करनी पड़ती।
मजबूत नौ सेना टुकड़ी का होना
श्री विजया साम्राज्य के खिलाफ उन्होंने सुंदर जलडमरूमध्य से होकर ऐसा अप्रत्याशित नौसैनिक हमला किया कि दुश्मन संभल ही नहीं पाए। राजेंद्र चोल के पास अपने विश्वास पात्र लोगों का एक पूरा जखीरा था जिसे वे युद्ध के दौरान दुश्मन मुल्क को घेरने का कार्य करते थे।
आर्थिक और व्यावसायिक प्रभुत्व
उनकी युद्ध नीति केवल राज्य विस्तार तक सीमित नहीं थी। बल्कि व्यापारिक मार्गों जिनमें समुद्री मार्गों महत्वपूर्ण थे को सुरक्षित रखने और एकाधिकार तोड़ने के लिए अहम भूमिका निभाते थे। अतः व्यापार में बाधा तथा जीवन यापन की आवश्यक वस्तुओं पर रोक लगाकर पर युद्ध में विजय हासिल करने का प्रयास किया जाता था।
स्थानीय सहायता और कूटनीति
वह सीधे शासन करने के बजाय क्षेत्रों को अपने अधीन कर व्यापारिक और राजनीतिक प्रभाव स्थापित करते थे। राजेंद्र चोल अपने अगल बगल की स्थानीय रियासतों को व्यापारिक मार्ग पर कब्जा होने के कारण उन्हें अन्य देशों से व्यापार करने की अनुमति कुछ शर्तों के आधार पर देते थे।
जिस कारण उस क्षेत्र विशेष में उनका शासन न होने के कारण भी उनका प्रभाव बना रहता था। जिस कारण से उन रियासतों के आंतरिक मामलों और राजनीति गतिविधियों पर उनकी नजर हमेशा बनी रहती थी। य यूं कहे तो उन रियासतों में सेंध लगाना तथा उनके अंतरिक भेद निकालना आसान हो जाता था।
उपरोक्त सभी कारणों के बावजूद राजेंद्र चोल एक बहादुर एवं साहसी राजा थे जिन्होंने अपने दुश्मन को युद्ध में कभी पीठ नहीं दिखाई। अपने कठोर दृढ़ संकल्प के चलते उन्होंने इतना बड़ा साम्राज्य स्थापित किया। इसके साथ ही राजेंद्र चोल एक अच्छे विद्वान होने साथ अपनी प्रजा की भलाई के लिए समय-समय पर महत्वपूर्ण कार्य और समारोह का आयोजन भी कराते थे।
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