Indian History reveal the Past

हमारे इस ब्लॉग में भारतीय इतिहास, सांस्कृतिक इतिहास, राजवंशों आंदोलन स्टार्टअप टेक्नोलॉजी कला और वास्तुकला तथा आर्थिक इतिहास से संबंधित विषयों पर जानकारी दी जाती है। हम कम से कम शब्दों में ज़्यादा से ज़्यादा जानकारी देने की कोशिश कर रहे हैं।

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9 सित॰ 2026

भानगढ़ का किला

 
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प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम भान गढ़ किले के निर्माण के समय काल तथा इससे संबन्धित राजा एवं इस किले के भुतिया होने के पीछे के कारण के बारे में जानेंगे। इसके साथ ही भान गढ़ किले में प्रयोग की गई वास्तुकला के इतिहास पर भी प्रकाश डालेंगे। खास बात यह है कि भारत  के प्रमुख पर्यटन स्थलों आने के बावजूद तथा वास्तुकला की आलोकनीय छाया प्रति होने के बावजूद यह यूनेस्को कि विश्व धरोहर की सूची में शामिल नहीं है। 

निर्माण कार्य

इस किले को 17वीं शताब्दी में राजा भगवंत दास शासन काल में उनके दूसरे पुत्र राजकुमार माधो सिंह के निवास स्थान के रुप में स्थापित किया गया था। यह किला राजस्थान राज्य जिले जयपुर और अलवर के बीच सरिस्का अभयारण्य से 50 किलोमीटर दूर स्थित है। इस किले के निकटतम गांव गोला का बास है। राजा का महल का खंडहर  पहाड़ियों की निचली ढलान पर स्थित है इसके साथ ही पेड़ तालाब और एक प्राकृतिक जल धारा परिसर के अंदर स्थित तालाब में गिरती है। बताते चलें कि किले के निर्माण कार्य के समय राजकुमार माधो सिंह के बड़े भाई मान सिंह मुगल सेना के एक शक्तिशाली सेनापति थे। राजमहल के अलावा भानगढ़ में 1720 ई. तक नौ हज़ार से अधिक घर थे धिरे-धिरे इनकी आबादी भी समाप्त हो गई।

यह किला अरावली पर्वत श्रृंखला के समीप होने तथा वास्तुकला के चमत्कार के कारण बड़ी संख्या में पर्यटकों को आकर्षित करता है।

किला परिसर

मुख्य द्वारा के अलावा किले में चार द्वार है जिन्हें लाहौरी द्वार  अजमेरी द्वार फुवबाड़ी द्वार और दिल्ली द्वार के नाम से जाना जाता है। खास बात यह है कि खंडहरों में होने के बावजूद भी किला भव्य दिखता है और हरे भरे वातावरण के कारण शांति का अनुभव कराता है। भानगढ़ किले के अंदर मंदिरो महलों और हवेलियों के खंडहरों कि एक श्रृंखला देखने को मिलती है।

किले मुख्य प्रवेश द्वारा से ही मंदिरों को देखा जा सकता है इन श्रृंखला में गोपीनाथ मंदिर केशव राय मंदिर मंगला देवी मंदिर तथा सोमेश्वर मंदिर और श्री गणेश मंदिर प्रमुख हैं। सभी मंदिर में भारत की प्राचीन नागर शैली का इस्तेमाल किया गया है। गोपीनाथ मंदिर का निर्माण चौदह फुट ऊंचे चबूतरे पर किया गया है। मंदिर में मुख्य पुजारी का निवास स्थान भी है जिसे पुरोहित की हवेली के नाम से भी जाना जाता है। किले परिसर में अन्य कई भव्य हवेलियां भी मौजूद थी जो वर्तमान समय में खंडहर में तबदील हो चुकीं है।

मुख्य रुप से नर्तकियों की हवेलीयां है जो कि नर्तकियों का निवास स्थान भी हुआ करती थीं। परिसर में एक बाजार के लगने के साक्ष्य मिलते है परिसर के भीतर के अंतिम छोर पर राजा का राजमहल का खंडहर देखने को मिलता है। बताया जाता है कि एक समय यह राजमहल सात मंज़िला इमारत के रुप में विद्यमान था मगर वर्तमान समय में यह भारी वर्षा और तूफान के प्रकोप के कारण मात्र चार मंज़िल ही रह गया है।

वैसे खास बात यह है कि भानगढ़ का कला भले ही खंडहर हो गया हो मगर पहाड़ी की तलहटी और हरे-भरे शांत वातावरण क बीच होने के कारण बेहद खूबसूरत दिखता है।

लोककथाएँ

इस किले को लेकर बहुत सी लोक कथाएं प्रचलित है जिनमें मुख्य दो के बारे में हम यहां जानकारी देंगे। पहली कथा  राज कुमारी रत्नावती की है-
कहानी के अनुसार भानगढ़ में एक राजकुमारी रहती थी जो कि बेहद खूबसूरत थी अगल-बगल के राज घरानों में उसकी सुन्दरता की चर्चा हुआ करती थी। बताया जाता है कि एक तांत्रिक साधु का दिल उस राजकुमारी पर आ गया मगर राजा के सिपाहियों तथा उसके संरक्षकों के चलते राजकुमारी तक पहुंच पाना मुश्किल था। राजकुमारी से मिलने के कई प्रयासों के बावजूद सफलता न मिलने के कारण साधु ने अपनी तांत्रिक नीति को अपनाने पर विवश हुआ।

एक दिन बाजार में राजकुमारी को इत्र खरीदता देख तांत्रिक ने इत्र की शीशी में अपने द्वारा तांत्रिक सिद्धि से साधित किया हुआ इत्र राजकुमारी पर डालना चाहा। इसके लिए दुकानदारों कि मिली भगत पर राज कुमारी ने शीशी खरीद ली मगर उसे दुकानदार द्वार अत्याधिक दबाव तथा सस्ते में देने के कारण शक हुआ सो उसने शीशी तो ली मगर एक बड़े पत्थर पर फेंक दी।

तांत्रिक के रानी के पीछे आने पर तथा ढलान होने के कारण पत्थर लुढ़कने लगा और तांत्रिक के पीछे होने के कारण वे उसके नीचे दब कर मर गया। जिस कारण से क्षेत्रीय लोगों ने यह कथा बना दी की तांत्रिक ने मरते दम भानगढ़ किले को श्राप दिया कि जैसे वे मर रहा है उसी प्रकार एक दिन पूरा भानगढ़ अचानक से समाप्त हो जायेगा।

दूसरी कहानी

बाबा बालूनाथ

बताया जाता है कि राजमहल के बनने से पहले बाबा बालूनाथ इस क्षेत्र विशेष पर विशेष रुप से रहते थे और तपस्या किया करते थे तथा यहीं अपनी कूटी बना कर रहा करते थे। समय अंतराल के बाद राजा ने इस क्षेत्र पर महल बनाने की चेष्टा की साधु बाबा के आदेश पर ही महल को बनाया गया। महल बनाने से पहले बाबा बालूनाथ ने निर्देश दिया था कि महल मेरी कूटी से ज्यादा ऊंचा नहीं होना चाहिए क्योंकि मेरे यह कूटी मेरे उस ईश्वर का प्रतीक जिसकी साधना के लिए मैं यहां हूं। जिस दिन मेरी इस कूटी पर महल की छाया पड़ी उस दिन तुम्हारा विनाश हो जाएगा।

महल अगर मेरी कूटी से ऊंचा हुआ तो समझो मेरे ईश्वर का अपमान हुआ और जल्द ही तुम्हारा विनाश होना तय है। हलांकि महल के शुरुआती निर्माण के दौरान बाबा की बातों पर अमल किया गया मगर जब माधो सिंह के पोते अजब सिंह का शासन काल आया तो उसने बाबा की बातों को नजरंदाज किया और किले की ऊंचाई बढ़ा दी। अंत में मुगल सेना का राज्य पर आक्रमण हुआ और पूरे राज्य का पतन हो गया।
ये लोक कथाएं है तो इन पर बिना प्रामाणिक साक्ष्य के मिले बिना महल के विनाश का मुख्य कारण जान पाना मुश्किल है।

यात्रा के लिए पर्यटन स्थल

दोस्तों यह किला पर्यटन के लिए एक उत्तम स्थल है जो कि राजस्थान के अलवर जिलें अरावली पर्वत श्रृंखला के समीप स्थित है। सड़क यात्रा की बात करें तो यह दिल्ली से लगभग 200 किलोमीटर दूर है तथा कार या बस से यात्रा करने पर तीन घंटे का समय लगता है। राज्य मार्ग 29 के माध्य से जाया जा सकता है जो की मुख्य रुप से असम नागालैंड और मणिपुर से होकर गुजरता है। इसके साथ ही यह उत्तर प्रदेश के वाराणसी सारनाथ सैदपुर गाजीपुर मऊ दोहरीघाट और गोरखपुर को भी जोड़ता है।

हवाई मार्ग 
भानगढ़ किले के सबसे नज़दीक जयपुर का अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा है जो लगभग 85 किलोमीटर दूर स्थित है यहां से आप कैब य भाड़े पर टैक्सी बूक करके जा सकते है। 

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