प्रस्तावना
प्रस्तुत लेख में हम भारत के इक्ष्वाकु वंश के बारे में चर्चा करेंगे यह वंश इसलिए भी खास है क्योंकि इसी वंश में श्री रामचन्द्र का जन्म हुआ था। जिन्हें हिन्दू धर्म कि मान्यताओं के अनुसार श्री विष्णु का अवतार माना गया है और आज भी लोग उनकी पुजा करते है। खास बात यह है कि इस वंश के महत्वपूर्ण साक्ष्य अभी तक नहीं मिल पाए है खाली वंशावली ही मिली है। अभी तक न तो उनके प्रशासन द्वारा जारी मोहरे मिल पायी है और न ही उनके व्यापारिक क्षेत्रों के बारे में महत्वपूर्ण साक्ष्य मिलें है।
परिचय
हिंदू धर्म के ग्रंथ के अनुसार राजा इक्ष्वाकु ही इक्ष्वाकु वंश के पहले राजा और संस्थापक थे इन्होंने कोसल राज्य की स्थापना की और अयोध्या को उसकी राजधानी बनाया जहां श्री राम चन्द्र का जन्म हुआ था। राजा इक्ष्वाकु मनु के पुत्र थे। पौराणिक साक्ष्यों के आधार पर इक्ष्वाकु शब्द इक्षु से उत्पन्न हुआ है। जिसका अर्थ ईख होता है माना जाता है कि ईख पैदा करने वाली धरती पर इस वंश की शुरुआत हुई। अतः ईख पैदा होने के कारण व करने के कारण इस वंश का नाम ईक्ष्वाकु पड़ा था।
इक्ष्वाकु राजा को महात्मा और तपस्वी महाराज कहा जाता था। इक्ष्वाकु के बाद उनके राजवंश के सम्राटो को सूर्यवंशी भी कहा जाता है। क्योंकि मनु सुर्य पुत्र थे इस कारण से इस वंश के राजा को सुर्यवंशी कहा जाता था। बताया जाता है की ईक्ष्वाकु राजा के 100 पुत्र थे जो की मध्य प्रदेश राजस्थान तथा उत्तर प्रदेश में राज किया करते थे।
प्राचीन महान ग्रंथ महाभारत के पर्व के नौवें अध्याय में महाराज इक्ष्वाकु का नाम आता है। ऋग्वेद में भी उनका नाम आता है क्योंकि इस राजवंश से निकलने राजा देश भर में फैले हुए थे जिनका रिश्ता देश के कई राजवंशों से लिया जाता है। दक्षिण भारत का आंध्र इक्ष्वाकु राजवंश 300 से 400 ई.भी अपने राजवंश को महाराज इक्ष्वाकु से संयोजित करता था।
खास बात यह है कि इक्ष्वाकु वंश को रघुवंश भी कहा जाता है जिसके वंशज रघुवंशी हैं जो उत्तर प्रदेश मध्य प्रदेश और राजस्थान में मुख्य तौर पर शासन किया करते थे। इक्ष्वाकु राजा पृथु मांधाता दिलीप सागर भगीरथ रघु हरिश्चंद्र जैसे प्रतापी राजा हुए। विष्णु पुराण के अनुसार जब मनु को छींक आई तो इक्ष्वाकु उनकी नासिका से निकले बताया यह भी जाता है कि 100 पुत्रों में से तीन सबसे प्रतिष्ठित थे विकुक्षि निमि और दण्ड तथा उनके पचास बेटे उत्तरी देशों के राजा थे। जबकि उनमें से 48 दक्षिण के राजकुमार थे।
जैन धर्म से संबन्ध
खास बात यह है कि चौबीस जैन तीर्थ कारों में से बाईस इसी वंश से संबंधित थे। ऋषभ हिंदू और जैन दोनों पौराणिक कथाओं में मौजूद है और दोनों ही एक ही व्यक्ति को संदर्भित करते हैं। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार गौतम बुद्ध इसी वंश से संबंधित थे। इस राज वंश से सम्बन्धित महत्वपूर्ण व्यक्ति राजा दूष्यंत के बेटे भरत थे जिनके नाम पर भारत का नाम भारत वर्ष पड़ा था। इसके साथ ही हरिश्चंद्र दिलीप सागर रघु ये वहीं राजा है जिनके नाम पर इक्ष्वाकु वंश का नाम रघुवंश पड़ा। उसके बाद राम और पसेन आदि का नाम आता है।
वहीं हिंदू पुराण और बौद्ध ग्रंथों में इक्ष्वाकु वंश के वर्णन में राजा शुद्धोधन बेटे गौतम बुद्ध जिनका एक राजकुमार के रुप में नाम सिद्धार्थ था और वे ही आगे चलकर बौद्ध धर्म के संस्थापक बने एवं राहुल आदि का नाम आता है। लेकिन बौद्ध ग्रंथों के अनुसार इक्ष्वाकु वंश के पूर्वज महासम्मत इस वंश के संस्थापक थे। जिन्हें जनता ने वर्तमान युग के प्रथम राजा के रुप में चुना था।
श्री राम चन्द्र
पुराणों के अनुसार इक्ष्वाकु वंश के गुरु वशिष्ठ ऋषि थे तथा राम इक्ष्वाकु वंश के 81वें वशंज थे जिन्होंने उत्तर भारत के मुख्य रुप से कोशल कपिलवस्तु वैशाली और मिथिला आदि क्षेत्रों पर अयोध्या को राजधानी बना कर शासन किया। इन राजा कि तुलना विष्णु के सातवें अवतार के रुप में की गई है। इस बात का उल्लेख हमें बाल्मीकि रामायण के युद्ध कांड के सर्ग 117 में मिलता है कि भगवान राम विष्णु के अवतार रुप में धरती पर जन्म लेते है।
यह पूरा महाकाव्य भगवान राम के सम्पूर्ण जीवन की घटनाओं को दर्शाता है। इसके अलावा गोस्वामी तुलसी दास द्वारा रचित श्री रामचरित मानस में बालकाण्ड और अन्य प्रसंगों में राम जी को भगवान विष्णु का स्वरुप बताया गया है। इसके साथ ही महाभारत के वन पर्व सहित अन्य कई पर्वों में भगवान राम की कथा तथा उनके विष्णु अवतार होने का प्रसंग मिलता है। इसके अलावा श्री मदभागवत पुराण तथा महापुराण के प्रथम स्कंध और तृतीया अध्याय में एवं विष्णु पुराण तथा अध्यात्म रामायण जैसे प्रमुख सनातन ग्रंथों में भगवान विष्णु के सातवें अवतार होने का वर्णन मिलता है।
कहानी का सार
वैसे दोस्तों श्री रामचंद्र सच में अवतरित पुरुष थे य नहीं ये हमें नहीं पता लेकिन इतना अवश्य समझ में आता है कि श्री राम चन्द्र के शासन काल में प्रजा उनसे बहुत खुश थी इतना ही नहीं उनके द्वारा किए गए कार्यों में मर्यादा और अपने से बड़ों का सम्मान विशेष रुप से झलकता है। उनका सम्पूर्ण जीवन भारतीय समाज के लिए प्रेरणा स्रोत है। जो बताता है कि मनुष्य को अपनी कुल मर्यादा और परंपरा और सम्मान का ख्याल रखना और उनका संरक्षण करना चाहिए।
वर्तमान स्थिति अनुसार अगर भगवान श्री राम के जीवन की तुलना करें सोचिए आपने किसी हाई क्लास संस्थान से एक बड़ी डिग्री य डिप्लोमा लिया जिसमें अपने चार से पांच वर्ष अपने बरबाद किए मगर परिणाम आने पर आपके घर वाले कहते है कि आप नौकरी नहीं करेंगे घर का रोजगार संभालेंगे। बहुत से लोग तो सीधे तौर पर घर वालों को मना कर देंगे मगर कुछ अगर मान भी जाते है तो वे खुद को ठगा हुआ महसूस करेंगे।
इसी तरह श्री राम के जीवन को देखा जाए तो उन्हें बचपन से ही एक राजा बनने की शिक्षा दी गई मगर जब राजा बनने का समय आया तो उन्हें 14 वर्षों के लिए वन को भेज दिया गया। सोचिए जो व्यक्ति राजा बनने वाला था वो अचानक से वन को जा रहा है जिसके जीवन के बारे में उन्हें कुछ नहीं पता मगर वे फिर भी तैयार हो जाते हैं।
ये कहानी य कथा में पढ़ना जितना आसान लगता है उतना ही वास्तविक जीवन में कठिन है। उनकी सकारात्मक विचार धारा बताती है कि वे जीवन की हर परिस्थिति से लड़ने के लिए वे तैयार थे। यहां एक बात साफ होती है कि जीवन में आप चाहे जिस भी परिस्थिति में हों सुख दुख तो आना जाना है। खास बात यह है कि हम उसके लिए तैयार है कि नहीं।
एक सकारात्मक सोच उनके चरित्र से झलकती है तभी तो उनकी गैर मौजूदगी में अयोध्या की राजगद्दी पर उनकी चरण पादुका को रखकर 14 वर्ष तक प्रशासन कार्य उनके भाइयों ने चलाया और सःकुशल चला भी।
इक्ष्वाकु वंश के राजा
इक्ष्वाकु वंश के अंतिम राजा राजा सुमित्र थे जो कि एक क्रूर राजा था जिन्हें 362 ईसा पूर्व में मगध के शक्तिशाली सम्राट महापद्य नंद ने हराया था। इतिहासकारों के अनुसार बताया जाता है कि महापद्यनंद ने राजपुतों का नर संहार किया था जिसके कारण उन्हें द्वितीय परशुराम भी कहा जाता था। परशुराम द्वितीय से पराजित होने के बाद राजा सुमित्रा बिहार के रोहतास क्षेत्र में चले गए थे और आगे चलकर राजा सुमित्र ने कुशवाहा वंश की स्थापना की कालांतर में वे कुशवाहा कहलाए।

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