प्रस्तावना
प्रस्तुत लेख में गुहिलोत वंश के आठवें एवं अंतिम शासक तथा मेवाड़ वंश के संस्थापक बप्पा रावल के बारे में बात करेंगे। तथा उनके द्वारा लड़े गए अरब आक्रमण के बारे में चर्चा करेंगे। बप्पा रावल ने अपने बचपन से ही कई कठिनाइयों का सामना किया था उनका बचपन कैसा बिता तथा उनके बचपन का क्या नाम था वे कैसे एक राजा बने इन सम्पूर्ण घटनाओं की चर्चा इस लेख में करेंगे।
जीवन परिचय
इनके पिता का नाम रावल महेंद्र द्वितीय जिन्हें राजा नागदित्य के नाम से भी जाना जाता था तथा इनकी माता का नाम अज्ञात है बस इतना पता चलता है कि वे परमार वंश के राजा मान मोरी की बहन थीं। यानी राजा मान मोरी बप्पा रावल के मामा थे। बताया जाता है कि राजा महेंद्र मेवा़ड़ के दक्षिण-पश्चिम में स्थित नागदा कस्बे पर शासन किया करते थे।
इतिहासकारों द्वारा बताया जाता है कि राजा रावल महेंद्र के धर्मभ्रष्ट होने के कारण उनकी हत्या कर दी गई थी। उस समय बप्पा रावल की उम्र मात्र तीन वर्ष की थी जो कि शासन चलाने के लिए उपयुक्त नहीं थी।
इस बीच नागदा के शासकों ने गुहिलोत सिंहासन के युवा राजकुमार को मारने का प्रयास किया था लेकिन राजा के करीबी भील मित्रों ने जो की स्थानीय आदिवासी समुदाय से आते थे ने उनके प्रयासों को असल कर दिया। बेटे कि सुरक्षा के लिए रानी साहिबा अपने पति की पुरानी राजधानी नागदा के आसपास के बीहड़ और दुर्गम ग्रामीण इलाके में लौट आयीं। यहीं क्षेत्र ब्राह्मणों का निवास स्थान था। जो भगवान शिव की स्थापित मूर्ति एक लिंग जी पूजा किया करते थे।
राजा महेंद्र रावल की विधवा ने अपने छोटे बेटे को एक स्थानीय ब्राह्मण पुजारी की पत्नी जो की कुल की पुरोहित भी थीं को देखभाल के लिए सौंप दिया। चूंकि बप्पा रावल बहुत छोटे थे जिस कारण उनके बालिग होने तक शासन उनके नाम पर ही चला। खास बात यह है कि बप्पा रावल को पुजारी को सौंपने का वृतांत बताता है कि उन्हें उनके पिता के हत्यारों से बचाने के लिए यह कार्य किया गया होगा।
बचपन का वृतांत
बप्पा रावल ने अपना बचपन नागदा के नीचे पहाड़ियों में स्थित एक धार्मिक आश्रम में बिताया। वे ब्राह्मणों के पशुओं को चराने के काम किया करते थे। इस प्रकार उनके बचपन का नाम काल भोज पड़ा। काल शब्द का अर्थ भगवान शिव के महाकाल रुप से लिया गया है। ऐसा इस लिए था जहां बप्पा रावल रहते थे सभी ब्राह्मण परिवार एकलिंग जी यानी भगवान शिव पूजा-अर्चना के प्रति गहरी निष्ठा रखते थे। पशुओं को चराना ब्राह्मणों के बच्चों के लिए एक सम्मानजनक एवं गौरवपूर्ण पेशा था।
यहां रहते हुए बप्पा रावल का स्थानीय भील समुदाय के साथ गहरा संबंध बन गया। बचपन में ही बप्पा रावल घुड़सवारी और तलवार बाजी में महारत हासिल कर चुके थे। काल भोज के गुरु हरित राशि नामक एक ऋषि अंतर्मुखी और दूरदर्शी व्यक्तित्व के धनी थे। उन्होंने बालक को नैतिकता का ज्ञान सिखाया। शिव का आराधना करना सिखाया विधान सभाओं के लिए दीक्षित किया। इस प्रकार बप्पा रावल हरित ऋषि के शिष्य बने महर्षि को जल्द ही ज्ञात हो गया कि बालक के पास अद्वितीय बुद्धि और सहानुभूति की क्षमता है।
उनकी प्रतिभा के देखते हुए उनके गुरु ने भविष्यवाणी की कि ठीक 16 वर्ष बाद यह बालक मेवाड पर शासन करेगा। उनके गुरु ने उन्हें विशेष आशीर्वाद दिया और बप्पा रावल को पालन करने के लिए विशिष्ट आचार संहिता प्रदान की।
16 वर्ष के बाद
जब 18 वर्ष के हुए तब वे चितौड़ गए इतिहासकारों द्वारा बताया जाता है कि उस समय किले के नीचे स्थित कस्बे में मेला चल रहा था वहां बप्पा रावल ने एक ऐसी लड़ाई का प्रदर्शन किया जिसने मान मोरी और परमार सरदारों को भयभीत कर दिया। जब मान मोरी को पता चला की वे उनका भांजा है तो उन्होंने उनका स्वागत किया और उन्हें किले के विद्वानों में शामिल किया इसके साथ ही उनके मामा ने एक जागीर भी भेंट में दी।
इतिहासकारों अनुसार बताया जाता है कि उनके पिता की हत्या भील सरदारों द्वारा षड्यंत्र रच कर की गयी थी इनमें किसी राजा या सम्राट का नाम नहीं मिलता बस कुछ क्षेत्रीय मुखियों तथा सरदारों ने मिल कर इस कार्य का अंजाम दिया था बड़े होने के बाद सबसे पहले अपने पिता के हत्यारों तथा षड्यंत्र कर्ताओं को दंडित किया और अपना साम्राज्य फिर से हासिल किया।
इसके वाद अपनी वंशावली को छोड़ते हुए यानी गुहिलात वंश जिसे गुहिला वंश कहते है को समाप्त करके मेवाड़ राजवंश की 734 ईस्वी में स्थापना की। इस प्रकार लगभग 21 वर्ष की आयु में उन्होंने अपने पिता रावल महेंद्र द्वितीय का स्थान लिया। बताया जाता है कि बप्पा रावल नाम उनकी बहादुरी के कारण उपाधि की रुप में उनकी प्रजा ने उन्हें दिया था और उनका वास्तविक नाम जो कि वे स्वयं स्वीकार करते थे कालभोज ही था
अरबों अथवा अम्मयद साम्राज्य का आक्रमण
सन 712 ईस्वी और आठवीं शताब्दी के समय काल में मुहम्मद बिन कासिम जो कि अरब साम्राज्य का राजा था जिसे हम उम्मयद साम्राज्य umayyad dynasty के नाम से भी जानते है ने सिंध के राजा दाहिर सेन को पराजित कर सिंध पर अपना शासन स्थापित किया इसके बाद के समय काल में अरब सेनापतियों जैसे कि जुनैद और तमीम ने राजस्थान गुजरात तथा मालवा पर हमला के छोटे-छोटे राज्यों पर हमला करना प्रारम्भ किया। जिससे इन क्षेत्रों के आसपास के राजा जैसे की मान मोरी इन लगातार आक्रमणों से कमजोर हो रहे थे।
इसी बीच जब अरब आक्रमणकारी मोहम्मद बिन कासिम ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया तो राजा मान मोरी ने अपनी प्रजा से आक्रमणकारी सेना जुटाने का आदेश दिया लेकिन अरबों की दहशत के चलते सभी जागीरदार अपनी जागीरें छोड़कर भाग खड़े हुए तब अंत में उन्होंने अपने भतीजे बप्पा रावल को बुलावा भेजा। इस प्रकार परमार राजा ने बप्पा रावल को अपनी सेना का सेनापति नियुक्त किया।
जागीरों से बेदखल किए जाने के बावजूद सरदार शर्मिंदगी से कारण उनके साथ चले गए। इतिहासकार कर्नल जेम्स टाड और अन्य पारंपरिक ग्रंथों के अनुसार बप्पा रावल ने अपनी वीरता और सैन्य कौशल का परिचय देते हुए अरब आक्रमणकारियों को करारी शिकस्त दी और उन्हें खदेड़ दिया। उनके समर्थन में प्रतिहार शासक नागभट्ट प्रथम तथा क्षेत्रीय राजाओं ने भी उनका सहयोग किया और अरबों को भारी शिकस्त दी।
चारण और भाट साहित्य की कथाओं अनुसार बप्पा रावल ने केवल अपनी सीमाओं की रक्षा ही नहीं की बल्कि भागती हुई अरब सेना का पीछा करते हुए उन्हें उत्तर-पश्चिम में काफी दूर तक खदेड़ा। बताया जाता है कि बप्पा रावल चौकियां और छावनीयां गजनी वर्तमान अफगानिस्तान तथा पाकिस्तान के रावलपिंडी शहर तक थी कहा यह भी जाता है कि रावलपिंडी नाम भी उनके द्वारा ही दिया गया था।
बताया जाता है कि बप्पा रावल की अरबों की इस ऐतिहासिक जीत ने कई सदियों तक उत्तर-पश्चिम भारत पर इस्लामिक आक्रमणों का रास्ता बंद कर दिया।
अंतिम समय
इतिहासकारों द्वारा बताया जाता है कि बप्पा रावल ने अपने जीवन के अंतिम समय में राजपाट और मोह-माया का त्याग किया और ध्यान और साधना में अपना मन लगाया। जिसके लिए मेवाड़ से उत्तर की ओर यात्रा करते हुए नागदा से आगे बढ़े खुरासान में अपना अंतिम समय बिताया और अपने गुरु हारित ऋषि के मार्ग पर चलते हुए योग साधना के बल पर 753 ईस्वी के आसपास अपना शरीर त्याग दिया।
ऐतिहासिक साक्ष्य
कुछ शिलालेखों में बप्पा रावल का उल्लेख मिलता है जिनमें गुहिला वंश की वंशावली यानी सूची दी गई थी। लेकिन अन्य शिलालेखों में उनका उल्लेख नहीं मिलता है। उदाहरण के तौर पर देखा जाए तो 959 ईस्वी के उनावास शिलालेख तथा 971 ईस्वी के एकलिंग शिलालेख में उनका उल्लेख नहीं मिलता है। इसके साथ ही 977 ईस्वी के अतपुर शिलालेख में इसके साथ ही 1083 ईस्वी के कदमल शिलालेख में भी उनका उल्लेख नहीं मिलता है।
इतिहासकारों का मानना है कि बप्पा रावल का गुहिला शासकों में से किसी एक का उपनाम नाम था इसके साथ ही अलग-अलग विद्वानों ने अलग-अलग गुहिला राजाओं से जोड़ने का प्रयास किया है। अतपुर और कदमल शिलालेखों के अनुसार गुहिला शासक महेंद्र के बाद कालभोज शासक बने। जी एच ओझा जैसे कई इतिहासकारों ने बप्पा रावल को कालभोज के रुप में पहचाना है।
क्योंकि 977 ईस्वी के अतपुर शिलालेख में खुमाना को कालभोज का पुत्र बताया गया है।
1404 ईस्वी के महारावल पाटा के उपरागणवा यानी डूंगरपुर शिलालेख में खुमाना को बप्पा रावल का पुत्र बताया गया है। आर.वी.सोमानी इस पहचान का समर्थन करते है लेकिन चेतावनी देते है क साक्ष्य निर्णायक नहीं है बप्पा रावल गुहिला वंश की किसी अन्य शाखा से संबंधित कोई अन्य शासक हो सकते है।
अतपुर शिलालेख में बप्पा रावल के नाग का उत्तराधिकारी और अपराजित का पूर्वज बताया गया है। 1460 के कुंभलगढ़ शिलालेख में बप्पा रावल को नाग का उत्तराधिकारी और अपराजित का पूर्वज बताया गया है। इससे पता चलता है कि बप्पा रावल कालभोज के परदादा शिलादित्य का दूसरा नाम था।
इस प्रमाण के आधार पर दशरथ शर्मा और डीसी सिरकार ने बप्पा रावल की पहचान शिलादित्य के रुप में की है। वहीं आर.वी. सोमानी इस पहचान का खंडन करते हुए कहते है कि इस शिलालेख में कई त्रुटियां है जिनमें बप्पा रावल को गुहादत्त के पिता के रुप में दर्शाया गया है जबकि कुछ शिलालेखों में उन्हें राजवंश का संस्थापक दर्शाया गया है।
कुछ अन्य इतिहासकारों ने बप्पा रावल को जैसे कि डी.आर. भंडारकर ने गुहिला शासकों के औसत शासनकाल की गणना के आधार पर कालभोज के पुत्र खुमाना के रुप में पहचाना है।
वहीं लखनऊ विश्वविद्यालय के श्याम मनोहर मिश्रा ने यह सिद्धांत दिया कि बप्पा रावल मूल रुप से मोरी शासक मनुरजा यानी मान मौर्य के जागीरदार थे।
उन्होंने संभवतः अरबों के विरुद्ध मोरी अभियान का नेतृत्व किया था जिससे वे अपने अधिपति से अधिक प्रसिद्ध हो गए थे। खोज कर्ताओं का मानना है कि य तो उन्होंने मनुराज को पदच्युत कर दिया या फिर मनुराज की निःसंतान मौत के बाद खुद राजा बन गए।
चित्तौड़ शिलालेख के अनुसार उन्होंने कर्नाटक और चोलों के साथ भी संघर्ष किया था अरबों के आक्रमण के बाद बप्पा रावल ने प्रतिहारों और राष्ट्रकूटों के साथ संघर्ष किया था। बताया जाता है कि राष्ट्रकूट राजा दंतिदुर्ग ने उज्जैन पर कब्जा कर लिया। हलांकि थोड़े समय में राष्ट्रकूट वहां से चले गए और नागभट ने अपनी सत्ता पुनः प्राप्त कर ली थी।
इतिहासकार आर. वी. सोमानी का सिद्धांत है कि इन संघर्षों में बप्पा रावल ने प्रतिहारों की सहायता करके दंतिदुर्ग की सेनाओं का सामना किया और इस प्रकार मेवाड क्षेत्र के पूर्वी हिस्सों पर कब्जा करने में सफल रहें।
सोने के सिक्के
जी.एच.ओझा जैसे प्रख्यात इतिहासकारों ने नागरी लिपि में श्री वोप्पा य श्री वोप्पाराजा अंकित कई सोने के सिक्कों को बप्पा रावल से संबंधित माना है। हलांकि कुछ मुद्रा शास्त्रियों ने इस मान्यता पर विवाद किया है तर्क देते हुए 1960 में भारतीय मुद्रा शास्त्र सोसायटी के एक जर्नल ने तर्क देते हुए कहा उस समय मेवाड उतना बड़ा साम्राज्य नहीं था
कि वें सोने के सिक्के जारी कर सके और इसके साथ ही उन्होंने तर्क दिया कि हो सकता है कि ये सिक्के सुरसेना वंश के राजा वप्पुका के हो सकते है जिनका उल्लेख 955 ईस्वी के एक शिलालेख में मिलता है।
फिर भी सिक्कों पर स्पष्ट रुप से शैव प्रतीक चिन्ह जैसे त्रिशूल लिंग और बैल के चिन्ह मिलते है जो कि बप्पा रावल की भगवान एक लिंगनाथ जी के प्रति निष्ठा और उनकी दृढ़ता से मेल खाता है। इसके साथ ही इन सिक्कों पर शैव प्रतीकों के नीचे एक व्यक्ति की लेटी हुई छवि है। उस व्यक्ति का कान बड़े और छिद्रित हैं और छेद अतिरंजित प्रतीत होते है।
इंडोलाजिस्ट डेविड गार्ड़न व्हाइट के अनुसार यह बप्पा के शैव संप्रदाय में दीक्षा का प्रतीक हो क्योंकि कान छिदवाने की प्रथा शैल संप्रदाय से जुड़ी हुई है । जो सोलहवीं शताब्दी से पहले एक लिंग जी मंदिर के संरक्षक हुआ करते थे।
हलांकि व्हाइट का मानना है कि बप्पा के पशुपात संप्रदाय में दीक्षा लेने की संभावना अधिक है क्योंकि पशु पात नाम आमतौर पर राशि में समाप्त होते थे इस प्रकार हरित ऋषि संभवतः एक पशु पात ऋषि थे। इसके आगे वे कहते है कि रावल संस्कृत शब्द राजकुल शाही-वंश 8वीं शताब्दी में पशुपती के बीच एक कुल का नाम था। जो की 13वीं में कुल नाथ संप्रदाय में समाहित हो गया था।
इसी प्रकार के एक सिक्के पर धनुष-बाण पकड़े हुए श्री राम की आकृति बनी है उनके बाई ओर एक बैल और दाई ओर एक हाथी है। सिक्के के दूसरी तरफ सिंहासन पर बैठे शासक की आकृति है जिनके दोनों और सेवक है और नीचे श्री वोप्पा य बप्पा लिखा हुआ है।
इसी प्रकार के एक सिक्के पर श्री वोप्पाराजा लिखा हुआ है जिसमें एक बैल एक त्रिशूल एक लिंग और एक परिचारक की छवियां है और दूसरी ओर एक गाय अपने बछड़े को दूध पिला रही है।
निष्कर्ष
साहस और पराक्रम का प्रतीक
बप्पा रावल केवल मेवाड़ के संस्थापक ही नहीं बल्कि भारतीय इतिहास के एक अत्यंत साहसी और प्रतापी योद्धा थे। उनके धैर्य के आगे विदेशी आक्रमणकारी विशेष कर अरबों के कदम ठहर न सकें जिससे देश की सीमाएं सुरक्षित हुईं।
धार्मिक और सांस्कृतिक निष्ठा
वे महान शासक होने के साथ-साथ धर्मनिष्ठ और भगवान शिव के परम भक्त थे। उन्होंने राजनीति और आध्यात्मिकता का अनूठा समन्वय प्रस्तुत किया जहां मेवाड़ के शासक खुद को भगवान का दीवान मानकर प्रजा की सेवा करते थे।
दूरगामी प्रभाव
उनके द्वारा स्थापित मेवाड का राजवंश आगे चलकर भारतीय इतिहास में वीरता त्याग और स्वाभिमान का प्रतीक बना।
संक्षेप में कहा जा सकता है कि बप्पा रावल का जीवन साहस कर्तव्यनिष्ठा और राष्ट्र प्रेम का अनूठा संगम था। उन्होंने न केवल विषम परिस्थितियों से निकलकर मेवाड़ में सुदृढ़ साम्राज्य की नींव रखी बल्कि विदेशी आक्रमणों के खिलाफ दीवार बनकर भारतीय संस्कृति और सीमाओं की रक्षा की।
उनकी वीरता जन हितकारी नीतियां और आध्यात्मिक जीवन-शैली सदियों तक आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देती रहेंगी और भारतीय इतिहास में उनका नाम एक अमर शासक के रुप में स्वर्ण अक्षरों में अंकित रहेगा।

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