Indian History reveal the Past

हमारे इस ब्लॉग में भारतीय इतिहास, सांस्कृतिक इतिहास, राजवंशों आंदोलन स्टार्टअप टेक्नोलॉजी कला और वास्तुकला तथा आर्थिक इतिहास से संबंधित विषयों पर जानकारी दी जाती है। हम कम से कम शब्दों में ज़्यादा से ज़्यादा जानकारी देने की कोशिश कर रहे हैं।

लेबल

2026-09-21

तिरोट सिंह

u tirot singh articale banner image

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम उन्नीसवीं शताब्दी के महान आदिवासी सरदार यू तिरोट सिंह के बारे में तथा उनके द्वारा किए गए महत्वपूर्ण कार्यों पर प्रकाश डालेंगे। इतिहासकारों के अनुसार यह बताया जाता है कि वे ब्रिटिश सरकार का विरोध करने वाले पहले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की सूची में आते है। अपने समय काल में वे मेघालय के नोंघखलाव क्षेत्र के सरदार अथवा सिएम थे। उन्हें हम इस लेख के माध्यम से उनके साहस प्रतिरोध के प्रतीक और नेतृत्व करने की क्षमताओं के रुप में याद करेंगे।

जीवन परिचय

उनका जन्म 1802 में सिएमलिएह नामक गोत्र में हुआ था। हलांकि उनका नाम तिरोट सिंह था मगर वे अपने क्षेत्र में यू तिरोट सिंह सिएम के नाम से जाने जाते थे। वे खांसी पहाड़ियों के एक भाग नोंम्खलाव के राजा था जिन्हें सिएम कहा जाता था। उनका उपनाम सिएमलिएह था। वे एक संवैधानिक थे जो अपने क्षेत्र के मुख्य गोत्रों के सहयोग से बनी अपनी परिषद क साथ सामूहिक अधिकार साझा करते थे। 

1826 में यंदबो की संधि करने के बाद अंग्रेजों ने ब्रह्मपुत्र नदी घाटी पर नियंत्रण कर लिया था। सिलहट में उनके कब्जे वाले क्षेत्र यानी असम वाला क्षेत्र जिसे हाल ही में संधि के चलते जीते अंग्रेजों ने हासिल किया था इन्हीं क्षेत्रों के बीच खासी पहाडींयां स्थित थी। अतः इसे भी वे अपना ही अधि ग्रहीत क्षेत्र मानते थे। अतः अंग्रेज गुवाहाटी को सिलहट से जोड़ने के लिए इस क्षेत्र से होकर एक सड़क का निर्माण करना चाहते थे ताकि हफ्तों की यात्रा को कम किया जा सके।

ब्रिटिश राजनीतिक नेता डेविड स्का्ट ने खासी स्वामित्व वाली पहाड़ीयों से होकर सड़क बनाने की अनुमति लेने के लिए सरोट सिंह से संपर्क किया। यू तिरोट सिंह सड़क परियोजना की अनुमति के बदले में असम के दर्रो में अपने अधिकार फिर से पाना चाहते थे। दो दिवसीय दरबार सत्र के बाद सभा ने अंग्रेजों का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। स्काट ने तिरोट सिंग को असम में प्रवेश करने वाले दर्रों पर नियंत्रण और क्षेत्र में मुक्त व्यापार करने देने का वादा किया।

राजा बलराम सिंह का विरोध

राजा बलराम सिंह ने यू तिरोट सिंह के दर्रे पर दावे का विरोध किया। अतः तिरोट सिंह दिसंबर 1828 में अपने दावे को साबित करने के लिए सशस्त्र लोगों के दल के साथ गए। उन्हें उम्मीद थी की ब्रिटिश सेना उनका सहयोग करेगी लेकिन ब्रिटिश पैदाइशी दोगले थे जो समझौता करने और झूठ बोलने में माहिर थे। अतः रास्ते में उनका सामना ब्रिटिश सिपाहियों के समूह से हुआ जो कि उनका रास्ता रोकने के लिए खड़े थे। इस घटना से तिरोट सिंह को यह अच्छे से समझ आ गया कि ब्रिटिश कंपनी ने उनके साथ धोखा किया है।

नोघखलाव पुलिस चौंकी

जब तिरोट सिंह को पता चला कि ब्रिटिश असम में सैनिकों की संख्या बढ़ा रहे है तब उन्होंने एक और दरबार बुलाया दरबार के योजना के अनुसार ब्रिटिश सेना को नोंघखलाव खाली करने का आदेश जारी किया गया। खास बात यह है कि ब्रिटिश कंपनी ने उनके आदेश को नजरंदाज किया और अपना काम जारी रखा। अतः उनकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया न आने पर 4 अप्रैल 1829 को तिरोट सिंह ने अपने लोगों के साथ नोंघखलाव की ब्रिटिश चौंकी पर हमला कर दिया।

उनके आदेश पर ब्रिटिश अधिकारी रिचर्ड गर्डन बेडिंग फील्ड और फिलिप बाउल्स बर्लटन को मार दिया गया। इस घटना के बाद जवाबी कार्यवाही करते हुए ब्रिटिश सेना ने तिरोट सिंह और बाकी के सभी खासी सरदारों के खिलाफ युद्ध अभियान शुरु किया।

एंग्लो खासी युद्ध

यह युद्ध 1829 से 1833 तक नोंघखलाव की जनजाति समुदाय और अंग्रेजों के बीच लड़ा गया जिसका नेतृत्व तिहोट सिंह जी ने किया था। जब उन्हें  खबर मिली की अंग्रेज गुवहाटी और सिलहट से अपने अतिरिक्त सैनिकों को लाकर इकट्ठा कर रहें हैं तब वे समझ गए कि अंग्रेज ब्रह्म पुत्र और सुरमा घाटियों के बीच स्थित संपूर्ण क्षेत्र पर कब्जा करना चाहते हैं।

अपने राज्य पर मंडरा रहे खतरे को देखते हुए पहले उन्होंने आदेश जारी किया कि वे इन क्षेत्रों से वापिस चलें जाएं मगर आदेश की नजरंदाजी  को देख कर पहले 4 अप्रैल 1829 नोघखलाव की पुलिस चौंकी पर हमला किया और दो ब्रिटिश अधिकारियों का मार डाला गया।

इस प्रकार यह युद्ध चार वर्षों तक लगातार चलता रहा हलांकि तिरोट सिंह की सेना के पास तकनीकी हथियारों की कमी थी इसके बावजूद तिरोट सिंह ने योद्धाओं के विशेष दल चुने और उन्हें गोला बारूद उत्पादन के लिए पहाड़ियों की गुप्त गुफाओं में तैनात किया। क्योंकि वे जानते थे कि खुले मैदान में अंग्रेजों के साथ वे नहीं लड़ पायेंगी इसलिए उन्होंने गोरिल्ला  युद्ध की विभिन्न स्थानीय रुप से विकसित तकनीकों का प्रयोग किया।

उन्हें अपने पहाड़ी भूभाग का  विशेष ज्ञान था जिसका लाभ युद्ध में अपनी रणनीतियों को अंजाम देने के लिए किया। रात्रि के समय अचानक पुलिस चौंकीयों पर हमला करके उन्होंने अंग्रेजों को हैरान कर दिया। गंभीर गोली लगने बावजूद तिरोट सिंह का शौर्य कम नहीं हुआ। वे अपने कुशल जासूसों के संगठन और अपने निपुण कौशल के लिए जाने जाते थे। हलांकि युद्ध में उनकी हार हुई मगर उनके अमर शब्दों को आज भी नहीं भुलाया जा सकता है।

वे कहते थे कि किसी के अधीन शासन करने से बेहतर है कि एक स्वतंत्र राजा के रुप में मौत को गले लगाना। इनके इन शब्दों ने उनकी प्रजा में साहस और शक्ति का संचार किया जिसके तहत वे इतनी बहादुरी से मैदान में लटे रहे।

मृत्यु

तिरोट सिंह ने सम्पूर्ण युद्ध तलवार और भाले जैसे देशी हथियारों से लड़ा जिसके चलते वे अंग्रेजों की गोलियों का शिकार हो गए जिसके चलते उन्हें इलाज के लिए एक गुफा में छिपना पड़ा ताकि अपना इलाज करवा सके। अंत में उन्हीं के समूह के एक सरदार ने उन्हें धोखा दिया और उनके छिपने का पता अंग्रेजों को बता दिया जिसके चलते 1833 में अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। उन्हें धोखा देने वाले सरदार को उनकी मुखबिरी करने लिए अंग्रेजों द्वारा सोने के सिक्कों की रिश्वत दी गई।

संक्षिप्त मुकदमे के बाद उन्हें ढाका की केंद्रीय जेल भेज दिया गया जहां 17 जुलाई 1835 में उनकी मौत हो गई।

सरकार द्वार किए गए महत्वपूर्ण कार्य

तिरोट सिंह दिवस
मेघालय सरकार द्वार हर साल 17 जुलाई को उनके बलिदान दिवस के रुप में यू तिरोट सिंह दिवस के रुप में मनाया जाता है जो उनके ऐतिहासिक संघर्ष कि याद दिलाता है।

स्मारक की स्थापना
मेघालय माईरांग शहर में तिरोट सिंह मेमोरियल का निर्माण कराया गया जिसका शिलान्यास देश की स्वतंत्रता के बाद दिसंबर 1952 में किया गया था और 1954 में इसे जनता को समर्पित किया गया।

बांग्लादेश के ढाका में स्मारक
क्योंकि तिरोट सिंह को अंग्रेजों ने बंदी बनाकर ढाका जेल में रखा था जिसके कारण भारत सरकार के विदेश मंत्रालय तथा मेघालय सरकार के संयुक्त प्रयासों से ढाका के इंदिरा गांधी सांस्कृतिक केंद्र में उनकी प्रतिमा का अनावरण 16 फरवरी 2024 को किया गया है । जो कि दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करता है।

भारतीय डाक टिकट
भारत सरकार ने उन्हें सम्मान और देश के प्रति उनके बलिदान को याद करने तथा उन्हें राष्ट्रीय पहचान देने के लिए  3 फरवरी 1988 को 60 पैसे का विशेष डाक टिकट जारी किए थे।

सांस्कृतिक केंद्र और पार्क
पूर्वोत्तर भारत और मेघालय में कई सार्वजनिक स्थलों तथा सांस्कृतिक केंद्रों एवं मार्गों का नामकरण उनके नाम पर किया गया है ताकि युवा पीढ़ी उनके देश प्रेम से प्रेरणा ले सके। 

 निष्कर्ष

यह कहा जा सकता है कि मेघालय की पहाड़ियों से उठे महान स्वतंत्रता सेनानी यू तिरोट सिंह का जीवन केवल एक क्षेत्रीय संघर्ष की कहानी नहीं है बल्कि यह औपनवेशिक शासन के विरुद्ध भारतीय स्वाभिमान स्वतंत्रता और मातृभूमि की रक्षा का एक अमर प्रतीक है।

ब्रिटिश शासन की आधुनिक सैन्य शक्ति और कूटनीतिक छल के आगे बिना झुके उन्होंने जिस साहस और दृढ़ता के साथ  गौरिल्ला युद्ध का नेतृत्व किया वह इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है।

ढाका जेल में अपनी शहादत देने से पहले उनका यह विचार कि किसी विदेशी के अधीन गुलाम बनकर जीने से बेहतर है अपनी मातृभूमि के लिए लड़ते हुए प्राण देना सम्मान की बात है। उनके यह शब्द आज भी देशवासियों के दिल में देश भक्ति की अलख जगाता है।

उनके बलिदान को नमन करते हुए उनकी स्मृति यों को आज राष्ट्रीय स्तर पर जो सम्मान दिया जा रहा है वे आने वाली पीढ़ियों को हमेशा राष्ट्रसेवा और कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ने के लिए सदैव प्रेरित करता रहेगा।  

कोई टिप्पणी नहीं: