Indian History reveal the Past

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लेबल

2026-09-30

मुज़िरिस बंदरगाह

illustration of port muziris

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम दक्षिण भारत में स्थित मुज़िरिस बंदरगाह के बारे में जानेंगे इसके साथ ही इसके आर्थिक महत्व को समझेंगे। तामिलनाडु में पेरियार नदी पर स्थित यह प्राचीन बंदरगाह शहर का केंद्र है। जिसे प्राचीन समय में मुज़िरिस बंदरगाह के नाम से जाना जाता था। जिसका उल्लेख हमें तमिल भाषा के प्राचीन ग्रंथों में भी मिलता है। इसके साथ ही इस बंदरगाह का उल्लेख हमें ग्रिक और  रोमन के प्राचीन और शास्त्रीय ग्रंथों में भी मिलता है।

परिचय

पुरातत्व विज्ञान के साक्ष्यों के आधार पर इस बंदरगाह की सटीक लोकेशन य स्थान केरल राज्य में कोंडुंगल्लूर यानी त्रिशुर के आसपास के क्षेत्र में स्थित थी। 2007 में केरल के उत्तरी परवूर के पास पट्टनम में इस रिसर्च का आजमा दिया गया था जिसने खोज कर्ताओं को इस स्थान को बंदरगाह के प्राचीन स्थल के रुप में मान्यता प्रदान करने के लिए समर्थन दिया है।

प्राचीन तमिल ग्रंथ जैसे कि संगम साहित्य तथा तमिल कविताओं में इस बंदरगाह का जिक्र मिलता है। इस बंदरगाह को मुख्य रुप से हिंद महासागर के मसाला व्यापार के रुप महत्व दिया जाता था इतिहासकारों अनुसार दक्षिण भारत की यह मुज्रिरस बंदरगाह कई शताब्दियों तक एक महत्वपूर्ण बंदरगाह के रुप में उपयोग होती रही है। 1341 में पेरियार नदी की विनाशकारी बाढ़ के कारण यह बंदरगाह समुद्र में समा गयी थी। खास बात यह है कि  2007 की रिसर्च से पहले इस बंदरगाह के सटीक स्थान को लेकर विवाद होता रहा है। 

नामकरण

मुज़िरिस नाम की उत्पत्ति स्थानीय  नाम मुच्चिरि से  मानी जाती है  जो कि पुराने तमिल शब्द फटे होंठ से लिया गया है दरअसल पेरियार नदी भी इस  स्थान पर कटे होंठों की तरह दो भागों में विभाजित  हो जाती है। मुज़िरिस को अक्सर संगम कविताओं में जैसे अकननुरु रचयिता एरुक्कत्तुर तयनकन्नानार कविता संग्रह के गीत संख्या 149 में तथा कवि पुराणनुरु द्वारा रचित कविता संग्रह के गीत 343 इसके साथ ही कवि पथित्रुपथु आदि ने मुच्चिरि के रुप में संदर्भित  किया है।

 इस के साथ ही इस बंदरगाह का उल्लेख भारत के सुप्रसिद्ध महाकाव्य रामायण में मुरासिपप्पट्टणन के नाम से इसका जिक्र मिलता है।इस बंदरगाह का उल्लेख यहूदी ताम्रपत्र में चेरा शासक के  11वीं शताब्दी के शासन काल को दौरान मिलता है।

जगह का प्रमाण

पहले इस बंदरगाह की पहचान कर्नाटक राज्य के दक्षिण-पश्चिम में मंगलौर के आसपास के क्षेत्र के रुप में की जाती थी। बाद में यह परिकल्पना दी  गयी कि यह बंदरगाह वर्तमान में कोडुंगल्लूर के आसपास स्थित थी जो  कि केरल राज्य के त्रिशूर जिले का एक शहर और तालुक है। खास बात यह है कि  यह क्षेत्र दक्षिण भारतीय इतिहास के द्वितीय चोल काल के चेरा शासकों के केंद्र के रुप  में प्रमुखता दिखाता है।

मगर 2007-08 को समय काल को दौरान हुई कोडुंगल्लूर और उत्तरी परवर के बीच पट्टनम गाँव में खुदाई की गई तब यह पता लगाया गया कि मुजिरिस का खोयी हुई बंदरगाह मिल गयी है जिससे नई परिकल्पना की शुरुआत हुई जिसने पट्टनम को मुज़िरिस के रुप में पहचाने जाने से इतिहासकारों के बीच विवाद पैदा कर दिया।

व्यापार

मुज़िरिस बंदरगाह भारत और फारस मध्य पूर्व उत्तरी अफ्रीका और ग्रीक-रोमन भू-मध्यसागरीय क्षेत्रों क बीच व्यापारिक संबंधों का एक महत्वपूर्ण केंद्र था। इतिहासकार प्लिनी द एल्डर में अपने नेचुरल हिस्ट्री रिसर्च बुक में मुज़िरिस को भारत का पहला व्यापारिक केंद्र बताया है। हालांकि 5वीं से भारत और रोम व्यापार में गिरावट आयी फिर भी मुज़िरिय न अन्य क्षेत्रों जैसे कि फारस और अरबों का ध्यान आकर्षित किया।

इस बंदरगाह से निर्यात की जाने वासी वस्तुओं में मुख्य रुप से मसाले जैसे कि काली मिर्च मालाबैथ्रोन आदि थे इसके बाद कुछ कीमती पत्थर जैसे बैरिल मोती हीरे और नीलम थे। इनके अलावा हाथी दांत चीनी रेशम कछुओं की खोल तथा गंगा में पायी जानी वाली स्पाइकानार्ड का भी व्यापार किया जाता था।

वहीं रोमन नाविक सोने के सिक्के पोरिडाट पतले कपड़े डिज़ाइनर लिनेन और बहुरंगी वस्त्र के साथ-साथ तांबा सीसा टिन मूंगा सल्फाइड तथा कच्चा कांच शराब और रियलगर और आर्पिमेंट लाते थे।

प्रारम्भिक साक्ष्य

रेशम मार्ग प्राचीन व्यापार मार्गों का एक समूह था जो पूर्व और पश्चिम को जोड़ता था तथा रोम की दो महान सभ्यताओं को बीच वस्तुओं और विचारों का आदान-प्रदान करने का माध्य था। मानचित्रों पर स्थलीय मार्ग लाल और समुद्री मार्ग नीले रंग में दर्शाया जाता गए है। 

संगम साहित्य

मुज़िरिस का उल्लेख तमिल के शास्त्रीय संगम साहित्य में मिलता है जो मुख्य रुप से 100 से 250 ईसा पूर्व के समय काल के वर्णन को दर्शाता है। एक शास्त्रीय तमिल कृति पुराणपनुरु में मुजिरिस को एक हलचल भरे बंदरगाह के रुप में वर्णित किया गया है जहां आंतरिक वस्तुओं का आयतित सोने के बदले आदान-प्रदान किया जाता था। ऐसा प्रतीत होता है कि कविता इस रचना के आधार पर प्रमुख रोमन व्यापारियों के साथ अपने संपर्कों को सीधे वाणिज्यिक सौदों का बजाय उपहार विनिमय के रुप में मान्यता देते थे।

एरिथ्रियन सागर का पेरिप्लस

पहली शताब्दी के ग्रीक यात्रा वृत्तांत पेरिप्लस आफ द एरिथ्रियन सी के अज्ञात लेखक जिसका अर्थ है लाला सागर की यात्रा चेरा साम्राज्य का विस्तृत वर्णन देता है जिसमें इस बंदरगाह के महत्व का वर्णन किया गया है। इसके बाद नौरा और टिंडिस का जिक्र मिलता है जो कि लिमरिके के पहले बाज़ार थे और मुज़िरिस और नेल्किंडा जो अब सबसे महत्वपूर्ण थे। टिंडिस सेरोबोथ्रा राज्य का वह हिस्सा है जो समुद्र के किनारे पर स्थित एक गांव है।

इसी क्षेत्र में मुज़िरिस में अरब और यूनानियों द्वारा माल से भरे जहाज़ बड़ी संख्या में आया करते थे। यह एक नदी पर स्थित है जो कि समुद्र से 92.5 किलोमीटर दूर था इसी को यूनान की दूरी मापने की इकाई के अनुसार 500 स्टेडिया कहा जाता है जिसमें एक स्टेडिया 185 मीटर का होता है। यहां से काली मिर्च का निर्यात होता है जिसका उत्पादन उन बाज़ारों के पास के एक क्षेत्र में होता था जिसे काट नारा कहा जाता है।

पेरिप्लस के अनुसार

यह प्राचीन यूनानी यात्रा समुद्री यात्रा विवरण के अनुसार पता चलता है कि मुज़िरिस की बड़ी बस्ती विदेशी व्यापार के माध्यम स चेरा रियासत के लिए एक समृद्ध मुख्य व्यापारिक बंदरगाह का काम करती थी। पास की पहाड़ियों से काली मिर्च स्थानीय उत्पादकों द्वारा मु़्ज़िरिस लाई जाती थी और रोमन व्यापारियों के आगमन की प्रतीक्षा में गोदामों में ढेर लगा कर रखी जाती थी।

क्योंकि मुज़िरिस में उथले पानी के कारण गहरे पतवार वाले जहाज बंदरगाह तक नदी के ऊपर की ओर नहीं जा सकते थे इसलिए रोमन मालवाहक जहाजों को लैगून के किनारे पर शरण लेनी पड़ती थी वही जबकि उनका माल छोटे जहाजों पर नदी के ऊपर की ओर स्थांतरित किया जाता था।

इस यात्रा लेख में यह भी दर्ज है कि मुज़िरिस जैसे स्थानों पर अनाज की विशेष खेप  भेजी गई थी रिसर्च कर्ताओं मानना है कि ये डिलीवरी स्थानीय रोमन निवासियों के लिए थी जिन्हें चावल के स्थानीय आहार के पूरक के रुप में कुछ चाहिए था।

सिलप्पतिकारम का अनुसार

दूसरी शताब्दी ईस्वी में कोडुंगल्लूर के जैन कवि राजकुमार इंलगो अडिगल द्वारा रचित तमिल  महाकाव्य सिलप्पतिकारम जिसका हिंदी में नाम पायल की कहानी है के अनुसार मु़ज़िरिस को एक ऐसे स्थान के रुप में दर्शाया गया है जहां यूनानी व्यापारी जहाज आकर सोने के बदले काली मिर्च खरीदते थे। इसमें यह भी उल्लेख किया गया है कि वस्तु विनिमय व्यापार के समय लगने के कारण व्यापारी एक अनोखी जीवन शैली जीते थे जो स्थानीय आश्चर्य की स्रोत थी।

इसके साथ ही सिलप्पतिकारम यूनानी व्यापारियों के देश वापसी  का वर्णन करते हुए लिखा मिलता है कि दक्षिण के विशाल किरणों वाला सूर्य उदय होता है और शीत ऋतु के आगमन में सफेद बादल बनने लगते है तब गहरे उफनते सागर को पार करने का समय आ जाता है। टिंडिस के शासक चील की लकड़ी रेशम चंदन मसाले और तरह-तरह के कपूर से लदे जहाज़ भेजते है।

बंदरगाह के गायब होने का कारण

इस बंदरगाह के गायब होने का मुख्य कारण 1341 में पेरियार नदी में आई बाढ़ थी जिसके कारण से यह बंदरगाह  सभी प्राचीन काल के ज्ञात मानचित्रों से गायब हो गई। इतिहासकार राजन गुरुक्कल तथा डिक व्हिटैकर द्वारा प्रकाशित एक लेख के माध्यम से बताया की इस बाढ़ की घटना ने कोच्चि के वर्तमान बंदरगाह और वेम्बनाड बैकवाटर प्रणाली को समुद्र से जोड़ दिया तथा इस क्षेत्र में एक नई भूमि का निर्माण किया जो अब कोच्चि के पास स्थित वाइपिन द्वीप के रुप में जाना जाता है। वैसे इनके द्वारा प्रकाशित इस लेख का नाम नीशीर्षक मुज़िरिस की खोज था।

इन दोनों खोजकर्ताओं अध्ययन से पता चल पाया कि इस क्षेत्र के भू-भौतिकी सर्वेक्षण से हमें पता चला कि 200 से 300 वर्ष पूर्व तटरेखा वर्तमान तट स लगभग 3 किलोमीटर पूर्व में स्थित थी इसी क्रम में 2000 साल पहले यही तटरेखा और भी पूर्व में लगभग 6.5 किलोमीटर आगे रही होगी।

उन्होंने अनुमान लगाया कि यदि रोमन काल में मुज़िरिस यहां कहीं स्थित होता तो उस समय तटरेखा अपनी वर्तमान रेखा से लगभग 4 से 5 किलोमीटर पूर्व में फैली होत। नदी मुहाने पर नियमित रुप से गाद  जमा होने के कारण अंततः इस स्थान को बंदरगाह के रुप में इस्तेमाल करना बंद करना पड़ा होगा।

पुरातत्व खुदाई के साक्ष्य

1945 में कोडुंगल्लूर के क्षेत्र में की गई खुदाई में 13वीं शताब्दी से पहले की कोई वस्तु नहीं मिल पाई। वहीं इसी क्षेत्र से 2 किलोमीटर दूर 1969 में की गई खुदाई में 13वी शताब्दी के साथ-साथ 16वीं शताब्दी की भी प्राचीन वस्तुओं की प्राप्ति हुई थी। इसी क्रम 1983 में इस क्षेत्र से लगभग 10 किलोमीटर दूर के क्षेत्र में खुदाई के दौरान रोमन सिक्कों का एक बड़ा भण्डार मिला जो  कि इस बात का संकेत देता है कि मुज़िरिस से पालघाट दर्रे और कावेरी घाटी के रास्ते भारत से पूर्वी तट तक विदेशी व्यापार क्षेत्र था।

इसके बाद 2007 में के सी एच आर ने पुरातात्विक खोजों के आधार पर पट्टनम में मुज़िरिस की संभावित खोजो में बड़ी संख्या में कलाकृतियां मिली हैं। खास बात यह है कि अब तक पट्टनम में उत्खनन के सात सत्र 2007 से 2014 तक पूरे हो चुके हैं। इन्हीं खोज के आधार पर जब के सी एच आर ने पुरातात्विक खोजों के आधार पट्टनम में ही मुज़िरसि बंदरगाह होने की संभावना जाहिर की तब अन्य इतिहासकारों और पुरातत्वविदों ने इसकी आलोचना की।

जिसमें मुख्य रुप से आर नागस्वामी के एन पणिक्कर और एमजीएस नारायण जैसे इतिहासकारों ने आलोचना करते हुए आगे के विश्लेषण की मांग की। हलांकि अन्य लोगों ने इसका समर्थन किया जिनमें इतिहासकार और शिक्षाविद राजन गुरुक्कल भी शामिल थे यद्यपि वे भी इस स्थल को क्षेत्रीय व्यापारियों की बस्ती अलावा और कुछ नहीं मानते थे क्योंकि इसमें विकसित प्रशासन या परिष्कार का अभाव था यदि मुज़िरिस कहीं और स्थित होता तो उन्हें लिखित साक्ष्य की उम्मीद थी।

खोज में मिले साक्ष्य 

इस 2007 की खुदाई के दौरान सफेद रंग के चीनी मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े तथा लाल रंग एवं काले रंग के मिट्टी के बर्तन के टुकड़े इसके साथ ही रत्न में कांच के मोती अर्ध कीमती पत्थरों के मोती जड़े हुए आभूषण और मुहर के छल्ले इसके साथ ही कैमयो ब्लैंक के अधूरे टुकड़े जो कि खास कर कांच य धातु के बने हुए हैं तथा कैमियो छवि व डिज़ाइन के लिए आधार बनाने के लिए डिज़ाइन किए जाते हैं इसके साथ ही सिक्के मसाले और टेराकोटा की वस्तुएं मिली हैं।

इसके साथ ही पक्की ईंटों से बना संरचनात्मक घाट परिसर है जिसमें नावों को खड़ा करने के लिए नौ बोलार्ड थे इसके साथ ही पट्टनम में मिली एक और रोचक चीज तीन तमिल ब्राह्मी लिपियों में से एक थी यह एक बर्तन के किनारे पर खुदी हुई थी और लगभग दूसरी शताब्दी ईस्वी की है जिस पर अ मा ना लिखा हुआ था जो प्रतीत होता है

जिसका मलयालम अर्थ है जैन होगा। यदि खोज कर्ताओं द्वारा अन्य प्रमाणों द्वारा यह व्याख्या और अर्थ प्रमाणित हो जाता है तो यह स्थापित होता है कि जैन धर्म कम से कम दूसरी शताब्दी से मालाबार तट पर प्रचलित था।

यह पहली बार है जब खोजकर्ताओं को प्राचीन केरल में एक धार्मिक प्रणाली से संबंधित साक्ष्य मिले है। इसके साथ ही पट्टनम में मिले कंकाल के नमूनों के डी एन ए विश्लेषण से मुज़िरिस में अतीत में पश्चिमी यूरेशियाई आनुवंशिक छाप वाले लोगों की उपस्थिति की पुष्टि होती है। इसे प्राचीन बंदरगाह शहर के अतीत में रखे गए विशाल अंतरराष्ट्रीय महत्व का संकेत माना जा रहा है।

निष्कर्ष

हम कह सकते है कि मुज़िरिस बंदरगाह केवल एक बंदरगाह ही नहीं था बल्कि वह प्राचीन भारत को वैश्विक व्यापार के शीर्ष पर स्थापित करने वाला एक जीवंत केन्द्र है। काली मिर्च जिसे काला सोना भी कहा जाता था ने व्यापार से समृद्ध यह नगर प्राचीन रोम यूनान और अरब देशों के साथ भारत के आर्थिक व सांस्कृतिक संबंधों की रीढ़ बना।

यद्यपि 1341 में पेरियार नदी की बाढ़ ने इस ऐतिहासिक नगर को इतिहास के पन्नों में समेट दिया और कोच्चि बंदरगाह के उदय का मार्ग प्रशस्त किया लेकिन संगम साहित्य में वर्णित इसकी गाथाएं और आधुनिक पुरातात्विक उत्खनन आज भी भारत की महान समुद्री विरासत का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

इसके साथ ही हमें पता चला की मुज़िरिस प्राचीन व्यापार का केंद्र जहां विशेषकर काली मिर्च और मसालों का व्यापार किया जाता था। यह शहर सांस्कृतिक संगम का केंद्र था जहां ग्रीक  रोमन यहूदी और अरब व्यापारियों की उपस्थिति से विकसित हुई। हाल ही में 2007 से 2014 की खोज में मिले साक्ष्यों का कारण यह चर्चा में है।

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