प्रस्तावना
प्रस्तुत लेख में हम लाल किला के इतिहास के बारे में विस्तार से चर्चा करने जा रहे हैं तथा भारतीय इतिहास के में इसके महत्व के बारे में समझने की कोशिश करेंगे। इसके साथ ही हम लाल किले के समीप शहर शाहजहानाबाद के ऐतिहासिक महत्व के बारे में चर्चा करेंगे।
इसके साथ ही हम लाल किले पर हुए हमलों तथा लुट की घटना पर चर्चा करेंगे खास बात यह है कि लाल किला कभी भी किसी युद्ध का केंद्र नहीं था।
परिचय
यह एक ऐतिहासिक मुगल किला है जिसे मुगल शासकों द्वारा आगरा से दिल्ली को अपनी राजधानी स्थानांतरित करने के दौरान बनवाया गया था। इस किले का निर्माण मुगल शासक शाहजहाँ द्वारा 12 मई 1639 में करवाया गया था। किले के निर्माण में फारसी और भारतीय स्थापत्य कला शैली का प्रयोग किया गया है। इस किले का प्राचीन नाम किला-ए-मुबारक था जो कि शाही परिवार का निवास स्थान था।
किले के निर्माण में सफेद और लाल पत्थर का इस्तेमाल किया जाने के कारण इस लाल किला कहा जाता है। जिसमें लाल शब्द हिंदी भाषा का है वहीं किला शब्द फारसी भाषा से लिया गया है। खास बात यह है कि इस किले के निर्माण का कार्य उस्ताद अहमद लाहौरी को सौंपा गया था ये वहीं शख्स हैं जिन्होंने ताज महल का निर्माण किया था। जो वर्तमान समय में भी अपनी निर्माण कला शैली तथा अपनी खूबसूरती के लिए प्रसिद्ध है।
लाल किला यमुना नदी के किनारे बनवाया गया तथा इसके किनारों पर गहरी खाईयां खुदवाईं गयी थी। इसका निर्माण कार्य पवित्र इस्लाम के महीने और मुहर्रम के समय में 13 मई 1638 में शुरु किया गया था। इसके साथ ही शाहजहां की देख रेख में यह पूरा किला 6 अप्रैल 1648 में बन कर पूर्ण हुआ। यह किला पूरे शाहजहानाबाद का केंद्र बिंदु था जिसे हम वर्तमान समय में पुरानी दिल्ली के नाम से जानते है।
शाहजहां की मृत्यु के बाद उनके उत्तराधिकारी औरंगजेब ने सम्राट के निजी कमरों में मोती मस्जिद का निर्माण करवा कर लाला किले और समृद्ध बनाने में अपना योगदान दिया। इसके साथ ही उन्होंने महल तक के मार्ग को अधिक घुमावदार बनाने के लिए मुख्य द्वारों के सामने दो बुर्ज का निर्माण भी करवाया था।
पहली लूट की घटना
किले को पहली बार फारसी सम्राट नादिर शाह ने 1739 में लुटा जब उसने 2लाख सैनिक टुकड़ी के साथ मुगल सेना को पराजित किया था। इस समय मुगल सम्राट औरंगजेब की मौत हो चुकी थी जिसके बाद 1712 में जहांदर शाह को मुगल शासन की गद्दी पर बिठाया गया था लेकिन एक वर्ष बाद ही षड्यंत्र कारियों ने उसकी हत्या कर दी गयी। इस प्रकार 1739 के समय काल में फर्रुखसियर को मुगल शासक बनाया जा चुका था।
अतः फर्रुखसियर की हार के बाद नादिर शाह ने लाल किले को लूटा। इस लूट में मुगल साम्राज्य का मयूर सिंहासन भी था जिसे लूट कर नादिर शाह फारस ले गया। हलांकि इससे पहले वह दिल्ली में लगभग तीन महीनों तक रुका रहा। इस आक्रमण ने शहर को काफी नुकसान पहुंचाया इसी बीच अगला मुगल शासक मुहम्मद शाह को गद्दी पर बिठाया गया। इसके शुरुआती शासन काल से ही मुगल साम्राज्य कमजोर होना प्रारम्भ हो गया था।
मराठों द्वारा शोषण
इस आंतरिक कमजोरी के कारण मुगल शासन सिर्फ नाम मात्र का ही रह गया था। इसी बीच मराठों की बढ़ती ताकत के चलते मुगलों को 1752 में मराठों के साथ संधि हस्ताक्षरित करनी पड़ी। इस संधि के तहत मराठों को दिल्ली सिंहासन का संरक्षक घोषित किया गया।
1758 में मराठों ने सरहिंद में अफगान शासकों पर अपनी विजय स्थापित की मगर आगे चलकर पानीपत की लड़ाई में मराठों की हार हुई। इस घटना ने मराठों को अहमद शाह दुर्रानी के साथ संघर्ष में धकेल दिया। दुर्रानी से हारने के बाद कर्ज अथवा मुआवजा चुकाने के लिए 1760 में मराठों ने दुर्रानी सेना से दिल्ली की रक्षा के लिए धन जुटाने हेतु दीवाने-ए-खास की चांदी की छत को उतारकर पिघला दिया।
मराठा 1761 में दुर्रानी सेना द्वारा पानीपत की तीसरी लड़ाई में हारने के बाद दुर्रानी सेना ने दिल्ली पर आक्रमण किया। जिसके बाद दिल्ली पर रोहिल्ला अफगान शासक दुर्रानी का प्रशासन 10 सालों तक रहा। जिसके बाद सम्राट शाह आलम द्वितीय के आदेश पर मराठों ने एक बार फिर से आक्रमण किया और दुर्रानी सेना को हराकर फिर से दिल्ली पर मुगल प्रशासन स्थापित किया।
1764 का आक्रमण
यह आक्रमण भरत पुर के जाट शासक महाराजा जवाहर सिंह द्वारा किया गया जिसमें उन्हें जीत भी हासिल हुई। जवाहर सिंह ने 40000 सैनिक टुकड़ी के साथ अवध से जोधपुर तक फैले क्षेत्र को लूटा। बात चीत के बाद सिख सेना दिल्ली से पीछे हटने और मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय को गद्दी पर बिठाने के लिए सहमत तो हुई मगर दिल्ली छोड़ने से पहले जाट समुदाय ने यह शर्त रखी की मुगल शासक दिल्ली में सात सिख गुरुद्वारों का निर्माण करवायेंगे।
मुगल प्रशासन द्वारा इस पर सहमति भी दी गयी अंत में दिल्ली में गुरु द्वारों का निर्माण भी करवाया गया जिसमें से गुरुद्वारा सिस गंज साहिब भी एक था।
1788 का आक्रमण
यह आक्रमण रोहिल्ला गुलाम कादिर ने किया था जो कि नजीब अद-दौला का पोता था। इसने मुगल शाही परिवार की महिलाओं की हत्या करवा दी तथा सम्राट शाह आलम द्वितीय को भी कैद कर दिया। बदले में मराठा शासक महादजी शिंदे ने अपने सैनिकों को शाह आलम को छुड़ाने और रोहिलखंड के घोसगढ़ में छिपे होने की जानकारी मिलने पर उस पर हमला कर दिया और पकड़ कर उसका सर कलम कर दिया गया।
इस जीत की उपलब्धि के रुप में मराठा ध्वज को 1803 तक यानी 15 सालों तक लाल किले पर मराठा ध्वज फहराने की अनुमति दी गई।
1803 का आक्रमण
द्वितीय एंग्लो-मराठा युद्ध के दौरान ब्रिटिश सेना ने दिल्ली के युद्ध में दौलत राव सिंधिया के संचालन में लड़ रही मराठा सेना को हराया। जिस कारण से दिल्ली पर लाल किला सहित मराठों का शासन समाप्त हुआ। इसके बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ने मुगल क्षेत्रों का प्रशासन अपने हाथों में ले लिया।
किले पर कब्जा करने वाले अंतिम मुगल शासक बहादुर शाह जफर ने भारत में कंपनी शासन के खिलाफ 1857 की क्रांति में भाग लिया और अंग्रेजों के विद्रोही बन गए। इस विद्रोह में उनका साथ शाहजहानाबाद की जनता ने दिया।
1857 का विद्रोह
मुगल सत्ता की राजधानी होने और अपनी रक्षात्मक क्षमताओं के बावजूद लाल किला 1857 के विद्रोह के दौरान किसी भी संघर्ष का स्थल नहीं थी। बहादुर शाह ने 17 सितंबर 1857 में किला छोड़ दिया और बाद में ब्रिटिश सेना द्वारा उसे पकड़ लिया गया। 1858 ब्रिटिश सेना द्वारा उन पर मुकदमा चलाने से पहले उन्हें दोबारा लाल किले में लाया गया जिसके बाद इसी वर्ष 7 अक्तूबर को रंगून भेज दिया गया।
मगर विद्रोह के समाप्त होने के बाद ब्रिटिश अधिकारियों ने लाल किले को ध्वस्त करने का आदेश जारी किया जिसके चलते किले की 80 प्रति शत संरचनाएं ध्वस्त कर दी गईं। जिनमें वह पत्थर की दीवार भी शामिल थी जो कभी किले को नदी की ओर वाले आगे के हिस्से पर बने मंडपों से जोड़ती थी।
अंग्रेजों द्वारा किले का सारा फर्नीचर य तो हटा दिया गया य नष्ट कर दिया गया। हरम के कमरे नौकरों की कमरे और बगीचों को ध्वस्त कर दिया गया और उनके ऊपर पत्थर की बैरक की एक पंक्ति खड़ी कर दी गई। शाही परिसर के पूर्वी हिस्से में स्थित संगमरमर की इमारतें पूर्ण विनाश से बच गईं।
हलांकि विध्वंस के दौरान उन्हें नुकसान पहुंचाया गया था इसके साथ ही रक्षात्मक दीवारें और मीनार सुरक्षित रह गए। आंतरिक संरचनाओं का दो-तिहाई से अधिक हिस्सा ध्वस्त कर दिया गया। इसके बाद लार्ड कर्ज़न जो की 1899 से 1905 के समय काल तक भारत के वायसराय थे ने लाल किले का जीर्णोद्धार करने का प्रयास किया। जिसके तहत इसकी दीवारों का पुनः निर्माण करवाया गया और मीनारें सुरक्षित की गयी।
1947 की घटना
प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने लाहौर गेट के ऊपर से 15 अगस्त 1947 को पहली बार तिरंगा फहराया जो भारत के पहले स्वतंत्रता दिवस का प्रतीक बन गया।
2000 का आतंकवादी हमला
लाल किले पर 22 दिसंबर 2000 को लश्कर-ए-तैबा के छह सदस्यों ने आतंकवादी हमला किया था। इस हमले में दो सैनिक और एक नागरिक मारे गए थे। समाचार मीडिया ने इसे तत्कालीन चल रही भारत-पाकिस्तान शांति वार्ता को पटरी से उतारने का प्रयास बताया था।
2003
21वीं सदी के बाद इस स्थल में कुछ ही परिवर्तन हुए और लाल किले का उपयोग सैन्य छावनी के रुप में जारी रहा। लाल किले का एक महत्वपूर्ण हिस्सा 22 दिसंबर 2003 तक भारतीय सेना के नियंत्रण में रहा, जब इसे जीर्णोद्धार और संरक्षण के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को सौंपा गया।
2009 में किले के पुनरुद्धार के लिए सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के तहत भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा तैयार की गई व्यापक संरक्षण और प्रबंधन योजना सी सी एम पी की घोषणा की गई।
2018 डालमिया समूह
अप्रैल 2018 में डालमिया समूह ने सरकार की विरासत गोद लें योजना के तहत 25 करोड़ के अनुबंध के माध्यम से पांच साल की अवधि के लिए लाल किले के रखरखाव विकास और संचालन का जिम्मा लिया था। पर्यटन और संस्कृति मंत्रालय तथा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए।
एक निजी संस्था द्वारा लाल किले को गोद लेने से व्यापक आक्रोश और बहस छिड़ गई, जिससे जनता इतिहासकारों और राजनीतिक दलों की आलोचना हुई। इस कदम के कारण सोशल मिडीया पर सरकार की बहुत बदनामी हुई। इसके बाद कांग्रेस सरकार ने मई 2018 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने केंद्रीय पुरातत्व सलाहकार बोर्ड निष्पक्ष समीक्षा किए जाने तक समझौते को निलंबित करने की मांग की।
2019 के दौरान
21 वीं सदी में लाल किला परिसर में कई संग्रहालय और दीर्घाएं जोड़ी गई हैं। इनमें से चार संग्रहालय जिनका उद्घाटन 2019 में हुई था। परिसर के भीतर औपनिवेशिक काल की बैरकों में स्थित हैं। बैरक बी1 1857 की स्वतंत्रता संग्राम को समर्पित है। बैरक बी 4 जिसे दृश्यकला के नाम से जाना जाता है भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और दिल्ली आर्ट गैलरी के बीच एक सहयोग है और भारतीय कला का प्रदर्शन करता है।
भारतीय स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालय मुमताज महल संग्रहालय और नौबत खान संग्रहालय सहित पहले के संग्रहालयों को बंद कर दिया गया है और उनके प्रदर्शनों को इन नव स्थापित संग्रहालयों में स्थानांतरित कर दिया गया है।
2021 भारतीयों किसानों का विरोध स्थल
26 जनवरी 2021 को भारतीय किसानों ने गणतंत्र दिवस विरोध प्रदर्शन के दौरान प्रदर्शनकारी किसानों के एक समूह ने किले में घुसपैठ की और विद्रोह के प्रचार में झंडे फहराने के लिए किले के गुंबदों पर चढ़ गए। प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़पों के कारण किले को नुकसान पहुंचा। पुलिस की चेतावनी के बाद इसे खाली करा लिया गया।
2025 दौरान
यह स्मारक पर्यावरणीय प्रदूषण के कारण प्रभावित हो रही है जिसके कारण लाल किले का रंग लाल से काला हो गया है। सितंबर 2025 में हुए हालिया इतालवी-भारतीय अध्ययनों के अनुसार वायु प्रदूषण की बार-बार होनी वाली घटनाओं ने लाल किले की दीवारों पर चिपचिपी काली पपड़ी बनने में योगदान दिया है। ये काली पपड़ी प्रदूषण के कारण होती है जिनमें मुख्य कण नाइट्रोजन डाइआक्साइड कार्बन मोनोआक्साइड और सीसा तांबा और जस्ता जैसी जहरीली धातुएं शामिल है।
निष्कर्ष
यह किला केवल पत्थरों की इमारत नहीं बल्कि भारत के गौरवशाली इतिहास और मुगल काल की स्थापत्य काला का अद्भुत प्रतीक है। हर साल यहां 15 अगस्त को प्रधान मंत्री द्वारा तिरंगा झण्ड़ा फहराया जाना देश की आजादी और सम प्रभुता की याद दिलाता है। अतः हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए ये हमारी जिम्मेदारी है की हम इस ऐतिहासिक धरोहर को सुरक्षित रखें ताकि हमारे आगे आने वाली पीढ़ियां हमारे इतिहास और संस्कृति को याद रखें।
लाल किले को वर्ष 2007 के समय काल के दौरान यूनेस्को की विश्व धरोहर की सूची में शामिल किया गया था। जिसका मुख्य कारण मुगल वास्तु कला ऐतिहासिक महत्व तथा इसमें मिलने वाले इस्लामी पर्सियन तिमुरिद तथा हिंदू कला के संयोजन के कारण इसे यह दर्जा दिया गया है।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें