Indian History reveal the Past

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2026-09-25

नौ-सेना विद्रोह 1946

digital oil painting of a navy mutiny

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम 1946 में हुए नौ सेना विद्रोह के बारे में तथा इस विद्रोह के  पीछे के मुख्य कारणों पर चर्चा  करेंगे इसके  साथ ही इस घटना  के  मुख्य  पात्रों तथा उनके द्वारा किए गए महत्वपूर्ण कार्यों पर चर्चा करेंगे।

विद्रोह के मुख्य पात्र
इस घटना के मुख्य पात्र रायल भारतीय नौ सेना के जवान एवं एयर फोर्स  के जवान तथा पुलिस बल के जवानों के साथ ही जान हेनरी गॅाडफ्रे जो कि आर  आई एल कमान के अधिकारी थे इसके साथ मोहम्मद अली जीन्ना सरदार वल्लभ भाई पटेल बी सी दत्त सर क्लाउट आचिनेलक  जो कमांडर इन चीफ थे इसके  साथ ही जनरल शाह नवजात खान कर्नल प्रेम सहगल एवं कर्नल गुरुब्बकश सिंह ढिल्लों आदि थे।

विद्रोह का मुख्य कारण
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दैनिक इस्तेमाल की जाने वासी वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी किए जाने से सैनिकों को आर्थिक कठिनाई का सामना करना पड़ा था। इसके साथ ही जापान युद्ध के बाद भारतीय सैनिकों की बरखास्त करना और सैनिकों के साथ मनमाना व्यवहार, अपर्याप्त वेतन तथा वरिष्ठ नेतृत्व की उदासीनता था।

विद्रोह के दौरान हुई घटनाएं

1 दिसंबर 1946 
यह विद्रोह की पहली घटना थी जिसमें R.I.N कमांडरों ने HMIS Talwar को पहली बार  जनता के लिए खोला गया था जिसमें सुबह समूह ने परेड ग्रांउड में जले हुए झंडे और बैनर बिखेर  कर परिसर में तोड़फोड़ की इसके साथ ही टावर पर झाड़  और बाल्टियां प्रमुखता से प्रदर्शित की और प्रतिष्ठान की  विभिन्न दीवारों पर भारत छोड़ो ब्रिटिश राज मुर्दा बाद तथा गांधी जी और नेहरु की विजय हो जैसे नारे लिखे हुए थे।

मामले को संभालते हुए वरिष्ठ अधिकारियों ने जनता के आने से पहले परिसर की सफाई कर दी लेकिन उपद्रव कर्ताओं पर कोई कार्यवाही नहीं कि। इस कमजोर प्रतिक्रिया ने षड्यंत्रकारियों को और अधिक साहसी बना दिया, अगले महीनों में इसी प्रकार की गतिविधियों का अंजाम देना जारी रखा।

इस कार्य को अंजाम देने से पहले कार्यरत 20 आपॅरेटरों ने अपने सेवाकाल के दौरान नस्लीय भेदभाव से त्रस्त एक दर्जन हमदर्दों के साथ मिलकर आज़ाद हिंद के नाम से एक गुप्त समूह बनाया और अपने वरिष्ठ अधिकारियों को कमजोर  करने की साजिशें रचने लगे। षड्यंत्रकारियों को पकड़ने में असमर्थ होने के कारण HMIS Talwar कमांड ने संदिग्ध लोगों की छंटाई करना प्रारम्भ करना प्रारम्भ कर दिया ।

उन्हें लगा की इससे उपद्रवी बल बाहर हो जायेगा। मगर ऐसा नहीं हुआ इससे समूह का आकार भले ही छोटा हो गया मगर लेकिन लोग राष्ट्र वादी गतिविधियों के लिए उत्साहित रहे। यह सभी प्रतिक्रिया कमांडर -इन -चीफ क्लाउड आचिनलेक द्वारा जारी पत्रों का परिणाम थी।

2 फरवरी 1946

 क्लाउड आचिनलेक  एक समारोह में शामिल होना था अधिकारियों को तोड़फोड़ की आशंका थी इसलिए उन्होंने पहले से ही बड़े पैमाने पर किसी भी प्रकार की कार्यवाही को रोकने के लिए गार्ड तैनात कर दिए थे। इसके बावजूद समूह ने उस  मंज की दीवारों पर पोस्टर चिपका दिए और रंग भर दिए। जहां से कमांडर इन चीफ को सलामी लेनी थी। इस सभी स्टीकर और पोस्टर पर भारत छोड़ो के नारे तथा जय  हिंद लिखा हुआ था।

सूर्योदय से पहले ही पोस्टर चिपकाने वालों का पता चल गया युद्ध में पांच साल बिता चुके अनुभवी बलाई चंद्र दत्त को पोस्टर और गोंद के साथ रंगे हाथों पकड़ा गया। कार्यवाही के दौरान उनके लॅाकर की तलाशी ली गई जिसमें से राष्ट्र वादी साहित्य बरामद किए गए। इन सभी सामग्री को राजद्रोह माना गया। दत्त के साथ रियल एडमिरल सहित पांच वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा एक के बाद एक पूछताछ की गई।

दत्त ने सभी तोड़फोड़ की घटनाओं की जिम्मेदारी ली जिसके चलते उन्हें 15 दिनों के लिए एकांत कारावास में रखा गया जबकि  उनके कारावास  में रहने का बाद भी तोड़फोड़ की घटनाएं जारी  रहीं।

8 फरवरी 1946

कई नौ सैनिकों का आदेश न मानने के कारण कोर्ट मार्शल किया गया। दूसरी तरफ कमांडिंग आफिसर फ्रेडरिक किंग ने कथित तौर पर भारतीय  जवानों को कुत्तों के बेटे, कुली के बेटे और जंगली जैसे अपशब्दों का इस्तेमाल किया। कुछ नौ सैनिकों ने कमांडिंग आफिसर के खिलाफ प्रयोग की गई भाषा शैली पर शिकायतें दर्ज की।

17 फरवरी 1946

बड़ी संख्या में नौ सैनिकों ने भोजन और सैन्य परेड के आदेशों को मानने से इनकार कर दिया। जिसके चलते कमांडर किंग ने ब्रीफिंग के दौरान नाविकों के एक समूह का वर्णन करने के लिए काले कमीने शब्द का इस्तेमाल किया था।

18 फरवरी 1946

इस दिन HMIS सतलज , HMIS जमुना और  बाम्बे हार्बर में कैसल और फोर्ट बैरक  में रेटिंग्स न HMIS Talwar के अपरेटरों के साथ एक जुटता दिखाई और आदेशों को मानने से इनकार कर दिया। इस बात की खबर उसी दिन 12.30 मिनट पर सभी उच्च अधिकारियों को खबर हो गई की आफिसर ने आदेश मानने से इनकार कर दिया है। तटवर्ती प्रतिष्ठानों पर कब्जा कर लिया गया और अधिकारियों को निष्कासित कर दिया गया।

दिन भर नौसैनिक बाम्बे हार्बर में एक जहाज से दूसरे जहाज पर आते जाते रहे और अन्य सैनिकों को विद्रोह में शामिल होने के लिए मनाते रहे। इसी बीच बी. सी. दत्त को 15 दिन के कारावास से रिहा कर दिया गया। उनकी बरखास्तगी से पहले उन्हें तलवार बैरक में लौटने की अनुमति दी गई। बाद में उन्हें ही विद्रोह को उकसाने वालों में से एक के रुप में जाना जाने लगा।

खास बात यह है कि उनकी रिहाई के बाद एक ही दिन में विद्रोह बंदरगाह के 22 जहाजों तथा बॉम्बे के 12 अन्य तटवर्ती प्रतिष्ठानों में फैल गया। उसी दिन विद्रोह में RIN द्वारा संचालित वायर लेस स्टेशन भी  शामिल हो गए जिनमें बातों के आदान-प्रदान के लिए कुछ दूरस्थ स्टेशन भी शामिल थे। HMIS Talwar के विद्रोहियों ने सिगनल स्कूल में उपलब्ध वार लेस उपकरणों का उपयोग करके उनसे सीधा संचार स्थापित किया।

19 फरवरी 1946

इस दिन दोपहर में सैनिक बाम्बे बंदरगाह पर विद्रोहियों ने HMIS Talwar में नौ सेना केंद्रीय हड़ताल समिति NCSC के प्रतिनिधियों का चुनाव करने के लिए तथा मांगो का चार्टर  तैयार करने के लिए एकत्र हुए। युद्ध पोत और तटीय प्रतिष्ठान समिति चुनाव के लिए निर्वाचन क्षेत्र बन गए, जिनमें व्यक्तिगत प्रतिनिधियों को समिति के लिए चुना गया। समिति के कई सदस्य कथित तौर पर 25 वर्ष से कम आयु के थे। जिन में पीटी अफसर मदन सिंह सिगनल मैन एम एस खान आदि शामिल थे। इन्हें समिति की औपचारिक वार्ता के लिए चुना गया था। मांगो का चार्टर अधिकारियों को भेजा गया जिसमें राजनीतिक और सेवा संबंधी मांगो का मिश्रण था।

मांगे कुछ इस प्रकार थी 

1 सभी राजनीतिक कैदियों की रिहाई
2 भारतीय राष्ट्रीय सेना के सभी कार्मिकों को बिना शर्त के  रिहा किया जाए
3 इंडोनेशिया और मिस्र से सभी भारतीय कार्मिकों की वापसी
4 भारत से ब्रिटिश  नागरिकों का निष्कासन
5 चालक दल के साथ दुर्व्यवहार करने के लिए कमांडिंग अधिकारियों और सिगनल बोसन पर मुकदमा चलना
6 भारतीय नौ सेना के नौसैनिकों और अधिकारियों की शीघ्रता से सेवा मुक्ति
7 वेतन और पारिवारिक भत्ते और अन्य सुविधाओं के संबंध में रायल नेवी के साथ समान दर्जा
8 परोसे जाने वाले भारतीय भोजन की सर्वोत्तम गुणवत्ता सुनिश्चित की जाए
9 सेवामुक्ति के बाद वस्त्र किट लौटाने की आवश्यकता को समाप्त करना
10 अधिकारियों द्वारा अधीनस्थ के प्रति व्यवहार के मानकों में सुधार
11 भारतीय अधिकारियों और पर्यवेक्षकों की नियुक्ति।

इसी दिन ऊपर के अफसरों की प्रतिक्रिया

रायल इंडियन नेवी के फ्लैग आफिसर कमांडिंग एडमिरल जान हेनरी गाडफे  ने आल इंडिया रेडियो के माध्यम से एक संदेश भेजा गया जिसमें कहा गया कि उनके विद्रोह को दबाने के सबसे कड़े उपाय किए जाएंगे जिसमें आवश्यकता पड़ने पर नौ-सेना को नष्ट करना भी शामिल है। रायल इंडियन नवी के द्वितीय-इन कमांड तथा रिय एडमिरल आर्थर रुलियन रौट्रे और बाम्बे हार्बर के कमांडिंग आफिसर ने स्वयं निरीक्षण किया।  जिसमें उन्होंने इस बात की पुष्टि की, कि अशांति व्यापक थी और नियंत्रण से बाहर थी।

रैट्रे ने विद्रोहियों के साथ बातचीत करने पर जोर दिया। लेकिन आचिनलेक और गाडफ्रे दोनों इस विचार के विरोधी थे। खास बात यह की HMIS Talwar की घटनाओं ने बॉम्बे और रायल  इंडियन नेवी के नाविकों को ब्रिटिश राज को उखाड़ फेंकने की क्रांति की संभावनाओं और अपने नौ सैनिक बिरादरी की शिकायतों के साथ एकजुटता  दिखाने के लिए प्रेरित किया था।

 20 फरवरी 1946

सूचना मिली की बॉम्बे बंदरगाह अपने सभी जहाजों और नौसैनिक प्रतिष्ठानों सहित विद्रोहियों के कब्जे में आ गया है जिसमें 45 युद्ध पोत , 10 से 12 तटवर्ती प्रतिष्ठान तथा 11 सहायक पोत और चरा बेड़े शामिल थे। इन सभी पर 10,000 से अधिक सैनिकों ने कब्जा कर लिया था। इसके साथ ही केंद्रीय संचार कार्यालय ,कोलाबा रिसीविंग स्टेशन तथा पास की सिवरी में स्थित रायल इंडियन नेवी के अस्पताल शामिल थे।

इसके अलावा युद्ध पोतों में विध्वंसक HMIS Narbada, HMIS Jamuna , अन्य दो और यु्द्ध पोत HMIS clive और HMIS Lorence एक फ्रिगेट HMIS Dhanush और चार कोरवेट HMIS गोंडवाना K348, HMIS असम K306 ,HMIS मराठा K395 , HMIS सिंध K224 आदि शामिल थे। इसके साथ ही अन्य जहाज गनबोट और नौसैनिक  ट्रालर भी शामिल थे।इस जहाज का कमान अधिकारी लेफ्टिनेंट कृष्णन ने ध्यान भटकाने वाला संकेत बनाया और 18 फरवरी 1946 को रात 8 बजे बंदरगाह से बाहर निकल गए थे।


कृष्णन विद्रोह में न तो शामिल हुए और न ही अपने नाविकों को विद्रोह में शामिल होने दिया । वर्सोवा में था HMI मछलीमार तथा एक पनडुब्बी रोधी प्रशिक्षण विद्यालय जिसमें 300 नौ सैनिक तैनात थे तथा मारवे स्थित HMI हमला जिसमें RIIN लैडिंग क्राफ्ट विंग के आवासीय क्वार्टर थे पर 600 नौ सैनिकों ने कब्जा कर लिया था 

इसी दिन नौ सेना के केंद्रीय हड़ताल समिति के कुछ नौ सैनिकों ने जन-समर्थन जुटाने लिए शहर में जाने कि सिफारिश की थी अतः इस प्रकार वे भारतीयों को एक जुट करने के लिए नारे लगाते हुए बॉम्बे के वाणिज्यिक जिलों में प्रवेश कर गए। इसके बाद शहर में विद्रोहियों और सैन्य कर्मियों सहित युरोपीय लोगों के बीच झड़पों की घटनाएं होना शुरु हुईं। शहर में पुलिस कर्मियों छात्रों तथा श्रमिक संगठनों ने विद्रोहियों का समर्थन करते हुए सामूहिक हड़तालें की।

दूसरी तरफ पायलटों ने शहर में ब्रिटिश सैनिकों की तैनाती के लिए परिवहन कर्तव्यों और बंदरगाह के ऊपर बमवर्षक विमान उड़ाने के आदेश को मानने से इनकार कर दिया। 1200 से अधिक वायु सेना के सैनिकों ने सनसमर्थन के साथ  शहर में एक जुलूस निकाला। 

वासयराय की कार्यकारी परिषद ने के बैठक बुलाई और दृढ़ रुख अपनाते हुए कैवल बिना शर्त के आत्मसमर्पण स्वीकार करने का निर्णय लिया और किसी भी प्रकार की बातचीत की संभावना को अस्वीकार किया। रियर ए़डमिरल रैट्रे ने 4.30 मिनट पर सभी सैनिकों को बैरक में उनके क्वार्टरों में वापस जाने का आदेश दिया। दक्षिण कमान क कमांडिंग आफिसर जनरल राब लाकहार्ट को विद्रोह को दबाने का आदेश दिया गया।

21 फरवरी 1946

सी लार्ड नौसेना प्रमुख से परामर्श लेने के बाद एडमिरल जान हेनरी गाडफ्रे ने आल इंडिया रेडियो पर एक बयान जारी किया जिसमें विद्रोहियों का तुरंत आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया वरना पूर्ण विनाश के लिए तैयार रहें की धमकी दी। इस सूचना के बाद क्रूजर HMS Glasgo तथा तीन फ्रिगेट और पांच विध्वंसक जहाजों को तैनात  किया गया तथा शक्ति प्रदर्शन के लिए रायल एयर फोर्स के बमवर्षक विमानों को बंदरगाह के ऊपर से उड़ाया गया।

इसके साथ ही कैसल बैरक को पुनः कब्जे में लेने का आदेश जारी किया गया। विद्रोहियों ने जमीनी सेना के कुछ ठिकानों पर गोलीबारी की इसके साथ ही उन्होंने शहर में घुसपैठ करने का प्रयास किया। लेकिन सेना ने उन्हें सफलता पूर्वक उन्हें खदेड़ दिया। मामला हाथ से निकलता देख गाडफ्रे ने ब्रिटिश एडमिरल टी को तत्काल सहायता का अनुरोध किया और बताया की विद्रोहियों के पास शहर पर कब्जा करने की क्षमता है।

इसी बीच बंदरगाह पर दुकानों पर तैनात नाविकों ने 5वीं मराठा लाइट इन्फैट्री के आगे बढ़ते ब्रिटिश सैनिकों के साथ गोलीबारी की। बैरक  की और बढ़ रहे ब्रिटिश सैनिकों पर RIN युद्धपोतों की मुख्य तोपों से गोले दागे गए। चार बजे स्ट्राइक कमेटी के निर्देशों के बाद युद्धपोतों से गोलीबारी बंद कर दी गई।  नाविक बैरकों से बाहर निकल गए। शाम को मरीन ने बैरक परिसर पर धावा बोल कर कब्जा कर लिया। बैरकों के सभी प्रवेश और निकास द्वारों को सुरक्षित कर लिया गया।

HMIS तलवार पर कब्जा करने के बाद अत्याधुनिक युद्धपोत HMIS नरबदा में स्थानांतरित करने दिया गया। इसी बीच अंधेरी और कोलाबा शिविरों के रायल इंडियन एयर फोर्स के कर्मियों में विद्रोह कर दिया और नौसेना के जवानों के साथ मिल गए। नकली खून से सने सफेद  झंडे लहराते हुए लगभग 1000 वायु सैनिकों ने बॉम्बे के मरीन ड्राइव पर कब्जा कर लिया। इस दल ने भी मांगों के चार्टर की नकल करते हुए अपनी मांगों का एक सेट जारी किया जिसमें रायल एयर फोर्स के साथ वेतनमानों की मानकीकरण मांग भी शामिल थी।

सायन क्षेत्र में रायल इंडियन एयर फोर्स के कर्मियों ने विद्रोहियों का समर्थन करते हुए हड़ताल शुरु की।

22 फरवरी 1946

एसेक्स रेजिमेंट क्वीन्स रेजिमेंट और बार्डर रेजिमेंट की बटालियन के रुप में ब्रिटिश सुदृढ़ीकरण के साथ रायल आर्मर्ड कोर की 146वीं रेजीमेंट बॉम्बे प्रांत से पूना पहुंची इसी के सात जबलपुर में तैनात रायल आर्टिलरी की फील्ड रेजिमेंट के साथ एंटी-टैंक बैटरी भी पहुंच गई। पूरे शहर में कर्फ्यू लगा दिया गया देश में व्यापक कम्युनिस्ट प्रेरित विद्रोह की आशंका से सरकार ने आंदोलन कार्यों रोक लगाने का प्रयास किया। अशांति को दौरान 236 लोगों की मौतें हुए और हजारों लोग घायल हुए। 

23 फरवरी 1946 को नौ सैना केंद्रीय हड़ताल समिति ने सभी युद्धपोतों से आत्मसमर्पण के काल झंडे फहराने का अनुरोध किया। कराजी में पूर्णतः बंद रहा इसके साथ ही गोदाम और दुकानें भी  बंद रहीं। ट्रामवे कर्मचारी हड़ताल पर चले गए तथा कालेज और स्कूली छात्र सड़कों पर प्रदर्शन के लिए निकल आये। शहर में शांति को बनायें रखने के लिए तीन कम्युनिस्ट नेताओं को गिरफ्तार किया गया और जिला मजिस्ट्रेट ने पूरे कराची  शहर में धारा 144 लागू कर दी। 

मनोरा द्वीप पर दबे हुए नौ सैनिकों ने भी हिरासत में रहते हुए भूख हड़ताल का आयोजन किया। शहर में लगभग 30000 लोगों का जुलूस निकला। हड़ताल कर रहे कई नौसौनिकों के नेताओं को अधिकारियों द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया और थार रेगिस्तान में मलिर स्थित सैन्य कारागार शिविर में भेज दिया गया। दूसरी तरफ शहर में ईदगाह पार्क में हजारों की भीड़ जमा हुई जिसमें कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व वाला जुलूस भी शामिल था। अंत में पार्क में पुलिस बल तैनात किया गया लेकिन वे अपने प्रयासों में असफल रहें। यूरोपीय स्वामित्व वाली इमारतों डाक घरों तथा सरकारी प्रतिष्ठानों में तोड़फोड़ की गई।

24 फरवरी 1946

को शहर में सैन्य बल ने सफलता पूर्वक शांति बहाल की अगले दिनों में अशांति कम हो गई 26 फरवरी के अंत तक सैन्य उपस्थिति हटा ली गई। गोलीबारी का अनुमान अधिकारिक आंकड़ों हिसाब से आत्मरक्षा में 33 लोग मारे गए तथा 53 पुलिस कर्मी घायल हुए जबकि वास्तीकता अलग थी जिनमें मरने वालों की संख्या का अनुमान नहीं लगाया जा सकता।

विद्रोह का अंत


फरवरी 1946 में भारतीय नौ सेना का विद्रोह भारतीय नौ सैनिक पुलिस सिपाहियों तथा नागरिकों द्वारा ब्रिटिश सरकार के खिलाफ किया गया एक असफल विद्रोह था। मुंबई से शुरु हुए इस विद्रोह ने कराची से लेकर कलकत्ता तक पूरे ब्रिटिश भारत में अपना प्रभाव दिखाया जिसमें 56 जहाजों और तटीय प्रतिष्ठानों में कार्यरत 10000 से अधिक नाविक शामिल हुए। मगर यह विद्रोह क्रांति में परिवर्तित न हो सका क्योंकि ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा विद्रोह को दबाने के लिए पर्याप्त बल लगा दिया।

जिसके चलते अंत में नाविकों के आत्मसमर्पण करने के साथ यह विद्रोह समाप्त हो गया। इस आत्मसमर्पण के लिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और मुस्लिम लीग में भारतीय नाविकों को मजबूर किया। उनका मानना था कि स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर इस प्रकार की अशांति से राजनीतिक और  सैन्य जोखिम बढ़ सकता है। इस प्रकार पार्टियों ने विद्रोह कि नींदा की।

क्योंकि उनका मानना था कि ऐसा करने से स्वतंत्रता संग्राम के शांतिपूर्ण समापन और सत्ता के हस्तांतरण का उनका विचार विफल हो सकता है।खास बात यह है कि इस विद्रोह के दौरान कोर्ट मार्शल किए गए सिपाहियों को स्वतंत्रता मिलने के बाद पुनः सेना में वापिस  नहीं लिया गया। इस विद्रोह का समर्थन करने वाली एक मात्र पार्टी कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया थी जो कि राष्ट्रव्यापी संगठन था।

निष्कर्ष

इस विद्रोह ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की चड़ें हिला दी जिसके चलते 1858 के भारत शासन अधिनियम के तहत भारत का शासन सीधे ब्रिटिश ताज के हाथों में चला गया। इस प्रकार कंपनी का शासन भारत से समाप्त हुआ। गवर्नर जनरल के पद को वायसराय में बदल दिया गया। जिसके साथ लार्ड कैंनिक प्रथम वायसराय बनें। इसके साथ ही ब्रिटिश नितियों में भारतीयों के आश्वासन करने के लिए रियासतों के विलय की नीती को त्यागने की घोषणा करी गई।

सेना का पुनर्गठन किया गया तथा भविष्य में ऐसे विद्रोह दुबारा न होने पायें इसके लिए भारतीय और अंग्रेज सैनिकों का अनुपात बदल दिया गया। खास बात यह है कि इसमें यूरोपीय सैनिकों की संख्या बढ़ाई गई तथा संवेदनशील और तोपखाने जैसे मबत्वपूर्ण पद अंग्रेज अधिकारीयों और सिपाहियों को सौंपे गए।

इस विद्रोह से राष्ट्र चेतना का बीजरोपण हुआ यद्यपि अंदोलन विफल रहा मगर इसने भारतीयों में एकता और राजनीतिक जागृति और स्वतंत्रता की ज्योती जगाई। यह विद्रोह केवल सैन्य अंसतोष नहीं बल्कि विदेशी दमनकारी शासन के विरुद्ध भारतीय समाज किसानों और सैनिकों की पहली सामूहिक और संगठित प्रतिक्रिया थी। जिसने भविष्य के भारतीय राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के लिए एक मजबूत वैचारिक और ऐतिहासिक आधार तैयार किया।

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